वामन महा पुराण
हरललित-दक्षयज्ञ का विध्यस(पूर्वानुवृत्त), शिव के कालस्वरुप एव राशिस्वरुपादि का वर्णन
पुलस्त्य उवाच।
जटाधरं हरिदृष्ट्वा क्रोधादारक्तलोचनम् ।
तस्मात् स्थानादपाक्रम्य कुञानेऽन्तर्हितः स्थितः ॥१
वसवोऽष्टौ हरं दृष्ट्वा सुनुवुर्वेगतो मुने ।
सा तु जावा सरिच्छेष्ठा सीता नाम सरस्वती ॥२
एकादश तथा रुद्रास्त्रिनेत्रा वृपक्तनाः ।
कान्दिशीका लयं जग्मुः समस्येत्यैव शंकरम् ॥ ३
विश्वेऽश्विनौ च साध्याश्च मरतोऽनलभास्कराः।
समासाद्य पुरोडाशं भक्षयन्तो महामुने ॥ ४
चन्द्रः सममृक्षगणेनिशां समुपदर्शयन् ।
उत्पत्यारुह्य गगनं स्वमधिष्ठानमाथितः ॥ ५
कश्यपाद्याश्च ऋपयो जपन्तः शतरुद्रियम् ।
पुष्पाञ्जलिपुटा भृत्वा प्रणताः संस्थिता मुने ॥ ६
शक्रादीनां सुरेशानां कृपणं विललाप ह ॥ ७
ततः क्रोधाभिभूतेन शंकरेण महात्मना ।
तलाहारैरमरा यहवो विनिपातिताः ॥८
पादप्रहारैरपरे त्रिशूलेनापरे मुने ।
दृष्ट्यमिना तथैवान्ये देवाधाः प्रलयीकृताः ॥९
वतः पूपा हरं वीक्ष्य विनिघ्नन्तं सुरासुरान् ।
क्रोधाद् याहू प्रसार्याथ प्रदुद्राव महेश्वरम् ॥ १०
तमापतन्तं भगवान् संनिरीक्ष्य त्रिलोचनः ।
बाहुभ्यां प्रतिजग्राह करेणैकेन शंकरः ॥ ११
कराभ्यां प्रगृहीतम्य शंभुनांशुमतोऽपि हि ।
कराङ्गुलिम्यो निश्चेरुरसृग्धाराः समन्ततः ॥ १२
ततो वेगेन महता अंशुमन्तं दिवाकरम् ।
भ्रामयामाप्त सततं मिहो मृगशिशुं यथा ॥१३
भ्रामितस्यातिवेगेन नारदांशुमतोऽपि हि ।
असकृद् दक्षदयिता दृष्ट्वा रुद्रं पलाधिकम् ।
क्रोध से भारत नेत्रवाले जटाधर को देखकर हरि उस स्थान से हट कर कुब्जाम्र में छिप कर बैठ गये।
मुने ! हर को देखकर आठ वसु वेग से वह (पिघल) गये। इससे सीता नामकी श्रेष्ठ नदी उत्पन्न हुई। (२)
तथा यूपकेतन त्रिनेत्रधारी एकादश रुद्र भय से भागते हुए शंकर के निकट जाकर उनमें लीन हो गये। (३)
हे महामुने! विश्वेदेवगण, अश्विनीवुमार, साध्यवृन्द, घायु, अग्नि एवं सूर्य शकर को निकट पाकर पुरोडाश साते हुए भाग गये।
वारागण के साथ चन्द्रमा रात्रि को प्रकट करते हुए आकाश में ऊपर जाकर अपने स्थान पर स्थित हो गये। (५)
हे मुने । कश्यप आदि ऋषि शारुद्रिय (मन्त्र) या जप करते हुए असलि में पुष्प लेकर विनम्र भाव से सड़े हो गये।
इन्द्रादिक देवताओं में रद्र को सर्वाधिक पली देस कर दक्ष की पत्नी अत्यन्त दीनतापूर्वक बार-बार विलाप करने (७)
