वामन का बलि के यज्ञवाद में प्रवेश एव बलि से पद वर की याचना, वामन का विराट् रुप प्रह्ण एवं उनका त्रिविकम रुप, बाण का वामन से बलि-बन्धन विषयक प्रश्न, वामन का बलि को वर प्रदान, बलि का पाताल एव वामन का स्वर्ग गमन

पुलस्त्य उवाच।।

एतस्मिन्नन्तरें प्राप्नो भगवान् वामनांकृतिः ।

यज्ञयाटमुपागम्ये उर्वचनमब्रवीत् ।। "

*कारपूर्वाः 'श्रुतयो 'मसैस्मिन्

तिष्ठन्ति' रूपेण' तपोधनानाम् ।

यज्ञोऽश्वमेधः ' प्रवरः क्रतूनां

मुरयस्तथा सत्रिषुदित्यनाथः ॥२

इत्थं यचनमाकये दानवाधिपतिर्वशी।

सार्थपात्रः समभ्यागाद्या देवः स्थितोऽभवत् ॥ ३

ततोऽर्थ्य देवदेवेशमय॑मर्यादिनासुरः ।

भरद्वाजर्षिणा साधं यज्ञबाट प्रवेशयत् ।। ४,

प्रविष्टमा देवेशं प्रतिपूज्य विधानतः।

प्रोवाच भगयन् धूहि किं दमि तव मानद ॥५ ।

ततोऽब्रवीतू सुरथलो दैत्यराजानमव्ययः !

विहस्य सुचिरं कालं भरद्वाजमवेक्ष्य च ।।.६

गुरोर्मदीयस्य गुरुस्तस्यास्त्यमिपरिग्रहः।

न स धारयते भृम्यां पारक्यां जातवेदसम् ।।७।।

तदर्थमभियायेऽहं मर्म दानवपाथिय ।

मच्छरीरप्रमाणेन देहि राजन् पदत्रयम्

मुरारेर्वचनं श्रुत्या यलिर्भार्यामवेक्ष्य च

याणं च तनयं वीक्ष्य इदं वचनमब्रवीत् ॥ ९

न केवलं प्रमाणेन वामनोऽयं लघुः प्रिये,11

येन ममत्रयं ,मौराद् याचते बुद्वितोऽपि च ।। १०

प्रायो विधाताऽल्पधियां नराणां

पहिप्कृतानां च महानुभाग्यैः ।

धनादिकं मूरि न थै ददाति

६५

पुलस्त्य ने पहा-इतने मे यामनाकार भगवान आ गये। यज्ञशाला के समीप आर वे ऊँचे स्वर से कहने लगे-

ओंकार पूर्वक घेदमन्त्र तपोधन पियों के रूप में इस यज्ञ में स्थित है। यमों में अश्वमेधयज्ञ सर्वश्रेष्ठ है और दरपस्यामी पलि यशाओं में प्रधान है। (२)

इस प्रकार पे पचन फो मुनार जिसेन्द्रिय दानवाधि- पनि पछि आर्यपात्र लेकर सही यामनदेव गहे थे यही गये। (३)

तदनन्तर अर्य आदि से देवदेवेचर की पूजा करके अमुरपति पति ने भरद्वार मषि के साप करें याशय में प्रविष्ट किया।

गावाग में प्रवेश करते ही पति ने देश की विधिपूर्वक पूजा पी और पदा-दे भगवन् । हे माना। चाहिये में आपापा ?

अविनाशी देषश्रेष्ठ ने देर तक इस फर तयाँ भरद्वाज पो देसर देत्यराज से कहा- मेरे गुरु के गुरु अग्निहोत्री हैं। वे दूसरे की भूमि में नअग्निस्थापन नही करते। (७)

है दानपपति । हे राजन् । उनके लिए मैं आपसे याचना करता हूँ कि मेरे शरीर पे परिमाण से आप तीन पग (भूमि) मुद्दो प्रदान पर। (८)

मुरारि फायपन मुनने के उपरान्त पति ने पत्नी को और पुर पाण को देखकर यह पपन कहा-

हे प्रिये। यह मामन फेपर प्रमाण पेशी छोटा नही है, अपितु पुछिपा भी पोटा है। पोंकि मूर्गताप याद गुप्तमे पेबल गीन पग (भूमि) माँगता है। (१२)

