वामन महा पुराण
प्रह्लाद-तीर्थयात्रा प्रसग में धुन्धु एव त्रिविकम का आख्यान एव मह्रदादि लोको का वर्णन, धुन्धु का यज्ञोपक्रम एव यज्ञ क्षय के लिए वामनोपात्ति, धुन्धु के यज्ञसदस्यों से अपने वृत्तान्त का कथन, धुन्धु की वामन के लिए धनादि दान करने की इच्छा वामन का विधिकम रुप, धुन्धु-वध
नारद उवाच ।
कानि तीर्थानि विप्रेन्द्र प्रहादोऽनुजगाम ह ।
प्रहादतीर्थयात्रां मे सम्यगारन्यातुमर्हसि ॥ १
पुलस्त्य उवाच।
शृणुष्य कथयिष्यामि पापपङ्कमणाशिनीम् ।
प्राहादतीर्थयात्रा ते शुद्धपुण्यप्रदायिनीम् ॥२
संत्यज्य मेरुं कनकाचलेन्द्र
तीर्थ जगामामरसंघजुष्टम् ।
स्यातं पृथिव्यां शुभदं हि मानस
यत्र स्थितो मत्स्यवपुः सुरेशः ।। ३
तस्मिस्तीर्घवरे स्नात्या संवर्ण्य पितृदेवताः ।
संपूज्य च जगन्नाथमच्युत श्रुतिभिर्युतम् ।। ४
उपोप्य भूयः संपूज्य टेयपिपिठमानवान् ।
जगाम कच्छप द्रष्टुं कौशिक्यां पापनाशनम् ।।
वस्यां स्नात्वा महानद्यां सपूज्य च जगत्पतिम् ।
समुपोष्य शुचिर्भूत्या दत्त्वा विप्रेषु दक्षिणाम् ॥ ६
नमस्कृत्य जगन्नाथमयो कूर्मवपुर्धरम् ।
ततो जगाम कृष्णाख्यं द्रष्टुं याजिमुखं प्रभुम् ।
तत्र देवहदै स्नात्या वर्पयित्वा पितृन् सुरान् ॥ ७
संपूज्य हयशीपं च जगाम गजसाद्वयम् ।
तत्र देवं जगन्नाथं गोविन्दं चक्रपाणिनम् ॥ ८
स्नात्वा संपूज्य विधियत् जगाम यमुना नदीम् ।
तस्यां स्नातः शुचिर्भूत्या संतीपिंसुरान् पितॄन् ।
ददर्श देवदेवेशं लोकनाथं त्रिविक्रमम् ॥ ९
नारद उवाच ।
साम्प्रतं भगवान् विष्णुस्त्रैलोक्याक्रमणं वपुः ।
करिष्यति जगत्मामी यलेन्धनमीश्वरः ॥ १०
तत्कथं पूर्वकालेऽपि विश्वरासीत् त्रिविक्रमः ।
कम्य या बन्धनं विष्णुः कवनांस्वच मे वद ॥ ११
नारद ने कहा-हे विप्रेन्द्र । प्रहलाद किन तीर्थों में गये। आप मुझसे प्रहलाद की तीर्थयात्रा या भली प्रकार वर्णन परें। (१)
पुलस्त्य ने कहा- सुनो, मैं तुमसे पापरूपी पा को नष्ट परने वाली एवं शुद्ध पुण्य को प्रदान करने याली प्रहलाद की तीर्थयात्रा का वर्णन करता हूँ। (२)
श्रेष्ट सुवर्णमय मेरु पर्वत यो छोड़कर वे देयों से सेवित पृथ्वी में प्रसिद्ध फल्याणप्रद मानसतीध में गये जहाँ मत्स्यशरीरधारी सुरेश निरास परते हैं। (३)
उस श्रेष्टतीर्थ में स्नान यं पितरों तथा देयों का सर्पण कर उन्होंने श्रुतियों से समन्वित अच्युत जगन्नाथ का पूजन किया।
और पुन यहाँ उपयास पूर्पक देयों, ऋपियों पितरों एवं मानों की पूजा पर कोशिकी में (अस्थित) पापनाशक कच्छप का दर्शन करने गये।
उस महानदी में स्नानकर इन्होंने जगत्पति जनादेन की पूजा की एष उपास करके पवित्र होकर ब्राह्मणों को दक्षिणा दिया। (६)
