वामन महा पुराण
बलिका पाताल वास, सुदर्शन चक्र का पाताल में प्रेवश एव बलि द्वारा उसकी स्तुति, प्राह्राद द्वारा बलि से विष्णु भक्ति तथा विष्णु भक्तों की प्रशसा
पलिरुवाच ।
भवता कथितं सर्व समाराध्य जनार्दनम् ।
या गतिः प्राप्यते लोके तां मे वक्तुमिहार्ड सि ॥ १
फैनाचनेन देवस्य प्रीतिः समुपजायते ।
कानि दानानि शस्तानि प्रीणनाय बगद्गुरोः॥२
उपवासादिकं कार्य कस्यां तिथ्यां महोदयम् ।
कानि पुण्यानि शस्तानि विष्णोस्तुष्टिप्रदानि वै ॥३
यघान्यदपि कर्त्तव्यं हटस्पैरनालसः ।
तदप्यशेष दैत्येन्द्र ममाख्यातुमिहार्हसि ॥ ४
प्रहाद उवाच।
श्रयानक्तिपरैर्यान्युद्दिश्य
अनार्दनम् ।
पले दानानि दीयन्ते ठानूचुर्सनयोऽध्यान् ॥ ५
वा एच तिथयः शस्ता यास्वम्पर्य जगत्पतिम् ।
तचित्तस्तन्मयो भूत्या उपयासी नरो भवेत् ॥ ६
पूजितेपु द्विजेन्द्र पूजितः स्याजनार्दनः।
एतान् द्विषन्ति ये मूढास्ते यान्ति नरकंध्रुवम् ॥७
तानयारो भक्त्या ब्राह्मणान् विष्णुतत्परः।
एवमाह हरिः पूर्व चाह्मणा मामकी तनुः ॥ ८
ब्राह्मणो नावमन्तव्यो युधो पाप्यबुधोपि वा।
सोऽपि दिव्या तनुर्विष्णोस्तस्मात् वामर्चयेन्नरः ॥ ९
तान्येव च प्रशस्वानि कुसुमानि महासुर ।
यानि स्युर्वर्णयुक्तानि रसगन्धयुतानि च ॥१०
विशेषतः प्रवक्ष्यामि पुष्पाणि तिययस्वथा ।
दानानि च प्रशस्वानि माधवप्रीणनाय तु ॥ ११
जाती शवाहा सुमनाः कुन्दं यहुपुटं तया ।
याणश चम्पकाशोकं करवीरं च पृयिका ।। १२
पारिभद्रं पाटला च बकुलं गिरिशालिनी।
विलकं च जपाकुसुमं पीठ नागरं त्यपि ॥ १३
६८
बलि ने कहा-आपने सप युथ वर्णन कया।अप आप जनार्दन की आराधना करने से प्राप्त होने याली गति का वर्णन करें। (१)
किस प्रकार की पूजा से घासुदेव थी प्रीति उत्पन्न होती जगद्गुरु यो प्रसन्न करने के लिये किस प्रकार के दान प्रशस्त है? (२)
सिनिधि में उपचास आदि परने से महान् उन्नति होती है। फोन पुण्य कार्य शिशु फे प्रतिजनक फहे गये हैं? (३)
है देरपेन्द्र ' आरस्यरहित होकर इसमनापूर्यफ करने योग्य अन्य कार्यों को भी पूर्णतया आप मुझे पटायें। (४)
मगर ने कहा- परि' मा सम्पन्न और भटियुट होकर जनार्दन के उद्देश्य से जो दान दिये जाने हेपाहे मुनियों ने अभय पहा है।
ऐकोनिया होती है जिनमें मनुष्य विशु की पूजा पाने के अनन्नर उनमें पिरामनगार उपशम पता है।
