सुकेशिवृत्तान्त के अन्तर्गत ब्रह्मचारिधर्मं एव सदाचार का वर्णन

ऋपय ऊचुः॥

अहिंसा सत्यमस्तेयं दानं शान्तिर्दमः शमः ।

अकार्पण्यं च शौच च तपश्च रजनीचर ॥

दशाङ्गो राक्षसश्रेष्ठ धर्मोऽसौ सार्यवर्णिकः ।

ब्राह्मणस्यापि विहिता चातुराश्रम्य कल्पना ॥२

सुकेशिरुवाच ।

विप्राणां चातुराश्रम्य विस्तरान्मे तपोधनाः ।

आचक्षध्वं न मे तृप्तिः शृण्वतः प्रतिपद्यते ॥

ऋपय ऊचुः।

कृतोपनयनः सम्यग् ब्रह्मचारी गुरौ वसेत् ।

तत्र धर्मोऽस्य यस्तं च कथ्यमानं निशामय ॥४

स्वाध्यायोऽथानिशुश्रूषा स्नान भिक्षाटनं तथा ।

गुरोनिवेद्य तच्चाद्यमनुज्ञातेन सर्वदा ॥ ५

गुरोः कर्मणि सोद्योगः सम्यक्प्रीत्युपपादनम् ।

तेनाहूत. पठेचैव तत्परो नान्यमानसः ॥ ६

एकं द्वो सकलान् चापि वेदान् प्राप्य गुरोर्मुखात् ।

अनुज्ञातो घर दत्त्वा गुरवे दक्षिणा तत. ॥७

गार्हस्थ्याश्रमकामस्तु गार्हस्थ्याश्रममावसेत् ।

वानप्रस्थाश्रम वाऽपि चतुर्थ स्वेच्छयात्मनः॥ ८

तत्रैव वा गुरोर्गेहे द्विजो निष्ठामवाप्नुयात् ।

गुरोरभावे तत्पुत्रे तच्छिष्ये तत्सुत विना ॥९

शुश्रूपन निरभीमानो ब्रह्मचर्याश्रम वसेत् ।

एवं जयति मृत्युं स द्विजः शालकटङ्कट ॥ १०

उपावृत्तस्ततस्तस्माद् गृहस्थाश्रमकाम्यया ।

असमानर्पिकुलजा कन्यामुदहेद् निशाचर ॥ ११

स्वकर्मणा धनं लब्या पितृदेवातिथीनपि ।

सम्यक संप्रीणयेद् भक्त्या सदाचाररतो द्विजः ॥ १२

ऋषियों ने कहा-हे राक्षसश्रेष्ठ। अहिसा, सत्य, । अस्तेय ( चोरी न करना) दान, क्षमा, दम ( इन्द्रिय निप्रह), शम, अकार्पण्य, शौच एव तप-इन दस अङ्गों वाल धर्म सभी वर्गों के लिये विहित है। ब्राह्मणों के लिये चार आश्रमों का विधान किया गया है। (१-२)

मुकेशी ने कहा-हे तपोधनो । ब्राह्मणों के हेतु विहित चातुराश्रम्य को आप लोग विस्तार पूर्वक मुझसे कहें। मुझे सुनते हुये तृप्ति नहीं हो रही है। (३)

मृपियों ने कहा-भलीभाति उपनयन संस्कार हो जाने पर ब्रह्मचारी गुरु के गृह पर रहे। वहाँ उसके जो धर्म हैं उन्हें पतला रहा हूँ, तुम सुनो। (४)

स्वाध्याय, अग्निकी सेवा, स्नान, भिक्षाटन, सर्वदा गुरु को निवेदित करके तथा उनसे आज्ञा प्राप्त कर भोजन करना । गुरु के कार्य हेतु उद्यत रहना, सम्यक् रूप से गुरु में प्रीति उत्पन्न करना, उनके द्वारा बुलाये जाने पर सत्पर तथा एकामचित्त होकर पढ़ना। (ये उसके धर्म है) (५-६)

गुरु के मुख से एक, दो या सभी वेदों को प्राप्त कर गुरु को धन तथा दक्षिणा देने के पश्चात् उनसे अनुशा, प्राप्त कर, गृहस्थाश्रम में जाने का इच्छुक ( शिष्य ) गाई- रध्याश्रम में प्रवेश करे । अथवा अपनी इच्छा के अनुसार वानप्रस्थ या सन्यास का अवलम्बन करे । (७-८),

