वामन महा पुराण
हरललित-सती का शरीर त्याग, शिव के क्रोध से गणों की उत्पत्ति,दक्षयज्ञ का विध्वस
पुलस्त्य उवाच।
एव कपाली संजातो देव भगवान्हरः ।
अनेन कारणेनासौ दक्षण न निमन्वितः ॥१
कपालिजायेति सती विज्ञायाथ प्रजापतिः ।
यह कहा-हे हपीकेश। आपके प्रसाद से ब्रह्महत्या नष्ट हो गयी। (४४)
(किन्तु) हे देवेश, यह कपाल मेरे हाथ को नहीं छोड़ रहा है। उसका कारण में नहीं जानता। आप ही मुझे यह बता सकते हैं।
पुलस्त्य ने कहा-महादेव का वचन सुन कर फेशव ने य़ यह वाक्य कहा-“हे रुद्र। इसके समस्त कारणों
को मैं तुम्हें पतराता हूँ। (४६)
मेरे सामने जो कमलों से युक्त यह दिव्य ह्रद है वह पवित्र तथा तीर्थश्रेष्ठ है एव देवताओं तथा गन्धर्वो से पूजित है। (४७)
यज्ञे चाह्यपि दुहिता दक्षेण न निमन्त्रिता ॥ २
एतस्मिन्नन्तरे देवी द्रष्टु गौतमनन्दिनी ।
जया जगाम शैलेन्द्रं मन्दरं चारुफन्दरम् ॥३
तामागतां सती दृष्ट्या जयामेकामवान ह ।
हे शभु । तुम इस परम श्रेष्ठ तीर्थ में स्नान करो। स्नान करने मात्र से आज ही यह कपाल (आप के हाथ को) छोड देगा। (४८)
इससे हे रुद्र ससार में तुम कपाली' नाम से प्रसिद्ध होगे तथा यह तीर्थ भी कपालमोचन नाम से प्रख्यात होगा । (४६)
पुलस्त्य ने कहा-हे मुने। सुरेश्वर केशर के ऐसा कहने पर महेश्वर ने पालमोचन तीर्थ मे वेदोक्तविधि से स्नान किया। (५०)
तीर्थ में स्नान करते ही त्रिपुरान्तक फे करतल से कपाल गिर गया। तदुपरान भगवान की कृपा से उस तीर्थश्रेष्ठ का नाम पारमोचन पढ़ा। (५१)
थी वामनपुराए म तृतीय अध्याय समाप्त।।३।।
पुलस्त्य ने कहा-हे देवर्षे । इस प्रकार भगवान हर कपाची हुए थे। इसी कारण वे दक्ष के द्वारा निमन्त्रित नहीं हुए।
प्रजापति दक्ष ने सती यो पाली की भार्या समझ कर योग्य तया अपनी कन्या होने पर भीयत में निमन्त्रित नहीं किया। (२)
इसी बीच देवी का दर्शन करने के लिये गौतम नन्दिनी जया सुन्दर कन्दरा बारे पर्वत श्रेष्ठ मन्दर पर गई। (३)
उस जया को अरेरी आई देस कर सती ने कहा-
किमर्थ विजया नागाजयन्ती चापराजिता ॥४
सा देव्या वचनं श्रुत्या उवाच परमेश्वरीम् ।
गता निमन्त्रिताः सर्वा मसे मातामहम्य ताः ॥५
समं पित्रा गौतमेन मात्रा चैवाप्यहल्यया ।
अहं समागता द्रष्टुं त्यां तत्र गमनोत्सुका ।। ६
कि त्वं न बजसे तत्र तथा देवो महेश्वरः।
नामन्त्रिताऽसि तातेन उताहोस्सिद् अजिष्यसि ॥७
गतास्तु ऋषयः सर्वे मपिपल्य. सुरास्तथा ।
मातृ नसः शशाङ्कश्च सपत्नीको गत. ऋतुम् ॥ ८
चतुर्दशसु लोकेषु जन्वयो ये चराचराः ।
निमन्त्रिताः ऋती सर्वे किनासि त्वं निमन्त्रिता ।। ९
पुलस्त्य उवाच ।
जयायास्तच श्रुत्वा वज्रपावसम मती ।
मन्युनाऽभिप्लुता ब्रह्मन् पञ्चत्वमगमत् ततः ॥१०॥
जया मृतां सतीं दृष्ट्वा क्रोधशोपरिप्लुता ।
मुधती पारि नेत्राम्यां सस्वरं विललाप ह ॥ ११
"विजया, जयन्ती और अपराजिता क्यों नहीं आयीं ?" (४)
देवी के वचन को सुन कर उन्होंने परमेश्वरी से कहा- पिता गौतम और माला अहल्या के साथ चे सन मातामह के यज्ञ मे निमन्त्रित होकर गयी है । यहाँ जाने के लिये उत्सुक में आप को देखने आयी हूँ।
क्या आप तथा महेश्वर यहाँ नहीं जा रहे हैं? क्या पिता ने आपसे निमन्त्रित नहीं पिया है? अथवा आप वहाँ जायेंगी?
