वामन महा पुराण
ब्रह्मा द्वारा पुश्राम नरको का वर्णन, पुत्र और शिष्य में वैशिष्य, औरस इत्यादि द्वादश पुत्रों का वर्णन, सनत्कुमार द्वारा ब्रह्मा का दत्तक पुत्र होना, ब्रह्मा द्वारा सनत्कुमार के लिए द्वादशपत्रक योग का उपदेश विष्णु की चतुर्मूर्ति का वर्णन मरु वध
प्रमोवाच ।
परदाराभिगमनं पापीयांसोपसेवनम् ।
पारुण्यं सर्वभूतानां प्रथमं नरकं स्मृतम् ॥ १
फलस्तेयं महापापं फलहीनं तथाऽदनम् ।
छेदन वृक्षजातीनां द्वितीयं नरकं स्मृतम् ॥२
पादानं तथा दृष्टमयध्यपधयन्धनम् ।
विवादमर्यहेतृत्वं तृतीयं नरकं स्मृतम् ॥ ३
भयदं सर्वसत्यानां मवभूतिविनाशनम् ।
भ्रंशन निजधर्माणां चतुर्थ नरकं स्मृतम् ॥ ४
मारणं मित्रकौटिल्यं मिथ्याभिशपनं च यत् ।
मिष्टकाशन मित्युक्तं पञ्चमं तु नृपाचनम् ।। ५
यन्त्रः फलादिहरणं यमनं योगनाशनम् ।
यानयुग्यस्य हरणं पष्टमुक्तं नृपाचनम् ॥ ६
राजभागहरं मूह राजजायानिपेवणम्
राज्ये त्वहितकारित्वं सममं निरयं स्मृतम् ।। ७
लुब्धत्वं लोलुपत्वं च लब्धधर्मार्थनाशनम् ।
लालासंकीर्णमेयोक्तमष्टमं नरकं स्मृतम् ॥ ८
विप्रोप्यं प्रमहरणं ब्राह्मणानां सिनिन्दनम् ।
विरोधं पन्धुभियोक्तं नवमं नरपाचनम् ॥ ९
शिष्टाचारविनाशं च शिष्टदेपं शिशोर्चधम् ।
ब्रह्मा ने कहा-हे महर्षि ! मैं तुमसे अत्यन्त प्राचीन, योगाद्र युक्त, रप भय दूर करने वाली परम पवित्र फया सुनाता हूँ। हे साध्य ! इसे सुनो। (७९)
श्रीवामनपुग में तीसवाँ अध्याय समाप्त।।
३५
ब्रह्मा ने कहा-परस्त्रीगमन, पापियों की सद्गति और सब प्राणियों के प्रति परपता को प्रयम नरक यहा जाता है।
फलों की पोरी, स्पर्ध भमण एवं वृक्षों का काटना महा. पाप तथा द्वितीय नरक माना गया है। (२)
निपिछ यस्तुमों का प्रहण, अपप्य प्रागियों का यध और यन्धन तथा अर्थ के लि होने पाला पिरान दोषयुक्त वीय नरक होता है।
सभी प्रागियों को भय देना, संसार की विभूति का यिनाशन व्या स्पधर्म का न पतुर्थ नरक कहलाता है।
मारण, मित्र के साथ पुटिलता, मिथ्या शपष, तथा अपले मिष्टामा भक्षण पप्रम नृपापन (नरक) हा
यन्त्र, पलादि पादरण, रिमी को योधना, योगनाशन अर्थात् किसी पी अपात की प्राप्ति या पिच्छेद और यान के जूए की पोरी को घटौं नृपायन (नएफ) कहते हैं।
