बलि-शुक सवाद में कोशकारसुत की कथा

पुलस्त्य उवाच ।

तत, समागच्छति यासुदेवे

मही चकम्पे गिरयश्च चेलुः ।

क्षुब्धाः समुद्रा दिवि अक्षमण्डलो

पभो रिपर्यस्तगतिमहर्षे ॥१

यज्ञः समागात् परमाकुलत्वं

न वैभि किं मे मधुहा करिष्यति ।

यथा प्रदग्धोऽस्मि महेश्वरेण

किं मां न संघक्ष्यति वासुदेवः ॥२

ऋक्साममन्त्राहुतिभिर्हताभि-

वितानकीयान् ज्वलनास्तु भागान् ।

भक्त्या द्विजेन्द्ररपि संपादितान्

नैव प्रतीच्छन्ति विमोर्भयेन ॥३

तान् दृष्ट्वा घोररूपांस्तु उत्पातान् दानवेधरः ।

पप्रच्छोशनसं शुक्र प्रणिपत्य कृताञ्जलिः ।।४

किमर्थमाचार्य मही सशैला

रम्य वाताभिहता चचाल ।

किमासुरीयान् मुहुवानपीह

भागान् न गृह्णन्ति हुताशनाथ ॥ ५

क्षुब्धाः किमर्थ मकरालयाच भो

क्षा न से किं प्रचरन्ति पूर्ववत् ।

दिशः किमर्थ तमसा परिप्लुता

दोपेण फस्याद्य पदस्व मे गुरो॥६

पुलस्त्य उवाच ।

शुक्रस्तद् वाक्यमाकर्ण्य विरोचनसुतेरितम् ।

अथ ज्ञात्या कारणं च पलिं वचनमब्रवीत् ॥ ७

शुक्र उवाच ।

शृणुप्न दैत्येश्वर येन भागान्

नामी प्रतीच्छन्ति हि आसुरीयान् ।

हुताशना मन्त्रहुतानपीह

नूनं समागच्छति वासुदेवः ॥ ८

तदनिविक्षेपमपारयन्ती

पुलस्त्य ने कहा-हे महाप! तदनन्तर वामन रूपधारी वासुदेव के आने पर पृथ्वी कम्पित होने लगी, पर्वत विचलित हो उठे, समुद्र आन्दोलित हो गये एय आकाश में तारा समूह की गति अस्त-व्यस्त हो गयी । (१)

यज्ञ भी अत्यन्त व्याकुल होकर सोचने लगा- न जाने मधुसूदन वासुदेव आकर मेरा क्या करेंगे? जैसे महेश्वर ने मुझे दग्ध कर दिया था, क्या वासुदेव भी वो मुझे वैसे ही दग्ध नहीं कर देगें ? (२)

द्विजेन्द्रों द्वारा भक्ति पूर्वक ऋगवेद एव सामवेद के मन्त्रों की आहुतियों से हुत यज्ञीय भागों को अग्नि विष्णु के भय से नहीं ग्रहण कर रहे थे ।

उन भयङ्कर उत्पातों को देखकर दानवेश्वर (बलि) ने उशना शुक्राचार्य को प्रणाम कर तथा हाथ जोड़कर (४)

हे आचार्य ! पर्वतों सहित पृथ्वी वायु से आहत

केले के वृक्ष सदृश क्यों कम्पित हो रही है एवं अग्नि भी भली भाँति आहुत आसुरीय भागों को क्यों नहीं ग्रहण कर रहे है? (५)

समुद्र क्यों क्षुब्ध हो उठे है? आश मे नक्षत्र पूर्ववत् क्यों नहीं सचार कर रहे है एव दिशाएँ क्यों अन्यार से आवृत हो गयी हैं। हे गुरु! मुझे यह बतलाएँ कि किसके दोष से यह सब हो रहा है ?

पुलस्त्य ने कहा-विरोचन पुत्र द्वारा कहे गये उस याक्य को सुनने के उपरान्त कारण को जानकर शुक्र ने बलि से कहा। (७)

शुक्राचार्य ने कहा-हे दैत्येश्वर । सुनो। निश्चय ही वासुदेव आ रहे है। इसीलिये अग्नि मन्त्र के द्वारा हुत होने पर भी आसुरीय भागों को नहीं ग्रहण कर रहे है। (८)

हे दितीश उनके पदक्षेप का भार सहन न कर सक्ने के कारण पर्वतों सहित पृथ्वी पम्पित हो रही है।