तदनन्तर धर्मशरीरधारी जगन्नाय को नमस्कार कर ये पहों से कृष्ण नाम ये अश्वमुस प्रभु का दर्शन करने गये । यहाँ देवहद में स्नान कर उन्होंने देवों पयं पितरों का दर्पण किया तथा हयग्रीष या पूजनर वे हस्तिनापुर गये । यहाँ स्नान पर चक्रपाणि जगन्नाथ गोविन्द देय की विधिपूर्वक पूजा करने के बाद वे यमुना नदी के समीप गए । इसमे स्नान कर पवित्र होकर उन्होंने पियों, पिवरों एय देयों का वर्पण या ए देवदेवेश लोकनाय निविक्रम वा दर्शन दिया। (८-९)
नारद ने पूछा-मम्प्रति जगत्पति भगवान् विष्णु प्रैलोक्य को आमान्त परने पारा शरीर धारण करेंगे तथा बलि को पागे। तो पिर भगरान् विष्णु फैसे पूर्व समय में नियिकम हुए थे और ( रस समय ) उन्होंने किसका बन्धन पिया था? यह बात मुंभ (१०-११)
पुलस्त्य उवाच।
श्रूयतां कथयिष्यामि योऽयं प्रोक्तस्त्रिविक्रमः ।
यस्मिन् काले संबभूव यं च वञ्चिवमानसौ ॥ १२
आसीद् धुन्धुरिति स्न्यातः कश्यपम्यौरसः सुतः ।
दनुगर्भसमुद्भूतो महायलपराक्रमः ॥ १३
स समाराध्य वरदं ब्रह्माणं तपसा सुरः।
अध्यत्वं सुरैः सेन्द्रः प्रार्थयत् स तु नारद ॥ १४
तद् वरं तस्य च प्रादात् तपसा पङ्कजोद्भवः ।
परितुष्टः स च बली निर्जगाम त्रिपिष्टपम् ॥ १५
चतुर्थस्य कलेरादौ जित्वा देवान् सवासवान् ।
धुन्धुः शक्रत्वमफरोद्धिरण्यकशिपो सति ।। १६
तस्मिन् काले स बलवान् हिरण्यकशिपुस्ततः ।
चचार मन्दरगिरी दैत्यं धुन्युं समाश्रितः॥ १७
सतोऽसुरा यथा काम विहरन्ति त्रिविष्टपे ।
ब्रह्मलोके च त्रिदशाः संस्थिता दुःससंयुताः ॥ १८
तवोऽमरान् ब्रह्मसदो निवासिनः
श्रुत्वाऽथ धुन्धुर्दिविजानुयाच ।
घ्रजाम दैत्या वयमग्रजस्य
सदो विजेतुं त्रिदशान् सशकान् ॥ १९
ते धुन्धुवाक्य तु निशम्य दैत्याः
प्रोचुर्न नो विद्यति लोकपाल ।
गतिर्यया याम पितामहाजिरं
सुदुर्गमोऽयं परतो हि मार्गः ॥२०
इत. सहसैहुयोजनारयै-
लोको महर्नाम महर्पिजुष्टः ।
येषां हि दृष्टयाऽर्पणचोदितेन
दह्यन्ति दैत्याः सहसेक्षितेन ॥ २१
ततोऽपरो योजनकोटिना वै
लोको जनो नाम वसन्ति यत्र ।
गोमातरोऽस्मासु विनाशकारि
यासां रजोऽपीह महासुरेन्द्र ।। २२
ततोऽपरो योजनकोटिभिस्तु
पभिस्तपो नाम तपस्विजुष्टः ।
विष्ठन्ति यत्रासुर साध्यवर्या
येषां हि निश्वासमस्त् त्वसद्यः ।। २३
ततोऽपरो योजनकोटिभिस्तु
पुलस्त्य ने कहा--सुनो, में पतलाना हूँ कि वे नियिम कौन हैं, किस समय हुए एव उन्होंने किसकी वञ्चना की।(१२)
कश्यप का दनु के गर्भ से उत्पन्न धुन्धु नाम से प्रसिद्ध अत्यन्त बलवान् एव पराक्रमी एक औरस पुत्र था। (१३)
हे नारद ! उस असुर ने तपस्या के द्वारा वरदाता ब्रह्मा की आराधना करके उनसे इन्द्र आदि देवताओं से अवध्य होने की प्रार्थना की। (१४)
