वामन महा पुराण
दण्डक द्वारा अरजा का धर्पण शुक्र द्वारा दण्डक को शाप प्रदान प्रह्राल का अन्धक से परस्रीवर्जन का उपदेश अन्धक का शिव के समीप दूत प्रेपरण अन्धक का शिव के साथ युद्धे घोग
अरजा उवाच।
नात्मानं वर दास्यामि यहुनोक्तेन किं वन ।
रक्षन्ती भवतः शापादात्मानं च महीपते ।।
प्रहाद उवाच
इत्यं विवदमानां तां भार्गवेन्द्रसुता बलात् ।
कामोपहतचिचात्मा व्यसयत मन्दधीः ॥ २
वां कुत्ला च्युतचारित्रां मदान्धः पृथिवीपतिः ।
निश्चत्रामाश्रमात् तस्माद् गतथ नगरं निजम् ।। ३
साऽपि शुक्रसुता तनी अरजा रजसाप्लुता । ।
आश्रमादय निर्गत्य पहिस्तस्थायधोमुसी ॥ ४
चिन्तयन्ती स्वपितरं रुदती च मुहुर्मुहुः ।
महामहोपतमेव रोहिणी शशिनः प्रिया ।। ५
तो पहुतिथे काले समाप्ते यज्ञकर्मणि ।
पातालादागमच्छुकः खमाश्रमपदं मुनिः ॥ ६
आश्रमान्ते च ददृशे सुता दैत्य रजस्खलाम् ।
मेघलेसामिपाकाशे संध्यारागेण रंजिताम् ॥ ७
वां दृष्ट्या परिपप्रच्छ पुरि केनासि घर्पिता।
कः क्रीडति सरोपेण सममाशीविषेण हि ॥ ८
कोऽयैव याम्यां नगरी गमिप्यति सुदुर्मतिः ।
यस्त्वां गुद्धसमाचार विध्वंसयति पापकृत् ॥९
ततः स्वपितरं दृष्ट्वा कम्पमाना पुनः पुनः ।
रुदन्ती बीडयोपेता मन्दं मन्दमुपाच ह ।। १०
तर शिष्येण दण्डेन वार्यमाणेन चासछन् ।
पलादनाथा रुदती नीताऽहं यचनीयताम् ॥ ११
एतत् पुच्या वचः श्रुत्वा क्रोधमरतलोचनः ।
उपस्पृश्य शुचिर्भूत्वा इदं वचनमब्रवीत् ॥ १२
यस्मात् तेनाविनीतेन मत्तो ह्यभयमुत्तमम् ।
गौरवं च तिरस्कृत्य च्युतधर्माऽरजा कता ॥ १३
तस्मात् सराष्ट्रः सरलः सभृत्यो वाहनैः सह ।
४0
अरजा ने यहा हे महीपति। आपके अधिक पहने से क्या होगा ? (पिता के) शाप से आपरी एवं अपनी रता करती हुई में आपको आरमदान नहीं करूँगी।
प्रसाद ने कहा-कामान्ध उस मूर्स ने इस प्रकार विवाद करती हुई शुक्र की उस पुत्री यो बलपूर्वक भ्रष्ट कर दिया। (२)
मदान्ध राजा उसका चरित भ्रष्ट कर उस आश्रम से निकल कर अपने नगर चला गया। (३)
तदनन्तर रज से आप्लुत वह तन्वद्गी शुनसुता अरजा भी आश्रम से निकलकर नीचा मुख किये हुए बाहर बैठ गई। (४)
महाप से उपतप्त चन्द्र प्रिया रोहिणी के सदृश वह अपने पिता का चिन्तन करती हुई पारम्बार रोने लगी।
तदनन्तर बहुत समय के बाद यज्ञ समाप्त होने पर शुफमुनि पाताल से अपने आश्रम में आये।
हे दैत्य ! उन्होंने आश्रम से बाहर आकाश में सन्ध्या- फालीन लालिमा से रजित मेघ माला की तरह अपनी रजस्वला पुनी को देसा। (७)
उसे देखकर उन्होंने पूछा -हे पुनी। किराने तुम्हारा धर्पण किया है ? रोपयुक्त सर्प से कौन क्रीडा कर रहा है। (८)
शुद्ध-चारित्र्यसम्पन्न तुम्हें भ्रष्ट कर कौन दुर्मति पापी आज ही यम पुरी जाने वाला है ?
