सुन्दर वर्ण की प्राप्ति के लिए पार्वती की तपश्वर्या एवं ब्रह्मा द्वारा पार्वती का सुवण तुल्य वर्ण का वर प्रदान, इन्द्र द्वारा कौशिकी की विन्ध्य पर स्थापना, महामोहनक में स्थित शिव के प्राङ्ग में अग्नि का प्रवेश, देवों की प्रार्थना से शिव द्वारा महामैथुन का परित्याग, अग्नि द्वारा शिव के वीर्य का पान, गजानन की उत्पत्ति

पुलस्त्य उवाच।

ततो गिरौ वसन् रुद्रः स्वेच्छया विचरन् सुने ।

विश्वकर्माणमाहूय प्रोवाच कुरु मे गृहम् ॥ १

ततश्चकार शर्वस्य गृहं स्वस्तिकलक्षणम् ।

योजनानि चतुःपष्टिः प्रमाणेन हिरण्मयम् ॥ २

दन्ततोरणनियुंह मुक्ताजालान्तरं शुभम् ।

शुद्धस्फटिकमोपानं वैडूर्यवृतरूपकम् ॥ ३

सप्तकक्षं सुविस्तीर्ण सर्वैः समुदितं गुणैः ।

ततो देवपतिश्चक्रे यझं गार्हस्थ्यलक्षणम् ॥ ४

तं पूर्वचरित मार्गमनुयाति स्म शंकरः ।

मत फीजिए। हे पितामह । ये सभी बालसिल्य महपि है, जो बड़े ही धन्य हैं।

तदुपरान्त शङ्कर के कहने के अनन्तर अट्टासी हजार पालखित्य नामक तपस्वी उठ सडै हुए। (५९)

तदनन्तर विवाद हो जाने पर शङ्कर कौतुमगार (कोहबर) मे गये। उन्होंने रात्रि मे पार्वती के साथ रमण किया और पुन प्रात वाल उठे। (६०)

तदुपरान्त पार्यती को प्राप्त पर प्रसन्न हुये शङ्कर पर्वतराज से पूजित होने के उपरान्त देवों एवं भूतगणों के साथ शीघ्रता पूर्वक मन्दराचल पर आ गये। (६१)

तदनन्तर अष्टमूर्ति शङ्कर ने ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र आदि देवताओं का यथोचित पूजन तथा प्रणाम पर उन्हें विदा किया और स्वयं अपने भूतगणों के साथ मन्दर पर्वत पर रहने लगे। (६२)

श्रीवामनपुराण में सत्ताइसवाँ अध्याय समाप्त ॥२७॥

२८

पुलस्त्य ने कहा-हे मुने। मन्दर पर्वत पर रहते हुए और इच्छानुसार विचरण करते हुए शङ्कर ने विश्वकर्मा को बुलाकर कहा-मेरे लिए घर बना दो।

तदनन्तर उसने शंकर के लिए चौसठ योजन विस्तृत सुपर्णमय तथा स्वस्तिक चिह्नों से युक्त गृह धनाया। (२)

उसमें हाथी के दाँतों के तोरण और मोतियों के सुन्दर झालर लगे थे एव उसमे पैडूर्यमणिखचित शुद्ध रफटिक के सोपान थे। (३)

सात कक्षों से युक्त वह सुविस्तीर्ण गृह सभी गुणों से सम्पन्न था। तदनन्तर देयाधिदेव ने गाईघ्य स्पी यज्ञ किया।

