वामन महा पुराण
वामन का विविध स्थानों में निवास कथन एव वरुजाङ्गल के लिए प्रस्थान
श्रीभगवानुवाच ।
आधं मात्स्यं महदूपं संस्थितं मानसे ह्रदे।
सर्वपापक्षयकर कीर्तनस्पर्शनादिभिः ॥ १
कोर्ममन्यत्सनिधानं फोशियां पापनाशनम् ।
इयशीपं च कृष्णांशे गोविन्दं हस्तिनापुरे ॥२
विविक्रम च कालिन्यां लिङ्गदे भवं पिसुम् ।
पंदारे माधवं गौरि फुझाने हष्टम्र्धजम् ।। ३
नारायणं पदयां च वाराहे गरुडासनम् ।
जयेश भद्रकणे च विपाशायां द्विजमियम् ॥
रुपधारमिरावत्यां कुरुक्षेत्र पुरुषजम् ।
कृतशाचे नृसिंहं न गोफणे विधर्मिणम् ।। ५
'प्राचीने कामपालं च पुण्डरीक महाम्ममि ।
पिशारापे घाजित हंस हंगपदे वया ॥ ६
पयोप्णायामसण्डं च पिवम्तायां पुमारिलम् ।
दे प्रयन् ! दिव्य, पार्थिय, जलपर, आशशयर, स्पायर, जाम, इन्द्र, सूर्य, पन्द्र, यम, पशु, पराग, सभी अग्नियों, समस्तपालप, ग्राहा से लेकर स्थायर तक पटा-पक्षी सहित समसा मूर्तिमान और अमूर्त थियिष गुरा सम्पम ये सभी पदार्य पृथ्वी की पूर्ति के लिए मुमसे ही रत्पर हुए हैं। (५८)
गृभ्यी पर स्थित ये सभी मुख्य पदार्थ देयों, सिखों यंदानयों से पूजनीय है। द्विजपर्य! इनफ. कीर्तन ण्य दर्शनमात्र से पाप सहमा नष्ट हो जाता है। (५९)
श्रीवामनपुण में बसटवाँ अध्याय समाप्त ॥१२॥
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श्रीमगपान ने कहा-कीर्तन और स्पर्श आदि से सभी पापोंयिनाय फरने पाटा मेरा प्रथम विशाल । मरस्परप मानस सरोवर में पित।
दूसरा पापनाशक मातार होशिय नदी में चित । है। गांव में अपनी भार या हशिनापुर में गोपियतिपिपरमान है।
परिन्दी में विषिषम, सिंगभर में पाप मप, पंचारती में मापद सीरि धौर इम्मान में एटमूत्र रुप दिन। (२)
यहरिरामम में नारायर, पाराह में गरगरासन मद्राकर्ण में अपेश पर्य विरास नदी के दर पर विज्ञप्रियम्पपिपमान है। (५)
इससी में रूपपार, कुरक्षेत्र में पुराणा, पोप में मृगिर और गोरम में पिपरमां पांमान है। (१)
मापन स्थान में पमपान, मदाग्भस में पुण्डरीक पिगारपूप में मतिर दशा पर में रम रूप पिपमान है।
पोनी में प्राग, शिया में पुमारिस, मम्मिान
मणिमत्पर्वते शभुं ब्रह्मण्ये च प्रजापतिम् ॥ ७
मधुनद्यां चक्रधरं शूलबाई हिमालये।
विधि विष्णुं मुनिश्रेष्ठ स्थितमोपपिसानुनि ।। ८
भृगुतुझे सुवर्णाक्षं नैमिपे पीतवाससम् ।
गयायां गोपति देवं गदापाणिनमीश्वरम् ॥ ९
त्रैलोक्यनाथं वरदं गोप्रतारे कुशेशयम् ।
अर्धनारीश्वरं पुण्ये माहेन्द्र दक्षिणे गिरौ ॥ १०
गोपालमुत्तरे नित्यं महेन्द्रे सोमपीथिनम् ।
चैकुण्ठमपि सह्याद्री पारियात्रेऽपराजितम् ॥ ११
कशेरुदेशे देवेशं विश्वरूपं तपोधनम् ।
मलयाद्री च सौगन्धि विन्ध्यपादे सदाशिवम् ॥ १२
अवन्तिविपये विष्णुं निषधेयमरेश्वरम् ।