तदनन्तर क्रोधाभिभूत महात्मा शंकर ने (हाथ के) तलवे के प्रहार से अनेक देवताओं को मार डाला। (८)
हे मुने। इसी प्रकार कुछ देवादिकों को पद प्रहार से कुछ को त्रिशूल से कुछ को मेत्राग्नि द्वारा नष्ट कर दिया।
तदनन्तर सुरों एवं असुरों का संहार करते हुए शकर को देसर पूपा-सूर्य कोषपूर्वक दोनों भुजाएँ प्रसारित कर महेश्वर की ओर दौडे। (१०)
भगवान् त्रिलोचन शर ने उन्हें आते देख एक ही हाथ से उनकी दोनों मुजाओं को पकड़ लिया। (११)
शभु द्वारा सूर्य के प्रगृहीत दोनों हायों की अगुलियों से चतुर्दिर रधिर की धारा प्रवाहित होने (१२)
तदनन्तर वे अंशुमान् दिवाकर को अत्यन्त बेग से निरन्तर इस प्रकार घुमाने लो जैसे सिंह मृगशावक को घुमाता है।
हे नारद । अत्यन्त वेग से घुमाये गए सूर्य की भुजाओं
भुजौ हस्वत्वमापन्नौ त्रुटितस्नायुयन्धनौ ॥ १४
रुधिराप्लुतसर्वाङ्गमंशुमन्तं महेश्वरः ।
संनिरीक्ष्योत्सस नमन्यतोऽभिजगाम ह ॥ १५
ततस्तु पूपा विहसन् दशनानि विदर्शयन् ।
प्रोवाचैह्येहि कापालिन् पुनः पुनरथेश्वरम् ॥ १६
ततः क्रोधाभिभृतेन पूष्णो वेगेन शंभुना ।
मुष्टिनाहत्य दशनाः पातिता धरणीतले ॥ १७
भग्नदन्तम्तथा पूपा शोणिताभिप्लुताननः ।
पपात भुवि निःसंज्ञो वजाहत इवाचलः ॥ १८
भगोऽभिधीक्ष्य पूपाणं पवितं रुधिरोक्षितम् ।
नेत्राभ्यां घोररूपाभ्यां वृषध्वजमपैक्षत ।। १९
त्रिपुरघ्नस्ततः क्रुद्धस्तरेनाहत्य चक्षुपी ।
निपातयामास भुवि क्षोभयन्सर्वदेवताः ॥ २०
ततो दिवाकराः सर्वे पुरस्कृत्य शतक्रतुम् ।
मरुद्भिश्च हुताशैश्च भयाज्जग्मुर्दिशो दश ॥ २१
प्रतियातेपु देवेषु प्रहादाद्या दितीश्वराः।
नमस्कृत्य ततः सर्वे तस्थुः प्राञ्जलयो मुने ॥ २२
ततस्तं यज्ञवाटं तु शंकरो घोरचक्षुपा ।
ददर्श दग्धं कोपेन सर्वाश्चैव सुरासुरान् ॥ २३
ततो निलिलियरे वीराः प्रणेमुर्दुद्रुवुस्तथा ।
भयादन्ये हरं दृष्ट्वा गता वैवस्वतक्षयम् ॥ २४
त्रयोऽग्नयस्त्रिभिनेत्रैर्दुःसहं समवैक्षत ।
दृष्टमात्रास्त्रिनेत्रेण भस्मीभूताभवन् क्षणात् ।। २५
अग्नो प्रणप्टे यज्ञोऽपि भूत्वा दिव्ययपुमंगः ।
दुद्राय विक्लवगतिर्दक्षिणासहितोऽम्बरे ॥ २६
तमेवानुससारेशचापमानम्य वेगवान् ।
शरं पाशुपतं कृत्वा कालरूपी महेश्वरः ॥ २७
अर्द्धन यज्ञबाटान्ते जटाधर इति श्रुतः ।
अर्डेन गगने शर्वः कालरूपी च कथ्यते ॥ २८
नारद उवाच ।
कालरूपी त्वयाख्यातः शंभुर्गगनगोचरः
लक्षणं च स्वरूपं च सर्व व्याख्यातुमर्हसि ।। २९
