वामन महा पुराण
स्कन्दोपत्ति, स्कन्द के षण्मुख चतुर्मूर्ति होने का कारण, स्कन्द का सेनापति पद पर अभिषेक, स्कन्द के लिए गण, मयूर, शक्ति एव दण्डादि का समर्पण
नारद उवाच।
फवं समहिपः मौनो भिन्नः मन्टेन मुमत ।
एतन्मे पिम्तराद् प्रान् कथयस्वामिवधुते ॥ १
पुलम्य उवाच।
शृणुप्प क्यायिष्यामि फया पुण्या पुरावनीम् ।
यग्रोवृद्धि इमारम्य पातिरंयम्य नारद ॥ २
यत्तत्पीत हुताशेन एन गुरं पिनाग्निः ।
तेनामान्तोऽमय अन्नन् मन्दतेना हुताशन. ॥३
सतो जगाम देवानां मराशममित्यति ।
तथापि प्रहिवस्तूण घासलोकं जगाम ह ॥ ४
स गच्छन् युटिला देवी ददर्श पपि पापकः ।
वां दृष्ट्या प्राह पुटिले तेन एवमुदईरम् ॥ ५
महश्चरेण मंत्परत निर्दहद् भुवनान्यपि ।
तस्मान् प्रतीच्छ पुत्रोऽयं तर धन्यो भरिम्यति ॥ ६
इत्यग्निना मा कुटिला स्मृत्वा समतमतमम् ।
प्रपिम्याम्मगि मम प्राह यदि मदापगा ।। ७
वतावपारपदेयी शायं तनम्त्यपू पुपन् ।
यह प्राचीन, परम पवित्र, माग्यों को माल देने यात्री देवी पो विषयच्या र्मयापित्त मयों को सदा मुनी गया होगा चाहिये । भायान ने मेलोण रहा है।(३१)
हुताशनोऽपि भगवान् कामचारी परिभ्रमन् ।। ८
पञ्चवर्षसहस्राणि धृतवान् हन्यभुक् ततः ।
मांसमस्थीनि रुधिरं मेदोन्त्ररेतसी त्वचः॥९
रोमश्मश्वक्षिकेशायाः सर्वे जाता हिरण्मयाः ।
हिरण्यरेता लोकेषु तेन गीतश्च पावकः ॥ १०
पञ्चवर्ष सहस्राणि कुटिला ज्वलनोपमम् ।
धारयन्ती तदा गर्भ ब्रह्मणः स्थानमागता ॥ ११
तां दृष्टवान् पद्मजन्मा संतप्यन्ती महापगाम् ।
दृष्ट्या पप्रच्छ केनायं तव गर्भः समाहितः ॥ १२
सा चाह शाङ्करं यत्तच्छुकं पीतं हि बहिना ।
वदशक्तेन तेनाद्य निक्षिप्रं मयि सत्तम ॥ १३
पञ्चवर्ष सहस्राणि धारयन्त्याः पितामह ।
गर्भस्य पर्वते कालो न पपात च कर्हि चित् ॥ १४
तच्छ्रुत्वा भगवानाह गच्छ त्यमुदयं गिरिम् ।
तत्रास्ति योजनशतं रौद्रं शरवणं महद् ॥ १५
तत्रेनं क्षिप सुश्रोणि विस्तीर्णे गिरिसानुनि ।
दशवर्प सहस्रान्ते ततो पालो भविष्यति ॥ १६
सा श्रुत्वा ब्रह्मणो वाक्यं रूपिणी गिरिमागता ।
आगत्य गर्भ तत्याज मुखेनैवाद्रिनन्दिनी ॥ १७
सा तु संत्यज्य ते बालं ब्रह्माणं सहसागमत् ।
आपोमयी मन्त्रवशात् संजाता कुटिला सती ॥ १८
तेजसा चापि शार्वेण रौस्मं शरवणं महत् ।
तन्निवासरताश्चान्ये पादपा मृगपक्षिणः ॥ १९
ततो दशसु पूर्णेषु शरदशशतेष्वथ ।
घालार्कदीनिः संजातो पालः कमललोचनः ॥ २०.
