वामन महा पुराण
बलि, भय आदि दानवो का देवो से युद्ध कालनेमि का युद्ध, कालनेमि से विष्णु का युद्ध एव कालनेमि का वध
पुलस्त्य उवाच ।
एतदर्थ बलिदैत्यः कतो राजा कलिप्रिय ।
मन्त्रप्रदाता प्रसादः शुक्रवासीत् पुरोहितः ।। १
ज्ञात्वाऽभिषिक्तं दैतेयं विरोचनसुतं वलिम् ।
दिक्षयः समायाताः समयाः सर्व एव हि ॥ २
तानागतानिरीक्ष्यैव पूजयित्वा यथाक्रमम् ।
पप्रच्छ कुलजान् सर्वान किंनु श्रेयस्करं मम ॥३
समूनुः सर्व एवेनं शृणुप्य सुरमर्दन ।
यत् ते श्रेयस्करं कर्म यदस्माकं हिसं तया ॥ ४
पितामहस्वय यली आसीद् दानवपालकः ।
हिरण्यकशिपुर्वीरः स शकोऽभूअगत्त्रये ॥ ५
मागम्य सुरश्रेष्ठो विष्णुः सिंहवपुर्धरः।
प्रत्यक्ष दानवेन्द्राणां नसैस्तं हि व्यदारयत् ॥ ६
अपकृष्टं तथा राज्यमन्धकस्य महात्मनः ।
तेपामय महापाहो शंकोण विशूलिना ॥ ७
तथा तब पित्रव्योऽपि जम्मः शक्रेण पावितः ।
श्रीमान् अपि इस प्रकार शाप देकर अपने आश्रम में गये। तदनन्तर सप्त सरस्थतियों से सात मरुत् उत्पन्न (७५)
हेमति ! पूर्घ काल में अन्तरिक्ष व्यापी मरुद्गण जिस प्रकार उत्पन्न हुए थे उसे मैंने आप से कहा। इन का वर्णन मुनने से पाप का नाश तथा धर्म का महान् अभ्युदय होता है। (७६)
श्रीवामनपुरा में दिवालिया अध्याय समाप्त।।
४७
पुन्टम्य ने कहा- पटिप्रिय! इसीलिए पलि देय । पो राजा बनाया गया था। प्रसाद उसफे मन्त्री तथा शुफ पुरोहित थे।
विरोषन फे पुत्र देश्य पनि पो अभिपिक हुआ जानर मय सहित सभी देरप उसे देखने कीया मे
आये। (२)
अपने पुरुषों को आया देगार (परि ने) यपान हमरी पूजा की एवं उनसे पूछा-मेरे लिए क्या भयार? (२)
उन सभी ने उससे कहा-रे देयमन! तुम्हारे लिए जो भेयरकर तथा हमारे सिप हितायद फर्म है न सुनो।
पलान् पीर दानयपाल दिण्यकशिपु तुम्हारे पितामह थे। ये तीनों लोगों में इन्द्र थे।
सिंदारीरधारी मुर विष्णु ने थायर भेट दानों सम्मुग्य उन्हें ना से विदोर दिया।
देमदापाटु ! तन (देषों) के लिए प्रिनरी हरने महात्मा अधिक चराग्य ले लिया था।
इसी प्रकार ए ने तुम्हारे पिता के माई जम्म
कुजम्भो विष्णुना चापि प्रत्यक्षं पशुवत् तव ॥८
शम्भुः पाको महेन्द्रेण भ्राता तब सुदर्शनः ।
विरोचनस्तव पिता निहतः कथयामि ते ॥९
श्रुत्वा गोत्रक्षयं ब्रह्मन् कृतं शरण दानवः ।
उद्योग कारयामास सह सर्वैर्महासुरैः ।।१
रथैरन्ये गजैरन्ये वाजिभिश्चापरेऽसुराः ।
पदायिस्तथैवान्ये जग्मुर्युद्धाय दैवतैः ॥ ११
मयोऽग्रे याति बलवान् सेनानाथो भयंकरः।
सन्यस्य मध्ये च यलि. कालनेमिश्च पृष्टत. ।। १२