शङ्कर भगवान् पूर्वाचरित मार्ग का अनुसरण

तया मतम्धिनेत्रस्प महान् कालोऽभ्यगामुने ॥५

रमतः मह पार्वत्या धर्मापेक्षी जगत्पतिः ।

खतः कदाचिनर्मार्थ कालीयुक्ता भवेन हि ॥ ६

पायंती मन्युनाविष्टा शंकरं याक्यमनवीत् ।

संरोहतीपुणा विद्धं वनं परशुना हतम् ।

पाचा दुरुक्त थीभत्यं न प्ररोहति वाक्क्षतम् ॥ ७

पापसायका पदनानिप्पतन्ति

राहतः शोचति राम्यहानि।

न तान् विमुश्चेत हि पण्डितो जन-

म्तमय धर्म वितयं स्या कृतम् ॥ ८

तस्माद् नमामि देवेश तपम्तप्तुमनुत्तमम् ।

तथा यतिप्ये न यया भवान् कालीति वक्ष्यति ॥९

इत्येवमुक्त्वा गिरिजा प्रणम्य च महेश्वरम् ।

अनुशाता विनरेण दियमे गोत्पपात ह ।।१०

ममुत्पत्य व वेगेन हिमाद्रिशिसरं शियम् ।

टासिन प्रयत्नेन विधात्रा निर्मित यया ॥ ११

ततोऽवतीर्य सस्मार जयां च विजयां तथा ।

उयन्ती च महापुण्यां चतुर्थीमपराजिताम् ॥ १२

वाः संस्मृताः समाजग्मुः काली द्रष्टुं दि देवताः ।

अनुशावास्तया देव्या शुश्रूषां चक्रिरे शुभाः ।। १३

वतस्तपसि पार्वत्यां स्थितायां हिमवदनात् ।

समाजगाम तं देशं व्याघ्रो दंष्ट्रानसापुषः ॥ १४

एकपादम्यिवायां तु देव्यां ध्याघ्रस्त्वचिन्तयत् ।

यदा पतिभ्यते घेयं तदादास्यामि वै अहम् ।। १५

इत्येवं चिन्तयन्नेव दत्तदृष्टिमंगाधिपः ।

पक्ष्यमानस्तु वदनमेकदृष्टिरजायत ॥ १६

ततो वर्षशत देवी गृणन्ती प्रमग. पदम् ।

सपोऽतप्यत ततोऽम्यागाद् प्रमा निभुवनेश्वरः॥ १७

पितामहस्ततोवाच देवी प्रीतोऽस्मि शाश्वते ।

तपमा धूतपापाऽमि वरं पृणु यपेप्सितम् ॥ १८

अधोवाच वचः काली व्याघ्रस्य कमलोद्भव ।

वरदो भव तेनाह यास्ये प्रीतिमनुत्तमाम् ॥ १९

ततः प्रादाद् वरं ब्रह्मा व्यानस्याद्भुतकर्मणः ।

गाणपत्यं विभौ भक्तिमजेयत्य च धर्मिताम् ।। २०

वरं व्याघ्राय दत्वैवं शिवकान्तामयात्रवीत् ।

वृणीय परमव्यग्रा वरं दास्ये ताम्बिके ॥ २१

ततो परं गिरिसुता प्राह देवी पितामहम् ।

वरः प्रदीयतां मह्यं वर्ण कनकमनिभम् ।। २२

तयेत्युक्त्वा गतो ब्रह्मा पावती चाभनद ततः ।

कोशं कृष्णं परित्यज्य पद्मफिञ्जल्फमनिमा ।। २३

तस्मात् कोशाच संजाता भूयः कात्यायनी मुने ।

ताम येत्य सहस्राक्षः प्रतिजग्राह दक्षिणाम् ।

प्रोवाच गिरिजा देवो वाक्यं स्वार्थाय वासवः ॥ २४

इन्द्र उवाच ।

इयं प्रदीयता मद्य भगिनी मेऽस्तु कौशिकी ।

त्वकोशमभवा चेयं कौशिकी कौशिकोऽप्यहम् ॥ २५

वां ग्रादादिति संश्रुत्य कौशिकी रूपसंयुताम् ।

सहस्राक्षोऽपि तां गृह्य पिन्ध्यं वेगाजगाम च ॥ २६

तत्र गत्मा स्वथोवाच तिष्ठस्वात्र महानले ।

पूज्यमाना सुरैर्नाम्ना ख्याता त्वं विन्ध्यवासिनी ।। २७