(उसके) तप से प्रसन्न होकर कमलयोनि ब्रह्मा ने उसे वह वर दे दिया। तदनन्तर वह बलवान् धुन्धु स्वर्ग मे गया। (१५)
चतुर्थ कलि के आदि मे हिरण्यकशिपु के वर्तमान रहते समय धुन्धु ने इन्द्र सहित देवों को जीतकर इन्द्र (१६)
उस समय धुन्धु का आश्रित होपर बलवान दैत्य हिरण्यकशिपु मन्दर पर्वत पर विचरण करता था। असुर लोग भी इच्छानुसार स्वर्ग में पिहार करने लगे।। सभी देवता दुखी होकर ब्रह्मलोक में रहने लगे। (१८)
तब देवताओं का ब्रह्मलोक मे रहना सुनकर धुन्धु ने दैत्यों से कहा-हे दैत्यो । इन्द्र सहित देवों को जीतने के लिये हमलोग ब्रह्मलोक चलें। (१९)
धुन्धु का वचन सुनकर उन दैत्यों ने कहा-हेलोक्पाल | हम रोगों में वह गति नहीं है जिससे पितामह के लोक मे जा सकें। (वहाँ का मार्ग अत्यन्त दुर्गम एव दूर है। (२०)
यहाँ से सहस्रों योजन दूर महषियों के द्वारा सेवित 'मह नामक लोक है। उन ऋषियों की सहसा दृष्टि पडते ही समस्त दैत्य जल जाते है। (२१)
उससे भी आगे कोटि योजन दूर 'जन नामक एक लोक है जहाँ गोमातायें रहती है। हे महासुरेन्द्र । उनकी धूलि भी हमलोगों का विनाशक है। (२२)
तदनन्तर छ कोटि योजन की दूरी पर तपरिवयों से सेवित 'तप' लोक है। हे असुर । वहाँ श्रेष्ठ एव साध्यगण निवास करते हैं । उनका नि श्वास पवन असह्य है। (२३)
तदुपरान्त तीस कोटि योजन की दूरी पर सहस
विंशदिरादित्यसहस्रदीमित
मत्याभिधानो भगवन्निवामो
वरप्रदोऽमृद् भवतो हि योऽसौ ॥ २४
यस्य वेदध्वनि श्रुत्वा निकमन्ति सुरादयः ।
संकोचमसुरा यान्ति ये च तेषां गधर्मिणः॥ २५
तस्मान्मा त्वं महाबाहो मतिमेतां ममादधः ।
वैराजमुवनं धुन्धो दुरारोहं सदा नृभिः ॥ २६
तेषां वचनमाकर्ण्य धुन्धुः प्रोवाच दानवान् ।
गन्तुकामः रा मदनं ब्रह्मणो जेतुमीश्वरान् ॥२७
कथं तु कर्मणा केन गम्यते दानवर्षमाः ।
कथं तत्र सहस्राक्षः संप्रामः सह देवतैः ॥२८
ते धुन्धुना दानपेन्द्राः पृष्टाः पोचुर्वचोऽधिपम् ।
फर्म तन वयं विद्यः शुमन्तद् त्यसंशयम् ॥ २९
दैत्यानां वचनं श्रुत्या पुन्धुर्दैत्यपुरोहितम् ।
पप्रच्छ शुक्र किंकर्म कृत्वा ब्रह्मसदोगतिः॥३०
ततोऽयी कययामास दैत्याचार्यः कलिनिय ।।
शत्रस्य चरितं श्रीमान् पुरा वृत्ररिपोः किल ||३१
शक्रः शतं तु पुण्यानां क्रतूनामजयत् पुरा ।
दैत्येन्द्र यातिमेधानां तेन प्रम मदो गतः ।। ३२ ।।
तद्वाक्यं दानवपतिः श्रुत्वा शुक्रस्य पीर्यवान् ।
यष्टं तुरगमेधानां चकार मतिमुत्तमाम् । “ ।
अथामच्यासुरगुरुं दानवांश्चाप्यनुत्तमान् ।। ३३ ।
प्रोवाच यक्ष्येऽहं यज्ञैरवमेधैः सदक्षिणैः ।
तदागच्छन्नमवनीं गच्छामो बसुधाधिपान् ॥ ३४
विजित्य हयमेधान् पै यथासामगुणान्वितान् ।
आहूयन्तां च निधयस्त्वाशाप्यन्तां च गुह्यकाः ॥ ३५.
