पितरों की आराधना के लिए पुण्य तिथि, देवों द्वारा पृथूदक में पितरों की आराधना कर सेना की प्राप्ति

देवदेव उवाच ।

एवं पृथदको देवाः पुण्यः पापभयापहः ।

तं गच्छध्वं महातीर्थ यावत् संनिधियोधितम् ।। १

यदा मृगशिरोऋक्षे शशिसूयौं बृहस्पतिः ।

तिष्ठन्ति सा तिथिः पुण्या त्वक्षया परिगीयते ॥ २

तं गच्छध्वं मुरश्रेष्ठा यत्र प्राची सरस्वती ।

पितृनाराधयध्वं हि सत्र श्राइन भक्तितः ।। ३

ततो मुरारिवचनं श्रुत्वा देवाः सवासवाः ।

समाजग्मुः कुरुक्षेत्र पुण्यवीय पृथदकम् ।।४

वत्र स्नात्या मुराः सर्वे वृहस्पतिमचोदयन् ।

विशस्व भगवन् मक्षमिमं मृगशिरं पुरु ।

पुण्यां विधि पापहरा तय कालोऽयमागतः ।।५

प्रवर्तते रविस्तत्र चन्द्रमाऽपि विशत्यसौ।

स्वदायत्त गुरो कार्य सुराणां तत् कुरुष्य च ॥६

इत्येवमुक्तो देवस्तु देवाचार्योऽब्रवीदिदम् ।

यदि वर्षाधिपोऽहं स्यां ततो यास्यामि देवताः ।

पाढमूचुः सुराः सर्वे ततोऽसौ प्राक्रमन्मृगम् ॥ ७

आपाढे मासि मार्गः चन्द्रक्ष्यतिधिहि या ।

तस्यां पुरंदरः प्रीतः पिण्डं पितृपु भक्तितः ॥८

प्रादात् विलमधून्मिभं हविप्यान्नं कुरुष्यथ ।

वतः प्रीवास्तु पितरस्तां प्राहुस्तनयां निजाम् ॥ ९

मेनां देवाश्च शैलाय हिमयुक्ताय वै ददुः ।

तां मेनां हिमयाँहन्ध्या प्रसादाद् देवतेप्यय ।

प्रीतिमानभवचासो रराम च यथेच्छया ।।१०

देवदेय ने कहा-है देवताओ! इस प्रकार पृथक पयित्र तथा पाप-भय का नाशक है। तुमलोग सग्निहित सर सफ शान होने वाले महावीय में जाओ।(१)

जय चन्द्रमा, सूर्य एवं वृदरपति मृगशिरा नक्षत्र में स्थित होते हैं उस पवित्र तिधि पो अश्या तिथि पदा जाता है! (२)

हे मुरहो ! जहाँ सरस्यती नदी पूर्व दिशा में पहनी पहा आर भक्ति में भार फरफ पितरों की आराधना (३)

तरनतर मुरारि पा पपन मुगर इन्द्र फे सहित सभी देवता पुरयंत्र में स्थित पृथूरक नामक पुण्य- तीर्थ में गये। (४)

यो नान पाने के अपरान सभी देशों ने पृरपति से पदा- भगवन् ! इस गारा मात्र में प्रवेश कर भाप पवित्र पापहरा पिप निर्माण करें। यह आपरा समय मा गया।

सूर्य यहाँ स्थित हैं तथा चन्द्रमा भी उसमें प्रवेश कर रहे है। गुरु ! देववाओं का कार्य आप फे अधीन है। आप उसे पूर्ण करें।

देयों के ऐसा कहने पर देयों के गुरु वृहस्पति ने यह पहा-दे देयो ! यदि में पधिप पन सो जाऊँगा । सभी दयों ने यहा-ठोर है। सयं उन्होंने मृगशिरा नक्षय में संस्मन किया। (७)

आपद मास की मृगशिरा नक्षत्र में पन्द्रक्ष्य (प्रमा पापा) तिथि के उपस्थित होने पर पुरदर ने प्रसन्न होकर कुम्हक्षेत्र में भक्ति से पितरों को तिमधु मिमित हवि प्याना पिण्ण प्रदान दिया। ददनम्नर पितरों ने देयों को भरनी मेना नाम च्या ये दिया। देवताओं ने हगे हिमालय को दे दिया। देषों के अनुपद मे एरा मेना प्रात पर हिमपान प्रसन्न रो गये और यष्य रमतरने सगे।

ततो हिमाद्रिः पितृकन्यया समं

समर्पयन् पैविषयान् यथेष्टम् ।

अजीजनत् सा तनयाश्च तिम्रो

रूपातियुक्ताः सुरयोषितोपमाः ॥११

इति श्रीवामनपुराणे चतुर्विशोऽध्याय ॥२४॥