वामन महा पुराण
बलि एवं बाण आदि का दोनो से युद्ध, बलि की स्वर्गविजय प्रह्राद का स्वर्ग में आगमन, बलि की कर्तव्योपदेश की शुश्रपा तथा प्रह्राद का उपदेश
पुलस्त्य उवाच ।
संनिचे ततो याणे दानवाः सत्वरं पुनः ।
निवृत्ता देवतानां च सशस्त्रा युद्धलालसाः ॥१
विष्णुरप्पमितौजास्तं ज्ञात्याऽजेयं पले सुतम् ।
मधुसूदन से इस प्रकार पहकर क्रोध से अधरोष्ठ को स्फुरित करते हुए कालनेमि ने, इन्द्र जिस प्रकार पर्वत पर यस फेरते हैं उसी प्रकार गदा को गरुड़ पर का।
भगवान विष्णु ने दानव के हाथ से मुक्त एस भयवर गदा यो आते देख उसे चफ से इस प्रकार नष्ट कर दिया जैसे पूर्वकृत कर्म भाग्यहीन मनुष्य के मनोरथ को नष्ट पर देता है। (४६)
गदा को फाट पर विष्णु दानव के निकट गये एवं बेगपूर्यफ उसकी मोटी भुजाओं को पाट डाले । भुजाओं के फट जाने पर कालनेमि दूसरे जले हुए पर्वत के तुल्य दिखलाई पड़ने लगा। (४७)
तदनन्तर माधय ने क्रोधपूर्वक चक्र द्वारा उसके शिर यो काट कर पक्व तालफल के सदृश पृथ्वी पर गिरा दिया। (४८)
चन मे मुण्डताल के सदृश पाहु एय मस्तरहीन कावन्ध निरम्प पर्वतराज मेरु के सरश खड़ा रहा । (४९)
हे मुने । जैसे महेन्द्र ने कुलिश द्वारा नष्ट घाँह और शिर वाले यल को पृथ्वी पर गिराया था उसी प्रकार पक्षि श्रेष्ठ गरुड़ ने अपनी छाती के प्रहार से उस (क्रन्ध) को पृथ्वी पर गिरा दिया। (५०)
उस दानय सेनापति के मारे जाने पर बाणासुर के अतिरिक्त देवों द्वारा अति पीडित सभी दैत्य शस्न, पेश, ढाल और परत्र पो छोदार भाग गये। (५१)
श्रीवामनपुराण में तेतात्सीसवाँ अध्याय समाप्त समाप्त।।
४८
पुलस्त्य ने कहा-तदनन्तर थाणासुर के टोटने पर दानय पुन शरत्र लेफर शीघ्र देयताओं से युद्ध परने की
इच्छा से लौटे।
अपरिमित तेजस्वी विष्णु ने पलि के पुत्र पाश को
प्राहामन्य सुरान् सर्वान् युध्यध्वं विगतज्वराः ॥२
विष्णुनाऽथ समादिष्टा देवाः शक्रपुरोगमाः ।
युयुधुर्दानवैः सार्ध विष्णुस्त्वन्तरधीयत ॥ ३
माधवं गतमाशाय शुक्रो पलिमुवाच ह ।
गोविन्देन सुरास्त्यक्तास्त्वं जयस्वाधुना यले ॥ ४
स पुरोहितवाक्येन प्रीतो याते जनार्दने ।
गदामादाय तेजस्वी देवसैन्यमभिद्रुतः ॥ ५
पाणो पाहुसहस्रेण गृह्य प्रहरणान्यथ ।
देवसैन्यमभिद्रुत्य निजधान सहस्रशः ॥ ६
मयोऽपि मायामास्थाय तैस्तै रूपान्तरैर्मुने ।
योधयामास यलवान् सुराणां च वरूथिनीम् ।। ७
विद्युअिहः पारिभद्रो वृपपर्वा शतेक्षणः ।
विपाको विक्षर मैन्यं तेऽपि देवानुपाद्रवन् ॥ ८
ते हन्यमाना दिविजैर्देवाः शक्रपुरोगमाः ।
गते जनार्दने देवे प्रायशो पिमुसाऽभवन् ॥९
