नमुचिवध, शुम्भनिशुम्भ का वृत्तान्त- शुम्भ द्वारा देवी के यहाँ दूतसंप्रेषण दूत का देवी से सदेश-कथन, धूम्रलोचन-वध, देवी का चण्ड मुण्ड के साथ युद्ध, काली द्वारा असुरसैन्य का विनाश, चण्डमारी का चण्डवध के लिए उद्योग तथा चण्डमुण्ड का वध

पुलस्त्य उवाच ।

कश्यपस्य दनुर्नाम भार्यासीद् द्विजसत्तम ।

तस्याः पुत्रत्रयं चामीत् सहस्राक्षाद् बलाधिकम् । १

ज्येष्ठ शुम्भ इति ख्यातो निशुम्भश्चापरोऽसुरः ।

तृतीयो नमुचिर्नाम महाबलसमन्वितः ॥ २

योऽसौ नमुचिरित्येयं ख्यातो दनुसुतोऽसुरः।

तं हन्तुमिच्छति हरिः प्रगृह्य कुलिशं को ॥ ३

त्रिदिवेशं समायान्तं नमुचिस्तन यादथ ।

प्रविवेश स्थं भानोस्ततो नाशकदच्युतः ॥ ४

सस्तेनाथ समयं चक्रे सह महात्मना।

अवध्यत्वं वरं पादाच्छस्पैरस्त्रैश्च नारद ॥५

ततोऽवध्यत्वमाशाय शस्त्रादस्त्राच्च नारद ।

संत्यज्य भास्कररथं पातालमुपयादय ॥ ६

स निमजन्नपि जले सामुद्रं फेनमुत्तमम् ।

ददृशे दानवपतिस्त प्रगृह्येदमब्रवीत् ॥ ७

यदुक्तं देवपतिना वासयेन यचोऽस्तु तत् ।

से शुम्भ और निशुम्भ नामक दो महान् दैत्यों का संहार किया था।

मृडानी जिस प्रकार पर्वत से उत्पन्न हुई थी उस शुभ आख्यान को मैंने तुमसे कहा । पर्वतनन्दिनी का यह आख्यान स्वर्ग एव यश को देने वाला, अघहारी तथा ओजस्वी है। (७४)

श्रीवामनपुराण में षठाइसवाँ अध्याय समाप्त ॥२८॥

पुलस्त्य ने कहा-हे हिजसत्तम | कश्यप की दनु नाम की पत्नी थी। उसे इन्द्र से अधिक बल वाले तीन | (१)

उनमें घड़े का नाम शुम्भ, मझले का नाम निशुम्भ, और महाबलवान तृतीय पुत्र का नाम नमुचि (२)

हाथ में यक्ष धारण कर इन्द्र ने नमुचि नाम से प्रसिद्ध नुपुन असुर को मारना चाहा। (३)

तदनन्तर इन्द्र को आसे देखकर उनके भय से नमुचि सूर्य के रथ में प्रविष्ट हो गया। इससे इन्द्र उसे मार

न सके। (४)

हे नारद! तदुपरान्त महात्मा इन्द्र ने उससे सन्धि कर लिया और उसे अस्त्र शस्त्रों से अवश्य होने का वर दिया। (५)

हे नारद । तदनन्तर अपने को अस्त्र शस्त्रों से अवध्य हुआ जानकर वह असुर सूर्य के रथ को छोड़कर पाताल चला गया।

उस दानरपति ने जल में स्नान करते हुए समुद्र के उत्तम फेन को देखा और उसे ग्रहण कर यह वचन कहा-