सभी अपि, ऋपिपलियाँ तथा देवगण यहाँ गये हैं। हे मातृप्यसे (मोसी)। सपत्नीक शशाक भी उस यज्ञ मे गये है। (८)
चौदहों लोकों के समस्त चराचर जन्तु उस यज्ञ में निमनित हुए हैं । क्या आप निमन्त्रित नहीं है ? (६)
पुरस्त्य ने कहा- हे ब्रह्मन् ! जया के ययपात-सदृश उस पचन को सुन कर शोधाभिप्लुत सनी पञ्चत्व को प्राप्त हो गई। (१०)
सनी पो मृत देखकर ग्रोध और शोक से परिप्लुत जया नेत्रों से आँसू यहाने हुए सस्पर विलाप करने | लगी।
आक्रन्दितध्वनि श्रुत्या शूलपाणिस्त्रिलोचनः ।
आः फिमेवदितीत्युक्त्वा जयाभ्याशमुपागतः ॥ १२
थागतो ददृशे देवी लतामिव बनस्पतेः ।
कृत्वां परशुना भृमो इलथाङ्गी पतितां सतीम् ।। १३
देवीं निपतितां दृष्ट्वा जयां पप्रच्छ शंकरः ।
किमियं पतिता भूमौ निकृत्तेव लता सती ॥ १४
सा शंकरवचः श्रुत्वा जया वचनमब्रवीत् ।
श्रत्वा ससस्था दक्षस्य भगिन्यः पतिभिः सह ॥ १५
आदित्यायास्त्रिलोकेश समं शक्रादिमिः सुरैः।
मातृवसा पिपन्नेयमन्तर्दुसेन
विपन्नेयमन्तर्दुःसेन दह्यती ॥ १६
पुलस्त्य उपाच।
एतच्छुत्वा वचो रौद्रं रुद्रः क्रोधाप्लुतो यमौ ।
शुद्धस्य सर्वगात्रेभ्यो निश्चेरुः सहसाऽर्चिपः ।। १७
वतः क्रोधात् त्रिनेत्रस्य गात्ररोमोद्भया एने।
गणाः सिंहमुसा जावा वीरभद्रपुरोगमाः ॥ १८
गणैः परिवृतस्तम्मान्मन्दराद्धिमसाह्वयम् ।
रोने की ध्वनि सुनकर शूलपाणित्रिलोचन "अरे यह क्या है" ऐसा रह कर जया के पास गए। (१२)
वहाँ पहुँचकर उन्होंने परशु से काटी हुई वृक्ष की रसा के सदृश शिथिलागी सती को भूमि पर पड़ी (१३)
भूमि पर पड़ी हुई देवी को देख कर शर ने जया से पूछा-'सती छिन्न लना की तरह भूमि पर क्यों पड़ी हुई (२४)
शर के वचन को सुन कर उस जया ने कहा "हे प्रिोवेश। दक्ष के यज्ञ मे अपने पतियों के साथ बहनों पा एव इन्द्रादिदेवों के साथ आदित्यादि का उपस्थित होना सुनकर आन्तरिक दुस से दग्ध होती हुई यह (मेरी) मौसी विपन्न हो गई।
पुलस्त्य ने कहा-इस भयकर यचन को मुनार रुद्र अत्यन्त क्रोधान्वित हो गए। मुद्ध (शर) के शरीर से सहसा ज्यागय निरुटने लगी।
तदनन्तर हे मुने! प्रोध के कारण विनंत्र शरीर थे गेमों से सिंह के सदृश मुसबारे गण उत्पन्न हुए जिनमे पीरमद्र प्रमुख थे। तय अपने गगों से परिवेष्टित होकर ये