उत्तानशायी भगवान् दिव्ये शरवणे स्थितः ।
मुसेऽङ्गुष्टं समाक्षिप्य रुरोद धनराडिय ॥ २१
एतस्मिन्नन्तरे देव्य कृत्तिकाः पट् सुतेजसः ।
ददृशुः स्वेच्छया यान्त्यो बालं शरवणे स्थितम् ।। २२
कृपायुक्ताः समाजग्मुः यत्र स्कन्दः स्थितोऽभवत् ।
करने लगी। भगवान् अग्नि भी इच्छानुसार भ्रमण करने लगे।
अग्नि ने उस तेज यो पाँच हजार वर्षों तक धारण किया था। इसरिए अग्नि के मांस, हड्डी, रुधिर, मेद, आँत, रेतस् , त्वचा, रोम, दादी, मुंछ मेत्र एवं केश आदि सभी मुवर्णमय यन गये । इसी से संसार में अग्नि को हिरण्यरेता कहा जाता है। (९-२०)
तदनन्तर अग्नि तुल्य उस गर्भ यो पाँच हजार वर्षों तक धारण करती हुई फुटिरा मझा के स्थान पर गई । (११)
पद्मजन्मा ब्रह्मा जी ने उस महानदी को सन्तप्त होती देगार पूछा तुम्हारा यह गर्भ सिके द्वारा स्थापित है? (१२)
उसने पहा-हे सत्तम ! अग्नि ने पिये हुए शङ्कर के उस सुक को असमर्थ होने के कारण मुफ में छोड़ दिया। (१३)
हे पितामह ! गर्भ धारण करते हुए पांच सइस वर्ष पासमय बीत गया, किन्तु किसी प्रकार इसरा निर्गमन नही हो रहा है। (१४)
यह सुनकर भगवान प्रदा ने कहा-तुम उदयाचल पर जामोपहा शनयोजन विस्तृत सरपनों का महान् भयंकर वन है। (१५)
हे सुन्दर कटि याली! उस विस्तृत गिरिशिसर पर इसे छोड़ दो ! दश हजार घों के बाद यह यालक हो जायेगा। (१६)
ब्रह्मा की बात सुनने के उपरान्त वह सुन्दरी पर्वतनन्दिनी पर्वत परगई एवं गुरु से ही (उसने) गर्भ का त्याग कर दिया ।(१७)
वह उस बालक को छोड़कर शीम ही ब्रह्मा के निकट गई। राती युटिला मन्त्र (शाप) के कारण जलगयी धन गई। (१८)
शंकर के तेज से यह विशाल सरपतों का पन सुवर्णमय यन गया। वहाँ के निवासी वृक्ष, मृग एवं पक्षी भी सुवर्णमय हो गये।
तदनन्तर दश सहस वर्ष योतने पर पाउ सूर्य के समान सेजरची तया यमल के समान नेत्रोंवाला मालक सत्पन्न हुआ।
दिव्य शरवण में स्थित उत्तानशायी भगवान मुख में अंगूठा डालकर पढ़े मेघ के सदृश रदन करने लगे। (२१)
इसी योच स्वेच्छा से जाती हुई दिव्य तेजस्विनी पही कृत्तिकाओं ने रखा में स्थित उस पालक को देखा । (२२)
ये वृत्तिाएँ दयायुक्त होकर पो गई जहाँ युमार पद थे। उसे दुग्धपान पाने हेतु ये परस्पर 'हम पहले,
अहं पूर्वमहं पूर्व तस्मै स्तन्येऽभिचुक्रुशुः ॥ २३
विवदन्तीः स वा दृष्ट्वा पमुसः समजायत ।
अधीभरंच वाः सर्वाः शिशु स्नेहाच्च कृत्तिकाः ॥ २४
त्रियमाणः स वाभिस्तु पालो वृद्धिमगान्मुने ।
कात्तिकयेवि विख्यातो नातः स पलिनां वरः ।। २५
एतस्मिन्नन्तरे ब्रह्मन् पायकं प्राह पद्मजः ।
कियत्प्रमाणः पुत्रस्ते वर्तते साम्प्रतं गुहः ।। २६