देवराज इन्द्र ने जो बचन कहा यह सफल हो । यह

अयं स्पृशतु मां फेनः कराभ्यां गृह्य दानयः ॥ ८

सुखनासाक्षिकर्णादीन् संममा यधेच्छया ।

तस्मिञ्चमोऽसृजद् वज्रमन्तर्हितमपीश्वरः॥९

तेनासौ भग्ननासास्यः पपात च ममार च ।

समये च तथा नष्टे ब्रह्महत्याऽस्पृशद्धरिम् ।। १०

स वै तीर्थ समासाद्य स्नातः पापादमुच्यत ।

ततोऽस्य प्रातरौ वीरौ क्रुद्धौ शुम्भनिशुम्भको ॥ ११

उद्योगं सुमहत्कृत्वा सुरान् बाधितुमागती।

सुरास्तेऽपि सहस्राक्षं पुरस्कृत्य विनिर्ययुः ॥ १२

जितास्त्वाक्रम्य दैत्याभ्यां सरला. सपदानुगाः ।

शक्रस्याहृत्य च गजं याम्यं च महिपं बलात् ।। १३

वरुणस्य मणिच्छत्रं गदां वै मास्तस्य च ।

निधयः पद्मशहाचा हतास्त्वाकम्य दानः ॥ १४

त्रैलोक्यं वशगं चास्ते ताभ्यां नारद सर्वतः ।

तदाजग्मुर्महीपृष्ठं ददृशुस्ते महासुरम् ॥ १५

रक्तबीजमयोचुस्ते को भवानिति सोऽब्रवीत् ।

स चाह दैत्योऽस्मि विमो सचियो महिपरय तु ।। १६

रक्तनीजेति विख्यातो महावीयों महामुजः ।

अमात्यो रुचिरौ वीरौ चण्डमुण्डाविति श्रुतौ ।। १७

तावास्तां सलिले मग्नौ भयाद् देव्या महाभुजौ ।

यस्त्यासीत् प्रभुरस्माकं महिपो नाम दानवः ॥ १८

निहतः स महादेव्या विन्ध्यशैले सुविस्तृते ।

भवन्तौ कस्य वनयो को वा नाम्ना परिश्रुती ।

किंवीयो फिप्रभावौ च एतच्छंसितुमर्हथः ।। १९

शुम्भनिशुम्भाचतुः।                                          

अहं शुंभ इति रयातो दनोः पुत्रस्तपौरसः ।

निशुम्भोऽयं मम भ्राता कनीयान शत्रुपूणहा ॥ २०

अनेन पहुशो देवाः सेन्द्रस्द्रदिवाकराः ।

समेत्य निर्जिता वीरा येऽन्ये च बलवत्तराः ॥ २१

तदुच्यता कया दैत्यो निहतो महिपामुः।

फेन मेरा स्पर्श करे। ऐसा कहकर वह दानव दोनों हाथों से फेन लेकर अपनी इच्छा के अनुसार उससे अपने मुख, नाक और फर्ण आदि पा मार्जन करने लगा। उस (फेन) में इन्द्र देव ने छिपे हुए बम की सष्टि की।

उससे नाक और मुस टूट जाने से वह गिर पड़ा और मर गया। प्रतिज्ञा के टूट जाने पर इन्द्र को ब्रह्महत्या का पाप लगा। (१०)

वे तीथों में जाकर स्नान करने से पापमुक्त हुए। तदनन्तर गुम्भ और निशुम्भ नामक उसके दो घर भाई अत्यन्त कुद्ध हुए। (११)

वे दोनों महान् उद्योग पर देवताओं को मारने के लिए आये। वे सभी देवता भी इन्द्र को आगे कर निकल (१२)

उन दोनों दैत्यों ने आक्रमण कर सेना और अनुचरों के साथ देवताओं को हरा दिया। इन्द्र के हाथी, यम के महिप, वरुण के मणिमय छन, वायु की गदा तथा पद्मशङ्खादि निधियों को भी दानवों ने आक्रमण कर हरण कर लिया। (१३-१४)

हे नारद । उन दोनों ने तीनों लोकों को वशीभूत कर लिया। उसके बाद वे सभी भूतल पर आये और रक्तबीज नामक एक महान असुर को देख कर उससे पूछे-आप कौन है ? उसने उत्तर दिया-हे विभो। मैं महिषासुर का मन्त्री एक दैत्य हूँ। (१५-१६)

में रक्तबीज नाम से प्रसिद्ध महापराक्रमी व विशाल भुजाओं वाला (दैत्य) हूँ। घण्ड और मुण्ड नाम से प्रसिद्ध (महिप) के सुन्दर वीर महामाहु दो अमात्य देवी के भय से जल मे मग्न हो गये हैं। महादेवी ने सुविस्तृत विभ्यपर्वत पर हमारे स्वामी महिष नामक दानव को मार डाला है। आप मुझे बता कि आप किसक पुत्र है १ तथा आय किस नाम से प्रसिद्ध है? आप मे कितना पराक्रम एव प्रभाव है?

शुम्भ और निशम्भ ने कहा-मैं दनु का औरस पुन शुम्भ नाम से विख्यात हूँ। यह मेरा छोटा भाई निशुम्भ शत्रु समूह का नाशक है। (२०)

इस निशुम्भ ने इन्द्र, रुद्र, दिवाकर आदि देवताओं तथा अन्य अनेक बल्वान वीरों को बहुत बार आक्रमण कर हरा दिया है। (२१)

अब बताओ कि किस स्त्री ने दैत्य महिषासुर को

यावत्तां घातयिष्यावः स्वमैन्यपरिवारितौ ॥ २२

इत्यं तयोस्तु वदतोर्नर्मदायास्तटे मुने ।

जलवासाद् विनिष्क्रान्तो चण्डमुण्डौ च दानवौ ।। २३

ततोऽभ्येत्यासुरश्रेष्ठौ रक्तबीजं समाश्रितो ।

ऊचतुर्वचनं श्लक्ष्णं कोऽयं वा पुरस्सरः ॥ २४

स चोभौ प्राह दैत्योऽसौ शुम्भो नाम सुरार्दनः ।

कनीयानस्य च भ्राता द्वितीयो हि निशुम्भकः ।। २५

एतायाश्रित्य ता दुष्टां महिपनी न संशयः ।

अहं विवाहयिष्यामि रत्नभूतां जगत्त्रये ।। २६

                 चण्ड उवाच।                                   

न सम्यगुक्त भवता रत्नाहोऽसि न साम्प्रतम् ।

यः प्रभुः स्यात्स रत्नाह रतस्माच्छुम्भाय योज्यताम् ॥२७

सदाचचक्षे शुम्भाय निशुम्भाय च कौशिकीम् ।

भूयोऽपि तद्विधां जाता कौशिफी रूपशालिनीम् ।। २८

ततः शुम्भो निजं दुतं सुग्रीवं नाम दानवम् ।

दैत्यं च पयामास महाशं विन्ध्यवासिनीम् ॥ २९

से गत्वा तद्वचः श्रुत्वा देव्यागत्य महासुरः।

निशुम्भशुम्मावाहेदं मन्युनाभिपरिप्लुतः ।। ३०

सुग्रीव उवाच ।

युवयोर्वचनाद् देवों प्रदेष्टुं दैत्यनायकौ ।

गतवानहमयेन तामहं वाक्यमब्रुवम् ॥ ३१

यथा शुम्भोऽतिविर यातः ककुनी दानवेष्वपि ।

से त्वां प्राह महाभागे प्रभुरस्मि जगत्त्रये ॥ ३२

यानि स्वर्गे महीपृष्ठे पाताले चापि सुन्दरि ।

रत्नानि सन्ति तापन्ति मम वेश्मनि नित्यशः ।। ३३

स्वमुक्ता चण्डमुण्डाभ्यां रत्नभूता कृशोदरि ।

तस्माद् भजस्यमा वात्वं निशुम्भंवा ममानुजम् ॥ ३४

सा चाह मां विहसती भृणु सुग्रीव मद्वचः।

सत्यमुक्तं त्रिलोकेशः शुम्भो रत्नाह एव च ॥ ३५

कि त्वरित दुर्विनीताया हृदये मे मनोरथः ।

मारा है । हम दोनों अपने सैन्यों को साथ लेकर उस स्त्री का सहार करेंगे। (२२)