मूतासग राजा फे अंश पाहा, राज पत्नीगमन तया राय शहित करना सप्तम नरम पहा जाता है। (७)
लुब्धता, सोलुपता, प्राप्त धर्मयुक्त अर्थ का पिनाश और सामिभिनयागी को अष्टम नरक बने हैं। (८)
ग्रामग को देशनियाय देना, मामण का मन पुराना, प्रामगों को निन्दा करना तथा बन्धुओं से विरोध करने को नयम नरपाचन (नरक) ने है।
शिष्टापर नाश, शिष्टजनों से पिप, शिशु की हत्या, शास्त्र की पोरी या स्यधर्म के नाश एम नरक
शास्त्रस्तेयं धर्मनाशं दशमं परिकीर्तिवम् ॥ १०
पडणनिधनं घोरं पाडगुण्यप्रतिपेपनम् ।
एकादशममेवोक्तं नरकं सद्भिरुचमम् ॥ ११
सत्सु नित्यं सदा वैरमनाचारमसत्क्रिया।
संस्कारपरिहीनत्वमिदं द्वादशमं स्मृतम् ।। १२
हानिर्धमार्थकामानामपवर्गस्य हारणम् ।
संमेद. संविदामेतत् त्रयोदशममुच्यते ॥ १३
कृपणं धर्महीनं च यद् वयं यच वहिदम् ।
चतुर्दशममेवोक्तं नरकं तद् विगहितम् ।। १४
अज्ञानं चाप्यसूयत्वमशौचमशुभावहम् ।
स्मृतं वन् पञ्चदशममसत्यवचनानि च ॥ १५
आलस्यं वे पोडशममाक्रोशं च विशेषतः ।
सर्वस्य चाततायित्वमावासेष्वग्निदीपनम् ॥ १६
इच्छा च परदारेषु नरकाय निगद्यते ।
ईर्ष्याभावश्च सत्येषु उद्धरां तु विगर्हितम् ॥ १७
एतैस्तु पापैः पुरुषः पुनामायेनं संशयः।
संयुक्तः प्रीणयेद् देवं संतत्या जगतः पतिम् ॥ १८
प्रीतः सृष्ट्या तु शुभया स पापायेन मुच्यते ।
पुंनामनरकं घोरं विनाशयति सर्वतः ॥ १९
एतस्मात् कारणात् साध्य सुतः इत्रेति गद्यते ।
अतः परं प्रवक्ष्यामि शेपपापस्य लक्षणम् ॥ २०
ऋणं देवर्षिभूतानां मनुष्याणां विशेषतः ।
पितृणां च द्विजश्रेष्ठ सर्पवणेषु चैकता ॥ २१
ओंकारादपि निर्यत्तिः पापकार्यकृतश्च यः ।
मत्स्यादव महापापमगम्यागमनं तथा ॥ २२
घृतादिविक्रयं घोरं चण्डालादिपरिग्रहः ।
स्वदोपाच्छादनं पापं परदोपप्रकाशनम् ।। २३
मत्सरित्वं बाग्दुष्टत्वं निष्ठुरत्वं तथा परम् ।
टाकित्यं नालवादित्वं नाम्ना वाचाऽप्यधर्मजम् ॥ २४
दारुणत्यमधार्मिस्यं नरकावहसुच्यते ।
एतैश्च पापैः संयुक्तः प्रीणयेद् यदि शंकरम् ॥ २५
ज्ञानाधिकमशेपेण शेषपापं जयेत् ततः ।
कहते है। (१०)
पडद्वनिधन अर्थात् ६. अगों पाली वेद-विद्या का विनाश, एय पाहगुण्य अर्थान् मन्धि विग्रहादि राजगुणों के प्रतिषेध को सजनों ने ग्यारहवाँ घोर नरम यहा है। (११)
