वामन महा पुराण
वामन की ब्रह्मलोक में पूजा, ब्रह्मा द्वारा वामन की स्तुति एव विष्णु का वामन रुप से स्वर्ग में निवास
नारदं उवाच'।
श्रुतं यथा भगवता मलिद्धों महात्मनाम"
किंवस्त्यन्य प्रष्टव्यं तच्छुत्या कर्थयाध में ।। १
भगवान् देवराजाय दत्वा विष्णुस्त्रिपिष्टपम् ।
अन्तर्धानं गतः पयासी सर्वोत्मा तात कथ्यताम् ॥ २
सुतलस्थश्च दैत्येन्द्रः किमकार्षीत् तथा वद । ।
का चेष्टा तस्य विप्रर्षे वन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥ ३
पुलस्त्य उवाच -
अन्तर्धाय सुरावासं वामनोऽमृदयामनः ।
जगाम ब्रह्मसदनमधिरह्योरगाशनम् ॥ ४
वासुदेवं समायान्तं ज्ञात्वा प्रझाऽव्ययात्मकः ।
समुत्थायाध सौहार्दा सस्वजे कमलासनः ।। ५
परिष्वज्या विधिना वेधाः पूजादिना हरिम् ।
पप्रच्छ किं चिरेणेह भयवागमनं छतम् ॥ ६
अथोपाच जगत्स्यामी मया कार्य महत्कृतम् ।
सुराणां ऋतुभांगायें स्वयंभी यलिबन्धनम् ।। ७
पितामहस्तद् वचनं श्रुत्वा' मुदितमानसः ।
कथ कथमिति प्राह स्वं मां दर्शितमर्हसि ॥
इत्येवमुक्ते वचने भगवान्, गरुडध्वजः ।
दर्शयामास तद्रूपं सर्वदेवमय लघु ॥९, न
|तरप्या पुण्डरीकाक्षं योजनायुतविस्तृतम् ।
खायानेयोग्रमानेन ततोज प्रणतोऽभवत् ॥, १०
ततः प्रणम्य सुचिरं साधु साध्वित्युदीर्य च ।
भक्तिननो महादेवं पद्मजः स्तोत्रमोरयत् ॥ ११
ॐ नमस्ते देवाधिदेव वासुदेव
एक मृग बहुरूप वृपाफपे भूतभावन
सुरासुरयप सुरासुरमथन पीतवासः
श्रीनिवास असुरनिर्मितान्त अमितनिर्मित
६६
नारद ने कहा-महात्मा भगवान् ने जिस प्रकार पलि को याँधा था इसे मैंने सुना। किन्तु, अन्य विषय भी पूछना है। उसे सुनार आज आप मुझसे कहिये । (१)
हे तात! यह यतलाइए कि देवराज इन्द्र को संग देने के उपरान्त वे सर्वारमा भगवान विष्णु अन्वदित हो पर यहाँ पले गये। इसके अतिरिक यद पतलाइ कि गुनटस्थ दरयेन्द्र ने क्या किया एवं हे यिपि ! मुझे पिशेपस्प से यह सूचित फॉकि तदुपरान्त यह कौन-सी चेष्टाएँ करता था ? (२३)
पुलस्त्य ने कहा-विरोहित होने पे उपरान्त थामन देष ने अपना यामन स्यरूप त्याग दिया एवं गरुड पर आरक्ष होकर गुरायास प्रह्मलोक गये। (४)
यासुदेय को आया जानकर अव्ययात्मा कमलासन महा (अपने आसन से) उठे ज्यं सौहादपूर्पक (विष्णु पा) आलिगनरिये।
भासिनोपपन्न विधिपूर्वक पूजादि द्वारा हरि की अर्चना कर जमा ने पूमा-पिरकालोपराम आपके यहाँ । आने का क्या कारण है।
तदनन्तर जगत्स्यामी ने फहा-मैंने महान कार्य किया है? हे स्वयम्भो। सुरों के या भाग के लिए मैंने पलि यो पाँधा है।
यह यचन सुनकर ब्रह्मा ने प्रसन्न होकर कहा-कैसे आप उस रूप को मुझे दिग्रलायें। ऐमा पचन कहे जाने पर भगवान् गररचज ने शीघ्रता से यह सर्वदेवमय रूप दिरगया।
अयुत योजन विस्तृत तथा उतने ही ऊँचे पुण्डरीकाक्ष को देखकर पितामह ने प्रणाम किया। (१०)
पदनन्तर देर तक प्रणाम पर मसाने 'साधु, साधु' पदा एवं भरिपूर्ण नम्रता से महादेय की स्तुति करने लगे-(११)
है देयापिदेय! यामुय! एकर! पम्प ! पृपायपि भूतभावन 'मुरामुरमेष्ठ! मुरमुरमयना पीवयास ! मोनियाम' अरनिर्मितान्त। अमितनिर्मित! कपिल!
