वामन महा पुराण
22 ब्रह्मोत्पत्ति वर्णन, सांनिहत्य सरोत्पत्ति सप्तर्पि एवं बालखिल्यों की उत्पत्ति एव तपश्चर्या, शिव द्वारा ऋषियों के धर्मज्ञान की परिक्षा ऋषियों द्वारा शिव के लिङ्ग का पातन, ब्रह्मा द्वारा ऋषियों को ज्ञान का उपदेश
भृण्वन्तु मुनयः सर्वे पुराणं यामनं महत् ।
पच्छ्रुत्वा मुक्तिमाप्नोति प्रसादाद् वामनस्य तु ॥ ३
सनत्कुमारमासीनं स्थाणोर्वटसमीपतः ।
ऋपिभिर्यालखिल्याच झपुत्रमहात्मभिः॥ ४
मार्कण्डेयो मुनिस्तत्र विनयेनाभिगम्य च ।
पप्रच्छ सरमाहात्म्य प्रमाणं च स्थिति तया ॥५
मार्कण्डेय उवाच ।
ब्रह्मपुत्र महाभाग सर्वशास्त्रविशारद ।
धूहि मे सरमाहात्म्यं सर्वपापक्षयावहम् ॥ ६
कानि तीर्थानि दृश्यानि गुदानि द्विजसत्तम ।
लिङ्गानि विपुण्यानि स्थाणोर्यानि समीपतः ॥ ७
येपां दर्शनमात्रेण मुक्ति प्राप्नोति मानवः ।
वटस्य दर्शनं पुण्यमुत्पत्ति कथयस्व मे ॥ ८
प्रदक्षिणायां यत्पुण्यं तीर्थम्नानेन यत्फलम् ।
गुह्येषु चैव दृष्टेषु यत्पुण्यमभिजायते ।। ९
देवदेवो यथा स्थाणुः सरोमध्ये व्यवस्थितः ।
किमर्थ पांशुना शक्रस्तीर्थ पूरितवान् पुनः ॥ १०
स्थाणुतीर्थस्य माहात्म्यं चत्र तीर्थस्य यत्फलम् ।
सूर्यतीर्थस्य माहात्म्यं सोमतीर्थस्य हि मे ॥ ११
शंकरस्य च गुधानि विष्णोः स्थानानि यानि च ।
कथयस्व महाभाग सरस्वत्याः सविस्तरम् ।। १२
हि देवाधिदेवम्य माहात्म्यं देव तत्त्वतः ।
विरिश्चस्य प्रमादेन विदितं सर्वमेव च ॥ १३
लोमहर्षण उवाच ।
मार्कण्डेयववः श्रुत्या ब्रह्मात्मा स महामुनिः ।
अतिभक्त्या तु तीर्थस्य प्रवणीकृवमानसः ॥ १४
पर्यवं शिथिलीकृत्वा नमस्कृत्वा महेश्वरम् ।
कथयामास तत्सर्व यच्छ्रुतं ब्रह्मणः पुरा ।। १५
सनत्कुमार उवाच।
नमस्कृत्य महादेवमीशानं वरदं शिवम् ।
उत्पत्तिं च प्रवक्ष्यामि तीर्थानां ब्रह्मभापिताम् ॥ १६
पूर्वमेकार्णवे घोरे नष्टे स्थावरजङ्गमे ।
लोमहर्पण ने कहा-हे समस्त मुनियो! आप लोग महान् वामनपुराण को सुनें जिसे सुनकर मनुष्य वामन की कृपा से मुक्ति को प्राप्त करता है। (३)
ब्रह्माके पुत्र महात्मा वालसिल्यादि ऋपियों के साथ सनत्कुमार स्थाणु बट के पास बैठे हुए थे। (४)
महर्पि मार्कण्डेय ने उनके पास नम्रतापूर्वक जाकर सरोवर के माहात्म्य, उसके विस्तार और स्थिति के विषय में पूछा। (५)
माण्डेय ने कहा-हे सर्पशास्र में कुशल महात्मा ब्रह्मपुत्र (सनत्कुमार) ' आप मुझसे सरोवर के सर्वपाप- नाशक माहात्म्य को कहिए। (६)
हे द्विजश्रेष्ठ ! स्थाणु के पास कौन-कौन तीर्थ दृश्य तथा कौन कौन अदृश्य हैं तथा कौन से अत्यन्त पविन लिङ्ग है। जिनका दर्शन कर मनुष्य मुक्ति पाता है। वट के दर्शन का पुण्य तथा उत्पत्ति भी बताइये । (७-८)