वत्र स्थाप्य हरिदेवी दत्त्वा सिंहं च वाहनम् ।

भवामरारिहन्त्रीति उक्त्वा सर्गमुपागमत् ॥ २८

उमाऽपि तं वरं लग्या मन्दरं पुनरेत्य च ।

प्रणम्य च महेशान स्थिता मरिनयं मुने ॥ २९

ततोऽमरगुरुः श्रीमान् पावत्या सहितोऽव्ययः ।

तम्यौ वर्षसहस्रं हि महामोहनके मुने ॥ ३०

महामोहस्थिते रहे भुवनाश्वेलुद्धताः ।

चुक्षुमुः सागराः सम देवाश्च भयमागमन् ॥ ३१

तत. सुरा. सहेन्द्रेण ब्रह्मण, सदनं गताः।

प्रणम्योचुर्महेशान जगत् क्षुब्धं तु किं त्विदम् ।। ३२

वानुवाच भवो नूनं महामोहनक स्थितः ।

तदननर काली ने कहा-हे कमलोद्भव । इस व्यान को आप पर दें। इसी से मैं भी अतिप्रसन्न होऊँगी। (१९)

तदुपरान्त ब्रह्मा ने उस अद्भुतकर्मा व्याप्न को गणों का स्वामित्व, शकर की भक्ति, अजेयता और धार्मिकता का पर दिया। (२०)

इस प्रकार व्याघ्र को यर देवर ( उन्होंने ) शिवकान्ता से कहा-दे अम्बिके । तुम अव्यम चित्त से वर माँगो।मैं तुम्हें वर दूंगा। (२१)

तदनन्तर गिरिनन्दिनी देवी ने पितामह से कहा- हे ब्रह्मन् । मुझे यही पर दीजिए कि मेरा वर्ण सुवर्णतुल्य हो जाय। (२३)

'ऐसा ही हो' कहकर ब्रह्मा चले गये। पार्वती भी अपने कृष्ण आचरण को छोड़कर कमल के केमर के समान हो गयी। (२३)

हे मुनि ! उस कृष्ण कोश से पुन कात्यायनी उत्पन्न हुई। सहस्राक्ष इन्द्र ने उनके निम्ट जाकर दक्षिणा ग्रहण की। उन्होंने अपने लिए गिरिजा से यह यचन कहा-(२४)

इन्द्र ने कहा-आप इसे मुझे प्रदान करें। यह कौशिकी मेरी भगिनी भने । आप के कोश से उत्पन्न होने से यह कौशिकी हुई एय में भी कौशिक हूँ। (२५)

'उसको दिया' यह सुनने के अनन्तर उस रूपयती कौशिक्षा को लेकर देवराज इन्द्र वेग से विन्ध्याचल (२६)

यहाँ जाकर ( उन्होंने ) कहा-हे महावल । आप यहाँ रहें। देवताओं द्वारा पूजित होती हुई आप विध्यवासिनी नाम से प्रख्यात होंगी। (२७)

वहाँ देवी को स्थापित कर और इन्हें वाहन रूप में सिह देने के उपरान्त "आप देवताओं के शत्रुओं को मारने वाली वने' यह कहकर इन्द्र स्वर्ग चले गये। (२८)

हे मुनि । उमा भी वह घर प्राप्त करने के उपरान्त मन्दर पर्वत पर गयीं एव महेश को प्रणाम कर विनयपूर्वक रहने लगी। (२९)

हे मुनि । तदनन्तर श्रीमान, अव्यय, अमरगुर एक महस्र वर्ष पर्यन्त महामोहनक में स्थित रहे। (३०)

स्द्रदेव के महामोह में स्थित होने पर समस्त भुरन उद्धत होकर विचलित हो गये। सातों सागर क्षुब्ध हो हो उठे और देवगण भयभीत हो गये। (३१)

तब देवता लोग इन्द्र के साथ ब्रझलोक गये तथा महेशान ब्रा को प्रणाम कर बोले-यह जगत क्यों क्षुब्ध हो गया है? (३२)