ब्राह्मणों की पूजा करने से जनार्दन की पूजा होती है। उनसे ट्रैप करने पाले मृद व्यक्ति निश्चय ही नरक में जाने है। (७)
विष्णुभफ मनुष्य यो भक्तिपूर्वक ब्राह्मणों की पूजा फरनी चाहिये। पूर्यकाल में विष्णु ने यह कहा था कि बामण मेरे शरीर है। (८)
शानी अथया असानी भी मानण की आमानना नही परगी पाहिये। यह विष्णु का दिव्य शरीर होता है। अनु उसी पूजा परनी चाहिये । (६)
हे महामुर! वर्ग, रस एवं गन्ध से युक्त पुष्प दो राम दोन है। (१७)
अब में माघर के प्रीणनार्थ हे गये विशेष पुप्पो, विधियों प्य दानों का वर्णन पाता। अन्पुन फे भनार्थ-मानी, साहा, गुमना, मुन्द यदुपुट, पाए, पम्प, अशोक, करार, (पनेर ), पिन (नदी), पारिभद्र, पारन, कुन (मोसरी), गिरिमारिनी, तिना, जपा, पनर नागर नामा पुप प्रभ है।
एतानि हि प्रशस्तानि कुसुमान्यच्युतार्चने ।। . ,
सुरभीणि तथान्यानि वर्जयित्वा तु केतकीम् ॥ १४
बिल्वपत्रं शमीपत्रं पत्रं भृङ्गमृगाङ्कयोः ।
तमालामलकीपत्रं शस्तं केशवपूजने ॥ १५ ॥
येपामपि हि पुष्पाणि प्रशस्तान्यच्युतार्चने ।
पल्लवान्यपि तेषां स्युः पत्राण्य विधौ हरेः ॥ १६
वीरुधां च प्रवालेन बहिपा चार्चयेत्तथा
नानारूपैश्चाम्युभवैः कमलेन्दीवरादिभिः ॥ १७
प्रयालैः शुचिभिः श्लक्ष्णैर्जलप्रक्षालितैले
वनस्पतीनामच्र्येत तथा दूर्वाग्रपल्लवैः ॥ १८
चन्दनेनानुलिम्पेत कुङ्कुमेन प्रयत्नतः ।
उशीरपद्मकाभ्यां च तथा कालीयकादिना ॥ १९
महिपारस्यं कणं दारु सितकं सागरं सिता ।
शङ्ख जातीफलं श्रीशे धूपानि स्युः प्रियाणि वै ॥२०
हविषा संस्कृता ये तु यवगोधूमशालयः ।
तिलमुद्गादयो मापा ब्रीहयश्च प्रिया हरेः ।। २१
गोदानानि पवित्राणि भूमिदानानि चानघ ।
वस्त्रानस्वर्णदानानि प्रीतये मधुघातिनः ॥ २२
माघमासे तिला देयास्तिलधेनुश्च दानव ।
इन्धनादीनि च तथा माधवप्रीणनाय तु ॥ २३
फाल्गुने बीहयो मुद्दा वस्त्र कृष्णाजिनादिकम् ।
गोविन्दप्रीणनार्थाय दातव्यं पुरुषर्षभः ॥ २४
चैत्रे चित्राणि वस्त्राणि शयनान्यासनानि च ।
विष्णोः प्रीत्यर्थमेतानि देयानि ब्राह्मणेष्वथ ।। २५
गन्धमाल्यानि देयानि वैशाखे सुरभीणि वै ।
देयानि द्विजमुख्येभ्यो मधुसूदनतुष्टये ॥ २६
उदकुम्भाम्युधेनुं च तालवृन्तं सुचन्दनम् ।
त्रिविक्रमस्य प्रीत्यर्थ दातव्यं साधुभिः सदा ॥
उपानयुगलं छवं लवणामलकादिकम् ।
आपाढे वामनप्रीत्यै दातव्यानि तु भक्तितः ॥ २८