तदनन्तर अपने पिता को देखकर बारम्बार काँपती एवं रोती हुई लजायुक्त अरजा ने धीरे धीरे कहा- (१०)
बार-बार मना करने पर भी आपके शिष्य दण्ड ने रोती हुई मुझ अनाथा को बल पूर्वक कलङ्कित किया । (११)
पुत्री का यह वाक्य सुनकर शुक्राचार्य के नेत्र क्रोध से लाल हो गये। उन्होंने आचमन कर शुद्ध होकर यह वचन कहा- (१२)
क्योंकि उस अविनीत ने मुझसे प्राप्त उत्तम अभय एवं गौरव को तिरस्कृत कर अरजा को धर्मभ्रष्ट किया है अतः
सप्तरात्रान्तराद् भस्म ग्रायवृष्टया भविष्यति ॥ १४
इत्येवमुक्त्वा मुनिपुंगवोऽसौ
शप्त्वा स दण्डं स्वसुतामुवाच ।
त्वं पापमोक्षार्थमित्व पुत्रि
तिष्ठस्व कल्याणि तपश्चरन्ती ।। १५
शप्त्वत्थं भगवान् शुक्रो दण्डमिक्ष्याकुनन्दनम् ।
जगाम शिष्यसहितः पातालं दानवालयम् ।। १६
दण्डोऽपि भस्मसाद् भूतः सराष्ट्रवलवाहनः ।
महता ग्रावण सप्तरात्रान्वरे तदा ॥ १७
एवं तद्दण्डकारण्यं परित्यज्यन्ति देवताः ।
आलयं राक्षसानां तु कृतं देवेन शंभुना ।। १८
एवं परकलत्राणि नयन्ति सुकृतीनपि ।
भस्मभूतान् प्राकृतांस्तु महान्तं च परामयम् ॥ १९
तस्मादन्धक दुर्युद्धिर्न कार्या भवता स्वियम् ।
प्राकृताऽपि दहेन्नारी किताहोदिनन्दिनी ॥ २०
शंकरोऽपि न दैत्येश शक्यो जेतुं सुरासुरैः ।
द्रष्टुमप्यमितीजस्कः किम योधयितुं रणे ।। २१
पुलस्त्य उवाच ।
इत्येवमुक्त वचने ऋद्धस्तात्रेक्षणः श्वसन् ।
चास्यमाह महातेजाः प्रसादं चान्धकासुरः ।। २२
किं ममासौ रणे यो शक्तस्त्रिणयनोऽसुर ।
एकाकी धर्मरहितो नरमारुणितविग्रहः ।। २३
नाम्धको पिभियादिन्द्रानामरेभ्यः कथंचन ।
स कयं पपत्राक्षाद् विभेति स्त्रीमुसेक्षकाद् ।। २४
तच्छ्रुत्वाऽस्य वचो घोरं प्रहादः प्राह नारद ।
न सँम्यगुक्तं भवता विरुद्धं धर्मतोऽर्थतः ॥ २५
हुताशनपतहाभ्यां सिंहकोष्टुकयोरिव ।
गजेन्द्रमशकाभ्यां च रुम्मपापाणयोरिव ।। २६
एतेषामेभिरुदितं यावदन्तरमन्धक ।
तावदेवान्तरं चास्ति भवतो वा हरस्य च ।। २७
वह सात रात्रियों में उपलवृष्टि के कारण राष्ट्र, सेना, भृत्य एवं वाहनों सहित विनष्ट हो जायेगा। {१३-१४)
उन मुनिश्रेष्ठ ने ऐसा कहकर दण्ड यो शाप देने के उपरान्त अपनी पुत्री से कहा-हे एत्री ! हे कल्याणी ! पाप से मुक्त होने के लिए तुम तप करती हुई यहीं रहो। (१५)
भगवान् शुक्र इक्ष्वाकुनन्दन दण्ड को इस प्रकार शाप देकर शिष्य के साथ दानवों के निवास स्थान पाताल में चले गये।
तदनन्तर दण्ड भी महती उपलवृष्टि के द्वारा सात- रात्रियों के भीतर अपने राज्य, सेना, और वाहनों के साथ नष्ट हो गया।
इसी से देवताओं ने दण्डकारण्य का परित्याग कर दिया एवं शम्भु ने उसे राक्षसों का स्थान बना दिया। (१८)
