वामन महा पुराण
नन्दी द्वारा गणो का आह्वान, उपस्थित गणों का वर्णन, गणों से हरिहर के एकत्व ज्ञान का उपदेश, गणो को सदाशिवरुप का दर्शन ऐक्यज्ञान से गणो का पापरहित होना शङ्कर के गणो द्वारा मन्दर का आच्छादन
पुलस्त्य उवाच ।
हरोऽपि शम्बरे याते समाहूयाथ नन्दिनम् ।
प्राहामन्त्रय शैलादे ये स्थितास्तव शासने ॥१
ततो महेशवचनानन्दी तूर्णतरं गतः ।
उपस्पृश्य जलं श्रीमान् सस्मार गणनायकान् ॥ २
नन्दिना संस्मृताः सर्वे गणनाथाः सहस्रशः ।
समुत्पत्य त्वरायुक्ताः प्रणतास्त्रिदशेश्वरम् ॥ ३
आगतांश्च गणानन्दी कृताञ्जलिपुटोऽव्ययः ।
सर्वान् निवेदयामास शंकराय महात्मने । ४
नन्धुयाच् ।
यानेतान् पश्यसे शभो त्रिनेत्राञ्जटिलाञ्शुचीन् ।
एते रुद्रा इति ख्याताः कोट्य एकादशैव तु ॥ ५
वानरास्यान् पश्यसे यान् शार्दूलसमविक्रमान् ।
एतेपां द्वारपालास्ते मन्नामानो यशोधनाः ।।६
पण्मुखान् पश्यसे यांच शक्तिपाणीशिसिध्वजान् ।
पट् च पष्टिस्तथा कोव्यः स्कन्दनाम्नः कुमारकान् ।।७
एतावत्यस्तया कोट्यः शास। नाम पडाननाः ।
विशाखारताचदेवोक्ता नैगमेयाश्च शंकर ।। ८
सप्रकोटिशतं शंभो अमी चै प्रमथोचमाः।
एकैकं प्रति देवेश तावत्यो ह्यपि मातरः॥९
भस्मारुणितदेहाश्च त्रिनेत्राः शूलपाणयः ।
एते शैवा इति प्रोक्ताम्तन भक्ता गणेश्वराः ॥ १०
तथा पाशुपताश्चान्ये भस्माहरणा पिभो
एते गणारत्वसंख्याताः सहायार्थ समागताः ॥ ११
पिनाकधारिणो रौद्रा गणाः कालमुसापरे ।
वर मकाः समायाता जटामण्डलिनोद्भुताः ॥ १२
सट्याङ्गयोधिनो वीरा रक्तचर्मसमावृताः।
इमे प्राप्ता गणा योद्धु महाबविन उत्तमाः ॥ १३
पुलस्त्य ने कहा-शम्बर के चले जाने पर शङ्कर ने भी नन्दी को बुलाकर कहा-हे नन्दी । तुम्हारे शासन में जो रहते हैं उन्हें बुलाओ।
तदनन्तर महेश के कहने से नन्दी अतिशीघ्र गए और जल का आचमन कर गणनायकों का स्मरण किया । नम्दी से स्मरण क्येकि गए सभी गणनाथ सहस्रों वी सख्या मे शीघ्रता पूर्वक आकर त्रिदशेश्वर शकर को प्रणाम किये। (३)
हाथ जोड़कर अविनाशी नन्दी ने सभी आये हुए गणों को महात्मा शङ्कर से निवेदित किया। (४)
नन्दी ने कहा-हे शम्भो । तीन नेत्रों पाले, जटा धारी एव पवित्र जिन गणों को आप देख रहे हैं उन्हें रुद्र कहते हैं। इनकी संख्या ग्यारह कोटि है। (५)
वानर सदृश मुख एव सिह तुल्य विक्रम सम्पन्न जिन्हें आप देख रहे है ये मेरा नाम धारण करने वाले यशस्वी इनके द्वारपाल हैं। (६)
हाथ में शक्ति लिए, मयूरध्वज वाले जिन छ मुख वालों को आप देख रहे है वे स्कन्द नामक कुमार हैं। इनकी संख्या छासठ करोड है। (७)
हे शङ्कर । इतने ही पण्मुखधारी शाख नामक गण हैं एव उतने ही विशाख और नैगमेय नामक गण है।
हे शम्भो । इन उत्तम प्रमथों की संख्या सात सौ करोड़ है। हे देवेश । प्रत्येक के साथ उतनी ही मातृकाएँ
