मेना से तीन वश्याओं की उत्पत्ति, ब्रह्मा के शाप से कुटिला का आपोमयी होना, रागिणी को ब्रह्मा का शाप, उमा की तपश्चर्या, शिव का हिमवदाश्रम में निवास, शिव द्वारा तपस्विनी पार्धनी की परीक्षा, शिव का मन्दराचल पर गमन

प्रलस्त्य उवाच ।

मेनायाः कन्यकारितस्रो जाता रूपगुणान्विताः ।

सुनाम इति च ख्यातचतुर्थस्तनयोऽभवत् ।। १

रक्ताइगी रक्तनेत्रा च रक्ताम्मरविभूषिता ।

रागिणी नाम संजाता ज्येष्ठा मेनासुता मुने ॥ २

शुभाहगी पद्मपत्राक्षी नीलकुश्चितमूर्घजा।

श्वेतमाल्याम्बरधरा कुटिला नाम चापरा ॥३

नीलाञ्जनचयप्रख्या नीलेन्दीवरलोचना ।

रूपेणानुपमा काली जघन्या मेनकामुता ॥४

जातास्ताः कन्यकास्तिस्रः पडब्दात् परतो मुने ।

कर्तुं तपः प्रयातास्ता देवास्ता ददृशुः शुभाः ॥ ५

तदो दिवाकरः सर्वसुभिश्च तपस्विनी ।

कुटिला ब्रह्मलोकं तु नीता शशिकरप्रभा ॥ ६

अयोचुर्देवताः सर्वाः किं त्वियं जनयिष्यति ।

पुत्रं महिपहन्तारं ब्रह्मन् व्याख्यातुमर्हसि ।। ७

ततोऽब्रवीत् सुरपतिर्नेयं शक्ता तपस्विनी ।

तदनन्तर पितरों की कन्या मेना के साथ हिमालय यथेष्ट विपय भोग करने लगे। उस मेना ने भी सुरनारियों के सदृश अतिरूपवती तीन कन्याओं को किया। (११)

श्रीवामनपुराण में चौदोसवों अध्याय समाप्त ।।२४।।

२५

पुलस्त्य ने कहा-मेना को रूपगुणसम्पन्न तीन ] कन्यायें उत्पन्न हुई और सुनाभ नाम से विख्यात चौथा पुत्र उत्पन्न हुआ। (?)

हे मुनि । लाल अगों वाली, लाल नेत्रों वाली तथा लाल वात्रों से सुशोभित रागिणी नाम की मेना की ज्येष्ठ कन्या उत्पन्न हुई।

शुभाङ्गी, कमल-दल के समान नेत्रों वाली नीले एव पुंघराले केशों वाली तथा श्वेत माला एव पत्र धारण करने वाली दूसरी कुटिला नाम की कन्या थी।

मेना की छोटी कन्या का नाम काली था। उसका रंग नील अञ्जन पुञ्ज के समान तथा नेत्र नील कमल के समान थे। वह अनुपम रूपवती थी। (४)

हे मुनि । वे तीनों कन्यायें जन्म से ६ वर्ष के पश्चात् तपस्या करने चली गयीं। देवताओं ने उन सुन्दरी कन्याओं को देखा।

उसके बाद सभी आदित्य तथा वसुगण चन्द्र-किरण के सदृश प्रभा वाली तपस्विनी कुटिला को ब्रह्मलोक में ले गये। (६)

तदनन्तर सभी देवताओं ने ब्रह्मा से कहा-हे ब्रह्मन् ! आप बतलायें कि क्या यह महिपहप्ता पुत्र को उत्पन्न करेगी?

