वामन महा पुराण
प्रह्राद तीर्थयात्रा मे विविध तीर्थों का वर्णन
पुलस्त्य उवाच ।
तस्मिस्तीर्थयरे स्नात्या दृष्ट्या देयं त्रिलोचनम् ।
पूजयित्वा सुवर्णाक्षं नैमिपं प्रययौ ततः ॥१
तत्र तीर्थसहस्राणि त्रिंशत्पापहराणि च ।
गोमत्याः काञ्चनाक्ष्याथ गुरुदायाश्च मध्यतः ॥ २
तेषु स्नात्वाय॑ देवेशं पीत्यामसमच्युतम् ।
ऋपीनपि च संपूज्य नैमिपारण्यवासिनः ॥ ३
देवदेवं तथेशानं संपूज्य विधिना ततः ।
तदननर निरुपम पौरुषवाले उस चक ने दैत्य का शिर काट डाला। छिन्नमस्तक दैत्य पर्वत के ऊपर से इस प्रकार गिरा जैसे वन से आहत शैलशिखर गिरता है। (४२)
उस देय शत्रु के मारे जाने पर मुरारि ने विरूपाक्ष शकर की आराधना की एवं चक्ररूपी श्रेष्ठ महायुध लेकर वे देव क्षीरसागर में स्थित अपने गृह को चले (४३)
हे पुत्र। ये वही देव देव महेश्वर विरूपाक्ष है। हे साधो! यदि तुम दूध के साथ भोजन करना चाहते हो तो उनकी आराधना करो।
माता के उस यचन को सुनकर बीतमन्यु के बलशाली पुत्र ने उन विरूपाक्ष शंकर की आराधना कर दुग्धयुक्त भोजन प्राप्त किया। (४५)
इस प्रकार प्राचीन काल में घटित शङ्कर के शरीर-छेदन विषयक परम पवित्र कथा को मैंने तुमसे कहा । वे महान असुर प्रहलाद सुन्दर पुण्य के लिये उस श्रेष्ट तीर्थ में गए।
श्रीवामनपुराग मे छप्पनवाँ अध्याय समाप्त ॥ ५६ ॥
५७
पुलरत्य ने कहा-प्रहलाद ने उस श्रेष्ठ तीर्थ में स्नानकर । त्रिलोचन महादेव का दर्शन किया तथा सुवर्णाक्ष की पूजा कर वे नेमिपारण्य चले गये।
यहाँ गोमती, फाञ्चनाक्षी और गुरुदा के मध्य में तीस हजार पाप नाशक तीर्थ है। (२)
उनमें स्नान कर उन्होंने पीताम्बरधारी देवेश्वर अच्युत की पूजा की। मैमिपारण्यपासी ऋपियों की पूजा करने के उपरान्त देवाधिदेव महेश का विधिपूर्वक अर्चन कर वे
गयायां गोपतिं द्रष्टुं जगाम स महासुरः ॥ ४
तत्र ब्रह्मध्वजे स्नात्वा कृत्वा चास्य प्रदक्षिणाम् ।
पिण्डनिर्वपणं पुण्यं पिवृषां स चकार है ॥५
उदपाने तथा स्नात्वा तत्राम्यर्च्य पितॄन् वशी।
गदापाणि समभ्यर्घ्य गोपतिं चापि शंकरम् ॥ ६
इन्द्रतीथे तथा स्नात्या संतl पितृदेवताः ।
महानदीजले स्नात्वा सरयूमाजगाम सः ।। ७
तस्यां स्नात्या समभ्यर्च्य गोप्रवारे कुशेशयम् ।
उपोप्य रजनीमेकां विरजा नगरी ययौ॥८
स्नात्या विरजसे तीर्थे दत्या पिण्डं पितुंस्तथा ।
दर्शनार्थं ययौ श्रीमान् अजितं पुरुषोत्तमम् ॥ ९
तं दृष्ट्वा पुण्डरीकाक्षमक्षरं परमं शुचिः ।
पडात्राभ्य तत्रैव महेन्द्रं दक्षिणं ययौ ॥ १०
तत्र देववरं शंभुमर्द्धनारीश्वरं हरम् ।
दृष्ट्वाज़े संपूज्य पितॄन् महेन्द्रं चोत्तरं गतः ॥ ११
तत्र देववरं शंभुं गोपालं सोमपायिनम् ।
दृष्ट्वा स्नात्वा सोमतीर्थे सद्याचलमुपागतः ॥ १२
