14 कुरुक्षेत्र के तीर्थ

लोमहर्षण उवाच ।

ततो रामहदं गच्छेत् तीर्थसेवी द्विजोत्तमः ।

यत्र रामेण विप्रेण तरसा दीमतेजसा ॥१

क्षत्रमुत्साद्य वीरेण हृदाः पञ्च निवेशिताः ।

पूरयित्वा नरव्याघ्र रुधिरेणेति नः श्रुतम् ।। २

पितरस्तर्पितास्तेन तथैव च पितामहाः।

ततस्ते पितरः प्रीता राममूचुर्दिजोचमाः ॥ ३

राम राम महाबाहो प्रीताः स्मस्तव भार्गव

अनया पितृभक्त्या च विक्रमेण च ते विभो ॥४

वरं वृणीष्य भद्रं ते किमिच्छसि महायशः ।

एवमुक्तस्तु पितृभी राम. प्रभवतां वरः॥५

अत्रयीत् प्राञ्जलिर्वाक्यं स पितॄन् गगने स्थिवान् ।

भवन्तो यदि मे प्रीता यधनुग्राह्यता मयि ॥ ६

पित्प्रसादादिच्छेयं तपसाप्यायन पुनः ।

यञ्च रोपाभिभूतेन क्षत्रमुत्सादितं मया ।। ७

ततश्च पापान्मुच्येयं युप्माकं तेजसा ह्यहम् ।

हदायैते तीर्थमृता भवेयुर्भुवि विश्रुताः ॥ ८

एवमुक्ताः शुभ वाक्यं रामस्य पितरस्तदा ।

प्रत्यूचुः परमप्रीता रामं हर्षपुरस्कृताः ॥९

उपस्ते वर्द्धता पुत्र पितृभक्त्या विशेषतः ।

यच्च रोपाभिभृतेन क्षत्रमुत्सादित त्वया ॥ १०

ततश्च पापान्मुक्तस्त्वं पातिवास्ते स्वकर्मभिः

हृदाश्च तत्र तीर्थत्वं गमिष्यन्ति न संशयः ॥ ११

हदेष्वेतेषु ये स्नात्वा स्वान् पितृस्तर्पयन्ति च ।

तेभ्यो दास्यन्ति पितरो यथा भिलपितं वरम् ॥ १२

इप्सितान् मानसान् कामान् स्वर्गवासं च शाश्वतम् ।

एवं दत्त्वा वरान् विप्रा रामस्य पितरस्तदा ॥ १३

आमन्न्य भार्गवं प्रीतास्तत्रैवान्तर्हितास्तदा ।

लोमर्पण ने कहा-तदनन्तर तीर्थसेवी द्विजोत्तम को रामहृद जाना चाहिये । जहाँ दीसतेजा विप्र वीर राम (परशुराम) ने बल पूर्वक क्षत्रियों को नष्ट कर पाँच ह्रदों का निवेश किया था। हे नरव्याघ्र | हम लोगों ने ऐसा सुना है कि उन्होंने उन (हृदों) को रुधिर से पूरित कर उससे अपने पितरों एव पितामहों को तृप्त किया । हे द्विजोत्तमो  तदनन्तर उन प्रसन्न पितरों ने परशुराम से कहा- (१-३)

हे महाबाहु । हे भार्गव राम । हे विभु । तुम्हारी इस पितृभक्ति और विक्रम से हम तुम्हारे ऊपर प्रसन्न है। (४)

हे महायशस्वी। तुम वर माँगो। क्या चाहते हो ? पितरों के ऐसा कहने पर प्रभावशालियों में श्रेठ राम ने आकाशस्थित पितरों से हाथ जोडकर कहा-यदि आप लोग मेरे ऊपर प्रसन्न है तथा मेरे ऊपर अनुप्रह करना चाहते हैं तो आप पितरों के प्रसाद से मैं पुनः तप से पूर्ण होना चाहता हूँ। रोपाभिभूत होकर मैंने जो क्षत्रियों का विनाश किया है, आप के तेज द्वारा मैं उस पाप से मुक्त होजाऊँ एव तीर्थ मैं भूत ये हद ससार मे प्रसिद्ध हो । (५-८)

राम के द्वारा इस प्रकार शुभ वचन कहे जाने पर उनके परमानन्दित पितरों ने हर्षपूर्वक उनसे कहा- (६)