नव सुरपति ने कहा-यह तपस्विनी शर्व शिव का सेज नही

शाव धारयितुं तेजो वराकी मुच्यतां त्वियम् ।। ८

ततस्तु कुटिला द्धा ब्रह्माणं प्राह नारद ।

वथा यतिष्ये भगवन् यथा शात्र सुदुर्द्धरम् ॥९

धारयिष्याम्यहं तेजस्तथैव शृणु सत्तम ।

तपसाई सुतप्तेन समाराध्य जनार्दनम् ॥ १०

यथा हरस्य मूर्धानं नमयिष्ये पितामह ।

तथा देव करिष्यामि सत्यं सत्यं मयोदितम् ॥ ११

पुलस्त्य उवाच ।

ततः पितामहः क्रुद्धः कुटिलां प्राह दारुणाम् ।

भगवानादिकृद् ब्रह्मा सर्वेशोऽपि महामुने ॥ १२

ब्रह्मोवाच ।

यस्मान्मद्वचनं पापे न शान्तं कुटिले त्वया ।

तस्मान्मच्छापनिर्दग्या सर्वा आपो भविष्यसि ॥ १३

इत्येवं ब्रह्मणा शमा हिमवदुहिता मुने।

आपोमयी ब्रह्मलोकं प्लावयामास वेगिनी ।। १४

तामुवृत्तजलां दृष्ट्वा प्रबन्ध पितामहः ।

ऋक्सामाथर्वयजुमिङ्मयैर्वन्धनैर्टदम् ॥ १५

सा बद्धा संस्थिता ब्रह्मन् तत्रैव गिरिकन्यका ।

आपोमयी प्लावयन्ती ब्रह्मणो विमला जटाः ॥ १६

या सा रागवती नाम सापि नीता सुरैर्दिवम् ।

ब्रह्मणे तां निवेधैवं वामप्याह प्रजापतिः ॥ १७

सापि क्रुद्धाऽब्रवीन्नूनं तथा तप्स्ये महत्तपः ।

यथा मन्नामसंयुक्तो महिपनो भविष्यति ॥ १८

तामप्यथाशपद् ब्रह्मा सन्ध्या पापे भविष्यसि ।

या मद्वाक्यमलद्ध्यं वै सुरैर्लङ्घयसे बलात् ॥ १९

सापि जाता मुनिश्रेष्ठ सन्ध्या रागवती दतः ।

प्रतीच्छत् कृत्तिकायोगं शैलेया विग्रहं रढम् ।। २०

ततो गते कन्यके द्वे ज्ञात्वा मेना तपस्विनी ।

तपसो वारयामास उमेत्येवान वीच सा ॥ २१

तदेव माता नामास्याचक्रे पित्सुता शुमा ।

धारण कर सकती । इस बेचारी को छोड़ दो।

हे नारद ! तदनन्तर क्रोधित होकर कुटिला ने ब्रह्मा से कहा-हे भगवन् ! हे सत्तम ! सुनिये । मैं ऐसा प्रयत्न करूंगी जिससे शङ्कर के सुदुर्द्धर तेज को धारण कर सकूँ। हे पितामह ! में सत्य कहती हूँ कि घोर तप द्वारा जनार्दन की ऐसी आराधना करूँगी जिससे शङ्कर का मस्तक झुका दूंगी। (६-११)

पुलस्त्य ने कहा-हे महामुनि ! तदनन्तर क्रुश होकर सर्वेश, पितामह, आदिकर्ता, भगवान ब्रह्मा ने दारुण कुटिला (१२)

ब्रह्मा ने कहा-हे पापिनी कुटिले! क्योंकि तुमने मेरे वचन को सहन नहीं किया अतः मेरे शाप से निर्दग्ध होकर तुम पूर्ण रूप से जल हो जाओगी। (१३)

हे मुनि ! इस प्रकार ब्रह्मा से शापित हिमालय की पुत्री जलमयी होकर वेगपूर्वक ब्रझलोक को प्लावित करने लगी। (१४)

पितामह ने उसके उमदकर यह रहे जल-प्रवाह को देखार ऋक्, साम, अथर्व और यजुप्प वाजय के  बन्धन द्वारा उसे दृढ़ता पूर्वक बाँध दिया । (१५)

हे ब्रह्मन् ! आपोमयी पह गिरिकायका बद्ध होकर ब्रह्मा की विमल जटा को आप्लावित करती हुई यहीं रहने लगी। (१६)

देवतागण रागवती को भी स्वर्ग में ले गये एवं ब्रह्मा को उसे निवेदित किया। उससे भी ब्रह्मा ने उसी प्रकार कहा।

उसने भी क्रुद्ध होकर कहा-मैं निश्चय ही ऐसा महान तप करूँगी जिससे महिप को मारने वाला मेरे नाम से संयुक्त होगा। (१८)

