कात्यायनी चरित में चण्ड मुण्ड द्वारा महिष से देवी के रुप सौप्ठक का निवेदन महिषासुर द्वारा दूत स्रप्रेषण, दूत द्वारा देवी से महिषासुर के सदेश का कथन महिषासुर का युद्धोघोग

नारद उवाच ।

कथं कात्यायनी देवी सानुगं महिषासुरम् ।

सवाहनं हतपती तथा विस्तरतो घद ।। १

एतच संशयं ब्रह्मन् हदि मे परिवर्तते ।

विद्यमानेषु शस्त्रेषु यत्पद्यां तममर्दयत् ॥२

पुलस्त्य उवाच।

शृणुष्वावहितो भूत्वा कथामेतां पुरातनीम् ।

वृत्तां देवयुगस्यादौ पुण्यां पापभयापहाम् ॥ ३

एवं स नमरः क्रुद्धः समापतत वेगवान् ।

सगजाश्वरथो ब्रह्मन् दृष्टो देव्या यथेच्छया ॥४

ततो पाणगणैर्दैत्यः समानम्याथ कार्मुकम् ।

ववर्ष शैलं धारौद्योरियाम्मुदवृष्टिभिः ॥ ५

शरवण तेनाथ विलोक्यादि समावृतम् ।

क्रुद्धा भगवती वेगादाचकर्ष धनुर्वरम् ।। ६

तद्धनुर्दानवे सैन्ये दुर्गया नामित बलात् ।

सुवर्णपृष्ठं विवभी विद्युदम्पपरेष्विर ॥७

बाणैः सुररिपूनन्यान् खड्गेनान्यान् शुभवत ।

गदया मुसलेनान्यांश्चर्मणान्यानपातयत् ॥ ८

एकोऽप्यसौ बहून् देव्याः केसरी कालसंनिमः ।

विधुन्धन् केसरसटा निषूदयति दानवान् ॥ ९

उन्होंने भी पादप्रहार द्वारा उस महिषासुर को मार डाला। (४३)

हे द्विज! इस प्रकार के प्रभाव से युक्त विष्णुपार समस्त रक्षाकारी (वस्तुओं) मे श्रेष्ठ कहा गया है। जिसके चित्त में चक्रपाणि स्थित हों युद्ध में उसके दर्ष की हानि कौन कर सकता है? (४१)

श्रीवामनपुराग में बीसवाँ अध्याय समाप्त ॥२०॥

२१

नारद ने कहा-"कात्यायनी देवी ने अनुचरों एय याइनों के साथ महिषासुर को किस प्रकार मारा। इसस विस्तार से वर्णन करें। (१)

हे प्रक्षन ! मेरे मन में यह संशय है कि शखरे के विद्यमान होते हुए भी देवी ने पैरों द्वारा उसे क्यों मर्दित किया?" (२)

पुलस्त्य ने कहा-"देवयुग के आदि में घटित तथा पाप एवं भय को दूर करने पाली इस पवित्र पुरातनी कथा को  सायधान होकर सुनो।" (३)

हे मझन् ! इस प्रकार यह मुद्ध नमर गज, अश्व एवं र रथ के साथ वेगपूर्वक आ पदा। देवी ने उसे यथेच्छरूपसे देखा।(४)

तदनन्तर धनुप को झुका कर दैत्य ने शैल के ऊपर इस प्रकार पाए वर्षा की जैसे आकाश (पर्वत पर) धारा प्रयाइ जलवृष्टि करता है। (५)

तदनन्तर पर्वत पो पाणवई से आवृत दुआ देख कर मुद्धा भगवती ने वेगपूर्वक श्रेष्ठ धनुप को सींचा। (६)

दानव-सेना के मध्य दुर्गा द्वारा बलपूर्वक मुकाया गया यह सुवर्णपृष्ठ वारा धनुप मेषों में विद्युत के तुज्य चमका। (७)

हेशुभवत! उन्होंने पुछराक्षसों को पाणों के द्वारा, युद्धको सड़ा के द्वारा, कुछ को गदा के द्वारा, कुछ को मुसल के द्वारा एवं कुब को ढाल के द्वारा मार डाटा। (८)