फपिल महाकपिल विष्वक्सेन नारायण [5]
ध्रुवचन मत्यध्यन समयज वालपज
यकृष्ट पुरुषोत्तम रेण्य विष्णो अपराजित
जय जयन्त विजय कतावत महादेव
अनादे अनन्त आधन्तमम्बनिधन
पुरअय धनंजय शुचिधय पृश्निगर्म [10]
कमलगौ फमलायताच श्रीपते विष्णमूल
मृगाधियाम धर्माधियाम धर्मधाम
धर्माध्यक्ष प्रजाध्यक्ष गदाधर
श्रीपर श्रुतिधर पनमालापर
सक्ष्मीघर धरणीधर पपनाम . [15]
पिरिय आर्टिषेण महागेन सेनाध्यक्ष
त परल्प महाकल्प
फापनामुरा अनिरुद्ध सर्वग मात्मन्
द्वादशात्मक मर्यात्मक सोमात्मक
पालारमा च्योमारमफ भूवारमफ [20]
रमात्मक परमात्मन् मनाउन
सवेश हरिश गुदाफैश पेश्य
नील गम स्थल पीव रक्त घेत घेताधिवास
रक्ताम्बरप्रिय प्रीतिकर प्रीतिमाम इंग
नीलयास मीरपज मर्यलोकाधियामक]
कुशेशय अधोक्षज गोविन्द जनार्दन
मधुसूदन यामन नमस्ते ।
सइसमीपडिसि सदसगगि महमपादोमगि
त्वं कमलोऽमि मदापोऽमि सदवपारमि
सहरतिरसि त्या देवाः प्रादुः सहयवदनं [30]
से नमस्ते।
ॐ नमस्ने विश्वदेवेश स्थिमः विधात्मक
विसरूप रिसमभव त्वत्तो नियमिदममवर
प्राक्षणात्यन्मुपिम्पोऽभयन् धनिया दोगमवाः
उरुयुग्माद् विशोऽगयन् द्राभरण कमलम्यः [3]
नाम्या भरतोऽतरिसमजायत इन्द्रामीयस्यतो
नेपाद मानुरभन्मनमः समाः अहं प्रमादनार
भोपान ध्यारकः प्राणाशातो मयतो मातरिया
महारपिट' पिण्यान! नारायण ! थापको नमसारी।
पन्यत्र! मारभ्यत! गरमध्यन तारयन! पेरण्ठ । पुरोग! याय! पिगु' भपता जप । जपा ! पिजय । साप! महादेय! धनादि। अनग! भादन ! सभ्यनिधन ! पुरग ! धनप ! गुपिमर ! हरिनगर्भ (भाप ना
समन्त्रा! यमरा1' पनि! विशुगर! मूना पराम! समाधिपास ! भो भगांका। माम! पदापर पर किया' परमार कापर' परपर। मनाम ( मापार दि सिमा नाका पुरा एस' गमन ' नाममा 'ना' 'भूगर ! ! मर: मान !
हरिश' गुरंश' पंप मैन' गुण' स्पून! पात:का' जानिय प्रीतिर प्रीनिगार हम' नीटशाग ' मेरा ' ममाधिपाग! मुशेशय' अशा गपिन्द । जगान' मदन' पामन ' मानमार। [27]
भार मारी, महसनं, गहराया, यमन, महापुर,प, महरा ६ मामी। भारत सदराम । भार विपक्ष ' वि भर्ग पर पिन प्राभार गुजर समे मा. नागार मे पानो
शिरसो धौरजायत श्रोत्राद् दिशो भूरियं चरणा-
दभूत्श्रोत्रोद्भवादिशोभवत स्वयंभोनक्षत्रास्तेजोद्भयाः[10]
मूर्चयश्चामृर्वयश्च सर्वे त्वत्तः सामुद्भूताः ।
अवो विश्वात्मकोऽसि ॐ नमस्ते पुष्पहासोऽसि
महाहामोऽमि परमोऽसि ॐकारोऽसि वपट्कारोऽसि
स्वाहाकारोऽसि चौपटकारोऽसि स्वधाकारोऽसि
वेदनयोऽसि तीर्थमयोऽसि यजमानमयोऽसि [45]
यज्ञमयोऽसि मर्वधाताऽसि यज्ञभोक्ताऽसि
शुक्रधाताऽमि भूर्द भुवद स्वर्ट स्वर्णद गोद
अमृतदोऽसीति । ॐ ब्रह्मादिरसि ब्रह्ममयोऽसि
यज्ञोऽसि वेदकामोऽसि वेद्योऽसि यज्ञधारोऽसि
महामीनोऽसि महासेनोऽसि महाशिरा असि [50]
नृकेसर्यसि होताऽसि होम्योऽसि हव्योऽसि हूयमानोऽसि
हयमेधोऽसि पोताऽसि पावयिताऽसि पूतोऽसि
पूज्योऽसि दाताऽसि हन्यमानोऽसि हियमाणोऽसि
हासीति । नीतिरसि नेताऽसि अग्योऽसि
विश्वधामाऽसि शुभाण्डोऽसिध्रुवोऽसिआरणेयोऽसि[55]
ध्यानोऽसि ध्येयोऽसि ज्ञेयोऽसि ज्ञानोऽसि यशासि
दानोऽसि भूमाऽसि ईक्ष्योऽसि ब्रह्माऽसि होताऽसि
उद्गाताऽसि गतिमतां गतिरसि ज्ञानिनां ज्ञानमसि
योगिनां योगोऽसि मोक्षगामिनां मोक्षोऽसि
श्रीमतां श्रीरसि गृह्योऽसि पाताऽसि परममि [60]
सोमोऽसि सूर्योऽसि दीक्षाऽसि दक्षिणाऽसि नरोऽसि
त्रिनयनोऽसि महानयनोऽसि आदित्यप्रभवोऽसि
सुरोत्तमोऽसि शुचिरसि शुक्रोऽसि नभोसि
नभस्योऽसि इपोऽसि ऊोऽसि सहोऽसि
सहस्योऽसि तपोऽसि तपस्योऽसि मधुरसि (65)
माधयोऽसि कालोऽसि संक्रमोऽसि विक्रमोऽसि
पराक्रमोऽसि अश्वग्रीवोऽसि महामेधोऽसि
शंकरोऽसि हरीश्वरोऽसि शंभुरसि ब्रह्मेशोऽसि
सूर्योऽसि मित्रावरुणोऽसि प्राग्वंशकायोऽसि
भृतादिरसि महाभूतोऽसि ऊर्ध्वकर्माऽसि कर्ताऽसि [20]
सर्वपापविमोचनोऽसि त्रिविक्रमोऽसि ॐ नमस्ते
पुलस्त्य उवाच ।
इत्यं स्तुतः पद्मभवेन विष्णु-
स्तपस्विभिथाद्भुतकार्मकारी।