इनकी प्रदक्षिणा से होने वाले पुण्य, तीर्थस्नान का फल एवं अदृश्य और दृश्य (तीयों) का पुण्य, किस प्रकार सरोवर के मध्य में देवाधिदेव स्थाणु स्थित हुए, किस कारण से इन्द्र ने तीर्थ को पुन घूलि से भर दिया, स्थाणुतीर्थ के माहाम्य, चक्रतीर्थ के फल, एवं सूर्य- वीर्य तथा सोमतीर्थ के माहाम्य-इन सबको आप मुझसे बताइये। (६-११)
हे महाभाग ! सरस्वती के समीप शंकर तथा विष्णु के गुह्य स्थानों को आप विस्तार से कहिए। (१२)
हे देव ! देवाधिदेव के माहात्म्य को आप यथार्थ रूप से घना क्योंकि ब्रह्मा की कृपा से थाप को सब कुछ ज्ञात है। (१३)
लोमहर्पण ने कहा-मार्कण्डेय का वचन सुनकर ब्रह्मस्वरूप महामुनि का मन तीर्थ की अति भक्ति से आपूरित हो गया। (१४)
आसन को शिथिल करने के उपरान्त शंकर को प्रणाम कर उन्होंने प्राचीन काल में ब्रह्मा से सुनी हुई सभी बातों का वर्णन किया। (१५)
सनत्कुमार ने कहा-मंगल कारक, वरदावा महादेव, ईशान को प्रणाम कर मैं ब्रह्मा से कथित तीयों की उत्पत्ति को कहूँगा। (१६)
वृहदण्डमभूदेकं प्रजानां बीजसंभयम् ॥ १७
तस्मिन्नण्डे स्थितो ब्रह्मा शयनायोपचस्मे ।
सहस्रयुगपर्यन्तं सुप्त्या स प्रत्यनुध्यत ।। १८
सुप्तोत्थितस्तदा ब्रह्मा शून्यं लोकमपश्यत ।
सृष्टिं चिन्तयतस्तस्य रजसा मोहितस्य च ॥ १९
रजः सृष्टिगुणं प्रोक्तं सत्त्वं स्थितिगुणं विदुः ।
उपसंहारकाले च तमोगुणः प्रपतते । २०
गुणातीत. स भगवान् व्यापकः पुस्पः स्मृतः ।
तेनेदं सकलं व्यास यतिकचिजीनसज्ञितम् ॥ २१
स ब्रह्मा स च गोविन्द ईश्वरः स सनातन ।
यस्तं वेद महात्मानं स सर्व वेद मोक्षवित् ॥ २२
किं तेषां मालस्तीधैराश्रमर्या प्रयोजनम् ।
येपामनन्तकं चित्तमात्मन्येव व्यवस्थितम् ॥ २३
आत्मा नदी संयमपुण्यतीर्थी
सत्योदका शीलसमाधियुक्ता ।
तस्यां स्नात. पुण्यकर्मा पुनाति
न वारिणा शुद्धयति चान्तरात्मा ॥ २४
एतत्प्रधानं पुस्पस्य फर्म
यदात्मसंरोधसुसे
जेयं तठेव प्रवदन्ति सन्त-
स्तत्प्राप्य देही विजहाति कामान् ॥ २५
नेतादृशं ब्राह्मणस्यास्ति वित्त
स्यकता समता सत्यता च ।
शीले स्थितिर्दण्ड विधानवर्जन-
मक्रोधनश्थोपरमः क्रियाभ्यः ॥ २६
एतद् ब्रह्म समासेन मयोक्तं ते द्विजोत्तम ।
यज्ज्ञात्वा ब्रह्म परमं प्राप्स्यसि त्वं न संशयः॥ २७
इदानीं शृणु चोत्पत्ति ब्रह्मणः परमात्मनः ।
इमं चोदाहरन्त्येन श्लोकं नारायणं प्रति ॥ २८
आपो नारा चै तनय इत्येवं नाम शुथुमः ।
तासु शेते स यस्माच तेन नारायणः स्मृतः ॥ २९
पूर्व समय में घोर एकार्णन मे समस्त स्थानर जद्गम के विनष्ट हो जाने पर प्रजाओं के बीजरवरूप एक वृहद् अण्ड की उत्पत्ति हुई।