तत्र स्नात्या महोदयां चैकुण्ठं चार्च्य भक्तिवः।
सुरान् पितॄन् समभ्यर्च्य पारियानं गिरिं गतः ॥ १३
तत्र रनावा लागलिन्यां पूजयित्वाऽपराजितम् ।
कशेरुदेशं चाम्येन्य विश्वरूपं ददश सः ॥ १४
यत्र देववरः शंभुर्गणानां तु सुपूजितम् ।
विश्वरूपमयात्मानं दर्शयामास योगवित् ॥ १५
तत्र मङ्कणिकातोये स्नात्वाभ्यर्च्य महेश्वरम् ।
जगामादि स सौगन्धि ग्रहादो मलयाचलम् ॥ १६
महाहढे ततः स्नात्वा पूजयित्वा च शंकरम् ।
ततो जगाम योगात्मा द्रष्टुं विन्ध्ये सदाशिवम् ।। १७
ततो विपाशासलिले स्नात्याभ्यय॑ सदाशियम् ।
त्रिरानं समुपोप्याथ अवन्ती नगरी ययौ ।। १८
महासुर गोपति का दर्शन करने के लिये गयातीर्थ में (३-४)
यहाँ नहा ध्वज में स्नान और उसरी प्रदक्षिणा कर उन्होंने पितरों के निमित्त पवित्र पिण्डदान दिया। (५)
यहाँ उदपान में स्नान कर जिनेन्द्रिय (प्रगद) ने पितरों, गदापाणि (विष्णु) एवं गोपति शहर की पूजा किया। (६)
इन्द्रतीर्थ में स्नान कर उन्होंने पितरों एवं देवों का तर्पण किया एव महानदी के जल मे स्नान र चे सरयू के समीप पहुंचे। (७)
उसमें मान पर उन्होंने गोमतार मे पुरेशर की पूजा पी एवं यहाँ एक रात्रि निवास पर वे शिरजा नगरी मे (८)
विरजातीर्थ मे स्नान करने में पश्चात् पितरों को पिण्डदान पर वे श्रीमान् पुरुषोत्तम अजित का दर्शन करने गये।
वे पापरहित प्रहलाद अक्षर पुण्डरीराक्ष का दर्शन करने के उपरान्त छ रात्रियों तक यहाँ निवास कर दक्षिण दिशा में स्थित महेन्द्र पर्वत पर गए । (१०)
(वे) यदी देवभेष्ठ अर्धनारीपर महादेव का दर्शन एवं पूजन कर पितरों की अर्चना किये एवं उत्तर दिशा की ओर चले गये। ((१)
वहाँ देवर शम्भु और सोमपायी गोपाल का दर्शन करने के पश्चात् सोमनीर्य में स्नान कर वे सहाचल पर गए । (१२)
वहाँ महोदशी मे स्नान करने के उपरान्त भक्तिपूर्वक विष्णु, देवों एवं पितरों का अर्चन कर वे पारियात्र पयत पर गए। (१३)
यहाँ लागलिनी में स्नान करने के उपरान्त उन्होंने अपराजित का पूजन किया एवं कशेरुदेश में जार विश्वरूप का दर्शन दिया। (२४)
यहाँ योगविन देववर शम्भु ने गणों से पूजित अपना विश्वरूप प्रदर्शिन किया था। (१५)
घदो मयुणिया के जल में स्नान करने के उपरान्त महेन्धर का पूजन कर प्रहलाद सुगन्धिपूर्णमलयाचल पर गए ।(१६)
तदननर मदाद में स्नान परने के उपरान दर की पूजा यर योगारमा प्रसाद सदाशिय का दर्शन करने विन्यपर्वत पर गये।
तदनन्तर विपाशा के जल में उन्होंने स्नान किया एवं सदाशिष या पूजन किया। तदुपरान्त तीन रानियों तक पहा नियास कर वे अपनी नगरी में गए। (१८)
तत्र शिप्राजले स्नात्वा विष्णुं संपूज्य भस्तितः ।
श्मशानस्थं ददर्शाथ महाकालवपुर्धरम् ।। १९
तस्मिन् हि सर्वसत्त्वानां तेन रूपेण शंकरः।