स तद्वचनमाकण्य अजानरतं हरात्मजम् ।
प्रोवाच पुत्रं देवेश न वेनि कतमो गुहः ।। २७
तं प्राह भगवान् यत्तु तेजः पीतं पुरा त्वया ।
प्रेयम्बकं त्रिलोकेश जातः शरवणे शिशुः ॥ २८
श्रुत्वा पितामहयचः पावकस्त्वरितोऽभ्यगात् ।
वैगिनं मेपमारुह्य कुटिला तं ददर्श ह ॥ २९
ततः पप्रच्छ कुटिला शीक जसे कये।
सोऽब्रवीत् त्रदृष्ट्यर्थ जातं शरवणे शिशुम् ॥ ३०
साधवीत् तनयो महं ममेत्याह च पावकः।
विवदन्तौ ददर्शाच स्वेच्छाचारी जनार्दनः।।
तौ पन्नच्छ किमर्थ वा विषादमिह चक्रयः।
ताबृचतुः पुत्रहेतो रुद्रशुकरेद्रवाय हि।।
तायुवाच हरिदेंवो गच्छ तं न्निपुरान्तकम्।
स यद् वक्ष्यति देवेशस्तुस्कुरुध्वमसंशयम्।।
इत्युक्तौ वामुदेवेन कुटिलाग्री हरान्तिकम्।
समम्बेत्योचतुस्तथ्यं कस्य पुन्नेति नारद।।
रुद्रस्तद्वाक्यमाकण्य इपनिर्भरमानसः।
दिव्या दिष्टयेति गिरिजां प्रोद्रुतपुलकोयवीत्।
ततोम्बिका प्राह हरं देव गच्छाम शिशुम्।
प्रष्टुं समाथ्रयेद् यं स तस्य पुन्नो भविष्यति।।
यादमित्येव भगवान् समुत्तस्था च धीसता।।
संप्राप्तास्ते शरवणं हराग्रिक्टिलाम्बिकाः।
हम पहले' कहकर विवाद करने लगी। (२३)
उन्हें परस्पर विराद परती दुई देसकर यह कुमार पण्मुस (छः मुसयाले) यन गये। तदनन्तर उन वृत्तिाओं ने स्नेह पूर्शक शिशु या पोपण दिया। (२४)
हे मुने! उनके द्वारा पालिन होपर यह यालक पड़ा हुआ। यह पलयानों में रेष्ठ कार्तिकेय नाम से (२५)
हे ग्रझन् ! इसी बीच ब्रह्मा ने अग्नि से पूछा-तुम्हारा पुत्र गुह इस समय कितना पड़ा हुआ है। (२६)
प्रदा की यात सुनसरशर के उस पुर यो न जानने के कारण अग्नि ने पहा-हे देवेश ! मैं पुत्र को नहीं जानता गुह कौन हैं? (२७)
भगवान ने उनसे कहा- त्रिलोकेश। पूर्यकाल में तुम्हारे द्वारा पान किया गया शंकर का सेज शरयग में शिशुरूप से उत्पन्न हुआ है।
पितामह का पचन सुनने के उपरान्त अग्निदेव वेगवान् यहरे पर आरूद होकर चोम (वहाँ) गए। कुटिला ने उन्हें खाने दसा। (२९)
सदनन्तर पुटिला ने पूछा- अग्निदेय! आप कहाँ जा रहे है। उन्होंने पदा-दारपग में उत्पन्न पुत्र शिशु को देखने जा रहा हूँ। (३०)
उसने कहा कि पुन्न मेरा है एवं अग्नि ने कहा कि मेरा है। स्वेच्छा से घूम रहे जनार्दन ने उन दोनों को विवाद करते हुए देखा।
उन्होने उन दोनो से पूछा-तुम दोनो क्यो विवाद कर रहे हो उन दोनों ने कहा- रुद्र के शुक्र से उत्तपन्न पुन्न के लिये।
विष्णु ने उन दोनो से कहा- तुम लोग न्निपुरान्तक के समीप जाओ। वे देवेश जो कहे उसे निसन्देह करो।
हे नारद वासुदेव के ऐसा कहने पर कुटिठा एवं अग्रि शहद के निम्ब गए एवं उनसे यह तथ्य पूछा कि पुन्न किसका है