इन भस्म भूषित देहवाले शूलपाणि त्रिनेत्रधारियों को शैव कहा जाता है। ये सभी गणेश्वर आपके भक्त (५०)
हे विभो। भस्मारधारी अन्य असख्य पाशुपत गण सहायतार्थ आये हैं। (११)
पिनाकधारी, जटामण्डल युक्त, भयकर कालमुख नामक आपके अन्य गण आये है। (१२)
खट्वाङ्ग से युद्ध करने वाले, लाल ढाल से युक्त महाव्रती नामक ये उत्तम गण युद्ध करने आये है।
दिग्याससो मौनिनश्च घण्टाग्रहरणास्तथा ।
निराश्रया नाम गणाः समायाता जगद्गुरो ॥१४
सार्धद्विनेत्राः पद्माक्षाः श्रीवत्सातिववक्षसः।
समायाताः सगारूढा वृषभध्वजिनोऽव्ययाः ।। १५
महापाशुपता नाम चक्रशूलधरास्तथा ।
भैरवो विष्णुना साईमभेदेनाचिनो हि यैः ॥ १६
इमे मृगेन्द्रवदनाः शूलपाणधनुर्धराः ।
गणास्त्यद्रोमसंभूता वीरभद्रपुरोगमाः ॥ १७
एते चान्ये च बहसः शतशोऽथ सहस्रशः।
महायार्थ तवायाता यथायीत्यादिशस्व तान् ॥ १८
ततोऽभ्येत्य गणा. सर्वे प्रणेमुईपभध्वजम् ।
तान् करेणैव भगवान् समावास्योपवेशयत् ॥ १९
महापाशुपतान् दृष्ट्वा समुत्थाय महेश्वरः ।
संपरिष्वजताध्यक्षांस्ने प्रणेमुर्महेश्वरम् ॥ २०
सतस्तदद्भुततमं दृष्ट्वा सर्वे गणेश्वराः
सुचिरं विस्मिताधाथ पैलक्ष्यमगमत् परम् ॥ २१
विस्मिताक्षान् गणान् दृष्ट्वा शैलादियोगिनां वरः।
प्राह ग्रहस्य देवेशं शूलपाणिं गणाधिपम् ॥ २२
विस्मितामी गणा देव सर्व एव महेश्वर ।
महापाशुपतानां हि यत् त्वयालिङ्गनं कृतम् ॥ २३
तदेतेपा महादेव स्फुट त्रैलोक्यविन्दकम् ।
रूपं ज्ञानं विवेकं च पदस स्वेच्छया विभो । ।। २४
प्रमथाधिपतेर्वाक्यं विदित्वा भूतभावनः ।
बभापे तान् गणान् सर्वान् भावाभावविचारिणः ॥२५
रुद्र उवाच ।
भवद्भिक्तिसंयुक्तैर्हरो भावेन पूजितः ।
अहंकारविमूर्द्धश्च निन्दहिष्णव पदम् ॥ २६
तेनाज्ञानेन भवतोनात्यानुपिरोधिताः ।
योऽहं स भगवान् विष्णुर्विष्णुर्य. सोऽहमव्ययः ।। २७
नाययोर्चे विशेपोऽस्ति एका मूर्तिविधा स्थिता ।
हे जगद्गुरु । दिगम्बर, मौनी, एष घण्टायुधधारी निराश्रय नामक गण आयें हैं। (१४)
तीन नेत्रों वाले, पद्माक्ष एव श्रीवत्स से अक्ति वक्षस्थल याने सगारुढ़ तथा अविनाशी वृपमध्यजी गण यहाँ (१५)
चक्र तथा शूलधारी महापाशुपत नामक गण आये हैं, जिन्होंने अभेद भाव से विष्णु के साथ भैरव की पूजा की है। (१६)
आपके रोमों से उत्पन्न ये सभी सिंह के मुस वाले शूल, याण और धनुपधारी वीरभद्र आदि गण आये हैं। (१७)
ये तथा अन्य अनेक सैक्डों एव सहस्रों गण भी आपरी सहायता हेतु आये है। अपनी रुचि के अनुसार आप इन्हें आदेश दें। (१०)
तदनन्तर सभी गणों ने निस्ट जार वृषभध्वज को प्रणाम किया। भगयान ने हाथ से ही उन्हें समाश्वस्त (१९)
महापाशुपत नामक अपने अध्यक्षों को देखने के उपरान्त महेश्वर ने उठकर उनका आलिङ्गन किया। उन लोगों ने मद्देश्वर को प्रणाम किया। (२०)
