देवताओं के अङ्गों में विविध वृक्षों की उत्पत्ति, अखण्डव्रत में केशव का पूजन, विष्णुपअरस्तोन, कात्यायनी चरित के अन्तर्गत महिष की उत्पत्ति एव राज्याभिषेक

पुलस्त्य उवाच ।

मासि चाश्वयुजे ब्रह्मन् यदा पद्म जगत्पतेः ।

नाम्या निर्याति हि तदा देवेष्वेतान्यथोऽभवन् ।। १

कन्दर्पस्य कराग्रे तु कदम्यश्चारुदर्शनः ।

तेन वस्य परा प्रीतिः कदम्बेन विवर्द्धते ॥२

वटवृक्षः समभवत् तस्मिस्तस्य रतिः सदा ॥३

महेश्वरस्य हृदये धत्तुरविटपः शुभः ।

सजातः स च शर्यस्य रतिकृत् तस्य नित्यशः ।। ४

ब्रह्मणो मध्यतो देहाजातो मरकतप्रभः ।

कहते हुए घृतयुक्त जौ की दक्षिणा प्रदान करे। (५८-५६)

श्रावण मास में मृगभोज्य (१)के जल से स्नान कराकर फलयुक्त बिल्वपत्रों से महादेव की पूजा करे तथा अगुरु का धूप दे। तदनन्तर घृतयुक्त पृप, मोदक, दधि, दथ्योदन, उड़द की दाल, भुना हुआ जी एवं कचौड़ी पानैवेद्य अर्पण करने के उपरान्त बुद्धिमान व्यक्ति ब्राह्मण पोश्वेतवृषभ, शुभ कपिला गी, स्वर्ण एवं रक्त्यरत्र की दक्षिणा दे एवं शंभु के 'गदाधर' इस नाम का जप करे। (६०-६२)

इन दूसरे छ. मासों के अनन्तर द्वितीय पारण होता है। इस प्रकार एक वर्ष तक वृषभध्वज का पूजन कर महेश्वर के वचनानुसार मनुष्य अक्षय कामनाओं को प्राप्त करता है। (६३)

हे देवर्षे ! यह फल्याणकारी पवित्र एवं सर्वाक्षयार व्रत स्वय रुद्र ने फहा है। यह जैसा कहा है वैसा ही है। यह कभी अन्यथा नहीं हो सकता। (६४)

श्रीवामनपुराग में सत्रहवाँ  अध्याय समाप्त ॥१७॥

पुलस्त्य ने कहा-दे ब्रह्मन् ! आश्विन मास में अय जगत्पति (विष्णु) की नाभि से कमल उत्पन्न हुआ उसी समय अन्य देयों से ये पस्तुएं उत्पन्न हुई-

कामदेय के पराम में सुन्दर पदम्य उत्पन्न हुआ । इसी- लिये कदम्य से उनकी परमप्रीति बढ़ती है। (२)

यक्षाणामधिपस्यापि मणिभद्रस्य नारद ।

हे नारद ! यक्षों के राजा मणिभद्र से घटवृक्ष उत्पन्न हुआ। इसी से उसमें सदा उसका प्रेम है। (३)

महेश्वर के हृदय पर सुन्दर धत्तूर वृक्ष उत्पन्न हुआ। अतएव यह महादेव को सदा प्रिय है।(१)