आमन्त्र्यन्तां च ऋषयः प्रयामो देविकाटवस्त
सा हि पुण्या सरिच्छेष्ठा सर्वसिद्धिकरी-शुभा ।
स्थानं प्राचीनमा साथ वाजिमेधान् यजामहे ॥३६
इत्यं सुरारेर्वचनं निशम्यासरयाजकः।।
आदित्यों के समान दीप्त 'सत्य' नामक लोक है। यह लोक उन्हीं भगवान् या निवास स्थान है जिन्होंने आपको वर प्रदान किया था। (२१)
उनकी चेदध्वनि सुनकर देवता आदि विकसित होते हैं और भसुर तथा उनके समानधर्म वाले संकुचित (२५)
अत..हे महाबाहु धुन्धु! आप ऐसा विचार न करें। क्योंकि मनुष्यों के लिये ब्रह्मलोक सदेव दुरारोह है। (२६)
उनकी बात सुनकर देवों को जीतने के लिए ब्रह्मलोक पो जाने की इच्छा वाले धुन्धु ने दानवों से कहा-२७)
हे दानवथेष्टो! यहाँ कैसे और किस कर्म से जाया जाता है ? देवों के साथ इन्द्र वहाँ कैसे पहुँचे ? (२८)
स्वामी धुन्धु फे पूछने पर न घेष्ठ दानवों ने कहा- हमलोग उस कर्म को नहीं जानते । शुक्राचार्य निस्सन्देह उसको जानते हैं। (२६)
'दैत्यों की यात सुनकर धुन्धु ने दैत्यों के पुरोहित शुफा- चार्य से पूछा-क्सि कर्म को करने से प्रझलोक में जामा जा सकता है? (३0)
हे कलिप्रिय ! तदनन्तर उससे वृत्रशन इन्द्र का चरित कहा । (उन्होंने कहा)-हे देत्येन्द्र ! प्राचीन काल में इन्द्र ने सौ पवित्र अश्वमेघ यज्ञ किया था। इसी से वे ब्रह्मलोक चले गए। (३१-३२)
शुप्राचार्य का वह वाक्य सुनकर बलयान् दानपपति ने अश्वमेध यज्ञ करने की उत्तम इच्छा की। तदनन्तर अमुर- गुरु तथा श्लेष्ट दानवों को आमन्त्रित पर उसने कहा- में दक्षिणा सहित अश्यमेध यज्ञों को करूँगा। अतः झायो, हमलोग पृथ्वी पर चलें एवं राजाओं को जीतकर इच्छा- नुकूल गुगों से सम्पन्न अश्वमेघों का सम्पादन करें। निधियों को बुलाओ एवं गुह्यकों यो आज्ञा दे दो। (३३-३१)
प्रपियोको आमन्त्रित करो, हमलोग देविका के तट पर चलें। यह पविन श्रेष्ठ नदी कल्याणप्रद एवं –सर्वसिद्धिकरी है। उप्स.प्राचीन स्थान पर पहुँचर इम अश्वमेध यज्ञ करो। (३१)
सुर-शत्रु के उस पचन योन्सुनकर असुरयाजक (शुक्र) ने ठीक है ऐसा कदा एवं प्रसन्नतापूर्वक उन्होंने निधियों
पाढमित्यप्रवीद् हृष्टो निधय. मदिदेश सः ॥ ३७
सतो धुन्धुर्देरिकायाः प्राचीने पापनाशने ।
भार्गवेन्द्रेण शुक्रेण वाजिमेधाय दीक्षित. ॥ ३८
सदस्या ऋत्विनवापि तत्रासन भार्गमा द्विजाः ।
शुक्स्यानुमते ब्रह्मन् शुक्रशिध्याश्च पण्डिताः ॥ ३९
यज्ञभागमुजस्तत्र स्वर्भानुप्रमुखा मुने।
कृताश्चासुरनाथेन शुभम्यानुमतेऽसुराः ॥४०
ततः प्रवृत्तो यज्ञस्तु समुत्सृष्टस्तया हयः ।
हयस्यानुययौ श्रीमानसिलोमा महासुरः ॥ ४१
ततोऽग्निधूमेन मही सशैला
व्याता दिशः ख विदिशश्च पूर्णाः ।
तेनोग्रगन्धेन दिवस्पृशेन
मरुद् चवी ब्रह्मलोके महर्षे ॥ ४२
त गन्धमाघ्राय सुरा विषण्णा
जानन्त धुन्धु हयमेधदीक्षितम् ।
ततः शरण्यं शरण जनार्दन
जग्मु. सशमा जगतः परायणम् ॥ ४३
प्रणम्य वरद देव पनाम जनार्दनम् ।
प्रोचुः मवें सुरगणा गयगद्गदया गिरा ।। ४४