तान् प्रभमान सुरगणान् बलियाणपुरोगमाः।
पृष्टतवाद्यन् सर्वं त्रैलोक्यविजिगीपयः ॥ १०
संवाध्यमाना दैतेयैर्देवाः सेन्द्रा भयातुराः ।
त्रिविध परित्यज्य ब्रह्मलोकमुपागवाः ॥ ११
ब्रह्मलोकं गतेष्वित्यं सेन्ट्रेष्वपि सुरेपु वै ।
स्वर्गभोक्ता बलिर्जातः सपुत्रभ्रातृवान्धवः ।। १२
शक्रोऽभूद् भगवान् ब्रह्मन् पलिर्वाणो यमोऽभवत् ।
वरुणोऽभून्मयः सोमो राहुादी हुताशनः ॥ १३
स्वर्भानुरभवत् सूर्यः शुक्रवासीद् बृहस्पतिः ।
येऽन्येऽप्यधिकृता देवास्तेपु जाताः सुरारयः ॥१४
पञ्चमस्य कलेरादौ द्वापरान्ते सुदारुणः ।
देवासुरोऽभूत् संग्रामो यत्र शक्रोऽप्पभूद् यलिः ॥ १५
पातालाः सप्त तस्यासन वशे लोकत्रयं तथा ।
भूर्भुवःस्वरिति ख्यातं दशलोकाधिपो पलिः ॥ १६
स्वर्ग स्वयं निवसति भुञ्जन् भोगान् सुदुर्लभान् ।
अजेय जानकर देवताओं को बुलाकर कहा-आप लोग निर्भय होकर युद्ध कीजिये। (२)
विष्णु के द्वारा आदिष्ट इन्द्र आदि देवता दानवों के साथ युद्ध करने लगे और विष्णु अदृश्य हो गये। (३)
माधन हो गया हुआ जानर गुमा ने थलि से कहा-हे पलि! गोविन्द ने देवताओं का परित्याग कर दिया है। अप तुम जय प्राप्त करो। (४)
जनार्दन के चले जाने पर तेजस्वी पलि पुरोहित के वाग्य से दर्षित हो गदा लेकर देवसेना की ओर दौड़ा।
एजार छापों में अस्मशन रे पर पाणमुर ने देष-सेना पर पढ़ाई पर सदसों या पध पिया। हे मुने ! पलपान मय दानव भी माया के द्वारा विभिन्न स्पों को धारण कर अमरों की सेना के साथ युद्ध परने ख्या।
विद्युजित, पारिभद्र, पृपपर्या, शमेक्षण, विपाक, तथा वितरभी देवताओं की सेना पर टूट पड़े। (८)
भगवान जनार्दन के पले जाने पर स्दादि देव दैत्यों द्वारा मारे जासर प्रायेग युद्ध से विमुख हो गये।
बलि एवं बाग आदिडोक्य को जीतने की इच्छा पाने सभी (दैत्य) भागते देवों के पीछे दौड़े। (१०)
देयों द्वारा पीडित हन्द्रादि भयातुर देवता स्वर्ग को छोड़कर ब्रह्मलोक चले गये । (१२)
इस प्रकार इन्द्र सहित देवताओं के प्रलोक चले जाने पर पुत्रों, भाई और पान्धयों के साथ पलि स्वर्ग या भोत्ता हो गया। (१२)
हे प्रझन् ! पलि भगवान् इन्द्र हुआ एयं याण यम यना । मय दानर परण हुआ तथा राष्ट्र पन्द्र और हलाद अग्नि धना।
स्यर्भानु (केतु) सूर्य हुआ एवं गुरु वृहस्पति मने । इसी प्रकार अन्य विभिन्न देयताओं के पदों पर असुरों ने अधिकार पर लिया। (१४)
पश्चम कलियुग के आदि में और द्वापर युग के अन्तिम भाग में भयङ्कर देषासुर संग्राम हुआ था। उस समय पलिइन्द्र बना था।
सान पाताल और भूः, भुया, स्यः नामक विषयात तीनों लोक उसके अधिकार में थे। इस प्रकार बलिदा सोकों का अधिपति हो गया था।