सननों से सदा देर-भाव, अनाचार, असतार्य एवं संस्थालरादित्य इन फो घारहयों नरय कहते हैं। (१२)
धर्म, अर्थ प्य काम की हानि, मोक्ष का नाश एवं इनके समूह में विरोध उत्पन्न करने को सेरहयों नरक पहा आता हे। (१३)
पण, धर्मदीन, पर्य एवं आग गाने चारे को गि- हित वीदयों नरक कहते है। (२४)
प्रधान, भमया, अगुभारी, अशीच प्य असत्यययनों पो पन्द्रयो नरफ यही हैं। (२५)
आटस्प, विशेष रूप से प्रोध, सभी के प्रति आततायित्व एवं गद में भाग टगाना सोरहयो नरक कहलाता है। (२६)
परनी की पामना, मत्य के सीईयाभाय पर्य निन्दिन एरण्ड प्यपदार नरक देने पाला पदा गया है। (१७) पुत्र के द्वारा देव जगत्पति जनार्दन को प्रसन्न करता है। (१८)
पापहारिणी भ सन्तति के द्वारा प्रसन्न जन्मार्दन पुग्नामक नरक यो पूर्णतया नष्ट कर देते है। (१९)
हे साध्य ! इसीलिए सुत को पुत्र कहा जातयोक्ति अर में शेप पाप या उक्षण बतलाता हूँ। (७४)
हे द्विजश्रेष्ठ! देवता, ऋषि, प्रानियों, वि मनुष्यों एवं पितरों का ऋण, सभी वर्गों में एकता, ओंभार का परित्याग, पापम का आचरण, मत्य भक्षण तथा गमन फे अयोग्य स्त्री के साय सध्यासन्ये महापाप हैं। (२१-२२१)
पृत आदि का विक्रय, घारडाल आदि का दान महा परना, अपना दोप छिपाना और दूसरे पा दोष प्रस्ट करना-ये पोर पाप है। (२३)
मारमर्य, पटु-मापण, मिष्टुरता, नाम कहने से भी अधर्मजनक दायिता और ताल्यादिता, भयरता सया अधार्मिकता के कार्य नरक फे हेतु हैं। इन पापों से युध मनुष्य यदि परमसानी शहर पो प्रसन्न फरता तो शेष पाप पो यह पूर्ण रुप मे जीत लेता है। धर्मपुत्र !
शारीरं वाचिकं यत् तु मानसं कायिक तथा ॥ २६
पितृमावकृतं यच कृतं यथाश्रितैन रैः ।
भ्रातृभिर्यान्धवैश्वापि तस्मिन् जन्मनि धर्मज ॥ २७
तत्सर्व विलयं याति स धर्मः सुतशिष्ययोः।
विपरीते भवेत् साध्य विपरीतः पदक्रमः ।। २८
तस्मात् पुत्रश्च शिष्यश्च विधातव्यौ विपश्चिता ।
एतदर्थमभिध्याय शिष्याच्छेष्टतरः मुतः ।
शेपात् तारयते शिष्यः सर्वतोऽपि हि पुत्रकः ॥ २९
पुलस्त्य उवाच।
पितामहयचः श्रुत्वा साध्यः प्राह तपोधनः ।
त्रिः सत्यं तव पुत्रोऽहं देव योगं वदस्व मे ।। ३.
