वामन महा पुराण
21 कुरुक्षेत्र के तीर्थ तथा प्राची सरस्वती का माहात्म्य
ऋपय ऊचुः ।
काम्पकस्य तु पूर्वेण कुञ्ज देवैर्निपेवितम् ।
तस्य तीर्थस्य संभूति विस्तरेण ब्रवीहि नः ॥ १
लोमहर्पण उवाच ।
शृण्यन्तु मुनयः सर्वे तीर्थमाहात्म्यमुत्तमम् ।
ऋपीणा चरितं श्रुत्वा मुफ्तो भवति किस्निपैः ।। २
नैमिपेयाश्च मपयः कुरुक्षेने समागताः ।
सरस्वत्यास्तु स्नानार्थ प्रवेशं ते न लेभिरे ।। ३
ततस्ते कल्पयामासुस्तीथं यज्ञोपनीतिकम् ।
शेपास्तु मुनयस्तत्र न प्रवेशं हि लेभिरे ।।४
( उस दिन) भोजन से सयुक्त चार फरक (पान-विशेप) एव अपूपों (मालपुआ) से युक्त कलश दान करना चाहिये । प्रथम अन्नसयुक्त करकों से देवता की पूजा करने के अनन्तर सर्वपातक नाशक कलश का दान करे। इसी विधान से स्नान करने वाला समस्त पापों से मुक्त होकर परम पद प्राप्त करता है। अन्य समय भी मङ्गल के दिन पछी तिथि होने पर उस तीर्थ में पूर्वोक्त क्रिया मुक्ति फलदायिनी होगी। (२६-३०)
हे द्विजोत्तमो । सभी तीर्थों के तीर्थभूत जिस तीर्थ मे स्नान करने से सर्वदेवों से अनुज्ञात होकर मनुष्य परम पद प्राप्त करता है उसे सर्वपाप नाशक काम्यकवन (कहा जाता है)। (३१-३२)
इसमे प्रवेश करने से ही मनुष्य समस्त पापों से हो जाता है। इस पवित्र वन का आश्रय प्रहण कर पूपा नामक सवितृदेव प्रकटरूप से स्थित है। (३३)
हे द्विजश्रेप्टो । उनके दर्शन से मुक्ति प्राप्त होती है। रविवार के दिन उस तीर्थ मे स्नान करने वाला मनुष्य विशुद्ध देवाला हो जाता है और अभीष्ट को प्राप्त करता है। (३४)
श्रीवामनपुराण के सरोमाहात्म्य मे बीसवाँ अध्यार समाप्त ॥२०॥
२१
ऋषियों ने कहा-आप हम लोगों से काम्यक के पूर्व में देवों से निपेवित फुलतीर्थ की उत्पत्ति का वर्णन विस्तार पूर्वक करें। (१)
लोमहर्षण ने कहा-हे मुनियों। आप सभी तीर्थ के उत्तम माहात्म्य को सुनें । ऋपियों का चरित्र सुनकर मनुष्य पाप से मुक्त हो जाता है।
नैमिपारण्य के ऋपि कुरक्षेत्र में सरस्वती में स्नान करने आये । परन्तु वे प्रवेश न कर पाये। । (३)
तदनन्तर उन्होंने यज्ञोपवीतिक नामक तीर्थ की रचना की। शेप मुनिलोग उसमें भी प्रवेश न कर पाये। (४)
रन्तुकस्याश्रमात्तायद् यापत्तीर्थ सचक्रकम् ।
ब्राह्मणैः परिपूर्ण तु दृष्ट्वा देवी सरस्वती ॥५
हितार्थ सर्वविप्राणां कृत्वा कुलानि सा नदी ।
प्रयाता पश्चिमं मार्ग सर्वभूतहिते स्थिता ॥६
पूर्वप्रवाहे यः स्नाति गङ्गास्नानफल लभेत् ।
प्रवाहे दक्षिणे तस्या नर्मदा सरितां वरा ॥ ७
पश्चिमे तु दिशाभागे यमुना संश्रिता नदी ।
यदा उत्तरतो याति सिन्धुर्भवति सा नदी ॥ ८
एवं दिशाप्रवाहेण याति पुण्या सरस्वती ।
तस्यां स्नातः सर्वतीर्थे स्नातो भवति मानवः ।।
ततो गच्छेद् द्विजश्रेष्ठा मदनस्य महात्मनः ।
तीर्थ त्रैलोक्यविख्यातं विहारं नाम नामतः ॥ १०
यत्र देवाः समागम्य शिवदर्शनकाशिणः ।
समागता न चापश्यन् देवं देव्या समन्वितम् ॥ ११
ते स्तुवन्तो महादेवं नन्दिनं गणनायकम् ।
ततः प्रसन्नो नन्दीशः कथयामास चेष्टितम् ।। १२
भवस्य उमया सार्थ विहारे क्रीडितं महत् ।
तच्छुत्या देवतास्तत्र पत्नीराहय क्रीडिताः ॥ १३
तेषां क्रीडाविनोदन तुष्टः प्रोवाच शंकरः ।
योऽस्मिस्तीथेन स्नाति विहारे श्रद्धयाऽन्वितः ।। १४
धनधान्यप्रियैर्युक्तो भवते नात्र संसयः ।
दुर्गातीय ततो गच्छेद् दुर्गया सेवितं महत् ॥ १५
यत्र स्नात्या पितॄन् पूज्य न दुर्गतिमवाप्नुयात् ।
तत्रापि च सरस्वत्याः कूपं त्रैलोक्यविश्रुतम् ॥ १६
दर्शनान्मुक्तिमाप्नोति सर्वपातकवर्जितः ।
यस्तत्र तर्पयेद् देवान् पितृय अड्यान्वितः ॥ १७