हे मुनि । नर्मदा तट पर इस प्रकार दोनों के बात करते समय चण्ड और मुण्ड नामक दोनों दानव जल से निकल आये। (२३)

उन दोनों ने रक्तबीज के पास जाकर मधुर शब्दों मे पूछ। तुम्हारे सम्मुस यह कौन खड़ा है ? उसने उन दोनों से कहा-यह देवताओं को कष्ट देने वाला शुम्भ नामक दैत्य है एवं यह दूसरा निशुम्भ नामका इसका छोटा भाई है। (२४-२५)

में निस्सन्देह इन दोनों की सहायता से त्रिलोक मे रत्नस्वरूपा तथा महिषासुर का नाश करने वाली उस दुष्टा से विवाह करूंगा। (२६)

चण्ड ने कहा- आप ने उचित नहीं कहा। आप अभी रन के योग्य नहीं है। राजा ही रत्न के योग्य होता है। अत शुम्भ का ही इससे संयुक्त करो। (२७)

तदनन्तर उन्होंने शुम्भ और निशुम्भ से उस प्रकार उत्पन्न स्वरूपवती कौशिकी कावर्णन दिया। (२८)

तब शुम्भ ने अपने दूत सुप्रीव नामक दानव को विभ्य. पासिनी के पास भेजा। (२९)

वह महासुर सुग्रीव यहाँ गया एव देवी की बात सुनार मोघ से जलते हुए उसने आर निशुम्भ और शुम्भ से कहा। (३०)

सुग्रीव ने कहा-हे दैत्यनायको। आप लोगों के कथनानुसार देवी से कहने के लिये मैं गया था। मैंने अभी जार उससे कहा-

हे भाग्यशालिनी। अतिविख्यात दानवश्रेष्ठ शुम्भ ने इमसे कहा है कि में तीनों लोकों पा स्वामी हूँ। सुन्दरी। स्वर्ग, पृथ्वी एव पाताल के सभी रत्न मेरे गृह मे नित्य रहते हैं। हे कृशोदरी। चण्ह और मुण्ड ने तुम्हें रलवरुपा बतलाया है। अत तुम मुझे या मेरे अनुज निशुम्भ का रण करो। (३२-३४)

हंसती हुई उसने मुझसे कहा- हे सुग्रीव ! मेरी घात सुनो। तुमने यह सत्य कहा है कि तीनों लोकों का स्पामी शुम्भ रत्न के योग्य हैं। (३५)

किन्तु हे महासुर । मुझ दुर्विनीता के हृदय का यह मनोरथ है कि युद्ध में मुझे जीतने याला ही मेरा पति

अयं स्पृशतु मां फेनः कराभ्यां गृह्य दानवः ॥८

मुखनासाक्षिकर्णादीन् संममा यथेच्छया।

वस्मिञ्छनोऽसृजद् वज्रमन्तहितमपीश्वरः ।। ९

तेनासौ भग्ननासास्यः पपात च ममार च ।

समये च तथा नष्टे ब्रह्महत्याऽस्पृशद्धरिम् ॥ १०

सबै तीर्थ समासाद्य स्नातः पापादमुच्यत ।

ततोऽस्य भ्रातरौ वीरौ क्रुद्धौ शुम्भनिशुम्भकौ ॥ ११

उद्योगं सुमहत्कृत्या सुरान् बाधितुमागतौ ।

सुरास्तेऽपि सहस्राक्षं पुरस्कृत्य विनिर्ययुः ।। १२

जितास्त्याक्रम्य दैत्याभ्यां सवलाः सपदानुगाः ।

शक्रस्याहत्य च गजं याम्यं च महिषं वलात् ।। १३

वरुणस्य मणिच्छत्रं गदां वै मारुतस्य च ।

निधयः पद्मशह्वाया हुतास्त्वाक्रम्य दानः ।। १४

त्रैलोक्यं वशगं चास्ते ताभ्यां नारद सर्वतः ।

तदानग्मुर्महीपृष्ठं ददृशुस्ते महासुरम् ।। १५

रक्तबीजमथोचुस्ते को भवानिति सोऽब्रवीत् ।

स चाह दैत्योऽस्मि विमो सचियो महिपस्य तु ।। १६

रक्तबीजेति विख्यातो महावीयों महामुजः ।

अमात्यौ रुचिरौ वीरौ चण्डमुण्डाविति श्रुतौ ॥ १७

वावारतां सलिले मग्नौ भयाद् देव्या महाभुजौ ।

यस्त्वासीत् प्रभुरस्माकं महिपो नाम दानवः ॥ १८

निहतः स महादेव्या विन्ध्यशैले सुविस्तृते ।

भवन्तौ कस्य तनयौ कौ वा नाम्ना परिश्रुतौ ।

किंवीयौं किंप्रभावौ च एतच्छंसितुमर्हथः ।। १९

शुम्भनिशुम्भावूचतुः ।

अहं शुंभ इति ख्यातो दनोः पुत्रस्तचौरसः ।

निशुम्भोऽयं मम भ्राता कनीयान् शत्रुपूगहा ॥ २०

अनेन पहुशो देवाः सेन्द्ररुद्रदिवाकराः ।

 समेत्य निर्जिता वीरा येऽन्ये च बलवत्तराः ॥ २१

तदुच्यतां कया दैत्यो निहतो महिषासुरः।

फेन मेरा स्पर्श करे । ऐसा कहकर वह दानर दोनों हाथों से फेन लेकर अपनी इच्छा के अनुसार उससे अपने मुख, नाक और वर्ण आदि का मार्जन करने लगा। उस (फेन) में इन्द्र देव ने छिपे हुए पत्र की सृष्टि की। (८-९)