घृतं च क्षीरकुम्भाश्च घृतधेनुफलानि च ।
इनके अतिरिक्त केतकी को छोड़कर अन्य मुगन्धित पुष्प भी प्रशस्त हैं। (१२-१४)
केशव के पूजन मे बिल्वपत्र, शमीपत्र, भृङ्ग एवं मृगाङ्क के पत्र, तमाल तथा आमलकी के पत्र प्रशस्त है।
अच्युत के अर्चन मे जिन वृक्षों के पुष्पों का प्रयोग होता है उनके पल्टय एवं पत्र भी हरिपूजनार्थ प्रशस्त (१६)
वीरुधों के किसलय एव कुश तथा जल में उत्पन्न होने वाले अनेक प्रकार के कमल एव इन्दीवरादि से विष्णु का पूजन करना चाहिए।
हे बलि। वनस्पतियों के चिकने, पवित्र एवं जल से प्रक्षालित कोपलों तथा दूर्वाग्रपल्लवों से (विष्णु का) पूजन करना चाहिए। (१८)
प्रयत्नपूर्वक चन्दन, कुडकुम, उशीर, पद्मक एवं कालयकादि से विष्णु का अनुलेपन करना चाहिए। (१५)
श्रीविष्णु को महिप नामक कण, दारु, सिहक, अगरु,सिता,राक्ष एवं जातीपल का धूप प्रिय होता है।(२०)
घृत से संस्कृत यव, गेहूँ, शालिधान्य, तिल, मूंग उद और अन्न हरि को प्रिय हैं। (२१)
हे अनघ! मधुसूदन को गौ, पवित्र भूमि, वस्त्र, अन्न एवं स्वर्ण के दान प्रिय होते हैं। (२२)
हे दानव । माधव के प्रीणनार्थ माघमास मे तिल, तिलधेनु एवं इन्धनादि का दान करना चाहिए । (२३)
श्रेष्ठ पुरुषों को गोविन्द के प्रोणनार्थ पाल्गुन मास मे चावल, मूंग, वस्त्र एव वृष्णमृग का चर्म दान करना चाहिए। (२४)
चैत्र मास मे विष्णु के प्रीत्यर्थ ब्राह्मणों को अनेक प्रकार के वस्त्र, शय्या एच आमनों का दान करना चाहिए।
मधुसूदन की तुष्टि हेतु वैशास मास में श्रेष्ठ ब्राह्मणों को सुगन्धित गन्ध एवं माल्यों का दान (२६)
त्रिविक्रम की प्रीति हेतु सम्जन व्यक्ति जल का पड़ा, जलधेनु, ताल वा पसा तथा सुन्दर चन्दन का चाहिए। (२७)
वामन की प्रीति हेतु आपाढ़ मास मे भक्तिपूर्वक जूते या जोदा, छत्र, लवश एवं आमलकादि का दान करना चाहिए। (२८)
बुद्धिमान मनुष्य को श्रीधर की प्रसन्नता हेतु प्रायण करना दान करे।
श्रावणे श्रीधरप्रीत्यै दातव्यानि विपश्चिता ॥ २९
मासि भाद्रपदे दद्यात् पायस मधुसर्पिपी ।
हुपीकेशप्रीणनार्थ लवणं सगुडोदनम् ॥ ३
तिलास्तुरङ्गं यूपम दधि ताम्रायसादिकम् ।
प्रीत्यर्थ पद्मनाभस्य देयमाश्वयुजे नरैः ॥३१
रजतं कनक दीपान् मणिमुक्ताफलादिकम् ।
दामोदरस्य तुष्ट्यर्थ प्रदद्यात् कार्तिके नरः ॥ ३२
सरोष्ट्राश्वतरान् नागान् यानयुग्यमजाविकम् ।