पुलस्त्य उवाच ।
स्वरूपं त्रिपुरघ्नस्य यदिप्ये कालरूपिणः ।
के स्नायुवन्ध टूट गए एवं वे छोटी हो गई।
दिवाकर को सर्वाङ्ग मेघिराप्लुत हुआ देस उन्हें छोड़ कर महेश्वर अन्यत्र चले गए।
तदनन्तर हँसते एवं दाँत दिखलाते हुए पूपा बारंबार कहने लगे, "हे कपाली । आओ आओ।" (१६)
तदुपरान्त क्रोधाभिभूत शम्भु ने वेगपूर्वक मुक्के से मारकर पूषा के दाँतों को धरती पर गिरा दिया। (१७)
इस प्रकार भग्नदन्त एवं रुधिराप्नुतमुख पूपा वन से मारे गये पर्वत के सदृश नि सज्ञ होकर पृथ्वी पर गिर पढ़ें। (१८)
गिरे हुए रुधिराप्तुत पूषा को देस पर भग भयङ्कर नेत्रों से वृपध्वज को देसने लगे। (१६)
तदनन्तर मुद्ध त्रिपुरहन्ता ने सभी देवताओं को क्षुब्ध परते हुए करतल के प्रहार से (भग) के दोनों नेनों को पृथ्वी पर गिरा दिया। (२०)
तत्पश्चान् आदित्यगण, इन्द्र को आगे पर, मरद्गणों तथा अग्नियों के साथ भय से दशों दिशाओं मे भाग गये। (२१)
मुने! देवताओं के चले जाने पर प्रसाद आदि दैत्य
महेश्वर को प्रणाम कर अअलिबाँध कर खड़े हो गए । (२२)
तदनन्तर शकर उस यज्ञमडप को तथा सभी देवासुरों को दग्ध करने के लिये क्रोधपूर्ण घोर दृष्टि से देखने लगे । (२३)
तत्पश्चात् महादेव को देखकर कुछ वीर भय से छिप गए, कई प्रणाम करने लगे, कुछ भाग गये और कोई-कोई यमपुरी पहुंच गये (२४)
तदनन्तर महेश्वर ने तीन नेत्रोंसे तीनों अग्नियों को देखा, उनके देखते ही तीनों अग्नियाँ क्षणभर में भस्मीभूत हो गयीं। (२५)
अग्नि के नष्ट होने पर यज्ञ भी दिव्य शरीर वाला मृग होकर दक्षिणा के साथ आकाश में व्यप्रगति से भाग गया। (२६)
रालरूपी वेगवान् महेश्वर घनुप को झुका कर उसमें पाशुपत शर संयुक्त पर उसी के पीछे दौड़े। (२७)
यज्ञशाला मे अर्धाश से स्थित शंकर जी 'जटाधर' नाम से प्रसिद्ध हुए एवं आगश में अर्वाश से स्थित उनमें 'कालस्पी' कहा जाता है। (२८)
नारद ने कहा-"आपने आगशधारी शंकर को
येनाम्मरं मुनिश्रेष्ठ व्यामं लोकहितेप्सुना ॥३०
यत्राश्विनी च भरणी कृत्तिकायास्तयांशकः।
मेपो राशिः कुजक्षेत्रं तच्छिरः कालरूपिणः ॥३१
आग्नेयांशास्त्रयो ब्रान् प्राजापत्य कवेहम् ।
सौम्या वृपनामेदं वदनं परिकीर्तितम् ।। ३२
मृगाईमादित्याशास्त्रयः सौम्यगृहं त्विदम् ।
मिथुनं भुजयोस्तस्य गगनस्थस्य शुलिनः ।। ३३
आदित्यांशश्च पुप्यं च आश्लेपा शशिनो गृहम् ।
राशिः कर्कटको नाम पार्चे मखविनाशिनः ।। ३४
