वामन महा पुराण
नर नारायण के साथ प्रह्राद का युद्ध(पूर्वानुवृत्त)
पुलस्त्य उवाच ।
शाङ्गपाणिनमायान्तं दृष्ट्वाध्ने दानवेश्वरः ।
परिभ्राम्य गदा वेगात् मूर्ध्नि साध्यमताडयत् ॥ १
ताडिवस्याथ गदया धर्मपुत्रस्य नारद ।
नेत्राभ्यामपसद् वारि पतिवर्ष निभं भुवि ॥२
मूनि नारायणस्यापि सा गदा दानवार्पिता ।
जगाम शतधा ब्रह्मशैलभृङ्गे यथाशनिः ॥३
ततो निवृत्य दैत्येन्द्रः समास्थाय रथं द्रुतम् ।
आदाय कार्मुकं वीरस्तूणाद् पाणं समाददे ॥४
आनम्य चापं वेगेन गाईपत्रान्शिलीमुसान् ।
मुमोच साध्याय तदा क्रोधान्धकारिताननः ॥५
तानापतत एवाशु वाणांचन्द्राईसन्निभान् ।
चिच्छेद पाणैरपरैर्निविमेद च दानवम् ॥ ६
ततो नारायणं दैत्यो दैत्यं नारायणः शरैः ।
आविध्येतां तदाऽन्योन्यं मर्मभिद्भिरजिह्मगैः ।। ७
ततोऽम्परे संनिपातो देवानामभवन्मुने ।
उस समय नारायण ने गदापाणि दैत्य को आते देस कर स्वय युद्ध करने की इच्छा से नर को पीछे कर दिया। (६४)
तदननर हे नारद । गदायुक्त दैत्यपति, तपोनिधान शार्ङ्गधनुर्धारी प्रसिद्ध पुरातन ऋषि महापराक्रमशाली लोकपति नारायण की ओर दौड़े।
श्रीवामनपुराण में सप्तमा अध्याय समाप्त ॥७॥
पुलस्त्य ने कहा-दानवेश्वर ने शाङ्गपाणि साध्य । (नारायण) को सामने आते देख गदा को घुमाकर वैग से उरके सिर पर प्रहार किया।
हे नारद । गदा से ताडित धर्मपुत्र के नेत्रों से अग्नि वषो के सदृश अश्रुजल भूमि पर गिर पड़ा । (२)
हे ब्रह्मन् । शैलशृग पर गिर कर जैसे वन टूट जाता है उसी प्रकार दानव द्वारा नारायण के सिर पर चलायी गयी गदा सैकड़ों टुकड़े हो गई। (३)
तदनन्तर शीघ्रतापूर्वक लौट कर वीर देत्येन्द्र ने स्थान पर आरूट हो धनुप लेकर तरकस से बाण निकाला। (४)
तदुपरान्त मोधान्य दैत्येन्द्र ने वेग से धनुप को झुका कर गृध्र के पख वाले अनेक पागों को साध्य की ओर चयरया
नारायण ने शीघ्रतापूर्वक आ रहे उन अर्धचन्द्र तुल्य बाणों को बाणों से काट डाला और अन्य याणों से दानव का भेदन किया। (६)
तदनन्तर दैत्य ने नारायण को और नारायण ते दैत्य को परस्पर मर्मभेदी एव सीधे चलने वाले बाणों से विद्ध किया।
हे मुने। उस समय शीघ्रतापूर्वक हो रहे इस लघु, विचित्र
दिदृक्षूणां तदा युद्ध लघु चित्रं च सुष्टु च ।। ८ ।
ततः सुराणां दुन्दुभ्यस् त्पनाधन्त महास्वनाः ।
पुष्पवर्पमनौपम्यं मुमुचु. साध्यदैत्ययोः ॥९
ततः पश्यत्सु देवेषु गगनस्थेषु वायुभो।
अयुध्येतां महेप्नासौ प्रेक्षकप्रीतिवर्द्धनम् ॥ १०
वरन्धतुस्तदाकाशं तावुभौ शरवृष्टिभिः ।
दिशच विदिशश्चैर छादयेतां शरोत्करैः ॥ ११
ततो नारायणश्वापं समाकृष्य महामुने ।
विभेद मार्गणैस्तीक्ष्ण. प्रहलादं सर्वमर्मसु ॥ १२
तथा दैत्येवर. ऋद्धशापमानम्य वेगवान् ।
विभेद हृदये वाहोर्वदने च नरोत्तमम् ॥ १३