गतः कनसलं तस्माद् यत्र दक्षोऽयजत् ऋतुम् ।। १९
ततो गणानामधिपो वीरभद्रो महारलः ।
दिशि प्रतीच्युत्तराया वस्थौ शूलधरो मुने ॥२०
जया क्रोधाद् गदां गृह्य पूर्वदक्षिणतः स्थिता ।
मध्ये त्रिशूलधृक् शस्तम्यौ क्रोधान्महामने ॥ २१
मृगारिवदन दृष्ट्वा देवाः शक्रपुरोगमाः ।
मपयो यक्षगन्धर्वाः किमिदं त्वित्यचिन्तयन् ॥ २२
ततस्तु धनुरादाय शरांश्चाशीरिपोपमान् ।
द्वारपालस्तदा धर्मो धीरभद्रमुपाद्रवत् ॥ २३
तमापतन्तं सहसा धर्म दृष्ट्वा गणेश्वरः ।
फरेणैकेन जग्राह त्रिशूल वह्निसन्निभम् ॥ २४
कार्मुकं च द्वितीयेन तृतीयेनाथ मार्गणान् ।
चतुर्थेन गदां गृह्य धर्ममभ्यद्रवद् गणः ॥ २५
वतश्चतुर्भुजं दृष्ट्वा धर्मराजो गणेश्वरम् ।
तम्घावष्टभुजो भूत्वा नानायुधधरोऽव्ययः ।। २६
सड्गचर्पगदापासपरश्वधयराङ्कुशैः।
मदर पर्वत से हिमालय पर गये और यहाँ से कनसल गए जहाँ दक्ष यन कर रहे थे। (२८ १६)
हे मुने । तदनन्तर गणाधिप महागली वीरभद्र शूल धारण किये पश्चिमोत्तर दिशा में स्थित हुए। (२०)
हे महामुने । त्रोध से गदा लेकर जया पूर्वदक्षिण दिशा में खड़ी हो गई और मध्य में क्रोधित निशूलधारी शहर स्थित हुए। (२१)
सिंहवदन (वीरभद्र) को देखकर इन्द्रादि देवता, ऋपि, यक्ष एव गन्धर्व लोग सोचने लगे कि यह क्या है ? (२२)
तदननर द्वारपाल धर्म धनुप एक सर्प के समान बाणों को रकर वीरभद्र की ओर दौड़। (२३)
सहसा धर्म यो आता हुआ देसार गणेश्वर एक हाथ में अग्नि के सदृश त्रिशूल, दूसर हाय मे धनुष, तीसरे हाथ में पाग और चतुर्थ हाथ मे गदा लेकर उनसे ओर दौदे। (२४ २५)
तदुपरान्त अव्यय धर्मराज ने चतुर्भुज गणेश्वर को देसर नाना प्रकार के आयुधों से युक्त अश्भुत होकर उनरा सामना किया और गणेवर यो मारने की या से (अपने हाथों मे) सङ्ग, धर्म (दाल), गदा, प्रास
चापमार्गणभृत्तस्थौ हन्तुकामो गणेश्वरम् ।। २७
गणेश्वरोऽपि संसुद्धो हन्तुं धर्म सनातनम् ।
ववर्ष मार्गणास्तीक्ष्णान् यथा प्रावृपि तोयदः ॥ २८
वाचन्योन्यं महात्मानौ शरचापधरौ हुने।
रुधिरारुणसिक्ताङ्गो किंशुकाविव रेजतुः ॥ २९
ततो वरास्त्रगणनायकेन
जितः स धर्मः तरसा प्रसह्य ।
पराङ्मुसोऽभूद्विमना मुनीन्द्र
स वीरभद्रः प्रविवेश यज्ञम् ।। ३०
यज्ञवाटं प्रविष्टं त वीरभद्रं गणेश्वरम् ।
दृष्ट्वा तु सहसा देवा उत्तस्थुः सायुधा मुने ॥ ३१