पित्र्यक्षं भगदैवत्यमुत्तरांशश्च केसरी ।
सूर्यक्षेत्रं विभोर्ब्रह्मन् हृदयं परिगीयते ॥ ३५
उत्तरांशास्त्रयः पाणिश्चित्राधं कन्यका त्वियम् ।
सोमपुत्रम्य सद्म॑तद् द्वितीयं जठरं विभोः ।। ३६
चित्रांशद्वितयं स्वातिविशाखायांशस्त्रयम् ।
द्वितीयं शुक्रसदन तुला नाभिरुदाहता ॥ ३७
विशाखांशमनूराधा ज्येष्ठा भौमगृहं त्विदम् ।
द्वितीयं वृथिको राशिमेंट् कालस्वरूपिणः ॥ ३८
मूलं पूर्वोत्तरांशश्च देवाचार्यगृहं धनुः ।
ऊरुयुगलमीशस्य अमरर्ये प्रगीयते ॥ ३९
उत्तरांशास्त्रयो ऋक्षं श्रवणं मकरो मुने।
धनिष्ठा शनिक्षेत्रं जानुनी परमेष्ठिनः ॥४॥
धनिष्ठा, शतभिपा प्रौष्ठपद्यांशकत्रयम् ।
सौरेः समापरमिदं कुम्भो जड्ड च विश्रते ॥ ४१
प्रौष्ठपद्यांशमेकं तु उत्तरा रेवती तथा ।
द्वितीयं जीवसदनं मीनस्तु चरणावुभौ ॥ ४२
एवं कृत्वा कालरूपं त्रिनेत्रो
यज्ञं क्रोधान्मागणैराजधान।
विद्धश्चासौ वेदनाबुद्धिमुक्तः
कालरूपी कहा है। आप उनके सम्पूर्ण स्वरूप ओर लक्षण की व्याख्या करें। (२९)
पुलस्त्य ने कहा-हे मुनिश्रेष्ठ, मैं त्रिपुरनाशक कालरूपी
उन शकर के स्वरूप का बतलाता हूँ जिन्होंने लोकहित की कामना से आकाश को व्याप्त किया। (३०)
पूरी अश्विनी वथा भरणी एवं वृत्तिा के एक पाद से युक्त, मगल का क्षेत्र मेष राशि कालरूपी महादेव का शिर है । (३१)
हे ब्रह्मन् । कृत्तिका के तीन अश, पूरी रोहिणी एव मृगशिरा के दो पूर्व पादों वाल, शुक्र का क्षेत्र वृष राशि उनका मुख है। (३२)
मृगशिरा के शेप दो पाद, पूरो आर्द्रा और पुनर्वसु के तीन पाद वाला बुध का क्षेत्र मिथुन राशि गगनस्थ शूली की दो भुजाएँ हैं। (३३)
पुनर्वसु का एक पाद पूरा पुष्य और अश्लेपा नक्षत्रों वाला चन्द्रमा का क्षेत्र कर्कट राशि यज्ञविनाशफ शकर के दो पाव है। (३४)
हे ब्रह्मन् । पूरी मघा, पूरी पूर्वा फाल्गुनी और उत्तरा फाल्गुनी के एक पाद वाला, सूर्य का क्षेत्र सिंहराशि शकर का हृदय कहा जाता है। (३५)
उत्तराफाल्गुनी के तीन पाद, पूरा हस्त एव चिना के दो पूर्व पादों वाला, घुप का द्वितीय क्षेत्र कन्या राशि शकर का जठर है। (३६)
चित्रा के शेष दो पाद, पूरी स्वाति एव विशाखा के तीन पादों याला, शुक्र का दूसरा क्षेत्र तुला राशि महादेव की नाभि कहलाता है।
विशाखा के एक पाद, अनुराधा और ज्येष्ठा नक्षत्रों वाला, मगल का द्वितीय क्षेत्र वृश्चिक राशि कालरूपी महादेव का लिंग है। (३८)