तमुवाच महायोगी त्वन्मातापितरौ यदि।
दास्येते च ततः सूनुर्दायादो मेऽसि पुत्रक ॥ ३१
सनत्कुमारः प्रोवाच दायादपरिकल्पना ।
येयं हि भवता प्रोक्ता तो मे व्याख्यातुमर्हसि ॥ ३२
तदुक्तं साध्यमुख्येन वाक्यं श्रुत्वा पितामहः।
प्राह प्रहस्य भगवान् भृणु वत्सेति नारद ॥ ३३
ब्रह्मोवाच ।
औरसः क्षेत्रजश्चैव दत्तः कृत्रिम एव च |
गूढोत्पन्नोऽपविद्धश्चदायादा यान्धवास्तु पट् ॥ ३४
अमीषु पट्पु पुत्रेषु ऋणपिण्डधनक्रियाः ।
गोत्रसाम्यं कुले वृत्तिः प्रविष्ठा शाश्वती तथा ॥ ३५
कानीनश्च सहोढच क्रीतः पोनर्भयस्तथा ।
स्वयदत्तः पारशवः पडदायादवान्धवाः ।। ३६
अमीभिणपिण्डादिकथा नैवेह विद्यते ।
नामधारका एवेह न गोत्रकुलसंमताः ॥३७
तत् वस्य वचनं श्रुत्वा ब्रह्मणः सनकाग्रजः ।
उपाचैपां विशेष मे ब्रह्मन् व्याख्यातुमर्हसि ॥ ३८
ततोऽप्रवीत् सुरपतिविशेष भृणु पुत्रक ।
औरसो यः स्वयं जातः प्रतिविम्वमिवात्मनः ॥ ३९
उस जन्म में किये गये सभी कायिक, याचिक एवं मानसिक कर्म माता, पिता तथा आश्रित जन और भाई एवं बान्धयों द्वारा किये गये कर्म विलीन हो जाते हैं। हे साध्य ! सुत एवं शिष्य का यही धर्म है। इसके विपरीत होने पर विपरीत गति प्राप्त होती है। (२४-२८)
अतएव विद्वान् व्यक्ति को पुन और शिष्य की (परम्परा) बनानी चाहिए। इसी प्रयोजन की दृष्टि से शिष्य की अपेक्षा पुत्र श्रेष्ठ होता है। क्योंकि शिप्य शेप पापों से मुक्त करता है और पुत्र सभी पापों से पचाता है। (२९)
पुलरत्य ने पहा-पितामह या वचन सुनकर तपोधन सनत्युमार ने कहा-हे देव । तीन बार सत्य उच्चारण करके कहता हूँ कि में आप का पुन हूँ। अत मुझे आप योग का उपदेश दीजिए। तप महायोगी पितामह ने उनसे कहा-हे पुन! तुम्हारे माता पिता यदि तुमको मुझे दे दें तो तुम मेरे दायाद पुत्र हो जाओगे। (३१)
सनत्कुमार ने पदा-हे भगवन् ! आप ने जो दायाद शम्द फदा है उसका अर्थ क्या है? यह मुझें बतलाइने। (३०)
हे नारद । भगवान् पिनामह साध्यप्रधान सनत्कुमार का वचन सुनकर हँसते हुए बोले-हे यत्स ! सुनो। (३३)
ब्रह्मा ने कहा-औरस, क्षेत्रज, दुस, कृत्रिम, गूढोत्पन्न और अपविद्ध-ये छ. बान्धव दायाद होते है। (३४)
इन छ' पुत्रों से ऋण, पिण्ड, धन की क्रिया गोत्रसाम्य, मुलगृत्ति और स्थिर प्रतिष्ठा रहती है। (३५)
इसके अतिरिक्त कानीन, सहोद, क्रीन, पीनर्भय, स्वयंदत्तं और पारशन ये छ अदायाद यान्यन कहे जाते हैं।
इनके द्वारा ऋग एवं पिण्डादि का कार्य नहीं होता। ये मामधारी-मात्र होते है। गोत्र एव पुल से ये सम्मन नहीं होते। (३७)