तदनन्तर उस अत्यन्त अद्भत दृश्य को देखकर सभी गणेश्वरों के नेत्र विस्मयान्वित हो गये। तदनन्तर वे सभी अत्यन्त रक्षित हो गये। (२१)
गणों को विस्मितनेन वाला देखकर योगिश्रेष्ठ शैलादि नन्दी ने हँस पर गणाधिप देवेश शूलपाणि से कहा। (२२ )
हे देव महेश्वर | महापाशुपतों का आपने जो आलिङ्गन किया है उससे ये सभी गण विस्मयान्वित हो (२३)
अत हे महादेव । हे विभो। इनके लोक्य विश्रुत रूप, ज्ञान एय विवेक का अपनी इच्छानुसार वर्णन (२४)
प्रमथाधिपति नन्दी की बात सुनकर भूतभावन महादेव मार और अमात्र का विचार करने वाले उन गणों से कहने लगे। (२५)
रुद्र ने कहा-अहमारसे विमूढ तथा भक्ति युक्त आप लोगों ने वैष्णव पद की निन्दा करते हुए भाव पूर्वक हर की पूजा की है। (२६)
इसी अज्ञान के कारण आप सभी का अनादर कर उनश विशेष अनुरोध किया गया। जो मैं हूँ वही भगवान् विष्णु ई एच जो विष्णु हैं यही अविनाशी में हूँ। (२७)
हम दोनो में कोई भेद नहीं है। एक ही मूर्ति दो रूपों मे अवस्थित है। अत भक्ति भाव से युक्त इन पुरुषश्रेष्ठ
तदमीभिर्नरव्याक्तिभावयुतैर्गणैः ॥ २८
यथाहं वै परिज्ञातो न भवद्भिस्तथा ध्रुवम् ।
येनाहं निन्दितो नित्यं भवद्भिर्मुढयुद्धिभिः ॥ २९
तेन ज्ञानं हि वै नष्टं नातस्यालिङ्गिवा मया ।
इत्येवमुक्ते वचने गणाः प्रोचुमहेश्वरम् ॥ ३०
कथं भवान् यथैक्येन संस्थितोऽस्ति जनार्दनः ।
भवान् हि निर्मल शुद्धः शान्तः शुक्लो निरञ्जन||३१
स चाप्यञ्जनसंकाशः कथ तेनेह युज्यते ।
तेपा वचनमर्थाट्यं श्रुत्वा जीमूतवाहनः ।। ३२
विहस्य मेघगम्भीर गणानिदभुनाच ह ।
श्रूयतां सर्वमारयास्ये स्वयशोगर्द्धनं यचः ।। ३३
न त्वेप योग्या यूयं हि महाज्ञानस्य कहिँचिन् ।
अपवादभयाद् गुह्य भवतां हि प्रकाशये ।। ३४
प्रियनमपि चैतेन यन्मच्चित्तास्तु नित्यशः।
एकरूपात्मकं देहं कुरुमं यत्नमास्थिताः ॥ ३५
पयसा हविपायैश्च स्नपनेन प्रयत्नतः ।
चन्दनादिभिरेकाप्रैन मे प्रीतिः प्रजायते ॥३६
यत्नात् क्रकचमादाय छिन्दध्व मम विग्रहम् ।
नरकाही भवद्भक्ता रक्षामि सयशोऽर्थतः ॥ ३७
माज्यं वदिश्यते लोको महान्तमपयादिनम् ।
यथा पतन्ति नरके हरभक्तास्तपस्विनः ॥ ३८
बजन्ति नरकं घोरं इत्येवं परिवादिनः ।
अतोऽयं न क्षिपाम्यद्य भवतो नरकेऽद्भुते ॥ ३९
यन्निन्दध्वं जगन्नाथं पुष्फराक्षं च मन्मयम् ।
स चैव भगवाशः सर्वव्यापी गणेश्वरः ॥ ४०
न तस्य सदृशो लोके विद्यते सचराचरे ।
श्वेतमूर्तिः स भगवान् पीतो रक्तोऽजनप्रभः ॥ ४१
तस्मात् परतरं लोके नान्यद् धर्म हि विद्यते ।
सात्त्विक राजसं चैन तामसं मिश्रक तथा ।
स एव थचे भगवान् सर्वपूज्यः सदाशिवः ॥ ४२
शंकरस्य वचः श्रुत्वा शैवाद्याः प्रमथोत्तमाः ।
प्रत्युचुर्भगवन् हि सदाशिवविशेषणम् ।। ४३