उनके वचन को सुनकर शङ्कर का मन आनन्द से परिपूर्ण हो गया। उन्होंने पुलग्नि होकर गिरजा से कहा- भाग्य की बात है, भाग्य की बात है।
तदन्नतर अम्बिका से शङ्कर से कहा- हे देव हम लोग उस बालक से पूछने चले। यह जिसका आश्रय मह्ण करेगा उसी का पुन्न होगा।
ठीक हे ऐसा कहने हुए बृषध्वज भगवान् शङ्कर पार्वती कुटिठा तथा बुद्धिमान पावक के साथ चल खड़े हुए।
शङ्कर पार्वती, बुटिला एवं पावक शरबग मे गये।
ददृशुः शिशुकं से च कृत्तिकोत्सङ्गशायिनम् ।। ३८
ततः स चालकस्तेषां मत्वा चिन्तितमादरात् ।
योगी चतुर्मूविरभूत् पण्मुखः स शिशुस्त्वपि ।। ३९
कुमारः शंकरमगाद् विशाखो गौरिमागमत् ।
कुटिलामगमच्छासो महासेनोऽग्निमभ्ययात् ॥ ४०
ततः प्रीतियुतो रुद्र उमा च कुटिला तथा ।
पावकश्चापि देवेशः परां मुदमवाप च ॥ ४१
वतोऽघुवन् कृत्तिकास्ताः पण्मुसः किं हरात्मजः ।
वा अब्रवीद्धः प्रीत्या विधिवद् वचनं मुने ॥ ४२
नाम्ना तु कार्तिकेयो हि युष्माकं तनयस्त्वसौ।
कुटिलायाः कुमारेति पुनोऽयं भविताऽव्ययः ।। ४३
स्कन्द इत्येव विख्यातो गौरीपुत्रो भवत्वसौ
गुह इत्येव नाम्ना च ममासौ तनयः स्मृतः ॥ ४४
महासेन इति स्यातो हुताशस्यास्तु पुत्रकः ।
शारदत इति ख्यातः सुतः शरवणस्य च ॥ ४५
एवमेप महायोगी पृथिव्यां ख्याविमेष्यति ।
पडास्यत्वान् महावाहुः पण्मुखो नाम गीयते ॥ ४६
इत्येवमुक्त्वा भगवान् शूलपाणिः पितामहम् ।
सस्मार दैवतैः साई तेऽप्याजम्मुस्त्यरान्विताः ॥ ४७
प्रणिपत्य च कामारिमुमां च गिरिनन्दिनीम् ।
दृष्ट्वा हुताशनं प्रीत्या कुटिलां कृत्तिकास्तथा ॥ ४८
ददृशुर्वालमत्युग्रं पण्मुसं सूर्यसंनिभम् ।
मुष्णन्तमिव चक्षूपि तेजसा स्वेन देवताः ॥ ४९
कौतुकाभियवाः सर्वे एवमूचुः सुरोत्तमाः ।
देवकार्य त्वया देव कृतं देव्याऽग्निना तथा ॥५०
तदुनिष्ठ व्रजामोऽध तीर्थमौजसमव्ययम् ।
कुरुक्षेत्रे सरस्वत्यामभिपिश्चाम पण्मुसम् ॥ ५१
सेनायाः पतिरस्त्येप देवगन्धर्वकिनराः ।
महिपं घातयत्वेप तारकं च सुदारुणम् ।। ५२
बादमित्यत्रवीर्चः समुत्तस्थुः सुरास्ततः ।
इन लोगों ने वृत्तिया की गोद में लेटे हुए उस शिशु यो देखा। (३८)
तदनन्तर वह पण्मुस बालक आदरपूर्वक उनके विचार को समझ कर शिशु होते हुए भी योगी सदृश चार मूर्तियों का हो गया। (३९)
घुमार शङ्कर के समीप, विशास गिरजा के निम्ट, शास पुटिला के पास एवं महासेन अग्नि के समीप (४०)
पदनन्तर प्रीतियुक्त रद्र, उमा, कुटिला तथा देवेश्वर अग्नि ये चारों अत्यन्त आनन्दित हुए। (४१)
तदुपरान्त उन पृत्तिाओं ने पूछा-क्या पहानन शङ्कर फे पुन हे ? हे मुने । शङ्कर ने उन सभी से प्रीति- पूर्वक विधिषद् घचन पदा- (४२)