ब्रह्मा के मभ्यशरीर से मरकतर्माण के समान सदिर

स दरः कण्टकी श्रेयानभवद्विश्वकर्मणः॥५

गिरिजायाः करतले कुन्दगुल्मस्त्वजायत ।

गणाधिपस्य कुम्भस्थो राजते सिन्धु वारकः ॥६

यमस्य दक्षिणे पाश्र्वे पालाशो दक्षिणोत्तरे ।

कृष्णोदुम्बरको रुद्राजातः क्षोभकरो वृपः॥ ७

स्कन्दस्य पन्धुजीवस्तु रवेरश्वत्थ एव च ।

कात्यायन्याः शमीजातापिल्यो लक्ष्म्याः करेऽभवत् ।।८

नागानां पतये ब्रह्मञ्छरस्तम्बो व्यजायत ।

वासुकेविस्तृते पुच्छे पृष्ठे दूर्वा सितासिता ॥ ९

साध्यानां हृदये जातो वृक्षो हरिवचन्दनः ।

एवं जातेषु सर्वेषु तेन तत्र रतियेत् ॥ १०

तत्र रम्ये शुभे काले या शुक्लैकादशी भवेत् ।

तस्यां संपूजयेद् विष्णुं तेन खण्डोऽस्य पूर्यते ॥ ११

पुष्पैः पत्रैः फलैर्वापि गन्धवर्णरसान्वितः

ओपधीभिश्च मुख्याभिर्यावत्स्याच्छरदागमः ॥ १२

घृतं तिला श्रीहियवा हिरण्यकनकादि यत् ।

मणिमुक्ताप्रवालानि वस्त्राणि विविधानि च ॥ १३

रसानि स्वादुकट्यम्लकपायलवणानि च ।

तिक्तानि च निवेद्यानि तान्यसण्डानि यानि हि ॥ १४

तत्पूजार्थ प्रदातव्यं केशवाय महात्मने ।

यदा संवत्सरं पूर्णमखण्डं भवते गृहे ॥ १५

कृतोपवासो देव द्वितीयेऽहनि संयतः ।

स्नानेन तेन स्नायीत येनाखण्ड हि वत्सरम् ॥ १६

सिद्धार्थकैस्तिलैर्वापि तेनैवोद्वर्तनं स्मृतम् ।

हविषा पद्मनाभस्य स्नानमेव समाचरेत् ।

होमे तदेव गदितं दाने शक्तिर्निजा द्विज ।। १७

पूजयेताथ कुसुमैः पादादारभ्य केशवम् ।

धूपयेद् विविधं धूपं येन स्याद् वत्सरं परम् ॥ १८

की उत्पत्ति हुई और विश्वमा के शरीर से सुन्दर कंटकी वृक्ष उत्पन्न हुआ।

गिरिनन्दिनी के करतल पर कुन्द-गुल्म पैदा हुआ तथा गणपति के कुम्भ देश में सिन्धुवारक वृक्ष विराजमान है। (६)

यमराज के दाहिने पार्श्व मे पालाश और दक्षिणोत्तर (घाम) पार्श्व में कृष्ण उदुम्बर का वृक्ष उत्पन्न हुआ। रुद्र से उद्वेजक वृप (वासक-अडूसा) की उत्पत्ति हुई। (७)

स्कन्द से बन्धुजीव, सूर्य से अश्वस्थ, कात्यायनी से शमी और लक्ष्मी के हाथ में वेल का वृक्ष पैदा (८)

हे ब्रह्मन् । नागों के पति (शेष) से शरस्तन्य (सरपत) उत्पन्न हुआ तथा वासुकि के विस्तृत पुच्छ और पीठ पर श्वेत एवं कृष्ण दूर्वा उत्पन्न हुई।

साध्यों के हृदय मे हरितचन्दन वृक्ष उत्पन्न हुआ। इस प्रकार उत्पन्न होने से उन सभी वृक्षों मे तत्तद् देवों की अनुरक्ति होती है।

उस रमणीय शुभ काल में जो शुक्ल एकादशी तिथि होती है उसमें विष्णु की पूजा करे। इससे इसकी न्यूनता दूर हो जाती है। (११)

शरत् काल के आगमन तक गन्ध, वर्ण और रसयुक्त पत्र, पुष्प एवं फलों तथा मुख्य औषधियों से विष्णु की पूजा करे। (१२)

घृत, तिल, व्रीहि, जौ, रजत, सुवर्ण, मणि, मुक्ता, प्रवाल, नाना प्रकार के वस्न, स्वादु, कटु, अम्ल, कपाय, लवण और तिक्त रस आदि वस्तुओं को अखण्डित रूप से महात्मा केशव की पूजा के लिये अर्पित करे। इस प्रकार पूजन करने से वर्ष के पूर्ण होने पर गृह में पूर्णता होती है। (१३-१५)

हे देवर्षे । उपवास कर दूसरे दिन संयत होकर इस प्रकार स्नान करे जिससे वर्षे अखण्डित रहे। (१६)

सफेद सरसों या तिल के द्वारा उबटन का विधान है। पद्मनाभ को घृत से स्नान कराना चाहिये । हे द्विन ! होम में भी वही (अर्थात् घृत) विहित है और दान में यथाशक्ति का विधान है। (१७)

तदनन्तर पुष्पों के द्वारा घरण से आरम्भ कर फेशव की पूजा करे एव नाना प्रकार के धूपों से उन्हें धूपित करे जिससे सम्वत्सर पूर्ण हो। (१८)