भगवन् देवदवेश चराचरपरायण ।
विज्ञप्ति श्रूयता विष्णो सुराणामातिनाशन ॥ ४५
धुन्धर्नामासुरपतिपलवान् बरवृहित ।
सर्वान् सुरान् विनिर्जित्य त्रैलोक्यमहरद् बलिः ॥ ४६
मते पिनाकिनो देवात् वाताऽस्मान् न यवो हरे ।
अतो विवृद्धिमगमद् यथा व्याधिरुपेक्षित. ॥ ४७
साम्प्रत ब्रह्मलोकस्थानपि जेतु समुद्यतः ।
शुस्य मतमास्थाय सोऽधमेधाय दीक्षितः॥४८
शत क्रतूनामिष्ट्वाऽसो ब्रह्मलोक महासुरः ।
आरोढुमिच्छति वशी विजेतु त्रिदशानपि ॥ ४९
तस्मादकालहीन तु चिन्तयस्व जगद्गुरो ।
को आदेश दिया। (३७)
सदन-वर देविका के प्राचीन पापनाशक तट पर भार्गव श्रेष्ठ शुक ने अश्वमेध यज्ञ के लिये धुन्धु को दीक्षित किया। (३८)
हे ब्रह्मम् । शुक्र की अनुमति से शुक्र के शिष्य तथा भार्गव-गोत्रीय विद्वान् ब्राह्मण उस यज्ञ में सदस्य एवं ऋत्विज बने। (३६)
हे मुने। शुक्राचार्य की अनुमति से असुरनाथ ने स्वर्भानु आदि असुरों को यचभाग का मोगी बनाया। (४०)
तदनन्तर यन आरम्भ हुक्षा एन अफ छोडा गया। असिलोमा नामक महान् असुर अन्ध के पीछे चला। (४१)
हे महर्षे । तदुपरान्त यज्ञ क धूम से पर्वतों सहित पृथ्वी, आकाश, दिशायें एय विदिशायें व्याप्त हो गई। आगश स्पर्शी उस एम गन्ध से सुगन्धित वायु ब्रह्मलोक में प्रवाहित होने लगा। (४२)
उस गन्ध को सूंघ कर देवगण विषण्ण हो गए। उन्हें यह ज्ञात हो गया कि धुन्धु ने अश्वमेध की दीक्षा ग्रहण की है। तदुपरान्त वे इद्र सहित जगदाश्रय शरण्य जनार्दन की शरण में गए। (४३)
वरदाता पदानाभ जनार्दन देव को प्रणाम कर सभी देवों ने भय से गद्गद् वाणी मे कहा- (४४)
हे देवों के दुख को दूर करने वाले चराचर हितकारी भगवान देवदेवेश विष्णु । आप हमारा निवेदन सुनें ।(४२)
धुन्धु नामक बलवान् असुरपति वर से बढ़ गया है। उस बलवान ने सभी देवों को जीतकर नैलोक्य को छीन लिया। (४६)
हे हरि । पिनाकी देव के अतिरिक्त हम देवों का कोई रक्षक न होने से बद असुर उपेक्षित व्याधि ये सदृश बढ़ गया है। (४७)
सम्प्रति ब्रह्मलोक मे हम रहने वालों को भी जीतने के लिये उद्यत होकर वह शुक्र के मतानुसार अश्वमेध यज्ञ में दीक्षित हुआ है। (४८)
सौ अश्वमेध यज्ञ करके वह महासुर देवताओं पर विजय पाने के लिए ब्रह्मलोक में आरोहण करना चाहता है। (४६)
अत हे जगद्गुरु । आप शीय यतको विश्वस्त करने
उपायं मसरियंसे येन स्याम सुनिताः ।।५०
श्रुत्या सुराणां वचनं भगवान् मधुसूदनः।।
दत्त्वाऽभयं महानाहुः पयामास साम्प्रतम् ।
विसृज्य देवता मर्या ज्ञात्वाऽजेयं महासुरम् ।। ५१
पन्धनाय मति चक्रे धुन्धोधर्मध्वजस्य ।
ततः कृत्वा स भगवान् वामनं रूपमीश्वरः ।। ५२
देहं त्यक्त्या निरालम्ब काष्ठवद् देविकाजले ।
क्षणान्मज्जस्तयोन्मजन्मुक्तकेशो यदृच्छया ।। ५३
दृष्टोऽथ दैत्यपतिना दैत्यैश्चान्यैस्वयपिभिः ।
वतः कर्म परित्यज्य यज्ञियं ब्राह्मणोत्तमाः ॥५४
समुत्तारयितुं विनमाद्रवन्त समाकुलाः ।
सदस्या यजमानश्च ऋत्विजोऽथ महौजसः ॥ ५५