अथवा वहीं गुरु के घर में ब्राह्मण मृत्यु (नैष्ठिक ब्रह्मचर्य ) प्राप्त करे अर्थात् जीवनपर्यन्त रहे। गुरु के अभाव मे उनके पुत्र एव पुत्र न हो तो उनके शिष्य के समीप निवास करे।

हे शालकटकट। अभिमानरहित तथा शुश्रया करते हुये ब्रह्मचर्याश्रम म रहे। इस प्रकार अनुष्ठान करने वाला द्विज मृत्यु को जीत लता है। (१०)

हे निशाचर । वहाँ से उपावृत्त होकर गृहस्थाश्रम की कामना से असमान ऋपि षाले. कुल में उत्पन्न कन्या से विवाह करे। (११)

सदाचार में रत द्विज अपने कर्म द्वारा धनोपार्जन कर

सुकेशिस्वाच ।

सदाचारो निगदितो युष्माभिर्मम सुव्रताः।

लक्षणं थोतुमिच्छामि कथयपं तमद्य मे ॥ १३

मपय ऊचुः॥

सदाचारो निगदितस्तव योऽस्माभिरादरात् ।

लक्षणं वस्य वक्ष्यामस्वच्छृणुष्य निशाचर ।। १४

गृहस्थेन सदा कार्यमाचारपरिपालनम् ।

न द्याचारविहीनम्य भद्रमत्र परत्र च ।। १५

यज्ञदानतपासीह पुरुषस्य न भूतये ।

भवन्ति यः समुल्लड्थ्य सदाचारं प्रवर्तते ॥ १६

दुराचारो हि पुरुषो नेह नामुत्र नन्दते ।

कार्यों यत्नः सदाचारे आचारो हन्त्यलक्षणम् ॥ १७

तस्य स्वरूपं पक्ष्यामः सदाचारस्य राक्षस ।

शृणुप्पैकमनास्तच यदि श्रेयोऽभिवाञ्छसि ॥ १८

धोऽस्य मूलं धनमस्य शाखा

पुष्पं च कामः फलमस्य मोक्षः।

असौ मदाचारवरुः सुकेशिन्

संसेवितो येन स पुण्यभोक्ता ।। १९

घाटे मुहर्ते प्रथमं वियुध्ये-

दनुस्मोद् देवरान् महपीन् ।

प्राभातिक मङ्गलमेव वाच्यं

यदुक्तवान् देवपतिस्त्रिनेत्रः॥२०

सुकेशिरुवाच ।

किं तदुक्तं सुप्रभातं शंकरेण महात्मना ।

प्रभाते यत् पठन्मयों मुच्यते पापरन्धनात् ।। २१

ऋषय ऊचुः ।

श्रूयतां राक्षसश्रेष्ठ सुप्रभातं हरोदितम् ।

श्रुत्या स्मृत्वा पठित्या च सर्वपापैः प्रमुच्यते ।। २२

ब्रह्मा परारित्रिपुरान्तकारी

भानुः शशी भूमिसुतो बुधश्च ।

गुरुश्च शुक्रः सह भानुजेन

कुर्वन्तु सर्वे मम सुप्रभातम् ॥ २३

पितरों, देवों एव अतिथियों को अपनी भक्ति द्वारा सम्यक् तया तृप्त करे। (१२)

सुकेशी ने कहा-हे सुनतो। आप लोगों ने मुझ से सदाचार का वर्णन किया है। मैं उसका लक्षण सुनना चाहता हूँ। मुझसे अब उसका वर्णन करें। (१३)

ऋषियों ने कहा-हे निशाचर। हमने आदर के साथ तुमसे जिस सदाचार का उद्देख किया है, उसका लक्षण कहते हैं, उसे सुनो। (१४)

गृहस्य को आचार का सदा पालन करना चाहिये। आचारहीन व्यक्ति का इसलोक और परलोक मे कल्याण नही होता है। (१५)

सदाचार का उल्लंघन पर व्ययहार करनेवाले पुरुष के यज्ञ, दान एवं तप कल्याणकर नहीं होते। (१६)