इस प्रकार परस्त्रियाँ सुकृतियों को भी भस्मीभूत कर देवी हैं। सामान्य मनुष्य तो महान पराभव प्राप्त करते हैं। (१६)
अतः हे अन्धक! आपको ऐसी दुर्बुद्धि नहीं करनी चाहिए। साधारण स्त्री भी जला सकती है तो पार्वती का क्या कहना (२०)
हे दैत्येश्वर ! सुर या असुर कोई भी महादेव को जीत नहीं सकता। जय अमित ओजस्वी शंकर को रण मे देखा भी नहीं जा सकता तो उनसे युद्ध करना कैसे सम्भव है ? (२१)
पुलस्त्य ने कहा-ऐसा वचन कट्ने पर मुद्ध एवं रक्तनेत्र महातेजस्वी अन्धकासुर ने दीर्घ श्वास लेते हुए प्रहलाद से (यह) वाक्य कहा- (२२)
हे असुर ! क्या भस्मलित शरीर वाला धर्म रहित एकाकी पद्द त्रिलोचन संग्राम मे मुझसे युद्ध कर सकता है? (२३)
जो अन्धक इन्द्र या (अन्य) देवताओं से कभी भयभीत नहीं होता यह वृपवाहन एवं स्त्री का मुख देखने वाले त्रिनेत्र से कैसे डर सकता है ? (२४)
हे नारद । उसके उस घोर वचन को सुनकर प्रहलाद ने कहा-आप ने यह ठीक नहीं कहा है। आपसा कथन धर्म एवं अर्थ के विरुद्ध है। (२५)
हे अन्धक! अग्नि एवं पतङ्ग, सिंह एवं शृगाल, गजेन्द्र एवं मशक तथा स्वर्ण एय पापाण मे जितना अन्तर रहा जाता है उतना ही अन्तर आप और शङ्कर के मध्य है। (२६-२७)
वारितोऽसि मया वीर भूयो भूयश्च वार्यसे ।
भृणुष्य वाक्यं देवरसितस्य महात्मनः ॥ २८
यो धर्मशीलो जितमानरोपो
विधाविनीतो न परोपतापी ।
स्वदारतुष्टः परदारवर्जी
न वस्य लोके भयमस्ति किंचित् ।। २९
यो धर्महीनः कलहप्रियः सदा
परोपतापी श्रुतिशास्त्रवर्जितः ।
परार्थदारेप्सुरवर्णसंगमी
सुसं न विन्दत परत्र चेह ॥ ३०
धर्मान्वितोऽभृद् भगवान् प्रभाकरः
संत्यक्तरोपश्च मुनिः स वारुणिः ।
विद्यान्वितोऽभून्मनुरर्कपुत्रः
स्वदारसंतुष्टमनास्त्वगस्त्यः ॥ ३१
एवानि पुण्यानि कृतान्यमीभि-
मया निवद्धानि कुलक्रमोक्त्या ।
तेनोन्विताः शापवरक्षमाश्च
जाताश्च सर्वे सुरसिद्धपूज्याः ॥ ३२
अधर्मयुक्तोङ्गसतो बभूव
विभुश्व निस्यं कलहप्रियोभूव।
परोपतापी नसुचिर्दुरात्मा
पराचलेप्सुर्नहुपश्च राजा।।
परार्यलिप्सुर्दितिजो हिरणयद्दक्
मूर्खस्तु तस्याध्यनुजः सुदुर्मतिः।
अवर्णसंगी यदुरुत्तमौजा
एते विनष्टास्त्वनधात् पुरा हि।।
तस्माद् धर्मो न संत्याज्यो धर्मो हि परमा गतिः।
धर्महीना नरा यान्ति रौरवं नरकं महत्।।
धर्मस्तु गदितः पृभिस्तारणे दिवि चेह च।
पतनाव तथा धर्म इह लोके परत्र च।।
स्याज्यं धर्मन्चितैश्चित्यं परदारोपसेवनम्।
नयन्ति परदारा हि नरकानेकविंशतिम्।।
सर्वेपामपि वर्णानामेष धर्मो ध्रवोन्धक।।
परार्थपरद्रेषु यदा वाञ्छां करिष्यति।
हे वीर! आपको मैंने रोग है एवं वारयार रोक रहा हूँ। आप देवपि असित का वचन सुनें। (२८)