दातव्यं केशवप्रीत्यै मासि मार्गशिरे नरैः ॥ ३३
प्रासादनगरादीनि गृहप्रावरणादिकम् ।
नारायणस्य तुप्प्यर्थ पोपे देयानि भक्तिवः ॥ ३४
दासीदासमलङ्कारमन्नं पडूससंयुतम् ।
पुरुषोत्तमस्य तुष्ट्यर्थ प्रदेयं सार्यकालिकम् ।। ३५
यद्यदिएतमं किंचिद्यद्वाप्यस्ति शुचि गृहे ।
तचडि देयं प्रीत्यर्थ देवदेवाय चक्रिणे ॥३६
यः कारयेन्मन्दिरं केशवस्य
पुण्याल्लोकान् स जयेच्छाश्वतान् वै ।
दत्त्वारामान पुष्पफलाभिपन्नान्
भोगान् भुङ्क्ते कामतः श्लाघनीयान् ॥ ३७
पितामहस्य पुरतः कुलान्यष्टौ तु यानि च ।
तारयेदात्मना साध विष्णोर्मन्दिरकारकः ॥३८
इमाश्च पितरो दैत्य गाथा गायन्ति योगिनः ।
पुरतो यदुसिंहस्य ज्यामधस्य तपस्विनः ।। ३९
अपि नः स कुले कश्चिद् विष्णुभक्तो भविष्यति ।
हरिमन्दिरकर्ता यो भविष्यति शुचित्रतः ॥ ४०
अपि न. सन्तती जायेद् विष्ण्यालयविलेपनम् ।
सम्मार्जनं च धर्मात्मा करिष्यति च भक्तिः ॥ ४१
अपि नः सन्तती जातो ध्वज केशवमन्दिरे ।
मास में घृत, दुग्ध का पुम्भ, घृतधेनु एय फलों का दान करना चाहिए। (२९)
भाद्रपद मास में हपीयेश घे प्रीणनार्थ पायस, मधु, घृत, पण पय गुदयुक्त ओदन पा दान करना चाहिए। (३०)
मनुष्यों को पद्मनाभ पी प्रीति हेतु आश्विन मास में तिल, अध, वृषभ, दधि, तान एव सह आदि का दान करना चाहिए। (३१)
मनुष्य दामोदर की तुष्टि हेतु फार्तिक मास में रजत, स्वर्ण, दीप, मणि, मुक्ता एवं पलादि का दान करे। (३२)
मनुष्यों को पेशव की प्रीतिहेतु मार्गशीर्ष मास में सर, उष्ट्र, सयर, हाथी, यानाइक परा प्य भेद का दान करना चाहिए।
नाराया पी तुष्टि हेतु पोप मास में भक्तिपूर्वक प्रासाद, नगर, गृह य द्वापरयादि का दान करना पाहि (३४)
पुरुशेत्तम की तुष्टि हेतु सभी समय पासी, दास, अलद्वार पद रसों से पुरु अन्न पा दान करना चाहिए। (३५)
चक्रधारी देवाधिदेय की प्रीति हेतु अपना जो सांघिय दो भयया गृह में जो पानु पवित्र हो उमरा दान करना चाहिए। (३६)
केशव या मन्दिर बनवाने याला मनुष्य शाश्वत पुण्य- रोकों को प्राप्त करता है। पुप्प एय फ्रों से युक्त उद्यानों का दान करने वाला इच्छापूर्वक श्लाघ्य भोगों का उपभोग करता है। (३७)
विष्णु के मन्दिर का निर्माण परयाने पाला पुरप अपने पितामह से आगे ये आठ पुल पुरुषों का उद्धार करना है। (३०)