ततोऽस्यतो दैत्यपते कार्मुक मुष्टिवन्धनात् ।
चिच्छेदकेन वाणेन चन्द्रार्धाफारवर्चसा ॥ १४
अपास्थत धनुश्छिन्नं चापमादाय चापरम् ।
अधिक्ष्य लाघवात् कृत्वा ववर्ष निशिताशरान् ॥ १५
तानप्यस्य शरान् साहयच्चिच्वा बाणैरवारयत्।
क्रार्सृकं च क्षुरप्रेण चिच्छेद पुरुषोत्तमः।।
छित्र छित्रं धनुदैत्ययस्हवन्यदन्यात्समाददे।
समादतं तदा साध्यो सुने चिच्छेद लाघवात्।।
संछिन्नेव्यथ चापेपु जग्राह दितिजेश्वरः।
परिघं दारुण दीर्घ सर्वलोहमय द्दधम्।
परिगृहाथ परिघ भ्रामयामाय दानवः।
भ्राम्यमाण स विच्छेद नारायेन महामुनि।।
छिन्ने तु परिघे श्रीमान् प्रहलादो दानवेधरः।
मुद्रगर भ्राम्य वेगेन प्रचिक्षेप नराग्रजे।।
तमापतन्त बलवान् मार्गणैर्दशमिर्मुने।
चिच्छेद दशघा साघ्यः स छिन्नो न्यपतद् मुनि।।
सुदगरे वितथे जाते प्रासमाविघ्य वेगवान्।
प्रचिक्षेप नराउयाय त च चिच्छेद धर्मजः।।
प्रासे छिन्ने ततो दैत्यः शक्तिमादाय चिहिपे।
एव सुन्दर युद्ध को देखने की इच्छा चाले देवताओं का समूह आकाश में एकत्रित हो गया। (८)
तदनन्तर महान् शब्दकारी दुन्दुभियों को पाकर देव ताओं ने साध्य और दैत्य पर अनुपम पुष्प-वर्ग की।
तदुपरान्त उन दोनों महाधनुर्धारियों ने आकाशस्थ देवों के सामने प्रेक्षकों की प्रीति बढाने वाला युद्ध (१०)
उस समय उन दोनों ने वाणो की दृष्टि से आकाश को वृत कर दिया तथा बाणों के समूह से दिशाओं ए विदिशाओं को आच्छादित कर दिया (११)
हे महामुने। तदनन्तर नारायण ने धनुप को खींच कर तीक्ष्ण बाणों से प्रह्लाद के सभी मर्मस्थलों मे प्रहार किया तथा वेगवान् दैत्येश्वर ने शोधपूर्वक धनुष को झुकाकर नरोत्तम के हृदय, दोनों वाहों और मुख मे भेदन किया (१२-१३)
तदनन्तर ( नारायण ने ) एक चन्द्रार्धाकार तेजस्वी बाण से बाण चला रहे दैत्यपति के धनुष को मुष्टिबन्ध से काट दिया। (१४)
(दैत्यपति ने) कटे घनुष को फेंक कर दूसरा धनुप ले लिया और धीघ्र ही उस पर प्रत्यक्षा चढ़ा कर तीक्ष्ण बाणो की वर्षाकी।
उसके उन शरों को भी साध्य ने बाणो से छिन्न कर निमारित कर दिया एव पुसषोत्तम ने तीक्ष्ण बाण से उसके धनुष को भी काट डाला।
हे मुने। धनुष के छिन् होने पर दैत्य राज ने बारम्बार दूसरा धनुष प्रहण किया किन्तु साध्य ने लिये गये उन धनुषो को भी लाघव से काट दिया।
तदान्तर धनुषो के कट जाने पर दितिजेश्वर ने भयकर दृढ एवं दीर्घ लौहमय परिघ को प्रहण किया।
दानव ने परिघ को लेकर उसे घुमाया। घुनाए जा रहे परिघ को महामुनि(नारायण) ने बाण से काट डाला।
परिघ के कट जाने पर श्रीमान दानवेश्वर प्रहलाव ने वेग से मुदगर को घुमा कर नारायण के ऊपर फेंका।
हे मुने उस आ रहे मुद्गर को बलवान् साध्य ने दृश बाणों से दश भागो मे काट दिया और वह कट कर पृथ्वी पर गिर पड़ा।