वसवोऽष्टौ महाभागा ग्रहा नर सुदारुणाः ।
इन्द्राधा द्वादशादित्या रुद्रास्त्वेकादशैव हि ॥ ३२
विश्वेदेवाश्च साध्याश्च सिद्धगन्धर्वपन्नगाः ।
यक्षा. किंपुस्पाचव खगाश्चक्रधरास्तथा ॥३३
राजा चैवस्ताद्वंशाद् धर्मकीर्तिस्तु विश्रुतः ।
(भाला), परवध (फरसा), उत्तम अकुश, धनुष एष याण धारण कर सडे हो गये। (२६२७)
गणेश्वर वीरभद्र भी अत्यन्त क्रुद्ध होकर सनातन धर्म को मारने के लिये वर्षाकालिक मेघ के सदृश उनके ऊपर वीक्ष्य धागों की पर्पा करने लगे। (२८)
हे मुने। शरचापधारी वे दोनों रुधिर से लाल तथा सिक्त शरीर वाले महात्मा किंशुक पुष्प के सदृश सुशोभित होने लगे। (२९)
हे मुनीन्द्र । तदनन्तर गणनायक द्वारा श्रेष्ठ शस्त्रास्त्रों से बरपूर्वक विजित धर्मराज उदास होकर पीछे हट गये प्य वीरभद्र यज्ञ मे प्रविष्ट हुए । (३०)
हे मुने। गणेश्यर वीरभद्र को यज्ञमण्डप में प्रविष्ट हुआ देसार देवतागण आन शस्त्र लेकर सहसा उठ (३१)
महाभाग आठों यमु, अति दाग नवग्रह, इन्द्रादि, द्वादश आदित्य, एकादश स्ट, विश्वेदेय, साम्यगण, सिद्ध, गन्धर्य, पन्नग, यक्ष, पिंपुरप (स्निर), भूत, विहंगम, पश्चर, येवस्थान-यशीय प्रसिद्ध राजा धर्मकीर्ति, चन्द्रवंशीय राजा उप्रयलशाली भोजति, दैत्य, दानव तथा
सोमवंशोद्भवश्वोरो मोजकीतिर्महाभुजः ॥३४
दितिजा दानवाश्चान्ये येऽन्ये तत्र समागताः ।
ते सर्वेऽभ्यद्रवन् रौद्रं वीरभद्रमुदायुधाः ॥ ३५
वानापतत एवाशु चापागधरो गणः।
अभिदुद्भाव वेगेन सर्वानव शरोत्करः ।। ३६
ते शस्त्रवर्षमतुलं गणेशाय समुत्सृजन् ।
गणेशोऽपि वरात्रैस्तान प्रचिच्छेद निमेद च ।। ३७
शरैः शस्त्रैश्च सततं पश्यमाना महात्मना ।
वीरभद्रेण देवाधा अवहारमयुत ॥ ३८
ततो विवेश गणपो यज्ञमध्यं सुविस्तृतम् ।
जुह्वाना ऋषयो यत्र हबीपि प्रवितन्यते ॥ ३९
ततरे महर्प यो दृष्ट्वा मृगेन्द्रवदनं गणम् ।
भीता होत्रं परित्यज्य जग्मुः शरणमच्युतम् ॥ ४०
सानाविक्रभृद् दृष्ट्वा महीस्त्रस्तमानसान् ।
न भेतव्यमितीत्युक्त्वा समुत्स्थौ वरायुधः ।। ४१
समानम्य ततः शाङ्गं शरानग्निशिखोपमान् ।
यहाँ आये हुए अन्य सभी आयुध लेकर रौद्र वीरभद्र की ओर दौड़े। (३२-३५)
घनुष बाणधारी गण ने उन सभी के आते ही उन पर वेगपूर्वक वाण प्रहार से प्रत्याक्रमण किया । (३६)