मुदुर्लभ भोगों का उपभोग करते हुए स्वयं
तत्रोपासन्त गन्धर्वा विश्वावसु पुरोगमाः ॥ १७
तिलोत्तमायाप्सरसो नृत्यन्ति सुरतापस ।
वादयन्ति च वाद्यानि यक्षविद्याधरादयः ॥ १८
विविधानपि भोगांथ भुञ्जन् दैत्येश्वरो बलिः ।
सस्मार मनसा ब्रह्मन् प्रह्लादं स्वपितामहम् ॥ १९
संस्मृतो नप्ठणा चासौ महाभागवतोऽसुरः ।
समभ्यागात् त्वरायुक्तः पातालात् स्वर्गमव्ययम्॥२०
तमागतं समीक्ष्यैव त्यक्त्वा सिंहासनं बलिः ।
कृताञ्जलिपुटो भूत्वा ववन्दे चरणावुभौ ॥२१
पादयोः पतितं वीरं प्रह्लादस्त्वरितो बलिम् ।
समुत्थाप्य परिष्वज्य विवेश परमासने ॥ २२
तं बलिः प्राह भोस्तात त्वत्प्रसादात् सुरा मया ।
निर्मिताः शक्रराज्यं च हुतं वीर्यग्रलान्मया ॥२३
तदिदं तात मद्वीर्यविनिर्जितसुरोत्तमम् ।
त्रैलोक्यराज्यं भुञ्ज त्वं मयि भृत्ये पुर स्थिते ॥ २४
एतावता पुण्ययुतः स्यामहं वाव यत् स्वयम् ।
त्वदलिपूजाभिरतस्त्वदुच्छिष्टानभोजनः ॥ २५ ।
न सा पालयतो राज्यं धृतिर्भवति सत्तम ।
या धृतिमुरुशुश्रूषां कुर्वतो जायते विभो ।। २६
ततस्तदुक्तं बलिना वाक्यं श्रुत्वा द्विजोत्तम ।
प्रहादः प्राह वचनं धर्मकामार्थसाधनम् ॥ २७
मया कृतं राज्यमकण्टकं पुरा
प्रशासिता भूः सुहृदोऽनुपूजिताः ।
दत्तं यथेष्टं जनितास्तथात्मजाः
स्थितो बले सम्प्रति योगसाधकः ॥ २८
गृहीतं पुत्र विधियन्मया भूयोऽर्पितं तव ।
एवं भव गुरूणां त्वं सदा शुश्रूपणे रतः ।। २९
इत्येवमुक्त्या वचनं करे त्वादाय दक्षिणे ।
शाके सिंहासने ब्रह्मन् बलिं तूर्ण न्यवेशयत् ॥ ३०
सोपविष्टो महेन्द्रस्य सर्वरत्नमये शुभे ।
वलि स्वर्ग में रहने लगा। विश्वावसु आदि गन्धर्व उसकी सेवा करने लगे। (१७)
हे देवपि ! तिलोत्तमा आदि अप्सराएँ नृत्य करती थी एवं यक्ष तथा विद्यापरादि वाद्य बजाते थे। (२८)
ब्रह्मन् ! विविध भोगों का उपभोग करते दैत्येश्वर बलि ने मन से अपने पितामह प्रहलाद का स्मरण किया। (१६)
पौत्र के स्मरण करने पर घे महान् विष्णु-भक्त असुर शीघ्र पाताल से अक्षय स्वर्गलोक में आये। (२०)
उन्हें आया हुआ देखते ही बलि ने सिंहासन त्यागकर तथा हाथ जोड़कर उनके चरणों की वन्दना की।
चरणों में प्रणत वीर बलि को शीघ्रतापूर्वक उठाकर तथा आलिङ्गन कर प्रह्लाद आसन पर बैठ गये। (२२)
बलि ने उनसे कहा-हे तात! मैंने आपकी कृपा से अपनी शक्ति के द्वारा देवताभों को पराजित कर दिया और इन्द्र के राज्य को छीन लिया । (२३)
हे तात ! आप मेरे पराक्रम द्वारा जीते गये देवों के इस श्रेष्ठ त्रैलोक्य-राज्य का भोग करें एवं मैं आपके सम्मुस भृश्य रूप से उपस्थित रहूँगा। (२४)