हिरण्यरत्नवासोभिः पूजयेत जगद् गुरुम् ।

रागखाण्डवचोष्याणि हविष्याणि निवेदयेत् ॥ १९

ततः संपूज्य देवेशं पद्मनाम जगद् गुरुम् ।

विज्ञापयन्मुनिश्रेष्ठ मन्त्रेणानेन सुव्रत ॥ २०

नमोऽस्तु ते पद्मनाभ पद्माधव महाद्युते ।

धर्मार्थकाममोक्षाणि त्वखण्डानि भवन्तु मे ॥ २१

विकासिपद्मपत्राक्ष यथाऽखण्डोसि मर्वतः

तेन सत्येन धर्माद्या अखण्डाः सन्तु केशव ॥ २२

एवं सवत्सरं पूर्ण सोपवासो जितेन्द्रियः ।

अखण्ड पारयेद् ब्रह्मन् व्रत वै सर्ववस्तुषु ।। २३

अस्मिथीर्णे ते व्यक्तं परितुष्यन्ति देवताः ।

धर्मार्थकाममोक्षाधास्त्वक्षयाः संभवन्ति हि ॥ २४

एतानि ते मयोक्तानि ब्रतान्युक्तानि कामिभिः ।

प्रवक्ष्याम्यधुना त्वेतद्वैष्णवं पञ्जरं शुभम् ॥ २५

नमो नमस्ते गोविन्द चक्रं गृह्य सुदर्शनम् ।

प्राच्या रक्षस्व मां विष्णो त्वामहं शरणं गतः ।। २६

गदां कौमोदकी गृह्य पद्मनाभामितद्यते ।

याम्यां रक्षस्व मा विष्णो त्वामहं शरणं गतः ॥ २७

हलमादाय सौनन्द नमस्ते पुरुषोत्तम ।

प्रतीच्यां रक्ष मे विष्णो भवन्तं शरणं गतः ॥ २८

मुसलं शातनं गृह्य पुण्डरीकाक्ष रक्ष माम् ।

उत्तरस्यां जगन्नाथ भवन्तं शरणं गतः ॥ २९

शार्ङ्गमादाय च धनु रस्त्रं नारायणं हरे ।

नमस्ते रक्ष रक्षोन ऐशान्यां शरण गतः ।। ३०

पाञ्चजन्यं महाशङ्खमन्तोंध्यं च पङ्कजम् ।

प्रगृह्य रक्ष मां विष्णो आगेय्यां यशसूकर ।। ३१

चर्म सूर्यशतं गृह्य खङ्गं चन्द्रमसं तथा ।

नैर्ऋत्यां मां च रक्षस्य दिव्यमूर्ते नृकेसरिन् ॥ ३२

सुवों, रत्नों और वस्त्रों द्वारा जगद्गुरु का पूजन करे तथा राग-खाण्डय (मिष्टान्न विशेप), चोष्य एव हविष्यों का नैवेद्य अर्पित करे। (१६)

हे सुवत । हे मुनिश्रेष्ठ। देवेश जगद्गुरु पद्मनाभ की की पूजा करने के उपरान्त इस मन्त्र से प्रार्थना करे-(२०)

हे पद्मनाभ । हे लक्ष्मी के पति । हे महाद्युतिमान् आपको प्रणाम है। हमारे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष अखण्ड हों। (२१)

हे विरसितकमलपत्र के समान ने वाले | आप जिस प्रकार सर्वत असण्ड हैं उसी सत्य के प्रभाव से मेरे धर्मादिक भी असण्डित रहें। (२२)

हे ब्रह्मन् । इस प्रकार सम्पूर्ण वर्ष तक उपवासी और जितेन्द्रिय रहते हुए सभी वस्तुओं पे द्वारा व्रत को अखण्ड के रूप से पारित करे। (२३)

यह मत करने पर निश्चित रूप से देवता प्रसन्न होते है एव धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष अश्य होते हैं। (२४)

कामियों द्वारा कथित इन व्रतों का मैंने तुमसे वर्णन क्यिा। अय में पल्याणकारी इस पैष्णवपअर का वर्णन करूंगा। (२५)

हे गोविन्द ! आपको नमस्कार है। हे विष्णो ! आप सुदर्शननचक्र लेकर पूर्व दिशा मे मेरी रक्षा करें । मैं आपकी शरण मेहूँ। (२६)