हे दैत्य ! यदुष्ठ योगयुक्त तपस्वी ज्यामघ के सम्मुग्य पितरों ने इस गाथा का गान किया था। (३९)
पया हमारे कुल में पवित्र प्रतधारी ऐसा योई विन्यु भरू उत्पन्न होगा जो हरि का मन्दिर यनगयेगा? (४०)
पया हमारी सन्तति में पोई विष्णुमन्दिर में भक्ति- पूर्वक लेप और साडू देन पाटा धर्मारमा उत्पन्न होगा? (४१)
क्या हमारी सानियों में ऐमा पोई होगा जा फैशय मन्दिर में प्यना दान करेगा एवं यदेकारको
दास्यते देवदेवाय दीपं पुष्पानुलेपनम् ॥ ४२ ॥
महापातकयुक्तो वा पातकी चोपपातकी ।
विमुक्तपापो भवति विष्ण्यायतनचित्रकृत् ।। ४३
इत्थं पितृणां वचनं श्रुत्वा नृपतिसत्तमः ।
चकारायतनं भूम्यां स्वयं च लिम्पतासुर ॥ ४४
विभृतिभिः केशवस्य केशवाराधने रतः ।
नानाधातुविकारैश्च पञ्चवर्णैश्च चित्रकैः ॥ ४५
ददी दीपानि विधिवद् वासुदेवालये चले।
मुगन्धितैलपूर्णानि घृतपूर्णानि च स्वयम् ।। ४६
नानावर्णा वैजयन्त्यो महारजनरजिताः ।
मजिष्ठा नवरशीयाः श्वेतपाटलिकाश्रिताः ।। ४७
आरामा विविधा हृद्याः पुष्पाढ्याः फलशालिनः ।
लतापल्लवसंछन्ना देवदारुभिरावृताः ।। ४८
कारिताश्च महामञ्चाधिष्ठिताः कुशलैर्जनैः ।
पौरोगवविधानझै रत्नसंस्कारिभिः॥ ४९
तेषु नित्यं प्रपूज्यन्ते यतयो ब्रह्मचारिणः ।
श्रोत्रिया ज्ञानसम्पन्ना दीनान्धविकलादयः ॥५०
इत्थं स नृपतिः कृत्वा श्रधानो जितेन्द्रियः ।
ज्यामको विष्णुनिलयं गत इत्यनुशुथुमः ॥ ५१
तमेव चाद्यापि पले मार्ग ज्यामधकारितम् ।
ग्रजन्ति नरशार्दूल विष्णुलोकजिगीपयः ॥ ५२
तस्मात् त्वमपि राजेन्द्र कारयस्वालयं हरेः।
तमर्चयस्व यत्नेन ब्राह्मणांश्च यहुश्रुतान् ।
पौराणिकान् विशेपेण सदाचाररवाशचीन् ॥ ५३
वासोभिर्भूषण रत्नाभि कनकादिभिः ।
विभवे सति देवस्य ग्रीणनं कुरु चक्रिणः ॥ ५४
एवं क्रियायोगरवस्य तेऽध
नूनं मुरारिः शुभदो भविष्यति ।
नरान सीदन्ति बले समाश्रिता
विभु जगन्नाथमनन्तमच्युतम् ।। ५५
पुलस्त्य उवाच ।
इत्येवमुक्त्वा वचनं दितीश्वरो
दीप, पुष्प और अनुलेपन प्रदान करेगा ? (४२)
महापातकी, पातकी अथवा उपपातकी व्यक्ति विष्णु मन्दिर को चित्रित कर पापमुक्त हो जाता है। (४३)
हे असुर! पितृगण के इस प्रकार के वचन को सुनकर उस नृपश्रेष्ठ ने पृथ्वी पर मन्दिर निर्माण करवाया एवं स्वयं उसमें लेप करता था।
यह फेदाप की विभूतियों, नाना प्रकार की धातुओं से निर्मित वस्तुओं तथा पाँच वर्ण के चित्रकों से केशव की पूजा करने लगा। (४५)