निमजमानमुअलः सर्वे ते वामनं द्विजम् ।
समुत्तार्य प्रसन्मास्ते पप्रच्छु. सर्व एव हि ।
किमर्थ पतितोऽसीह केनाक्षिप्तोऽसि नो वद ॥५६
तेपामाकर्ण्य वचनं कम्पमानो मुहुर्मुहुः ।
प्राह घुन्धुपुरोगांस्तान्छूयतामत्र कारणम् ॥ ५७
प्रामणो गुणवानासीत् प्रभाम इति विश्रुतः ।
सर्वशास्त्रार्थवित् प्राज्ञो गोत्रतश्चापि वारुणः ।। ५८
तस्य त्रद्वयं जातं मन्दप्रशं सुदुःसितम् ।
तत्र ज्येष्ठो मम भ्राता फनीयानपरस्त्वहम् ।। ५९
नेत्रभाम इति ख्यातो ज्येष्ठो भ्राता ममासुर ।
मम नाम पिता चक्र गतिभासेति कौतुकात् ।। ६०
रम्यश्रावसथो बन्धो शुभश्वासीत् पितुर्मम ।
त्रिविष्टपगुणयुक्तधारुरूपो महासुर ।। ६१
वतः कालेन महता आयोः स पिता मृतः ।
तस्यौदहिकं कृत्वा गृहमावां समागतौ ॥ ६२
ततो मयोक्तः स भ्राता विभजाम गृहं वयम् ।
तेनोक्तो नैव भवतो विद्यते भाग इत्यहम् ॥ ६३
कुजवामनराजानां क्लीनानां चित्रिणामपि ।
उन्मत्तानां तथान्धानां धनभागो न विद्यते ॥ ६४
शय्यासनस्थानमा स्वेच्छयानभुजक्रिया।
का उपाय सोचें जिससे हमलोग निश्चिन्त हो सकें। (५०)
राभी देयों को अभयदान देकर उन महाबाहु ने उन्हें विसर्जित किया एवं उस महान असुर धर्मध्वज धुन्धु को अजेय जानकर उन्होंने उसे पाँधने का विचार किया। तदनन्तर भगवान् विष्णु ने वामन का रूप धारण किया एवं देविका के जल में अपने शरीर को फाष्टवत् निपलम्य छोड़ दिया। क्षणमात्र मे खुले हुये फेशों वाले वे अपने आप डूबने उतराने लगे। (५१-५३)
तदनन्तर देत्यपति, दैत्यों एवं अन्य ऋपियों ने उन्हें देवा । तदुपरान्त यज्ञकर्म को छोडर श्रेष्ठ प्रामग व्यप्रतापूर्वक उस माझण को निरालने के लिये दौड़े। सभी सदस्य, यजमान एवं अति शोजस्वी ऋत्विजों ने दूय रहे थामनामार माझण को निकाला एय उससे पूछा-दमें यह बतलाओ कि तुम यहाँ क्यों गिरे अथवा तुम्हें किसने फेंका (५४-५६)
पनके पचन को सुनकर पार-यार कापते हुए उन्होंने घुग्घु आदि से कहा-आप लोग इस कारण सुनें । (५७)
वरुण गोत्रोत्पन्न प्रभास नामक एक प्रामण थे। सर्वशास्त्रों के अर्थ के नाता तथा बुद्धिमान थे। (५८)
उनके दो पुत्र उत्पन्न हुए। दोनों ही अल्पबुद्धि और अत्यन्त दुसमस्त थे। उनमें मेरा भाई पड़ा और में (५९)
हे असुर! मेरा पड़ा भाई नेत्रभास नाम से विख्यात है। मेरे पिता ने कुतूहलाश मेरा नाम गतिभास रस्सा । (६०)
हे महासुर धुन्धु । मेरे पिता का गृह रमणीय, सुसद, स्वर्गीय गुणों से युक्त एय सुन्दर था। (६१)
तदनन्तर यहुत दिनों के बाद हम दोनों के पिता दिवंगत हो गये। उनरा प्रेतर्म फर हम दोनों भाई पर आये। (६२)
तदुपरान्त मैंने पड़े भाई से कहा- हम दोनो गृह का विभाजन पर हैं। उसन मुझसे कहा-तुम्हारा भाग नहीं है। (६३)
क्योंकि कुन्न, यामन, लँगड़े, नपुंसर, श्वेतपुटी, उन्मत्त और अन्धों का धन में भाग नहीं होता। (६)
नन्हें पेषल प्यासन का स्थान एवं स्वच्यानुसार
एतावद् दीयते तेभ्यो नार्थभागहरा हि ते ॥ ६५.