हे अमितद्युति पद्मनाभ । कौमोदकी गदा धारण कर दक्षिण दिशा में मेरी रक्षा करें । हे विष्णों । में आपकी शरण मे आया हूँ। (२७)

हे पुरुषोत्तम | आपको नमस्कार है। सौनन्द नामक इल लेकर आप पश्चिम दिशा मे मेरी रक्षा करें। हे विष्णो ! मैं आपकी शरण आया हूँ। (२८)

हे पुडरीकाक्ष । विनाशकारी मुसल लेकर आप उत्तर दिशा मे मेरी रक्षा करें । हे जगन्नाथ! मैं आपकी शरण आया हूँ। (२६)

हे हरि । शार्ङ्गधनुप एव नारायणास्त्र लेकर ईशान कोण मे मेरी रक्षा करें। हे रक्षोध्न। आपको नमस्कार है। में आपकी शरण में आया हूँ। (३०)

हे यज्ञमृवर विष्णु । पान्नजन्य नामक महाशय तथा अन्तर्वोग्य पङ्कज को ग्रहण कर अग्निकोण में मेरी रक्षा करें। (३१)

हे दिव्यमूतिनरकेशरी ! सूर्यशत नामक ढाल तथा चन्द्र- मस नामक तलवार रेकर नैत्य कोण में मेरी रक्षा (३२)

वैजयन्ती प्रगृह्य त्वं श्रीवत्सं कण्ठभूषणम् ।

यायन्यां रक्ष मां देव अश्वशीर्ष नमोऽस्तु ते ॥ ३३

वैनतेयं समारुह्य अन्तरिक्ष जनार्दन ।

मां त्वं रक्षाजित सदा नमस्ते त्वपराजित ॥ ३४

विशालाक्षं समारुह्य रक्ष मां त्वं रसातले ।

अपार नमस्तुभ्यं महामोह नमोऽस्तु ते ॥३५

करशीर्षाडिप्रपर्वेषु तयाऽध्यापञ्जरम् ।

कृत्वा रक्षस्स मां देव नमस्ते पुरुषोत्तम ॥ ३६

एतदुक्तं भगवता वैष्णव पञ्जरं महत् ।

पुरा रक्षार्थमीशेन कात्यायन्या द्विजोत्तम ॥ ३७

नाशयामास सा यत्र दानवं महिषासुरम् ।

नमरं रक्तपीजं च तथान्यान् मुरकण्टकान् ।। ३८

नारद उवाच ।

काऽसौ कात्यायनी नाम या जन्मे महिपासुरम् ।

नमरं रक्तपीजं च तथाऽन्यान् सुरकण्टकान् ।। ३९

कथासी महिपो नाम कुले जातश्च कम्य सः ।

कश्चासौ रक्तगीजाख्यो नमरः कस्य चात्मजः ।

एतद्विस्तरवस्तात यथावद् वक्तुमर्हसि ॥ ४०

पुलस्त्य उवाच ।

श्रूयतां संग्रवक्ष्यामि कथा पापग्रणाशिनीम् ।

सर्वदा वरदा दुर्गा येय कात्यायनी मुने ॥ ४१

पुराऽसुरसरी रौद्रो जगत्क्षोभफराभौ ।

रम्नथैय करम्भश्च द्वापास्तां सुमहारलौ ॥ ४२

तावपुत्रौ च देवर्षे पुत्रार्थ तेपतुरतपः ।

बहून् वर्षगणान् दैत्यौ स्थितौ पश्चनदे जले ।। ४३

तको जलमध्यस्थो द्वितीयोऽप्यग्निपंचमी ।

करम्मश्चैव रम्भश्व यक्षं मालवटं प्रति ॥ ४४

एकं निमग्नं सलिले ग्राहरूपेण वासनः ।

चरणाम्या समादाय निजघान यथेच्छया ॥ ४५

ततो भ्रातरि नष्टे च रम्भः कोपपरिप्लुतः ।

हे अश्वशीर्ष देव । वैजयन्तीमाला तया श्रीवत्स नामक कण्ठभूपण धारण कर वायव्य कोण मे मेरी रक्षा करें। आप को नमस्कार है। (३३)