हे बलि! उसने वासुदेव के मन्दिर में स्वयं विधिपूर्वक सुगन्धित तेल एवं घृत से पूर्ण दीप का दान किया । (४६)
(उसने विष्णु मन्दिर मे) कुसुम्भ मञ्जिष्ठा के रस में रजिन श्वेत ए' रक्त वर्ण के तथा नव रगों वाले विविध प्रभार के ध्वजों का आरोपण किया। (४७)
( उसने ) पुष्पों, फलों, स्तापल्लयों तथा देवदार आदि विविध प्रकार के वृक्षों से पूर्ण उद्यानों का निर्माण (१८)
( उसने ) पाक्शालाध्यक्ष के विधान को जानने वाले एव रत्नसस्कार करने वाले अत्यन्त दुशल पुरुषों से अधिष्टित पड़े-पड़े मनों का निर्माण करवाया।उनमें प्रतिदिन यतियों, ब्रह्मचारियों, ज्ञानसम्पन्न | 4
श्रोत्रियों, दीनों, अन्धों एवं विश्लेन्द्रिय पुरुपों का पूजन होता था। (५०)
हम लोगों ने सुना है कि ऐसा कार्य करने से श्रद्धालु एवं जितेन्द्रिय राजा ज्यामघ विष्णु लोक गये। (५१)
हे बलि । विष्णुलोक जाने की कामना वाले पुरुप आज भी ज्यामघ द्वारा प्रदर्शित उसी मार्ग का अवलम्बन करते हैं। (५२)
अतः हे राजेन्द्र । तुम भी हरि का मन्दिर बनाओ एवं यत्नपूर्वक उन इरि, बहुश्रत ब्राह्मणों एवं विरोप रूप से सदाचारपरायण पवित्र पौराणिकों का अर्चन करो। (५३)
ऐश्वर्य रहने पर वस्त्र, आभूषण, रत्न, गौ, पृथ्वी एवं स्वर्णादि द्वारा चक्रधर देव को प्रसन्न करो। (५४)
तुम्हारे इस प्रकार की क्रिया करने में रत रहने पर मुरारि निश्चय ही तुम्हारा कल्याण करेंगे। हे घलि ! अनन्त अच्युत विमु जगन्नाथ का आश्रय प्रहण करने वाले व्यक्ति दुसी नहीं होते। (५५)
पुलस्त्य ने कहा-पलि से इस प्रकार सत्य एवं भेट वचन कहने के उपरान्त पूर्णकाम, हरिवरणानुरागी
वैरोचनं सत्यमनुत्तमः
संपूजितस्तेन विमुक्तिमाययौ
संपूर्णकामो हरिपादभक्तः ॥ ५६
गते हि तस्मिन् मुदिते पितामहे
यलेयभौ मन्दिरमिन्दुवर्णम् ।
महेन्द्रशिल्पिप्रवरोग्य केशवं
स कारयामास महामहीयान् ॥५७
स्वयं स्वभार्यासहितश्चकार
देवालये मार्जनलेपनादिकाः ।
क्रिया महात्मा
यवशर्कराद्यां
पलिं चकाराप्रतिमां मधुद्रुहः ॥ ५८
दीपप्रदान स्वयमायताक्षी
विन्ध्यापली विष्णुगृहे चकार ।
गेयं स धर्म्यश्रवणं च धीमान्
पौराणिकैविप्रवरैरकारयत् ॥ ५९
तथाविधस्यासुरपुंगवम्य
धम्ये सुमार्गे प्रतिमंस्थितस्य ।
जगत्पतिर्दिव्ययपुर्जनार्दन-
स्वस्सी महात्मा बलिरक्षणाय ॥ ६०
सूर्यायुताभं पुसलं प्रगृह्म '...