पिपा। माय .भपयुद्धि पाले भाग्यहीन परियों अधिक धनादि नही सादगी से रिणु ने किया

अयेह विष्णोर्नमंडप्रयासंगालो

न ददाति विधिस्तस्यायस्य माग्यविपर्याणी

मयि दावरि यश्चायमच याचे पदवयम्

इत्येवमुक्त्वा पंचना महात्मा

 भूयोऽप्युवाचाया हरि र दनूजः

पाचस्व विष्णों जवानिभूमि

दासी हिरण्यं यदमीप्सितं च १३२

भवान् याचयिता विष्णो अहं दाता जगत्पतिमा

दातुर्याचयितुलजा कथं न स्यात् पदत्रये । १४

रसातलं वा पृथिवीं भुवं नाकमथापि वा ।

एतेभ्यः कतमं दद्या स्थानं याचस्व वामन ॥ १५

" यामन उवाच ।

गजाश्वभूहिरण्यादि तदधिम्या प्रदीयताम् ।

एतारता त्वहं चार्थी देहि राजन् पदत्रयम् ॥ १६

इत्येवमुक्ते वचने वामनेन महासुरः।।।।

पलिभृङ्गारमादाय ददौ विष्णोः प्रमत्रयम् ।। १७

पाणी तु पतित तोये दिव्यं रूपं अकार:

त्रैलोक्यक्रमणार्थायी बहुरूपं जगन्मयम् सिटमा

पनयां भूमिस्तथा जड्वे नमस्त्रैलोक्ययन्दितः ।

सत्यं तपो नानुयुग्मे ऊरुन्या मेरुमन्दरी ॥

विश्वेदेवा कटीमागे मरुतो वस्तिशीर्षगा। मागे

लिङ्गे स्थितो मन्मथच घृपणाभ्यां प्रजापतिः । २०१०

कुक्षिम्यामर्णयाः सप्त जठरें भुवनानि च ।

वलिपु त्रिपु नद्यश्च यज्ञास्तु जठरे स्थिताः ।। २१

इष्टापूर्वादयः सर्वाः क्रियास्तत्र तु संस्थिताः ।

पृष्ठस्था यसको देवाः स्कन्धी रुद्रैरधिष्ठितौ ॥ २ ।

यावश्च दिशः सर्या वसयोऽष्टौ करे स्मृताः ।

हृदये संस्थितो ब्रह्मा कुलिशों हृदयास्थिषु ॥ २३

श्रीसमुद्रा उरोमध्ये चन्द्रमा मनसि स्थितः ।।

ग्रीवादितिर्देवमाता विद्यारतद्वलयस्थिताः ॥ २४

गुखे तु साग्नयो विप्राः संस्कारा देशनच्छदाः।

धर्मकामार्थमोक्षीयाः शास्त्राः शौचसमन्विताः २५

प्रयास नहीं किया। (११)

जिसका भाग्य विपरीत होता है, उसे विधाता नहीं देते हैं। मेरे ऐसा दाता होने पर भी आज ये तीन पग की याचना करते हैं। (१२)

ऐसा कह कर महात्मा पलि ने पुनः हरि से कहा- हे विष्णु ! हाथी, घोड़ा, भूमि, दासी तथा सुवर्ण आदि जो आप चाहते हों, यह मोंगिये । (१३)

आप विष्णु याचक और में जगत्पति दाता हूँ। ऐसी स्थिति में केवल तीन पग का दान करने में दाता त्वं याचक को क्यों लज्जा न होगी? (१४)

हे वामन ! आप याचना करें। रसातल, पृथ्वी, भुवर्लोक अथवा स्वर्गलोक में से में किस स्थान का दान करूँ। (१५)

यामन ने कहा-हाथी, घोड़ा, भूमि, सुवर्ण आदि वस्तुएँ उनके प्रार्थियों को दीजिये। हे राजन् ! में इतने का ही प्रार्थी हूँ। अतः मुझे तीन पग प्रदान (१६)