तामसं रूपमास्थाय संहारं कुरुते वशी ॥ २०
वत्रस्थेन मुरेशेन श्वेतकिर्नाम भूपतिः ।
रक्षितस्त्वन्तकं दग्ध्या सर्वभूतापहारिणम् ॥ २१
तवातिहष्टो वसति नित्यं शर्वः सहोमया ।
वृतः प्रमथकोटीभिर्वहुभिस्त्रिदशान्तिः ॥ २२
तं दृष्ट्वाय महाकालं फालकालान्तकान्तकम् ।
यमसंयमनं मृत्योर्मृत्यु चित्रविचित्रकम् ।। २३
श्मशाननिलयं शंभुं भूतनाथं जगत्पतिम् ।
पूजयित्वा शूलधरं जगाम निषधान् प्रति ॥ २४
तत्रामरेश्वरं देवं दृष्ट्या संपूज्य भक्तिः ।
महोदयं समभ्येत्य हयग्रीवं ददर्श सः ॥ २५
अश्चतीर्थे ततः सात्या दृष्ट्वा च तुरगाननम् ।
श्रीधरं चैव संपूज्य पञ्चालविपयं ययौ ।। २६
तत्रेश्वरगुणैर्युक्तं पुत्रमर्धपतेरथ ।
पाश्चालिकं वशी दृष्ट्या प्रयागं परतो ययौ ।। २७
नात्या सन्निहित तीर्थे यामुने लोकविश्रुते ।
दृष्ट्वा वटेश्वरं रुद्रं माधवं योगशायिनम् ।। २८
द्वावेव भक्तित: पूज्यौ पूजयित्वा महासुरः।
माघमासमथोपोप्य ततो वाराणसी गतः ।। २९
ततोऽस्यां वरणायां च तीर्थेषु च पृथक् पृथक् ।
सर्वपापहरायपु स्नात्वाऽर्च्य पितृदेवताः ॥ ३०
प्रदक्षिणीकृत्य पुरी पूज्याविमुक्तकेशवौ ।
लोलं दिवाकरं दृष्ट्वा ततो मधुवनं ययौ ।। ३१
तत्र स्वयंभुवं देवं ददर्शासुरमत्तमः ।
तमम्यर्च्य महातेजाः पुष्करारण्यमागमत् ॥ ३२
तेषु त्रिष्वपि तीर्थेपु स्नात्वाऽर्च्य पितृदेवताः ।
पुष्फराक्षमयोगन्धि ब्रह्माणं चाप्यपूजयत् ॥ ३३
वतो भूयः सरस्वत्यास्तीर्थे त्रैलोक्यविश्रुते ।
कोटितीर्थ स्ट्रकोटिं ददर्श वृपमध्यनम् ॥ ३४
यहॉ शिप्रा के जल में स्नान करने के उपरान्त भफिपूर्वक विष्णु का पूजन फर उन्होंने श्मशान में स्थित महाराल वारपारी का दर्शन किया। (१६)
यहाँ दस रूप में स्थित आत्मरशी शङ्कर तामसरूप धारण कर समस्त प्राणियों का संहार करते हैं। (२०)
यहाँ स्थित मुरेश ने सर्वभूतापहारी अन्ना को जला कर श्वेतकि नामक राजा की रक्षा की थी। (२१)
परोड़ों गों से आवृत एवं देवों से पूजित भगवान शहर उमा के साथ अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक वहां नित्य निवास करते हैं। (२२)
उन कालवाल, अनाना, यमनिगमक, मृत्यु के मृत्यु, चित्रविचित्र, श्मशानवासी, भूतनाथ जगत्पति, शूलधारी शङ्कर का दर्शन एवं पूजन कर वे निषध देश की (२३-२४)
यहाँ भक्तिपूर्वक अमरेश्वर देव का दर्शन प्यं पूजन करने के उपरान्त उन्होंने महोदय में जारर हयपोर का दर्शन किया। (२५)
तदनन्तर अश्यनीय में स्नान कर अश्वमुप पा दर्शन एवं मीपर का पूजन पर वे पानाल देश गए। ओर गए। (२६)
वहाँ अर्थपति कुवेर के पुत्र ईश्वर-गुण सम्पन्न पांचालिक का दर्शन कर जितेन्द्रिय प्रह्लाद प्रयाग चले गये। (२७)