देवी के कारतुल्य सिंह ने अपनी फेसरसटा को हिलाने

कुलिशाभिहता दैत्याः शक्त्या निर्मिन्नवक्षसः ।

लाङ्गलैर्दारितग्रीवा विनिकृत्ताः परश्वधैः ॥१०

दण्डनिर्भिनशिरसश्चऋविच्छिन्नबन्धनाः।

चेलुः पेतुश्च मम्नुश्च तत्यजुश्चापरे रणम् ॥ ११

ते वध्यमाना रौद्रया दुर्गया दैत्यदानवाः ।

कालरात्रिं मन्यमाना दुद्रुवुर्भयपीडिताः ॥ १२

सैन्याग्रं भग्नमालोक्य दुर्गामग्रे तया स्थिताम् ।

दृष्ट्वाजगाम नमरो मत्तकुञ्जरसस्थित. ॥ १३

समागम्य च वेगेन देव्या. शक्ति मुमोच है।

त्रिशुलमपि सिंहाय प्राहिणोद् दानवो रणे ॥ १४

तावापतन्ती देव्या तु हुंकारेणाथ भस्मसात् ।

कृतावथ गजेन्द्रेण गृहीतो मध्यतो हरिः ॥ १५

अथोत्पत्य च वेगेन तलेनाहत्य दानवम् ।

गतासुः कुञ्जरस्कन्धात् क्षिप्य देव्यै निवेदितः ॥ १६

गृहीत्वा दानवं मध्ये ब्रह्मन् कात्यायनी स्पा।

सव्येन पाणिना भ्राम्य वादयत् पटहं यथा ॥ १७

ततोऽट्टहासं मुमुचे तादृशे वाद्यतां गते ।

हास्यात् समुद्भवंस्तस्या भूता नानाविधाऽद्भवाः ।। १८

केचिद् व्याघ्रमुसा रौद्रा वृकाकारास्तथा परे ।

हयास्या महिपास्याश्च वराहपदनाः परे ॥ १९

आसुकुक्कुटवक्त्राश्च गोजाविकमुखास्तथा ।

नानावक्त्राक्षिचरणा नानायुधधरास्तथा ॥ २०

गायन्त्यन्ये हसन्त्यन्ये रमन्त्यन्ये तु सघशः ।

वादयन्त्यपरे वत्र स्तुवन्त्यन्ये तथाम्पिकाम् ।। २१

सा तैर्भूतगणैर्देवी साई तद्दानवं बलम् ।

शातयामास चाक्रम्य यथा सस्य महाशनिः ॥ २२

सेनाने निहते तस्मिन् तथा सेनाग्रगामिनि ।

चिक्षुः सैन्यपालस्तु योधयामास देवता ॥ २३

हुए अकेले अनेक दानवों का वध किया । (९)

कुलिश से आहत, शक्ति से विदीर्ण पक्ष स्थल वाले, हल से फाडी गयी गर्दनवाले, परश्वध से काटे गये, दण्ड से फोडे गये शिरवाले तथा चक्र से विच्छिन्न बन्धनों वाले दैत्य विचलित हो गये, गिर गये, मूर्छित हो गये और कोई- कोई युद्ध छोडकर भाग गये। (१०-११)

भयकर दुर्गा द्वारा मारे जा रहे भय पीडित दैत्य एव दानव उन्हें कालरात्रि मानकर भाग खडे हुए । (१२)

सेना के अग्र भाग को भग्न तथा दुर्गा को सम्मुख स्थित देख कर मत्त हाथी पर आरूढ नमर आगे (१३)

युद्ध मे आकर दानव ने देवी के ऊपर वेगपूर्वक शक्ति से प्रहार किया एव सिंह के ऊपर निशूल चलाया। (१४)

देवी ने आ रहे उन दोनों अलों को हुकार द्वारा भस्म सात् कर दिया। तदनन्तर गजेन्द्र ने सिंह के मध्य भाग को पकड लिया। (१५)

तदनन्तर (सिंह ने) वेगपूर्वक उछल कर दानव को थप्पड से मारने के उपरान्त उस निष्प्राण (दानव) को कुअर के स्कन्ध से नीचे गिरा कर देवी को निवेदित किया।

हे ब्रह्मन् । देवी कात्यायनी क्रोध से उस दैत्य को मध्य में पकड कर तथा बायें हाथ से घुमा कर पटह के सदृश बजाने लगी। (१७)

तदनन्तर उसके उस प्रकार वाद्यता को प्राप्त होने पर देवी ने अट्टहास किया। उनकी हॅसी से अनेक प्रकार के अद्भुत भूत उत्पन्न हुए। (१८)