गणों ने जैसा मुझे जाना है निश्चय ही आप रोग इस प्रकार मुझे नहीं जानते । मूढ बुद्धि वारे आप लोगों ने यत नित्य मेरी निन्दा की है अत आप लोगों का ज्ञान नष्ट हो गया। इसीलिये मैंने आप लोगों का आलिङ्गन नहीं किया है। ऐसा कहने पर गणों ने महेश्वर से कहा- (२८-३०)
आप एव जनार्दन ऐक्य भाव से कैसे रहते हैं? आप निर्मल, शुद्ध, शान्त, शुक्ल एव निरञ्जन है। किन्तु वे अञ्जन तुल्य है अत उनसे अपमा योग कैसे होता है ? उनके अर्थ पूण वचन को सुनने के उपरान्त जीमूत याहन शकर ने हँस कर कहा-अपना यश बढाने वाली सम्पूर्ण यात मैं बतलाता हूँ। उसे सुनो। (३१-३३)
तुम रोग कदापि महाज्ञान के योग्य नहीं हो। पर अपवाद के भय से मैं आप सभी के सम्मुख गुह्य तत्त्व प्रकाशित करता हूँ। (३४)
मुझमे नित्य आसक्तचित्त होने से भी अन्य लोग प्रिय हैं। जिसके भक्त हो उसके साथ एक रुपात्मक अपना सम्बन्ध बनाओ।
प्रयत्नपूर्वक दुग्ध या घृत से स्नान कराने एव एकाग्रतापूर्वक चन्दनादि द्वारा लेप करने से मुझे प्रीति नहीं उत्पन होती।
आरा लेकर मेरे शरीर का छेदन कर डालो। किन्तु अपने यश के लिए नरक के योग्य आप भत्तों की मैं रक्षा करता हूँ। (३७)
(क्योंकि) यह लोक मुझे इस प्रकार का महान् अपवाद न लगाये कि तपस्वी शङ्कर के भक्त नरक में जाते हैं । (३८)
इस प्रकार का परिवाद करने वाले लोग घोर नरक मे जाते हैं। इसीलिए आप लोगों को मैं अद्भुत नरक मे नहीं डालता। (३६)
आप लोग मरस्वरूप जिन पुष्कराक्ष जगन्नाथ की निन्दा करते हैं वे ही सर्वव्यापी गणेश्वर भगवान शर्व है। (४०)
इस चराचर लोक मे उनके सदृश कोई नहीं है। वे भगवान् श्वेतमूर्ति, पीत, रक्त एवं अञ्जन के समान प्रभा वाले हैं। (४१)
लोक में उनसे श्रेष्ठ कोई अन्यधर्म नहीं है। वे सर्वपूज्य सदाशिव भगवान ही समस्त सात्त्विक, राजस, तामस एय मिश्रित भावों को धारण करते हैं। (४२)
शङ्कर का वचन सुनार शैव आदि श्रेष्ठ गणों ने कहा- हे भगवान् । सदा शिव के विशेषण पहिये । (४३)
तेपां तद् भापितं श्रुत्वा प्रमथानामधेश्वरः ।
दर्शयामास तद्रूपं सदाशेचं निरअनम् ॥ ४४
ततः पश्यन्ति हि गणाः तमीशं वै सहस्रशः।
सहस्रवस्त्रचरणं सहस्रभुजमीश्वरम् ॥ ४५
दण्डपाणि मुदुर्दश्यं लोकानं समन्ततः ।
दण्डसंस्थाऽस्य दृश्यन्ते देवप्रहरणास्तया ॥ ४६
चत एकमुसं भूयो दृशुः शंकरं गणाः ।
रौद्रेश्व वैष्णश्चैव वृतं चिह्नः सहस्रशः ॥ ४७
अडेन वैष्णयवपुरद्धेन हरविग्रहः ।
सगम्य वृपारूढं सगारुढं पवनम् ॥ ४८
यया यथा त्रिनयनो रूपं धत्ते गुणाग्रणीः ।
तथा तथा स्वजायन्त महापाशुपता गणाः॥४९
ततोऽभयकरूपी शंकरो बहुरूपवान् ।
निरुपश्चाभयद् योगी एकरूपोऽप्यरूपवान् ।
क्षणाच्छ्वेता क्षणाद् रक्तः पीतो नीलः क्षणादपि ॥ ५०
मिश्रको वर्णहीनश्च महापाशुपतस्तथा ।
क्षणाद् भवति रुद्रेन्द्रः क्षणाच्छंभुः प्रभाकरः ॥ ५१
क्षणाच्छिंकरो विष्णुः क्षणार्यः पितामहः ।