मुद्रगर के र्व्यथ हो जाने पर बेगवान् दैत्य ने प्रास लेकर नरश्रेष्ठ के ऊपर फेका। धमनन्दन ने उसे भी काट दिया।
तां च चिच्छेद बलवान् क्षुरप्रेण महातपाः ॥ २३
छिन्नेषु तेषु शस्त्रेषु दानवोऽन्यन्महद्धनुः ।
समादाय ततो वाणैरवतस्तार नारद ॥ २४
ततो नारायणो देवो दैत्यनाथं जगद्गुरुः ।
नाराचेन जघानाथ हृदये सुरतापसः ॥ २५
संभिन्नहदयो ब्रह्मन् देवेनाद्भुतकर्मणा।
निपपात रथोपस्थे तमपोवाह सारथिः ।। २६
स संज्ञा सुचिरेणैव प्रतिलभ्य दितीश्वरः ।
सुदृढं चापमादाय भूयो योपागतः । २७
तमागतं सनिरीक्ष्य प्रत्युवाच नराग्रजः ।
गन्छ दैत्येन्द्र योत्स्यामः प्रातस्त्वाहिकमाचर ॥ २८
एवमुक्तो दितीशस्तु साध्येनाद्भुतकर्मणा ।
जगाम नैमिपारण्यं क्रियां चक्रे तदाऽऽहिफीम् ॥२९
एवं युध्यति देवे च प्रहादो ह्यसुरो मुने ।
रात्रो चिन्तयते युद्धे कथं जेन्यानि दाम्भिकम् ॥ ३०
एवं नारायणेनाऽसौ सहायुध्यत नारद ।
दिव्यं वर्षसहस्रं तु दैत्यो देवं न चाजयत् ॥ ३१
ततो वर्षसहस्रान्ते ह्यजिते पुरुषोत्तमे ।
पीतवाससमभ्येत्य दानवो वाक्यमब्रवीत् ।। ३२
किमर्थ देवदेवेश साध्यं नारायणं हरिम् ।
विजेतुं नाऽद्य शक्नोमि एतन्मे कारणं वद ।। ३३
पीतवासा उवाच ।
दुर्जयोऽसौ महामाहुस्त्वया ग्रहाद धर्मजः ।
साध्यो विप्रयरो धीमान् मृधे देवासुरैरपि ।। ३४
ग्रहाद उवाच ।
यद्यसो दुर्जयो देव मया साध्यो रणाजिरे ।
तत्कथं यत्प्रतिज्ञातं तदसत्यं भविष्यति ॥ ३५
हीनप्रतिज्ञो देवेश कथं जीवेत मादृशः।
वस्मात्तवाग्रतो निष्णो करिष्ये कायशोधनम् । ३६
पुलस्त्य उवाच ।
इत्येवमुक्त्वा वचनं देवाने दानवेश्वरः।
प्रास के छिन्न होने पर दैत्य ने शक्ति लेकर फेंकी। बलवान् महातपा नारायण ने चरम द्वारा उसे भी फाट दिया। (२३)
हे नारद । उन अषों के छिन्न होने पर दानर ने अन्य महाधनुप लेकर याणों की वर्षा की। (२४)
तदनन्तर सुरतापस जगद्गुरु नारायण देव ने दैत्यपवि के हृदय में नाराच से प्रहार किया। (२५)
हे ब्रह्मन् । अद्भुतकर्मा देव द्वारा छिदे हृदय वाला वह दैत्य रथ के मध्य भाग मे गिर पड़ा। उसे सारथी वहाँ से इटारे गया। (२६)
बहुत देर बाद चेतना प्राप्त कर सुदृढ धनुष लेकर दितीश्वर पुन युद्ध करने के लिए आया। (२७)
उसे आया देख नरामज ने कहा-“हे दैत्येन्द्र । हम प्रात काल युद्ध करेंगे, जाओ इस समय आहिक कर्म (२८)
अद्भुतकर्मा साध्य के ऐसा कहने पर दितीश नैमिपा- रण्य मे गया और वहाँ उसने आह्निक कर्म किया। (२६)
हे मुने। देव के ऐसा युद्ध करने पर असुर प्रहलाद रात्रि मे यह विचार करता था कि युद्ध में दाम्भिक को कैसे जीतूंगा? (३०)
हे नारद । इस प्रकार दैत्य ने नारायण के साथ दिव्य सहस्र वर्षों तक युद्ध किया, परन्तु वह देव को नहीं जीत सका। (३१)
तदनन्तर सहस्र वर्षों के उपरान भी पुरुषोत्तम नारायण के अपराजित रहने पर दानव ने पीताम्बरधारी विष्णु के पास जाकर कहा- (३२)