पृथ्वी, श्रवण से दिशाएँ एय तेज से नक्षत्र उत्पन्न हुए है। समस्त मूर्त एव अमूर्त पदार्थ आपसे समुद्भूत हुए हैं। [41]
अत आप विश्वात्मक है आपको नमस्कार है। आप पुष्पहास, गहाहास, परम, ॐकार, वषट्कार, स्वाहाकार, बौपटवार, स्वधाकार, वेदमय, तीर्थमय, यजमानमय, यज्ञमय, सर्वधाता, यज्ञभोक्ता, शुन्धाता, भूर्द, भुपर्द, स्वर्द, स्वर्णद गोद एव अमृतद हैं। , आप ब्रह्मादि, ब्रह्ममय, यज्ञ, वेदकाम, वेद्य, यज्ञधार, महामीन, महासेन, महाशिरा, नृकेसरी, होता, होम्य, हव्य, हूयमान, यमेध, पोता, पाययिता, पूत, पूज्य, दाता, हन्यमान, हियमाण एव इर्ता हैं। * आप नीति, नेता, अग्य, विश्वधाम, शुभाण्ड, ध्रुव, आरणेय, पान, ध्येय, ज्ञेय, ज्ञान, यष्टा, दान, भूमा, ईक्ष्य, ब्रह्मा, होता, उद्गाता, गविमानों की गति, शानियों के ज्ञान, योगियों के योग, मोक्षार्थियों के मोक्ष, श्रीमानों की श्री, गृह्य, पाता एव परम हैं। [60]
आप, सोम, सूर्य, दीक्षा, दक्षिणा, नर, त्रिनयन, महानयन, आदित्यप्रभव, सुरोत्तम, शुचि, शुक्र, नभ, नभत्य, इप, ऊर्ज, सह, सहस्य, तप, तपस्य, मधु, माधव, काल, सक्रम, विक्रम, पराक्म, अश्वग्रीन, महामेध, शङ्कर, हरीश्वर, शम्भ, ब्रह्मेश, सूर्य, मित्रावरुण, प्राग्वंशकाय, भूतादि, महाभूत, ऊर्मफर्मा, कर्ता, सर्वपापविमोचन एवं त्रिविक्रम है। * आपको नमस्कार है। [10]
पुलस्त्य ने कहा-ब्रह्मा एव तपस्वियों के इस प्रकार स्तुति करने पर अद्भुत कर्मचारी विष्णु ने प्रपितामह देव से कहा-हे अमलसत्त्ववृत्ति । आप वर माँगिये। (१२)
पितामह ने प्रीतिपूर्वक उनसे कहा-हे विभो! हे मुरारि! आप मुझे यह पर प्रदान करें कि आप इस
प्रोवाच देवं प्रपितामहं तु
वरं वृणीष्वामलसत्यवृत्ते ।। १२
तमत्रवीत् प्रीतियुतः पितामहो
वरं ममेहाय विभो प्रयच्छ ।
रूपेण पुण्येन विभो बनेन
मस्थीयतां मझवने मुरारे ।। १३
इत्थं वृते देववरेण प्रादात्
प्रभुस्वयास्त्विति तमव्ययात्मा ।
वस्यौ हि रूपेण हि वामनेन
संपूज्यमानः सदने स्वयंभोः ।। १४
नृत्यन्ति तत्राप्सरसा समूहा
गायन्ति गीतानि सुरेन्द्रगायनाः ।
विद्याधरास्तूर्यवरांच वादयन्
स्तुवन्ति देवासुरसिद्धसहाः ।। १५
ततः समाराध्य विभुं सुराधिपः
पितामहो धौतमलः स शुद्धः ।
सर्गे पिरिश्चिः सदनात् सुपुष्पा-
ध्यानीय पूजा प्रकार विष्णोः ।। १६
स्वर्गे सहस्रं स तु योजनानां
विष्णोः प्रमाणेन हि वामनोऽभूत् ।
तत्रास्य शक्रः प्रचकार पूजा
स्वयंभुवस्तुल्यगुणां महर्षे ॥ १७
एतत् पोकं भगवास्त्रिविक्रम-
श्चकार यद् देवहितं महात्मा।
रसातलस्थो दितिजश्वकार
यत्तच्छृणुष्वाद्य पदामि विप्र ।। १८
इति श्रीवामनपुराणे पष्टितमोऽध्याय ।।६॥
पवित्र रूप से मेरे भवन में स्थित रहें। (१३)
देवश्रेष्ठ के ऐसा वर माँगने पर अव्ययात्मा प्रभु ने सनसे कहा-ऐसा ही होगा। तदनन्तर वे स्वयम्भू के भवन मे वामनरूप से पूजित होते हुए रहने लगे। (१४)
वहाँ अप्सराओं का समूह नृत्य करने लगा, सुरेन्द्र के गायक गान करने लगे, विद्याधर श्रेष्ट तूर्य यजाने लगे एवं देव, असुर तथा सिद्धों के संघ स्तुति करने लगे।
विभु को समाराधना के उपरान्त पितामह ब्रह्मा निष्पाप एव शुद्ध हो गए। स्वर्ग मे ब्रह्मा ने घर में से सुन्दर पुष्पों को लार उनसे विष्णु का पूजन (१६)
विष्णु पर्ग मे वामन रूप से सहस्र योजन विस्तृत हो गये। हे महर्षे। वहाँ इन्द्र ने ब्रह्मा के समान गुणयुक्त पदार्थों से उनकी पूजा की। (१७)
हे विष। महात्मा भगवान् त्रिविक्रम ने बलि को रसातल में भेजकर देयताओं का जो हितसाधन किया था, वह मैंने आप से कहा। दैत्य ने रसातल मे रहते हुए जो कार्य किया उसमा वर्णन मैं आज कर रहा हूँ। उसे सुनो। (१८)
श्रीदामनपुराण में छाछठवाँ अध्याय समाप्त ।। ६६ ॥
पुलस्त्य उवाच
गत्या रसातलं दैत्यो महार्हमणिचित्रितम् ।
शुद्धस्फटिकसोपानं कारयामास वै पुरम् ॥ १
तत्र मध्ये सुविस्तीर्णः प्रासादो पवेदिकः ।