दुराचारी पुरुष इस लोक तथा परलोफ में आनन्दित नही होता। अतः आचार पालन में सदा प्रयत्न करना चाहिये । आधार अलक्षण को विनष्ट करता है। (१७)

 हे राक्षस । उस सदाचार का स्यरूप कहते हैं।

यदि कल्याण चाहते हो तो एकाग्र चित्त होकर उसे (१८)

हे सुकेशी । धर्म इसका मूल है, धन इसी शासा काम इसका पुष्प है एव मोक्ष इसका फल है-ऐसे सदाचार रूपी वृक्ष का जिसने सेग्न किया है यह पुण्य को भोगने वाला हावा है। (१६)

ब्राह्ममुहूर्त मे उठकर सर्वप्रथम श्रेष्ठ देवों एव महर्षियों का स्मरण करे तथा देवपति महादेव द्वारा कथित प्रभात-कालीन मगल को पड़े। (२०)

मुकेशी ने कहा-महात्मा शकर ने कौन सा सुप्रभात कहा है। जिसका प्रान गाल पाठ करने से मनुष्य पाप पन्धन से मुक्त हो जाता है। (२१)

ऋपियों ने कहा-हेराक्षसश्रेष्ठ । महादेव द्वारा कथित 'सुप्रभात' सुनो। इसको सुनने, स्मरण करने और पढ़ने से मनुष्य समस पापों स मुक्त हो जाता है। (२२)

ब्रह्मा, विष्णु, शंकर, सूर्य, चन्द्रमा, मंगल, पुष, दृहरपति, शुक, सथा शनि-ये सब मेरा अपमान करें।(२३)

भृगुर्वसिष्ठः ऋतुरङ्गिराश्च

मनुः पुलम्स्पः पुलहः सगौतमः !

रेभ्यो मरीचिश्च्यवनो ऋमुश्च

कुर्वन्तु सर्वे मम सुप्रभातम् ॥ २४

सनत्कुमारः सनकः सनन्दनः

सनातनोऽप्यासुरिपिगलौ च।

सप्त स्वराः सम रसातलाश्च

कुर्वन्तु सर्वे मम सुप्रभातम् ।। २५

पृथ्वी सगन्धा सरसाम्तथाऽऽपः

स्पर्शश्च वायुज्वलनः सतेजाः ।

नभः सशब्दं महता सहय

यच्छन्तु सर्वे मम सुप्रभातम् ॥ २६

समार्णवाः सम कुलाचलाश्च

समर्पयो द्वीपवराश्च सप्त ।

भूरादि कृत्वा भुवनानि सप्त

ददन्तु सर्वे मम सुप्रभातम् ॥ २७

इत्थं प्रभाते परमं पवित्रं

पठेत् स्मरेद्वा शृणुयाच भक्त्या।

दुःस्वप्ननाशोऽनघ सुप्रभातं

भवेच्च सत्यं भगवत्प्रसादात् ॥ २८

ततः समुत्थाय विचिन्तयेत

धर्म तथार्थ च विहाय शय्याम् ।

उत्थाय पश्चारिरित्युदीर्य

गच्छेत् तदोत्सर्गविधिं हि कर्तुम् ॥ २९

न देवगोब्राह्मणवह्निमार्गे

न राजमार्गे न चतुष्पथे च ।

कुर्यादथोत्सर्गमपीह गोष्ठे

पूर्वापरां चैव समाश्रितो गाम् ।। ३०

वस्तु शौचार्थमुपाहरेन्मृदं

गुदे त्रयं पाणितले च सप्त ।

तथोभयोः पञ्च चतुस्तथैको

लिने तथैका मृदमाहरेत ॥ ३१

नान्तर्जलाद्राक्षस मूषिकस्थलात्

शौचावशिष्टा शरणात् तथान्या।

 वल्मीकमृच्चैव हि शौचनाय

ग्राह्या सदाचारविदा नरेण ॥ ३२

उदङ्मुखः प्राड्मुखो वापि विद्वान

प्रक्षाल्य पादौ भुवि संनिविष्टः ।

भृगु, वसिष्ठ, फतु, अगिरा, मनु, पुलस्त्य, पुलह, गौतम, रेभ्य, मरीचि, च्यवन तथा ऋभु ये सभी (ऋषि) मेरा सुप्रभात करें। (२४)