यामन के ऐसा पचन कहने पर महान् असुर यलि ने कमण्डलु लेकर विष्णु को तीन पग दान दिया। हाथ पर जल गिरते ही तीनों लोकों को नापने के लिये विष्णु ने वृहद् दिव्य विश्वमय रूप धारण किया। (१८)

उनके पेरमे भूमि, जंघाओं में त्रैलोक्य-पूजित आकाश, दोनों जानुओं में सत्यलोक और तपोलोक, दोनों ऊरुओं मे मेरु और मन्दर पर्वत, कटि प्रदेश में विश्वेदेव, वस्ति प्रदेश के शीर्षस्थान परमरुद्गण, लिङ्ग में कामदेव, वृषणों में प्रजा- पति, कुक्षियों मे सप्त समुद्र, जठर में समस्त भुवन, नियली मे नदियाँ एवं उनके जठर मै यज्ञ स्थित थे। (१९-२१)

जठर मे ही इष्टापूर्त आदि समस्त क्रियाएँ अवस्थित थीं। उनकी पीठ में यसुगण और देवगण और कन्धों में रद्रगण अधिष्टित थे। (२२)

सभी दिशायें उनके पादुरवरूप थीं। उनके हाथ में आठ वसुगण, हृदय में ब्रह्मा एवं हृदय की अस्थियों में पुलिश स्थित था। (२३)

उर के मध्य श्री सथा समुद्र, मन में चन्द्रमा, प्रीया में देवमाता अदिति, वथा यलयों में सारी विद्यार्य अवस्थित (२४)

मुस में अग्नि के सहित माक्षण, ओष्ठ में सभी धार्मिक संस्कार, स्लाट में लक्ष्मीसहित तथा पवित्रता

लक्ष्म्या सह ललाटस्थाः अयणाम्यामांचिनौ

श्वासस्थो मातरिश्वााच मस्त सर्वसधिपु

सर्वसूक्तानि दर्शना निद्वा देवी सरस्वती

चन्द्रादित्यो चानयने पक्षमस्थाः कृत्तिकादयः २

शिखाया देवदेवस्य ध्वो राजा न्यपीदत |

तारका रोमकूपेभ्यो रोमाणि च महर्षयः ॥ २८ :

गुणै सर्वमयो भूत्वा भगवान् भूतभावनः । .

मेणैकेन जगतीं जहार सचराचराम् ॥ २९

भूमि विक्रममाणस्य महारूपस्य तस्य थे ।

दक्षिणोऽभूत् स्तनश्चन्द्र सूर्योऽभूदथ चोत्तरम्।

नभश्चाक्रमतो नाभि सूर्येन्दु सव्यदक्षिणौ ॥ ३०

द्वितीयेन क्रमेणाथ स्वमहर्जनतापसा.।-

क्रान्तार्धान वैराज मध्येनापूर्यताम्बरम् ।। ३१ ।'

तव. प्रतापिना ब्रह्मन् वृहद्विष्णयविणाम्बरे ।

ब्रह्माण्डोदरमाहत्य निरालोक जगाम ह ।। ३२

विश्वाधिणा प्रसरता कटाहो भेदितो बलात् ।

कुटिला विष्णुपादेातु' समेत्य कुंटिला ततः ॥ ३३

तस्या विष्णुपदीत्येपं नामाख्यातममूमने

तथा सुरनदीत्येवं तामसेवन्त तापसा

भगवानप्यसपूर्णे तृतीये तु मे विभुः ॥ ३४

समभ्येत्य बलिं पाहाईपता प्रस्फुरिवाधरः ।

मणाद् भवति दैत्येन्द्र यन्धनं घोरदर्शनम् । ।

त्वं पूरय पद तन्में नो चेद् बन्धं प्रतीच्छ भोः ॥ ३५

तन्मुरारिवचः श्रुत्या विहस्याथ पले सुत ।

बाणः प्राहामरपतिं वचनं हेतुसयुतम् ॥ ३६

याण उवाच ।।

कृत्वा महीमल्पतरा जगत्पते ।

स्वायभुवादिभुवनानि पै पट् ।

कथ मलिं प्रार्थयसे सुविस्तृता ।

या प्राग्भवान् नो विपुलामथाकरोत् ।।१३७

विभो मही यावतीय त्वयाऽध ।

सृष्टा समेता भुवनान्तरालै.।

के साथ धर्म, अर्थ, काम एव मोक्ष सम्बधी शास्त्र, कों में अश्विनीकुमार, श्वास मे वायु एव सभी सन्धियों में मरद्गण स्थित थे। (२५-२६)