हे पुत्र । पितृभक्ति से तुम्हारा तप विशेष रूप से बढे । क्रोधाभिभूत होकर तुमने जो क्षत्रियों का विनाश ३ किया इस एप से तुम मुक्त हो क्योंकि वे क्षत्रिय अपने कर्म से मारे गये हैं। तुम्हारे (द्वारा निवेशित) ये हृदनिसशय तीर्थ बनेंगे। (१०-११)

इन ह्रदों में स्नान कर जो अपने पितरों का तर्पण करेंगे है उन्हें पितृगण यथाभिलषित वर, मनोभिलपित कामनायें एव स्वा मे शाश्वत निवास प्रदान करेंगे। हे विप्रो । इस प्रकार वर देने के उपरान्त भार्गव राम के पितर उनकी अनुमति

एवं रामहदाः पुण्या मार्गवस्य महात्मनः ॥ १४

स्नात्वा हदेषु रामस्य ब्रह्मचारी शुचित्रतः ।

राममभ्ययं श्रद्धावान् निन्देद् बहु मुवर्णकम् ॥ १५

चंशमूलं ममासाद्य तीर्थसेगी सुमंयतः ।

स्ववंशमिद्धये विप्राः स्नात्वा वै वंशमूलके ॥१६

कायशोधनमासाय तोय त्रैलोक्यनिश्रुतम् ।

शरीरशुद्धिमाप्नोति स्नातम्तम्मिन् न संशयः ।। १७

शुद्धदेहश्च त याति यस्मानारतने पुनः ।

तावद् भ्रमन्ति तोर्येषु मिद्धाम्तीर्थपरायणाः ।

यापन प्राप्नुवन्तीह तो तत्कायशोधनम् ।। १८

तोमम्तोये च सप्लाव्य कार्य मंयतमानसः ।

परं पदमवाप्नोति यामानावर्तते पुनः ॥ १९

ततो गच्छेत निन्द्रास्तीर्थ लोक्यविश्रुतम् ।

लोका यत्रोद्धताः सर्वे विष्णुना प्रभविष्णुना ।। २०

लोकोद्धार समासाद्य वीर्यस्मरणतत्परः।

स्नात्यातीर्थवरे तम्मिन् लोकान् पश्यति शाश्वतान् ॥२१

या विष्णुः स्थितो नित्यं शिवो देयः सनातनः ।

तो देवी प्रणिपातेन प्रसाद्य मुक्तिमाप्नुयात् ॥ २२

श्रीतीर्थ तु ततो गच्छेत् शालग्राममनुत्तमम् ।

तत्र स्नातस्य सानिध्य सदा देवी प्रयच्छति ॥२३

कपिलाहदमामाय तीर्थ त्रैलोक्यविश्रुतम् ।

तत्र स्नात्यायित्वा च दैवतानि पितृस्तया ॥ २४

कपिलानां सहस्रस्य फलं निन्दति मानमः।

तत्र स्थित महादेवं कापिलं वपुरास्थितम् ॥ २५

दृष्ट्या मुक्तिमवाप्नोति ऋषिभिः पूनितं शिवम् ।

सूर्यतीर्थ समासात्र स्नात्वा नियतमानस. ॥ २६

अर्चयित्ना पितॄन् देवानुपवासपरायणः ।

अग्निष्टोममवाप्नोति सूर्यलोकं च गच्छति ॥ २७

सहस्रफिरणं देव भानुं त्रैलोस्पविश्रुतम् ।

लेकर प्रसन्नता पूर्वक वहीं अ हित हो गये । इस प्रकार महात्मा परशुराम के रामहुद पुण्यप्रदायक हैं। (१२-१४)

अद्वापान, शुचित्रा व्यक्ति प्रह्मचर्य पूर्वक राम के हुदों में स्नान करने के उपराना परशुराम का अर्थन करने से यहुन परिमाण मे सुवर्ण प्राप्त करता है। (२५)

हे ग्रामगो । तीर्थसेवी जितेन्द्रिय मनुष्य पेशमूल तीर्थ में जाकर उसमें स्नान करने से अपने या की सिद्धि प्राप्त परता है। (१६)

प्रैलोक्य प्रसिद्ध कायशोधन तीर्थ मे जार एसमें स्नान करने से मनुष्य को निस्सन्देह शरीर की शुद्धि प्राप्त होती है। (१७)

और शुखदेह मनुष्य उस स्थान या जाता है जहाँ से यह पुन नहीं लौटना तीथेपरायण मिद्ध पुस्प तीर्था में तब तक भ्रमण करते रहन है जब तक वे उम कायशोधन नामक तीर्थ में नहीं पहुंचा। संतचित्त माय उस तीर्य में शरीर को घोकर उस परम पद को प्राप्त करता है जहाँ से पुन' लौटना नहीं पड़ना। (१९)

