वामन महा पुराण
वामनपुराण की फलश्रुति
पुटारय ने कहा-हे नारद । मैंने तुमसे इस अत्यन्त पवित्र पुराग पा वर्णन क्यिा । इसको मुनने से मनुष्य परम कीर्ति एवं भक्ति-युक्त होकर विष्णुलोर को जाता है। (१)
जिस प्रहार गगानल में स्नान करने से मारे पाप धुर जाते हैं, उसी प्रकार पुराण का प्रयग करने से समस्त पाप नट हो जाता है। (२)
हे ब्रह्मन् । यामन पुराग का अपग परने पारे मनुष्य ये
शरीरे च कुले ब्रह्मन् यः भृणोति च वामनम् ।।३
भृणोति नित्यं विधिवच्च भक्त्या
संपूजयन् यः प्रणवच विष्णुम् ।
स चाश्वमेघस्य सदक्षिणस्य
फलं समग्रं परिहीनपापः ॥ ४
प्राप्नोति दत्तस्य सुवर्णभूमे-
रश्वस्य गोनागरथस्य चैव ।
नारी नरश्चापि च पादमेक
शृण्वन् शुचिः पुण्यतमः पृथिव्याम् ॥ ५
स्नाने कृते तीर्थयरे सुपुण्ये
गङ्गाजले नैमिपपुष्करे या।
कोकामसे यत् प्रवदन्ति विप्राः
प्रयागमासाद्य च
स तत्फलं प्राप्य च वामनस्य
संकीर्तयन् नान्यमनाः पदं हि ।
गच्छेन्मया नारद तेऽद्य चोक्तं
यद् राजसूयस्य फलं प्रयच्छेत् ॥ ७
यद् भूमिलोके सुरलोफलम्ये
महत्सुखं प्राप्य नः समग्रम् ।
प्राप्नोति चास्य श्रवणान्महर्षे
सौत्रामणेनास्ति च संशयो मे ॥८
रत्नस्य दानस्य च यत्फलं भवेद्
यत्सूर्यम्प चैन्दोहणे च राहोः।
अन्नस्य दानेन फलं यथोक्तं
युभुक्षिते विप्रवरे च साग्निक ॥९
दुर्भिक्षसंपीडितपुत्रमा
यामी सदा पोपणवत्परे च ।
देवाग्निविप्रपिरते च पित्रोः
शुश्रृपके प्रातरि ज्येष्ठताम्ने ।
पचत्फलं संप्रवदन्ति देवाः
स तत् फलं लभते चास्य पाठात् ॥ १०
चतुर्दश वामनमाहुरराय
श्रुते च यस्यापचयाय नाशम् ।
प्रयान्ति नास्त्पत्र च संशयो मे
महान्ति पापान्यपि नारदाशु ॥ ११
पाठात् संश्रवणाद् विप्र श्रावणादपि कस्पचित् ।
शरीर एवं कुल मे रोग तथा अभिचार-कर्म जनित विषया प्रमाय नहीं होता।
नम्रतापूर्वक विष्णु का पूजन करते हुए भक्तिपूर्वक विधिवत् नित्य इस पुराण का प्रण करने वाले मनुष्य के पाप नष्ट हो जाते हैं एवं उसे दक्षिणासहित अश्वमेघ यज्ञ करने तथा सुपर्ण, भूमि, अश्व, गी, हायी एवं रथ फे दान का फल प्राप्त होता है । इस (पुराग) का एक घरण भी श्रवण करने पाला पुरुष तथा स्त्री पृथ्वो मै शुचिता युक्त एवं अत्यन्त पुण्यवान हो जाता है।
विगण अत्यन्त पयिन भेष्ठ तीर्थ के जल, गाजल, नैमिषारण्य, पुपर, फोकामुरा एवं मापमास में प्रयाग में जाकर स्नान करने में जिस पल की प्राप्ति का होना पतलाने हैं, अनन्यमन से पामनपुराग के एक परका कीर्तन करते हुए गमन करने वाले पुरुष को यही पल प्रात होता है। नारर ! मैंने आम तुमसे यह पुपर या है जो पसग याका फल प्रदान करता है।
