बलि का प्रहलाद से पूजा, दान आदि विषयों में प्रश्न, विष्णु के पूजन में विहित पुष्प, पूजाविधि एव प्रतिमास मे विविध दानों का वर्णन, विष्णुमन्दिर निर्माण-महिमा, प्रह्लाद द्वारा विष्णु भक्तो एव वृद्ध-वाक्य की महिमा-वर्णन

पुलस्त्य उवाच ।

एतन्मया पुण्यतमं पुराण

तुभ्य क्या नारद कीर्तित वै ।

श्रुत्वा च कीर्त्या परया समेतो

मक्त्या च विष्णो. पदमभ्युपैति ॥१

यथा पापानि पूयन्ते गगावारिविगाहनात् ।

तया पुराणश्रवणाद् दुरिवाना विनाशनम् ।। २

न वस्य रोगा जायन्ते न पिप चाभिचारिकम् ।

तदनुकूल आचरण करने याने निस्सन्देह आनन्दित होते है। (६५)

वृद्धवाक्यस्पी औपधि आपत्ति रूपी सर्प से दशित मन्त्रहीन पुरुप को निस्सन्देह विपरहित कर देती  है। (६६)

वृद्धवाक्यरूपी अमृत को पीने एवं उनके कथनानुसार आचरण करने से मनुष्यों को जो तृप्ति होती है वैप्तीसोमपान में कहाँ है?(६७)

आपत्ति में पड़े हुए निन मनुष्यों का शासन पद्धन नहीं परमे वे कधुओं के लिये शोचनीय तया जीवित हीमृतक तुल्य होते हैं। (६८)

आपत्तिरूपी माह से पद्दीत जिन व्यक्तियों को वृद्ध पण्डित लोग मुक्त करने वाले नहीं हाते उन्हें शान्ति की प्राप्ति नहीं होती। (६६)

आपत्तिरूपी जल में निमग्न एव व्यसनरूपी लहरा से आकृष्ट हो रहे पुरुषों का उद्धार वृद्धवाश्य ये अतिरिक्त अय किसी भी प्रकार नहीं हो साता। (७0)

अत पृद्धवाक्यों को सुनन एव तदनुसार माधरण करने वाला मनुष्य विरोचन पुत्र अलि के सदृश शीम सिद्धि प्राप्त करता है। (७१)

श्रीवामनपुराण म पडसठवाँ अध्याय समाप्त।।६८।।

॥विदिवम चरिन्न समाप्त।।