विश्री सदनगर निम्प्रसिद्ध रोकोसार तीर्थ में जाना पाहिए. जहाँ संसार्थ रिशु ने समस्त सेकों का उद्धार किया था। लोकोद्धार नामक तीर्थ में जार सम स्नान करने से तीर्थस्मरण तत्पर व्यक्ति शाश्वत शेरों का दर्शन करता है। (२0-२१)

वहाँ विष्णु एव सनातन देव शिर दोनों ही स्थित है। प्रणाम द्वारा उन दोनों देवों को प्रसन्न कर मुक्ति प्राप्त करे। (२२)

सदनन्तर तीर्थश्रेष्ठ शालग्राम नामक भीतीध में जाना चाहिए। यहाँ स्नान करने से भगवती अपने निस्ट पा निवास प्रदान करती है। (२३)

तदुपरान रैलोक्यपिथुन पपिडाद नाम तीर्थ में जाकर उसमें स्नान करने के पश्चात् देयता क्या पितरों की पूना करने से मनुष्य को सहस पपिग गायों पदापा पल प्रात होता है। यहाँ पर स्थित कापिल शरीरधारी ऋपियों से पूपित महादेय शिय का दर्शन करने से मुक्ति की प्राप्ति होती है। स्थिरचित व उपयास-परायण व्यक्ति सूर्यतीर्थ में जाकर स्नान करने के उपरान्त पितरों का अचा करने से अग्निटोम यज्ञ का फल प्राप्त करता है य मूर्यग्रेस को जाग है। (२५-२७)

ठेक्य विश्रुत सहघ किरण सूर्यदेव का दर्शन करने से

दृष्ट्वा मुक्तिमवाप्नोति नरो ज्ञानसमन्वितः ॥ २८

भवानीवनमासाद्य तीर्थसेवी यथाक्रमम् ।

तत्राभिषेकं कुर्वाणो गोसहस्रफलं लभेत् ॥ २९

पितामहस पिरतो घमृतं पूर्वमेव हि ।

उद्गाराद सुरभिर्जाता सा च पातालमाश्रिता ॥ ३०

तस्या: सुरभयो जाताः तनया लोकमातरः।

ताभिस्तत्सकलं व्याप्तं पातालं सुनिरन्तरम् ॥ ३१

पितामहस्य यजतो दक्षिणार्थमुपाहताः ।

आहूता ब्रह्मणा ताश्च विभ्रान्ता विवरेण हि ॥ ३२

तस्मिन् विवरद्वारे तु स्थितो गणपतिः स्वयम् ।

यंदृष्ट्वा सकलान् कामान् प्राप्नोति संयतेन्द्रियः ॥३३

संगिनीं तु समामाद्य तीर्थ मुक्तिसमाश्रयम् ।

देव्यास्तीर्थे नरः स्नात्वा लभते रूपमुत्तमम् ॥ ३४

अनन्तां श्रियमाप्नोति पुत्रपौत्रसमन्वितः ।

भोगांश्च विपुलान् भुक्त्वा प्राप्नोति परम पदम् ॥ ३५

ब्रह्मावर्चे नर स्नात्वा ब्रह्मज्ञानसमन्वितः ।

भयते नात्र सन्देहः प्राणान् मुश्चति स्वेच्छया ॥३६

ततो गच्छेत विप्रेन्द्रा द्वारपालं तु रन्तुकम् ।

तम्य तीर्थ सरस्वत्यां यक्षेन्द्रस्य महात्मनः ।। ३७

वत्र स्नात्वा महाप्राज्ञ उपवासपरायणः ।

यक्षस्य च प्रसादेन लभते कामिकं फलम् ।। ३८

ततो गच्छेत विप्रेन्द्रा ब्रमावर्च मुनिस्तुतम् ।

ब्रह्मावर्ने नर. स्नात्या ब्रह्म चाप्नोति निश्चितम् ।। ३९

वतो गच्छेत विप्रेन्द्राः सुतीर्थकमनुत्तमम् ।

तत्र संनिहिता नित्यं पितरो दैवतैः सह ॥४०

तत्राभिषेकं कुर्मीत पितृदेवार्चने रतः।

अश्वमेधमवाप्नोति पितृन् प्रीणाति शाधतान् ॥ ४१

ततोऽभुवनं धर्मज्ञ समासाद्य यथाक्रमम् ।

कामेश्वरस्य तीर्थ तु स्नात्वा श्रडासमन्वितः ॥ ४२

सर्वव्याधिविनिर्मुक्तो ब्रह्मावाप्तिर्भवेद् ध्रुवम् ।

मातृतीयं च तत्रैव यत्र स्नातस्य भक्तिवः ॥ ४३

प्रजा विवर्धते नित्यमनन्तां चाप्नुयाच्छ्यिम् ।

ज्ञान समन्वित मनुष्य मुक्ति को प्राप्त करता है। (२८)