उन सभी ने वीरभद्र के ऊपर अतुलनीय बाणों की वर्पा की। गणपति ने भी उत्तम अस्त्रों से उन्हें छिन्न भिन्न कर डाला। (३७)
महात्मा वीरभद्र द्वारा विविध बाणों और अस्त्रों से आहत होकर देवतादि युद्ध से निवृत्त हो गये । (३८)
तब गणपति वीरभद्र सुविस्तृत यज्ञ के मध्य में प्रविष्ट हुए जहाँ यज्ञरत ऋपि लोग अग्नि मे हवि की आहुति दे रहे थे। (३९)
तदुपरान महर्षि लोग सिंहमुख गण को देखकर भय से हवन छोड़कर अच्युत की शरण में गये । (४०)
चक्रधारी अच्युत त्रस्तमानस उन महर्षियों को आर्त देस- कर 'डरो मत ऐसा कह कर श्रेष्ठ आयुध लेकर सड़े (४१)
तदनन्तर वे शाई धनुष को झुका कर वीरमद्र के ऊपर शरीरावरण को विदारित करने वाले अग्निशिखा के
मुमोच वीरभद्राय कायावरणदारणान् ॥ ४२
ते तस्य कायमासाद्य अमोघा वै हरेः शराः।
निपेतुर्भुवि भग्नाशा नास्तिकादिव याचकाः ॥ ४३
शरांस्त्वमोघान्मोयत्वमापनान्वीक्ष्य केशवः।
दिव्यैरस्त्रैवीरभद्रं प्रच्छादयितुमुद्यतः ॥ ४४
तानस्त्रान्वासुदेवेन प्रक्षिशान्गणनायकः।
वारयामास शूलेन गदया मार्गणैस्तथा ।। ४५
दृष्ट्वा विपन्नान्यस्त्राणि गदां चिक्षेप माधवः ।
त्रिशूलेन समाहत्य पातयामास भूतले ॥ ४६
मुशलं वीरभद्राय प्रचिक्षेप हलायुधः।
लागलं च गणेशोऽपि गदया प्रत्यवारयत् ॥ ४७
पुशलं सगदं दृष्ट्वा लाङ्गल च निवारितम् ।
वीरभद्राय चिक्षेप चक्रं क्रोधात् सगध्वजः ॥ ४८
तमापतन्तं शतसूर्यकल्पं
सुदर्शन वीक्ष्य गणेश्वरस्तु |
शूलं परित्यज्य जगार चक्रं
तुल्य वाणों का वर्पण करने लगे। (५२)
श्री हरि के वे अमोघ वाण उसके (वीरभद्र के) शरीर पर पहुँच कर पृथ्वी पर इस प्रकार गिर पड़े जैसे याचक नास्तिक के पास से निराश होकर लौटता है। (४३)
अमोघ वाणों को व्यर्थ होते देख कर केशव श्रीरभद्र को दिव्य अस्त्रों से आच्छादित करने के लिये उद्यन हुए।
वासुदेव के द्वारा प्रक्षिप्त उन बाणों को गणनायक ने शूल, गदा और वाणों से निवारित कर दिया। (४५)
माधव ने अपने अस्त्रों को विनष्ट हुआ देखवर गदा की। किंतु (चीरभद्र ने) त्रिशूल से आघात कर उसे भूतल पर गिरा दिया। (४६)
हलायुध ने वीरभद्र की ओर मुशल और लागल फेंका जिसे गणाधिप ने गदा से निवारित कर दिया। गदा के सहित मुशल औरहल को निवारित हुआ देख कर गरुडध्वज ने क्रोध से वीरभद्र के ऊपर चक्र फेंका । (४८)