उन्होंने उन लोगों से कहा-महादेव निश्चय ही

तेनाकान्तास्त्विमे लोका जग्मुः क्षोभं दुरत्ययम् ।। ३३

इत्युक्त्वा सोऽभवत् तूष्णीं ततोऽप्यूचुः सुरा हरिम् ।

आगच्छ शक्र गच्छामो यावत् तन्न समाप्यते ॥ ३४

समासे मोहने पालो यः समुत्पस्यतेऽव्ययः ।

स नूनं देवराजस्य पदमैन्द्रं हरिष्यति ॥ ३५

ततोऽमराणां वचनाद् विवेको पलधातिनः ।

भयाज्ज्ञानं ततो नष्टं भाविकर्मप्रचोदनात् ॥ ३६

ततः शक्रः सुरैः साधं यहिना च सहसदृक् ।

जगाम मन्दरगिरि तच्छृङ्गे न्यविशत्ततः ॥ ३७

अशक्ताः सर्व एवैते प्रवेष्टुं तद्भवाजिरम् ।

चिन्तयित्वा तु सुचिरं पारकं ते व्यसर्जयन् ।। ३८

स चाम्येत्य सुरश्रेष्ठो दृष्ट्वा द्वारे च नन्दिनम् ।

दुष्प्रवेशं च तं मत्वा चिन्तां वतिः परां गतः ॥ ३९

स तु चिन्तार्णवे मग्नः प्रापश्यच्छंभुसमनः ।

निष्क्रामन्ती महापङ्क्ति हंसानां विमला तथा ॥ ४०

असावुपाय इत्युक्त्वा हंसरूपो हुताशनः ।

वञ्चयित्या प्रतीहारं प्रविवेश हराजिरम् ॥ ४१

प्रविश्य सूक्ष्ममूर्तिश्च शिरोदेशे कपर्दिनः ।

प्राह प्रहस्य गम्भीरं देवा द्वारि स्थिता इति ॥ ४२

तच्छ्रुत्वा सहसोत्थाय परित्यज्य गिरेः सुताम् ।

विनिष्कान्तोऽजिराच्छों वहिना सह नारद ॥ ४३

विनिष्क्रान्ते सुरपतौ देवा मुदितमानसाः ।

शिरोभिरवनी जग्मुः सेन्द्रार्कशशिपायकाः ॥ ४४

ततः प्रीत्या सुरानाह पदध्वं कार्यमाशु मे।

प्रणामावनतानां वो दास्येऽहं वरमुत्तमम् ।। ४५

देवा ऊचुः ।

यदि तुष्टोऽसि देवानां वरं दातुमिहेच्छसि ।

तदिदं त्यज्यतां तावन्महामैथुनमीश्वर ॥ ४६

महामोहनक मे स्थित है। उसी से आरात हो ये लोक अत्यन्त (३३)

इतना कहकर वे मौन हो गये। उसके बाद देवताओं ने इन्द्र से कहा-हे शक! जब तक वह (महामोहनक) समाप्त नहीं हो जाता तब तक हम लोग चलें! (३४)

मोह समाप्त होने पर उत्पन्न होने पाया अविनाशी पालक निश्चय ही देवराज के ऐन्द्र पद का हरण करेगा। (३५)

तदनन्तर भाविधर्म की प्रेरणावश देवताओं के पचन से पलपाती (इन्द्र) का विवेक एवं भय के कारण मान नष्ट हो गया। (३६)

तय सहस्रनेत्र इन्द्र अग्नि और देयों के साथ मन्दर पर्वत पर गये एव उसके शिखर पर बैठे। (३७)

किन्तु वे सभी महादेव के भवन में प्रविष्ट नहीं हो सके। बहुत देर तक विचार कर उन लोगों ने अग्नि को भेजा। (३८)

मुरश्रेष्ठ अग्नि यहाँ गये और द्वार पर नन्दी वो देश पर, यहाँ प्रवेश परना दु'साम्य जानकर अत्यन्त (३९)

चिन्ता-सागर में मग्न उन्होंने शम्भु के भवन से निकल रही हसों की विमल महापक्ति को देखा। (४०)

'यही उपाय है ऐसा कहकर अग्नि हैस रूप मे द्वार- पाल को धोखा देकर महादेव के घर में प्रवेश किए। (४१)

प्रविष्ट होने के उपरान्त सूक्ष्म शरीरधारी अग्निदेव ने महादेव के शिर के पास हँसते हुए गम्भीर स्वर से कहा-देवता लोग दरवाजे पर पड़े हैं। (४२)

हे नारद! महादेव उस यात को सुनार उसी क्षण उठे और हिमालय की कन्या को छोड़ार अग्नि के साथ आंगन से निकल पड़े। (४३)

मुरपति शङ्कर के निकल आने पर इन्द्र सहित चन्द्र, सूर्य और अग्नि आदि सभी देवताओं ने आनन्दित होकर पृथ्वी पर शिर झुशया । (४४)