उस अण्ड मे स्थित ब्रह्मा ने शयन का उपक्रम क्यिा । सहस युग पर्यन्त शयन करने के उपरान्त वे जगे। (१८)
सोकर उठे हुए ब्रह्मा ने लोक को शून्य देखा । तदनन्तर रजोगुण से मोहित होकर ये सृष्टि की चिन्ता करने लगे। (१९)
रजोगुण सृष्टि शारक एव सत्त्वगुण स्थितियारक माना गया है। सहार के समय तमोगुण की प्रवृत्ति होती है। (२०)
(वस्तुत ) वे भगवान् गुणातीत तथा व्यापक है। उन्हें ही पुरप कहा जाता है। जीव नामक समस्त पदार्थ उन्हीं से व्याप्त है। (२१)
बे ही ब्रह्मा, विष्णु और सनातन महेश्वर हैं। उन महात्मा को जानने वाला सर्वज्ञ एव मोक्षवित होता है। (२२)
जिनका अनन्त चित्त आत्मा मे ही व्यवस्थित है उनके लिए समस्त तीर्थों एवं आश्रमों से क्या प्रयोजन? (२३)
शील-समाधियुक्त आत्मारूपी नदी सयम रूपी पवित्र तीयों याली एव सत्य रूपी उदक से पूर्ण है। इसमे स्नान करने वाला पुण्यात्मा पवित्र हो जाता है। अन्तरात्मा की शुद्धि जल से नहीं होती। (२४)
आत्मज्ञान रूपी सुख मे प्रवेश करना ही पुरुष का प्रधान कर्तव्य है । सन्त लोग उसी को ज्ञेय कहते हैं। उसको पाकर शरीरधारी सम्पूर्ण कामनाओं को छोड़ देता है। (२५)
एकता, समता, सत्यता, शील में स्थिति, दण्ड विधान का त्याग, अक्रोध एव क्रियाओं से उपरम के सदृश ब्राह्मण के लिए कोई अन्य धन नहीं है। (२६)
हे द्विजोत्तम । मैंने सक्षेप में तुमसे यह ज्ञान कहा है इसे जानकर तुम निस्सन्देह परम ब्रह्म को प्राप्त करोगे।
अब तुम परमात्मा ब्रह्म की उत्पत्ति सुनो। उस नारायण के विषय मे लोग यह श्लोक उदाहत करते हैं- (२८)
'आप' अर्थात् जल ही को 'नार' ( एवं परमात्मा की ) 'तनु' कहा जाता है। वे उसमें शयन करते हैं अतः उन्हें 'नारायण' कहा जाता है। (२९)
विबुद्धः सलिले तस्मिन् विज्ञायान्तर्गतं जगत् ।
अण्डं विमेद भगवांस्तस्मादोमित्यजायत ।
ततो भूरभवत् तस्माद् भुव इत्यपर. स्मृतः ।
सः शब्दश्य तृतीयोऽभूद् भूर्भुन, स्वेति सजितः ॥ ३१
तस्मात्तेजः सममवत् वत्सवितुर्वरेण्यं यत् ।
उदकं शोपयामास यत्तेजोऽण्डविनिःसृतम् ॥ ३२
तेजसा शोपितं शेष कललत्यमुपागतम् ।
कललाद् बुयुदं ज्ञेयं ततः काठिन्यतां गतम् ॥ ३३
काठिन्याद् धरणी जेया भूतानां धारिणी हि सा ।
यस्मिन् स्थाने स्थितं ह्यण्डं तस्मिन् संनिहितं सरः ॥ ३४ |
पदाचं निःसृतं तेजस्तस्मादादित्य उच्यते ।
अण्डमध्ये समुत्पन्नो ब्रह्मा लोकपितामह ।। ३५
उल् तस्याभवन्मेरुर्जरापुः पर्वताः स्मृताः ।
गर्मोदकं समुद्राव तथा नद्यः सहस्रशः ॥ ३६
नामिस्याने यदुदक ब्रह्मणो निर्मलं महत्।
महस्मरस्ते पूर्ण विमलेन बराम्भसा।।
तस्मिन् मध्ये स्यापुरुपी घटवृक्षो महामनः।