मुक्ताजालान्तरद्वारा निर्मितो विधकर्मणा ॥२
तत्रास्ते विविधान् भोगान् भुञ्जन् दिव्यान् समानुपान् ।
नाम्ना विन्ध्यावलीत्येवं भार्याऽस्य दयिताऽभवत् ॥३
युवतीनां सहस्रस्य प्रधाना शीलमण्डिता।
तया सह महातेजा रेमे पैरोचनिने ॥ ४
भोगासक्तस्य दैत्यस्य वसतः सुतले तदा ।
दैत्यतेजोहरः प्राप्तः पाताले वै सुदर्शनः ॥५
चक्रे प्रविष्टे पातालं दानवानां पुरे महान् ।
यभौ हलहलाशन्दः क्षुभितार्णवसंनिभः ॥ ६
तं च श्रुत्वा महाशब्दं बलिः सङ्गं समाददे ।
आः किमेतदितीत्यश्च पप्रच्छासुरपुंगवः ॥ ७
ततो विन्ध्यायली प्राह सान्त्वयन्ती निजं पतिम् ।
कोशे सङ्ग समावेश्य धर्मपत्नी शुचित्रता ।। ८
एतद् भगवतश्चनं दैत्यचकक्षयंकरम् ।
संपूजनीयं दैत्येन्द्र वामनस्य महात्मनः ।
इत्येवमुफ्त्या चार्यश्री सार्पपात्रा विनिर्ययौ ॥९
अथाभ्यागात् सहस्रारं विष्णोश्च सुदर्शनम् ।
ततोऽसुरपतिः प्रहः कृताञ्जलिपुटो मुने।
संपूज्य विधिवच्चक्रमिदं स्तोत्रमुदीरयत् ॥ १०
बलिहवाच ।
नमस्यामि हरेश्वळ देत्यचक्रविदारणम् ।
सहस्रांशु सहस्राम सहस्रार सुनिर्मलम् ॥ १६
नमस्यामि हरेश्चक्र यस्य नाभ्यां पितामहः ।
तुण्डे त्रिशूलधृक् शर्व आरामूले महाद्रयः ॥ १२
पुलस्त्य ने कहा-रसातल मे जाकर दैत्य ने बहुमूल्य मणियों से चित्रित शुद्ध स्फटिक के सोपान से भूपित नगर पनवाया। (१)
विश्वकर्मा ने उसके मध्य में सुविस्तीर्ण वनमय चेदियों वाला एवमुक्ताजालयुक्त द्वार वाला प्रासाद बनाया। (२)
बलि अनेक प्रकार के दिव्य तथा मनुष्यों के योग्य भोगों का उपभोग करते हुए वहाँ रहने लगा। विन्ध्याचली नाम की उसकी प्रिय पत्नी थी ।
हे मुनि। वह सहस्रों युवतियों में प्रधान एक शीलसम्पन्न स्त्री थी। महातेजस्वी विरोचन पुन पलि उसके साथ रमण करने लगा। (४)
भोगासक्त दैत्य के सुतल में रहते समय एक दिन दैत्यतेजोहर सुदर्शन चक्र पाताल मे प्रविष्ट हुआ।
चक के पाताल में प्रविष्ट होने पर दानवों के पुर मे क्षुब्धसागर के तुल्य महान् हलहलाशब्द उत्पन्न (६)
उस महान शब्द को सुनकर असुरश्रेष्ठ बलि ने हाथ मे एक तलवार लिया और इस प्रकार पूछा-अरे। यह क्या है? (७)
तदनन्तर शुचिव्रता धर्मपत्नी विन्ध्यावली ने अपने पति को सान्त्वना देकर तथा खड्ग को कोश मे समाविष्ट पर यह कहा-
यह भगवान् महात्मा वामन का दैत्यसमूह का विनाश करने वाला पूजनीय चक है। ऐसा कहकर वह सुन्दरी अर्घपान सहित बाहर गयी।
उसी बीच विष्णु का सहख अरों वाला सुदर्शन चक्र आ पहुँचा। हे मुनि । असुरपति ने नम्नतापूर्वक हाथ जोडकर विधिवत् चक्र का पूजन किया एवं (१०)
बलि ने कहा-दैत्य-समूह को विदीर्ण करने वाले सहस्राशुयुक्त, सहस्र आभा वाले, सहस अरों से युक्त निर्मल विष्णु के सुदर्शन चक्र को मैं नमस्कार करता हूँ।
विष्णु के उस चक्र को मैं नमस्कार करता हूँ, जिसकी
पारेषु गरिमादेशः मन्त्राः गा: मपाराः ।
प्रय पप पितो पापुरापोषिः पिनी नमः ॥ १३
आरपान बीता: मौदामिन्युपगारपाः।
पापा पुनको यस्य पानगिन्यादयानपा ।। १४
समापुमपरं पन्दे यामुगार मरिताः।
पन्ने पारीरोरप पानं मान मर ग॥१५
उन्म दान दांनो पितोपत्र गुरन ।
पन्म नो पाप पर मार मा ||१६
यन्मेरमा गरमा नमताभ।
मापपो मम नम्पन्नु पापको पान्तु पम् ।।
रसभामफानाग दुरियं पातु गंधपम् ।। १७
इरहस्य मनिपान गमम्पयाध नियः ।
समरन पुजा गपापनाशनम् ॥ १८
पनि परिना गळ हवा निम्नतमोगुगन् ।
नियामाघ पावाना तिरा राने ॥ १९
मुने निर्गत परिममा गत।
परमामाप प्राप्य गामारपपिठामाम् ॥ २०
म पापि गंगवः मामः गुतलं दानपेपर।
टिपा बन्यो महातेजाः गाईपायो पटिग्वदा ।। २१
समर्प पिधिना प्रागन पितुः पिचरमीघरम् ।
गाडारिपुटी भरपाई परनमा पीत् ।। २२
संग्गवोऽपि मया सात मुपिपगेन पेयमा।
रान्मे हित पध्वं प यो पद माउ मे ॥ २३
शिपायात गंगार यगवा रोग दिन
न पेन पे नाच पन्ध: गणपनाया ॥ २४
गंगागरमप्राना नरागामापरेतमाम् !