ब्रह्मा ने उसे भी शाप दिया-हे पापिनी ! देवों से अनुलनीय मेरे वचन का अहंकारवश उलइन करने से तुम सन्भ्या हो जाओगी। (१९)

हे मुनिश्रेष्ठ! तदनन्तर वह शैलपुत्री रागवती भी सन्म्या होकर दविप्रह कृत्तिकायोग की प्रतीक्षा करने लगी। (२०)

तदनन्तर दो कन्याओं को गई जानकर तपस्विनी मेना ने (एतीय कन्या काठी को) सप से रोका । उसने स  मा ऐसा कहा। (२१)

उमेत्येव हि कन्यायाः सा जगाम तपोवनम् ॥ २२ -

ततः सा मनसा देवं शूलपाणिं वृपध्वजम् ।

रुद्रं चेतसि संधाय तपस्तेपे सुदुष्करम् ॥ २३

ततो प्रमाऽब्रवीद् देवान् गच्छध्वं हिमवत्सुताम् ।

इहानयध्वं तां काली तपस्यन्ती हिमालये ॥२४

ततो देवाः समाजग्मुर्ददृशुः शैलनन्दिनीम् ।

तेजसा विजितास्तस्या न शेकुरुपसर्पितम् ॥ २५

इन्द्रोऽमरगणैः साई निई तस्तेजसा तया ।

ब्रह्मणोऽधिकतेजोऽस्या विनिवेद्य प्रतिष्ठितः ।। २६

ततो ब्रह्माऽनधीत् सा हि ध्रवं शंकरयल्लभा ।

यूयं यत्तेजसा नूनं विक्षिप्तास्तु हतप्रभाः ॥ २७

तस्माद् भजध्वं स्वं स्वं हि स्थानं भो विगतज्वराः ।

सतारकं हि महिपं विदध्वं निहतं रणे ॥ २८

इत्येवमुक्ता देवेन ब्रह्मणा सेन्द्रकाः सुराः ।

जग्मुः स्वान्येव विष्ण्यानि सद्यो वै विगतज्वराः ॥ २९

उमामपि वपस्यन्तीं हिमवान् पर्वतेश्वरः ।

निवर्त्य तपसस्तस्मात् सदारो बनयद्गृहान् ॥ ३०

देवोऽप्याश्रित्य तद्रौद्रं व्रतं नाम्ना निराश्रयम् ।

विचचार महाशैलान् मेरुपायान् महामतिः ॥३१

स कदाचिन्महाशैलं हिमवन्तं समागतः ।

तेनाचिंतः श्रद्धयाऽसौ वां रात्रिमवसद्धः॥ ३२

द्वितीयेऽति गिरीशेन महादेवो निमन्त्रितः ।

इहैव विष्टस्व विभो तपःसाधनकारणात् ।। ३३

इत्येवमुक्तो गिरिणा हरवत्रे मतिं च ताम् ।

तस्थावाश्रममाश्रित्य त्यक्त्वा यासं निराश्रयम् ॥ ३४

वसतोऽप्याश्रमे तस्य देवदेवस्य शुलिनः ।

तं देशमगमत् काली गिरिराजसुता शुभा ॥ ३५

तामागतां हरो दृष्ट्वा भूयो जातां नियां सतीम् ।

स्वागतेनामिसंपूज्य तस्थौ योगरवो हरः॥ ३६

पितरों की पुत्री, कल्याणमयी, माता ( मेना) मे कन्या का वही 'उमा' यह नाम रखा। वह भी तपोवन मे चली गयी। (२२)

तदनन्तर उसने मन में शूलपाणि वृपध्वज रुद्र को रखकर घोर तप किया। (२३)

तदुपरान्त ब्रह्मा ने देवताओं से कहा-तुम लोग हिमालय पर तप कर रही हिमालय की पुत्री काली के पास जाओ और उसे यहाँ लाओ। (२४)

तदनन्तर देवता आये और उन्होंने शैलनन्दिनी को देखा। किन्तु उसके तेज से विजित हो जाने से वे निकट न जा सके।

देवताओं के साथ इन्द्र उसके तेज से मिल हो गये । वे ब्रह्मा से उसके सेज की अधिकता का निवे. दन कर सड़े हो गये। (२६)