सनत्युमार ने उनी यात सुनकर यहा-प्रक्षन् ! आप इन सभी का विशेष लक्षण मुझ पतलाएँ। (३८)
तदनन्तर मुरपति ब्रह्मा ने कहा-दे पुत्र ! में विरोपरूप से बतलाता हूँ। मुनो। अपने द्वारा उपप्त किया गया पुत्र औरस कहलाता है। यह अपना प्रतिविम्य होता
क्लीयोन्मते व्यसनिनि पत्यौ तस्याशया तु या।
भार्या बनातुरा पुत्र जनयेत् क्षेत्रजस्तु सः ॥ ४०
मातापितम्यां यो दत्तः स दत्तः परिगीयते ।
मित्रपुत्रं मित्रदत्तं कृत्रिमं प्राहुरुत्तमाः ॥ ४१
न ज्ञायते गृहे केन जातस्त्विति स गूढकः ।
बाह्यतः स्वयमानीतः सोऽपविद्धः प्रकीर्तितः ॥ ४२
कन्याजावस्तु कानीनः सगर्भोढः सहोढका।
मूल्यैर्गृहीतः फ्रीतः स्याद् द्विविधः स्यात् पुनर्भवः ॥४३
दत्त्वैकस्य च या कन्या हत्वाऽन्यस्य प्रदीयते ।
तातस्तनयो यो लोके पौनर्भयो मुने ॥ ४४
दुर्भिक्षे व्यसने चापि येनात्मा विनिवेदितः ।
स स्वयंदत्त इत्युक्तस्तथान्यः कारणान्तरः ॥ ४५
ब्राह्मणस्य सुतः शूद्रयां जायते यस्तु सुव्रत ।
ऊढायां वाप्यनूढायां स पारशय उच्यते ॥४६
एतस्मात् कारणात् पुत्र न स्वयं दातुमर्हसि ।
स्वमात्मानं गच्छ शीघ्र पितरौ समुपाद्वय ॥ ४७
ततःस मातापितरौ सस्मार वचनाद् विभोः ।
तापाजग्मतुरीशानं द्रष्टुं वै दम्पती मुने ॥ ४८
धर्मोऽहिंसा च देवेशं प्रणिपत्य न्यपीदताम् ।
उपविष्टौ सुखासीनौ साध्यो वचनमब्रवीत् ॥ ४९
सनत्कुमार उवाच ।
योगं जिगमिपुस्तात प्रमाणं समचूचुदम् ।
स चोक्तवान् मां पुत्रार्थे तस्मात् त्वं दातुमर्हसि ॥५०
तावेवमुक्तौ पुत्रेण योगाचार्य पितामहम् ।
पति के नपुसक, उन्मत्त या व्यसनी होने पर उसी आज्ञा से अनातुरा (निष्काम भाव से) पत्नी (अन्य पुरुष के संयोग से) जो पुत्र उत्पन्न करती है उसे क्षेत्रज (४०)
माता-पिता यदि दूसरे को अपना पुत्र दे दें तो यह दत्तक फहा जाता है। मित्र के पुत्र और मित्र द्वारा दिये गये पुन यो उत्तम पुरप कृत्रिम पुत्र कहते है। (४१)
यह पुत्र गूढ़ होता है जिसके विषय में यह क्षात न हो कि गृह में रिसके द्वारा यह उत्पन्न हुआ है। भाइर से स्वयं लाये हुए पुत्र को अपविद्ध कहते (४२)
धुमारी कन्या के गर्भ से उत्पन्न पुत्र का नाम कानीन है। गर्भिणी पन्या से विवाह के अनन्तर उत्पन्न पुत्र पो सहोद कहते है। मूल्य देकर खरीदा हुआ पुन मीत पुन पहलाता है। पुनर्भय पुत्र दो प्रकार पा होता है। (४३)
एक फन्या वो एक पति के हाथ में देकर पुनः एससे छीनकर दूसरे पति के हाथ में देने पर लो पुत्र उत्पन्न होता है उसे पुनर्भय पुन करते है। (४४)