निकटस्य यमुना के प्रसिद्ध तीर्य में स्नानोपरान्त वटेश्वर स्वयं योगशायी माघर का दर्शन एवं भक्तिपूर्वक उन दोनों पूच्चों का पूजन कर दन महासुर ने मापमास में यहाँ निरास दिया । तदनन्तर वे याराणसी गए । (२८-२९)
तदनन्तर असी और घरणा के सर्वपापहारी विभिन्न तीर्थों में स्नानोपरान्त पितरों एव देवों का पूजन पर उन्होंने पुरी की प्रदक्षिणा की। तदननर अविमुक्तेश्वर म्य फेशर की पूजा तथा लाला का दर्शन कर ये मधुरन चले गए। (३०-३१)
महातेजपी असुरश्रेष्ठ प्रहलाद यहाँ स्वयम्भू देय पा दर्शन एवं पूजन कर पुष्करारण्य में गए। (३२)
इन तीनों वीयों में स्नान करने के उपरान्त पिार प्य देवों वा अर्चन कर उन्होंने अयोगन्धि पुकाम तथा मझा का पूजन किया। (३३)
तदनन्तर सरस्वती के तौर पर स्थित मोरपित फोटितीर्थ में उन्होंने रदकोटि वृपमध्या या दर्शन किया। (३४)
नमिपेया द्विजवरा मागधेयाः ससैन्धवाः।
धारण्याः पोकरेया दण्डकारण्यकास्वया ॥ ३५
चाम्पेया भारुकच्छेया देविकातीरगाथ ये ।
ते तव शंकरं द्रष्टुं समायाता द्विजातयः ।।३६
फोटिसरन्यास्तपामिद्धा हरदर्शलालसाः ।
अहं पूर्वमहं पूर्वमित्येवं वादिनो मुने ३७
तान् संक्षुब्धान् हरो दृष्ट्या महतीन दग्धकिलिपान् ।
तेपामेवानुकम्पार्थ कोटिमूर्तिरभृद् भवः ।। ३८
वतस्तै मुनयः प्रीताः सर्व एव महेश्वरम् ।
संपूजयन्तस्तस्थु तीर्थ कृत्वा पृथक् पृथक् ।
इत्येवं रुद्रकोटीति नाम्ना शंभुरजायत ॥ ३९
तं ददर्श महातेजाः प्रहादो भक्तिमान् वशी।
कोटितीर्थ ततः नात्या तर्पयित्या वसन् पितुन ।
रुद्रकोटि समम्पर्य जगाम फुजाङ्गलम् ॥ ४०
तत्र देवयरं स्थाणुं शंकर पार्वतीप्रियम् ।
सरस्वतीजले मग्नं ददर्श सुरपूजितम् ।।४१
सारस्वतेऽम्भसि मात्वा स्थाणु संपूज्य भक्तितः ।
सात्वा दशाश्वमेधे च संपूज्य च सुरान् पितॄन् ।। ४२
सहस्रलिङ्ग संपूज्य स्नात्वा कन्यादं शुचिः ।
अभिवाय गुरुं शुक्र सोमतीथं जगाम ह ॥ ४३
तत्र खात्याय॑ च पितृन् सोमं संपूज्य भक्तितः ।
क्षीरिकाशसमभ्येत्य लानं चक्रे महायशाः । ४४
प्रदक्षिणीकृत्य तरं वरुणं चार्य बुद्धिमान् ।
भूयः कुरुध्वजं दृष्ट्या पाख्या नगरी गतः ।। ४५
तत्राय॑ मित्रावरुणी भास्करौ लोकपृजिती ।
कुमारधारामम्येल्य ददर्श स्वामिनं वशी॥ ४६
खात्या कपिलधारायां संताज़े पितॄन सुरान् ।
दृष्ट्या स्कन्द समम्पर्य नर्मदायां जगाम ह ॥ ४७
तस्यां नात्या समभ्यय॑ वासुदेवं श्रियः पतिम् ।
जगाम भूधरं द्रष्टुं वाराहं चक्रधारिणम् ।। ४८
(प्राचीन समय में) नैमिपारण्य, मगध, सिन्धु प्रदेश, धर्मारण्य, पुष्पर, दण्डकारण्य, चम्पा, भररन्छ एवं देविगतीर नियाती श्रेष्ठ प्राह्मण यहाँ शहर या दर्शन करने आये। (३५-३६)
देगुनिशिव फेदनरम्यायाने परोड़ों सिद्ध तपरपी ' पहल पर फरमा' 'मैं पहने न पगा' इम दियाद परने लगे। (२७)