ततस्तद्भुववमं दृष्ट्वा शैयादयो गणाः ॥५२
अजानन्त तदेक्येन प्राविण्यीशभास्करान् ।
यदाऽभिन्नममन्यन्त देवदेवं सदाशियम् ।। ५३
तदा नि तपापास्ते समजायन्त पार्पदाः ।
तेप्येयं धूतपापेषु अभिन्नेपु हरीश्वरः ॥५४
प्रीतात्मा वियमौ शंभुः प्रीतियुक्तोऽब्रवीद् वचः ।
परितुष्टोऽस्मि यः सर्वे ज्ञानेनानेन मुग्रताः ।। ५५
घृणुध्वं परमानन्त्यं दास्ये वो मनसेप्सितम् ।
ऊचुस्तै देहि भगवन् वरमस्माकमीश्वर ।
मिन्नदृष्ट्युद्भवं पापं यत्तद् भ्रंशं प्रयातु नः ॥ ५६
पुलस्त्य उवाच।
वाढमित्यप्रवीच्छर्यश्च निघृतकल्मपान् ।
संपरिष्वजताव्यस्तावान् सर्वान् गणपृथपान् ।। ५७
इति पिमुना प्रणतातिहरेण
प्रमथेश्वर ने उनके इस घचन यो सुनार उन्हें निरसन सदाशिव रूप को दिखलाया। (५४)
तदनन्तर सहसों गों ने उन ईश्वर को सहस्र मुस, परए एवं भुजाओं याला देसा। (४५)
ये लोगों से संर्यतः व्यात, दण्डपाणि यं मुदुद्देश्य थे। उनके दण्ड में देयताओं के अन दिपलाई (४६)
तदनन्तर गगों ने रुद्र में विष्णु के सहसों चिट्ठों से युफ एकमुस घर को देगा । उस रूप पा अवेश हमारीर था और अ भाग सगप्पज था। फ अर्वाश सगयन पारद था प्यं अन्य श्रद्धांश पयज गाद्वारत था। (४८)
गुगामगी बिगोपन ने जैसा जैसा रप घारग दिया महापाशुपतगग उसी प्रसार के होते गये। तदनगर एफरपी शहर पस्पशन हो गये। ये योगी द्विरुपपारी, फिरपी ए अम्पयान भी हो गये। वे प्रतिक्षय देत, रस, पोत, नील मिश्र वर्ण एवं यहीन होते गए। महापार पतों का भी साप तनुम्प होश गरा।
शहर किसी क्षण में इन्द्र, किसी क्षण में प्रभार, किसी क्षण में विष्णु एवं फिसी क्षण में पिनाम के रूप परिवर्तित हो गये। यह अद्भुततम दृश्य देसार शेगादि गों ने प्रशा, विष्णु, देश एवं भारसर को एक माय युक्त समझा। उन लोगों ने अब देयाधि देय सदाशिव यो अभिन्न मान लिया तो ये सभी पार्षद पापरहित हो गये। इस प्रकार अभेद-युद्धि के कारण उनके पापयिमुक्त होने से हरीया शम्भु प्रसन्न हो गये। उन्होंने प्रीतिपूर्वक यहा -हे मुपतो। तुम्हारे इस प्रकार के शान से में प्रसन्न हूँ। (५०-५५)
अय अनन्त पर मांगो! मैं तुएँ मनोयांछित पर दूंगा। उन्होंने कहा-हे भगवान् !ह महेश्वर! हमें यह परदकि भेददृष्टि के कारण मृत्पन हमारे पाप नष्ट हो (५६)
पुटरत्य ने कहा-शहर ने पदा 'पमा ही होगा। तदननर अव्यफ शहर ने उन मभी गाधिों का आलिशान फर टाहें पापरदिन पर दिया। सदनभर मुनि दी दक्ति पा जैसे अनुगमन दोग है एमी प्रया दृप ८६ मेपराहन दिारी शहर के गाय
गणपतयो वृपमेघरथेन ।
श्रुतिगदिवानुगमेनेव मन्दरं
गिरिमवतत्य समध्यवसन्तम् ॥ ५८
आच्छादितो गिरिवरः प्रमथैनाभै-
राभाति शुक्लतनुरीश्वरपादजुटः।
नीलाजिनावततनुः शरदनयों
यद्वद् विभाति बलवान् वृपभो हरस्य ॥ ५१
इति श्रीवामनपुराणे एकचत्वारिशोऽध्याय.||४||