कितु गणेश्वर ने सैकड़ों सूर्य के सदृश सुदर्शन को आते देख शूल छोड कर चक्र को इस प्रकार निगल
यथा मधु मीनवपु. सुरेन्द्रः॥ ४९
चक्रे निगीणे गणनायकेन
क्रोधातिरक्तोऽसितचारुनेत्रः।
मुरारिरभ्येत्य गणाधिपेन्द्र-
मुत्क्षिप्य वेगाद् भुवि निष्पिपेप ॥ ५०
हरियाहूरुवेगेन विनिष्पिष्टस्य भूतले ।
सहितं रुधिरोद्गारैखाचक्र विनिगतम् ।। ५१
ततो निःसृतमालोक्य चक्र कैटभनाशनः ।
समादाय हपीफेशो वीरभद्रं मुमोच ह ॥ ५२
हपीकेशेन मुक्तस्तु वीरभद्रो जटाधरम् ।
गत्या निवेदयामास वासुदेवात्पराजयम् ।। ५३
बतो जटाधरो दृष्ट्या गणेशं शोणिताप्लुतम् ।
निश्वसन्तं यथा नागं क्रोधं च तदाव्ययः ।। ५४
धतः क्रोधाभिभृतेन वीरभद्रोऽथ शंभुना ।
पूर्वोद्दिष्टे तदा स्थाने सायुधस्तु निवेशितः ॥ ५५
धीरभद्रमथादिश्य भद्रकाली च शंकरः ।
विवेश क्रोधताम्राक्षो यज्ञबाट त्रिशूलभृत् ॥ ५६
ततस्तु देवप्रवरे जटाधरे
त्रिशूलपाणौ त्रिपुरान्तकारिणि ।
दक्षस्य यज्ञ विशति क्षयंकरे
जातो ऋषीणां प्रबरो हि साध्वसः ॥५७
इति श्रीवामनपुराणे चतुर्थोऽध्याय ॥४॥
लिया जैसे मीनशरीरधारी सुरेन्द्र मधु को निगल गए थे। (४६)
गगनायक द्वारा चक्र निगले जाने पर मुरारि के सुन्दर काले नेत्रोध से अत्यन्त लाल हो गये। वे गणाधिप के निस्ट गए और उन्हें वेग से उठा लिया तथा पृथ्वी पर पटक कर पीसने लगे। (५०)
हरि की भुजाओं और जाघों के प्रबल वेग से मे पटके गए वीरभद्र के मुख से रधिरोद्गार के साथ चक्र निकल आया। (५१)
तदनन्तर कैटभनाशन हृषीकेश ने चक्र को निकला देस कर उसे ले लिया और वीरभद्र को छोड दिया। (५२)
हपीकेश द्वारा मुक्त वीरभद्र जटाधर शकर के निकट जाकर वासुदेव से हुई अपनी पराजय निवेदित किये ।(५३)
तदनन्तर गणेश्वर को शोणिताप्लुत तथा नाग के सदृश निश्वास लेते देस अव्यय जटाघर ने क्रोध किया। (५४)
तदुपरान्त क्रोधाभिभूत शंकर ने सायुध चीरभद्र को पूर्वोद्दिष्ट स्थान पर निविष्ट कर दिया। (५५)
वीरभद्र तथा भद्रकाली को आदेश देकर क्रोध से रक्तनेन थाले त्रिशूलधर शकर यज्ञमण्डप मे प्रविष्ट (५६)
तदनन्तर त्रिपुरान्तकारी, त्रिशूलपाणि, क्षयारी, देव-श्रेष्ठ जटाधर के दक्ष यज्ञ में प्रवेश करने पर ऋपियों में महान् भय उत्पन्न हुआ। (५७)
इति वामनपुराण म चतुर्थ अध्याय समाप्त।।