सनके दाँतों मे समस्त सूक्त, जिह्वा मे सरस्वती देवी, दोनों नेत्रों मे चद्र और सूर्य एष धरोनियों में वृत्तिका आदि नक्षम स्थित थे। (२७)

देवदेव पी शिसा में राजा ध्रुव, रोमकूपों में तारा और रोमों मे महर्पि रोग अवस्थित थे। (२८)

भूतभावन भगवान् ने गुणों के द्वारा सर्वमय होकर एक पद मे ही चराचर सहित पृथ्वी का हरण कर लिया। (२९)

भूमि को नापते समय उन विशाल रूपधारी के चन्द्रमा एव सूर्य दक्षिण तथा टत्तर स्तन हो गए। इसी प्रकार आकाश का अतिक्रमण करते समय सूर्य एव चन्द्रमा उनकी नाभि के वाम एव दक्षिण भाग में अवस्थित हुए। (३०)

तदन तर उन्होंने द्वितीय चरण के आधे से स्वर्गलोक, महर्लोक, जनलोक और तपोलो का आकान्त कर शेष आधे से बेरोजोक तथा मध्यभाग से आमाश को आपूरिते (३१)

" हे प्रधा। तदुपरान्त विष्णु का प्रतापी विशाल धरण आकाश में ब्रह्माण्ड के उदर भाग को आहत र निरालोक में चला गया। (३२)

विष्णु के फैल रहे चरण में बलपूर्वक फटाह का भेदन कर दिया। विष्णु का चरण कुटिला नदी के समीप पहुंच गया । हे मुने। इससे फुटिला विष्णुपदी नाम ,से। प्रसिद्ध हुई। तपरवीजन सुरनदी के रूप में उसकी सेवा करने लगे। व्यापक भगवान् तीसरे चरण के पूर्ण न होने पर यलि के पास गए एव अधर को किंचित पुरित करते हुए बोले-हे दैत्येन्द्र । ऋण न चुकाने से भयर यधन होता है। अत तुम मेरे पद को पूर्ण करो अन्यथा बन्धन स्वीकार करो। (३३-३५)

मुरारि के उस वचन को सुनकर पलि के पुत्र घाण ने अमर पति से हँस र हेतुयुक्त वचन कहा-  (२६)

माण ने पहा-हे जग पति। आपने स्वायम्भुयादि छ भुवनों का ही निर्माण पर पृथ्वी को छोटा धनाया है। आपने पहले ही भूमि को विपुल नहीं बनाया अते आप यलि से अधिक विस्तृत भूमि कैसे माँगते हैं । (३७)

" है विभो । भुवनान्तरारों सहित जितनी पृथ्वी को सृष्टि आपने पीथी उसे मेरे पिता ने ज आप वो दे

दत्ता च तातेन. हितवितीयं

किपाक्छलेनैप नियध्यतेवाइंट

''या नैव शक्या मैववा-हि यूरिन

कथं वितन्याद् दिविजेश्वरोऽसौ ।

शक्तस्तार संपूजयित रारे

प्रसीद मा, पन्धनमा दशस्व.२.

प्रोक्तं श्रुतौ भवतापीश वाक्य

दान पाने भवते - सौख्यदायि.