हे कृत्तिाओ। कार्तिकेय नाम से ये तुम्हारे पुन दोगे तया ये अपिनाशी कुमार नाम से पुटिया के पुत्र होंगे।
ये दी रहन्द नाम से विख्यात गौरी के पुत्र होंगे क्या गुह नाम से मेरे पुत्र होंगे। (४४)
महासेन नाम से ये अग्नि के विख्यात पुत्र होंगे तथा शारदूत इस नाम से विख्यात ये शरबग के पुत्र होंगे। (४५)
इस प्रकार ये महायोगी पृथ्वी मे विख्यात होंगे। छ मुस होने से महायाहु ये पण्मुस नाम से प्रसिद्ध होंगे। (४६)
इस प्रकार कह र शूलपाणि शङ्कर ने देवताओं सहित पितामह ब्रह्मा का स्मरण किया । वे सभी शीघ्रता से वहाँ आ गए। (४७)
कामारि शङ्कर और गिरिनन्दिनी पार्वती को प्रणाम पर तथा हुताशन, पुटिला तथा वृत्तिकाओं को प्रीतिपूर्वक देसकर उन देवों ने-अतिशय उप्र, सूर्य के समान एवं अपने तेज से सभी के नेत्रों को चुराने वाले उस पण्मुस यालक को देखा। (४८-४९)
यौतुरान्वित उन श्रेष्ठ देयों ने कहा-हे देय ! आपने, देवी ने एवं अग्नि ने देवताओं का कार्य पर दिया। (५०)
अत आप उठे। अब हम लोग अविनाशी औजस तीर्थ को चले। पुरुक्षेत्र में चल कर सरस्वती में हम लोग इस पण्मुस यो अभिपिधित करें। (५१)
हे देयो, गन्धयों और किन्नरो! ये हमारे सेनापति पनें और महिप तथा मयंकर नारक पाप करें। (१२)
शङ्कर ने कहा-बहुत अच्छा । तदनन्तर सभी देवता उठे और धुमार के सहित महाफलदायी कुरुक्षेत्र में
हमारगरिया जन्मः गुरुक्षेत्रं महाफलम् ।। ५३
वर देयताः मैद्रास प्रमजनार्दनाः ।
यत्नमम्याभिषेकार्य पनिगणः मह ।। ५४
ततोऽयुना ममममुद्रयादिनी-
नदीजनेनापि महाफलेन ।
वरीपधीमिय महामूनिमि-
म्तदाम्यपिचन गुहम पुठायाः ।। ५५
अमिपियति गनान्यां मारे दिव्यरूपिणि ।
जगुर्गन्धर्षपतयो ननृतथाप्यरोगमाः ।। ५६
अभिपिक्वं इमारं न गिरिश्री निरीय हि ।
ग्नंहादुरमागं मन्दं मन्य जिवन्माईमः ।। ५७
जिप्रती पानियम्य अभिपैराठ माननम् ।
मारयट्रिना यधन्दम्य देयमाताऽदितिः पुरा ॥ ५८
सदाऽमिपिस्तं तनयं रष्ट्या या मुदं ययी
पारस: गिरामेष दृष्टिला व यामिनी ॥ ५९
ततोऽमिपित्तस्य हरः सेनापत्ये गुहम्य तु ।
प्रमयांधतुरः प्रादानुल्यपराधमान् ।। ६०
घण्टारर्ण लोहिताक्ष नन्दिमनं पदारणम् ।
चतुर्थ पलिना मुग्यं ग्यातं युप्रदमानिनम् ॥ ६१
हरदत्नान् गणान् रष्ट्या देयाः मन्दम्य नारद ।
प्रदः प्रमथान मान् मान् म प्रामपुरोगमाः ॥ ६२
स्थाणुं मना गणं प्रासाद् विष्णु. प्रादार गपश्यम् ।
संक्रमं विक्रम पर तृतीयं च परापमम् ।। ६३
उसं पो रष्टिकापिलानी ।
चन्द्रो मणि यमुमपिमधिनी यत्मनन्दिनी ।।६४
ज्योतिनाशनः प्रादाग्यलजिदं वयापरम् ।
पुसा युगमं श्रीन धावागुगरान् ददा ।। ६५
पकानुनको रसष्टा र धातिभिरगुम्धिरी !