हे अजित जनार्दन । वैनतेय पर आरूढ हो कर आप अन्तरिक्ष मे मेरी रक्षा करे । हे अपराजित । आपसे सदा नमस्कार है। (३४)

हे अकूपार (महाकच्छप) विशालाक्ष पर आरूद होकर आप रसातल मे मेरी रक्षा करें । हे महामोह 1 आपको नमस्कार है। (३५)

हे पुरपोत्तम । हाथ, शिर एव जोड़ों आदि मे अष्ट बाहु पञ्जर करके आप मेरी रक्षा करें। हे देव | आप को नमस्कार है। (३६)

हे द्विजोत्तम । प्राचीन काल में भगवान् ईश (शवर) ने कात्यायनी को रक्षा के हेतु इस महान् वैष्णव पर को उस स्थान पर कहा था जहाँ उन्होंने महिषासुर, नमर, रक्तबीज एव अन्यान्य देव-शत्रुओं का नाश किया था। (३७-३८)

नारद ने पूछा-"महिषासुर, नमर, रक्तबीज तथा अन्यान्य सुरकण्टकों का वध करने वाली ये कात्यायनी (३६)

"हे तात । यह महिप कौन है ? तथा वह किसके कुल में उत्पन्न हुआ था ? यह रक्तबीज कौन है ? तथा नमर किसरा पुत्र है ? आप इसका यथावत् विस्तारपूर्वक वर्णन करें।" (४०)

पुलस्त्य ने कहा-"सुनिये मैं उस पापनाशक कथा को कहता हूँ । हे मुने । सर्वदा वरदा दुर्गा ही ये कात्यायनी हैं।" (४१)

प्राचीन काल में रम्भ और करम्भ नामक भयकर, जगत्क्षोभकारी, महाबलवान दो श्रेष्ठ असुर थे। (४२)

हे देवः । पुत्रहीन उन दोनों दैत्यों ने पश्चनद के जल में रहकर बहुत वर्षों तक पुनार्थ तप किया। (४३)

मालवट यक्ष के प्रति एकाग्र करम्भ और रम्भ इन दोनों मे एक जल में स्थित होकर तथा दूसरा पञ्चाग्नि के मध्य बैठ कर तप कर रहा था। (४४)

प्राहरूपधारी इन्द्र जल में निमग्न एक को पैर पकड़ कर सींच ले गया और इच्छानुसार मार डाला। (४५)

तदनन्तर भाई के नष्ट हो जाने पर क्रोधयुक्त महा बलशाली रम्भ ने अपने शिर को काट कर अग्नि में आहुति करने की इच्छा (४६)