दुर्भिश, ध्यसन या अन्य किसी कारण से जो स्वयं को (किसी दूसरे के हाथ में ) समर्पित कर देता है. उसे स्वयंदत्त पुत्र कहते हैं। (४५)
हे सुव्रत ! विवाहित या अविवाहित शूद्रा के गर्भ से ब्राह्मण का जो पुत्र होता है उसका नाम पारशय (४६)
हे पुत्र ! इन कारणों से तुम स्वयं आत्मदान नहीं कर सकते । अत शीघ्र जाकर अपने माता पिता को (४७)
हे मुनि! तदनन्तर सनत्कुमार ने विभु ब्रह्मा के कहने से अपने माता-पिता का स्मरण किया। हे मुनि! वे दम्पती पितामह का दर्शन करने के लिए यहाँ आ (४८)
धर्म और अहिंसा प्रद्मा को प्रणाम कर बैठ गये। उनके से बैठ जाने पर सनत्कुमार ने यह यपन कहा-
सनकुमार ने कहा-हे वात! मैंने योग जानने यो लिए पितामह से प्रार्थना की थी। उन्होंने मुमसे अपना पुत्र होने के लिए कहा। अतः आप मुझे प्रदान कर दें।(५०)
पुत्र के ऐसा कहने पर उन दोनों ने योगाचार्य पितामह से कहा- हे प्रभो! हम दोनों पा यह पुत्र
उक्तवन्तौ प्रमोऽयं हि आवयोस्तनयस्तय ॥ ५१
अद्यप्रभृत्ययं पुत्रस्तव घान् भविष्यति ।
इत्युक्त्वा जग्मतुस्तूर्णं येनैवाभ्यागतो यथा ॥ ५२
पितामहोऽपि तं पुत्रं साध्यं सद्विनयान्वितम् ।
सनत्कुमारं प्रोवाच योगं द्वादशपत्रकम् ॥ ५३
शिखासंस्थं तु ओङ्कारं मेपोऽस्य शिरसि स्थितः ।
मासो वैशाखनामा च प्रथमं पत्रकं स्मृतम् ॥ ५४
नकारो मुखसंस्थो हि पस्तत्र प्रकीर्तितः ।
ज्येष्ठमासश्च तत्पत्रं द्वितीयं परिकीर्तितम् ।। ५५
मोकारो भुजयोर्युग्मं मिथुनस्तत्र संस्थितः ।
मासो आपाढनामा च तृतीयं पत्रकं स्मृतम् ॥५६
भकारं नेत्रयुगलं तत्र कर्कटकः स्थितः ।
मासः श्रावण इत्युक्तश्चतुर्थ पत्रकं स्मृतम् ॥ ५७
गकारं हृदयं प्रोक्तं सिंहो यसति तत्र च।
मासो भाद्रस्तथा प्रोक्तः पश्चम पत्रकं स्मृतम् ।। ५८
वकारं कवचं विद्यात् कन्या तत्र प्रतिष्ठिता ।
मासथाश्वयुजो नाम पष्ठं तत् पत्रकं स्मृतम् ॥ ५९
तेकारमस्त्रग्रामं च तुलाराशिः कृताश्रयः।
मासश्च कार्तिको नाम सप्तमं पत्रकं स्मृतम् ॥ ६०
वाकारं नाभिसंयुक्तं स्थितस्तत्र तु वृश्चिकः ।
मासो मार्गशिरो नाम त्वष्टमं पत्रकं स्मृतम् ।। ६१
सुकारं जघनं प्रोक्तं तत्रस्थश्च धनुर्धरः ।
पोपेति गदितो मासो नवमं परिकीर्तितम् ।। ६२
देकारवोल्युगलं मकरोऽप्यत्र संस्थितः ।
माघो निगदितो मासः पत्रकं दशमं स्मृतम् ।। ६३
वाकारो जानुयुग्म च कुम्भस्तत्रादिसंस्थितः ।
पत्रकं फाल्गुनं प्रोक्तं तदेकादयमुत्तमम् ॥ ६४
पादौ यकारो मीनोऽपि स चैन्ने यसते मुने।
इदं द्वादशमं प्रोक्तं पत्रं चै केशवस्य हि ।। ६५
द्वादशार तथा चक्रं पष्णाभि द्वियुतं तथा ।
त्रिव्यूहमेकमूर्तिश्च तथोक्तः परमेश्वरः ॥ ६६