मही सशैला चलिता दितीश ।

तस्यां चलल्यां मकरालयामी

उबृत्तवेला दितिज्ञाय जाताः ॥ ९

पुलस्त्य उवाच।

शुक्रस्य वचनं श्रुत्या पलिर्भार्गवमप्रवीत् ।

धर्म सत्यं च पथ्यं च सर्वोत्साहसमीरितम् ॥ १०

घलिरुवाच ।

आयाते वासुदेवे चद मम भगवन् धर्मकामार्थतत्त्वं

कि कार्य किंच दयं मणिकनकमयो भृगजाधादिकं वा ।

किंवा वाच्यं मुरारेनिज हितमथवा तद्धितं या प्रयुञ्ज

तथ्यपथ्यं प्रियं मोमम चदशुभदंवत्करिष्येन चान्यत्॥११

पुलस्त्य उवाच ।

तद् वाक्यं भार्गवः श्रुत्या दत्यनाथेरितं वरम् ।

विचिन्त्य नारद प्राह भृतमन्यविदीश्वरः ।। १२

स्वया कृता यज्ञमजोऽसुरेन्द्रा

पहिष्कता ये श्रुविष्टमार्गे ।

श्रुतिप्रमाणं मसभोजिनो पहिः

सुरास्तदर्थ हरिरभ्युपैति ॥ १३

तस्पाध्वरं दैत्यसमागवस्य

कार्य हि किं मां परिपृच्छसे यत् ।

कार्य न देयं हि विभो तृणा

यदध्वरे भूनकादिकं वा ॥१४

वाच्यं तथा साम निरर्थक विभो

कस्ते वरं दातुमलं हि शक्नुयात् ।

यस्योदरे भूसंपनाकपाल-

रसावलेशा निवसन्ति नित्यशः ।। १५

पलिरुवाच ।

मया न चोक्तं वचनं हि मार्गव

न चास्ति मह्यं न च दातुमत्सहे ।

ममागतेऽप्यर्थिनि हीनयुत्ते

जनार्दने लोकपती कथं तु ॥ १६

एवं च श्रूयते श्लोकः सतां कथयतां विभो

सद्भायो ग्रामणेष्वेव फर्त्तव्यो भूतिमिच्छता ।

दृश्यते हि तथा तच सत्यं प्रामणसवम ।। १७

हेदितिज! पृथियो के विचलित होने से ये समुद्र आज सीमा का स्टपन पर गये हैं।

पुत्पत्य ने पहा-गुफ का वचन मुनर पलि ने भार्गय से धर्मयुक्त, सत्य, हितप्रद और सभी प्रशर के एत्माद से युक्त पचन कहा। (१०)

पछि ने पदा-दे भगवन् ! यामुदय के आने पर मेरे फरने योग्य पर्ग, पाम एवं अर्थ फे. सत्त्य को पतटा में बन्द गणि, स्वर्ण, पृषी, दाधी अपया अप में से पया दान १ में मुरारि से पया का ? अपना अयया उना या दिन मापन पर आप मुझे हितकारी, गुम पया प्रिय तथ्य पतला। मैं यही पगा, अग्य पुनदी कगा। (११)

पुराग ने पा-६ मारद' देगनाय द्वारा पहे गए पर श्रेष्ठ पपन पो गुनने पं. नपरान विचार पर भूत एमविश्यमाना मार्ग ने कहा- (१२)

गुमने पति द्वारा प्रतिपादित मार्ग में पदिसत भारेमो पामंशा पनापार एवं मुति प्रमानानुमार ।

मसभोगी देयों को पहिणत पर दिया है। इसी कारण से हरि आ रहे हैं।

हे दैत्य ! तुमने मुझसे जो यह पूया है कि यामे उनके आने पर यया यरना चाहिए, (इसके विषय में मेरा यह कहना है कि) या में तृण के अपभाग ६ परायर भी पृथ्वी या मुपांदि उन्हें नहीं देना चाहिए। १४)

उनसे इस प्रसर या अर्थहीन मामयुक्त पचन पदना पाहिए कि हे पिभो ! जिसरे पदर में मूलोप, गुपोंक एवं स्थलों के अधिपति तथा रमाराल के स्वामी मिरण नियास पर है ऐसे आप पो दान देने में कौन समर्प है?

पलि ने पहा मार्गय ! आपारदीन यापर के आने पर भी मैंने पद पपन नही पा कि मेरे पास नही है और में देना नहीं पाता। आः सोग्गली जनान यापरु पनार आने पर में गिा केंगे पद गस्तार  पिमां! मननों पं द्वारा पदासा मारा ग्मोर गुना जाता है कि परीक्षा पास

पूर्वाभ्यासेन कर्माणि संभवन्ति नृणां स्फुटम् ।

वाक्कायमानसानीह योन्यन्तरगतान्यपि ॥ १८

किंवा त्वया द्विजश्रेष्ठ पौराणी न श्रुता कया ।

या वृत्ता मलये पूर्व कोशकारसुतस्य तु ।। १९

शुक्र उवाच।

कथयस्व महायाहो कोशकारसुताश्रयाम् ।

कथां पौराणिकी पुण्या महाकौतूहलं हि मे ॥ २०

यलिरुवाच ।

भृणुष्व कथयिष्यामि कथामेतां मसान्तरे ।

पूर्वाभ्यासनिवद्धां हि सत्यां भृगुकुलोद्वह ॥ २१

मुद्गलस्य मुनेः पुत्रो ज्ञानविज्ञानपारगः ।

कोशकार इवि ख्यात आसीद् ब्रह्मरतपोरतः ॥ २२

तस्यासीद् दयिता साध्वी धर्मिष्ठा नामतः श्रुता ।

सती वात्स्यायनसुता धर्मशीला पतिव्रता ॥ २३

तस्यामस्य सुतो जातः प्रकृत्या जडाकृतिः ।

मूकपन्नालपति स न च पश्यति चान्धयत् ॥ २४

तं जातं ब्राह्मणी पुत्र जडं मूकं त्वचक्षुपम् ।

मन्यमाना गृहद्वारि पष्ठेऽहनि समुत्सृजत् ॥ २५

ततोऽभ्यागाद् दुराचारा राक्षसी जातहारिणी।

स्वं शिशुं कृशमादाय सूर्पाक्षी नाम नामतः ॥ २६

तत्रोत्सृज्य स्वपुत्रं सा जग्राह द्विजनन्दनम् ।

तमादाय जगामाय भोक्तुं शालोदरे गिरौ ॥ २७

ततस्तामागता वीक्ष्य वस्या पर्वा घटोदरः।

नेत्रहीनः प्रत्युवाच किमानीतस्त्वया प्रिये ॥ २८

साऽब्रवीत् राक्षसपते मया स्थाप्य निजं शिशुम् ।

कोशकारद्विजगृहे तस्यानीतः प्रभो सुतः ॥ २९

स प्राह न त्वया भद्र भद्रमाचरितं त्विति ।

महाज्ञानी द्विजेन्द्रोऽसौ ततः शप्स्यवि कोपितः ॥ ३०

मनुष्य को ब्राह्मणों के प्रति सद्भाय रसना चाहिए। हे ब्राह्मणपुंगव ! और यह भी प्रतीत होता है। (१७)