गरणे यो भन् पोवनन्मे प्यार पाउमईगि ॥ २५
पुल्यश्य उपाय।
पतानमार पपीनार दागचरः।
रिचिन्य मायननं मंगारे यदिवं परम् ।। २६
मसार उपासा
गा दानागदत यो जाता मतिम्रिएपम् ।
मामि पिगमा गोरी पर महादेश, भर गून में गार पर, रों में प, पूर्व, प्रत, भादि देवता, में पायु, और भा भरों के किनारों में श, गभर नाराओं ऐ समूह या पायभाग में पापार भारी मुनि सिमा है। (१२)
में भर्षिक यादेच आयुम पागमागर को परतारादपि दामन मेनारिस पाधिक मानामा पापों का भार पर। ६
अग्युराध। मेरा मानुर पापा पेग से आप हरण करें। आपरमवार मेरो ममा वाभि स्याधियों का नाश हो जाय । पम । आपने नामापीन परने में पापों का नाम दो जाय । (१५-१७)
ऐगा पदर गतिमान् (प) ने मणिपूर्वर पर पी पूजा कर गपापनाशक पुरीग: पा (१८)
है मुति। पछि से पूजित गर. अमुरो पो निरज पर पातालमेनियर र दक्षिण की शोरगरा। (१९)
मुदर्शन में मिल जाने पर थलि परयन्त विकल हो गए। घोर आपति आने पर होने अपने पितामह को
तरिया। (२०)
पर ही दोपर (प्रदूराद ) मुगल में आ गो। ( पा)गदी महासाची निसान दा भागिदाहुए। (२१)
ना। गत पम विरामद की विधिवत पूजा परी परान पनि हाय मोड पर यद परन पदा- (२२)
गा। आयप वि पिरा से मैंने आप पारण विगाह। बा देगा। गुऐ दिशा, पथ्य एवं सेयर सा उपदेश (२३)
ऐना। मनुष्य का संसार में दो हुए पया पाना पादिएपित मेरो पन्धन न हो। (२४)
आप मुझसे मार समुद्र में मान अल्पमति मनुष्यों पो परने पोशिपोस्यस्पक्या है इसे पाये। (२५)
पुराय ने यहा अपने पौत्रणे यस यपन यो मने फे पाना दानगर (प्रहलार) ने विचार पर ससार में दिवार धेष्ठ पगा पहा । (२६)
माय ने पहा-हे दाम तुम धन्य हो कि , गुम्दे पेसी गति पर हुई। हे पलि ! अब मैं तुम्हारे एवं
प्रवक्ष्यामि हितं तेऽद्य तथाऽन्येषां हितं बले ॥ २७
भवजलधिगतानां द्वन्द्ववाताहतानां
सुतदुहिकलत्रत्राणभारार्दिवानाम् ।
विषमविषयतोये मज्जतामलवानां
भवति शरणमेको विष्णुपोतो नराणाम् ॥ २८
ये संश्रिता हरिमनन्तमनादिमध्यं
नारायणं सुरगुरुं शुभदं वरेण्यम् ।
शुद्धं खगेन्द्रगमनं कमलालयेशं
ते धर्मराजकरणं न विशन्ति धीराः ॥२९
स्वपुरुपमभिवीक्ष्य पाशहस्त
वदति यमः किल तस्य कर्णमूले ।
परिहर मधुसूदनप्रपन्नान्
प्रभुरहमन्यनृणां न वैष्णयानाम् ॥ ३०
तथाऽन्यदुक्तं नरसत्तमेन
इक्ष्वाकुणा भक्तियुतेन नूनम् ।
ये विष्णुभक्ताः पुरुषाः पृथिव्यां
यमस्य ते निर्विपया भवन्ति ॥ ३१
सा जिह्वा या हरिं स्तौति वचित्तं यत्तदर्पितम् ।
तावेव केवलं श्लान्यौ यो तत्पूजाकरौ करौ॥ ३२
नूनं न तो करी प्रोक्तौ वृक्षशाखाग्रपल्लयौ।
न यौ पूजयितुं शक्ती हरिपादाम्बुजद्वयम् ॥ ३३
नूनं तत्कण्ठशालूकमयमा प्रतिजिह्वका ।
रोगोयाऽन्यो न सा जिह्वा या न पक्ति हरेर्गुणान् ॥३४
शोचनीयः स बन्धूना जीवन्नपि मृतो नर. ।
यः पादपङ्कज विष्णोर्न पूजयति भक्तितः ॥ ३५
ये नरा वासुदेवस्य सततं पूजने रताः ।
मृता अपि न शोच्यास्ते सत्य सत्यं मयोदितम् ।। ३६
शारीर मानस वाग्ज मूर्तामृत चराचरम् ।
दृश्य स्पृश्यमदृश्यश्च तत्सर्च केशवात्मकम् ॥ ३७
येनाचितो हि भगवान् चतुर्धा वै त्रिविक्रमः ।
तेनार्चिता न संदेहो लोका. सामरदानवाः ।। ३८
यथा रत्नानि जलधेरसख्येयानि पुत्रक ।
दूसरों के लिए हितकर वचन कहता हूँ । (२७)
ससार रूपी समुद्र मे निमग्न, द्वन्द्वरूपी बायु से आहत, पुन, कन्या, पत्नी आवि की रक्षा के भार से दुखी, भयकर विषयरूपी जल मे मग्न हो रहे नौसरहित मनुष्यों के लिये विष्णु रूप नौका ही एकमात्र शरण होती है। (२८)
आदि, मध्य एव अन्त रहित, शुभदाता, वरेण्य, गरुड वाइन, लक्ष्मीपति, शुद्ध, सुरगुरु, नारायण हरि का आश्रय ग्रहण करने वाले धीर मनुष्य यमराज के शासन में नहीं पड़ते। (२६)
यमराज पाश हाय मे लिये खडे अपने दूत को देखकर उसके कान में कहते हैं कि मधुसूदन की शरण में गये हुये मनुष्यों को छोड़ देना। क्योंकि मैं अन्य मनुष्यों का ही प्रभु हूँ, वैष्णवों का नहीं। (३०)