कोई कोई भयकर (भूत) व्याघ्र के समान मुखवाले थे, किसी की आकृति वृक के सदृश थी, किसी का मुख घोड़े के तुल्य, किसी का महिप सदृश एव पिसी का वराह जैसा था। (१६)

किन्हीं का मुख मूषक, कुक्कुट, गाय, बकरा अथवा भेड़ के सदृश था। वे सभी नाना प्रकार के मुख, आँखके , एव चरणों वाले तथा नाना प्रभार के आयुधों को धारण किये हुये थे। (२०)

उनमे कुछ समूह बनाकर गाने लगे, कुछ हँसने लगे, कुछ रमण करने लगे, कुछ वादन करने लगे तथा कुछ देवी की स्तुति करने लगे।

देवी ने उनभूतगणों के साथ उस दानव सेना पर आक्र- मण कर उसे इस प्रकार नष्ट कर दिया जैसे महान् वन सस्य (खेती) का नाश करता है। (२२)

सेना के उस अग्र भाग तथा सेनाप्रगामी ( सेनापति) के मारे जाने पर सैन्यपाल चिक्षुर ने देवताओं से युद्ध किया।(२३)

कार्मुकं दृढमाकर्णमाकृष्य रथिनां वरः।

ववर्प शरजालानि यथा मेयो वसुन्धराम् ॥ २४

तान् दुर्गा स्वशरैश्छित्त्वा शरसंघान् सुपर्वभिः ।

सौवर्णपुवानपराशरान् जग्राह पोडश ॥ २५

ततश्चतुर्भिश्चतुरस्तुरङ्गानपि भामिनी ।

हत्या सारथिमेकेन ध्वजमेकेन चिच्छिदे ।। २६

ततस्तु सशरं चापं चिच्छेदैकेषुणाऽम्मिका ।

छिन्ने धनुपि सङ्गं च चर्म चादत्तवान् बली ॥ २७

तं खड्गं चर्मणा सार्ध दैत्यस्याधुन्वतो नलात् ।

शरैश्चतुर्भिश्चिच्छेद ततः शूलं समाददे ॥ २८

समुद्राम्य महच्छूलं संप्राद्यदथाम्पिकाम् ।

मोष्टुको मुदितोऽरण्ये मृगराजवधूं यथा ।। २९

तम्याभिपतत. पादौ करौ शीर्ष च पञ्चभिः

शरैश्चिच्छेद संक्रुद्धा न्यपतन्निहतोऽसुरः ॥ ३०

तस्मिन् सेनापतौ क्षुणे तदोग्रास्यो महासुरः ।

समाद्रवत वेगेन करालास्यश्च दानवः ॥ ३१

पाष्कलरचोद्धतश्चैव उदग्राख्योगकार्मुकः ।

दुईरो दुर्मुसश्चैव पिडालनयनोऽपरः ॥ ३२

एतेऽन्ये च महात्मानो दानवा घलिनां पराः।

कात्यायनीमाद्रवन्त नानाशस्त्रास्त्रपाणयः ।। ३३

वान् दृष्ट्या लीलया दुर्गा वीणां जग्राह पाणिना ।

चादयामास हसती तथा डमरुकं वरम् ॥ ३४

यथा यथा वादयते देवी वाद्यानि तानि तु ।     

तथा तथा भूतगणा नृत्यन्ति च हसन्ति च ॥ ३५

ततोऽसुराः शस्त्रधराः समभ्येत्य सरस्वतीम् ।

अभ्यघ्नस्तांश्च जग्राह केशेषु परमेश्वरी ॥३६

प्रगृह्य केशेषु महासुरांस्वान्

उत्पत्य सिंहात्तु नगस्य सानुम् ।

ननर्त वीणां परिवादयन्ती

पपौ च पान जगतो जनित्री ॥ ३७

ततस्तु देव्या पलिनो महासुरा

दोर्दण्डनिध्वविशीर्णदर्पाः।

रथारोहियों में श्रेष्ठ उस दैत्य ने दृढ धनुप को पानों तक खींच कर इस प्रकार वाणों की वर्षा की जैसे मेघ वसुन्धरा पर जलपर्षा करता है । (२४)

दुर्गा ने सुन्दर पर्यो याने अपने बाणों से उन याण समूहों को काट कर सुवर्ण पुखवाल दूसरे सोलह बाणों को लिया। (२५)