तदुपरान्त केश ग्रहण कर और हाथ में सूर्य सदृश

वही स्वशीर्ष संक्षिध होतुमैच्छन् महाबलः ॥ ४६

वतः प्रगृह्य केशेषु खड्गं च रविसप्रभम् ।

छेत्तकामो निजं शीर्ष वह्निना प्रतिपेधितः ॥ ४७

उक्तश्च मा दैत्यवर नाशयात्मानमात्मना ।

दुस्तरा परवघ्याऽपि स्ववध्याऽप्यतिदुस्तरा ॥ ४८

यच प्रार्ययसे वीर तददामि यथेप्सितम् ।

मा म्रियस्व मृतस्येह नष्टा भवति चै कथा ॥ ४९

वतोऽब्रवीद् वचो रम्भो वरं चेन्मे ददासि हि ।

त्रैलोक्यविजयी पुत्रः स्यान्मे त्वत्तेजसाऽधिकः ॥ ५०

अजेयो देवतैः सर्वैः पुभिदैत्यैश्च पावक ।

महायलो वायुरिव कामरूपी कृतास्त्रविद ॥ ५१

तं प्रोवाच कविह्मन् वाढमेवं भविष्यति ।

यस्यां चित्तं समालमि करिष्यसि ततः सुतः ।। ५२

इत्येवमुक्तो देवेन वह्निना दानवो ययौ।

द्रष्टुं मालवट यक्षं यश्च परिवारितम् ॥ ५३

तेषां पद्मनिधिस्तत्र वसते नान्यचेतनः।

गजाश्च महिपाश्चाश्वा गायोजाविपरिप्लुताः ॥ ५४

तान् दृष्ट्वैव तदा चक्रे भावं दानवपार्थियः ।

महिन्यां रूपयुक्तायां त्रिहायण्यां तपोधन ॥ ५५

सा समागाच दैत्येन्द्रं कामयन्ती तरस्विनी ।

स चापि गमन चक्रे भवितव्यप्रचोदितः ॥ ५६

वस्यां समभवद् गर्भस्तां प्रगृह्याथ दानवः ।

पातालं निवेशाय ततः स्वभवनं गतः ॥ ५७

दृष्टश्च दानवैः सर्वैः परित्यक्तश्च बन्धुभिः ।

अकार्यकारवेत्येवं भयो मालवटं गतः ॥ ५८

माऽपि तेनैव पतिना महिपी चारुदर्शना।

समं जगाम तत् पुण्यं यक्षमण्डलमुत्तमम् ।। ५९

ततस्तु वसतस्तस्य श्यामा मा सुपुवे मुने ।

अजीजन सुतं शुभं महिपं कामरूपिणम् ॥ ६०

एतामृतुमतीं जातां महिपोऽन्यो ददर्श ह ।

प्रभायुक्त खड्ग धारण कर अपना शिर काटने की इच्छा याले (रम्भ) को अग्नि ने रोका और कहा "हे दैत्यवर ! तुम स्वयं अपना नाश मत करो। परवध भी दुशार होता है, आत्महत्या तो अतिदुस्तर है। (४७-४८)

हे वीर । तुम जो माँगो वह तुम्हारी इच्छा अनुसार मैं तुम्हें दूंगा। मरो मत । इस संसार में मृत व्यक्ति की कथा नष्ट हो जाती है। (४९)

तदनन्तर रम्भ ने यह वचन कहा-'यदि आप पर देते है तो (यह दीजिये कि) मुझे आप से भी अधिक तेजस्वी त्रैलोक्य-विजयी पुत्र उत्पन्न हो । (५०)

हे पावक ! समस्त देवताओं तथा मानों और दैत्यों से भी यह अजेय हो । वह यायु के समान महावस्यान क्या ! कामरूपी एव सस्त्रिवेत्ता हो।'

हे ब्रह्मान् ! अग्नि ने उससे कहा-"अच्छा ऐसा ही होगा । जिस स्त्री में तुम्हारा चित्त लग जायेगा उसी से तुम पुत्र उत्पन्न करोगे।" (५२)

अग्निदेव के ऐसा कहने पर रम्भ यक्षों से परिवेष्टित मालबट यक्ष का दर्शन करने गया। (५३)

यहाँ उन यक्षों का पद्म नाम निधि काम मन से निवास करता था। बकरे और भेड़ों से भरे हुये अश्व, महिप तथा हाथी और गौ उस स्थान पर थे।

हे तपोधन ! दानवराज ने उन्हें देसफर तीन वर्षों वाली रूपवती एक महिपी में प्रेम प्रकट किया (अर्थात् आसक्त हुआ)। (५५)

कामपरायण होकर वह महिषी शीघ्र दैत्येन्द्र के समीप आ गयो । भवितव्यता से प्रेरित उसने (रम्भ ने) भी उसके (महिपी के) साब संगम किया। (५६)

उसे गर्भ हो गया। तदनन्तर उस महिषी को लेकर दानर पाताल मे प्रविष्ट हुआ और घर चला गया। (५७)

उसके दान-बन्धुओं ने उसे देख एवं 'अकार्यकारक जानार उसरा त्याग कर दिया । (तदनन्तर) यह पुन माल- वट के निम्न गया। (५८)

वह सुन्दरी महिपी भी उसी पति के साथ उस पवित्र और उत्तम यक्ष-मण्डल में गई। (५६)

हे मुने! वहाँ उसके निवास करते समय उस श्यामा (महिपी) ने प्रसर किया । उसने एक शुभ तथा इच्छानुसार रूप धारण करने याले महिप पुन को उत्पन्न किया । (६०)