"हे देवदेवेश । में साध्य नारायण हरि को आज तक क्यों नहीं जीत सका? मुझे इसका कारण बतलाएँ।" (३३)
पीताम्मरपारी ने कहा-“हे प्रहराद । महाबाहु धर्म- पुत्र तुम्हारे द्वारा दुर्जेय है। विप्रवर धीमान् साध्य देवा सुरों द्वारा भी युद्ध मे अजेय हैं।" (३४)
प्रहलाद ने कहा-“हे देव । यदि वह साध्य देव रणा- गण मे मेरे द्वारा दुर्जेय है तो मैंने जो प्रतिज्ञा की है उसका क्या होगा? वह तो मिथ्या होगी।" (३२)
"हे देवेश | मेरे जैसा व्यक्ति हीनप्रतिज्ञ होकर कैसे जीवित रहेगा ? इसलिये हे विष्णु । मैं आप के सामने अपना शरीर शोधन करूँगा।" (३६)
पुलस्त्य ने कहा-विष्णु के सामने ऐसा पचन कह कर
शिरःस्नातस्तदा तस्थौ गृणन् ब्रह्म सनातनम् ॥ ३७
ततो दैत्यपति विष्णुः पीतवासाऽब्रवीद्वचः।
गच्छ जेष्यसि भक्त्या तं न युद्धेन कथंचन ॥३८
प्रहाद उवाच ।
मया जितं देवदेव त्रैलोक्यमपि सुत्रत ।
जितोऽयं त्वत्प्रसादेन शक्रः किमुत धर्मजः ॥३९
असौ यद्यजयो देव त्रैलोक्येनापि सुत्रतः ।
न स्थातुं त्वत्प्रसादेन शक्यं किमु करोम्यज ॥ ४०
पीतवासा उवाच ।
सोऽहं दानवशार्दूल लोकानां हितकाम्यया ।
धर्म प्रवर्चापयितुं तपश्चर्या समास्थितः ।। ४१
तस्माधदिच्छसि जयं तमाराधय दानव ।
तं पराजेयसे भक्त्या तस्माच्छुश्रूप धर्मजम् ।। ४२
पुलस्त्य उवाच ।
इत्युक्तः पीतवासेन दानवेन्द्रो महात्मना ।
अब्रवीद्वचनं हए: समाहूयाधकं मुने ॥ ४३
प्रहाद उवाच ।
दैत्याश्च दानवाश्चैव परिपाल्यास्त्वयान्धक ।
मयोत्सृष्टमिदं राज्यं प्रतीच्छस्व महाभुज ॥ ४४
इत्येवमुक्तो जग्राह राज्यं हैरण्यलोचनिः ।
प्रह्लादोऽपि तदा गच्छत् पुण्यं वदरिकाश्रमम् ॥ ४५
दृष्ट्वा नारायण देवं नरं च दिविजेश्वरः।
कृताञ्जलिपुटो भूत्वा ववन्दै चरणौ तयोः ॥ ४६
तमुवाच महातेजा वास्यं नारायणोऽव्ययः।
किमयं प्रणतोऽसीह मामजित्वा महासुर ॥ ४७
ग्रहाद उवाच ।
कस्त्वां जेतुं प्रभो शक्तः कस्त्वत्तः पुरुपोऽधिकः ।
त्वं हि नारायणोऽनन्तः पीतासा जनार्दनः ॥ ४८
त्वं देवः पुण्डरीकाक्षस्त्वं विष्णुः शाईचापधृक् ।
त्वमव्ययो महेशानः शाश्वतः पुरुषोत्तमः ॥ ४९
त्वां योगिनश्चिन्तयन्ति चार्चयन्ति मनीषिणः ।
जपन्ति स्नातकास्त्वां च यजन्ति त्वांच याज्ञिकाः॥५०
दानवेश्वर शिर स्नात होकर सनातन ब्रह्म का जप करते हुए बैठ गए। (३७)
तदनन्तर पीताम्बरधारी विष्णु ने दैत्यपति से यह वचन कहा-"जाओ, उन्हें भक्ति से जीत सकोगे, युद्ध से कथमपि नहीं।" (३८)
प्रहलाद ने कहा-“हे देवदेव । हे सुव्रत । आपकी कृपा से मैंने त्रैलोक्य तथा इन्द्र को जीता है। इस धर्म- नन्दन की क्या बात है?" (३६)
'हे अजन्मा । यदि वह सुव्रत त्रैलोक्य से भी अजेय है तथा आपके प्रसाद से भी मैं उसके सामने नहीं ठहर सकता तो मैं क्या करूँ ?"