जो व्यक्फि धर्मशील, अभिमान एवं क्रोध को जीवने थाला, विद्या से विनीत, किसी को दुख न देने वाला, अपनी पत्नी में सन्तुष्ट तथा परस्त्री का पर्जन परने वाला होता है उसे संसार में कोई भय नहीं होता। (२९)
जो व्यक्ति धर्महीन, कलहप्रिय, सदा दूसरों को दुख देने वाला, वेद-शास्त्र रहित, दूसरे के धन और स्त्री की इच्छा रखने वाला, तथा भिन्न वर्ण के साथ संसर्ग करने वाला होता है, यह इस लोक और परलोक में सुख नहीं प्राप्त करता। (३०)
भगवान भास्कर धर्मयुक्त थे, महर्षि वारुणि (वशिष्ठ) मोधत्यागी थे, सूर्यपुत्र मनु विद्यावान थे एवं अगस्त्य ऋपि अपनी पत्नी में सन्तुष्ट थे। (३१)
मैंने कुल के क्रमानुसार इन पुण्य करने वालों का उल्लेख किया है। शाप एवं घर देने में समर्थ ये सभी तेजस्वी लोग देवताओं और सिद्धों के पूजनीय हुए। (३२)
अङ्ग-पुत्र(वेन) अधर्ग युद्ध था, विमुनिस्त कलह प्रिय था, दुरात्मा नमुचि दूसरे को संताप देने वालाथा। एवं राजा नदुष दूसरे की स्री प्राप्त करना चाहता था।
दिति पुत्र हिरण्याश्च परधन का लोभी था, उसका अनुज दुर्मति एवं मूख था एवं पराक्रमी युद्ध भिन्न-वर्ण के साथ ससर्ग करने वाला था। ये सभी पूर्वकाल में दुर्नीति के कारण नष्ट हो गये।
इसलिये धर्म का स्थान नही करना चाहिए क्योंकि धर्म ही परम गति है। धर्महीन मनुष्य महान गौरव नरक में जाते हैं।
मनुष्यो ने धर्म को लोक तथा परलोक पार करने वाला बताया है तथा अधर्म को इस लोक और परलोक में पतन का कारण बताया है।
धार्मिक व्यक्तियों को परस्त्री-सेवन सदैव स्थाज्य बताया है। परस्त्रियाँ इक्कीस नरको मे ले जाती है। हे अन्धक सभी वर्णो के लिये यह निश्चित धर्म है।
जो मनुष्य परधन और परस्त्री में इच्छा करता है यह
स याति नरकं घोरं रौरवं बहुलाः समाः ॥ ३८
एवं पुरासुरपते देवपिरसितोऽव्ययः ।
प्राह धर्मव्यवस्थानं सगेन्द्रायारुणाय हि ॥ ३९
तस्मात् सुदुरतो वर्जेत् परदारान् विचक्षणः ।
नयन्ति निकृतिप्रज्ञं परदाराः पराभवम् ॥ ४०
पुलस्त्य उवाच ।
इत्येवमुक्त वचने प्रहादं प्राह चान्धकः ।
भवान् धर्मपरस्त्वेको नाहं धर्म समाचरे ॥ ४१
इत्येवमुक्त्वा प्रहादमन्धकः प्राह शम्मरम् ।
गच्छ शम्मर शैलेन्द्रं मन्दरं वद शंकरम् ॥ ४२
भिक्षो किमर्थ शैलेन्द्र स्वर्गौपम्य सकन्दरम् ।
परिभुञ्जसि केनाय तव दत्तो वदस्व माम् ॥ ४३
तिष्ठन्ति शासने मह्य देवाः शक्रपुरोगमाः ।
तत् किमर्थ निवससे मामनादृत्य मन्दरे ॥ ४४
यदीष्टस्तव शैलेन्द्रः क्रियतां वचनं मम ।
येयं हि भवतः पत्नी सा मे शीघ्रं प्रदीयताम् ॥ ४५
इत्युक्तः स तदा तेन शम्मरो मन्दरं द्रुतम् ।
जगाम तर यत्रास्ते सह देव्या पिनाकधृक् ॥ ४६
गत्वोवाचान्धकाचो याथातथ्यं दनोः सुतः ।
तमुत्तरं हरः प्राह पृपस्या गिरिकन्यया ॥ ४७
ममायं मन्दरो दत्तः सहस्राक्षेण धीमता ।