एवन्न् वयोक्तं देवस्य रूपं द्वादशपत्रकम् ।
आप का हो। (५१)
हे ब्रह्मन् । आज से यह पुत्र आप का होगा। इतना कहकर वे शीघ्र ही जिस मार्ग से आये थे उसी से चले गये। (५२)
पितामह ने भी उस विनय युक्त पुन सनत्कुमार को द्वादशपत्र योग का उपदेश किया। (५३)
भगवान् यासुदेव की शिसा में स्थित 'ओंगर', शिर पर स्थित मेप राशि और वेशास मास ये इसके प्रथम पत्र है। (५४)
मुर में स्थित 'नर' और वहीं पर विद्यमान पराशि तथा ज्येष्ठ मास ये उनो द्वितीय पत्र कहे गये हैं। (५५)
दोनों भुजाओं में स्थित 'मोकार', मिथुन राशि एय आषाढ मास-ये उनके तृतीय पत्र हैं। (५६)
उनके नेत्र युगल में विद्यमान 'भरार', कर्क राशि और प्रावण माप्त-ये चतुर्थ पनर हैं। (५७)
(उनके) हृदय ये रूप में विद्यमान 'गार', सिंहराशि और भाद्रपद मास-ये पधम पर हैं। (उनके) पयर के रूप में विद्यमान 'यार', न्याराशि और आश्विन मास-ये पष्ठ पत्रक है। (५९)
(उनके) अस्त्र-समूह के रूप में विद्यमान 'तेगार, तुरा-राशि और कार्तिक मास-ये सप्तम पत्रक है। (६०)
हे मुनि। (उनके) नाभि रूप में विद्यमान 'यार', वृश्चिक राशि और मार्गशीर्ष मास-ये अष्टम पत्रक है। (६१) (उनके) जघनरूप में विद्यमान 'सुमार', धनुराशि और पौष मास ये नाम पता है। (६२)
(उनने) अरु युगर-रूप मे विद्यमान 'देकार', मार राशि और माघ मास-ये दशम पत्रक है। (६३)
(उनके) दोनों घुटनों के रूप मे विधमान 'सार', कुम्भ राशि और फाल्गुन मास ये ग्यारहवें पता हैं। (६४)
(उनके) चरणद्वय रूप में विद्यमान 'यार', मीन राशि और चैन मास ये पारहवें पता है। ये दी केशर के द्वादश पत्र है। (६५)
उन पर यारह अरों, पारद-नाभियों और प्रिव्यूह से युक्त है। इस प्रगार यी उन परमेश्वर की एकमूर्ति है। (६६)
हे मुनिश्रेष्ठ ! मैंने तुमसे भगवान के इस द्वादशा पत्रक स्यस्प का यर्णन किया जिसमें जानने से पुन मरण
यस्मिन् ज्ञाते मुनिश्रेष्ठ न भूयो मरणं भवेत् ॥ ६७
द्वितीयमुक्तं सत्त्वाढ्यं चतुर्वणं चतुर्मखम् ।
चतुर्माहुमुदारा श्रीवत्सधरमव्ययम् ॥ ६८
तृतीयस्तामसो नाम शेपमूर्तिः सहस्रपात् ।
सहस्रवदनः श्रीमान् प्रजाप्रलयकारक. ।। ६९
चतुथों राजसो नाम रक्तवर्णश्चतुर्मुखः ।
द्विभुजो धारयन् मालां सृष्टिकृचादिपूरपः ।। ७०
अव्यक्तात् संभवन्त्येते त्रयो व्यक्वा महामने ।
अतो मरीचिप्रमुसास्तथान्येऽपि सहस्रशः ॥ ७१
एतद् तोक्तं मुनिवर्य रूपं
विभो. पुराणं मतिपुष्टिपर्थनम् ।
चतुर्भुजं तं स मुर्दुरात्मा
कृतान्तनाक्यात् उनराससाद ॥ ७२
तमागतं प्राह मुने मधुघ्न.