उससे नाक और मुख टूट जाने से वह गिर पड़ा और मर गया। प्रतिज्ञा के टूट जाने पर इन्द्र को ब्रह्महत्या का पाप लगा। (१०)

वे तीर्थों में जाकर स्नान करने से पापमुक्त हुए। तदनन्तर शुम्भ और निशुम्भ नामक उसके दो वैर भाई अत्यन्त क्रुद्ध हुए।

वे दोनों महान् उद्योग कर देवताओं को मारने के लिए आये। वे सभी देवता भी इन्द्र को आगे कर निकल पड़े। (१२)

उन दोनों दैत्यों ने आक्रमण पर सेना और अनुचरों के साथ देवताओं को हरा दिया। इन्द्र के हाथी, यम के महिप, वरण के मणिमय छर, वायु की गदा तथा पद्मशतादि निधियों को भी दानवों ने आक्रमण कर हरण कर लिया। (१३-१४)

हे नारद ! उन दोनों ने तीनों लोगों को पशीभूत कर लिया। उसके बाद वे सभी भूतल पर आये और स्तोत्र नामक एक महान असुर को देख कर उससे पूछे-आप कौन है ? उसने उचर दिया-हे विभो ! मैं महिषासुर का मन्त्री एक दैत्य हूँ।(१५-१६)

मैं रक्तवीज नाम से प्रसिद्ध महापराक्रमी वं विशाल भुजाओं वाला (दैत्य) हूँ। चण्ड और मुण्ड नाम से प्रसिद्ध ( महिप) के सुन्दर वीर महाबाहु दो अमात्य देवी के भय से जल मे मग्न हो गये हैं। महादेवी ने सुविस्तृत विन्ध्यपर्वत पर हमारे स्वामी महिप नाम दानव को मार डाला है। आप मुझे बतलाये कि आप किसके पुत्र है । तथा आप किस नाम से प्रसिद्ध है? आप मे कितना पराक्रम एवं प्रभाव है? (१७-१९)

शुम्भ और निशुम्भ ने कहा-मैं दनु पा औरस पुत्र शुम्भ नाम से विख्यात हूँ। यह मेरा छोटा भाई निशुम्भ शत्रुसमूह का नाशक है ।(२0)

इस निशुम्भ ने इन्द्र, रुद्र, दिवारर आदि देवताओं तथा अन्य अनेक बलवान वीरों को बहुत बार आश्मय कर हरा दिया है। अब बतलाओ कि किस स्त्री ने दैत्य महिषासुर ग्रे(२१)

घातपिप्याय. समैन्पपरिवारितौ ।। २२

योस्तु वदतोर्नर्मदायास्वटे मुने।

गद् विनिष्क्रान्ती चण्डमुण्डौ च दानवौ ॥ २३

येत्यासुरश्रेष्ठौ रक्तबीज समाश्रितो।

चन इलक्षण कोऽय तर पुरस्मरः ॥ २४

नौ प्राह दैत्योऽमौ शुम्भो नाम सुरार्दनः ।

नस्य च भ्राता द्वितीयो हि निशुम्भकः ।। २५

श्रित्य ता दुष्टा महिपघ्नी न सशयः ।

वाहयिष्यामि रत्नभूता जगत्त्रये ॥ २६

चण्ड उवाच ।

पगुक्त भवता रत्ना)ऽसि न साम्प्रतम् ।

स्यात्स रत्नाई रतस्माच्छुम्माय योज्यताम्॥२७

वक्षे शुम्भाय निशुम्भाय च कौशिकीम् ।

पि तद्विधा जाता कौशिकी रूपशालिनीम् ।। २८

म्भो निज दूत सुग्रीव नाम दानवम् ।

दैत्यं च प्रेषयामास सकाश विन्ध्यवासिनीम् ॥ २९

स गत्या तद्वचः श्रुत्वा देव्यागत्य महासुरः।

निशुम्भशुम्भावाहेद मन्युनाभिपरिप्लुतः ॥३०

सुग्रीव उवाच ।                                                 

युवयोर्वचनाद् देवी प्रटेष्टुं दैत्यनायको।

गतमानहमद्यैर तामह वाक्यमयम् ।। ३१

यथा शुम्भोऽतिविरयात. ककुझी दानवेष्वपि ।

स त्वा प्राह महाभागे प्रभुरस्मि जगत्त्रये ॥ ३२

यानि स्वर्ग महीपृष्ठे पाताले चापि सुन्दरि ।

रत्नानि सन्ति तापन्ति मम वेश्मनि नित्यशः ॥ ३३

त्वमुक्ता चण्डमुण्डाभ्या रत्नभूता कृशोदरि ।

तस्माद् भजसमा सात्व निशुम्भ वाममानुजम् ॥ ३४

सा चाह मा विहसती भृणु सुग्रीव मद्वचः ।

सत्यमुक्त त्रिलोकेशः शुम्भो रत्नाई एव च ॥ ३५

किं त्नस्ति दुर्दिनीताया हृदये मे मनोरथः ।

है? हम दोनों अपने सैन्यों को साथ लेकर उस सहार करेंगे। (२२)

मुनि । नर्मदा तट पर इस प्रकार दोनों के बात उमय चण्ड और मुण्ड नामक दोनों दानव जल से आये। (२३)