वचन, शरीर एधं मन द्वारा किये गये मनुष्यों के कर्म दूसरी योनियों में भी पूर्व के अभ्यासवश स्फुटरूप से प्रकट होते है। (१८)

हे द्विजश्रेष्ठ! प्राचीनकाल मे मलयाचल पर घटित कोशकार के पुत्र की प्राचीन कथा को क्या आपने नहीं (१९)

शुक ने कहा-हे महाबाहु ! कोशकार के पुत्र सम्बन्धी पवित्र प्राचीन कथा को कहो। मुझे महान कौतूहल हो रहा है। (२०)

यलि ने कहा-हे भृगुकुलश्नेष्ठ ! पूर्वाभ्यास से संबद्ध इस सत्य कथा को में यज्ञ में कह रहा हूँ। आप श्रवण (२१)

हे ब्रह्मन् ! महर्षि मुद्गल का कोशकार नाम से विख्यात ज्ञान विज्ञान सम्पन्न एक तपस्वी पुत्र था। (२२)

उसकी पत्नी का नाम धमिष्ठा था। वह चाल्यायन की कन्या, साध्वी, सती, धर्मशीला तथा पतिव्रता थी। (२३)

उसी स्त्री के गर्भ से उसो एक पुत्र हुआ, जो स्वभाव से ही जद आकार वाला था। गूंगे व्यक्ति की भाँति न यह योलता था और न अन्धे की भाँति देखता ही (२४)

अपने उस उत्पन्न पुत्र को जड़, मूंगा और अन्धा समझकर ब्राह्मणी ने छठे दिन उसे घर के द्वार पर फेक दिया। (२५)

तदनन्तर सूक्षी नाम की एक दुराचारिणी, नवजात चालकों को चुराने वाली राक्षसी अपने दुबले-पतले पुत्र को लेकर यहाँ आयी। (२६)

वहाँ अपने पुत्र को छोड़कर उसने ब्राह्मणपुन को उठा लिया। उसे लेकर खाने के लिए शालोदर नामक पर्वत पर गयी। (२७)

तदुपरान्त उसे आयी हुई जानकर घटोदर नामक उसके नेत्रहीन पति ने पूछा-हे प्रिये ! तुम क्या लायी हो ? (२८)

उसने कहा-हे राक्षसपति । हे प्रभो ! में अपने शिशु को कोशकार गुनि के घर मे रसकर उनके पुत्र को लायी हूँ। (२९)

राक्षस ने कहा-हे भद्रे! तुमने यह अच्छा नहीं किया। यह द्विजेन्द्र महाज्ञानी है। अतः यह कोधित होकर शाप दे देगा। (३०)

तस्माच्छीघमिमं त्यक्त्वा मनुजं घोररूपिणम् ।

अन्यस्य कस्यचित् पुत्रं शीप्रमानय सुन्दरि ॥३१

इत्येवमुक्ता सा रौद्रा राक्षसी कामचारिणी।

समाजगाम त्वरिता समुत्पत्य विहायसम् ।। ३२

स चापि राक्षससुतो निसृष्टो गृहयाद्यतः ।

रुरोद सुस्वरं ब्रह्मन् प्रक्षिप्यागुष्ठमानने ॥ ३३

सा ऋन्दितं चिराच्छुत्या धर्मिष्ठा पतिमयीन् ।

पश्य स्वयं मुनिश्रेष्ठ सशब्दस्तनयस्तय ।। ३४

वस्ता सा निर्जगामाथ गृहमध्यात् तपस्विनी ।

स चापि ब्राह्मणश्रेष्ठः समपश्यत वै शिशुम् ॥ ३५

वर्णरूपादिसंयुक्तं यथा स्वतनयं तथा ।

ततो विहस्य प्रोवाच कोशकारो निनां प्रियाम् ।। ३६

एतेनाविश्य धर्मिष्ठे भाव्यं भूतेन साम्प्रतम् ।

कोऽप्यस्माकं छलयितुं सुरूपी भुवि संस्थितः ॥ ३७

इत्युक्त्या वचनं मन्त्री मन्नस्तं रक्षसात्मजम् ।

पबन्धोल्लिख्य वसुधा सकुशेनाथ पाणिना ॥ ३८

एतस्मिन्नन्तरे प्राप्ता सूर्पाक्षी विनमालकम् ।

अन्तर्धानगता भूमौ चिक्षेप गृहदूरतः ॥ ३९

तंक्षिप्तमा जग्राह कोशकारः स्वक सुतम् ।

सा चाभ्येत्य ग्रहीतुं स्वं नाशकद् राक्षसी सुतम् ॥ ४०

इतश्वेतच विभ्रष्टा सा भर्तारमुपागमत् ।

कथयामास यद् वृत्तं स्वद्विजात्मजहारिणम् ॥ ४१

एवं गवायां राक्षस्यां ब्राह्मणेन महात्मना ।

स राक्षसशिशुनमन् मायायै विनिवेदितः ।। ४२

स चात्मतनयः पित्रा कपिलायाः सवत्सयाः।

दध्ना संयोजितोऽत्यर्थ धीरेयोक्षुरसेन च ।। ४३

द्वावेव वर्धिती पालौ संजातौ समवार्षिको

पित्रा च कृतनामानौ निशाकरदिवाकरौ ॥ ४४

नैशाचरिर्दिवाकीर्तिनिशाकीर्तिः स्वपुत्रकः ।

तयोश्चकार विनोऽसौ व्रतबन्धक्रियां ऋमात् ॥ ४५

हे मुन्दरी! इसलिए शीघ्र इस भयंकर रूप वाले मनुष्य को छोड़ कर तुम किसी दूसरे के पुत्र को लाओ। (३१)