देशे सुपुण्ये वरद यच काले

वचाशेष दृयतः चक्रपाणे ॥४

दांने 'भूमिः सर्वकामप्रदेव mar

भिवान् पात्र'देवदेवों जितात्मा ।

कालो ज्येष्ठामूलंयोगे मृगाङ्कः

कुरुक्षेत्र पुण्यदेश प्रसिद्धम् ।। ४१

किंवा देवोऽस्मद्विधैर्युद्धिहीनः ।

शिक्षापनीयः साधु वाऽसाधु चैव ।

स्वयं श्रुतीनामपि चादिकर्ता

च्याप्य स्थितः सदसई यो जंगद् पै ॥ ४२

दिया। अतः आप वाक्छल द्वारा उन्हें क्यों बाँधते (३८)

हे मुरारे! जिस पृथिवी की कमी को आप पूर्ण नहीं कर सकते, उसको ये दानयपति कैसे विस्तृत कर सकेंगे. ये आपकी पूजा करने में समर्थ है। अतः आप प्रसन्न हो और चाँधने का आदेश न दें। (३९)

हे ईश! आपने ही श्रुति में यह कहा है कि पवित्र देश, काल एवं परदाता पात्र में दिया गया दान सुख । दायक होता है। हे चक्रपाणि ! यह सम्पूर्ण (योगा दिखलाई पड़ रहा है।। (४०)

'सर्वकामप्रदा भूमि का दान हो रहा है, देवाधिदेव । जितात्मा आप पात्र हैं, ज्येष्टा एवं मूल के योग में स्थित चन्द्रमा से युक्त काल है क्या प्रसिद्ध र पवित्र कुरुक्षेत्र का । देश है।  (४२)

अथवा हम जैसे बुद्धिहीन लोगों द्वारा आप भगवान को उचित और अनुचित शिक्षा क्या दी जाय ? आप स्वयं वेदों के भी आदिकर्ता और सदसद् विश्व वो।

कृत्या प्रमाण स्वयमेव हीन

पदवीध्याचितवान् हामुक्या

किं त्वं न गृद्गासि जगत्त्रयांभो

रूपेण लोकत्रयवन्दितेन ॥४३

नावाश्चर्य यजगद् वै समयमा

ऋमत्रय

यं नैव पूर्ण, तवाय !

क्रमेण ये लपयितुं समर्थो

लीलामेता कृतवान् लोकनाथ ।। ४

प्रमाणहीनों स्वयमेव "कृत्वा

वसुंधरी माधर्व पदनाम ।

विष्णोनयनासि पलि न दूरे

प्रभुयंदेवेच्छति करोति ॥ ४५

पुलस्त्य उवाच ।"

इत्येवमुक्ते वचने वाणेन पलिसूनुना |

प्रोवाच भगवान् वाक्यमादिकर्ता, जनार्दनः ॥ ४६॥

त्रिविक्रम उवाच ।

यान्युक्तानि वचांसीत्थं त्वया पालेय साम्प्रतम् ।

तेषां वै हेतुसंयुक्त भृणु प्रत्युत्तरं मम ॥ ४७

व्याप्त कर अवस्थित है। (४२)

आपने स्वयं अपने प्रमाण (शारीरिक आकार) को छोटा बनाकर चीन पग भूमि की याचना की थी। हे देव.! पया आप अपने, त्रैलोक्य पन्दितरूप से तीनों ओंकों को महण नहीं कर लिए हैं? (४३)

आपके तीन पगों को समम जगत् पूर्ण नहीं कर संका, इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं। क्योंकि अपने एक पग से ही आप इसका उलइन करने में समर्थ है। हे लोकनाथ ! आपने तो यह लीली ही की है। (४४)

हे माधय ! हे पद्मनाभ ! हे विष्णु ! पृथ्यो, को स्वयं ही लघुप्रमाण की यनाकर बलि को वोधना उचित नहीं। प्रभु,जो पाहते हैं यही करते है। (४५)

पुदम्य ने कहा-पलिपुन बाण के-ऐसा कहने पर आदिकर्ता,भावान् जनार्दन ने यह पचन,कहा। (४६)

त्रिविक्रम ने कहा है पलिनन्दन ! तुमने संप्रति इस प्रकार जिन पचनों को कहा है उनका हेनुसंयुक प्रत्युत्तर मुझ से सुनो। (४७)