पाश्चालिकं च प्रम पाश्चालेषु व्यवस्थितम् ॥ १३
महोदये हयग्रीवं प्रयागे योगशायिनम् ।
स्वयंभुवं मधुवने अयोगन्धिं च पुष्करे ॥ १४
तथैव विप्रनवर वाराणस्यां च केशवम् ।
अविमुक्तकमय लोलयात्रैव गीयते ॥ १५
पद्मायां पाकिरणं समुद्रे वडवामुखम् ।
कुमारधारे वाहीशं कार्तिकेयं च यहिणम् ॥ १६
अजेशे शंभुमनघं स्थाणुं च कुरुजाङ्गले ।
वनमालिनमाहुमा किष्किन्धावासिनो जनाः ॥ १७
वीरं कुवलयारूढं शहचक्रगदाधरम् ।
श्रीवत्साङ्कमदाराङ्गं नर्मदायां श्रियः पतिम् ॥ १८
माहिष्मत्यां त्रिनयनं तत्रैव च हुताशनम् ।
अर्युदे च त्रिसौपर्ण क्ष्माधरं सुफराचले ।। १९
त्रिणाचितं ब्रह्म प्रभासे च कपर्दिनम् ।
तवैवात्रापि विख्यातं तृतीयं शशिशेखरम् ॥ २०
उदये शशिनं सूर्य ध्रुवं च त्रितयं स्थितम् ।
हेमटे हिरण्याक्षं स्कन्दं शरवणे मुने ॥ २१
महालये स्मृतं रुद्रमत्तरेपु कुरुष्वथ ।
पर्यत में शम्भु एवं प्रक्षण्य मे प्रजापति रूप स्थित है।
हे मुनिश्रेष्ठ! मधुनदी मे चम्धर, हिमालय में शूल्याहु और ओपधिप्ररथ में मेरे विष्णु रूप पो अवस्थित जानें। (८)
भृगुतुंग में सुवर्णाक्ष, नैमिप मे पोतयासा एय गया में गोपति गदाधर इधर रूप घर्तमान है। (९)
गोप्रतार में परदायक सरोक्यनाथ पुशेशय एच पवित्र महेन्द्र पर्वत पर दक्षिण मे अधनारीश्वर रूप विद्यमान है। (१०)
महेन्द्र पर्वत पर उत्तर में सोमपीथी गोपाल, सहादि पर्यन में कुण्ठ व्यं पारियान में अपराजित रूप (११)
कशेरु देश में तपोधन विधरप देवेश, मलय पर्वत में सौगन्धि तथा यिध्यपाद में सदाशिव रूप वर्तमान है। (१२)
ममपि ! अयन्ति देश में विष्णु, निपप देश में अमरेपर और पांचाल देश में मेरा पांचालिकरप व्यपस्थित है। (१३)
मदोदय में इपीय, प्रयाग में योगशापी, मधुपन में स्थपाभुप और पुपर में प्रयोगन्धि रूप विद्यमान (१४)
हे विप्रश्श्रेष्ठ! उसी प्रकार याराणसी मे मेरा फेशन रूप तथा यहीं पर अविमुत्तक तथा लोल रूप को स्थित कहा गया है। (१५)
पद्मा मे परिरण, समुद्र मे यड्यामुस तथा पुमारधार में पालीश और यहाँ कार्तिीय रूप स्थित है। (१६)
अजेश मै अनघ शम्भु सथा युरुजांगल मे स्थाणु मूर्ति हैं। पिफिया के निवासी लोग मुझे पनमाली पड़ते हैं।
नर्मदा के क्षेत्र में मुझे धीर, पुयलयास्त, समयक गदाधर, श्रीयत्सा एवं उदारान धीपनि कहा जाता है। (१८)
माहिष्मती में मेरा प्रिनयन एय हुताशन रूप विद्यमान है है। इसी प्रकार अर्बुद मे निसीपणे एवं परायल में मेरा माघर म्प अयस्थित है। (१६)
हे ब्रह्मर्षि प्रमास में मरा बिगापित, पपर्दा तृतीय शशिशेर स्पयिन्यात है। (२०)
उदयगिरि में पन, पुर्य और भुप ये सीन मूर्तियों अवस्थित है। मुनि! हेमपूट में हिरण्यास पर्प शरपण में स्कन्द नामक स्प विद्यमान है। (२१)
'हे मुनिभेष्ठ! महालप में रद्र उप में सपं.