सनत्कुमार, सनक, सनन्दन, सनातन, आसुरि, पिगल, सातों स्वा एवं सातो रसातल-ये सभी मेरा सुप्रभात (२५)

गन्धयुक्त पृथिवी, रसयुक्त जल, स्पर्शयुक्त घायु, तेज-युक अग्नि, शब्द युक्त आकाश एवं महत्तत्त्य के सभी मेरा (२६)

सात समुद्र, सात युलपर्वत, सात ऋषि, सात घेष्ठ द्वीप और भू आदि सात लोक ये सभी मुझे सुप्रभात प्रदान करें। (२७)

इस प्रकार प्रातःकाल परम पवित्र सुप्रभात स्तोत्र को भक्तिपूर्वक पढ़े, स्मरण करे अथया मुने । हे अनप! (ऐसा करनेसे) भगवान की कृपा से निश्चय ही दुस्वप्न  का नाश होता है तथा सुप्रभात होता है। (२८)

तदनन्तर उठकर धर्म तथा अर्थ की चिन्ता करे और शय्यात्याग करने के उपरान हरि' का नाम लेकर उत्सर्ग विधि (शौचादि) करने के लिये जाय । (२६)

देवता, गौ, ब्रामग और अग्नि के मार्ग, राजपथ और चौराहे पर, गोशाला में क्या पूर्व या पश्चिम दिशा की ओर मुख करके मल-त्यागन करें।

तदनन्तर शौचार्थ मिट्टी प्रहण करे एवं मलद्वार में तीन बार, (वाम) पाणितल में सात पार तथा दोनों करतलों में दस पार एवं लिङ्ग मै एक पार मिट्टी लगावे । (३१)

हे राक्षस । सदाचारविद् मनुष्य को जल के भीतर से, चूहे की यिल से, दूसरों के शीच से पची हुई एवं गृह से मिट्टी नहीं लेनी चाहिए। दीमक की यात्री से ही शोधार्थ मिट्टी लेनी चाहिए । (३२)

विद्वान् पुरुप पैर धोने के पश्चात् उत्तर या पूर्वमुख

समाचमेदद्भिरफेनिलाभि-

रादौ परिमृज्य मुखं द्विरद्भिः ॥ ३३

ततः स्पृशेत्सानि शिरः करेण

संध्यामुपासीत तत. क्रमेण ।

केशांस्तु मंशोध्य च दन्त बावनं

कृत्वा तथा दर्पणदशनं च ।। ३४

कृत्वा शिसस्नानमथाङ्गिक वा

संपूज्य तोयेन पितॄन सदेवान् ।

होमं च कृत्वालमनं शुभानां

कृत्वा बहिर्निर्गमनं प्रशस्तम् ॥ ३५

द्वादधिसर्पिरथोदकुम्भ

धेनुं सवत्सां वृषभं सुवर्णम्

मृद्गोमयं स्वस्तिकमक्षतानि

लाजामधु ब्राह्मणकन्यकां च ॥ ३६

श्वेतानि पुष्पाण्यथ शोभनानि

हुताशनं चन्दनमर्कयिम्मम् । ।

अश्वत्थवृक्षं च समालभेत

ततस्तु कुर्यान्निजजातिधर्मम् ॥ ३७

देशानुशिर्ट कुल धर्ममयं

स्वगोत्रधर्म न हि संत्यजेत ।

तेनार्थसिद्धि समुपाचरेत

नासत्प्रलापं न च सत्यहीनम् ॥ ३८

न निष्ठुर नागमशास्त्रहीनं

वाक्यं वदेत्साधुजनेन येन । ।

निन्यो भवेन्नैव च धर्मभेदी

सगं न चासत्सु नरेपु कुर्यात् ।। ३९

संध्यासु वज्यं सुरत दिवा च

सर्वासु योनीपु परावलासु ।

आगारशून्येपु महीतलेपु

रजस्वलास्वेव जलेपु वीर ॥४०

वृथाटनं वृथा दानं वृश च पशुमारणम् ।

न कर्त्तव्यं गृहस्थेन वृथा दारपरिग्रहम् ।। ४१

वृथाटनानित्यहानिर्वृथादानादनक्षयः

वृथा पशुघ्न. प्राप्नोति पातकं नरकप्रदम् ॥ ४२

संतत्या हानिरश्लान्या वर्णसंकरतो भयम् ।

भेतव्यं च भवेल्लोके वृथादारपरिग्रहात् ।। ४३

बैठकर पहले मुख को दो बार जल से धोने के उपरान्त फेन-रहित जल से आचमन करे । (३३)