दन पापरहिन मपियों को स्वा हुआ देगार सादर ने उन पर अनुरापा पर योरि मूर्तियाँ धारण दी।
तदनगर ये सभी मुनि प्रमालापर्य थर-थर । मौर्य यार महेपर की पूजा पर हुए रहने रंगे। इस प्रारम्भुपा नाग रदकोटि मा। (३९)
महाशायी भारतमान् जिमेन्द्रिय प्रागद ने इनाम ने किया एवं कोटितीर्थ में मान पर गानों व दिपा अपंग तथा रदयटि या पृतन पर ।पुराल में चले गए। (४०)
उन्होंने यहाँ सरी पं. जर में मग्न मुरपूजित पायागुरपान किया।
सरस्यनी के में स्नान पर उन्होंने भक्तिपूर्वक स्थागु की पूजा की तथा दशावमेघ में स्नान पर देयों एवं पितरी या पूजन दिया। (४२)
पन्याहद में स्नान करने के पश्चात् पवित्र होकर उन्होंने सहयरिङ्ग का पूजन रियाज्यं (शुक्रतीर्थ में) गुरु शुत्राचार्य को प्रणाम पर वे सोमतीर्थ चले गये। (५३)
यहाँ स्नान पर भक्तिपूर्वक पितरों एवं सोम का पृजन घर घे महायशस्वी क्षीरियायाम में जाकर पदों स्नान पिये।
पद से शो मदधिणार तथा यार की पूजा पाने फे पाद बुद्धिमान् प्रसार पुन' पुरष्यत पा रंग पर पद्मा नामक नगरी में गये।
पदों मोरपूजिरा जारी मित्रायरग या अर्थन परने प. उपरान्त गुमारधारा में जागर जिगेन्द्रिय प्रगर ने स्वामी पान दिया।
पापिलधारा में मान पर पितृतर्पण, देयपूजन एवं मन्द पान एवं अपेन पर नर्मदा के समीप (१७)
हममें स्नान तथा समीप पागुदंप दी पूना पर पपमपारी भूपर पारादेय पा पनप गये। (४८)
स्नात्वा कोकामुसे तीर्थे संपूज्य धरणीघरम् ।
त्रिसौवर्ण महादेवमवुदेशं जगाम ह ॥ ४९
तत्र नारीहटे स्नात्या पूजयित्वा च शंकरम् ।
कालिञ्जरं समस्येत्य नीलकण्ठं ददर्श सः॥ ५०
नीलतीर्थजले स्नात्वा पूजयित्वा ततः शिवम् ।
जगाम सागरानूपे प्रभासे द्रष्टुमीश्वरम् ॥ ५१
स्नात्वा च संगमे नद्याः सरस्नत्यार्णवस्य च ।
सोमेश्वरं लोकपतिं ददर्श स कपर्दिनम् ॥ ५२
यो दधशापनिर्दग्ध. क्षयी ताराधिपः शशी।
आप्यायितः शकरेण विष्णुना सकपर्दिना ।। ५३
वावय॑ देवप्रवरौ प्रजगाम महालयम् ।
तत्र रुद्रं समभ्यर्च्य प्रजगामोत्तरान् कुरून् ।। ५४
पद्मनाभं स तत्राय॑ सप्तगोदापरं ययौ ।
वत्र स्मात्याऽर्घ्य विश्वेशं भीमं त्रैलोक्यवन्दितम् ॥ ५५
गत्वा दारुवने श्रीमान् लिङ्गं स ददर्श ह।
तमय॑ ब्राह्मणी गत्या स्मात्माऽर्घ्य त्रिदशेश्वरम् ॥५६
प्लक्षावतरणं गत्वा श्रीनिवासमपूजयत् ।
ततश्च कुण्डिनं गत्वा संपूज्य प्राणमिदम् ।। ५७
शुपारके चतुर्णाहुँ पूजयित्वा विधानतः ।
मागधारण्यमासाय ददर्श यमुधाधिपम् ॥ ५८
तमर्चयित्वा विश्वेशं स जगाम प्रजामुखम् ।
महातीर्थे ततः सात्वा वासुदेवं प्रणम्य च ॥ ५९
शोणं संप्राप्य संपूज्य रुक्मवर्माणमीश्वरम् ।
महाकोश्यां महादेवं हंसाख्यं भक्तिमानथ ।। ६०
पूजयित्वा जगामाय सैन्धपारण्यमुत्तमम् ।