पद्मनाभं मुनिश्रेष्ठ सर्वसौख्यप्रदायकम् ॥ २२
समगोदावरे ब्रह्मन् विख्यातं हाटकेश्वरम् ।
तत्रैव च महाहंमं प्रयागेऽपि वटेश्वरम् ॥ २३
शोणे च रुक्मकरचं कुण्डिने प्राणवणम् ।
भिल्लीवने महायोग मारेषु पुरुपोत्तमम् ॥ २४
प्लक्षावतरणे विश्वं श्रीनिवासं द्विजोत्तम ।
शुर्पारके चतुर्याहुं मगधायां सुधापतिम् ॥ २५
गिरिप्रजे पशुपति श्रीकण्ठं यमुनातटे ।
वनस्पति समाख्यात दण्डकारण्यवासिनम् ।। २६
कालिञ्जरे नीलकण्ठं सरय्या शंभुमुत्तमम् ।
हंसयुक्तं महाकोश्या सर्वपापप्रणाशनम् ।। २७
गोकर्णे दक्षिणे शयं यासुढेवं प्रजानुसे ।
विष्यशृङ्गे महाशौरि कन्थायां मधुसूदनम् । २८
त्रिकूटशिखरे ब्रह्मन चम्पाणिनमीश्वरम् ।
लौहदण्डे हृषीकेशं कोसलायां मनोहरम् ॥ २९
महामाहुं सुराष्ट्र च नवराष्ट्र यशोधरम् ।
भूधरं देविकानयां महोदायां, कुशप्रियम् ॥ ३०
गोमत्यां छादितगदं शङ्खोद्धारे च शहिनम् ।
सुनेत्रं सैन्धवारण्ये शूरं शूरपुरे स्थितम् ।। ३१
रुद्रारयं च हिरण्मत्यां वीरभद्र त्रिविष्टपे ।
शङ्ककणं च भीमायां भीमं शालवने विदुः ॥ ३२
विश्वामित्रं च गदितं कैलासे वृषभध्वजम् ।
महेशं महिलाशैले कामरूपे शशिप्रभम् ॥ ३३
यलम्यामपि गोमित्रं कटाहे पङ्कजप्रियम् ।
उपेन्द्र सिंहलद्वीपे शकाढे कुन्दमालिनम् ॥ ३४
रसावले च विख्यातं सहसशिरसं मुने ।
कालाग्निरुद्रं वत्रैव तथाऽन्यं कृत्तिवाससम् ॥ ३५
सुतले कूर्ममचलं वितले पङ्कजामनम् ।
महातले गुरो रयात देवेशं छागलेश्वरम् ।। ३६
तले सहस्रचरणं सहस्रभुजमीश्वरम् ।
सहस्राक्षं परिरयातं मुसलाकृष्टदानवम् ।। ३७
पाताले योगिनामीशं स्थितञ्च हरिशंकरम् ।
सौख्यप्रद पद्मनाभ रूप विख्यात है। (२२)
हे ब्रह्मन् । सप्तनोदायर मे विख्यात हाटकेश्वर एव महाहस तथा प्रयाग मे घटेश्वर रूप अवस्थित है। (२३)
शोण मे रुक्मस्यच, कुण्डिन मे घ्राणतर्पण, भिटीवन में महायोग, माद्र में पुरुषोत्तम रूप विद्यमान है। (२४)
हे द्विजोत्तम । प्लशावतरण में विश्वात्मक श्रीनिवास, शूर्पारक में चतुर्बाहु एवं मगधा मे सुधापति रुप (२५)
गिरिव्रज मे पशुपति, यमुनातट पर श्रीकण्ठ एव दण्डकारण्य मे मेरा घनस्पति रूप विख्यात है। (२६)
कालिंजर में नीलकण्ठ, सायू मे उत्तम शम्भु एवं महाकोशी मे सर्वपापविनाशक हसयुक्तरूप स्थित है। (२७)
दक्षिण गोकर्ण में शर्व, प्रजामुख में वासुदेव, विन्ध्य पर्वत के शिखर में महाशीरि एव कन्या में मधुसूदन रूप विद्यमान है। (२८)
हे ब्रह्मन् । त्रिकूटपर्वत के शिखर पर चक्रपाणि ईश्वर, लौहदण्ड मे हपीकेश तथा कोशला मे मनोहर रूप वर्तमान है। (२६)
सुराष्ट्र मे महागहु, नवराष्ट्र में यशोधर, देविका नदी मे भूधर तथा महोदा मे कुशप्रिय रूप स्थित है। (३०)
गोमती में छादितगद, शखोद्धार मे शसी, सैन्धवारण्य मे सुनेज एव शरपुर मे शूर रूप विद्यमान है। (३१)
हिरण्वती मे रुद्र, त्रिविष्टप मे वीरभद्र, भीमा मे शकुवर्ण और शारवन में भीम नामक रूप को लोग जानते है। (३२)
कैलास मे वृषभध्वज विश्वामित्र, महिलाशैल मे मद्देश एव कामरूप मे शशिप्रभ रूप धर्तमान है। (३३)
बलभी मे गोमित्र, कटाह मे पङ्कजप्रिय, सिंहलद्वीप में उपेन्द्र एव शाकाह मे कुन्दमारी नामक रूप स्थित है। (३४)