तदनन्तर (भगगन महादेव ने ) प्रातिपूर्वक देवताओं से पहा-शीघ्र मुझे कार्य यताइये । प्रणाम के लिए अपनन आप लोगों को में उत्तम यर दूंगा। (४५)

देवताओं ने कहा-हे ईश्वर! यदि आप प्रसन्न है धीर देयों को पर देना चाहते हैं तो आप इस महामेथुन पा त्याग करें। (४६)

ईश्वर उवाच ।

एवं भवतु संत्यस्तो मया भावोऽमरोत्तमाः।

ममेदं तेज उद्रिक्तं कश्चिद् देवः प्रतीच्छतु ॥ ४७

पुलस्त्य उवाच।

इत्युक्ताः शंभुना देवाः सेन्द्रचन्द्रदिवाकराः ।

असीदन्त यथा मग्नाः पङ्के वृन्दारका इव ॥ ४८

सीदत्सु दैवतेष्वेवं हुताशोऽभ्येत्य शंकरम् ।

ग्रोवाच मुञ्च तेजस्त्वं प्रतीच्छाम्येप शंकर ॥ ४९

ततो मुमोच भगवांस्तदेव. कन्नमेव तु ।

जलं रूपान्ते चै यद्वन् तैलपानं पिपासितः ॥ ५०

ततः पीते तेजसि वै शार्च टेवेन वहिना ।

स्वस्थाः सुराः समामन्य हरं जग्मुस्त्रिविष्टपम् ॥ ५१

संप्रयातेपु देवेषु हरोऽपि निजमन्दिरम् ।

समस्येत्य महादेवीमिदं वचनमब्रवीत् ॥ ५२

देवि देवैरिहाभ्येत्य यत्नात् प्रेष्य हुताशनम् ।

नीतः प्रोक्तो निपिद्धस्तु पुत्रोत्पत्तिं तपोदरात् ॥ ५३

साऽपि भर्तुर्वचः श्रुत्वा क्रुद्धा रक्तान्तलोचना ।

शशाप दैवतान् सर्वान् नष्टपुत्रोद्भवा शिवा ॥ ५४

यस्मान्नेच्छन्ति ते दुष्टा मम पुत्रमथौरसम् ।

तस्मात् ते न जनिष्यन्ति स्वासु योपित्सु पुत्रकान् ॥ ५५

एवं शप्त्या सुरान् गौरी शौचशालामुपागमत् ।

आहूय मालिनी स्नातुं मतिं चक्र तपोधना ॥ ५६

मालिनी सुरभि गृह्य श्लक्ष्णमुद्वर्तनं शुभा।

देव्यङ्गमुद्वर्तयते कराम्यां कनकप्रभम् ।

तत्स्वेदं पार्यती चैव मेने कीदृग्गुणेन हि ॥ ५७

मालिनी तूर्णमगमद् गृहं स्नानस्य कारणात् ।

तम्यां गतायां शैलेयी मलाचक्रे गजाननम् ॥ ५८

चतुर्भुज पीनवक्षं पुरुपं लक्षणान्वितम् ।

कृत्वोत्ससर्ज भूम्यां च स्थिता भद्रासने पुनः ॥ ५९

मालिनी तच्छिर स्नानं ददौ विहसती तदा ।

ईश्वर ने कहा-हे देवश्रेष्टो। ऐसा ही हो। मैंने आसक्ति छोड़ दिया । कोई देवता मेरे इस निकले हुए तेज को प्रहण करे।

पुलस्त्य ने यहा-शम्भु के ऐसा कहने पर इन्द्रसहित चन्द्रमा एवं सूर्यादि देवता पट्कमग्ग गज के सदृश दुसी हुए। (४८)

देवताओं के इस प्रकार दुःसी होने पर अग्नि ने शहर के निम्ट जाकर कहा-हे शङ्कर। आप तेज को मुक्त करें।मैं प्रहण करूँगा। (४९)

तदनन्तर भगवान् ने (सेज को ) छोड़ दिया। उस एसलित रेतस् को ( अग्निदेय इस प्रकार पो गये) जैसे जल का प्यासा व्यक्ति तैलपान कर जाता है। (५०)