न दोनों ने रक्तबीज के पास जाकर मधुर शब्दों तुम्हारे सम्मुख यह कौन खड़ा है ? उसने उन कहा-यह देवताओं को कष्ट देने वाला शुम्भ दैत्य है एव यह दूसरा निशुम्भ नामका इसका छोटा (२४-२५)

निस्सन्देह इन दोनों की सहायता से निलाक स्वरूपा तथा महिषासुर का नाश करने वाली उस विवाह करूंगा। (२६)

ण्ड ने कहा-आप ने उचित नहीं रहा। आप रत्न के योग्य नहीं है। राना ही रत्न के होता है। अत शुम्भ का ही इससे सयुक्त (२७)

तदनन्तर उन्होंने शुम्भ और निशुम्भ से उस प्रकार स्वरूपवती कौशिकी का वर्णन क्यिा । (२८)

वासिनी के पास भेजा। (२९)

यह महासुर सुप्रीव यहाँ गया एव देवी की बात सुनकर क्रोध से जलते हुए उसने आकर निशुम्भ और शुम्भ से कहा। (३०)

सुप्रीव ने कहा-हे दैत्यनायको। आप लोगों के कथनानुसार देवी से कहने के लिये मैं गया था। मैंने अभी जाकर उससे कहा- (३१)

हे माग्यशालिनी । अतिविरयात दानवनेष्ट शुम्भ ने तुमसे कहा है-कि में तीनों लोकों का सामी हूँ। हे सुदरी। स्वर्ग, पृथ्वी एव पाताल के सभी रत्न मेरे गृह मे नित्य रहते है। हे कृशादरी। चण्ड और मुण्ड ने तुम्हें रत्नस्वरूपा बतलाया है। अत तुम मुझे या मेरे अनुन निशुम्भ का परण क्रो। (३२-३४)

हँसती हुई उसने मुझसे कहा-हे सुप्रीव । मेरी वात सुनो। तुमने यह सत्य कहा है कि तीनों लोकों का स्वामी शुम्भ रन के योग्य हैं। (३५)

किन्तु हे महासुर । मुझ दुविनीता के हृदय का यह

यो मा विजयते युद्धे स भवा स्यान्महासुर ॥ ३६

मया चोक्ताअलिप्ताऽसि यो जयेत् ससुरासुरान् ।

स त्वां कथं न जयते सा त्वमुत्तिष्ठ भामिनी ॥ ३७

साऽथ मा प्राह किं कुर्मि यदनालोचित. कृत.।

मनोरथस्तु तद् गच्छ शुम्भाय व निवेदय ॥ ३८

तयैवमुक्तस्त्वभ्यागा त्वत्सकाशं महासुर ।

सा चाग्निकोटिसदृशी मत्वैवं कुरु यत्क्षमम् ।। ३९

पुलस्त्य उवाच ।

इति सुग्रीयवचन निशम्य स महासुरः ।

प्राह दूरस्थित शुम्मो दानवं धूम्रलोचनम् ।। ४०

शुम्भ उवाच।

धूम्राक्ष गच्छ ता दुष्टा केशाकर्षणविद्वलाम् ।

सापराधा यथा दासी कृत्या शीघ्रमिहानय ।। ४१

यश्चास्याः पक्षकृत् कश्चिद् भविष्यति महानलः ।

स हन्तव्योविचार्यैव यदि हि स्यात् पितामहः।। स एवमुक्तः शुम्भेन धूम्राक्षोक्षौहिणीशतैः।

वृतः पड् भिर्महातेजा विन्धर्य गिरिसृपाद्रवत्।।

स तत्र दृष्ट्वा तां दुगा भ्रान्तदृष्टिरुवाच ह।

एह्रोहि मूढे भर्तारं शुम्भमिच्छस्व कौशिकी।

न चेद् बलाभयिष्यामि केशाकर्पणविहलाम्।।

श्रीदेव्युवाच।

प्रेतितोसीह शुम्भेन बलान्नेतृं हि मां किल।

तत्र किं हावला कुर्याद् येथेच्छसि तथा कुरु।।

पुलस्त्य उवाच।

एवमुक्तो विभावर्या बलवान् धूम्रलोचनः।

समभ्यधावत् त्वरितो गदामादाय वीर्यवान्।।

तमापतन्तं सगद हुकारेणैव कौशिकी।

सचलं भस्मसाच्चके शुष्कमग्निरिवेन्धनम्।।

होगा। (३६)

मैंने कहा-तुम गर्षिता हो गई हो। भला जिसने सभी सुरासरों को जीत लिया है यह तुम्हें क्यों नहीं जीत लेगा । अत हे भामिनी । तुम उठो। (३७)

तदनन्तर उसने मुझसे कहा-मैं क्या करूँ ? विना विचारे मैंने वैसा सकल्प कर लिया है। अत जाकर शुम्भ से मेरी बात कहो। (३८)

अत हे महासुर । उसके ऐसा कहने पर मैं आप के पास आया हूँ। वह अग्निशिखा के समान है। यह जानकर आप जैसा उचित हो वैसा कार्य करें। (३६)

पुलस्त्य ने कहा-सुग्रीव के इस वचन को सुनकर उस महासुर शुम्भ ने दूर मे स्थित धूम्रलोचन दानव से रहा।

शुम्भ ने कहा-हे धूम्राक्ष | तुम जाओ । उस दुष्टा को अपराधिनी दासी की भाँति केश सींचने से व्याकुल बना करशीन यहा लाओ। (४१)

यदि कोई बलशाली उसका पक्ष महण परे तो विना विचार किये तुम उसे मार डालना। चाहे वह ब्रह्मा ही

क्यों न हो।

झुम्भ के ऐसा कहने पर वह महातेजस्वी धूम्राक्ष छ सौ अक्षौहिणी सेना के साथ विन्ध्य पर्वत पर गया।