उसके ऋतुमती होने पर किसी दूसरे महिप ने उसे

सा चाम्यगाद् दितिवरं रक्षन्ती शीलमात्मनः ।। ६१

तमुन्नामितनासं च महिपं वीक्ष्य दानरः ।

सङ्गं निष्कृष्य तरसा महिप समुपाद्रवत् ॥ ६२

तेनापि दैत्यस्तीक्ष्णाम्यां शृङ्गाभ्यां हृदि ताडितः ।

निर्मिन्नहृदयो भूमौ निपपात ममार च ॥ ६३

मृते भर्तरि सा श्यामा यक्षाणां शरणं गता।

रक्षिता गुह्यकै. साध्वी निवार्य महिप ततः ॥ ६४

चतो निवारितो यह यारिदिनातुरः।

निपपात सरो दिव्यं ततो दैत्योऽभवन्मृतः ॥ ६५

नमरी नाम विरयातो महारलपराक्रमः ।

यक्षानाश्रित्य तस्थौ स कालयन् श्वापदान् मुने ।। ६६

स च दैत्येश्वरो यक्षसलवटपुरस्सरैः ।

चितामारोपितः सा च श्यामा तं चारुहत् पतिम् ॥ ६७

ततोऽग्निमध्यादुत्तस्थौ पुस्पो रौद्रदर्शनः ।

व्यद्रावयत् स तान् यक्षान् खड्गपाणिभयंकरः ॥ ६८

ततो हतास्तु महिपाः सर्व एव महात्मना |

ऋते संरक्षितारं हि महिषं रम्भनन्दनम् ॥ ६९

स नामत. स्मृतो दैत्यो रक्तपीजो महामुने ।

योजयत् सर्वतो देवान् सेन्द्ररुद्रार्कमारुतान् ।। ७०

एवं प्रभाया दनुपुगवास्ते

तेजोऽधिकस्तत्र पभी हयारिः।

राज्येऽमिपिक्तश्च महाऽसुरेन्द्र-

विनिर्जितैः शम्परतारकायैः ।। ७१

अशक्नुवद्भिः सहितैश्च देवः

सलोकपालैः सहुताशभास्करैः ।

स्थानानि त्यक्तानि शशीन्द्रभास्करै-

धर्मश्च दूरे प्रतियोजितश्च ।। ७२

इति श्रीवामनपुराणेअष्टादशोऽध्याय ॥१८॥

देखा। वह अपने शील का रक्षण करती हुई दैत्यश्रेष्ठ के निकट गई। (६१)

नाक को ऊपर उठाये उस महिप को देख कर दानव खड्ग निकाल कर महिप पर वेग से आक्रमण किया। (६२)

उस (महिप) ने भी तीक्ष्णा शृङ्गों से दैत्य के हृदय में प्रहार किया। वह दैत्य हृदय फट जाने से भूमि पर गिर पडा और मर गया। (६३)

पति के मर जाने पर वह महिषी यक्षों की शरण में गई । तदनन्तर गुह्यकों ने महिप को हटा कर साध्वी महिपी की रक्षा की। (६४)

यक्षों द्वारा निवारित कामात ह्यारि (महिप ) एक दिव्य सरोवर में गिर पड़ा । तदुपरान्त वह मर कर एक दैत्य हो गया। (६५)

हे मुने। वन्य पशुओं को मारते हुए यक्षो के आश्रय मे रहने वाला महावल पराक्रम युक्त वह दैत्य नमर नाम से (६६)

मालवट आदि यक्षों ने उस दैत्येश्वर को चिटा पर विख्यात हुआ।

रखा। यह श्यामा भी पति के साथ ( चिता पर) आरूढ हो गई। (६७)

तदनन्तर अग्नि के मध्य से हाथ मे खड्ग धारण किये रौद्रदर्शन एघ भयकर पुरुष प्रकट हुआ। उसने सभी यक्षों को भगा दिया। (६८)

तदुपरान्त उस बलवान ने संरक्षक रम्भनन्दन महिप को छोड़कर सारे महिषों को मार डाला। (६९)

हे महामुने । वह दैत्य रक्तबीज नाम से विख्यात हुआ। उसने इन्द्र, रुद्र, सूर्य एव मस्तादि सहित देवों को सर्वत जीत लिया। (७०)

वे सभी दैत्य इस प्रकार के प्रभाव से युक्त थे। किन्तु उनमे हयारि (महिष ) अधिक तेजस्वी था । उसके द्वारा विजित शम्बर, चारकादि महान् असुरों ने उसका राज्याभिषेक किया। (७१)

लोकपालों के सहित अग्नि, सूर्य आदि देवों के द्वारा एक साथ मिलकर जब यह जोता नहीं गया वो चन्द्र, इन्द्र एव सूर्य ने अपना अपना स्थान छोड़ दिया तथा धर्म भी दूर हटा दिया गया।

श्रीवामनपुराण में अठारहवा अध्याय समाप्त॥१८॥