अग्निदेव द्वारा शम्भु का वीर्य पी लेने पर स्वस्थ देवता लोग महादेव की अनुमति लेकर चले गये। (५१)

देवताओं के चले जाने पर महादेव ने भी अपने मन्दिर में जाकर महादेवी से यह पचन कहा- (५२)

हे देवि! देवों ने यहाँ आएर प्रयत्नपूर्वक अग्नि को (मेरे पास } भेजकर मुझे बुलाया और तुम्हारे सदर से पुत्रोसत्ति न करने के लिये कहा। (५३)

पति का वचन सुनार विनष्ट पुत्र-जन्म वाली शिया ने क्रोध से आँखे लाल कर समस्त देवताओं को शाप दिया। (५४)

क्यों कि वे दुष्ट मेरे उदर से पुत्र का जन्म नहीं चाहते अतः वे भी अपनी पत्नियों से पुत्र नहीं उत्पन्न करेंगे।

इस प्रसार देवताओं को शाप देकर तपोधना गौरी शौचालय मे गयी और मालिनी को बुलाकर स्नान करने का विचार किया।

मुन्दरी मालिनी सुगन्धयुक्त कोमल उद्वर्त्तन लेकर देवी के स्वर्णिम आभा से युक्त शरीर में दोनों हाथों से लगाने लगी। पार्वती विचार करने लगी कि इस स्वेद मे क्या गुण है। (५७)

मालिनी स्नान (पने ) के लिए शीघ्र स्नानागार मे चली गयी। उसके परे जाने पर शैलनन्दिनी ने ( उस) मल से गजानन को बनाया। (५८)

चार भुजाओं से युक्त, पीन पक्षस्थल याले, लक्षणान्वित पुरुप को यनार भूमि पर रस दिया एव पुन उत्तम आसन पर बैठ गई।