यहाँ दुर्गा को देखकर उसने भ्रान्त दृष्टि होकर कहा- हे मूढे आओ। कौशिकी। तुम शुम्भ को पखि बनाने की इच्छा करो। अन्यथा केशाकर्षण से व्याकुल कर तुमको में बलपूर्वक ले जाऊँगा।

श्रीदेवी ने कहा- निश्चय ही शुम्भ ने मुझे बलपूर्वक ले जाने केलिए तुम्हे भेजा है। इसमें एक अबला क्या करेगी। तुम जैसा चाहो वैसा करा।

पुलत्य ने कहा- विभावरी(देवी) के ऐसा कहने पर बलवान् एव वीर्यवान् धूमलोचन शीघ्र गदा लेकर दौड़ पड़ा।

कौशिकी  ने गदा लेकर आ रहे उसको हुँकार द्वारा ही सेना सड़ित इस प्रकार भरमसात् कर दिया जैसे अग्नि शुष्क ईधन को जला देता है।

एक वर्स डिग्री सेना पैदल सिपाही घूड़सवार रथी और गजारोही रहते है।

ततो हाहाकृतमभूजगत्यस्मिंश्चराचरे ।

सबलं भस्मसान्नीत कौशिक्या वीक्ष्य दानवम् ॥ ४८

तच शुम्भोऽपि शुभ्राय महच्छन्दमुदीरितम् ।

अयादिदेश बलिनौ चण्डमुण्डौ महासुरौ ॥ ४९

रुरुच पलिनां श्रेष्ठं तथा जग्मुर्मुदान्विताः।

तेषां च सैन्यमतुलं गजाश्वरथसंकुलम् ॥ ५०

समाजगाम महसा यत्रास्ते कोशमंभवा।

तदायान्तं रिपुबलं रष्ट्या कोटिशतावरम् ।। ५१

मिहोद्रवद् धुतसटः पाटयन् दानवान् रणे ।

कांश्चित् करप्रहारेण कांश्चिदास्येन लीलया ॥ ५२

नसरै कांधिदाक्रम्य उरसा प्रममाथ च ।

ते वध्यमानाः मिहेन गिरिकन्दरवासिना ।। ५३

भृतश्च देव्यनुचरैचण्डमुण्डौ समाश्रयन् ।

तावात स्ववलं दृष्ट्या कोपप्रस्फुरिताधरौ ॥ ५४

समाद्रचेतां दुर्गा वै पतङ्गाविध पायकम् ।

तावापतन्तौ रौद्रौ च दृष्ट्वा क्रोधपरिप्लुता । ५५

विशाखां भृकुटी वक्त्रे चकार परमेश्वरी ।

भृकुटीकुटिलाद् देव्या ललाटफलकाद् द्रुतम् ।

काली करालवदना निःसृता योगिनी शुभा ॥ ५६

खट्वाङ्गमादाय करेण रौद्र-

मसिञ्च कालाजनकोशमुग्रम् ।

संशष्कगात्रा रुधिराप्लुताङ्गी

नरेन्द्रमृघ्नी समुदहन्ती ॥ ५७

कांश्चित् सड्गेन चिच्छेद सट्वाङ्गेन परान् रणे ।

न्यपूदयद् भृशं क्रुद्धा सरथाश्वगजान् रिपून ।। १८

चर्माशं मुद्रं च सधनुष्कं मपण्टिकम् ।

कुखरं मह यन्त्रेण प्रचिक्षेप मुसेऽमिका ।। ५९

सचत्रकूवररथं ससारथितु रङ्गमम् ।

समं योधेन बदने क्षिप्य चर्पयतेऽम्बिका ॥ ६०

एक जग्राह केशेषु ग्रीवायामपरं तया ।

पार्दनाक्रम्य चैवान्यं प्रेपयामास मृत्यवे ॥ ६१

ततस्तु तद् यलं देव्या मक्षितं सरलाधिपम् ।

कौशिकी द्वारा बलवान् दानव को सेना सहित भरम किये जाते देसार चराचर संसार मे हाहाकार मच (४८)

शुम्भ ने भी उस महान शब्द को सुना। तदनन्तर उसने चण्ड एव मुण्ड नामक दोनों महान् एव बलवान् असुरों तथा वलयानों में श्रेष्ठ रुरु को आदेश दिया। वे प्रसन्नतापूर्वक चल दिये। हाथी, घोड़ों और स्थ से पूर्ण उनकी अतुल सेना शीघ्र यहाँ पहुँची जहाँ कौशिरी उपस्थित थीं। उस समय सैम्ड़ों शनुसेना को आते देस हिलती हुई सटाओं याला सिंह युद्ध में दानों को विदारित परते हुए दोड़ने लगा। उसने लोला पूर्वक कुछ को हाथ के प्रहार से, कुछ को मुस से, युछ यो नत से एय कुछ को अपनी छाती के प्रहार से व्याकुल पर दिया। गिरिकन्दरवासी सिंह एवं देवी के अनुपरस्वरूप भूतों से मारे जा रहे वे सभी घण्ड-मुण्ड की शरण मे गये । अपनी सेना को आर्च देख उन दोनों के ओठ कोप से प्रस्फुरित होने (१९-५४)

अग्नि की ओर दीदने वाने पतहों के सदृश वे दोनों दत्य देवी की ओर दौड़े। उन दोनों भयङ्कर दानवों को आते देखकर देवी अत्यन्त प्रोधित हुई। (५५)

परमेश्वरी ने मुस में तीन रेसाओ वाली भृकुटि चढ़ायीं । देवी के पुटिल भृकुटियुक्त ललाट पटक से शीघ्र विक्टमुसवाली मङ्गलमयी योगिनी साली निकल आयीं। (५६)