प्राप्तोऽसि केनासुर कारणेन ।
स प्राह योडू सह वै स्वयाग्य
तं प्राह भूयः सुरशत्रुहन्ता ॥ ७३
यदीह मां योडुमुपागतोऽसि
तत् कम्पते ते हृदयं किमर्थम् ।
ज्यरातुरस्येव मुर्महुरें
तन्नास्मि योत्स्ये सह कावरेण ॥ ७४
इत्येवमुक्तो मधुसूदनेन
मुरुस्तदा स्वे हृदये स्वहस्तम् ।
कथं व कस्येति मुहुस्तयोक्त्या
निपातयामास विपन्न युद्धिः॥ ७५
हरिश्च चक्र मृदुलाघवेन
मुमोच तइकमलस्य शत्रोः।
चिच्छेद देवास्तु गतव्यथाभवन्
देवं प्रशंसन्ति च पद्मनाभम् ॥ ७६
एतत् तवोक्तं मुरदत्यनाशनं
कृत हि युक्त्या शिवचक्रपाणिना।
अत, प्रसिद्धिं समुपाजगाम
मुरारिरित्येव विभुसिंहः ॥ ७७
इति श्रीवामनपुराणे पञ्चत्रिशोऽध्याय ॥३॥
नहीं होता।
उनरा द्वितीय सत्त्वमय, श्रीवत्सधारी अविनाशी स्वरूप, चतुर्वर्ण, चतुर्मुस, चतुर्याहु ए५ उदार अह्नों से युक्त हैं।(६०)
सहस्र पैरों एवं सहस्र मुखरों से सम्पन्न श्रीसयुक्त तमोगुणमयी उनी तृतीय शेपमूर्ति प्रजाओं का प्रल्य परती है। (६९)
उनका पतुर्थ प रानस है। यह रक्तवर्ण, चार मुस एय दो भुवाओं से सम्पन्न तथा माला से अर ड्यूत है।। यही रूप सटिकत्ता आदिपुरुष है। (७)
हे महामुनि । ये तीन व्यक्त मूत्तियाँ अव्यक्त से उत्पन्न होती हैं। इनसे ही मरीचि आदि ऋपि तथा अन्यान्य हजारों पुरप उत्पन्न हुए हैं। (७२)
हे मुनिर । तुम्हारे सामने मैंने विष्णु के अत्यन्त प्राचीन और मति-पुष्टि-बर्द्धक रूप का वर्णन क्यिा। दुरात्मा मुरु यमराज के फहने से पुन उन चतुर्भुज (विष्णु) के (७२)
हे मुनि । मधुसूदन ने आये हुए उससे पूछा-देअसुर।' तुम किस लिए आये हो ? उसने कहा-तुम्हारे साथ आज युद्ध करने आया हूँ । असुरारि ने उससे पुन कहा- (७३)
यदि तुम मेरे साथ युद्ध करने आये हो तो ज्वरातुर के सदृश तुम्हारा हदय वारम्वार क्यों कम्पित हो रहा है? अत में कातर पे साथ युद्ध नहीं करूँगा। (७४)
मधुसूदन के ऐसा पहने पर 'कैसे ? कहाँ ? सिका?' ऐसा पार यार कहने हुए नष्ट बुद्धि मुरु ने अपने हृदय पर हाथ रखा।
इसे देसार हरि ने धीरे से चक्र निकालार उस शत्रु के हदय कमल को दिन कर दिया। तदनन्तर सभी देवता दुस रहित होरर भगवान् पद्मनाभ विष्णु की प्रशंसा करने लगे। (७६)
मैंने तुमसे तीक्ष्ण चक्र धारण करने याले विष्णु द्वारा युधिपूर्वक किये गए मुर दैत्य के विनाश का वर्णन किया। इसी से विमु नृसिह 'मुरारि' नाम से प्रसिद्ध हु। (७७)
श्री वामपुराण में तेतीसवाँ अध्याय समाप्त।१५।।