पीताम्बरधारी ने कहा-हे दानवश्रेष्ठ । यह मैं ही हूँ जो जगत् की हितकामना से धर्मप्रवर्तनार्थ तपश्चर्या कर रहा हूँ। (४१)
अत. हे दानव! यदि तुम विजय चाहते हो तो उनकी आराधना करो। तुम उन्हें भक्ति द्वारा पराजित कर सकोगे अत धर्मनन्दन की सेवा करो। (४२)
पुलस्त्य ने कहा-हे मुने! महात्मा पीताम्बरधारी के ऐसा कहने पर प्रसन्न दानवेन्द्र ने अन्धक को बुला कर यह वाक्य कहा- (४३)
प्रहलाद ने कहा- हे अन्धक ! तुम दैत्यों और दानवों का प्रतिपालन करो। हे महाभुज ! मेरे द्वारा त्यक्त यह राज्य तुम ग्रहण करो। (४४)
इस प्रकार कहने पर हिरण्याक्ष के पुन ने राज्य प्रहण किया । तदनन्तर प्रहलाद भी पवित्र बदरिकाश्रम चले गये।
दितिजेश्वर ने नारायण देव तथा नर को देख हाथ जोड़ कर उनके चरणों में प्रणाम किया । महातेजस्वी अव्यय नारायण ने उससे कहा-"हे मदासुर । मुझ बिना जीत तुम क्यों यहाँ प्रणत (४७)
प्रहलाद ने कहा-हे प्रभो! आपको कौन जीत सकता है ? कौन पुरुष आप से बढ़कर हो सकता है ? आप ही अनन्त नारायण पीताम्बरधारी जनार्दन है। (४८)
आपही देव पुण्डरीकाक्ष तथा शार्ङ्गधनुषधारी विष्णु हैं। आप अव्यय, महेश्वर तथा शाश्वत पुरुषोत्तम हैं।" (४६)
'योगी आपका ध्यान करते हैं, मनीषी आपकी पूजा करते हैं, स्नातक आपके नाम का जप करते हैं तथा याज्ञिक आपका यजन करते है।"
त्वमच्युतो हुपीकेनश्चक्रपाणिर्धराधरः ।
महामीनो हयशिरास्त्वमेव वरफच्छपः ॥ ५१
हिरण्याक्षरिपुः श्रीमान् भगवानथ सूकरः ।
मपितुनाशनकरो भवानपि नृकेसरी ।। ५२
ब्रह्मा त्रिनेत्रोऽमरराड हुताशः
प्रताधिपो नीरपतिः समीरः।
सूयों मृगाष्टोऽचलजङ्गमाधो
भवान् विभो नाथ सगेन्द्रकेतो ॥५३
त्वं पृथ्वी ज्योतिराकाशं जलं भृत्या सहस्रशः ।
त्वया व्याप्तं जगत्सर्व कस्त्वां जयति माधव ॥ ५४
भक्त्या यदि हपीकेश तोपमेपि जगद्गुरो।
नान्यथा त्यं प्रशक्योऽसि जेतुं सर्वगताव्यय ।। ५५
भगवानुवाच ।
परितुष्टोऽस्मि ते दैत्य स्तवेनानेन सुग्रत ।
भक्त्या त्वनन्यया चाहं त्वया दैत्य पराजितः ॥५६
पराजितश्च पुरुषो दैत्य दण्डं प्रयच्छति ।
दण्डार्थ ते प्रदास्यामि वरं वृणु यमिच्छसि ॥ ५७
प्रहाद उवाच ।
नारायण वर याचे यं स्वं मे दातुमर्हसि
तन्मे पापं लयं यातु शारीरं मानसं तथा ॥ ५८
वाचिकं च जगन्नाथ यत्त्वया सह युध्यतः ।
नरेण यद्यप्पभवद् वरमेतत्प्रयच्छ मे ॥ ५९
नारायण उवाच ।
एवं भवतु दैत्येन्द्र पापं ते यातु संक्षयम् ।
द्वितीयं प्रार्थय परं तं ददामि तवासुर ।। ६०
प्रह्लाद उवाच ।
या या जायेत मे बुद्धिः सा सा विष्णो त्वदाश्रिता।
देवार्चने च निरता त्वचिचा त्वत्परायणा ।। ६१
नारायणा उवाच !