उनके हाथ में भयर सट्वान और कालाअन तुल्य कोश से युक्त उप्र तय्यार थी। उनम शरीर सूसा और रक्त से सना हुआ था तथा उनके गले में राजाओं के शिर की अत्यन्त मुद्ध होर उन्होंने युद्ध में थुछ पो काट डाला और हाथी, रथ एव घोड़ों से युक्त अन्य शत्रुओं को सध्याग से मार डाला। (५८)

तदनन्तर अम्बिका चर्म, अकुश, मुद्गर, धनुष, घटियों और यन्त्र सहित हाथी को अपने मुख में फग्ने थी।

चक्र और यूनर युक्त रथ को सारथी, घोड़े और योद्धा के साथ मुस में डाल कर अम्बिका चनाने लगी। (६०)

उन्होंने किसी को केश पकड़कर, किसी को गला परड़-कर और अन्य रिसी को चरण से प्रहार पर मृत्यु के पास पहुँचा दिया। (६१)

तदनन्तर सेनापति सहित इस सेना को देवी द्वारा भक्षित हुआ देख रुरु दौड़ पड़ा। चण्डी ने स्वय उसे देखा

रुरुर्दृष्ट्या प्रदुद्राव तं चण्डी ददृशे स्वयम् ॥ ६२

आजपानाथ शिरसि सट्वाङ्गेन महासुरम् ।

स पपात हतो भूम्यां छिन्नमूल इव द्रुमः ॥ ६३

ततस्तं पतितं दृष्ट्वा पशोरिव विभावरी।

कोशमुत्कर्तयामास कर्णादिचरणान्तिकम् ॥ ६४

साच कोशं समादाय ववन्ध विमला जटाः ।

एका न बन्धमगमत् तामुत्पाट्याक्षिपद् भुपि ।। ६५

सा जाता सुतरां रौद्री तैलाभ्यक्तशिरोरुहा ।

कृष्णार्धमर्धशुक्लं च धारयन्ती स्वकं वपुः ॥ ६६

साऽब्रवीद् वरमेकं तु मारयामि महासुरम् ।।

तस्या नाम तदा चक्रे चण्डमारीति विश्रुतम् ॥ ६७

प्राह गच्छस्व सुभगे चण्डमुण्डाविहानय ।

स्वयं हि मारयिष्यामि तापानेतुं त्यमर्हसि ॥ ६८

श्रुत्यैवं वचनं देव्याः साऽभ्यद्रवत तानुभौ ।

प्रदुद्रुवतुर्भयानी दिशमाश्रित्य दक्षिणाम् ॥ ६५

ततस्तावपि वेगेन प्राधावत् त्यक्तवाससौ।

साऽधिरह्म महावेगं रासभं गरुडोपमम् ।। ७०

यतो गतौ च तो दैत्यो तत्रैवानुययौ शिया ।

सा ददर्श तदा पौण्ड महिपं वै यमस्य च ॥ ७१

सा तस्योत्पाटयामास विषाणं भुजगाकृतिम् ।

तं प्रगृह्य करेणेव दानवावन्यगाजवात् ।। ७२

तौ चापि भूमि संत्यज्य जग्मतुर्गगनं तदा ।

वेगेनाभिसृता सा च रासमेन महेश्वरी ।। ७३

ततो ददर्श गरुडं पन्नगेन्द्रं चिपादिपुम् ।

कर्कोटकं स दृष्ट्वैव ऊर्वरोमा व्यजायत ।। ७४

भयान्मार्याच गरुडो मांसपिण्डोपमो पभो।

न्यपतस्तस्य पत्राणि रौद्राणि हि पतत्रिणः ।। ७५

खगेन्द्र पत्राण्यादाय नागं कर्कोटकं तथा ।

वेगेनानुसरद् देवी चण्डमुण्डौ भयातुरौ ।। ७६

संप्रामौ च तदा देव्या चण्डमुण्डौ महासुरी ।

और सट्याग से उस महामुर के शिरपर प्रहार क्यिा । यह मरकर जड़ से कटे हुये वृक्ष के सदृश पृथ्वी पर गिर पड़ा।(६२-६३)

देयी ने उसे भूमि पर गिरा हुआ देखकर पशु के सरश उसके पान से पैर तक पा फोश काट लिया। (६४)

उस कोश (चमड़े) को लेकर उन्होंने अपनी यिमल जटाओं को योगा। उनमे एक जटा पाँधी नहीं गयी। उसे सरगढ़ पर एन्होंने धरती पर फेंक दिया। (६५)

यह जटा एक भयवर देवी हो गयी। उसके मरतक के पेश तैलाभ्या थे एवं यह आधा पाला तथा आधा सफेद पर्ण पा शरीर धारण विये हुए थी। (६६)

उसने कहा-मैं एक श्रेष्ठ महामुर यो मारगी। देवी ने सय एसका प्रसिद्ध नाम पण्डमारी रसा। (६७)

देवी ने यहा- मुभगे। तुम जाकर पण्ड और मुण्ट पो यहाँ लाशी। मैं स्वयं हें मारगी। उन्हें साने में तुम समर्थ दो। (६८)

देवी ६ इस कथन को गुनकर पद दौड़ पड़ी। पे दोनों भयातं होफर दक्षिण दिश की ओर भाग गये। (६६)

तब चण्डमारी गरुड के सदृश महावेगयुक्त गर्दभ पर सवार होकर वेग से पस्त्रहीन उन दोनों के पीछे दौड़ी। (७०)

जहाँ वे दोनों देत्य गये उनके पीछे शिवा भी यहाँ गई । उस समय उन्होंने यमराज के पीण्डू नामक महिप को देखा। (७२)

उन्होंने उस महिप के सागर शृङ्ग को उरगड़रिया और उसे हाथ में लेकर वेगपूर्वक दानों के पीछे दौड़ी। (७२)