हे भुने । रसातल मे विख्यात सहस्रशीर्प एव पालाग्नि रुद्र तथा कृत्तिवासा नामक विद्यमान है। (३)
हे गुरु । सुतल मे अचल कूर्म, वितल में पकजासन तथा महातल में छागलेश्वर नामक विख्यात देवेश रूप स्थित है।
तल में सहस्रचरण, सहस्रबाहु एव दानव का आकृष्ट करने वाला मेरा सहस्राक्ष रूप अवस्थित है। (३७)
धरातले कोकनदं मेदिन्यां चक्रपाणिनम् ॥ ३८
अपलों के च गरुडं स्थलों के विष्णुमव्ययम् ।
महलों तथा गस्त्यं कपिलं च जने धितम् ।। ३९
तपोलोकेऽपिलं ब्रह्मन् वाङ्मयं सत्यसंयुतम् ।
प्रमाणं ब्रह्मलोके च सममे ये प्रतिष्टितम् ।। ४०
सनातनं तथा शैवे परं ब्रह्म च वैष्णवे ।
अप्रताप निरालम्मे निराकाशे तपोमयम् ॥ ४१
जम्यूद्वीपे चतुर्याहुँ कुशद्वीपे कुशेशयम् ।
प्लक्षद्वीपे मुनिश्रेष्ठ ज्यातं गरुडवाहनम् ।। ४२
पमनाभ तथा क्रौञ्चे शाल्मले वृपभप्रजम् ।
सहस्रांशुः स्थितः शाके धर्मराट् पुष्करे स्थितः ॥४३
तथा प्रथिव्यां ब्रह्म शालग्रामे स्थितोऽस्म्यहम् ।
समलस्थलपर्यन्तं चरेपु स्थायरेषु च ॥ ४४
एतानि पुण्यानि ममालयानि
ब्रह्मन् पुराणानि सनातनानि ।
धर्मप्रदानीह महौजसानि
संकीर्तनीयान्यपनाशनानि ॥ ४५
संकीर्तनात् स्मरणाद् दर्शनाच
संस्पर्शनादेव च देवतायाः।
धर्मार्थकामाघमवर्गमेय
लमन्ति देया मनुजाः ससाध्याः ॥ ४६
एतानि तुभ्यं पिनिवेदितानि
ममालयानीह तपोमयानि ।
उचिष्ठ गच्छामि महासुरस्य
यशं सुराणां हि हिताय विप्र ॥ ४७
पुलस्त्य उवाच।
इत्येवमुक्त्वा वचनं महर्षे
विष्णुर्भरद्वाजमूर्षि महात्मा।
बिलासलीलागमनो गिरीन्द्रा
स चाम्यगच्छन् फुरुजाङ्गलं हि ॥ ४८
इति श्रीवामनपुराणे अपष्टितमोऽध्याय ॥६॥
पाताल में योगीश हरिशकर, धरातल पर कोपनद तथा मेदिनी में पमपाणि रूप पर्तमान है। (३८)
भुपर्लोक में गरह, स्यलेक में अव्यय विष्णु, महलोक मे अगरस्य तथा जनक मे पपिल नामक रूप विद्यमान है। (३९)
हे मनन् । तपोलोक में सत्यसंयुक्त अखिल पाइमय ज्य सप्तम मालोक में प्रभा नामर रूप प्रनिहित है। (४0)
शिपत्येक मे सनातन, विष्णुनगेफ में परम प्रय, निरालम्य में अप्रतपय व्यनिराश में तपोमय नामक सर स्थित है।
है मुनिश्रेष्ठ । जग्यू द्वीप में पतुर्या, पुदीप में पुशेशय एष प्लक्षद्वीप में गरब्याहन नाम से विख्यात | रूप वर्तमान है। (४२)
बौद्राद्वीप में पनाम, शाल्मस्ट्रीप में पृपभपज, भारीप में राहावांय मया पुष्कर द्वीप में धर्मराज नामक रूप विद्यमान है।
हे ब्रह्मर्षि इसी प्रकार पुष्पी में में माम पे भीतर अपरियत हूँ। प्रसर जल,यल से हेयर समरण पापा में में वांमारहूँ।
हे ब्रह्मन् ! ये ही मेरे पुण्य, पुरातन एय सनातन धर्मप्रद, अत्यन्त ओजस्वी, सङ्कीर्तन योग्य एवं अपनाशक निवास स्थान है।
देवता पे फीर्तन, स्मरण, दर्शन और स्पर्श परने से दी देय, मनुष्य और साध्य रोग धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्राप्त करते हैं। (४६)
है पि। मैंने थाप से अपने इस सपोमय स्थानों को कहा। उठिए, देयवाओं या हित साधन करने के लिए में पति रे या में जाता हूँ। (१०)
पुटारय ने कहा-हे महर्षि! महारमा विष्णु महर्षि ने भरमाज से इस प्रकार या पपन करपर पिनासपूर्वक पालो हुए हर गिरीद्र से पुरजांगल में पारे।
श्री वामनपुराण में तिराइवाँ अध्याय समाप्त ॥ ६३॥