एवं भविष्यत्यसुर वरमन्यं यमिच्छसि ।
तं वृणीष्व महाबाहो प्रदास्याम्यविचारयन् ।। ६२
प्रह्लाद उवाच ।
सर्वमेव मया लब्धं त्वत्प्रसादादधोक्षज ।
त्वत्पादपङ्कजाभ्यां हि ख्यातिरस्तु सदा मम ॥ ६३
"आप अच्युत, हपीकेश, चक्रपाणि, घराघर, महा मत्स्य, हयग्रीव तथा श्रेष्ठ कच्छप (कूर्मावतार) हैं।" (५१)
"आप श्रीमान् , हिरण्याक्ष रिपु, तथा भगवान् सूकर है ।आप ही मेरे पिता के नाशक भगवान् नृसिंह हैं । (५२)
"आप ब्रह्मा, महादेव, इन्द्र, अग्नि, यमराज, वरुण और वायु हैं। हे विभो । हे नाथ । हे सगेन्द्रकेतु (गरुड़धज ) । आप सूर्य, चन्द्र तथा स्थावर और जगम मे आदि है।"
आप पृथ्वी, अग्नि, आकाश, जल हैं। सहस्रों रूपों से आप ने समस्त जगत् को व्यात किया है। हे माधव कौन आप को जीतेगा। (५४)
"हे जगद्गुरो! हे हृषीकेश ! आप भक्ति से ही सन्तुष्ट हो सकते है । हे सर्वगत । हे अविनाशी । आप दूसरे किसी प्रकार से नहीं जीते जा सकते।"
भगवान् ने कहा-हे सुत्रत । हे दैत्य । तुम्हारे इस स्तव से मैं सन्तुष्ट हूँ । हे देत्य । इस अनन्य भक्ति से तुम्हारे द्वारा मैं पराजित हो गया हूँ। (५६)
"हे दैत्य । पराजिन पुरुष दण्ड देता है । अस्तु, दण्ड के निमित्त में तुम्हें वर दूंगा । इच्छित वर मांगो।" (५७)
प्रहलाद ने कहा-“हे नारायण । में वर माँगता हूँ जिसे आप दे सकते हैं। हे जगन्नाथ | आपके तथा नर के साथ युद्ध करने में मेरे शरीर, मन और वाणी से जो भी पाप हुआ हो वह नष्ट नष्ट हो जाय। मुझे यही वर दें।(५८-५९)
नारायण ने कहा-“हे दैत्येन्द्र । ऐसा ही हो । तुम्हारा पाप नष्ट हो जाय । हे असुर। दूसरा घर माँगो। उसे भी मैं तुम्हें दूंगा।" (६०)
प्रहलाद ने कहा - "हे विष्णु । मेरे भीतर जो जो बुद्धि उत्पन्न हो यह आपके ही आश्रित, देवार्चन में निरत और आपके चिन्तन में लगी रहे। (६१)
नारायण ने कहा -" असुर । ऐसा ही होगा। हे महाबाहो। अम्य जो पर तुम चाहो माँगो। मैं विना विचारे तुम्हें दूंगा। (६२)
प्रह्लाद ने कहा-“हे अधोक्षज ! आपके अनुग्रह से मुझे सब कुछ मिल गया। आपके चरणकमलों से मेरी प्रसिद्धि सदा धनी रहे।" (६३)
नारायण उवाच ।
एवमस्त्वपरं चास्तु नित्यमेवाक्षयोऽव्ययः ।
अजरथामरश्चापि मत्प्रसादाद् भविष्यसि ॥ ६४
गच्छस्व दैत्यशार्दूल स्वमावासं क्रियारत. ।