हे महर्षि! मुझे इसमे सन्देह नहीं है कि इसका श्रवण करने से मनुष्य पृथ्वी एवं सुरलोक में उपलब्ध होने योग्य समस्त महार सुसरों को प्राप्त पर सौत्राणि नामक यज्ञ का फल प्राप्त करता है। (८)
देवगण रत्नदान, राह द्वारा सूर्यप्रण एवं चन्द्र पा प्रहण होने के समय किये गए दान, भूसे अग्निहोत्री श्रेष्ठ ब्राह्मण को दिये गये अन्नदान, दुर्भिक्ष से पीड़ित पुत्र, भार्या एवं बान्धय के पोपण मे उत्पा पुरुष को दिये गए दान, देवता, अगिन एवं विप्र की परिचर्या में टग्न व्यकि को दिये गए दान, माता पिता, तपा ज्येष्ठ भ्राता को दिए गये दान से जिस फल का होना यदलाते हैं पर पल मनुष्य इसरा पाठ करने से प्रान कर देना (९-१०)
हे नारद! घामनपुराग चौपदयों भेष्ठ पुराग है। इममें मुझे सन्देह नहीं है कि इस मयग करने में पाप समूह प्यं महापाप भी शीम नष्ट हो जाते है। (११)
सर्वपापानि नश्यन्ति चामनस्य सदा मने ॥ १२
इदं रहस्य परमं नवोक्तं
न वाच्यमेतद्धरिभक्तिवर्जिते।
द्विजस्य निन्दारतिद्दीनदक्षिणे
सहेतुवाक्यावृतपापसत्त्वे ॥ १३
नमो नमः कारण वामनाय नित्यं यो वदेनियतं द्विजः ।
तस्य विष्णुः पदं मोक्षं ददाति सुरपूजितः ॥ १४
पाचकाय प्रदातव्य गोभूस्वर्णविभूषणम् ।
वित्तशाठ्यं न कर्तव्यं कुर्वन् श्रवणनाशकम् ।। १५
त्रिसध्यं च पठन् मृण्वन् सर्वपापप्रणाशनम् ।
असूयारहितं विन सर्वसम्पत्प्रदायकम् ॥ १६
इति श्रीवामनपुराणे एकोनसप्ततितमोऽध्याय॥६९॥
॥ इति श्रीवामनपुराणं समाप्रम्।।
हे मुनि। हे विप्र । वामन पुराण का पाठ करने, सुनने एवं सुनाने से सर्वदा समस्त पाप नष्ट होते (१२)
मैंने तुमसे यह परम रहस्य तत्त्व कहा है इसे हरिभक्तिरहित व्यक्ति, ब्राह्मण की निन्दा करने वाले आचार- हीन तथा तशील पापी मनुष्य के सम्मुग्व नहीं कहना चाहिए। (१३)
'नमो नम. कारणवामनाय' इस मन्त्र का नियमपूर्वक जप करने वाले द्विज को सुरपूजित विष्णु मोक्ष पद प्रदान करते है। (१४)
इस पुराण के वाचक को गो, पृथ्वी एच स्वर्णाभूषण प्रदान करना चाहिए। इममे वित्तशाठ्य नहीं करना चाहिए। क्योंकि ऐसा करने से अयण के फल का नाश हो जाता है। (१५)
हे विप्र। तीनों सध्याओं मे असूयारहित होकर सर्वपापनाशक इस पुराण का पाठ करने एय श्रवण करने से सभी प्रकार की सम्पत्तियाँ प्राप्त होती है। (१६)
श्रीवामनगुगण मे उनहत्तरवाँअध्याय समाप्त ॥६९॥
वामनपुराण समाप्त