यामपार्थमवएभ्य शाल्वः प्रथितविक्रमः ।
प्रयाति दक्षिणं घोरं तारकार-यो भयंकरः ॥ १३
दानवानां महस्राणि प्रयुतान्यवृंदानि च ।
संप्रयातानि युद्धाय दयः सह कलिप्रिय ॥ १४
श्रुत्वाऽसुराणामुद्योगं शक्रः सुरपतिः सुरान् ।
उवाच याम दैत्यांस्तान् योडु सपलसंयुतान् ॥ १५
इत्येवमुक्त्वा वचनं सुरराट् स्यन्दनं बली ।
समारोह भगवान् यतमातलिवाजिनम् ॥ १६
समारूढे सहस्राक्षे स्यन्दनं देवतागणाः ।
स्यं स्वं पाहनमारय निरुयुद्धकाक्षिणः ॥ १७
आदित्या वसवो रुद्राः साध्या विश्धेऽश्विनौ तथा ।
विद्याधरा गुह्यकाच यक्षराक्षसपन्नगाः ॥ १८
राजर्ष यस्तथा सिद्धा नानाभूताश्च संहताः।
गजानन्ये स्थानन्ये यानन्ये समारुहन् ॥ १९
विमानानि च शुभ्राणि पक्षिवाह्यानि नारद ।
समारुह्याद्रवन् सर्वे यतो दैत्ययल स्थितम् ॥ २०
एतस्मिन्नन्तरे धीमान् वैनतेयः समागतः ।
तस्मिन् विष्णुः सुरश्रेष्ठ अधिरुह्य समभ्यगात् ।। २१
तमाग सहसाक्षरत्रैलोक्यपतिमव्ययम् ।
ववन्द मूनीवनत. सह सः सुरोत्तमैः ।। २२
ततोऽग्रे देवसैन्यस्य कार्तिकेयो गदाधरः ।
मारा तथा विष्णु ने तुम्हारे सम्मुस कुजम्भ को पशु की तरह मारहाणथा। (८)
शम्भु, पाक और तुम्हारे भाई सुदर्शन को महेन्द्र ने निहत किया था। तुम्हारे पिता विरोचन भी मारे गये थे।
हे वहन् । शम द्वारा किये गये गोरक्षय को सुनकर दानय ने समस्त महान असुरों से युद्ध का उद्योग (१०)
पतिपय अमुर रयों पर, कुछ हाधियों पर, फुल पोदों पर तथा पुछ पैदल ही देयों से युद्ध करने के लिए गये। (११)
सेना के अप्रभाग में भयवर एवं घलयान सेनापति मय चला। सेना ये मध्य में पलि, पृष्ठ मे पाटनेमि, पामभाग में प्रसिद्ध पराक्रमी शास्य तथा दक्षिण पार्थ में मयपूर सारक नामक असुर स्थिन हुआ। (१२-१३)
हे कसिप्रिय (नारद)। हजारों, प्रयुतों एवं अचुदो दानय देषताओं से रहने के लिए प्रयाग किये। (२४) अनु या पुरोधोग मुगार मुरपति पद ने देवताओं से कहा-मोना से युक्त दन दरयों से लाने फेरिए इम मप पलें। (१५)
ऐसा वचन कहकर यख्यान भगवान सुरपति इन्द्र मातलि द्वारा नियन्त्रित अश्वों याले रथ पर समारूढ़ हुए। (१६)
इन्द्र के रथारुद होने पर देवगण अपने-अपने यादनों पर आरूढ़ हो युद्ध की इच्छा से पाहर निकले। (१७)
आदित्य, पसु, रुद्र, साध्य, विधेदेव, अधिनीकुमार, विद्याधर, गुधक, यक्ष, राक्षस, पन्नग, राजर्पि, सिद्ध तथा नाना प्रकार के भूत समवेत हुए। कुछ हाधियों पर, फुछ रयों पर तथा कुछ घोड़ों पर आस्द (१८-१९)
