वामन महा पुराण
सरोमाहात्म्ये 7 वामनचरित-विष्णु द्वारा अदिति को वरप्रदान, अदिति के गर्भ में विष्णु की स्थिति
लोमहर्पण उवाच ।
एवं स्तुतोऽथ भगवान् वासुदेव उवाच ताम् ।
अदृश्यः सर्वभूतानां तस्याः संदर्शने स्थितः ॥ १
श्रीभगवानुवाच ।
मनोरथांस्त्वमदिते यानिच्छत्यभिवाञ्छितान् ।
तांस्त्वं प्राप्स्यसि धर्मज्ञे मत्प्रसादान संशयः ॥२
शृणु त्वं च महाभागे परो यस्ते हदि स्थितः ।
मदर्शनं हि विफलं न कदाचिद् भविष्यति ॥३
यश्चेह त्वदने स्थित्वा त्रिरात्रं वै करिष्यति ।
सर्वे कामाः समृष्यन्ते मनसा यानिहेच्छति ॥ ४
दूरस्थोऽपि वनं यस्तु अदित्याः स्मरते नरः ।
सोऽपि याति परं स्थानं किं पुनर्निवसन् नरः ॥५
यश्चेह ब्राह्मणान् पञ्च त्रीन् वा द्वावेकमेव वा।
भोनयेच्छूद्धया युक्तः स याति परमां गतिम् ॥ ६
अदितिरुवाच।
यदि देव प्रसन्नस्त्वं भक्त्या मे भक्तवत्सल ।
त्रैलोक्याधिपतिः पुत्रस्तदस्तु मम वासरः ।। ७
हृतं राज्यं हृतश्वास्य यज्ञभाग इहासुरैः ।
त्वयि प्रसन्ने वरद तत् प्राप्नोतु सुतो मम ॥ ८
जिनकी सूर्य चन्द्रमा रूप दोनों आँखे समस्त लोकों के शुभाशुभ कमों को सतत देखती रहती हैं उन उपेन्द्र को मैं नमस्कार करती हूँ। (३४)
जिन सर्वेश्वर के विषय मे मेरा यह समस्त कथन सत्य है तथा असत्य नहीं है उन अनन्मा, अव्यय एव सष्टा विष्णु को में नमस्कार करती हूँ। (३५)
जनार्दन । यदि मैंने यह सत्य कहा है, तो उस सत्य के प्रभाव से मेरे सब मनोरथ परिपूर्ण हों। (३६)
श्रीवामनपुराण के सरोमाहात्म्य मे छठवा अध्याय समाप्त ।।६।।
लोमहर्षण ने कहा-इस प्रकार सस्तुत समस्त प्राणियों से अदृश्य भगवान वासुदेव उसके सम्मुख प्रत्यक्ष होकर बोले।
श्रीभगवान ने कहा-“हे धर्मज्ञ अदिति । जिन अभि वाञ्छित मनोरथों को तुम चाहती हो उन्हें मेरी कृपा से तुम निस्सन्देह प्राप्त करोगी। (२)
हे महाभागे । सुनो, तुम्हारे मन मे जो वर है (उसे मागों) मेरा दर्शन कभी विफल नहीं होगा। (३)
तुम्हारे इस वन में रह पर जो तीन रात्रियों तक निवास करेगा उसकी सभी मनोवाञ्छित कामनायें सफल होंगी। (४)
दूर रह कर भी जो मनुष्य अदिति के वन का स्मरण करता है वह भी परम धाम को प्राप्त कर लेता है। फिर यहाँ रहने वाले मनुष्य की तो बात ही क्या है ? (4)
जो इस स्थान पर पाँच, तीन, दो या एक भी ब्राह्मण को श्रद्धा युक्त होकर भोजन करायेगा वह उत्तम गति को प्राप्त करेगा।
अदिति ने कहा-हे भक्तवत्सल देव । यदि आप मेरी भक्ति से प्रसन्न हैं तो मेरे पुत्र इन्द्र त्रैलोक्य के स्वामी बने। (७)