तदनन्तर अपनी इन्द्रियों तथा शिर को हाथ से स्पश कर क्रमश केश सशोधन, दन्तधायन एव दर्पण-दर्शन करने के उपरान्त सध्योपासन करे। (३४)

शिर स्नान अथवा आङ्गिक स्नान कर पितरों एय देवताओं का जल से पूजन करने के पश्चात् हवन कर और मागलिक वस्तुओं का स्पर्श कर बाहर निकलना प्रशस्त होता है। (३५)

दूर्वा, दधि, घृत,जलपूर्ण फ्लश, सवत्सा गौ, वृषभ, सुवर्ण, मिट्टी, गोवर, स्वस्तिक चिह्न, अक्षत, लाजा, मधु, ब्राह्मण की कन्या, सुन्दर श्वेतपुष्प, अग्नि, चन्दन, सूर्य- बिम्प और अश्वत्थ (पीपल ) वृक्ष का स्पर्श कर अपने जाति के घमों का पालन करे। (३६-३७)

देश-विहित धर्म, श्रेष्ठ कुलधर्म और गोत्रधर्म का त्याग नहीं करना चाहिये । इसी से अर्थ की सिद्धि करनी चाहिए।

असत्प्रलाप, सत्यरहित, निष्ठुर और आगम शास्त्र विहीन ऐसा वाक्य कमी न कहे जिससे साधुजनों द्वारा निन्दित होना पडे। धर्मभेद एव असत्पुरुषों का सङ्ग भी नहीं करना चाहिये। (३८-३९)

हे वीर | सन्ध्या एक दिन के समय रति नहीं करनी चाहिये। सभी योनियों की परखियों मे, गृह हीन पृथ्वी पर, रजस्वला श्री मे तथा जल में सुरतव्यापार वर्जित है। (१०)

गृहस्थ को व्यर्थ भ्रमण, व्यर्थ दान व्यर्थ पशु- वध तथा व्यर्थ दार परिग्रह नहीं करना चाहिये। (४१)

व्यर्थ घूमन से नित्यकर्म को हानि होती है, पृथा दान से धनक्षय होता है तथा वृथा पशुवध करने वाला नरकप्रद पातक को प्राप्त करता है। (४२)

व्यर्थ स्त्री-समह से सन्तान को निन्द्य हानि, वर्ण- सर से भय तया लोक में भी भय की प्राप्ति होती

