वामन महा पुराण
सरोमाहात्यम् 1 ब्रहमसर के प्रमाण एव महिमा का वर्णन
देवदेव उवाच ।
सरस्वतीरपद्वत्योरन्तरे कुरुजाङ्गले ।
मुनिप्रवरमासीनं पुराणं लोमहर्पणम् ।
अपृच्छन्त द्विजवराः प्रभावं सरसस्तदा ।। १
प्रमाणं सरसो हि तीर्थानां च विशेषतः ।
देवतानां च माहात्म्यमुत्पत्ति वामनस्य च ।। २
एतच्छृत्या वचस्तेषां रोमहर्षसमन्वितः ।
प्रणिपत्य पुराणपिरिदं वचनमब्रवीत् ॥ ३
लोमहर्पण उवाच ।
ब्रह्माणमायं कमलासनस्थ
विष्णुं तथा लक्ष्मिसमन्वितं च ।
रुद्रं च देवं प्रणिपत्य मूर्ना
तीर्थ महद् ब्रह्मसरः प्रवक्ष्ये ॥ ४
रन्तुकादोजसं यावत् पावनाच चतुर्मुखम् ।
सरः संनिहितं प्रोक्तं ब्रह्मणा पूर्वमेव तु ॥५
कलिद्वापरयोर्मध्ये व्यासेन च महात्मना ।
सराप्रमाणं यत्प्रोक्तं तच्छृणुध्वं द्विजोत्तमाः ॥६
विश्वेश्वरादस्यिपुरं तथा कन्या जरद्गवी।
यावदोषवती मोक्ता तावत्संनिहितं सरः ।। ७
मया श्रुतं प्रमाणं यत् पठ्यमानं तु वामने ।
तच्छृणुध्वं द्विजश्रेष्ठाः पुण्यं वृद्धिकरं महत् ॥ ८
विश्वेश्वराद् देवयरा नृपावनात् सरस्वती ।
सरः संनिहितं ज्ञेयं समन्तादर्धयोजनम् ॥ ९
एकदाश्रित्य देवाश्च सपयश्च समागताः ।
सेवन्ते मुक्तिकामार्थ स्वर्गार्थे चापरे स्थिताः ॥ १०
ब्रह्मणा सेवितमिदं सृष्टिकामेन योगिना ।
विष्णुना स्थितिकामेन हरिरूपेण सेवितम् ॥ ११
सरोमाहात्मय
१
देवदेव ने कहा-सरस्वनी और पद्वती के मध्य कुरुजागल मे आसीन मुनिप्रवर वृद्ध लोमहर्पण से प्राचीनकाल में नागों ने सरोवर का प्रभाव पूछा-
इस सरोवर के विस्तार, विशेपतः तीर्थों और देवताओं के माहात्म्य एवं यामन की उत्पत्ति का आप वर्णन करें। (२)
उनके इस वचन को सुनकर रोम हर्ष-युक्त पौराणिक शपि ने उन्हें प्रणाम करने के उपरान्त कहा । (३)
लोमहर्षण ने कहा-सर्वप्रथम उत्पन्न कमलासन ब्रह्मा, लक्ष्मी-सहित विष्णु और महादेव रुद्र को शिर से प्रणाम कर में महान ब्रह्मसर तीर्थ का वर्णन करता हूँ। (४)
ब्रह्माने प्राचीन पाल में यह कहा था कि यह सन्निहित सरोयर रन्तुक से औजस पर्यन्त और पारन से चतुर्मुसतक है। (५)
हे द्विजोत्तमो । कलि और द्वापर के मध्य में महात्मा व्याप्त ने सरोवर का जो प्रमाण बतलाया है,उसे आपलोगसुन (६)
विश्वेश्वर से अस्थिपुर पर्यन्त और कन्या जरद्गवी से ओपवती पर्यन्त यह सन्निहित सरोवर स्थित है। (७)
हे द्विजश्रेष्टो मैंने वामन पुराण में वर्णित जो प्रमाण सुना है उस पवित्र एवं अभ्युदयकारी प्रमाण को आप सुनें। (८)
विश्वेश्वर से देववर तक एवं नृपायन से सरस्वती पर्यन्त चतु- दिक अर्धयोजन मे इस सनिहित सरकोसमझना चाहिये।()
आये हुए देवता एव ऋषिगण इसका आश्रय महण कर मुक्ति की यामना से इसरा सेवन करते हैं, तथा अन्य लोग स्वर्ग के निमित्त यहाँ स्थित रहते हैं। (१०)
योगी ब्रह्मा ने सृष्टि की इच्छा से एवं हरिरूप धारी विष्णु ने जगन् स्थिति की कामना से इसका सेवन किया।(११)
रुद्रेण च सरोमध्यं प्रविष्टेन महात्मना ।
सेव्य तीर्थ महातेजाः स्थाणुत्वं प्राप्तवान् हरः ॥ १२
आयपा ब्रह्मणो वेदिस्ततो रामहदः स्मृतः ।
कुरुणा च यतः कृष्टं कुरुक्षेत्रं ततः स्मृतम् ॥ १३
तरन्तुकारन्तुकयोर्यदन्तरं
यदन्तरं रामहदाचतुर्मुखम् ।
एतत्कुरुक्षेत्रसमन्तपञ्चक
पितामहस्योचरवैदिरुच्यते ॥ १४
इति श्रीवामनपुराणे सरोमाहात्म्ये प्रथमोध्याय