हे तात! इस प्रकार आपके चरणों की पूजा में रत रहकर आपके उच्छिष्ट अन्न का भोजन करने से मैं पुण्यवान हो जाऊँगा।
सत्तम! हे विभो ! राज्य का पालन करने वालों में वह धृति नहीं होती जो धृति गुरु की शुश्रूषा करने वालों में होती है। (२६)
हे द्विज सराम ! तदनन्तर प्रहलाद ने पलि द्वारा कहे वाक्य को सुनकर धर्म, अर्थ तथा नाम का साधक वचन कहा।(२७)
मैंने पहले अक्टक राज्य किया है। पृथ्वी का शासन और मित्रों की पूजा कर चुश हूँ। यथेष्ट दान और अनेक सन्तानों को उत्पन्न किया है। किन्तु हे बलि ! इस समय मैं योगी हो गया हूँ। (२८)
हे पुत्र ! तुम्हारे दिये को विधिपूर्वक ग्रहण कर मैंने पुन तुमको दे दिया। इसी प्रसर तुम गुरुओं की सेवा में में सदा रत रहो। (२९)
हे ब्रह्मन् ! ऐसा वचन कहकर (प्रहलाद ने) दाहिना हाथ पकड़ कर बलि को शीघ्र इन्द्र के सिंहासन पर बैठा (३०)
वह देश्यपति धलि महेन्द्र के सर्वरत्नमय मङ्गलमय सिंहासन
सिंहासने दैत्यपतिः शुशुभे मघवानिव ॥ ३१
तत्रोपविष्टश्चैवासौ कृताञ्जलिपुटो नतः ।
प्रहादं प्राह वचनं मेघगम्भीरया गिरा ॥ ३२
यन्मया वात कर्तव्यं त्रैलोक्यं परिरक्षता ।
धर्मार्थकाममोक्षम्यस्तदादिशतु मे भवान् ।। ३३
तद्वाक्यसमकाल च शुक्रः प्रहादमब्रवीत् ।
यद्युक्तं तन्महाराहो वदस्वाद्योत्तरं वचः ॥ ३४
वचनं पलिशुक्राभ्यां श्रुत्वा मागवतोऽसुरः।
प्राह धर्मार्थसंयुक्त प्रह्लादो वाक्यमुत्तमम् ॥ ३५
यदायत्यां क्षम राजन् यद्वितं भुवनस्य च ।
अविरोधेन धर्मस्य अर्थस्योपार्जन च यत् ॥ ३६
सर्वसत्त्वानुगमनं कामवर्गफलं च यत् ।
परत्रेह च यच्छेयः पुत्र तत्कर्म आचर ।। ३७
यथा श्लाघ्यं प्रयास्यद्य यथा कीर्तिर्भवेत्तय ।
यथा नायशसो योगस्तथा कुरु महामते ॥ ३८
एतदर्थ थिय दीप्तां कासन्ते पुरुषोत्तमाः ।
येनैतानि गृहेऽस्माकं निवसन्ति सुनिताः ।। ३९
कुलजो व्यसने मग्नः ससा चार्थयहिः कृतः ।
वृद्धो ज्ञातिर्गुणी विप्रः कीर्तिश्च यशसा सह ॥ ४०
तस्माद् यथैते निवसन्ति पुत्र
राज्यस्थितस्येह कुलोद्गतायाः ।
तथा यतस्वामलसत्त्वचेष्ट
यथा यशस्वी भविताऽसि लोके ॥ ४१
भूम्यां सदा प्राह्मणभूपिताया
क्षत्रान्विताया दृढवापितायाम् ।
शुथूपणासक्तसमुद्भवाया-
मृद्धिं प्रयान्तीह नराधिपेन्द्राः ॥ ४२
तस्माद् द्विजायाः श्रुतिशास्त्रयुक्ता
नराधिपास्ते प्रतियाजयन्तु ।
दिव्यैर्यजन्तु क्रतुभिर्द्विजेन्द्रा
यज्ञाग्निधूमेन नृपस्य शान्तिः ।। ४३
तपोऽध्ययनसंपन्ना याजनाध्यापने रताः ।
पर बैठकर इन्द्र के समान शोभित हुआ ! (३१)
उस पर बैठने के उपरान्त ननता पूर्वक हाथ जोडकर उसने मेघगर्जन तुल्य गम्भीर वाणी मे प्रहलाद से