तन्न शक्नोम्यहं त्यक्तुं विनाज्ञां वृत्ररिणः ॥ ४८
यचाब्रवीद् दीयतां मे गिरिपुत्रीति दानवः ।
तदेपा यातु स्वं काम नाहं वारयितुं क्षमः ।। ४९
ततोऽब्रवीत् गिरिसुता शम्मरं मुनिसत्तम ।
प्रूहि गत्वान्धकं वीर मम याक्यं विपश्चितम् ॥ ५०
अहं पताका सग्रामे भवानीशश्च देविनौ ।
प्राणघृतं परिस्तीर्य यो जेष्यति स लप्स्यते ॥ ५१
इत्येवमुक्तो मतिमान् शम्नरोऽन्धकमागमत् ।
समागम्याब्रवीद् वाक्यं शर्वगौर्योश्च भापितम् ।। ५२
घोर रौरव नरक में यहुत वर्षों के लिये चला जाता है। (३८)
राक्षसराज । प्राचीन काल मे महात्मा देवर्षि असित ने गरुड तथा अरुण से यह धर्म व्यवस्था कही थी। (३९)
अत बुद्धिमान मनुष्य परस्त्रियों का दूर से ही परित्याग कर दे। क्योंकि निकृष्ट बुद्धि वाले मनुष्यों को परस्त्रियाँ पराभव को प्राप्त कराती हैं। (४०)
पुलस्त्य ने कहा-ऐसा वचन कहने पर अन्धक ने प्रह्लाद से कहा कि आप अकेले धार्मिक है। मैं धर्म का आचरण नहीं करता। (४१)
प्रहाद से ऐसा कहकर अन्धक ने शम्बर से कहा- हे शम्बर। तुग मन्दर पर्वत पर जाओ और शरीर से कहो- (४२)
भिक्षुक । तुम गुफाओं से युक्त तथा स्वर्ग तुल्य मन्दर पर्यंत का उपभोग क्यों कर रहे हो? मुझे बताओ कि इसे तुमको किसने दिया है ? (४३)
इन्द्रादि समस्त देवता मेरा शासन मानते हैं। अब तुम मेरी अवज्ञा करके इस मन्दर पर्वत पर वैसे रह रहे हो? (४४)
यदि यह शैलेन्द्र तुम्हें प्रिय है तो मेरे कथन के अनुसार कार्य करो। तुम्हारी जो यह परनी है उसे मुझे शीघ्र दे दो।
उसके ऐसा कहने पर शम्बर शीघ्रता पूर्वक उस मन्दर पर्वत पर गया जहाँ पिनास्पाणि शकर देवी के साथ निवास करते थे। (४६)
दनुपुत्र ने यहाँ जाकर यथावत् अन्धक का वचन कहा । शङ्कर ने पर्वतनन्दिनी के सुनते हुए उसे उत्तर दिया। (४७)
बुद्धिमान् इन्द्र ने मुझे यह मन्दर पर्यंत दिया है। अत वृत्रासुर वैरी इन्द्र की आज्ञा विना मैं इसे नहीं छोड सकता। (४८)
दानव ने जो यह कहा कि गिरिनन्दिनी को मुझे दे दो, तो ये अपनी इच्छा से जा सकती हैं। मैं इन्हें नहीं रोक सकता। (४९)
हे मुनिसत्तम । तदनन्तर गिरिसुता पार्वती ने शम्बर से कहा-हे वीर। तुम जाकर बुद्धिमान् अन्धक से मेरी बात कहो- समाम मै मैं पतास हूँ। आप और शङ्कर खेलने वाले हैं। प्राणों का धूत फैलाकर जो जीतेगा वह मुझे प्राप्त करेगा। (११)
ऐसा कहने पर बुद्धिमान् शम्बर अन्धक के
तच्छ्रुत्वा दानपति कोधदीप्लेक्ष्णः श्वसन् ।
समाहूयात्रवीद् वाक्यं दुर्योधनमिदं वचः ।। ५३
गच्छ शीघ्रं महानाहो मेरी सान्नाहिकी दृढाम् ।
ताडयस्व सुनिश्रब्ध दुःशीलामिन योपितम् ॥ ५४
समादिष्टोऽन्धनाथ मेरी दुर्योधनो बलात् ।
ताडयामास वेगेन यथाप्राणेन भूयसा ।। ५५