हे नारद! पतिपय देवगग पक्षियों द्वारा ढोये जाने याले शुध पिमानों पर आरूद होकर यहाँ गये जहाँ दैत्य सेना रिपत थी। (२०)
इसी बीच बुद्धिमान गरड आये। सुरश्रेध विष्णु उस पर आल्द होकर चले। (२१)
सभी देवताओं के साथ शिर पुकार सहसास इन्द्र ने आये हुए प्रैलोक्यपति अश्यय ( विशु) की वन्दना की। (२२)
तदनन्तर फार्तिकेय देय-सेना के अममाग में, गदापर विष्णु सेना के परपार भाग में तथा
पालयनयनं विष्णुर्याति मध्ये सहसदृक् ।। २३
पाम पार्थमवष्टभ्य जयन्तो व्रजते मुने ।
दक्षिणं वरुणः पार्श्वमवष्टम्याजद् बली ॥ २४
ततोऽमराणां पृतना यशस्विनी
स्कन्देन्द्र विष्ण्यम्बुपसूर्यपालिता।
नानास्त्रशस्त्रोद्यतदोःसमूहा
समाससादारिखलं महीधे ॥ २५
उदयाद्रितटे रम्ये शुमे समशिलावले ।
निर्यक्षे पक्षिरहिते जातो देवासुरो रणः॥ २६
संनिपातस्तयो रोद्रः सैन्ययोरभवन्मुने ।
महीधरोत्तमे पूर्व यथा वानरहस्तिनोः ।। २७
रणरेण रथोद्भूतः पिङ्गलो रणमूर्धनि ।
संध्यानुरक्तः सदृशो मेघः से सुरवापस ।। २८
वदासीव तुमुलं युद्धं न प्राज्ञायत किंचन ।
श्रूयते त्वनिशं शन्दा छिन्धि भिन्धीवि सर्वतः ।। २९
ततो विशसनो रौद्रो दैत्यानां देवतैः सह ।
जातो रुधिरनिष्यन्दो रजःसंयमनात्मकः ॥३०
शान्ते रजसि देवाद्यास्तद् दानवरलं महत् ।
अभिवन्ति सहिताः समं स्कन्देन धीमता ।। ३१
निजघ्नुर्दानवान् देयाः कुमारभुजपालिताः ।
देवान् निजघ्नुर्दैत्याच मयगुमाः प्रहारिणः ॥ ३२
वतोऽमृतरसास्वादाद् विना भूताः सुरोत्तमाः ।
निर्जिताः समरे दैत्यैः समं स्कन्देन नारद ॥ ३३
विनिर्जितान् सुरान् दृष्ट्वा वैनतेयध्वजोऽरिहा ।
शाहमानम्य पाणीपनिजघान ततस्ततः ॥ ३४
ते विष्णुना हन्यमानाः पतत्तिभिरयोस ।
देतेयाः शरणं जग्मुः कालनेमि महामुरम् ॥ ३५
तेभ्यः स चाभयं दत्या ज्ञात्वाऽजेयं च माधयम् ।
विवृदिमगमद् प्रान् यथा व्याधिरुपेक्षितः ॥ ३६
यं यं करेण स्पृशति देवं यक्ष मकिनरम् ।
सहस्रलोसन इन्द्र मध्यभाग की रक्षा करते हुए चले। (२३)
हे मुनि ! जयन्त घामपार्थ को घेर कर चले एवं घलयान वरुण दक्षिण पार्थ में स्थित होकर चल । (२१) ' तदनन्तर नाना प्रकार के अनशनों को धारण करने पालों से युक्त तथा स्कन्द, विष्णु, परुण एवं सूर्य से पालित देषों की यशस्विनी सेना पर्यत पर शनुसैन्य के निकट पहुँची। (२५)
वृक्ष एवं पक्षियों से रहित उदयाचल के रमणीय, शुभ एवं सम शिलातल पर देवों एवं असुरों का महान् युद्ध हुआ। (२६)
है मुनि! पूर्वगल में जैसा युद्ध शानर एवं हाधियों फे पीच हुआ था येसा ही भयदर संघर्प उन दोनों सेनाओं में हुआ।