एवमुक्ते मया सोक्तः किमर्थ पैतृकाद् गृहात् ।
धनार्धभागमामि नाहं न्यायेन केन वै ।। ६६
इत्युक्तवति याक्येऽसौ भ्राता में कोपसंयुतः ।
समुक्षिप्याक्षिपन्नधामस्यां मामिति कारणात् ।। ६७
ममास्यां निम्नगायां तु मध्येन प्लयतो गतः ।
कालः संवत्सराख्यस्तु युप्माभिरिह चोद्धृतः ॥ ६८
के भवन्तोत्र संग्रामाः सरनेहा पान्धवा इव ।
कोऽयं च शक्रप्रतिमो दीक्षितो यो महाभुजः ॥ ६९
तन्मे सर्व समाख्यात याथातथ्यं तपोधना. ।
सहदिसंयुता यूयं सानुकम्पा मे भृशम् ।। ७०
तद् वामनवचः श्रुत्वा भार्गवा द्विजसत्तमाः।
प्रोचुर्वयं द्विजा ब्रह्मन् गोवतथापि भार्गवाः ॥७१
असायपि महातेजा धुन्धुर्नाम महासुरः ।
दाता भोक्ता विभक्ता च दीक्षितो यज्ञकर्मणि ॥ ७२
इत्येवमुक्त्वा देवेशं. वामनं भार्गवास्ततः।
प्रोचुर्दै त्यपति सर्ने वामनार्थकरं वचः ।। ७३
दीयतामस्य दैत्येन्द्र सोपस्करसंयुतम् ।
श्रीमदायसर्थ दास्यो रत्नानि विविधानि च ॥७४'
इति द्विजानां वचनं श्रुत्वा दैत्यपतिर्वचः ।
प्राह द्विजेन्द्र ते दमि यावदिच्छसि वै धनम् ॥ ७५
दास्ये गृहं हिरण्यं च वाजिनः स्यन्दनान् गजान् ।
प्रयच्छाम्यध भवतो बियतामीप्सितं विभो ।। ७६
तद्वाक्यं दानवपतेः श्रुत्वा देवोऽथ वामनः ।
प्राहासुरपति धुन्धु स्वार्थसिद्धिकरं वचः ।। ७७
सोदरेणापि हि प्राना हियन्ते यस्य संपदः ।
तस्याक्षमस्य यद्दत्तं किमन्यो न हरिष्यति ॥ ७८
दासीदासांच मृत्यांश्च गृहं रत्नं परिच्छदम् ।
समर्थेषु द्विजेन्द्रपु प्रयच्छस्व महाभुज ॥ ७९
मम प्रमाणमालोक्य मामकं च पदत्रयम् ।
अन्नभोग या अधिकार दिया जाता है। वे अर्थ के भाग के अधिसरी नहीं होते।
ऐसा पहने पर मैंने उससे कहा कि मैं किस न्याय से और क्यों पैतृक गृह के पन के अर्धमाग या अधिकारी नहीं हूँ? (६६)
इस प्रकार या वाक्य कहने पर कोपयुक्त मेरे भ्राता ने इसी कारण मुझ उठाकर इस नदी में फेंक दिया । (६७)
मुझे इस नदी में तैरते हुए एक वर्ष का समय व्यतीत हो गया । आप लोगों ने यहाँ मेरा उद्धार किया है। (६८)
स्नेह युक्त यान्धयों के सदृश यहाँ स्थित आप लोग कौन हैं तथा यज्ञ के लिए दीक्षित इन्द्रतुल्य ये महापराक्मी कौन है? (६९)
है तपोधनो! आप मुझे यह सय यथार्थ रूप में बहलायें । आपलोग महान् ऐधर्य से युक्त एवं मेरे ऊपर अतिशय अनुकम्पा करने वाले हैं। (७०)
यामनपा पह पाक्य मुनर भाययुल के प्राण भेटों ने कहा-हे प्रझन् ! दमडोग भागेयगोत्रीय माम है। (७१)
पे धुन्धु नामक अनि संजरयो पाता, मोटा एवं बिमा पर्ष मदाम् अगुर है। ये याम्म में दीभित हुए हैं। (२)
देवेश वामन से ऐसा कहकर सभी भार्गवगोत्रीय (ब्राह्मणों ने) दैत्यपति धुन्धु से यामन के प्रयोजन को सिद्ध करने वाय यचन कहा- (७३)
हे दैत्येन्द्र ! इन्हें समस्त सामग्रियों से युक्त भीसम्पन्न गृह, दासियाँ एवं विविध प्रकार के रत्न प्रदान करें। (७४)
ब्राह्मणों के उस पचन को सुनकर देत्यपति ने यह यचन कहा-हे द्विजेन्द्र में आपकी इच्छानुसार धन दूँगा । (७५)
हे विमु ! आप अपने ईप्सित पदार्थ का परण करें। मैं आज आपरो गृह, वर्ण, अध, रय एवं हाथी प्रदान करूँगा। (७६)
दानपति का यह यास्य मुनर यामनदेय ने असुर- पति धुन्धु से अपना स्यार्थ सिद्ध करने याला ययन कहा- (७७)
सहोदर भाई ने जिसकी सम्पत्ति का अपहरण कर लिया उस असमर्थ को जा दिया जायेगा क्या उसे कोई दूसरा नहीं छीन लेगा? (७८)