इसके अतिरिक्त भक्तियुक्त नरपुगर इक्ष्वाकु ने कहा था कि पृथ्वी में विष्णुभक्त व्यक्ति यम की गति से बाहर है। (-१)
वही जिता है जो हरि की स्तुति करती है, यही चित्र
है जो उनमें रत है, वही करयुगल प्रशसनीय हैं जो उनकी पूजा करते हैं। (३२)
जो परयुगल श्रीहरि के चरणारविन्द युगल की पूजा नहीं करते, वे हाथ नहीं है, अपितु वृक्षशाखा के अप्रपल्लव हैं। (३२)
जो जिह्वा हरि के गुणों का वर्णन नहीं करती, वह जिता नहीं अपितु कण्ठशालूरु (मेढक का कठ), प्रतिजिह्वा अथवा अन्य कोई रोग है। (३४)
भक्तिपूर्वक विष्णु के चरणकमल का पूजन न करने घाला मनुष्य जीवित ही मृत तुल्य है एव बन्धुजनों के लिये शोचनीय है। (३५)
यह सत्य कहता हूँ कि वासुदेव के पूजन मे निरन्तर रत मनुष्य मरने पर भी शोचनीय नहीं होते। (३६)
समस्त शारीरिक, मानसिक, वाचिक, मूर्त, अमूर्त, चर, अचर,दृश्य, स्पृश्य एव अदृश्य पदार्थ विष्णु स्वरूप हैं। (३७)
त्रिविक्रम भगवान् की चार प्रकार से अर्चना करने वाले मनुष्यों ने निस्सन्देह सुरासुर सहित समस्त लोगों का अर्चन कर लिया है। (३८)
हे पुन्न जिस प्रकार समुद्र के रत्न असख्य
तथा गुणा हि देवस्य त्वमरयातास्तु चक्रिणः ॥ ३९
ये शङ्खचक्रामकरं सशाङ्गिण
सगेन्द्रकेतुं वरदं श्रियः पतिम् ।
समाश्रयन्ते भवभीविनाशनं
संसारगर्ने न पतन्ति ते पुनः॥ ४०
येपा मनसि गोविन्दो निवासी सततं चले।
ते परिभव यान्ति न मृत्योरुद्विजन्ति च ।। ४१
देवं शार्ङ्गधरं विष्णुं ये प्रपन्नाः परायणम् ।
न तेषां यमसालोक्यं न च ते नरकौकसः ॥ ४२
न तां गतिं प्राप्नुवन्ति श्रुविशास्त्रविशारदाः।
पिमा दानवशाल विष्णुभक्ता नजन्ति याम् ॥ ४३
या गतिर्दैत्यशार्दूल हतानां तु महाहवे ।
ततोऽधिकां गति यान्ति विष्णुभत्ता नरोत्तमाः ॥ ४४
या गविर्धर्मशीलानां सात्त्विकानां महात्मनाम् ।
सा गतिर्गदिता दैत्य भगवत्सेनिनामपि ॥ ४५
सायासं चामुदेवं सूक्ष्ममव्यक्तविग्रहम् ।
प्रविशन्ति महात्मानं वदता नान्यचेतसः ॥ ४६
अनन्यमनसो भक्त्या ये नमस्यन्ति केशवम् ।
शुचयस्ते महात्मानस्तीर्थभूता भवन्ति ते ॥ ४७
गच्छन् विष्ठन् स्वपन् जाग्रत् पिनन्नश्ननमीक्ष्णशः ।
घ्यायन् नारायणं यस्तु न ततोऽन्योऽस्ति पुण्यभाक् ।
वैकुण्ठ सड्गपरशुं भवरन्धसमुच्छिदम् ॥ ४८
प्रणिपत्य यथान्यायं संसारे न पुनर्भवेत् ।
क्षेत्रेषु वसते नित्यं फ्रीडन्नास्तेऽमितद्युतिः ॥ ४९
आसीनः सर्वदेहेपु कर्मभिर्न म यध्यते ।
येपा विष्णुः प्रियो नित्यते विष्णोः सततं प्रियाः ॥ ५०
न ते पुनः सम्भवन्ति तद्भक्ताम्तत्परायणाः ।
ध्यायेद् दामोदरं यस्तु भक्तिनम्रोऽर्चयेत वा ।। ५१
न स संमारपद्धेऽस्मिन् मजते दानवेश्वर ।
कल्यमुत्थाय ये भक्त्या स्मरन्ति मधुसूदनम् ।
स्तु पन्त्यप्यभिभृण्यन्ति दुगाण्यविवरन्ति ते ।। ५२
है, उसी प्रकार चक्रधारी विष्णु के गुण भी असख्य हैं। (२९)
हाथों में शर, चक्र, स्मल एवं शाह धनुप धारण करने याठे, गरुडध्वज भयभीतिनाशक, परदाता श्रीपी का आश्रय प्रहण करने वाले मनुष्य पुन ससार गर्न में नहीं गिरते।
हे पलि | गोविन्द जिनके मन में सतत निवास करते । उना पराभव नहीं होता एव वे मृत्यु से उद्विग्न नहीं (५१)
श्रेष्ठ शरणस्थान, शाहधर देव विष्णु की शरण में पहुँचे मनुष्यों को यालोक या नरक में नहीं जाना पड़ता। (८२)
हे दानवश्रेष्ठ। ध्रुतिशास्त्रविशारद विप्रो को यह गनि नहीं प्राप्त होती जो गति विष्णुभक्त प्राप्त करते है। (४३)
हे दैत्यश्रेष्ट । महान् युद्ध में निहत व्यक्ति जो गति प्राप्त करते है, विष्णुभक्त नरश्रेष्ठ को उससे भी उत्तम गति प्राप्त होती है। (४४)
हे दैत्य । धर्मशील, सात्त्विक, महात्माओं को जो गति माप्त होती है, मगरद्भक्तों की भी यही गति रही गई है। (४१)