पाणिस्य पालरा प्रादान पा महायली ॥ ६६
सपमा घनाई ग हिमपान् प्रमशीनमी।
प्रादादेयोच्छितो विन्ध्यस्त्वतिशृङ्ग च पार्पदम् ॥ ६७
सुवर्चसं च वरुणः प्रददौ चाविवर्चसम् ।
संग्रहं विग्रहं चाब्धिर्नागा जयमहाजयौ ॥ ६८
उन्मादं शङ्खकर्ण च पुष्पदन्तं तथाऽम्बिका।
घसं चातिघसं वायुः प्रादादनुचरायुभौ ॥ ६९
परिघं चटकं भीमं दहतिदहनौ तथा ।
प्रददायशुमान् पञ्च प्रमथान पण्मुखाय हि ॥ ७०
यम. प्रमाथान्मार्थ कालसेनं महामुखम् ।
तालपत्रं नाडिजई पडेवानुचरान् ददौ ।। ७१
सुप्रभं च सुकर्माणं ददौ धाता गणेश्वरी।
सुव्रतं सत्यसन्धं च मित्रः प्रादाद् द्विजोत्तम ॥ ७२
अनन्तः शङ्खपीठश्च निकुम्भः कुमुदोऽम्युजः ।
एकाक्षः कुनटी चक्षुः किरीटी कलशोदरः ।। ७३
सूचीवक्त्रः कोकनदः प्रहासः प्रियकोऽच्युतः ।
गणाः पञ्चदशैते हि यर्दित्ता गुहस्य तु ।। ७४
कालिन्याः कालकन्दश्च नर्मदाया रणोत्कटः ।
गोदावर्याः सिद्धयात्रस्तमसायाद्रिकम्पकः ॥ ७५
सहस्रबाहु. सीताया पञ्जुलायाः सितोदरः।
मन्दाकिन्यास्तथा नन्दो विपाशायाः प्रियंकरः ॥ ७६
ऐरावत्याश्चतुर्दष्ट्रः पोडशाक्षो वितस्तया ।
मार्जार कौशिकी प्रादात् ऋथक्रौञ्चौ च गौतमी ॥ ७७
वाहुदा शतशीष च वाहा गोनन्दनन्दिको ।
भीमं भीमरथी प्रादाद् वेगारिं सरगर्ददौ ।। ७८
अष्टयाहुं ददौ काशी सुबाहुमपि गण्डकी ।
महानदी चित्रदेवं चित्रा चित्ररथं ददौ ।। ७९
कुहू कुवलयं प्रादान्मधुरर्ण मधूदकर ।
जम्युकं धूतपापा च वेणा श्वेताननं ददौ ।। ८०
श्रुतवर्ण च पासा रेवा सागरचेगिनम् ।
प्रभावार्थ सहं प्रादात् काञ्चना कनकेक्षणम् ॥ ८१
गृध्रपत्रं च विमला चारुवक्त्रं मनोहरा।
तथा ऊँचे विन्ध्याचल ने अतिशत नामक पार्षद को दिया।
वरुण ने सुवर्चा एवं अतिवचा को, समुद्र ने संगह तथा विग्रह पो एवं नागों ने जय तथा महाजय को दिया। (६८)
अम्बिका ने उन्माद, शकुर्ण और पुष्पदन्त को तथा पवन ने घस और अतिघस नामक दो अनुचरों को दिया। (६६)
अंशुमान् ने पण्मुस यो परिघ, घटक, भीम, दहति तथा दहन नामक पाँच प्रमों को दिया। (७०)
यमराज ने प्रमाथ, उन्माध फालसेन, महामुस, तालपत्र ने और नाडिजह नामक छः अनुचरों को दिया। (७१)
है द्विजोत्तम ! धाता ने सुप्रभ और सुषमा नामक गणेपरों को, तथा मित्र ने मुव्रत तथा सत्यसन्ध नामक अनुचरों को दिया। (७२)
पक्षों ने अनन्त, शापीठ, निकुम्भ, कुमुद, अम्युज, एकाक्ष, पुनटी, पा, पिरीटी, क्रशोद, मचीवक्त्र, फोकनद, महास, प्रिया एवं अच्युन-इन पन्द्रह गणों को कार्तिकेय के लिये दिया। (७३-७४)
कारिन्दी ने पालान्द को, नर्मदा ने रणोत्स्ट को, गोदावरी ने सिद्धयान को एवं तमसा ने अद्रिकम्पक को दिया। (७१)
सीता ने सहस्राबाहु को, यक्षुला ने सितोदर को मन्दाकिनी ने नन्द को एवं विपाशा ने प्रियंकर को दिया।
ऐरावती ने चतुर्दष्ट्र को,वितस्ताने पोडशाक्ष को, कौशिकी ने मार्जार को एवं गोमती ने मथ और फ्रीश्च को दिया। (७७)
पाहुदा ने शतशोर्प को, याहा ने गोनन्द और नन्दिक को, भीमरथी ने भीम को, और सरयू ने घेगारि को दिया। (७८)
काशी ने अष्टपाहु को, गण्डकी ने सुबाहु को, महानदी, ने चित्रदेव को तथा चित्रा ने चितरथ को दिया। (७९)
युहू ने फुयलय को, मधूदका ने मधुवर्ण को, धूतपापा ने जम्यूफ को और वेणा ने श्वेतानन को समर्पित (८०)
पर्णासा ने ग्रुतपर्ण को, रेया ने सागरवेगी यो, प्रभाया ने अर्थ और सह को एवं फानना ने कनफेक्षण को दिया। (८१)
विमला ने गृधपत्र को, मनोहरा ने पास्यकत्र को, धूत.