ऐसा कहे जाने पर यह कामचारिणी भयङ्कर राक्षसी आकाश में उड़ती हुई शीघ यहाँ गयी। (३२)

हे प्रदान् । गृह के बाहर छोड़ा गया पह गक्षस पुत्र भी मुरा में अँगूठा डालकर उच पर से रोने लगा, (३३)

चिरकालोपरान्त कन्दन पो सुनकर उस धर्मिया ने पति से कहा-हे मुनिश्रेठ! देखो यह, आपरा पुत्र शब्द करने लगा। (३५)

हरयर पद तपस्विनी गृह के भीतर से पाइर गयी। उस माह्मणश्रेष्ठ ने भी सस शिशु को देसा । (३५)

अपने पुत्र के समान ही रंग रूप आदि से युक्त उस पालक यो देखने के उपरान्त कोशगर मुनि ने इस पर अपनी पत्नी से कहा। (३१)

 हे धर्मिष्ठे। इस पालक के भीतर अवश्य भूत प्रविष्ट हो गया है। हम लोगों को धोखा देने के लिए मुग्दर रूपयाला कोई यहाँ विमान है। (३७)

ऐसा पहपर उप्त मन्त्रयेसा ने हाय में कुशा लेकर मन्त्रों के द्वारा भूमि को रेखादित पर रामसपुर को पाप  दिया।  (३८)

इसी बीच सूक्षी यहाँ पहुँची एवं अदृश्य रूप में गृह से दूर स्थित होकर उसने ब्राह्मण के बालक को पचा। (३६)

फेंफते ही कोमार ने अपने उस पुत्र को परड़ लिया। फिन्तु यह राक्षसी यहाँ जारर अपने पुत्र वो नही पकड़ सकी। (४०)

दोनों ओर से भ्रष्ट होकर यह अपने पति के पास गयी और अपने पुत्र तथा ब्राह्मणपुत्र दोनों के सोने का वृत्तान्त यह सुनाया। (४१)

हे ब्रह्मन्। इस प्रकार राक्षसी के चले जाने पर महात्मा बादाम ने अपनी पत्नी को यह राक्षस-पुत्र दे दिया।

और पिता ने अपने पुत्र को सरसा थपिला गाय के दूध, दधि एवं ईप के रस से पाला-पोसा। (४३)

दोनों ही पाटक यदरर सात वर्ष थे हो गए। पिता ने उन दोनों का नाम निशारा दिपार एस। (४४)

रामसपुत्र का नाम दियारीर्ति और माझग पुत्र का नाम निशाणीति था। प्राग ने मम दोनों का यतोपथीत गार किया। (४२)

अतरन्ये कृते वेदं पपाठासौ दिवाकरः ।

निशाकरो जडतया न पपाठेति नः श्रुतम् ॥ ४६

तं बान्धवाश्च पितरी माता मावा गुरुन्तथा ।

पर्यनिन्दस्तया ये च जना मलयवासिनः ॥ ४७

ततः स पित्रा द्धन क्षिप्तः कृपे निरूदक ।

महाशिला चोपरि व पिधानमबरोपयत् ।। ४८

एवं वितस्तदा कूपे बहुवर्षगणान् स्थितः ।

वत्रास्त्यामलकीगुल्मः पोपाय फलितोऽभवत् ।। ४९

ततो दशसु वर्षेषु समतीतेपु भार्गव ।

तस्य माताऽगमत् कृपं तमन्वं शिलयाचितम् ।। ५०

सा दृष्ट्या निचितं कृपं शिलया गिरिकल्पया।

उच्चैः प्रोवाच केनेयं कृपोपरि शिला कृता ।। ५१

पान्तस्थः स तां पाणी श्रुत्वा मातुनिशाकरः ।

प्राह प्रदत्ता पित्रा मे कृपोपरि शिला स्वियम् ॥ ५२

सानिमीताऽत्रयीत् कोऽसि कूपान्तस्थोऽद्भुतस्वरः ।

सोऽप्याह र पुत्रोऽस्मि निशाकरेवि विश्रुतः ।। ५३

माऽब्रवीत् तनयो मह्यं नाम्ना स्यातो दिवाकरः ।

निशाकरेति नाम्नाऽहो न कश्चित् वनयोऽस्ति मे ॥ ५४

स चाह पूर्यचरितं मातुनिरवशेषतः ।

साश्रुत्यावां शिलांसुभ्रःसमुत्क्षिप्यान्यतोऽक्षिपद ॥५५

सोतीर्य कूपात् भगवन् मातुः पादायचन्दत ।

सा सानुरूपं तनयं दृष्ट्वा स्वजनमप्रतः ॥ ५६

ततस्तमादाय सुतं धर्मिष्ठा पतिमेत्य च ।

कथयामास तत्सर्व चेष्टितं स्वमुतस्य च ॥ ५७

ततोऽन्यपृच्छद् विनोऽत्तौ किमिदं वात कारणम् ।

नोक्तवान् यद्भवान् पूर्व महत्कोतूहलं मम ।। ५८

तच्छ्रुत्वा वचनं धीमान् कोशकारं द्विजोत्तमम् ।

प्राह पुत्रोद्भुतं वाक्यं मातरं पितरं तया ॥ ५९

प्रत-यन्ध हो जाने पर दिवार वेदपाठ करने लगा। किन्तु निशाकर जड़ता के पारण वेदपाठ नहीं करता था। ऐसा हम लोगों ने सुना है। (४६)