तदनन्तर ब्रह्मा ने कहा- यह अवश्य ही शङ्कर की पत्नी होगी। क्योंकि उसके सेज से तुम लोग विक्षिप्त और इतप्रभ हो गये हो। (२७)

अत. हे देवो! तुम लोग चिन्ता छोड़कर अपने-अपने स्थान को जाओ। युद्ध में तारक के साथ महिप को मारा गया समझो। (२८)

ब्रह्मदेष के ऐसा कहने पर इन्द्र सहित सभी देवता तुरन्त निश्चिन्त होकर अपने अपने स्थान पर चले गये। (२९)

तप करती हुई उमा को भी उस तप से निवर्तित कर पत्नी-सहित हिमवान् घर ले आये। (३०)

महाज्ञानी महादेव भी निराश्रय नामक उस भयंकर प्रत का अवलम्बन कर मेरु आदि महाशैलों पर विचरण करने लगे। (३१)

एक समय वे महाशैल हिमाचल पर गये। उस (हिमालय ) से श्रद्धापूर्वक पूजित होने पर उन्होंने उस रात वहीं निवास किया। (३२)

दूसरे दिन गिरिराज ने महादेव को निमन्त्रित कर कहा-"हे विभु ! तपस्या-हेतु आप यहीं रहें।" (३३)

पर्वद के ऐसा कहने पर हर ने भी यही विचार किया एवं निराश्रयवास छोड़कर आश्रम में रहने लगे। (३४)

देवाधि देव त्रिशूलधारी शङ्कर के आश्रम में रहने पर गिरिराज पुत्री कल्याणी काली उस स्थान पर गयी । (३५)

पुन उत्पन्न प्रिया सती को आई हुई देख हर ने स्वागत द्वारा उनका सत्कार किया और पुनः योगरत हो गये। (३६)

सा चाम्येत्य वरारोहा कृताञ्जलिपरिग्रहा।

यवन्दे चरणौ शैचौ सखीभिः सह भामिनी ॥ ३७

ततस्तु सुचिराच्छवः समीक्ष्य गिरिकन्यकाम् ।

न युक्तं चैवमुक्त्वाऽथ सगणोऽन्तदंधे ततः ॥ ३८

साऽपि शर्ववचो रौद्रं श्रुत्वा ज्ञानसमन्विता ।

अन्तदुःखेन दद्यन्ती पितरं प्राह पार्वती ॥ ३९

तात यास्ये महारण्ये तप्तुं घोरं महत्तपः ।

आराधनाय देवस्य शंकरस्य पिनाकिनः ॥ ४०

तथेत्युक्तं वचः पित्रा पादे तस्यैव विस्तृते ।

ललिताख्या तपस्तेथे हराराधनकाम्यया ।। ४१

तस्याः सत्यस्तदा देव्याः परिचर्या तु कुर्वते ।

समित्कुशफलं चापि मूलाहरणमादितः ॥ ४२

विनोदनाथं पार्वत्या मृन्मयः शूलधृग हरः ।

कृतस्तु तेजसा युक्तो भद्रमस्त्विति साऽब्रवीत् ॥ ४३

पूजां करोति तस्यैव तं पश्यति मुहुर्मुहुः ।

ततोऽस्यास्तुष्टिमगमच्या त्रिपुरान्तकृत् ।। ४४

घटुरूपं समाधाय आपाढी सुञ्जमेखली।

यज्ञोपवीती छत्री च मृगाजिनधरस्तथा ॥ ४५

कमण्डलुव्यग्रकरो भस्मारुणितविग्रहः ।

प्रत्याश्रमं पर्यटन् स तं काल्याश्रममागतः ॥ ४६

वमुत्याय वदा काली सखीभिः सह नारद

पूजयित्वा यथान्यायं पर्यपृच्छदिदं ततः ॥ ४७

उमोवाच ।

कस्मादागम्यते भिक्षो कुत्र स्थाने तवाश्रमः ।

क्व च त्वं प्रतिगन्तासि मम शीघ्र निवेदय ॥ ४८

भिक्षुरुवाच ।

ममाश्रमपदं वाले वाराणस्यां शुचिव्रते ।

अथावस्तीर्थयात्रायां गमिष्यामि पृथूदकम् ॥ ४९

देव्युवाच ।

किं पुण्यं तत्र विप्रेन्द्र लब्धासि त्वं प्रधूदकै ।

जोद कर सखियों के साथ शिव के दोनों चरणों मे प्रणाम किया। (३७)