तीर्थसेवी मनुष्य क्रमानुसार ममानीवन में जाकर यहाँ अभिषेक करने से सहस्र गोदान का फल प्राप्त करता है। (२६)

प्राचीन काल में अमृत पीते हुए ब्रह्मा के उद्गार (डकार) से सुरभि की उत्पत्ति हुई और वह पावाल लेक मे चली गई। (३०)

उस सुरभि से लोकमाताये गायें उत्पन्न हुई। उनसे समस्त पाताल लोक व्याप्त हो गया। (३१)

पितामह के यज्ञ करते समय दक्षिणार्थ लायी गई एच ब्रह्मा के द्वारा आहूत वे गाये विवर के कारणभटकने लगीं। (३२)

उस विवर के द्वार पर स्वय गणपति विराजमान है। सयतेन्द्रिय मनुष्य उनका दर्शन करने से समस्त कामनाओं को प्राप्त करता है। (३३)

देवी के मुक्ति के आश्रयभूत सगिनी तीर्थ में जाकर स्नान करने से मनुष्य को सुन्दर रूप की प्राप्ति होती है तथा वह पुत्र पौत्र समन्वित होकर अनन्त ऐश्वर्य को प्राप्त करता है और विपुल भोगों का उपभोग कर परम पद प्राप्त करता है। (३४-३५)

ब्रह्मावर्त तीर्थ में स्नान करने से मनुष्य नि सन्देह ब्रह्मज्ञानी हो जाता है एव वह स्वेच्छानुसार प्राणों का परित्याग करता है। (३६)

हे विप्रश्रेष्ठो । तदनन्तर द्वारपाल रन्तुक के तीर्थ मे जाय । उन महात्मा यझेन्द्र का तीर्थ सरस्वती नदी में है। वहाँ स्नान कर उपवास परायण महाप्राज्ञ व्यक्ति यक्ष के प्रसाद से इच्छित फल प्राप्त करता है। (३७-३८)

हे विप्रवरो। तदनन्तर मुनिप्रशसित ब्रह्मावर्त तीर्थ में जाना चाहिए। ब्रह्मावर्त में स्नान करने से मनुष्य निश्चय ही ब्रह्म को प्राप्त करता है। (३९)

हे विप्रश्रेष्ठो। तदुपरान्त श्रेष्ठ सुतीर्थक नामक स्थान पर जाना चाहिए। वहाँ देवताओं के साथ पितृगण नित्य स्थित रहते हैं। पितरों एव देवों की अर्चना मे रत व्यक्ति वहाँ स्नान कर अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त करता है तथा शाश्वत पितरों को प्रसन्न करता है। (४०-४१)

हे धर्मज्ञ । तदनन्तर क्रमानुसार कामेश्वर के तीर्थ अम्बु वन में जाकर श्रद्धापूर्वक स्नान करने से मनुष्य सभी व्याधियों से विनिर्मुक्त होकर निश्चय ही ब्रह्म की प्राप्ति करता है। वहीं स्थित मातृतीर्थ मे भक्ति पूर्वक स्नान करने से मनुष्य की प्रजा (सतति) की नित्य वृद्धि होती है तथा उसे अनन्त लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। तदुपरान्त नियत-