माता, पिता, भाई, बन्धुजन, गुरु एवं अन्य मलयवासी लोग उसपी निन्दा करने लगे। (४७)

तदनन्तर पिता ने मुद्ध होकर उसे निर्जल कूप मे फेक दिया एवं उसे एक बड़ी शिला से ढंक दिया। (१४)

इस प्रकार कुएँ मे फेंके जाने पर वह पालक यहाँ अनेक वर्षों तक रहा। उस कुएँ मे एक आँवले का वृक्ष था। उस बालक के पोषण के लिए उसमे फल लग गये। (४६)

हे भार्गव! तदनन्तर दस पर्प बीत जाने पर उसकी माँ उस अन्धकार पूर्ण तथा पत्थर से ढके हुये कुएँ के पास (५०)

उसने पर्वत के समान शिला से ढंके कुएँ को देखकर ऊँचे स्वर से कहा-कुएँ के उपर इस पत्थर को किसने रसा है? (५१)

कुएँ के भीतर अपस्थित पुत्र निशार ने माता की याणी सुनकर कहा-मेरे पिताजी ने फुएँ पर इस शिला को रया है। (५२)

यह अत्यन्त भयभीत होकर बोलीं-कुएँ के भीतर इस अपुर्व पर बाले तुम कौन हो? उसने कहा- में निशाार नामक तुम्हारा पुत्र हूँ। (५३)

उसने रहा-मेरे पुत्र का नाम तो दियाफर है। निशार नाम या मेरा कोई पुत्र नहीं है। (५४)

उस बालक ने माता से अपना समस्त पूर्व वृत्तान्त महा। उसे सुनने के उपरान्त माता ने उस शिला को उठार दूसरी ओर फेक दिया।

हे भगन् । उस बालक ने पुएँ से ऊपर उठकर माता के चरणों की वन्दना की। उसने अपने से उत्पन्न एवं अपने अनुरूप पुन को सम्मुस देसा । (५६)

तदनन्तर उस पुत्र को लेकर मिया पति के समीप गयी एव अपने पुत्र के सम्पूर्ण चरित को उससे (५७)

तदनन्तर उस ब्राह्मण ने पूछा-हे पुत्र! तुम पहले नहीं बोले, इसरा क्या कारण है? मुझे बहुत कुतूहल हो रहा है। (५८)

उस बात को सुनकर बुद्धिमान पुत्र ने ब्राह्मण श्रेष्ठ कोशकार था माता से अद्भुत वचन कहा।

निशाकर उवाच ।

श्रूयतां कारणं तात येन मूकत्वमाश्रिवम् ।

मया जडत्वमनय तथाऽन्धत्वं स्वचक्षुपः ।। ६०

पूर्वमासमहं पिप्र कुले वृन्दारकस्य तु ।

वृपाकपेय तनयो मालागर्भसमद्भयः ॥ ६१

वतः पिता पाठयन्मां शास्त्रं धर्मार्थकामदम् ।

मोक्षशास्त्रं परं तात सेतिहासथुति वथा ॥ ६२

सोऽहं तात महाज्ञानी परावरविशारदः ।

जातो मदान्धस्तैनाहं दुप्फर्मागिरतोऽभवम् ॥ ६३

मदात् समभवल्लोमस्तेन नष्टा प्रगल्भता ।

विषको नाशमगमत् मूर्सभायमुपागतः ।। ६४

मृतभाववया चाय जातः पापरतोस्मबहम्।

परदारपरार्थेषु मतिमें च सदाऽभवत् ॥ ६५

परदाराभिमर्शित्यात् परार्थहरणादपि ।

मृतोऽस्म्युदन्धनेनाह नरकं रोरच गतः ॥ ६६

तस्माद् वर्ष सहस्रान्ते मुक्तशिष्टे वदागसि ।

अरण्ये मृगहा पापः संज्ञातोऽहं मृगाधिपः ॥ ६७

व्याघ्रत्ये मंस्थितस्तात पद्धः पञ्जरगः कृतः ।

नराधिपेन निभुना नीवश्व नगरं निजम् ॥ ६८

पद्धस्य पिञ्जरस्थस्य व्याघत्वेऽधिष्ठितस्य है।

धर्मार्थकामशास्त्राणि प्रत्यभासन्त सर्वश. ॥ ६९

ततो नृपतिशार्दूलो गदापाणिः कदाचन ।

एकनस्त्रपरीधानो नगरान्निर्ययो यहिः ॥ ७०

तस्य भार्या जिता नाम रूपेणाप्रतिमा भुवि ।

मा निर्गते तु रमणे ममान्तिरमुपागता ।। ७१

तां दृष्ट्या ववृधे मां पूर्वाभ्यासान्मनोभवः ।

यव धर्मशास्त्राणि ताहमवदं च साम् ॥ ७२

राजपुत्रि मुकल्याणि नववीयनशालिनि ।

चित्तं हरमि मे भीरु कोकिला ध्वनिना यथा ॥ ७३

सा मदचनमाकये प्रोवाच तनुमध्यमा ।

निशाकर ने कहा-हे निष्पाप पिता ! मेरे द्वारा मूक्ता, जड़ता एवं अपने नेत्रों के अन्यत्य का आभय यरने का पारण मुनिये। (६०)