पूरा मूल, पूरा पूर्वापाढा और उत्तरापाढा के एक पाद वाला वृहस्पति का क्षेत्र धनुराशि महेश्वर का करुयुगल है। (३९)
हे मुने । उत्तरापाढा के शेष तीन पाद, पूरा श्रवण और धनिष्ठा के दो पूर्व पाद वाला, शनि का क्षेत्र मकर राशि पामेष्टी महेश्वर के दो जानु हैं। (४०)
धनिष्ठा के अपराध पूरी शतभिषा, पूर्व भाद्रपद के तीन पादवाला शनि का द्वितीय गृह कुम्भ राशि उनकी दो जधाएँ हूँ। (४१)
पूर्वभाद्रपद का एक पाद, पूरा उत्तरभाद्रपद और रेवती नक्षत्रों वाला, वृहस्पति का द्वितीय गृह मीन राशि उनके दो चरण है। (४२)
इस प्रकार त्रिनेन ने कालरूप धारण कर शोधपूर्वक यस को याणों से मारा। तदनन्तर बाणविद्ध वेदनानुभूतिरहित
खे संतम्यौ तारकाभिश्चिताङ्गः ॥ ४३
नारद उवाच ।
राशयो गदिता ब्रह्मस्त्वया द्वादश वै मम ।
तेषां विशेपतो ब्रूहि लक्षणानि स्वरूपतः ॥ ४४
पुलस्त्य उवाच।
स्वरूपं तय वक्ष्यामि राशीनां भृणु नारद ।
यादृशा यत्र संचारा यस्मिन् स्थाने वसन्ति च ॥ ४५
मेपः समानमूर्तिश्च अज्ञाविकधनादिषु ।
संचारस्थानमेवास्य धान्यरत्नाकरादिपु ॥ ४६
नवशालमंछन्नवसुधायां च सर्वशः।
नित्यं चरति फुल्लेषु सरमा पुलिनेषु च ॥ ४७
वृपः सदृशरूपो हि चरते गोकुलादिषु ।
तस्याधियासभूमिस्तु कृषीवलपराश्रयः ॥ ४८
स्त्रीपुंसयोः समं रूपं शय्यासनपरिग्रहः ।
वीणावायधृङ् मिथुनं गीतनर्तकशिल्पिपु॥ ४९
स्थितः क्रीडारविनित्यं विहारावनिरस्य तु ।
मिथुनं नाम विरयातं राशिधात्मकः स्थितः ॥ ५०
कर्किः कुलीरेण समः सलिलस्थः प्रकीर्तितः ।
रेदारचापीपुलिने विविक्तावनिरेव च ।। ५१
सिंहस्तु पर्वतारण्यदुर्गकन्दरभूमिषु ।
वसते व्यापल्लीषु गह्वरेपु गुहासु च ॥ ५२
व्रीहिप्रदीपिककरा नावारूढा च कन्यका ।
चरते स्त्रीरतिस्थाने वसते नड्वलेषु च ।। ५३
तुलापाणिश्च पुस्पो वीथ्यापणविचारकः ।
नगरामानशालासु वसते तत्र नारद ॥५४
श्वभ्रवल्मीकसंचारी वृश्चिको वृश्चिकाकृतिः।
विपगोमयकीटादिपापाणादिपु संस्थितः ॥ ५५
धनुस्तुरङ्गजघनो दीप्यमानो धनुर्धरः ।
वाजिश रास्त्रविद्वीरः स्थायी गजरयादिषु ।। ५६
मृगास्यो मकरो ब्रह्मन् वृपस्कन्धेक्षणाङ्गजः ।
यज्ञ सारिकाओं से आवृत शरीर होकर आकाश में स्थित हो गया। (४३)
नारद ने कहा-हे ब्रह्मन् । आपने मुझ से द्वादश राशियों का कथन किया । अब विशेष रूप से उनके स्वरूप के अनु- सार लक्षण का वर्णन करें। (४४)