अनन्यभाय से भगरान की भक्ति करने वाले ससं. यास, भूक्ष्म, अव्यक्त पारीर याने महारमा वासुदेव में प्रवेश करते है। (४६)
अनन्यमन से भक्तिपूर्वक पेशन को नमस्कार करने यारे मनुष्य पवित्र एव तीर्थस्वरूप होत हैं। चल्ते, सड़े, सोते, जागते, एय साते पीते हुए निरन्तर नारायण का ध्यान करने यार से अधिक पुण्य का भाजन कोई नहीं होता। यथाविधि भवरन्धन का समुच्छेद करने याने सड्गपरशु वैरण्ठ देव को प्रणाम करने से ससार मे पुनर्जन्म नहीं होता। क्षेत्र में निवास परत नित्य प्रीडा करन याला अमितद्युति पृणभक्त समस्त शरीरों में रहने पर भी उनको कमों पन्धन में नहीं पड़ता। विष्णु जिन्हें नित्य प्रिय है ये सर्वदा विष्णु के प्रिय होत हैं। (४८-५०)
दामोदर का ध्यान करने या उनो मा, उनसे शरणागत अथवा भत्तिपूर्वक उतरा अर्चन करने यार मनुष्य पुन जन्म प्रहण नहीं करते। (३१)
है दानवेयर । प्रातल ठर महिपूर्वक मधुसूदन का स्मरण परने यान इस मसारप में निमग्न नहीं होने। उनकी स्तुति परनेयारे प्य गुण्या करने पारे मनुष्य दुर्गों को पार कर जाने हैं। (५२)
हरिवाक्यामृत पीत्वा विमलैः श्रोत्रभाजनैः ।
प्रहृष्यति मनो येषां दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥५३
येषां चक्रगदापाणी भक्तिरन्यभिचारिणी ।
ते यान्ति नियतं स्थानं यत्र योगेश्वरो हरिः॥५४
विष्णुकर्मप्रसक्तानां भक्तानां या परा गतिः ।
सा तु जन्मसहस्रेण न तपोभिरवाप्यते ॥ ५५
कि जप्यैस्तस्य मन्त्रैर्वा किं तपोभिः किमाश्रमः ।
यस्य नास्ति परा भक्तिः सततं मधुसूदने । ५६
पृथा यज्ञा वृथा वेदा पृथा दानं वृथा श्रुतम् ।
वृथा तपश्च कीर्तिश्च यो द्वेष्टि मधुसूदनम् ॥५७
किं वस्य बहुभिर्मन्त्रैर्भक्तिर्यस्य जनार्दने ।
नमो नारायणायेति मन्त्रः सर्वार्थसाधकः॥ ५८
विष्णुरेव गतिर्यपां कुतस्तेषां पराजयः ।
येपामिन्दीवरश्यामो हृदयस्थो जनार्दनः ॥ ५९
सर्वमङ्गलमाङ्गल्यं वरेण्यं वरदं प्रभुम् ।
नारायणं नमस्कृत्य सर्वकर्माणि कारयेत् ।। ६०
विष्टयो व्यतिपाताच येऽन्ये दुनीतिसम्भवाः ।
ते नाम स्मरणाद्विष्णोर्नाशं यान्ति महासुर ।। ६१
तीर्थकोटिसहस्राणि तीर्थकोटिशतानि च ।
नारायणप्रणामस्य कलां नार्हन्ति पोडशीम् ॥ ६२
पृथिव्यां यानि तीर्थानि पुण्यान्यायतनानि च ।
तानि सर्वाग्यवाप्नोति विष्णोर्नामानुकीर्तनात् ।। ६३
प्राप्नुवन्ति न ताल्लोकान् नतिनो वा तपस्विनः ।
प्राप्यन्ते ये तु कृष्णस्य नमस्कारपरैर्नरः ॥ ६४
योऽप्यन्यदेवताभक्तो मिथ्यार्चयति केशवम् ।
सोऽपि गच्छवि साधूनां स्थानं पुण्यकृतां महत् ।। ६५
सातत्येन हपीफेशं पूजयित्वा तु यत्फलम् ।
सुचीर्णतपसां नृणां तद् फलं न कदाचन ॥ ६६
त्रिसन्ध्यं पद्मनाभं तु ये स्मरन्ति सुमेधसः ।
से लभन्त्युपवासस्य फलं नास्त्यत्र संशयः ॥ ६७
सततं शास्त्रदृष्टेन कर्मणा हरिमर्चय ।
विमल रणस्पी पात्रों से परिवाक्यामृत का पान कर जिनका मन अत्यन्त प्रसन्न होता है ये फठिनाइयों यो पार कर जाते हैं। (५३)
चमगदापाणि विष्णु में स्थिर भक्ति रसने याले मनुष्य निश्चय ही योगेश्वर हरि के स्थान मे जाते है। (५४)
विष्णु की सेया मे आसक्त भक्ती यो जो श्रेष्ठ गति प्राप्त होती है यह सहर समों पे भी तप से नहीं प्राप्त हो सस्ती। (५५)
मामूदन में सता पाभक्ति से रहित मनुष्यों पे जप, गन्न, तप एवं आधमों से पराभ? मधुसूदन से द्वेप करने घा मनुष्यों ये यज्ञ, वेद, दान, कान, तप ण्य योनि व्यर्थ है। (५७)
जनार्दन मे मतिरसने वालों को घटुत से मत्रों से क्या राम?"नमो नारायणाय"गन्त्रसभी अयों पा सापाह।(५८)
जिनकी गति विष्णु है ग्यं जिनके दप में इन्दीयर श्याम जनार्दन अपस्थिा है इनरी पराजय यहाँ सम्भय है? (१६)
सभी मद्दों पे माटरषरूप, परणीय, परदाता प्रभु नारायण को नमार पर समस्त फर्म करना चाहिए । (६०)