तदनन्तर गिरिकन्या को देर तक देखकर 'यह उचित नहीं है। ऐसा कहने के उपरान्त शङ्कर गणों के साथ अन्तर्दित हो गये। (३८)

शङ्कर के भयहर वचन को सुनकर अन्तर्दुःख से जलती हुई ज्ञान समन्वित उन पार्वती ने भी पिता से कहा- (३९)

हे तात! पिनाकधारी देव शङ्कर की आराधना-हेतु मैं महारण्य मे घोर तथा महान तप करने जाऊँगी । (४०)

पिता ने 'ठीक है यह कहा। तदनन्तर हर के आरा-धना की कामना से ललिता (पार्वती) उसी (हिमालय) की विस्तृत तलहटी में तप करने लगी। (४१)

उस समय उनकी सखियों समिधा, कुश, फल मूलादि सारर देयो की सेवा करने लगी। (४२)

(उन सखियों ने) पार्वती के विनोदार्थ मिट्टी के तेजस्वी त्रिशूलवारी शर का निर्माग किया। पार्वती ने भी 'ठीक है' कहा- (४३)

वे उसी की पूजा फरती एवं पुनः पुन: उसे देखती रहती थी। तदनन्तर उनकी श्रद्धा से त्रिपुरान्तकारी शंकर सन्तुष्ट हो गये। (४४)

वदुपरान्त वे पालाशदण्ड, मुझ को मेखला, यज्ञोपवीत छत्र एवं मृगचर्म धारण कर बटु के रूप में हाथ में कमण्ड लिए एवं शरीर में भस्म लगाये हुए प्रत्येक आश्रम भ्रमण करते हुए काली के आश्रम में पहुंचे। (४५-४६)

हे नारद ! तदनन्तर सखियों सहित काली ने उठ उनका यथोचित पूजन किया एवं तदनन्तर उनसे य पूछा। (४७)

उमा ने कहा-हे भिक्षु! आप शीघ्र मुझे पतला कि आप यहाँ से आ रहे हैं? आप का आश्रम कहाँ एवं आप वहाँ जायगे?

भिक्षु ने कहा-"हे पवित्रवतों यात्री बाले ! वाराणस में मेरा आश्रम है। मैं तीर्थयात्रा कर रहा हूँ। यहाँ से में

(४)

देवी ने कहा-हे विप्रेन्द्र ! पृथूदक में तुम्हें कौन सा पुण्य उपलब्ध होगा? मार्ग में किन-किन तीर्थों में