विप्र में पहले वृन्दारफ (सम्मानिन)श मे माला के गर्भ से उत्पन्न पापि का पुत्र था। (६१)

हे सार। पिता ने मुझे धर्म, अर्थ और पाम की सिद्धि ऐने याने ज्ञान सया इतिहास और वेद महित मोपदायक शासन को पढ़ाया। (६२)

है तात। में महासानी तपास मान और परलोक पान में विशारद था। रासे में अपार से अन्धा दापर दुपर्म में प्रवृत्त हो गया। (६२)

मद से मुहारोम हुआ। उससे मेरी प्रगामा नष्ट होगपी। पिफ पाना हो गया जिसमे में मह हो गया। (६४)

गहना ये पार पापी पन गया। मेरा मा गदा गरे को एप दूसरे के पन में आग रहने म्यगा। (६0)

पाकी के माप मग परत एवं परा पाल परने में पार न होने पर मैं मर पर शैल मे गया।

पर सहस पर्व के उपरान्त भोग से अपशिष्ट प्रस पाप के पारण में पशुपाती पापी व्यास दोपर अरण्य में उत्पन्न हुआ। (६७)

दे तात। पर प्रभाशयुक्त राजा ने व्याघ्रयोनि में स्थित मुझे पौध पर पिजद मे डाल दिया एवं अपने नगर मेहे गया। (६८)

व्यायोनिमात, पन्धन प्रस्त ण्य पिअरस्थ मुश समरन धर्म, अर्थ एप पाम सम्बन्धी शस्त्र प्रतिभासित हो रहे थे। (६९)

तदनन्तर यह घेष्ट राजा विसी ममय दाय में गदा रिये एम पाप धारण परमार से यादर पला गया। (७)

पृथ्वी में अप्रनिम स्प पारी उसयी जिना नामर भाषां धी। पनि पाएर जाने पर पद मेरे समीप आयी।

 उसे देखकर पूर्वाभ्यास में पारण धर्मरामों पे शान की वृद्धि की भानि मेरे मन में काम की वृद्धि हुई। सदनकर मैंने उमारे करा- (७२)

भीर गुपयागी पीयनसनी मी! तुम मेरा पिरानी प्रारती हो जो पोति अपनी ध्यान योगी के पित्त राज परती है।

पर मुन्दरी ने मेरा पपन गुनकर फा- पाम !

कथमेवावयोर्व्याघ्र रतियोगमपेप्यति ॥ ७४

ततोऽहमब्रुवं तात राजपुत्री सुमध्यमाम् ।

द्वारमुद्घाटयस्वाथ निर्गमिष्यामि सत्वरम् ।। ७५

साऽप्ययत्रवीद् दिवा व्याघ्र लोकोऽयं परिपश्यति ।

रात्राउद्घोटयिष्याम ततो रस्याच स्वेच्छया ॥७६

तामेवाहमयोचं ये कालक्षेपेऽहमक्षमः |

तस्मादुद्घाटय द्वारं मा बन्धाच विमोचय ।। ७७

ततः सा पीयरश्रोणी द्वारमुद्घाटयन्मने ।

उद्घाटिते ततो द्वारे निर्गतोऽहं पहिः क्षणात् ।। ७८

पाशानि निगडादीनि छिनानि हि पलान्मया ।

सा गृहीता च नृपतेर्भार्या रमितुमिच्छता ।। ७९

ततो दृष्टोऽस्मि नृपते त्यैरतुलविक्रमः ।

शस्त्रहस्तैः सर्वतश्च तैरहं परिचेष्टित ॥ ८०

महापाशै. शृङ्सलाभिः समाहत्य च मुद्गरैः ।

वध्यमानोऽवमहं मा मा हिंसध्वमाकुलाः ॥ ८१

ते मद्वचनमाकर्ण्य मत्यैव रजनीचरम् ।

दृढं वृक्षे समुद्रध्य घातयन्त तपोधन ॥ ८२

भयो गतव नरकं परदारनिपेवणात् ।

मुक्तो वर्षसहस्रान्ते जातोऽहं श्वेतगर्दभः ॥ ८३

ब्राह्मणस्याग्निवेश्यस्य गेहे बहुकलत्रिणः ।

तत्रापि सर्वविज्ञानं प्रत्यमासत् ततो मम ॥ ८४

उपवाह्यः कृतश्चास्मि द्विजयोपिद्भिरादरात् ।

एकदा नाराष्ट्रीया भार्या तस्याग्रजन्मनः ।। ८५

चिमतिर्नामतः रयाता गन्तुमैच्छद् गृह पितुः ।

तामुवाच पतिर्गच्छ आरय श्वेतगर्दभम् ॥ ८६

मासेनागमनं कार्य न स्थेयं परतस्ततः ।

इत्येमुक्ता सा मा तन्वी मामधिरह्य च ॥ ८७

पन्धनादवमुच्याथ जगाम सरिता मुने ।

ततोऽर्धपथि सा तन्वी मत्पृष्ठादवरुह्य वै ।। ८८

अवतीर्णा नदी स्नातुं स्वरूपा चावाससा ।

हम दोनों का सम्भोग कैसे सम्भय है? (७४)

हे तात । तदनन्तर मैंने उस सुन्दरी राजपुत्री से कहा- तुम अभी पिजड़े का द्वार खोलो, में शीघ्र याहर निकल आऊँगा।

उसने कहा-हे व्याघ्र । दिन में लोग देखेंगे। रात्रि मे खोलूँगी, तब इच्छानुसार दोनों बिहार करेंगे। (७६)