दोनो दैत्य भूमि छोड़कर आकाश मे पले गये । तप महेश्वरी ने अपने गधे के साथ येगपूर्वक उन दोनों का पीछा किया।

(देवी ने ) सर्पराज करोंटक कोसाने की इच्छा पाने गरुड़ को देसा। (देयो फो) देसने ही उनके रोंगटे सदे हो गये। (७४)

घण्टमारी के भय से गगह मांसपिण्ड के समान 'हो गया । उस पक्षी फे भयर पर गिर गये। (७५) रगेन्द्र पी पांखों तथा करीटक सर्प को लेकर देशी  मपात घण्ट और मुण्ड फे पीय दौड़ी।

तदनन्तर देयी पण्ड और मुण्ड नामह दोनों मदासुरों के पास पहुँच गई हुई उन दोनों को वर्होटक नाग से

यद्धी कर्कोटकेनैव वया विन्ध्यमुपागमत् ॥ ७७

निवेदयित्वा कौशिक्यै कोशमादाय भैरवम् ।

शिरोमिर्दानवेन्द्राणा तायपश्च शोभनैः ।। ७८

कृत्वा स्रजमनौपम्यां चण्डिकायै न्यवेदयत् ।

धर्धरा च मृगेन्द्रस्य चर्मण. सा समार्पयत् ।। ७९

सजमन्यैः सगेन्द्रस्य परैर्मुनि निनध्य च ।

आत्मना सा पपौ पानं रुधिर दानवेष्यपि ॥ ८०

चण्डा वादाय चण्डं च मुण्ड चासुरनायकम् ।

चकार कुपिता दुर्गा विशिरस्को महासुरौ ॥ ८१

तयोरेवाहिना देवी शेखरं शुष्फरेवती।

कृत्या जगाम कौशिक्या. सकाश मार्यया सह ॥ ८२

समेत्य साब्रवीद् देवि गृह्यता शेयरोत्तमः ।

अथितो दैत्यशीर्षाच्या नागराजेन वेष्टितः ॥ ८३

त शेखर शिया गृह्य चण्डाया मूर्ध्नि विस्तृतम् ।

चन्ध प्राह चैवैना कृत कर्म सुदारुणम् ॥ ८४

शेसरं चण्डमुण्डाभ्यां यस्माद् धारयसे शुभम् ।

तस्माल्लोके तब ख्यातिश्चामुण्डेति भविष्यति ।। ८५

इत्येवमुक्त्वा वचन त्रिनेत्रा

सा चण्डमुण्डस्रजधारिणी चै ।

दिग्याससं चाभ्यवदत् प्रतीता

निषूदय स्वारिबलान्यमूनि ॥ ८६

सा त्वेवमुक्ताऽध विपाणकोट्या

सुवेगयुक्तेन च रासभेन ।

निपूयन्ती रिपुमैन्यमय

चचार चान्यानसुराचसाद ।। ८७

ततोऽनिकायास्त्वध चर्ममुण्डया

मार्या च सिंहेन च भूतसंधै।

निपात्यमाना दनुपुगवास्ते

ककुमिन शुम्भमुपाश्रयन्त ॥ ८८

इति श्रीवामनपुराणे एकोनत्रिंशोध्याय ||२९||

याँधकर तथा लेकर विन्ध्य पर्वत पर आयीं। (७७)

उसने देयो के पास उन दानवों को निवेदित करने के पाद भयङ्कर कोश र फर दानवों के मस्तकों तथा गरड के सुन्दर पनों से धनी अनुपम मारा बनार देवी को दिया एपसिंह चर्म का घाघरा देवी को अपित किया। (७८-७६)

उन्होंने स्वय गरुड के अन्य पसों से दूसरी माला बनायर उसे अपने सिर मे बाँध लिया और दानवों का रक्त पीने लगी। (८०)

तदनन्तर प्रचण्ड दुर्गा ने चण्ड और असुरनायक मुण्ड को पकड लिया एव क्रुद्ध होकर उन दोनों महान असुरों का शिर काट डाला। (८१)

शुष्करेवती देवी सर्प द्वारा उन के मस्तक का शिरो भूपण घनाकर चण्डमारी के साथ कौशिकी के निकट  गई। (८२)

वहाँ जाकर उन्होंने कहा-हे देवि । दैत्यों के मस्तक से प्रथित एव नागराज से वेष्टित इस उत्तम शिरोभूषण को प्रहण करें। (८३)

सम्पन्न किया

शिवा देवी ने उस विस्तृत शिरोभूषण को लेकर चामुण्डा के सिर पर उसे बाँध दिया और उनसे कहा-आपने अति भयङ्कर कार्य कार्य सम्पन्न है। (८४)

क्योंकि आप ने चण्ड और मुण्ड के शिरों या शुभ शिरोभूषण धारण किया है अत आप ससार में चामुण्डा में नाम से विख्यात होगी। (८५)

चण्ड और मुण्ड की माला धारण करने वाली उन देवी से त्रिनेत्रा ने ऐसा कहकर दिगम्बरा से यहा-तुम अपने इन शत्रुसैन्यों का सहार करो। (८६)

ऐसा कहे जाने पर अत्यन्त वेगयुक्त रासभ के साथ यह देवी विपाण के अग्र भाग द्वारा उप्रश सैन्य का सहार करती हुई घूमने एव असुरों को खाने लगी।

तदनन्तर अम्बिा के अनुयायियों, चर्ममुण्डा मारी, सिंह एयभूतगणों द्वारा मारे जा रहे थे श्रेष्ठ दानव अपने नायक गुम्म की शरण मे गये।

श्रीवामनपुरा मे उनतीसवाँ अध्याय समाप्त ॥२६॥