परवे परदारे च न कार्या युद्धिरुत्तमः ।

परस्य नरकायैव परदाराश्च मृत्यवे ॥ ४४

नेक्षेनु परत्रियं नग्नां न संभापेव तस्करान् ।

उदफ्यादर्शनं स्पर्श संभापं च विवर्जयेत् ।। ४५

नकासने तथा स्धेयं मोदयी परजायया ।

तथैव स्यान मातुश्च तया सदुहितुस्त्यपि ॥ ४६

न च स्नायीत वै नग्नो न शयीत कदाचन ।

दिग्याससोऽपि न तथा परिभ्रमणमिष्यते ॥

भिन्नासनभाननादीन् दूरतः परिवर्जयेत् ॥ ४७

नन्दासु नाम्यामुपाचरेत

औरं च रिक्तासु जयामु मांसम् ।

पूर्णामु योपित्परिवर्जयेत

भद्रासु सर्वाणि समाचरेत ।। ४८

नाम्यगम न च भूमिपुत्रे

क्षौरं च शुक्रे रपिजे च मांसम् ।

युधेपु योपिन्न समाचरेत

शेपेषु सर्वाणि सदैव कुर्यात् ॥ ४९

चित्रासु हस्ते श्रवणे च तैलं

शौरं विशाखास्वभिजित्सुवय॑म् ।

मूले मृगे भाद्रपदासु मांसं

योपिन्मघाकृत्तिकयोत्तरासु ॥५०

सदैव यज्र्य शयनादक्शिरास्

तथा प्रतीच्यां रजनीचरेश ।

भुञ्जीत नयेह च दक्षिणामुसो

न च प्रतीच्यामभिभोजनीयम् ॥ ५१

देवालयं चैत्यतरं चतुष्पथ

विद्याधिकं चापि गुरुं प्रदक्षिणम् ।

माल्यानपानं वसनानि यत्नतो

नान्यभृतांश्चापि हि धारयेद् बुधः ॥ ५२

स्नायाच्छिरस्नानतया च नित्यं

न कारणं चैव पिना निशासु ।

ग्रहोपरागे स्वजनापयाते

उत्तमव्यक्ति परपन तथा परस्त्री में मन न लगाये। परधन नरक-कारक और परस्त्री मृत्यु का कारण होती (४४)

परती को नग्नायस्था में न देगे, तस्करों से सम्भापण नपरेण्यं रतस्यला घी पोन तो देरी, न उसरा स्पर्श करे और न उमसे समापन करे। (४५)

अपनी पहन तथा परस्त्री के माथ एक आसन पर नहीं पैठना पाहिये। उसी प्रकार अपनी माता तया कन्या के साथ एकासन पर न बैठे। (४६)

नग्न होकर स्नान और शयन फभी न करे । नंगा होकर भमग न करे। टूटे आसन और पर्तन आदि को मेही स्पाग। (४७)

नम्मा (मतिपदा, पटी और एचदशी) विधियों में मालिश न करे, रिता (पतुर्थी, नयमी और पतुर्दशी) विधियों में और पर्म न करे तथा जया (मृतीया, अष्टमी और पोसरी) विधियों में मांग नहीं खाना चाहिये । पूर्गा (पमी, परामी भोर पूर्णिमा) तिथियों में स्त्री का संपर नरेसथा भद्रा (द्वितीया, सप्तमी तथा दासी) तिथियों में सभी कार्य करे। (४८)

रविवार एवं मगलवार को मालिश, शुक्रवार को और फर्म, शनिवार को मास तथा बुधवार को स्त्री का वर्जन करे। शेप दिनों में सभी रार्य सदैय करना चाहिये। (४६)

चित्रा, इल और अयग नक्षत्रों में तेल तथा विशासा और अभिजित् नरात्रों में क्षौर कार्य का पर्जन करना पाहिये । मूल, मृगशिरा और भाद्रपदाओं में मांस भक्षण सया मघा, कृत्तिका और तीनों उत्तराओं (उत्तरपारगुनी, उत्तरापाद, उत्तराभद्रपदा) में स्त्री-सइयास न यरे। (५०)

हे राक्षसराज। उत्तर एवं पश्चिम की ओर शिर फर शयन करना सदा पर्शनीय है। दक्षिण और पशिम की ओर मुख पर भोजन नहीं परना चहिये । (५१)

देवमन्दिर, पैत्यतरु ( प्रशस्त-वृक्ष), चतुष्पय, अपने से अधिक विद्वान् पया गुरु की प्रतिमा परे । मुद्धिमान व्यक्ति यत्नर्पक दूसरे के द्वारा व्ययाहन माठा, अम और पत्रिका व्ययहार न करे। नित्य शिरफे उपर से स्नान करे। महोपराग (दश-पाठ) और खनन की मृत्यु मया जन्म नक्षत्र में चन्द्रमा

मुक्त्वा च जन्मभंगते शशाङ्के ॥५३

नाम्यगितं कायमुपस्पृशेच

स्नातो न केशान् विधुनीत चापि ।

गात्राणि चैयाम्बरपाणिना च

स्नातो विमृज्याद् रजनीचरेश ।। ५४

घसेच देशेषु सुराजकेपु

मुमहितेप्पेय जनेषु नित्यम् ।

अक्रोधना न्यायपरा अमत्सरा:

कृषीवला ह्योपधयश्च यत्र॥ ५५

न तेपु देशेषु यसेत बुद्धिमान्

सदा नृपो दण्डरुचिस्त्वशक्तः ।

जनोऽपि नित्योत्सवबद्धवैरः

सदा जिगीपुश्च निशाचरेन्द्र ।। ५६

इति श्रीयामनपुराणे चतुर्दशोऽध्याय ॥ १४॥