पुलस्त्य ने कहा-हे नारद | आपको मैं राशियों का स्वरूप बतलाता हूँ, सुनिये। वे जैसे है तथा जहाँ सचार और निवास करते हैं. वह सभी वर्णन करता हूँ। (४५) मेषराशि मेष के सदृश मूतिवाला है। बकरी, भेड़, धन धान्य एव रत्नाररादि इसके सञ्चार स्थान हैं। (४६)
तथा नवीन दूर्वा से आच्छन्न समग्र पृथ्वी एव पुष्पित वनस्पतियों से युक्त सरोवर के पुलिनों में यह नित्य सश्चरण करता है।
धुष के तुल्य रूपयुक्त वृषपशि गोकुरादि मे विचरण करता है तथा कृषकों की भूमि इसका निवास स्थान है। (४८)
मिथुन राशि स्त्री और पुरुष के समान रूप से युक्त है । शय्या और आसन इसके आश्रय हैं। अपने हाथों में इसते वीणा एव वाद्य धारण पर रक्खे हैं। गायकों, नर्तकों एव शिल्पियों में यह सवरण करता है। (४९)
इस द्वेधात्मक राशि को मिथुन कहते हैं। यह राशि क्रीडा प्रेमी एवं विहारभूमियों में निवास करने वाला है।(५०)
कर्कट राशि केकडे के सदृश रूपयुक्त एवं जल में रहने वाला कहा जाता है । जल से पूर्ण क्यारी एव पुलिन (नदीतीर) तथा एकान्त भूमि इसके सञ्चार के स्थान हैं।(५१)
सिह राशि पर्वत, अरण्य, दुर्गमस्थान, कन्दरा, व्याधों (आखेटकों) के स्थान, गदर एवं गुफाओं में निवास करता है। (५२)
कन्या राशि ब्रीहि एव दीपक हाथ में लिये हुए है तथा नौगरुद्ध है, वह त्रियों के रतिस्थान और सरपतों मे विचरण करता है।
हे नारद । तुला राशि हाथ मे तुला लिये हुए पुरप के रूप में गलियों और बाजारों में विचरण करता है तथा नगरों, मार्गों एव भवनों में निवास करता है। (५४)
वृश्चिक के आकार की वृश्चिक राशि, गड्ढे एव वल्मीक (दीमकों की याँबी) मे विचरण करता है। विष, गोबर, कोट एवं पाषाण आदि इसके निरास स्थान है।
धनुष राशि की जघा अश्व के सहश है। यह प्रकाशमान धनुपधारी है। यह घुड़सवारी, शूरकर्म एव अन का ज्ञाता तथा वीर है। गज एव रथ आदि में उस स्थान है। (५६)
हे ब्रह्मन् । मकर राशि का मुख मृग के सदृश, एक
मारोऽसौ नदीचारी वसते च महोदधौ ॥ ५७
रिक्तकुम्भश्च पुरुष. स्कन्धधारी जलाप्लुतः ।
धूतशालाचरः कुम्भः स्थायी शौण्डिकमद्मसु ।। ५८
मीनद्वयमयासक्तं मीनस्तीब्धिमंचर।
वसते पुण्यदेशेषु देवब्राह्मणसद्मसु ॥ ५९
लक्षणा गदितास्तुभ्यं मेपादीनां महामुने ।
न कस्यचित् त्वयार येयं गुह्यमेतत्पुरातनम् ॥ ६०
एवन् मया ते कथितं सुर
यथा त्रिनेत्रः प्रममाथ यज्ञम् ।
पुण्य पुराणं परमं पवित्र-
मार यातनापापहरं शिवं च ॥ ६१
इति श्रीवामनपुराणे पञ्चमोऽध्यायः ॥५॥