ततः शीतवनं गच्छेन्नियतो नियताशनः ॥ ४४

तीर्थ तत्र महाविप्रा महदन्यत्र दुर्लभम् ।

पुनाति दर्शनादेव दण्डकं च द्विजोत्तमाः ॥ ४५

केशानभ्युक्ष्य वै तस्मिन् पूतो भवति पापतः ।

तत्र तीर्थयरं चान्यत् स्यानुलोमायनं महत् ।। ४६

सत्र विप्रा महामाशा विद्वासस्तीर्थतत्पराः

स्वानुलोमायने तीर्थे विप्रास्त्रैलोक्यविश्रुते ॥ ४७

प्राणायामनिहरन्ति स्वलोमानि द्विजोत्तमाः।

पूतात्मानश्च ते विप्राः प्रयान्ति परमां गतिम् ॥ ४८

दशाश्वमेधिकं चैव तत्र तीर्थ सुविश्रुतम् ।

तत्र स्नात्वा भक्तियुक्तस्तदव लभते फलम् ।। ४९

तो गच्छेत श्रद्धावान् मानु लोकनिश्रुवम् ।

दर्शनात् तस्य तीर्थस्य मुक्तो भवति किल्लिपैः ॥ ५०

पुरा कृष्णमृगास्तव व्याधेन शरपीडिताः

विगाद्य तस्मिन् सरसि मानुपत्यमुपागताः ।। ५१

ततो व्याघाश्च ते सर्वे वानपृच्छन् द्विजोत्तमान् ।

मृगा अनेन वै याता अस्माभिः शरपीडिताः ॥५२

निमग्नास्ते सरः प्राप्य क ते याता द्विजोत्तमाः।

तेऽववस्वत्र चै पृष्टा वयं ते च द्विजोत्तमाः ॥ ५३

अस्य तीर्थस्य माहात्म्यान्मानुपत्यमुपागताः ।

तस्माद् यूय श्रधानाः स्नात्वा तीर्थे विमत्सराः ॥५४

सर्वपापविनिर्मुक्ता भविष्यथ न संशयः ।

ततः स्नाताश्च ते सर्वे शुटेहा दिवं गताः ।। ५५

एवंद तीर्थस्य माहात्म्यं मानुषस्य द्विजोत्तमाः।

ये प्यन्ति श्रद्दधानास्तेऽपि यान्ति परां गतिम् ॥ ५६

इति श्रीवामनपुराणे सरोमाहाम्ये चतुर्दशोऽध्याय ॥१४॥

भोजी एय जिसेन्द्रिय होकर शीतपन नामक तीर्थ में जाना चाहिए। हे महाविप्रो । यहाँ पर अन्यत्र दुर्लभ दण्डक नामक महान् दीर्थ है। हे द्विजोत्तमो । वह दर्शनमात्र से मनुष्य को पवित्र कर देता है। (४२-४५)

उस तीर्थ मे पेशों का मुण्डन कराने से मनुष्य पाप से मुक्त हो जाता है। वहाँ स्यानुलोमायन नामक एक अन्य महान् तीर्थ है। (४६)

हे द्विजोत्तमो । यहाँ पर स्थित उस रैलोक्य पित स्पानुलोमायन नामक तीर्थ में तीर्थ-सत्पर महाप्राज्ञ विद्वान विप्र लोग प्राणायामों के द्वारा अपने लोगों का परित्याग फरते हैं और चे पूतारमा विष परम गति को प्राप्त करते हैं। (४७-४८)

पही पर परमप्रसिद्ध दशाश्वमेधिक तीर्थ है भक्तिपूर्वक इसमें स्नान करने से पूर्वोक्त फल की ही प्राप्ति होती है। (४९)

तदनन्तर प्रद्धावान् मनुष्य को रोक-प्रसिद्ध मानुप तीर्थ में जाना चाहिए। उस तीर्थ का दर्शन करने से ही पापों से मुक्ति हो जाती है। (५०)

पूर्वकाल में व्याध द्वारा पाणपोदित कृष्णमृग उस सरोवर मे स्नान करने से मनुष्यत को प्राप्त हुए थे। (५१)

तदनन्तर उन सभी व्याधों ने उन द्विजोत्तमों से पूछा-हे द्विजोत्तमो। हम लोगों द्वारा शापीडित मृग इस मार्ग से जाते हुए सरोवर में निमग्न होकर कहाँ चले गये? उनके पूछने पर उन्होंने उत्तर दिया-हम द्विजोचम ही ये मृग थे । इस तीर्थ के माहात्म्य से हम मनुष्य यन गये है। अव एय मत्सररहित होकर श्रद्धा पूर्यफ तीर्थ में स्नान करने से तुम लोग नि सन्देह समस्त पापों से विनिर्मुक्त हो जाओगे। तदनन्तर स्नान करने से मुद्ध देह होकर ये सभी स्वर्ग चले गये। (५२-५५)

हे द्विजोत्तमो। जो श्रद्धापूर्वक मानुप तीर्थ के इस माहात्म्य को सुनते हैं वे भी परम गति को प्राप्त करने  है। (५६)

श्रीवामनपुराण के सरोमाहाम्य के बाँरवाँ अध्याय समाप्त।।