यथि स्नानेन च फलं केषु किं लब्धवानसि ॥ ५०

भिक्षुरुवाच ।

मया स्तानं प्रयागे तु कृत प्रथममेव हि ।

ततोऽथ तीर्थे कुन्जाने जयन्ते चण्डिकैघरे ॥ ५१

बन्धुरन्दे च कर्कन्धे तीर्थे कनखले तथा ।

सरस्वत्यामग्निकुण्डे भद्राया तु त्रिविष्टपे ॥ ५२

कोनटे कोटितीर्थे च कुञ्जके च कृशोदरि ।

निष्कामेन कृत स्नान ततोऽभ्यागा तवाश्रमम् ॥ ५३

इहस्थां त्या समाभाष्य गमिष्यामि पृथूदकम् ।

पृच्छामि यदहं त्वां वै तत्र न कोडुमर्हसि ॥ ५४

अहं यत्तपसात्मानं शोपयामि कुशोदरि ।

याल्येऽपि संयततनुस्तत्तु बलाध्यं द्विजन्मनाम् ॥ ५५

किमर्थ भवती रौद्र प्रथमे ययसि स्थिता ।

तप समाश्रिता भीरु संशय. प्रतिभाति मे ॥५६

प्रथमे वयसि स्त्रीणा सह भर्ना विलासिनि ।

सुभोगा भोगिताः काले ब्रजन्ति स्थिरयौवने || ५७

तपसा वाञ्छयन्तीह गिरिजे सचराचराः ।

रूपामिजनमैश्वयं तच ते विद्यते घहु ।। ५८

तत् किमर्थमपास्यैतानलकाराञ् जटा धृताः ।

चीनाशु परित्यज्य किं त्वं पल्कलधारिणी।। ५९

पुलस्त्य उवाच ।

ततस्तु तपसा वृद्धा देव्याः मोमनभा सखी।

भिक्ष्वे कथयामास यथावत् सा हि नारद ॥६०

सोमप्रभोवाच ।

तपश्चर्या द्विजश्रेष्ठ पार्वत्या येन हेतुना।

त भृणुष्व विय काली हर भारमिच्छति ।। ६१

पुलस्त्य उवाच ।

सोमप्रभाया वचन श्रुत्या संकम्प्य वै शिरः।

विहस्य च महाहास भिक्षुराह वचस्त्विदम् ॥ ६२

भिक्षुरुवाच ।

वदामि ते पार्वति चास्यमेव

केन प्रदता तर बुद्धिरेषा ।

कथं कर. पल्लरकोमलस्ते

समेप्यते शार्यकरं ससर्पम् ॥ ६३

स्नान करने से तुम्हें कौन कौन फल प्राप्त हुआ ? (५०)

भिक्षु ने कहा-हे कृशोदरि मैंने पहले प्रयाग में स्नान किया है, तदनन्तर कुब्जाघ्र, जयन्त, चण्डिकेश्वर पन्धुवृन्द, कर्वन्ध, कनखलतीर्थ, सरस्वती, अग्निकुण्ड, भद्रा, निविष्टप,कोनट कोटितीर्थ और कुब्जक में निष्काम भाव से स्नान कर मैं तुम्हारे आश्रम में आया हूँ। (५१-५३)

यहाँ स्थित तुमसे वार्ता करने के पश्चात् में पृथूदक तीर्थ में जाऊँगा। मैं तुमसे जो कुछ पूछता हूँ उस पर मोध न करना। (५४)

हे यशोदरि । बाल्यावस्था में भी सयत शरीर होकर मैं जो वपस्या से अपने को सुसा रहा हूँ यह तो ब्राह्मणों के लिए प्रशंसनीय ही है। (५५)

परन्तु, हे भीरु । इस प्रथमावस्था मे ही तुम क्यों भयर तप कर रही हो ? (इसमें मुझे) सशय हो रहा है। (५६)

हे स्थिरयौपने । हे विलासिनि । प्रथमावस्था के काल में पति के साथ स्रियाँ सुन्दर भोगों का भोग करती हैं। (५७)

हे गिरिजे। चराचर जीव तपस्या से ससार में रूप, सत्कुल और ऐश्वर्य चाहते हैं, वे सभी तुम्हें प्रचुर. मात्रा में प्राप्त हैं। (५८)

तो इन अलङ्कारों को छोड़कर तुमने जटा क्यों धारण किया है ? चीनाशुक रेशमी वस्त्र का परित्याग कर तुम वल्कल क्यों पहन ली? (५६)

पुलस्त्य ने यहा-हे नारद । तदनन्तर पार्वती की, तप से युद्ध सोमप्रभा नामक सखी ने भिक्षु से वस्तुस्थिति का वर्णन किया। (६०)

सोमामा ने कहा-हे द्विजश्रेष्ठ । पार्वती जिस शरण से तपरया कर रही हैं, उसे सुनिये। यह काली शिव को अपना पति बनाना चाहती है।

युलस्त्य ने कहा-सोमप्रभा की बात सुनकर शिर हिलाते हुये घड़े जोर से हंसकर मिक्षु ने यह वचन (६२)

भिक्षु ने कहा- पार्वदि । मैं तुमसे यह बात पूछता हूँ कि तुम्हें यह बुद्धि किसने दी? तुम्हारा पल्लव के समान कोमल हाथ शहर के सर्पयुक्क हाथ से कैसे मिलेगा। (६३)

(६१)