मैंने पुन उससे रहा देर धरने में मैं असमर्थ हूँ। अत द्वार सोरो और मुझे पन्धन से मुक्त करो। (७७)

तदनन्तर उस सुन्दरी ने द्वार सोल दिया। द्वार सुलने पर मैं क्षणमान में बाहर निकला।  (७८)

मैंने बलपूर्वक वेडी आदि बन्धनों को तोड डाला और उस राजा की पत्नी को रमण करने की इच्छा से पकड़ लिया। (७)

तदनन्तर राजा के अतुल पराक्रमशाली अनुचरों ने मुझे देखा और हाथ मे शस्त्र लेकर उन लोगों ने मुझे चारों ओर से घेर लिया। (८०)

मोटी रस्सियों और साँकलों से घाँधार उन लोगों ने मुझे मुद्गरों से बहुत पीटा। मारे जाते समय मैंने उनसे कहा-तुम लोग मुझ मत मारो। (८०)

हे तपोधन। मेरा वचन सुनकर उन लोगो ने मुझे राक्षस समभा और वृक्ष मे कसकर बाँध कर मार डाला। (८२)

परस्त्री सेवन के कारण पुन मैं नरक मे गया। सहस्र वर्ष के उपरान्त मुक्त होने पर मैं श्वेतगर्दभ हुआ। (८३)

उस अवस्था मे मैं अनेक स्त्रियों यारे अग्निवेश्य नामर प्राह्मण के घर में रहता था। वहाँ भी पूर्वजन्मार्जित समस्त ज्ञान मुझे प्रतिभासित हो रहे थे। (५४)

ब्राह्मण के घर की स्त्रियों ने मुझे आदर से सवारी के कार्य में लगाया। एक समय उस ब्राह्मण की नवराष्ट्र देशीय विमति नामक पत्नी अपने पिता के घर जाने के लिए उत्सुक हुई। उसके पति ने उससे कहा---इस श्वेत गदहे पर आरूढ होकर चली जाओ। (८५-८६)

एक महीने के भीतर चली आना। उससे अधिक समय तक न रहना। पति पे ऐसा कहने पर वह सुन्दरी मेरे ऊपर सवार हुई।

हे मुने। बन्धन खोलकर वह तुरन्त चल पड़ी। तदनन्तर आधे मार्ग मे यह सुन्दरी मेरी पीठ से उतरकर नदी में नहाने के लिए उतरी। भीगे यस्त्र मे होने से

साङ्गोपाङ्गां रूपरतीं दृष्ट्वा तामहमाद्रवम् ॥ ८९

मया चाभिट्ठवा तूर्ण पतिता थियीतले ।

वस्यामुपरि भो तात पतितोऽहं भृशातरः ॥ ९०

यो मानुसृष्टेन नृणा तदनुमारिणा ।

प्रोस्थिप्य पष्टिं मां प्रान् ममाधापन् वरान्चित. ॥ ९१

वद् भयाव वा परित्यज्य प्रद्रुतो दधिणामुसः ।

ततोऽभिव्यतम्नृण सलीनरसना मने ॥ ९२

ममासक्ता वंशगुल्मे दुमोक्ष प्राणनाशने ।

तपासक्तम्य पड़रानान्ममा जीवितस्यः ॥ ९३

गतोऽस्मि नरकं भूयस्तम्मान्मुक्तोऽयं शुकः ।

महारण्ये तया पद्. शररेण दुरात्मना ॥ ९४

परे सिप्प विकीवो वणियपुत्राय शालिने ।

सेनाप्यन्तःपुरवरे युवतीनां समीपत. ॥ ९५

शन्दशाम्प्रविदित्येव दोपन्नत्याम्धितः ।

त्रासतस्तर यस्ता ओदनाम्युफलादिभिः ।। ९६

भक्ष्येय दाडिमफल. पुष्णन्त्यहरह. पितः ।

कदाचित् पमपत्राधी श्यामा पीनपयोधरा ॥ ९७

सुश्रोणी तनुमभ्या च वणिक्वप्रिया शुभा।

नाम्ना चन्द्रायली नाम समुद्घाट्याथ परम् ।। ९८

मां जग्राह सुचार्यश्री कराभ्यां चार हामिनी ।

चमारोपरि पीनाम्यां स्तनाम्पा सा हि मां ततः ॥९९

ततोऽहं कृतवान् भावं तम्यां मिलमितुं प्लवन् ।

वतोऽनुप्लपवम्ता हारे मर्यटवन्धनम् ॥ १००

पद्धोऽहं पापमंयुक्तो मृतश्च तदनन्तरम् ।

भूयोऽपि नरकं घोरं प्रपन्नोऽस्मि मुदुर्मतिः ॥ १०१

तम्माचाहं वृपत्वं ये गतवाण्डालपकणे ।

स चैकदा मा शरट नियोज्य स्वां विलामिनीम् ॥१०२

समारोप्य महातेजा गन्तुं कृतमतिर्वनम् ।

ततोऽग्रतः म चण्डालो गतम्गाम्य पृष्टतः ।। १०३

गायन्ती याति तच्छुत्या जातोऽहं व्यधितेन्द्रियः।

पृष्टवस्तु समालोक्य विपर्यस्तस्तथोत्प्टतः ॥ १०४

पतितो भूमिमगमम् वद क्षणविश्मात् ।

उसका स्प स्पष्ट दिमाई पड़ा। इसे अगोपांगों सहित रूपपती देगार में इस पर दोड़ा ।

 मेरे पिटने पर पद पाल गयी पर गिर पड़ी। है तान । मैं भरपधिर आतुर दोसर सर उपर गिर (९०)