दे महापाटु ! आप समर्थ मापणों को दासी, दाम, सृत्य, गृह, ररन एवं अच्छे यन्त्र प्रदान करें। (38)
हे देरपेन्द्र! मेरा परिमाए देखकर मुझे तीन
संप्रयच्छस्व दैत्येन्द्र नाधिक रक्षितुं क्षमः ।। ८०
इत्येवमुक्ते वचने महात्मना
विहस्य दैत्याधिपति. मऋत्विजः।
प्रादाद् द्विजेन्द्राय पदत्रय तदा
यदास नान्यं प्रगृहाण किंचित् ॥ ८१
क्रमवयं तावदवेक्ष्य दत्तं
महासुरेन्द्रण विभुर्यशस्वी
चने ततो लड़यितुं त्रिलोकी
त्रिविक्रम रूपमनन्तशक्तिः ॥ ८२
कृत्वा च रूपं दिविजांच हत्या
प्रणम्य चीन् प्रथमम्मेण ।
मही महीः सहितां सहाणेवां
नहार रत्नाकरपचनैर्यताम् ॥ ८३
भुपं सनाकं त्रिदशाधिवासं
सोमार्ककारभिमण्डितं नमः ।
देवो द्वितीयेन जहार वेगात्
क्रमेण देवप्रियमीप्सुरीश्वरः॥ ८४
क्रमं तृतीयं न यदाऽस्य पूरितं
तदाऽतिकोपाद् दनुपुंगवस्य ।
पपात पृष्ठे भगवांस्त्रिविक्रमो
मेस्प्रमाणेन तु विग्रहेण ॥ ८५
पतता वासुदेवेन दानवोपरि नारद ।
त्रिंशयोजनसाहस्री भूमेर्गर्ता दृढीकता ॥ ८६
ततो दैत्यं समुत्पाट्य तस्यां प्रक्षिप्य वेगतः।
अवर्षत् सिकतादृष्ट्या वा गर्वामपूरयत ।। ८७
ततः स्वर्ग सहस्राक्षी वासुदेवप्रसादतः ।
सुराश्च सर्वे प्रैलोक्यमवापुनिरुपद्रयाः ।। ८८
भगवानपि दैत्येन्द्र प्रक्षिप्य सिकतार्णवे ।
कालिन्या रूपमाधाय वौयान्तरधीयत ॥ ८९
एव पुरा विष्णुरभूध वामनो
धुन्धुं बिजेतुं च त्रिविक्रमोऽभूत् ।
यस्मिन् स दैत्येन्द्रसुतो जगाम
महाश्रमे पुण्यपुतो महर्षे ।। ९०
इति श्रीवामनपुराणे द्विपशाशोऽध्याय ॥५२॥
पग (भूमि) प्रदान कर । में अधिक की रक्षा करने में समर्थ नहीं हूँ।
उन महात्मा के ऐसा वचन कहने पर जब उन्होंने अन्य कुछ ग्रहण नहीं किया तो ऋत्विजों सहित दैत्याधिपति ने हँसकर उन द्विजेन्द्र को तीन पग (भूमि) प्रदानकी।८१)
महान असुरेन्द्र द्वारा तीन पग भूमि प्रदान की हुई देखकर अनन्त शक्ति वाले यशस्वी विभु ने निरोकी का लखन फसे में लिये त्रिविक्रम रूप धारण किया।
(त्रिविक्रम) रूप धारण करने के उपरान्त उन्होंने दैत्यों का यधकर चैपियों को प्रणाम किया एव प्रथम पादग्यास में पर्वत, सागर, रत्नों की सान एय नगरों से युक्त पृथ्वी को हरण कर लिया। (८३)
देयो का प्रिय करने की इच्छा वाले ईश्वर वामनदेय ने द्वितीय पादप्रम से वेगपूर्वक देवनाओं के निवास स्वर्ग के सहित भुयर्लोक, चन्द्र, सूर्य ण्य नक्षत्रों से मण्डित आगश का हरण कर लिया। (८४)
उनका तृतीय पादकम जब पूरा नहीं हुआ तो अत्यन्त कोप से भगवान त्रिविक्रम मेरु के तुल्य शरीर से दानवश्रेष्ट की पीठ पर गिरे। (८५)
हे नारद । दानव के उपर वासुदेव के गिरने से भूमि मे तीस सहस्र योजन का इद गर्ने घन गया । (८६)
तदनन्तर उन्होंने देत्य को उठार वेग से उसमें पंक दिया एघ चालु की दृष्टि से उस गर्ने को भर दिया। (८७)
सदनन्तर यामदेव के अनुग्रह से इन्द्र ने स्वर्ग पाया ण्व उपद्रव रहित समरस देवों को रैलोक्य की प्राप्ति हुई। (८८)
कालिन्दी के यालुकार्णव में देरयेन्द्र को फेंकने के उपरान्त भगवान् भी अपना रूप धारण कर वही अन्तर्हित हो गए। (८)
प्राचीन काल में इस प्रकार धुन्धु यो जीतने के लिये विष्णु वामन तथा बियिकम हुए थे। हे महर्पि। यह पुण्यात्मा दैत्येन्द्र पुत्र प्रहलाद उसी थाश्रम में गया ।
श्रीवामनपुपण में बावनवाँ मध्याय समाप्त ॥१२॥