तदनन्तर क्रुद्ध दुर्गा ने चार वाणों से ( उसके ) चार घोडों को, एक से सारथी यो एव एक से ध्वज को काट डाला। (२६)

तदुपरान्त अम्यिका ने एक बाण से उसने याणसहित धनुप कोकाट डाल। धनुप कट जाने पर बलवान् चिक्षुर ने सद्ग और दाल प्रहण किया। (२५)

देवी ने देत्य के उस दाल युक्त वलयार को जिसे वह परपूर्वक घुमा रहा था चार वाणों से काट दिया। तदुप-रान्त उसने शूल धारण किया। (२८)

महान् शूल को घुमा र वह अम्बिश की ओर इस प्रकार दौड़ा जैसे यन में शृगाल प्रसन्नमन होकर सिहिनी यी ओर दौड़ता है। (२६)

अत्यन्त मुख देयी ने पाँच पाणों से आक्रमणगरी उस

(असुर) के दोनों हाथों, दोनों पैरों एवमस्तक को काट दिया जिससे मरकर वह असुर गिर पड़ा। (३०)

उस सेनापति के मरने पर उपास्य नामक महान् असुर तथा क्रायस्य नामक दानव वेगपूर्वक दौड़े। (३१)

बाप्पल, उद्धत, उदमाख्य, उपकार्मुक, दुर्धर, दुर्मुख, तथा विडालनयन-ये तथा अन्य अनेक शस्त्रधारी, अत्यन्त बली एव श्रेष्ठ दानवों ने कात्यायनी पर आरमण किया। (३२-३३)

उन्हें देस र देवी दुर्गा ने लीलापूर्वक हाथों में वीणा एव श्रेष्ट डमरू लेकर हँसते हुए घजाना प्रारम्भ किया। (३५)

देवी ज्या ज्या उन पाद्यों को यजाती थी त्यों त्यों भूत- गण नाचते और हँसते थे। (३५)

तदनन्दर शस्त्रधारी असुर सरस्वती के निकट जारर प्रहार करने लगे। परमेश्वरी ने उनके केशों को पकड़ लिया।

उन महासुरों का फेश परद कर तथा सिंह से उछल पर पर्वत शग पर आयी हुयी जगजननी (करयायनी) वीणा यादन करते हुए पान करने लगीं। (३७)

तदनन्तर देयी के याहुदण्ड से मारे गये विशीणदर्पाले

विसस्तवस्त्रा व्यसवश्च जाता.