सा वाडिता बलरता मेरी दुर्योधनेन हि ।
सत्वरं भैरवं रावं रुराव सुरभी यथा ॥ ५६
तस्यास्तं स्वरमाकर्ण्य सर्व एव महासुराः ।
समायाताः सभा तूर्ण किमेतदिति वादिनः ॥ ५७
याथातथ्यं च तान् सर्वानाह सेनापविली
ते चापि पलिना श्रेष्ठाः सन्नद्धा युद्धकाणिः ॥ ५८
सहान्धका निर्ययुस्ते गजैस्ष्ट्र हयै रथः।
अन्धको रथमास्थाय पञ्चनल्यप्रमाणतः ।। ५९
त्र्यम्मकं स पराजेतुं कृतमुद्धिर्तिनिर्ययो ।
जम्भः कुजम्भो हुण्डश्च तुहुण्डः शम्बरो बलिः ॥ ६०
वाणः कातस्वरो हस्ती सूर्यशत्रुर्महोदरः।
अयाशंकृः शिपि. शाल्यो वृपपर्वा विरोचनः ॥ ६१
हयग्रीवः कालनेमिः संहाद. कालनाशनः ।
शरभः शलभश्चैव विप्रचित्तिश्च वीर्यवान् ।। ६२
दुर्योधनश्च पाकच विपाकः कालशम्मरी।
एते चान्ये च बहवो महायीर्या महारलाः ।
प्रजग्मुरत्सुका योद्धुं नानायुधधरा रणे ॥ ६३
इत्यं दुरात्मा दनुमैन्यपाल-
स्तदान्धको योडुमना
योडुमना हरेण ।
महाचलं मन्दरमभ्युपैयिवान्
स कालपाशावसितो हि मन्दधीः ॥ ६४
इति श्रीवामनपुराणे चत्यत्यारिंशोऽध्याय ॥ ४0॥
समीप गया एव शङ्कर तथा गौरी की कही हुई यात को (५२)
उसे सुनकर दानवपति के नेत्र क्रोध से दीप्त हो गये । दीर्घ श्याँस लेते हुए दुर्योधन को बुलाकर उसने कहा- (५३)
हे महाबाहु । शीघ्र जाओ एव दुश्चरिना स्त्री के सरश दृढ़ समामिझी भेरी को भली भाँति वजाओ। (५४)
तदनन्तर अन्धक से आदेश प्राप्त कर दुर्योधन अत्यन्त वल, प्राण एव वेग पूर्वक भेरी को बनाने लगा। (५२)
पलवान दुर्योधन द्वारा ताडित भेरी सुरभी ये शब्द सदृश शीघ्र भयङ्कर शब्द करने लगी। उसके उस स्वर को सुनकर सभी महान असुर 'यह क्या है ?' ऐसा कहते हुए शीघ्रता से सभा मे आ (५७)
बलयान सेनापति ने उन सभी से यथार्थ तथ्य कहा। बलवानों में श्रेष्ठ वे सभी युद्ध की आकाक्षा से
तैयार हो गये। (५८)
हाथी, ऊँट, घोड़ों और रथों सहित वे सभी अन्धक के साथ बाहर निकले । पाँच नल्व-अर्थात् ४०0 हायके पाले रथ पर आरूढ होकर अन्धक त्रिलोचन शकर को जोतने का निश्चय पर बाहर निकला । जम्भ, फुजम्भ, हुण्ड, तुहुण्ड, शम्बर, बलि, माण, कार्तस्वर, हस्ती, सूर्यशत्रु, महोदर अय शङ्ख शिथि, शाल्व, वृषपर्या, विरोचन, हयग्रीव, कालनेमि, सलाद, कालनाशन, शरभ, शलभ, वीर्यवान् विप्रचित्ति, दुर्योधन, पाक, विपाक, काल एव शम्बर-ये सभी तथा अन्य अनेक महावीर्यशाली तथा महाबलान् राक्षस नाना प्रकार के आयुधों को धारणकर उत्सुकता पूर्वक सप्राम मे लड़ने पे लिए चल पड़े। (५९- ६३)
इस प्रकार कालपाश से आबद्ध यह मन्दबुद्धि दनु सैन्यपति दुरात्मा अन्धक शङ्कर से युद्ध करने के विचार से महापर्वत मन्दर पर गया। (६४)
श्रीवामनपुराण में चालीसवाँसध्याय समाप्त ॥४0॥