तथा दुकूलाम्बरशालिनी त्वं

मृगारिचर्माभिवृतस्तु रुद्रः।

त्वं चन्दनाक्ता स च भस्ममृपितो

न युक्तरूपं प्रतिभाति मे स्विदम् ॥ ६४

पुलस्य उवाच।

एवं वादिनि विप्रेन पार्वती भिक्षुमनवीत् ।

मा मैवं बद भिक्षो त्यं हरः सर्वगुणाधिकः ॥ ६५

शिवो वाप्यथवा भीमः सधनो निर्धनोऽपि वा।

अलंकृतो वा देवेशस्तथा वाप्यनलंकृतः ।। ६६

यादृशस्तादृशो वापि स मे नाथो भविष्यति ।

निवार्यतामय भिक्षुर्विचक्षुः स्फुरिताधरः।

न तथा निन्दकः पापी यथा शृण्वन् शशिप्रमे ।। ६७

पुलस्त्य उवाच।

इत्येवमुक्त्वा वरदा समुत्थातुमथैच्छत ।

ततोऽत्यज भिक्षुरूपं स्वरूपस्थोऽभवच्छिनः ॥ ६८

भृत्योवाच प्रिये गच्छ स्वमेव भवनं पितुः।

वार्थाय प्रहेष्यामि महीन हिमवद्गृहे ।। ६९

यह रुद्रमीहन्त्या मृन्मयश्वेश्वरः कृतः ।

असौ भद्रेश्वरेत्येवं ख्यातो लोके भविष्यति ॥ ७०.

देवदानवगन्धर्वा यक्षाः किंपुरुषोरगाः ।

पूजयिष्यन्ति सततं मानवाश्च शुमेप्सवः ॥ ७१

इत्येवमुक्ता देवेन गिरिराजसुता मुने ।

जगामाम्मरमाविश्य स्वमेव भवनं पितुः ॥ ७२

शकरोऽपि महातेजा विसृज्य गिरिकन्यकाम् ।

पृथदकं जगामाथ स्नानं चक्रे विधानतः ॥ ७३

वतस्तु देवप्रवरो महेश्वरः

पृथूदके स्नानमपास्तकल्मषः ।

कृत्वा सनन्दिः सगणः सवाहनो

महागिरि मन्दरमाजगाम ॥ ७४

और तुम सुन्दरवस्त्र धारण करने पाली हो किन्तु रुद्र व्याघ्रचर्म धारण करते है। तुम चन्दन-चर्चित हो एवं शकर भरम भूपित हैं । अत मुझे यह उपयुक्त नहीं प्रतीत होता। (६४)

पुलस्त्य ने कहा- हे विप्रेन्द्र । भिक्षु के ऐसा कहने पर पार्वती ने उससे कहा-हे भिक्षुक । तुम ऐसा मत कहो । शंकर सम गुणे में श्रेष्ठ है। (६५)

वे देवेश शिष या भयङ्कर, सधन या निधन तथा अलंकृत अथवा अलवार विहीन हों। वे जैसे तैसे क्यों न हों वे ही मेरे स्वामी होंगे। हे शशिप्रभे। इसे मना करो। यह भिशुरु पुन घुछ कहना चाहता है जिससे इसके ओठ फड़क रहे हैं। निन्दक येसा पापी नहीं ता जैसा (निन्दा को) मुनने पाय होता है। (६६-६७)

पुलस्त्य ने कहा-ऐसा कहकर परदा पार्वती ने यहाँ उठ कर जाना पाहा। सदनन्तर शकर मिक्षुरूप को त्याग स्यरूपस्थ हो गये। (६८)

वे स्वरूपस्य होकर पोल-हे प्रिये! अपने पिता के घर जाओ। तुम्हारे लिये मैं हिमवान् के घर पर मर्पियों को भेजूंगा। (६९)

रुद्र को चाहने पाली तुमने यहाँ जिस मृण्मय ईवर को बनाया है वे ससार में भद्रेश्वर नाम से प्रसिद्ध (७०)

देव, दानप, गन्धर्ष, यक्ष, किंनर, उरग एवं मनुष्य मगल की इच्छा से सदा उनकी पूजा करेंगे। (७१)

हे मुनि। शहर के ऐसा कहने पर हिमालय-पुत्री पार्वती आकाश मार्ग से अपने पिता के घर चली (७२)

महातेजस्वी शहर भी गिरिराज की पन्या ने विदाफर पृथूदक तीर्थ में गये एवं विधान पूर्पक स्नान (७३)

वदनन्तर देयप्रयर महेपर पृयूदक में स्नान से पाप विमुफ होकर नन्दी, गमों एवं याहन के सहित महापर्यंत मन्दर पर आये। (७४)