उस समय मालिनी ने हंसते हुए देवी को शिर से

ईपद्धासामुमा दृष्ट्वा मालिनी प्राह नारद ॥ ६०

किमर्थ भीरु शनकैहससि त्वमतीव च ।

साऽयोवाच हसाम्येव भवत्यास्तनयः किल ॥ ६१

भविष्यतीति देवेन प्रोत्तो नन्दी गणाधिपः ।

वच्छत्वा मम हासोऽयं संजातोऽव कृशोदरि ॥ ६२

यस्माद् देवैः पुत्रकामः शंकरो विनिधारित.।

एतच्छुत्या वचो देवी सस्नौ तत्र विधानतः ।। ६३

स्नात्वार्य शकर भक्त्या समस्यागाद् गृह प्रति ।

ततः शमुः समागत्य तस्मिन् भद्रासन त्वपि ॥ ६४

स्नातस्तस्य ततोऽधस्तात् स्थित. स मलपूरपः ।

उमास्वेद भवस्वेद जलभूतिसमन्वितम् ।। ६५

तत्सपर्कात् समृत्तस्यौ फूत्कृत्य करमुत्तम् ।

अपत्य हि विदित्वा च प्रीतिमान् भुवनेश्वरः ॥ ६६

त चादाय हरो नन्दिमुवाच भगनेत्रहा ।

स्द्रः स्नात्वार्य देवादीन् वाग्भिरद्भिः पितृनपि॥ ६७

जप्त्या सहस्रनामानामापार्श्वमुपागतः ।

समेत्य देवी विहसन् शंकरः शूलधग् वचः ॥ ६८

प्राह त्वं पश्य शैलेयि स्वसुतं गुणसंयुतम् ।

इत्युक्ता पर्वतसुता समेत्यापश्यदद्भुतम् ।। ६९

यत्तदङ्गमलादिव्यं कृत गजमुखं नरम् ।

ततः प्रीता गिरिसुता तं पुत्रं परिपनजे ॥ ७०

मूनि चैनमुपाघ्राय ततः शर्वोऽब्रवीदुमाम् ।

नायकन विना देवि तव भूतोऽपि पुत्रकः ।। ७१

यस्माजातस्ततो नाम्ना भविष्यति विनायकः ।

एप विघ्नसहस्राणि सुरादीना करिष्यति ॥ ७२

पूजयिष्यन्ति चैवास्य लोका देवि चराचराः।

इत्येवमुक्त्वा देव्यास्तु दत्तवास्तनयाय हि ॥ ७३

सहायं तु गणश्रेष्ठं नाम्ना रयात घटोदरम् ।

तथा मातृगणा घोरा भूता विश्नकराश्च ये ।। ७४

ते सर्वे परमेशेन देव्याः प्रीत्योपपादिताः।

देवी च ससुत दृष्ट्वा परां मुदमवाप च ॥ ७५

रेमेऽथ शंभुना सार्ध मन्दरे चारुकन्दरे ।

स्नान कराया । हे नारद | मालिनी को मुस्कुराते हुए देख कर देवी ने कहा- (६०)

हे भीरु । तुम धीरे धीरे इतना क्यों हँस रही हो ? मालिनी ने कहा-मैं इसलिए हंस रही हूँ कि आप को अवश्य पुन होगा, ऐसा महादेव ने गणपति नन्दी से कहा था । हे कृशोदर। उसे सुनकर ( स्मरण कर ) आज मुझे हसी आ गयी क्यों कि देवताओं ने शङ्कर को पुन की कामना करने से रोक दिया है। इस बात को सुनकर देवी ने वहाँ विधिपूर्वक स्नान किया। (६१-६३)

स्नान करने के उपरान्त भक्ति से शहर की पूजा कर देवी गृह में चली गयीं। तदनन्तर महादेव ने भी आकर उसी पवित्र आसन पर स्नान किया। उसी आसन के नीचे बहु मल्पुरुष पड़ा था। उमा के स्वेद एव जल और भरम से युक्त शङ्कर के स्वेद का सम्पर्क होने से वह उत्तम गुण्ड से फूत्कार करते हुए उठा। उसे अपना पुत्र जानर भुवनेश्वर प्रसन्न हो गये। (६४-६६)

भग के नेत्र को नष्ट करने वाले महादेव ने उसे लेकर नन्दी से कहा--( यह मेरा पुत्र है)। स्नानोपरान्त शिव ने स्तुतियों से देवताओं की तथा जल से पितरों की भी पूजा की।

तदनन्तर सहस्रनाम का जप कर दे उमा के पास

गये। देवी के पास जाकर शूलधारी शङ्कर ने हंसते हुए यह वचन कहा-हे शैलनन्दिनी । तुम अपने गुणयुक्त पुन को देखो। ऐसा कहे जाने पर पार्वती ने जाकर यह आश्चर्य देखा कि उनके अग के मल से दिव्य हाथी के मुख वाला मनुष्य बन गया है। तदनन्तर गिरिजा ने प्रीतिपूर्वक उस पुत्रका आलिङ्गन किया । (६८-७०)

तदुपरान्त उसके सिर को सूंघकर शम्मु ने उमा से कहा-हे देवि! तुम्हारा यह पुन विना नायक के उत्पन्न हुआ है अत इसम नाम विनायक होगा। यह देवादिकों के सहस्रों विघ्नों के करेगा।

हे देवि । समस्त चराचर लोक इसकी पूजा करेंगे। देवी से ऐसा कहकर उन्होंने पुत्र विनायक को पटोदर नामक श्रेष्ठ गण, घोर मातृगणों तथा विघ्नकारी भूतों को सहायर बनाया। देवी की प्रीति के लिए परमेश ने उन सयरी सप्टि की। अपने पुत्र को देखकर देवी को भी परम आनन्द प्राप्त हुआ। (७३-७५)

तदनन्तर देवी शम्भु के साथ सुन्दर कन्दराओं वाल मन्दराचल पर रमण करने लगी। हे विभो । इसी प्रसर यह देवी पुन कात्यायनी हुई थी जिन्होंने प्राचीन समय

एवं भूयोऽभवद् देवी इयं कात्यायनी विभो।

या जघान महादैत्यौ पुरा शुम्भनिशुम्भको ॥ ७६

एतत् तवोक्तं वचनं शुभाख्यं

यथोद्भवं पर्वततो मृडान्याः।

स्वाय यशस्यं च तथावहारि

आख्यानमूर्जस्करमद्रिपुत्र्याः ॥ ७७

इति श्रीवामनपुराणे अष्टविंशोऽध्यायः ॥२८॥