पूर्वमुक्तस्तव पिता मया राजन पदवयम् ।

देहि महाप्रमाणेन तदेतत् समनुष्ठितम् ॥ ४८

किं न वेत्ति प्रमाणं मे पलिस्तव पितासुर ।

प्रायच्छदं न निःशई ममानन्तं प्रमत्रयम् ॥ ४९

सत्यं क्रमेण चैकेन क्रमेयं भूर्भुवादिकम् ।

बलेरपि हितार्थाय कृतमेतत् क्रमत्रयम् ॥ ५९

तस्माद् यन्मम बालेय त्वपित्राम्बु करे महत् ।

दत्तं तैनापुरेतस्य कल्पं यावद् भविष्यति ॥.५१

गते मन्वन्तरे पाण श्राद्धदेवस्य साम्प्रतम् ।

सावर्णिके च संप्राप्त बलिरिन्द्रो भविष्यति ॥५२

इथं प्रोक्त्वा पलिसुतं पार्ण देवस्त्रिविक्रमः ।

प्रोवाच पलिमम्येत्य वचनं मधुराक्षरम् ।। ५३

धीभगवानुवाच ।

आपूरणाद् दक्षिणाया गच्छ राजन् महाफलम् ।

सुतलं नाम पावालं वस तत्र निरामयः ॥५४

बलिरुवाच

सुवले, वसतो नाथ मेम मोगीः कुतोऽव्ययाः ।

भविष्यन्ति तु येनाहं निवेत्स्यामि निरामयः ।।५५

त्रिविक्रम उवाच ।

सुतलस्थस्य दैत्येन्द्र यानि भोगानि तेऽधुना।

भविष्यन्ति महार्हाणि तानि वक्ष्यामि सर्वशः ॥५६

दानान्यविधिदत्तानि श्राधान्यश्रोत्रियाणि च ।

तथाधीतान्यप्रतिभिर्दास्यन्ति भवतः फलम् ।। ५७

तथान्यमुत्सवं पुण्यं वृत्ते शक्रमहोत्सवे ।

द्वारप्रतिपदा नाम तव भावी महोत्सवः ॥५८

तत्र त्वां नरशाईला दृष्टाः पुष्टाः स्वलंकृताः ।

पुष्पदीपप्रदानेन अर्चयिष्यन्ति यत्नतः ।। ५९,

तत्रोत्सवो मुख्यतमो भविष्यति

दिवानिशं ' 'हएजनाभिरामम् ।

यथैव राज्ये भवतस्तु साम्प्रतं

मैने प्रथम ही तुम्हारे, पिता से यह पहा था कि हे राजन् । मेरे प्रमाणानुसार 'मुझे तीन पग भूमि हो। उन्होंने भलीभाँति उसका अनुष्ठान किया। (४८)

हे असुर । क्या तुम्हारे पिता पलि मेरा प्रमाण नहीं जानते थे जो उन्होंने नि शवभाव से मेरे अनन्त तीन पगों का दान किया। (४६)

यस्तुर अपने एक पैर से ही में समस्त भू भुव आदि जगत् को आमान्त कर सकता हूँ। बलि के हित के लिए ही मैंने तीन पगो को किया है। (५०)

अत हे पलिपुत्र ! क्योंकि तुम्हारे पिता ने मेरे हाय में प्रशस्त जल दिया है अत इनकी आयु एक कल्प की होगी। (५१)

हे पाण। माखदेष का सम्प्रतिक मन्यन्तर व्यतीत हो जाने पे उपरान्त सापणिक मन्यनार के आने पर पलि इनबनंगे। (५२)

पलि के पुत्र याण से ऐसा कहने के उपरान्त प्रियिम्म देव पलि के समीप गये एवं उससे मधुर वचन बहा। (५३)

भीमराशन ने कहा है राइन् । दक्षिणा की पूर्ति होने तक तुम्हें यह महाफल प्राय करना होगा। तुम सुनल नामक पाताल मे व्याधि रहित होकर निरास करो। (५४)

पलि ने कहा-हे नाथ। सुतल में निवास करते समय निरामय रूप से रहने के लिये मुझे अक्षय भोग या से प्राप्त होंगे?