असुरों ने उसके राज्य और यज्ञभाग का अपहरण कर लिया है। हे वरद । आपके प्रसन्न होने पर मेरा पुत्र उसे
हृतं राज्यं न दुःखाय मम पुत्रस्य केशव ।
प्रपन्नदापविभ्रंशो बाधां मे कुस्ते हृदि ।।९
श्रीभगवानुवाच ।
कृतः प्रसादो हि मया तव देवि यथेप्सितम् ।
स्वांशेन चैव ते गर्भ संभविष्यामि कश्यपात् ॥ १०
तव गर्भे समुद्भूतस्ततस्ते ये त्वरातयः ।
तानहं च हनिष्यामि निवृत्ता भव नन्दिनि ॥ ११
अदितिरुवाच ।
प्रसीद देवदेवेश नमस्ते विधमापन ।
नाहं त्वामुदरे घोडमीश शक्ष्यामि केशव ।
यस्मिन् प्रतिष्ठितं सर्व विश्वयोनिस्वमीश्वरः ॥ १२
श्रीभगवानुवाच ।
अहं त्वां च वहिष्यामि आत्मानं चैव नन्दिनि ।
न च पीडा करिष्यामि स्वस्ति तेऽस्तु व्रजाम्यहम् ।। १३
इत्युक्त्यान्तहिते देवेदितिर्गर्भ समादधे ।
गर्भस्थिते ततः कृष्णे चचाल सकला क्षितिः ।
चकम्पिरे महाशैला जग्मुः शोमं महाब्धयः ॥१४
यतो यतोऽदितिर्याति ददाति पदमुत्तमम् ।
ततस्ततः क्षितिः खेदान्ननाम द्विजपुंगवाः ॥ १५
दैत्यानामपि सर्वेपा गर्भस्थे मधुसूदने ।
बभूव तेजसो हानिर्यथोक्तं परमेष्ठिना || १६
इति श्रीवामनपुराणे सरोमाहात्म्ये सप्तमोऽध्याय ॥७॥
प्राप्त करे। (८)
हे केशव । पुन पा राज्यापहरण मेरे दु ख का कारण नहीं है अपितु शरणागत के दाय (हिस्से ) का छिन जाना मेरे हृदय को पीडित कर रहा है। (8)
श्रीभगवान ने कहा-हे देवि । तुम्हारी इच्छा के अनुसार मैंने तुम्हारे उपर अनुप्रह किया है। अपने अश से कश्यप के द्वारा तुम्हारे गर्भ से मैं जन्म धारण करूगा । (१०)
तुम्हारे गर्भ से उत्पन्न होकर तुम्हारे सभी शत्रुओं को मैं मारूगा । हे नन्दनि । लौट जाओ। (११)
अदिति ने कहा-हे देवदेवेश । आप प्रसन्न हों। हे विश्वभावन ! आपको नमस्कार है।हे केशव । हे ईश । जिसके भीतर सभी कुछ प्रतिष्ठित है ऐसे आपको मैं अपने उदर मे बहन न कर सकूँगी। आप विश्वयोनि एव ईश्वर है। (१२)
श्रीभगवान् ने कहा-हे नन्दिनी । मैं तुमको और अपने को भी वहन करूंगा। मैं तुम्हें पष्ट न दूंगा। तुम्हारा कल्याण हो, में जाता हूँ। (१३)
यह कह कर भगवान के अन्तर्हित हो जाने पर अदिति ने गर्भधारण किया। कृष्ण के गर्भ में आने पर समस्त पृथ्वी चञ्चल हो उठी। पर्वत प्रकम्पित होने लगे एव महासमुद्र प्रक्षुब्ध हो गए। (१४)
हे द्विजश्रेष्टो । अदिति जहाँ जहाँ जातीं या पैर रखती थीं वहाँ यहाँ की पृथ्वी खेद के कारण नम्र हो जाती थी।
जैसा कि ब्रह्मा ने (पहले ) कहा था मधुसूदन गर्भस्थ होने पर सभी दैत्यों के सेज की हानि हो गई । (१६)
श्रीवामनपुराण के सरोमाहात्म्य में सातवा अध्याय समाप्त ॥७॥