हे मात । त्रैलोक्य का रक्षण करते हुये मेरे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के लिये पर्त्तव्य को मुझे आप पतलाएँ । (३३)
उसके पाक्य के साथ ही साथ शुक्र ने प्रहलाद से कहा-हे महागाहु । जो उचित हो यह उत्तर दीजिए। (३४)
विष्णु भक्त प्रहलाद ने पलि और शुक्र की यात मुनार धर्म और अर्थ युक्त उत्तम वाक्य कहा- (३५)
हे पुन । भविष्य के लिए समर्थ, ससार के लिए हितारह एय धर्म के अनुकूल अर्थ का उपार्जन तथा सभी प्राणियों के अनुकूल पामर्ग पे फल (फा सेयन) एवं इह रोक और परलोक मे श्रेयस्कर फर्म का आचरण करो। (३६-३७)
हे महामति । तुम जिस प्रकार इलापनीय धन मको एवं जिस प्रकार तुम्दै कीर्ति प्राप्त दो तथा अयश मा योग नहो यही कर्म करो। (३८)
श्रेष्ठ पुरुप इसीलिए उत्कृष्ट लक्ष्मी की आकाँक्षा करते हैं ताकि विपत्ति मे पडा हुआ कुलीन व्यक्ति, धनहीन ससा, वृद्ध ज्ञाति, गुणी ब्राह्मण एव यश से युक्त कीर्ति उनके गृह मे शान्तिपूर्वक रह सकें। (३६-४०)
अत हे पुत्र । हे पवित्र विचार एवं चेष्टा पाले । राज्य स्थित होने पर जिस प्रकार (उपर्युक) पुलोत्पन्नादि (तुम्हारे गृह मे) रह सकें एव जिस प्रकार तुम लोक मे यशस्वी हो सो येसा ही प्रयत्न करो। (४१)
पृथ्वी के सदा ब्राह्मणों से भूपित होने, क्षत्रियों से युक्त होने, (वैश्यों द्वारा) भलीभाँति (जोते) पोये जाने तथा सेवारत (शद्रों से) से सम्पन्न होने पर श्रेष्ठ राजाओं को समृद्धि प्राप्त होती है। (४२)
अत' श्रुतिशास्त्र सम्पन्न श्रेष्ठ प्राक्षण राजाओं से या फरायें एष उत्तम द्विजगण दिव्य यश फरें। यज्ञाग्नि पे धूम से नृप की शान्ति होती है।
हे यति । वपस्या और वेदाध्ययन से सम्पन्न यजन और अध्यापन में निरत प्रादग तुम्हारी अनुमति पाकर
सन्तु विना बले पूज्यास्त्वत्तोऽनुज्ञामवाप्य हि ॥ ४४ |
स्वाध्याययज्ञनिरता दातारः शस्त्रजीविनः ।
क्षत्रियाः सन्तु दैत्येन्द्र प्रजापालनधर्मिणः ॥ ४५
यज्ञाध्ययनसपन्ना दातारः कृपिकारिणः ।
पाशुपाल्यं प्रकुर्वन्तु वैश्या विपणिजीविनः ॥ ४६
प्राह्मणक्षत्रियविशां सदा शुश्रूपणे रताः ।
शूद्रा. सन्त्वसुरश्रेष्ठ तयाज्ञाकारिणः सदा ॥ ४७
यदा वर्णा. सधर्मस्था भवन्ति दितिजेश्वर ।
धर्मवृद्धिस्तदा स्याद्वै धर्मवृद्धौ नृपोदयः ॥ ४८
तस्माद् वर्णाः स्वधर्मस्थास्त्वया कार्याः सदा यले ।
तवृद्धौ भवतो वृद्धिस्तद्धानी हानिरुच्यते ॥ ४९
इत्थं वचः श्राव्य महासुरेन्द्रो
वलिं महात्मा स बभूव तूष्णीम् ।
ततो यदाज्ञापयसे करिष्ये
इत्थं यलिः प्राह वचो मह ॥५०
इति श्रीवामनपुराणे अष्टचत्वारिंशोऽध्याय ॥४८॥