त्रिविक्रम ने कहा-हे देत्येन्द्र । में इस समय तुम्हारे सम्मुस उन समस्त बहुमूल्य भोगों का वर्णन करता हूँ जो सुनल में निपास परत समय तुम्हें उपलब्ध (५६)

अविधिपूर्वक किए गये दान, अनोत्रिय द्वारा रिये गए भार  ब्रह्मचर्यग्रत-रहित अभ्ययन आप दो फल प्रदान करेंगे। (५७)

इन्द्र पूजन के अनन्नर आने वाली प्रतिपदा को तुम्हारे पूजन के निमित्त दूसरा उरसय मनाया जायणा, जिसका नाम द्वारप्रतिपदा होगा। (५८)

इस रसव के समय इष्ट-पुष्ट, नरमेष्ठ योग मुन्दर रूप से सम पर पुष्प और दोप देकर प्रयत्नपूर्वक वापी (५६)

आप के राज्य में इस समय जिस प्रकार अहोरात्र

तयैव सा माग्यय कोपदी च ॥६०

इत्येवास्त्वा महा दितीबरं

विमर्जयित्या मुतलं सभार्यम् ।

यसमादाय जगाम तूर्ण

प्रसमानरसंपनुष्टम् ॥ ६१

दत्या मपोने प'विमुस्त्रिविष्ट

कृत्याच देवान मसभागमोरन् ।

अन्तर्दधे 'विश्वपतिर्मह

मपश्यतामेव 'मुराधिपानाम् ॥ ६२

स्वर्ग गते 'पातरि वासुदेवे'

'शाल्योऽगुराण - महता पिलेन ।

कत्या पुरं सौमिति प्रसिद्ध

'वेदान्तरिक्ष विचचार कामात् ।। ६३ ।

मयस्तु मत्या पिपुरं महात्मा

मुपर्णवासयममध्यमौरयम्।

मतारकाक्षः मह यानेन

संविष्टते 'मृत्यकलवान् सः ।। ६४

पागोऽपि देवेन हने त्रिविष्ट

पढे पली पापि रसातलस्ये।

छत्वा सुगुमं सुवि शोणितारण्य

पुरं स पास्ने सह दानवेन्द्रः ॥ ६५

एवं पुरा- चक्रघरेण विष्णुना

पद्धो । पलिमिनरूपधारिणा

प्रियार्थ सुरकार्यमिइये .

हिवाप विप्रर्पभगोरिजानाम् ।। ६६

प्रादुर्भयन्ते।  फथितो महर्षे

पुग्यः शुचिर्यामनस्यापहारी।।

थुने यस्मिन् मम्मृने कीर्तिप

पापं पाति। प्रवर्य पुप्पमेति ॥ ६७

एतत् प्रोक्तं मयतः पुण्यफीः ।।

प्रादुर्मायो पलिबन्धोध्ययस्य

पपाप्यन्यन् श्रोतुरामोऽमि यिन

तन्प्रोन्यता फपिप्पाम्योपम् ।। ६८

इति श्रीवामनपुरागे पह्रषष्टिनमोध्याय।।

पमा जनसमुदाय के कारण रमणीक महोत्सव मना दता है ही प्रकार एसयों में मेष्ठ यह कौमुदी नाम का परमप होगा। (६०)

मपुरन ने दानवेर यति में सर पर पगे परनी सहित गाल येक में भेज दिया। या ये भयभीम प-मगर में पिता भपन गये। (६१)

दमन ! मरे पाद विपरिम्पार भगवान विष्ण, पर पगं देर और देवताओं को या मागाभेला भनार पानी की निं भरप से (२२)

विभाग यादव के पर्ग पर जाने पर जाना हार मुरोकपड़ी मे सर गोम नाम अमित नगर भाग में विपाए(३) मम नपुर पर मान के ग अपण गुगन पहनेमा

पागापुर भी विष्णु के द्वारा पापीन लिये जाने पर सया पलिकपंधने तपा रगानल में रहने पर भाया सुरक्षित: गिा नागा पुर निमांजर दानों के माप रहने लगा।

इस प्रकार प्राचीन समय में पधारा विष्णु ने वामन रूप धारण कर इनकी भाई यात्री की पारि नया प्रा, पियों, गोभी भीर दिनों के दिल पे सिर मकोयोभाया (६१)

हे महर्षि मैंने माप में पान के पार, पियुष एवं पवित्र प्रादुर्भाव पारन रिया। मरे भास, मत न गे पार  पि! पण र मन परीवार परिया। अपर  गुना पा मेंगपत।