न कर्मवन्धो भवतो मच्चित्तस्य भविष्यति ॥ ६५
प्रशासयदमून् दैत्यान् राज्यं पालय शाश्वतम् ।
स्वजातिसदृशं दैत्य कुरु धर्ममनुत्तमम् ॥ ६६
पुलस्त्य उवाच।
इत्युक्तो लोकनाथेन प्रह्लादो देवमत्रवीत् ।
कथं राज्यं समादास्ये परित्यक्तं जगद्गुरो॥ ६७
तमुवाच जगत्स्वामी गच्छ त्वं निजमाश्रयम् ।
हितोपदेष्टा दैत्यानां दानवाना तथा भव ॥ ६८
नारायणेनैवमुक्तः स तदा दैत्यनायकः ।
प्रणिपत्य विभुं तुष्टो जगाम नगरं निजम् ।। ६९
दृष्टः सभाजितथापि दानवैरन्धफेन च ।
निमन्वितश्च राज्याय न प्रत्यैच्छत्स नारद ॥ ७०
राज्यं परित्यज्य महाऽमुरेन्द्रो
नियोजयन् सत्पथि दानवेन्द्रान् ।
ध्यायन् स्मरन् केशवमग्रमेय
तस्थौ तदा योगविशुद्धदेहः ॥७१
एवं पुरा नारद दानवेन्द्रो
नारायणेनोत्तमपूरुपेण ।
पराजितश्चापि विमुच्य राज्य
तस्थौ मनो धातरि सन्निवेश्य ॥ ७२
इति श्रीवामनपुराणे अष्टमोऽध्याय ॥८॥
नारायण ने कहा-"ऐसा ही होगा। इसके अतिरिक्त मेरे प्रसाद से तुम अक्षय, अविनाशी, अजर और अमर होगे। (६४)
"हे दैत्यशार्दूल । अपने घर जाओ। सदा (धर्म) कार्य में रत रहो । मुझ में चित्त लगाये रखने से तुम्हें कर्म बन्धन नहीं होगा।
'इन दैत्यों का शासन करते हुए शाश्वत राज्य का पालन करो। हे दैत्य । अपनी जाति के अनुकूल श्रेष्ट धर्मों का (६६)
पुलस्त्य ने कहा-लोकनाथ के ऐसा कहने पर प्रह्लाद ने भगवान् से कहा-“हे जगद्गुरो, परित्यक्त राज्य को कैसे प्रहण करूँ?" (६७)
जगावामी ने उससे कहा-“तुम अपने घर जाओ तथा दैत्यों एव दानवों क हितोपदेशक बनो। (६८)
नारायण के एसा कहने पर वे दैत्यनायक (प्रहलाद) विभुको प्रणाम कर प्रसन्नतापूर्वक अपने नगर चले (६६)
हे नारद । अन्धक तथा दानवों ने प्रहलाद को देखा तथा सम्मान किया और उन्हें राज्य स्वीकार करने के लिए निमन्त्रित किया, किन्तु उन्होंने राज्य नहीं स्वीकार किया। (७०)
महासुरेन्द्र (प्रहलाद) राज्य को छोड़, दानवेन्द्रों को शुभ मार्ग मे नियोजित कर तथा अप्रमेय केशव का ध्यान और स्मरण करते हुए योग के द्वारा विशुद्ध शरीर होकर अव स्थित हुए। (७१)
हे नारद । इस प्रकार, प्राचीन समय में पुरुषोत्तम नारायण द्वारा पराजित दानवेन्द्र प्रहलाद राज्य छोड़ कर विधाता नारायण में चित्त सलान कर अवस्थित हुए। (७२)
श्रीवामनपुराण म अष्टम अध्याय समाप्त।।