मन । स्यामी पं आदेश में उमस्त्री पंपो थाने या अपरने मुझे देगरिया और ठार पद पैग में मेरी और दीप पका।

इमामय में मनी को दोहार में मी दलिपी मेरमा। मुने। पनी दो मोरगानी योग पीपार यिस्ट हामी मेगगी। परी ६गा हुआ मैं रा प दाद (०२-९३)

मुंपुन मार  सना का यह मे मुहर मेरी मदन भर में रिदुरामा पा ने सुनिया

पिच गार (नाने मु) मा परि पुत्र परिवाम में पुरायो निार गुमाया पर वासा  नितिन पाने गमप से गुस्सा गया।

प्रतिदिन मुझे पापर, उल तमा अनार के पग के मोजन से पुट करने लगी। समय यणिर पुत्र पी फमन्दल मुल्प ने यो पारी यामा, विशाल स्तनों नया मुन्दर जपन य क्षीगाट पाली कल्याणी पन्द्रापली गामरप्रिया ने पिजड़े को संता।

उस पारदापिनी मुन्दरी में गुने देना दापों में से लिंग और अपने दोनों स्तनों पर मुगगरिया (९९)

उमरे दाद मैंने पन्द्रारी के माप विहार परने पर भार प्राट पिा। तय पापागर में घूमना सा उमरे हार में मांट पन्धन पी भानि धार र गा में पुन अरयम पापयुदने पं पारत पर मरर में गया।

मानगर में पेट र साराक पर में पाया। मोहनदिन मुरे गाड़ी में शरमा गादी पर मागं पाया गपा में जाने की  पर मदमी पारस भाग पर मर पद पन्य। नमुना  पित होगी। मैंने पोरेम पर देश भर

बात भूमि पनि पर     

पोरने मुपद एयास्मि पश्चत्वमगमं ततः ॥१०५

भ्यो निमग्नो नरके दशवर्षशतान्यपि ।

अवस्ता गृह जावस्त्यहं जातिमनुस्मरन् ।। १०६ ।

सावन्त्येयाय जन्मानि स्मरामि चानुपूर्वशः।

पूर्वाभ्यासांग शास्त्राणि पन्धन चौगम्ममा

सदहं जातविमानो नागरिप्पे कथंचन

पापानि पोररूपाणि मनसा सर्मणा गिरामद

शुभ यायशुमायापि सान्या शास्त्रजीविका।।

पन्धनं या यपो पाऽपि पूर्णम्यारोन जायते ।।-१०९

जाति यदा पीरिकी तु स्मरते वास मानयः

तदा ग तेम्य पापेभ्यो निश्चि हि करोति ये ॥११॥

तम्माद् 'गमिप्ये 'शुभवर्धनाय

पापक्षपापाय मुने सरयम् ।'

भवान् दिवाकी तिमि मुत्रं

गाईस्थ्यधर्म पिनियोजयस्य || १११

बलिरुवार

इत्यमुपस्या स निशायरस्तदा

प्रणम्य मातापितरी मह ।

जगाम पुण्यं' मदनं सरारेः

रुयातं यदाश्रममाघमीयम् ॥ ११२

एवं पुराम्यासरवस्य.. घुमो

सपन्तदानाप्पपनादिकानि

तरमाग मूर्य-द्विजार्यये ममा

अभ्यस्तमासीमनु ने प्रीमि ॥ ११३

दानं तपो याम्ययनं महर्षे

महापातकमप्रिदादम् ।

सानानि वायसना, हि पूर्व

भयन्ति धमार्थयामि नाथ ॥ ११४,

इलस्त्य उवाच ।

इत्येवमुक्त्या पलपान ग शुध

देश्येश्वरः सं गुरुमीशिवारम् ।

प्यास्तदान मधुकैटमा

नारायणं चक्रगदासिपाणिम् ॥ ११५

इति श्रीवामनपुराणे चतुषष्टितमोध्याय।।

ससी में भरपन्न पलाने से में मर गया।

में पुन साहस प पर्यन नरफ में पदारहा। यहाँ । से में अपने पूर्व जन्म पा स्मरण करता हुआ आपरे गृह में रपम हुआ हूँ। (१०६)

मैं भाजही जन्मों का मन मरण कर रहा है। पूर्व अम्गामे मुरगानों थान तथा पायन हिरा। मा नो दोपर में मन, कर्म और पानी में भी पर पाररमो पाधापरणनदीपा।

शुभ, भाभ, पराभ्याप, शारीपिरा धन पा पर पूर्व अम्पास से ही दोन है। सा मनुष्य अप अफ पूर्व जाम पर रोमानो याद का पापो मेरमा।  जामुने! एमट पाए लिए मेरा में पानी बार म गुर सि को पाप धर्म में ।

बलि ने पदा- मनि । गा परने के उपराम मागपिता को प्रणाम पर यह निर भगगन नारायण कं भेष्ठ गुपियान पवित्र नियास परिकामा में (११२)

मी प्रणा पूपाभ्यामया मनुष्य प दान एक अध्ययन मादिगार होने हैं। निजपर! सी में निगरसे में आप अपने पूर्व अभ्यास के सध्य रे  पला गया।

रमाए। दार, तर, अम्पका, पोरी, सापानअग्निाद. मान, पा, अर्थ पर सभी पूर्वजन्मों में दापस । (११४)

पुरमाने-बापा सार साने गुरु और निपामर मा राप्रपुनरम के माया पानामा-गरमपारी नारागरा पान कराने लगा।

श्रीवामनपुराण में चौसठवाँ अध्याय समाप्त।।