धूतपापा महारायं कर्णा विट्ठमसंनिभम् ।। ८२
मुप्रसाद सुवेणुश्व जिष्णुमोघवती ददौ ।
यज्ञराहुं विशाला च सरस्वत्यो ददुर्गणान् ।। ८३
कुटिला वनयस्यादाद् दश शश्वलान् गणान् ।
करालं सितमेशं च कृष्णफेशं जटाधरम् ।। ८४
मेपनादं चतुर्दष्ट्र विद्युजिहं दशाननम् ।
सोमाप्यायनमेवोयं देवयाजिनमेव च ॥ ८५
हंसास्यं कुण्डजठरं बहुग्रीवं हयाननम् ।
कूर्मग्रीयं च पश्चैतान् ददुः पुत्राय कृत्तिकाः ।। ८६
स्थाणुबधं कुम्भवक्त्रं लोहजथं महाननम् ।
पिण्डाकारं च पश्चैतान् ददुः स्कन्दाय चर्पयः ।। ८७
नागजिहं चन्द्रमासं पाणिर्म शशीक्षकम् ।
चापवक्त्रं च जम्यूकं ददौ तीर्थः पृथूदकः ॥ ८८
चक्रतीर्थ सुचक्राक्षं मकराक्षं गयाशिरः ।
गणं पञ्चशिसं नाम ददी कनसलः स्वकम् ।। ८९
बन्युदत्वं वाजिशिरो पादुशालं च एफरम् ।
सौंजमं माहिपकं मानम. पिङ्गलं यथा ॥ ९०
दमोशनसः नादात् ततोऽन्ये मातरो ददुः ।
वसुदामा सोमतीर्थः प्रभासो नन्दिनीमपि ॥ ९१
इन्द्रतीर्थ विशोकां च उदपानो घनस्वनाम् ।
समसारस्वतः प्रादान्मावरचतुरोद्भुताः ॥ ९२
गीतप्रियां माधवीं च तीर्थनेमि स्मिताननाम् ।
एकचूडां नागतीर्थः कुरुक्षेत्रं पलामदाम् ।। ९३
ब्रह्मयोनिश्चण्डशिला भद्रकाली त्रिविष्टपः ।
चौण्डी भैण्डी योगभैण्डी प्रादाचरणपावनः ॥ ९४
सोपानीयां मही मादाच्छालिकां मानसो ह्रदः ।
शतघण्टा शवानन्दां वथोल्सलमेसलाम् ।। ९५
एमावती माधवी च ददी बदरिकाश्रमः ।
सुपमामेकचूडां च देवीं धमवमा तया ।। ९६
उत्क्राथनी वेदमित्रां वेदारो मातरो ददौ ।
पापा ने महारार को एधं कर्गा ने विद्रुमसग्निभ को दिया। (८२)
सुवेणु ने मुप्रसाद को, एवं ओघवनी ने जिष्णु को दिया। विशाला ने यज्ञयाहु को दिया। इस प्रकार इन नदियों ने अनेक गणों को दिया। (या सरस्पती नदियों ने अनेक गणों को दिया)(८३)
युटिला ने अपने पुत्र को कराल, सितफेश, फष्यकेश, जटाधर, मेघनाद, चतुर्दष्ट्र, विद्युजित, दशानन, सोमाप्यायन पर्व उप्र देवयाजी नामक दशगों को दिया । (८५-८५)
कृतिशओं ने अपने प्रश्न को इंसारय, कुण्डजठर, पहु-पीय, हयानन तया पूर्मप्रीय इन पाँच अनुचरों को प्रदान (८६)
पियों ने स्कन्द को स्थाणुज, पुम्भयरत्र, लोहजह, महानन और पिण्डागार इन पोप अनुपरों को दिया ।(८७)
पृथूदा तीर्थ ने नागजिद, चन्द्रभास, पाणिर्म, शशीक्षक, पापा सथा जापूक नामक अनुचरों को दिया।
पनी ने मुपमा तपागपाशिर ने मपए को और कनगाउने पशिस नाम: अपने गए दिया।
वाजिशिर ने यन्धुदत्त और पुष्कर ने याहुशाल को सया मानस ने सजिस, माहिपक और पिसल यो (९०)
औशनस ने रद्र को दिया, तथा अन्यों ने मातृकाओं को दिया । सोमतीर्थ ने यसुदामा यो और प्रभास ने नन्दिनी को और इन्द्र तीर्थ ने विशोमा को अर्पित किया। उदपान ने पनरयना को प्र्य सप्तसारस्वत ने गीतप्रिया, माधषी, तीनेमि एयं स्मिवानना नामक पार अद्भुत माताओं को प्रदान किया। नागतीर्थ ने एकदा को एवं कुरक्षेत्र ने पलामदा को दिया। (९१-९३)