हे सुरतापस! प्य से उड़ी हुई युद्ध की पिहल्यण धूलि युर-भूमि के ऊपर आकाश में स्थित सन्ध्याचलीन साल मेघ की तरह प्रतीत होने लगी। (२८)
इस समय हो रहे तुमुटयुद्ध में कुछ भी नहीं मान हो रहा था। सभी ओर निरन्तर 'बाटो' 'मारों का शब्द सुनाई पड़ता था। (२९)
धूलि को शान्त करने याला रधिर-प्रयाह उत्पन्न (३०)
धूलि के शान्त होने पर देवताओं ने बुद्धिमान कार्तिकेय के साथ महान् दानव-दल पर आयमण (३२)
फुमार कार्तिकेय के याहुयल से रक्षित देयताओं ने दैत्यों को मारा तथा मय के द्वारा रक्षित प्रहार परने पाले दैत्यों ने देवताओं को मारा। (३२)
हे नारद ! तदनातर अमृतरस के आस्वाद के बिना सन्द सहित श्रेष्ठ देयगण युद्ध में दैत्यों द्वारा पराजित हो गये। (३३)
देयों यो पराजित हुआ देसर शनुसूदन गरसम्पन शाई धनुप को मुगार चारों तरफ यागों थी वर्ग करने लगे। (३४)
विष्णु द्वारा हमुरस पाणों से मारे जा रहे दैत्य फालनेमि नामक महान् अमुर की शरण में (३५)
हे अझन् ! उन्हे अभय प्रदान कर तथा मापर को अजेय जानकर (यह) उपेशित व्याधि ये सहा पदने या।
यह बलवान जिम देपना, यक्ष या किसर हाथ से
तं तमादाय चिक्षेप विस्तृते वदने यली ॥३७
संरम्भाद् दानवेन्द्रो विमृदति दितिजैः संयुतो देवसैन्यं
सेन्द्र सार्क सचन्द्रं करचरणनरौरस्त्रहीनोऽपि वेगात् ।
चक्रवैश्वानराभैस्त्ववनिगगनयोस्तिर्यगूचं समन्तात्
प्राप्त ऽन्ते कालवह्वेर्जगदखिलमिदं रूपमासीद् दिधक्षोः॥३८
तं दृष्ट्वा वईमानं रिपुमति लिनं देवगन्धर्वमुख्याः
सिद्धाःसाध्याविमुख्या भयतरलदृशःप्राद्रवन् दिक्षु सर्वे ।
पोप्लूयन्तश्च दैत्या हरिममरगणैरचितं चारुमौलि
नानाशस्त्रास्त्रपातैर्विगलितयशसं चक्रुरुसिक्तदर्पाः॥३९
तानित्थंप्रेक्ष्य दैत्यान्मयनलिपुरगान् कालनेमिप्रधानान्
वाणैराकृष्य शाझं त्वनयरतमरोभेदिभिर्वज्रकल्पैः ।
कोपादारफ्तदृष्टिः सरथगजहयान् दृष्टिनिधूतवीर्यान्
नाराचारपैः सुपुहर्जलद इव
गिरीन् छादयामास विष्णुः॥४०
तैर्याणैश्छाधमाना हरिकरनुदितैः कालदण्डप्रकाशै-
र्नाराचैरर्धचन्द्र लिमयपुरगा भीतभीतास्त्वरन्तः ।
प्रारम्भ दानवेन्द्रं शतवदनमथो प्रेपयन् कालनेमि
स प्राया देवसैन्यप्रभुममिवयल केशवं लोकनाथम्॥४१
तं दृष्ट्वा शतशीर्प मुघतगदं शैलेन्द्रशृङ्गाकृति
विष्णुः शाईमपास्य सत्वरमथो जग्राह चक्र करे ।
सोऽप्येनं प्रसमीक्ष्य दैत्यविटपप्रच्छेदन मानिनं
प्रोवाचाथ विहस्य त च सुचिरं मेघसनो दानवः ॥४२
अय स दनुपुत्रसैन्यवित्रासकृद्रिपुः
परमकोपितः स
मधोर्विघातकृत् ।
हिरण्यनयनान्तकः कुसुमपूजारति.