अक्षय्यं लभते सर्व पितृतीर्थ विशिष्यते।
मातृहा पितृहा यश्च ब्रह्महा गुरुतल्पगः ॥ १८
स्नात्वा शुद्धिमवाप्नोति यत्र प्राची सरस्वती ।
देवमार्गप्रविष्टा च देवमार्गेण निःसृता ।। १९
प्राची सरस्वती पुण्या अपि दुष्कृतकर्मपाम् ।
त्रिरात्रं ये करिष्यन्ति प्राची प्राप्य सरस्वतीम् ।। २०
रन्तुक के आश्रम से सचक्रक तीर्थ तक (समस्त स्थल को) ब्राह्मणों से परिपूर्ण देखकर देवी सरस्वती ने सभी विनों के हितार्थ बुओं की सृष्टि की एवं तदनन्तर सर्वभूतों के हित में रत वह नदी पश्चिम की ओर चली गई । (५-३)
उसके पूर्व प्रवाह में स्नान करने वालों को गङ्गा स्नान का फल प्राप्त होता है। उसके दक्षिण प्रवाह में सरिद्वरा नर्मदा एवं पश्चिम दिशा की ओर यमुना नदी आश्रित है तथा जब उत्तर की ओर वह नदी जाती है तो सिन्धु होती है। (७-८)
इस प्रकार विभिन्न दिशाओं में पवित्र सरस्वती नदी प्रवाहित होती है। उसमें स्नान करने वाला मनुष्य सभी तीथों में स्नान कर लेता है।(६)
हे द्विजश्रेष्ठो ! तदनन्तर महात्मा मदन के विहार नामक त्रैलोक्य विख्यात तीर्थ में जाना चाहिये । (१०)
जहाँ शिवदर्शनाभिलापी देवता सामूहिक रूप से आये किन्तु वे देवीसंयुक्त देव का दर्शन न कर पाये। वे लोग गणनायक महादेव नन्दी की स्तुति करने लगे। इससे प्रसन्न होकर नन्दीश ने (उन लोगों से) विहार में उमा के साथ की जा रही शिर की क्रीडा का वर्णन किया ।
यह सुनकर देवताओं ने भी अपनी पत्नियों को बुलाकर क्रीडा की। (१२-१३)
उनके क्रीडा विनोद से प्रसन्न शंकर ने कहा-इस विहार तीर्थ में जो श्रद्धापूर्वक स्नान करेगा यह निरसदेह धन-धान्य एवं प्रिय से युक्त होगा। तदनन्तर दुर्गासेवित महान दुर्गातीर्थ मे जाना चाहिए। (१४-१५)
वहाँ स्नान कर पितरों की पूजा करने से मनुष्य की दुर्गति नहीं होती । वहाँ सरस्वती का त्रैलोक्य-विख्यात कूप उसके दर्शन से ही मनुष्य सर्वपाप-रहित होकर मुक्ति प्राप्त करता है। वहाँ श्रद्धा से देवता और पितरों का तर्पण करने वाला व्यक्ति समरत अक्षय (पदायों) को प्राप्त करता है। पितृतीर्थ विशेष (महत्त्वपूर्ण) है।माता, पिता और ब्राह्मण का घातक तथा गुरुपत्नी गमन करने वाला उस तीर्थ में स्नान करने से शुद्ध हो जाता है। वहीं प्राचीप्रवाहिनी सरस्वती देव- मार्ग से प्रविष्ट होकर देवमार्ग से नि सत हुई हैं । (१७-१८)
प्राची सरस्वती पापात्माओं के लिए भी पुण्यदायिनी हैं। प्राची सरस्वती के निकट जाकर जो त्रिरात्र व्रत करता है उसकी देह में कोई दुष्कृत नहीं रह जाता। नर और
न तेषां दुग्छवं किंचिद् देहमाश्रित्य निष्ठति ।
नरनारायणी देयो प्रक्षा स्थाणुस्तया रसिः ॥ २१
प्राची दिशं निपपन्ने नदाचा. मगमगाः।
ये तु श्राद्धं करिष्यन्ति प्राचीमाश्रित्य मानगः ॥ २२
तेषां न दुर्लभ किनिदिह लोके परसर ।
सम्मान प्राची गदा मेय्या पशम्यां न पिछपतः ।। २३
पगम्या सेवमानस्तु लक्ष्मीन जायने नरः ।
तत्र सीर्थमीशनं प्रैलोक्यम्यापि दुर्लभम् ।। २४
उशना यत्र मंमिडाराप्य परमेश्वरम् ।
प्रदमध्येपु पूज्यने तम्य वीर्षम्य सेवनात् ।। २५
एवं शुक्रेण मुनिना सैरिवं तीसचमम् ।
ये सेपन्ने श्रध्यानास्ने यान्ति परमां गतिम् ॥ २६
यम्नु भाई नरो मस्त्या तस्मिन्तीय परिप्पति ।
पिवरम्तारिताम्तेन भविष्यन्ति न संशयः॥२७
चतरा प्रमतीर्थ मरो मर्यादया स्थितम् ।
ये सेबन्ने चतुर्दश्यां मोपरामा पमन्ति ॥ २८
अष्टम्या कृष्णपरम्य पत्र मामि दिनोचमाः।
ते पश्यन्ति परं ममं यम्मानापर्तने पुनः ॥ २९
म्यागुतीर्थ वती गर्छन् महसलियोमितम् ।
या पाणु पटं दृष्ट्या मुक्तो भरति रिसिपः ॥ ३०
इति श्रीवामनपुराण सरोमाहत्मये सम्पपडियः ॥२॥