तस्माद् विनिगता यर्णा ब्राह्मणाः क्षत्रिया विशः।।
शूद्राद्ध तम्मादुत्पन्ना शुथूपाथं द्विजन्मनाम्।
ततश्चिन्तयतः सृष्टिं ब्रह्मणोध्यक्तज्ञन्मनः।
मनसा मानसा जाताः सनकाया महर्षयः।।
पुनश्चिन्तघतम्यम्य प्रजाकामस्या घीमतः।
उत्पन्ना ऋषयः सप्र ते प्रजापतयोभवन्।।
पुनश्चिन्तयतम्यम्य रज्ञसा मोहितम्य च।
चारिलयाः समुत्पन्नास्तुप स्वाध्यायतत्पराः।।
ते सदा स्नान निरता देवार्चनपरायणाः।
उपवार्सर्ततैस्तीप्रैः शोपयन्ति कलेवरम्।
वानप्रस्वेन विविना अग्निहोत्रसमन्विताः।
तपसा परमेणेह शोपयन्ति कलेवरम्।।
जागृत होने के उपरान्त उस जल में जगत् को अन्तर्गत हुआ जानकर भगवान ने अण्ड का भेदन किया। उससे 'ओम्' इस शब्द की उत्पत्ति हुई।(३०)
तदनन्तर उससे (प्रथम ) भू, द्वितीय भुर एव तृतीय स्व की उत्पत्ति हुई। इनका 'भूर्भुव स्व' यह नाम हुआ। (३१)
उससे उस सविता देवता का वरेण्य तेज उत्पन्न हुआ। सृत उस तेज ने जल को सुखाया। (३२)
तेज से जलके शोषित होने पर शेप कलल के रूप मे परिवर्तित हुआ । कपल से बुद-युद हुआ ओर तदनन्तर वह कठिन हो गया। (३३)
काठिन्य से भूतों को धारण करने वाली धरणी उत्पन्न हुई। जिस स्थान पर अण्ह स्थित था वहीं सनिहित. मरोवर, है। (३४)
तेज के आदि में उत्पन्न होने से उसे 'आदित्य' कहा जाता है । अण्ड के मध्य में लोकपितामह ब्रह्मा उत्पन्न हुए। (३५)
उस अण्ड का उल्व ( गर्भवेष्टन ) मेरु पर्वत है एव अन्य पर्वत उसके जरायु माने जाते हैं। समुद्र एव सहस्रों
नदियाँ गर्मेदक है। ब्रह्मा के नाभि-स्थान में जो महान निर्मल बल है उस स्वच्छ श्रेष्ठ जल से महान् सरोवर परि पूर्ण है।
उसके मध्य में स्वाणु स्वरुप महा मनसी वटवृक्ष है। उससे ब्राह्मण क्षत्रिय और वैश्य ये वर्ण निकले एव द्विजो की शुपधा हेतु उससे बूढो की उत्पत्ति हुई। तदन्तर सृष्टि की चिन्ता कर रहे अध्यकवज्मा ब्रह्मा के मन से सनकदि महषिर्यो की उत्तपत्ति हुई।
पुन प्रजा की कामना से चिन्ता कर रहे धीमान् ब्रह्मा से सात ऋषि उत्पन्न हुए। वे प्रजापति हुये।
रजोगुण से मोहित ब्रह्मा ने जब पुन चिन्ता की तो तप स्वाध्याय परायण बालखिम्यो की उत्पत्ति हुई।
वे सदा स्नान निरत, देवपूजा पराजय रहते तथा उपवासों एव तीव्र व्रतो से अपने शरीर को शोषित करते है।
अग्निहोत्र से युक्त होकर वानप्रस्थ विधि से परम तप द्वारा वे शरीर को शोषित करते हैं।
दिव्य वर्ष सहस्रं ते कथा धमनिसंतता।
आराघयन्ति देवेश्वं न च तुभ्यति प्रकारः।।
ततः कालेन महता अभया सह शकरः।
आकाश्वमार्गेग तदा दृष्ट्वा देवी सुदु खिता।
प्रस्राद्य देवेदेशं शंकर प्राह सुनता।
क्लिश्यन्ते ते मुनिगण देवादारवानाअधाः।