वनेश्वरं सुनेताख्य शङ्खशूलधरं गुरुम् ।।
पूजयित्वा महाबाहुः प्रजगाम त्रिविष्टपम् ।। ६१
तत्र देवं महेशानं जटाधरमिति श्रुतम् ।
तं दृष्ट्वाऽर्च्य हरि चामौ तीर्थ कनसलं ययौ ॥ ६२
वत्राय॑ भद्रकालीशं वीरभद्रं च दानवः ।
कोकामुख तीर्थ में स्नान और धरणीधर की पूजा कर वे अर्बुदेश निसौवर्ण महादेव के पास गये । (४९)
वहाँ नारीहुद मे स्नान तथा शङ्कर की पूजा करने के उपरान्त पालिअर में आकर उन्होंने नीलकण्ठ का दर्शन किया। (५०)
नीलतीर्थ के जल में स्नान करने के उपरान्त शिव का पूजन कर वे समुद्र के किनारे प्रभासतीर्थ में भगवान् का दर्शन करने गए। (५१)
यहाँ सरस्वती नदी और सागर के सगम में स्नान कर उन्होंने लोक्पति कपर्दी सोमेश्वर का दर्शन किया। (५२)
पर्दोशङ्कर एव विष्णु ने दक्ष के शाप से दग्धय क्षय रोगग्रस्त ताराधिप चन्द्रमा को पूर्ण किया था। (५३)
उन दोनों श्रेष्ठ देयों का अर्चन पर वे महालय गए। यहाँ रुद्र का पूजन कर वे उत्तरकुरु गए। (५४)
घहों पद्मनाभ का पूजन कर चे सप्तगे दायर तीर्थ में गए। यहाँ स्नान परान्त उन्होंन क्ययन्दित भीम विश्वेश्वर का अर्चन किया। (५५)
दास्पन मे जाफर श्रीमान् प्रहाद ने लिङ्ग का दर्शन किया। उनकी पूजा करने के उपरान्त प्रामणी (नदी) मे जार पदोंने स्नान और निदशेवर महादेय की
पूजा की। (५६)
तदनन्तर प्लक्षारतरण में जार उन्होंने श्रीनिवास की पूजा की। तत्पश्चात् कुण्डिन में जाकर प्रायों को तृप्ति देने वाले देव । अर्चन किया। (५७)
शूर्पारक मे चतुर्भुज देय की विधिवत् पूजा कर मागधारण्य मे जार उन्होंने यसुधाधिप या दर्शन (५८)
उन विश्वेश का पूजन कर वे प्रजामुख मे गए। तदनन्तर महातीर्थ में स्नान कर उन्होंने यासुदेव को प्रणाम किया। (५६)
शोणतट पर जाकर उन्होंने स्वर्णाचच धारण करने यारे ईश्वर का अर्चन दिया। तदनन्तर भक्तिमान (प्रसाद) ने मक्षामोशी मेहंस नामक महादेव का पूजन किया एय घेछ सैन्धवारण्य में जाकर शह तथा शूलधारी मुनेत्र नामक पूज्य ईश्वर का अर्थन किया। तदनन्तर वे महानाहु त्रियिष्टप (६०-६१)
यहाँ सटाघर नाम से प्रसिद्ध महेशान देव या दर्शन और विष्णु की पूजा पर वे कनपल तीर्थ गये । (६२)
दानर प्रहलाद वहाँ भद्रकालीश पय वीरभद्र तथा पनाधिप
धनाधिपं च मेघावं ययावथ गिरिव्रजम् ॥ ६३
वत्र देवं पशुपति लोकनाथं महेश्वरम् ।
संपूजयित्या विधिवत्कामरूपं जगाम ह ॥ ६४
शशिपमं देववरं त्रिनेत्रं
संपूजयित्वा सह वै मृडान्या ।
जगाम तीर्थप्रवरं महाख्य
तस्मिन् महादेवमपूजयत् सः॥ ६५
ततस्त्रिकूट गिरिमत्रिपुत्रं
जगाम द्रष्टुं स हि चक्रपाणिनम् ।
तमीड्य भक्त्या तु गजेन्द्रमोक्षणं
जजाए जप्यं परमं पवित्रम् ।। ६६
स्त्रोष्प दैत्येवरसूनुरादरा-
मासत्रयं मूलफलाम्युभक्षी।