ववस्तु तान् वीक्ष्य महासुरेन्द्रान् ॥ ३८

देच्या महौजा महिषासुरस्तु

व्यद्रावयद् भूतगणान् खुराः।

तुण्डेन पुच्छेन तथोरसाऽन्यान्

निवासवातेन च भूतसंघान् ॥ ३९

नादेन चैवाशनिसनिमेन

विपाणकोट्या स्वपरान् प्रमथ्य ।

दुद्राय सिंहं युधि हन्तुकामः

ततोऽम्बिका क्रोधवशं जगाम ।। ४०

ततः स कोपादथ तीक्ष्णशृङ्गः

क्षिप्रं गिरीन् भूमिमशीर्णयच्च ।

संक्षोमयस्तोयनिधीन घनश्च

विध्वंसयन् प्राद्रवताय दुर्गाम् ।। ४१

सा चाथ पाशेन पबन्ध दुष्ट

स चाप्यभूत् क्लिन्नकटः करीन्द्रः।

करं प्रचिच्छेद च हस्तिनोऽग्रं

स चापि भ्यो महिपोऽभिजातः । ४२

ततोऽस्य शूलं व्यसृजन्मृडानी

स शीर्णमूलो न्यपतत् पृथिव्याम् ।

शक्ति प्रचिक्षेप हुताशदत्ता

सा कुण्ठिताग्रा न्यपतन्महर्षे ॥ ४३

चक्र हरेर्दानवचक्रहन्तुः

क्षिप्तं त्वचक्रत्वमुपागतं हि ।

गदां समाविध्य धनेश्वरस्य

क्षिप्तातु भग्ना न्यपतत् पृथिव्याम् ॥ ४४

जलेशपाशोऽपि महासुरेण

विपाणतुण्डाग्रसुरप्रणुन्नः।

निरस्य तत्कोपितया च मुक्तो

दण्डस्तु याम्यो पहुखण्डतां गतः ॥ ४५

वज्र सुरेन्द्रस्य च विग्रहेऽस्य

मुक्त सुसूक्ष्मत्वमुपाजगाम ।

संत्यज्य मिहं महिपासुरस्य

दुर्गाऽधिरूढा सहसैव पृष्ठम् ।। ४६

पृष्ठस्थितायां महिपासुरोऽपि

पोप्ल्यते वीर्यमदान्मृडान्याम् ।

बलवान् महासुर अस्तव्यस्त वस्त्रवाने एव विगतप्राण हो गए । तदुपरान्त उन श्रेष्ठ महासुरों को देख कर महाबलवान् महिषासुर ने अपने खुराम, तुण्ड, पुच्छ, वक्ष स्थल तथा नि श्वास वायुसे देवी के भूतगणों को भगा दिया। (३८ ३६)

वचतुल्य शब्द एव सींगों की नोक से अन्यों को प्रम-थित करके युद्ध मे सिंह को मारने की इच्छा से वह दौड़ा। इससे अम्बिका क्रुद्ध हो गई। (४०)

तदनन्तर तीक्ष्ण शृङ्गयुक्त यह ( महिष ) कोपवश शीघ्रतापूर्वक पर्वतों एव भूमि को विशीपा करने लगा तथा समुद्र को सक्षुब्ध करते हुए एवं मेघों को विध्वस्त करते हुए दुर्गा की ओर दौड़ा। (४१)

तदनन्तर उन्होंने उस दुष्ट को पाश से बाँध लिया । और वह मदसितगण्डस्थल वाला गजराज बन गया। देवी ने हाथी का शुण्डान काट दिया। तत्पश्चात् वह पुन महिप हो गया। (४२)

हे महर्षे । तदनन्तर मृडानी ने उसके ऊपर शूल फेंका, वह (शूल) टूट कर पृथ्वी पर गिर पड़ा। तत्पश्चात् उन्होंने अग्नि द्वारा प्रदत्त शक्ति फेंकी, किन्तु वह भी कुण्ठिताम होकर गिर पड़ी। (४३)

दानव समूह को मारने वाला हरि का चक भी फेंके जाने पर अचक बन गया (निष्क्रिय हो गया)। धनेश्वर की घुमा कर फेंकी गयी गदा भग्न होकर पृथ्वी पर गिर (४४)

महासुर ने जलेश के पाश को विषाण, तुण्डान एवं खुर के प्रहार से निरस्त कर दिया। कुपित (देवी द्वारा) छोड़ा गया यम का दण्ड भी कई खण्डों मे टूट गया। (४५)

उसके शरीर पर चलाया गया इन्द्र का वज्र भी अति सूक्ष्म (टुकड़े टुकड़े) हो गया। तदनन्तर दुर्गा सहसा सिंह को छोड़कर महिषासुर के पृष्ठ पर आरुढ हो गई। (४६)

मृहानी के पृष्ठस्थित होने पर महिषासुर वीर्य के मद से

सा चापि पनयां मृदुकोमलाम्या

ममर्द तं हिन्नमिवाजिनं हि ॥ ४७

स मृद्यमानो धरणीधराभो

देव्या बली हीनलो बभूव ।

ततोऽस्य शूलेन निमेद कण्ठं

तस्मात् पुमान् सङ्गधरो विनिर्गतः॥४८

निष्कान्तमात्रं हृदये पदा तम्

आहत्य संगृह्य कचेपु कोपात् ।

शिरः प्रचिच्छेद वरासिनाऽस्य

हाहाकृतं दैत्यालं तदाऽभूत् ॥ ४९

सचण्डमुण्डाः समयाः सतारा:

सहासिलोम्ना भयकातराक्षाः।

संताध्यमानाः प्रमथैर्मवान्याः

पावलमेवाविविशुभयार्ताः ॥ ५०

देव्या जयं देवगणा विलोक्य

स्तुवन्ति देवी स्तुतिभिर्मह।

नारायणी सर्वजगत्प्रतिष्ठा

कात्यायनी घोरमुसी सुरुपाम् ॥ ५१

संस्तूयमाना सुरसिद्धसंघ-

निपण्णभूता हरपादमूले।

भूयो भविष्याम्यमरार्थमेव-

मुक्त्या सुरांस्तान् प्रविवेश दुर्गा ॥ ५२

इति श्रीवामनपुराणे एक विंशोऽध्याय ॥२१॥