क याति मम दृष्टिगोचरे निपतित. खलः ।। ४३
यधेप संप्रति ममाहवमभ्युपैति
नुनं न याति निलयं निजमम्बुजाक्षः ।
मगृष्टिपिटशिथिलाङ्गमपात्तभस्म
संद्रक्ष्यते सुरजनो भयकातराक्षः ॥४४
स्पर्श करता उसे लेकर अपने विस्तृत मुख मै फेकने लगा।
यह देत्येन्द्र कालनेमि अखहीन होने पर भी दानवों के साथ मिलकर क्रोध से हाथ, पैर और नस के प्रहार से इन्द्र, सूर्य, चन्द्र सहित देव सेना को वेग से मारने लगा। यह अग्नि तुल्य चरों द्वारा आकाश एव पृथ्वी पर नीचे ऊपर चतुर्दिक प्रहार करने लगा। उस समय उसरा रूप प्रलय काल मे समस्त जगत् को दुग्ध करने की इच्छा वाले अग्नि के सदृश था। (३८)
उस अति पलान् शन को बढते देसर देवता, गन्धर्व, सिद्ध साध्य, अश्विनीकुमार आदि भय से घचल दृष्टि याले होकर चारों ओर भागने लगे। दते हुए दैत्यों ने अस्यन्त गर्वित होकर अमरों से पूजित तथा सुन्दर मुकुट वाले यिष्णु पे सामने जारर विविध शरमानों के आपात से उनके यश को समाप्त कर दिया। (३६)
मय, पलि एय कालनेमि आदि दैत्यों को इस प्रकार देसार विष्णु के नेत्र प्रोध से लाल हो गये। उन्होंने अपनी दृष्टि से रथ, हाथी और पोदों को वीर्यहीन कर दिया एप जैसे भेष आकाश को आच्छादित करने है उसी प्रकार मुन्दर पुखों से युक्त नाराच नामक याणों द्वारा पर्वत को आच्छादित कर दिया । (४०)
विष्णु के हाथों से छोडे गये कालदण्ड तुल्य अर्धचन्द्राकार उन नाराच नामक चाणों से आच्छादित यलि एव मय आदि दैत्यों ने मयमीत होर शीघ्रता से पहले दानवेन्द्र शतमुस कालनेमि को प्रेपित किया। वह देव सेनाधिप अति घलपान लोकनाथ केशव के सम्मुख गया। (४१)
गदा उठाये हुये सौ शिर पाले पर्यंतशृङ्ग के सदृश कालनेमि को देखकर विष्णु ने शाई धनुप को छोदारहाथ में शीघ्र ही चक्र को लिया। इनको देसार यहुत देर तक जोर से हँसते हुए मेव के समान शब्द पाले उस दानय ने दैत्यरूपी वृक्षों के नाशक मनायी हरि से पहा- (४२)
यही दानव सेना को प्रस्त करने वाला शत्रु, अत्यन क्रोधी, मधु को मारने वाला, हिरण्याक्ष का नाशक तथा पुष्पों द्वारा की गई पूजा से प्रसन्न होने वाला है यह सल मेरी ऑसों के सामने आ कर अब कहाँ जाता है। (४३)
यह फमलाक्ष (विष्णु) यदि इस समय मेरे साथ युद्ध फरे तो अपने घर नहीं जायेगा और देवता भयातर नेत्र से मेरी मुट्ठी में पिसार शिथिल आहों याने इस (विष्णु) को धूलिधूसरित देखेंगे। (४४)
इत्येवशुपत्या मधुसूदनं वे
स कालनेमिः स्फुरिवाधरोष्ठः ।
गदा खगेन्द्रोपरि जातकोपो
मुमोच शैले कृलिशं यथेन्द्रः॥ ४५
तामापतन्ती प्रसमीक्ष्य विष्णु-
घोरा गदां दानववाहमुक्ताम् ।
चरण चिच्छेद सुदुर्गतस्य
मनोरथं पूर्वकृतेव कर्म ॥ ४६
गदा छित्त्वा दानवाभ्याशमेत्य
भुजी पीनी संप्रचिच्छेद वेगात् ।
भुजाभ्यां कृत्वाम्या दग्धशैलप्रकाशः
सदृश्येताप्यपरः कालनेमिः ॥ ४७
सतोऽस्य माधवः कोपा शिरचक्रेण भूतले ।
छित्त्वा निपातयामास पकं तालफलं यथा ॥ ४८
तथा विबाहुर्विशिरा मुण्डवालो यथा वने ।
तस्थौ मेररियाकम्प्यः कनन्धः क्ष्माधरेवरः ॥ ४९
तं वैनतेयोऽप्युरसा सगोत्तमो
निपातयामास मुने धरण्याम् ।
यथाऽम्पराद् पाहुशिरः प्रणप्ट-
पलं महेन्द्रः कुलिशेन भून्याम् ॥ ५०
तस्मिन् हते दानवसैन्यपाले
संपीड्यमानास्त्रिदशैस्तु दैत्याः।
निमुक्तशस्त्रालकचर्मवस्त्राः
संप्रादयन् पाणमृतेऽसुरेन्द्राः॥ ५१
इति श्रीवामनपुराणे सप्तचत्वारिंशोऽध्याय ॥४॥