निवेद्य विप्रप्रवरेषु काञ्चनं
जगाम घोरं स हि दण्डक वनम् ॥ ६७
तत्र दिव्यं महाशाखं वनस्पतिवपुर्धरम् ।
ददर्श पुण्डरीकाक्षं महाश्वापदचारणम् ॥ ६८
तस्याधस्थात् त्रिरात्रं स महाभागवतोऽसुरः ।
स्थितः स्थण्डिलशायी तु पठन सारस्वत रतवम् ॥ ६९
तस्मात् तीर्थवरं विद्वान् सर्वपापप्रमोचनम् ।
जगाम दानवो द्रष्टुं सर्वपापहरं हरिम् ॥ ७०
तस्याग्रतो जजापासौ स्तवौ पापप्रणाशनौ ।
यौ पुरा भगवान् प्राह कोडरूपी जनार्दनः ।।७१
तस्मादथागाद् दैत्येन्द्रः शालग्रामं महाफलम् ।
यत्र संनिहितो विष्णुश्चरेषु स्थावरेषु च ॥ ७२
तत्र सर्वगतं विष्णुं मत्वा चक्रे रतिं वली ।
पूजयन् भगवत्पादौ महाभागवतो मुने ॥ ७३
इयं तयोक्ता मुनिसंघजुष्टा
प्रहादतीर्थानुगतिः सुपुण्या।
यत्कीर्चनाच्छ्यणात स्पर्शनाच
विमुक्तपापा मनुजा भवन्ति ।। ७४
इति श्रीवामनपुराणे सप्तप्तपञ्चाशोऽध्यायः ।।५७॥
मेघाङ्क पी अर्चना कर गिरिबज गए ।(६३)
वहाँ विधिवत् लोकनाथ महेश्वर पशुपति देव का पूजन पर वे कामरूप गए। (६४)
यहाँ चन्द्र की पॉति से युक्त देवशेठ मिनेत्र शङ्कर की मृडानी (पार्वती) के साथ विधिवत् पूजा फर प्रहलाद श्रेष्ठ महाख्य तीर्थ मे गये और यहाँ पर उन्होंने महादेव की पूजा की। (६५)
तदनन्तर अत्रिपुत्र चम्पाणि विष्णु के दर्शनार्थ ये गिफूट पर्वत पर गये और भक्ति पूर्वक सनकी अर्चना पर उन्होंने परम पवित्र जपने योग्य गजेन्द्रमोक्षण स्तव का पाठ किया। (६६)
मूल, फल एप पाल या भक्षण परते हुए देत्येवर पुन प्रसाद ने यहाँ तीन मास तक आदर पूर्वक निरास पिया। तदनन्तर श्रेष्ठ मानणों को सुपर्ण दान पर पे पोर दण्डकपन पत्रे गए। (६७)
उन्होंने यही महान हिंस पशुओं के निवारक, महान शासाओं से युक्त यनरपतिशारीरधारी पुण्डरीकाक्ष का दर्शन किया। (६८)
सारस्पत स्तोत्र का पाठ करते हुए महान् विष्णुभक्त असुर प्रहलाद ने तीन रानि पर्यन्त उसके नीचे आस्तरणदीन चबूतरे पर शयन किया। (६९)
विद्वान् दानव (प्रहलाद) यहाँ से सर्वपापहारी हरि का दर्शन करने सर्वपापनाशक श्रेष्ठ तीर्थ में गए । (७०)
उन्होंने उनके सम्मुस प्राचीनकाल में कोडरूपी जनार्दन से कहे गए पापनाशक दो स्तोत्रों का पाठ किया।
तदनन्तर यहाँ से दैत्येन्द्र (प्रहलाद) महाफलदायक शालमाम तीर्थ मे गये। विष्णु यहाँ समस्त घर और स्थावर पदार्थों में विराजमान हैं। (७२)
हे मुने ! यहाँ महान विष्णुभक्त यलयान प्राराद विष्णु को सर्यगत जानार भगवान के चरणों की पूजा करते हुए उनमें अनुरक हुए। (७३)
मैंने तुमसे मुनियों के समूहों से सेवित अत्यन्त पवित्र प्रहलाद की तीर्थयात्रा का वर्णन किया। इनके कीर्तन, अयण एवं पर्श से मनुष्य पापरहित हो जाने हैं। (७४)
श्रीवामनपुराण में सत्तावनावाँ अध्याय समाप्त॥१७॥