यनयोनि ने पण्डशिरा को, त्रियिष्टिप ने भद्रकाली यो तथा चरणपायन ने पौटी, भैढी तथा योगर्भटी को दिया। (९४)
मदी ने सोपानीया यो, मानसाद ने शालिन को एवं पदरिकाम्म ने तानन्दा, शतपण्टा, सूपरमेस्वारा, पद्मासी और माधरी को दिया। पेदार तीर्थ में मुषमा, एकदा, धमधमा देयी, उत्सायनी तया पेदमिया नाम माताओं को दिया। मदमदाटय ने मुनक्षत्रा, कन्या, मुप्रभाता, मुमङ्गटा, देय मित्रा और पत्रसेना को दिया। प्रय इंटरा उध्ययेनी, श्रीमती,
सुनक्षत्रां कलां च सुप्रभातां सुमङ्गलाम् ॥ ९७
देवमित्रां चित्रसेनां ददौ रुद्रमहालयः ।
कोटराम प्रवेणी च श्रीमती बहुपुत्रिकाम् ॥ ९८
पलितां कमलाक्षी च प्रयागो मातरो ददौ ।
सूपलां मधुकुम्भा च ख्याति दहदहां पराम् ॥ ९९
प्रादा सटकटां चान्यां सर्वपापविमोचनः ।
संवानिको विकलिकां क्रमश्चत्वरवासिनीम् ॥ १००
जलेश्वरी कुक्कुटिकां सुदामां लोहमेसलाम् ।
वपुग्मत्युल्मुकाक्षी च कोकनामा महाशनी ।
रौद्रा कर्कटिका तुण्डा श्वेततीर्थो ददौ स्विमाः ॥ १०१
एतानि भूतानि गणांथ मावरो
दृष्ट्वा महात्मा विनतावनूजः ।
ददौ मयूरं स्वसुतं महाजवं
तथाऽरुणस्ताम्रचूडं च पुत्रम् ॥ १०२
शक्ति हुताशोऽद्रिसुवा च वस्त्रं
दण्डं गुरु सा कुटिला कमण्डलुम् ।
मालां हरिः शूलधरः पताकां
कण्ठे च हारं मघवानुरस्तः ॥ १०३
गणै तो मातृभिरन्ययावो
मयूरसंस्थो वरशक्तिपाणिः।
सैन्याधिपत्ये स वृतो भवेन
रराज सूर्येव महायपुष्मान् ॥ १०४
इति श्रीवामनपुराणे एकनिशोऽध्याय ॥३१॥
यहुपुत्रिया, पलिता तथा क्मलाक्षी नामक मातृकाओं को अपित किया। सर्वपापविमोचन ने सूपला, मधुकुम्भा, ख्याति, दहदहा, परा और खटकटा को दिया। क्रम ने सन्तानिरा, विरलिया और चत्वरवासिनी को प्रदान (९५-१००)
श्वेततीर्थ ने जलेश्वरी, पुक्युटिका, सुदामा, रोहमेखला, यपुप्मती, सल्मुकाक्षी, चोकनामा महाशनी रौद्रा, कटिका और तुण्डा नामक अनुचरियों को दिया । (१०१)
इन भूतों, गणों और मातृकाओं को देखकर विनतापुर गरुड ने अपने पुत्र महावेगशाली मयूर को समपित किया और अरुण ने अपने पुत्र ताम्रचूड को दियो । (१०२)
अग्नि ने शक्ति, पार्वती ने वरन, वृहस्पति ने दण्ड, उस दुटिला ने कमण्डलु, विष्णु ने माला, शेर ने पताका तथा इन्द्र ने अपने पक्ष स्थल का हार कार्तिकेय के रण्ठ मे अर्पित किया। (१०३)
गणों से युक्त, मातृकाओं से अनुसरित, मयूर पर बैठे एवं श्रेष्ठ शक्ति यो हाथ में लिये हुए महाशरीरधारी कुमार कार्तिकेय शंकर के द्वारा सेनाधिपत्ति के पद पर अभिपिक्त होकर सूर्य के समान प्रकाशित होने लगे। (१०४)
श्रीवामनपुराण में इक्तीसवाँ अध्याय समाप्त १॥