हे महासुर । विष्टियाँ, व्यतिपात एव दुर्नीति से उत्पन्न अन्य समस्त आपत्तियाँ विष्णु के नाम का स्मरण करने से विनष्ट हो जाती है। (६१)
शत कोटि च सहस्र कोटि तीर्थ भी नारायण को प्रणाम करने की सोरहवीं क्ला के भी तुल्य नहीं हैं। (६२)
पृथ्वी में जितने सीध और पविन देवालय है, ये सभी विष्णु के नाम के सकीर्तन से प्राप्त होते हैं। (६३)
श्रीकृष्ण को नमामार करने याने मनुष्य जिन रोकों चोप्राप्त परते है उन्हें प्रती या तपरची लाग नहीं प्राप्न (६४)
अन्य देवता या भक्त होते हुए पेशर या मिथ्या अर्चन यरने वाला मनुष्य भी पुण्यममा साधुओं के महान स्थान को प्राण परला है।
इपीरेश पे सतत पूतन से जो पल ात होना है पोर तप यरने पारे मनुष्यो यो यह पल भी नहीं प्रात होता।
तनों सभ्याराल में पद्मनाभ पा स्मरण करने या घुद्धिमान पुरुषों को निरादेव उपपास या प्राप्त होता है।
हे बलि ! कारों में प्रतिपादित पमं द्वारा मान दरिया
तत्प्रसादाद परां सिद्धिं यले प्राप्स्यसि शाश्वतीम् ॥६८
तन्मना भव तद्भक्तस्तद्याजी तं नमस्कुरु ।
तमेवाश्रित्य देवेशं सुखं प्राप्स्यसि पुत्रक ॥ ६९
आयं धनन्तमजरं हरिमव्ययं च
ये वै स्मरन्त्यहरहन्धरा भुविस्थाः ।
सर्वत्रगं शुभदं ब्रह्ममयं पुराणम्
ते यान्ति वैष्णवपदं ध्रुवमक्षयश्च ।। ७०
ये मानवा विगतरागपरापरज्ञा
नारायणं सुरगुरुं सततं स्मरन्ति ।
ते धौतपाण्डुरपुटा इव राजहंसाः
संसारसागरजलस्य तरन्ति पारम् ॥७१
घ्यायन्ति ये सततमच्युतमीशिसारं
निष्फल्मयं प्रवरपद्मदलायताक्षम् ।
ध्यानेन तेन हतकिरियपवेदनास्ते
मातुः पयोधररसं न पुनः पिरन्ति ।। ७२
ये कीर्तयन्ति वरदं वरपदनामं
शङ्काब्जचक्रवरचापगदासिहस्तम् ।
पमालयावदनपङ्कजपटपदारव्यं
नूनं प्रयान्ति सदनं मधुघातिनस्ते ।। ७३
मृण्वन्ति ये भक्तिपरा मनुष्याः
संकीर्त्यमान भगवन्तमाद्यम् ।
ते मुक्तपापाः सुसिनो भवन्ति
यथाऽमृतप्राशनवर्पितास्तु ।। ७४
तस्माद् ध्यानं स्मरणं कीर्तन वा
नाम्नां श्रवणं पठतां सजनानाम् ।
कार्य विष्णोः श्रद्दधानमनुष्यैः
पूजातुल्यं तत् प्रशंसन्ति देवाः ॥ ७५
वास्तिथाऽन्तःकरणैरविक्लवै-
यो नार्चयेत् केशवमीशितारम् ।
पुप्पैश्च पर्जलपल्लयादिभि-
नूनं स मुष्टो विधितस्करेण ॥७६
इति श्रीवामनपुराणे सपष्टितमोऽध्यायः ॥६॥
अर्चन परो। उनके प्रसाद से श्रेष्ठ शाश्वती सिद्धि प्राप्त (६८)
हे पुन! तुम तम्मना, सद्भक्त एय उनका भजन करने पाला होकर उन्हें नमस्कार परो। उन देवेश का ही आनय महण पर तुम सुस प्राप्त करोगे। (६९)
आध,अनन्त, अजर, सर्वत्रगामी,शुभदाता,ब्रह्ममय पुराण, अव्यय हरि का अहोरात्र स्मरण करने वाले पृथ्वीपासी वेष्ट मनुष्य भूय एवं अभय पैष्णय पद प्राप्त यरते हैं। (७0)
जो वीतराग एवं परापरक्ष मनुष्य सतत सुरगुरु ! नारायण का स्मरण करते हैं वे धुले हुए श्वेत पसों यार राजसो फे सदश संसार रूपी सागर के जल को पार कर (७१)
जो मनुष्य सतत उत्तम मलदल तुल्य विस्तृत नेत्रों पाने निष्कल्मप, नियामक अच्युत का ध्यान करते हैं वे उस ध्यान से पापवेदना का नाश हो जाने से पुन माना के पयोधर का रस नहीं पान करते । (७२)
हाथों में शर, कमल, चक, प्रेष्ठ धनुप, गदा घि असि धारण काने वाले. लक्ष्मी के बदनपङ्कज के भ्रमर, परदाता पद्मनाभ का कीर्तन करने वाले मनुष्य निश्चय ही मधुसूदन का लोक मात करते हैं। (७)
अमृतप्राशन से तृप्त होने यारे प्राणी के सदृश भक्ति- परायण मनुष्य आद्य भगवान का कीर्तन सुनार पापमुक्त एय मुसी होते हैं। (७१)
अत श्रद्धालु मनुष्य को विजणु का ध्यान, स्मरण, कीर्तन अयया पाठ करने वाले मनुष्यों से विष्णु के नामों का प्रयण परना चाहिये। देवगण पूजा के तुल्य उसरी प्रशसा करते हैं।
स्वस्थ, याह्य तथा आन्तरिक इन्द्रियों से जो मनुष्य पुष्प, पत्र, जल एवं पहादि द्वारा नियामक पेशा या अर्चन नहीं करता निश्चय ही विधिरूपी तर ने उसे लूट लिया है।
श्री वामनपुराण में सदसठवाँअध्याय समाप्त ॥७॥