निरन् स दुष्टानरियूथपालान् । ।
द्वारि स्थितो न प्रददौ प्रवेशं
प्राकारगुप्ते बलिनो गृहे तु ॥ ६१
द्वारि स्थिते धातरि रक्षपाले
नारायणे सर्वगुणाभिरामे।
प्रासादमध्ये हरिमीशिवार-
मभ्यर्चयामास सुरर्पिमुख्यम् ।। ६२
स एवमास्तेऽसुरराड् यलिस्तु
समर्चयन् वै हरिपादपङ्कजी।
सस्मार नित्यं हरिभपितानि
स तस्य जातो यिनयाङ्कुशस्तु ।। ६३
इदं च वृत्तं स पपाठ दैत्यराट
स्मरन् सुवाक्यानि गुरोः शुमानि ।
तथ्यानि पथ्यानि परत्र चेह
पितामहस्येन्द्रसमस्य चीरः ॥ ६४
ये वृद्धवाक्यानि समाचरन्ति
श्रुत्वा दुरुक्तान्यपि पूर्ववस्तु ।
स्निग्धानि पश्चान्नवनीतशुद्धा
दितीश्यर प्रहलाद बलि द्वारा की गयी पूजा स्वीकार कर विमुक्तिमार्गगामी हो गए।
प्रसन्न पितामह प्रहलाद के चले जाने पर बलि का भवन चन्द्रवन् प्रकाशित होने लगा। महामहिम उस (पलि ने) विश्वकर्मा से केशर का मन्दिर बनवाया। (५७)
बलि स्वयं अपनी पत्नी के साथ उस देयालय में मार्जन, लेपन आदि क्रियाएँ परने लगा। मधुसूदन के लिए महात्मा पलि ने जी एवं शाकर आदि का उत्तम नैवेद्य अर्पित किया।(५८)
विशालाक्षी विध्यारली स्वयं विष्णुमन्दिर में दीपदान करने लगी। पुरिमान मलि पुराणवेता श्रेष्ठ सामगों से धर्मयुक्त प्रवचन परयाते थे। (५९)
उस प्रपार के धर्ममार्ग में स्थित असुरभेष्ट पलि के रक्षणार्थ दिव्यशरीरधारी जगत्पति महात्मा जनार्दन स्थित हुए।(६०)
वे द्वार पर रहते हुए अयुत सूर्यों के तुज्य आभा याले मुसल को लेकर दुष्ट शत्रुओं के यूथपतियों का विनाश करते एवं प्रासरों से रक्षित बलि के गृह में किसी को प्रवेश नहीं करने देते थे। (६१)
सर्वगुणाभिराम विधाता नारायण के द्वारपाल होने पर पलि अपने प्रासाद के मध्य निरन्तर मुरों एवं ऋपियों में सर्वश्रेष्ठ नियामक हरि का अर्चन फरने लगा। (६२)
असुरराज बलि इस प्रकार हरि के पादपङ्कजों या पूजन करते हुए नित्य हरि के यचनों को स्मरण परता था। पद (नियम) उसके लिये विनयादृश हो गया। (६३)
इन्द्रतुल्य श्रेष्ठ अपने पितामह के कल्याणपद इस लोक तथा परलोक में हितगरी एवं तथ्य सुन्दर पचनों का स्मरण करते हुए यह धीर देत्यराज इस पृत्त (६४)
पूर्व में कठोरता पूर्वक कहे गए ए बाद में नवनीत के सरश निग्य एवं शुद्ध वृदयाश्यों का अवश्य कर
मोदन्ति ते नात्र विचारमस्ति ॥ ६५
आपमुजंगदप्रस्य मन्त्रहीनस्य सर्वदा । -
वृद्धवाक्यौपधा नूनं कुर्वन्ति किल निर्विपम् ॥ ६६
वृद्धवाक्यामृत पीत्वा तदुक्तमनुमान्य च ।
या वृमि यते पुसा सोमपाने कृतस्तथा ॥ ६७
आपत्ती पतिताना येपा वृद्धा न सन्ति शास्तारः ।
ते शोच्या बन्धूना जीवन्तोऽपीह मृततुल्या. ॥ ६८
आपद्ग्राहमहीवाना बृद्धाः सन्ति न पण्डिताः। ।
येपा मोक्षयिवारो वै तेषां शान्तिन विद्यते ॥ ६९
आपञ्जलनिमग्नाना हियना व्यसनोमिमिः ।
वृद्धवाक्यैविना नूनं नैवोचार कयचन ।। ७०
तस्माद् यो वृद्धवाक्यानि शृणुयाद् विदधाति च ।
स सद्य सिद्धिमामोति यथा वैरोचनो यलिः ॥ ७१
इति श्रीवामनपुराणे अष्टपष्टितमोऽध्याय ॥६॥
।। इति निविक्रमचरित समाप्तम्।।