तेषा क्लेशशय देव विघेदि कुरु से दयाम्।
किं वेदधर्मनिष्टानामनन्त दव दुष्ठातम्।
नाद्यापि वेन शुडयन्ति शुष्कस्नाटयस्थिशोषिताः।
तच्छस्वा वचन देव्या पिनाकी वातिवान्धकः।
प्रोवाच प्रहसन् मूर्ध्नि चारुचन्द्राशुशोभित।।
श्रीमहादेव उवाच।
न वेत्सि देवि तस्वेन घर्मस्य महना मतिः।
मैते धर्म विजानन्ति न च फामविवर्जिताः।।
न च क्रोधन निर्यत्काः केवलं मूढवुद्धयः।
एतच्छत्वावनीद् देवी मा मैवं शासितप्रतान्।।
देव प्रदर्शयात्मान परं कौतूहलं हि मे।
स इत्युक्त उवाचेदं देवी देव. स्मिताननः ॥ ५१
तिष्ठ त्वमत्र यास्यामि यौते मुनिपुंगवाः।
साधयन्ति तपो घोरं दर्शयिष्यामि चेष्टितम् ॥ ५२
इत्युक्ता तु ततो देवी शकरेण महात्मना ।
गच्छस्वेत्याह मुदिता भर्तारं भुवनेश्वरम् ॥ ५३
यत्र ते मुनयः सर्वे काष्ठलोष्टसमा. स्थिताः ।
अधीयाना महाभागा. कृताग्निसदनश्यिाः॥५४
तान् विलोक्य ततो देवो नग्न. सर्वाङ्गसुन्दरः ।
वनमालाकृतापीडो युवा भिक्षाकपालभृत् ॥ ५५
आश्रमे पर्यटन भिक्षा मुनीना दर्शन प्रति ।
देहि भिक्षा ततथोक्त्वा ह्याश्रमादाश्रमं ययौ ॥ ५६
व विलोक्याश्रमगत योपितो ब्रह्मयादिनाम् ।
सकौतुकस्वभावेन तस्य रूपेण मोहिताः ।। ५७
प्रोचुः परस्पर नार्य एहि पश्याम भिक्षुकम् ।
परस्परमिति चोक्त्वा गृह्य मूलफल बहु ।। ५८
अत्यन्त दुर्बल एव धमानिमात्रावशेष होकर वे लोग सहस्र दिव्य वर्षो तक देवेश की आराधना करते रहे विस्तु शङ्कर प्रसन्न नही हुए।
तदनन्तर चिरकाल के पश्चात आकाश मार्ग से उमा सहित शङ्कर भ्रमण कर रहे थे। उस समय(वालखिल्यों) देख कर सुन्दर व्रतो वाली देवी ने दुःखी होकर देवदेवेश शङ्कर को प्रसन्न कर कहा-देवदारु बन में रहने वाले वे मुनिगण क्लेशित हो रहे है। हे देव मुक्त पर दया कर आप उनके क्लेश को दूर करे। हे देव क्या इन भेद धर्मनिष्ठो का दुष्कत अनन्त है जिससे स्नायु एव अस्थि मात्र अवशिष्ट हाने पर भी वे आज तक शुद्ध नही हुए। देवी के वचन को सुनकर चार चन्द्रास्ल से शोभित बन्धक के शुद्ध शङ्कर ने हँसते हुए कहा।
श्री महादेव ने कहा- हे देवि धर्म की गति गहन होती है। तुम उसे यथार्थ रुप मे नही जानती। ये लोग न तो धर्म को जानते है और न कमरहित ही है।
क्रोध से भी ये मुक्त नही है। ये केवल मूढवृद्धि है। यह सुन कर देवी ने कहा- प्रशस्त व्रत वालों के लिये ऐसा न कहिए। हे देव आप अपने स्वरुप को प्रकट करे। मुझे बहुत कौतूहल हो रहा है। ऐसा कहने पर शङ्कर ने हँसकर देवी से इस प्रसार कहा- (५०-५१)
तुम यहाँ रुको। ये मुनिगण जहाँ घोर तप कर रहे हैं वहाँ जाकर मैं र्म दिखलाता हूँ। (५२)
महात्मा शङ्कर के ऐसा कहने पर प्रसन्न देवी ने ( अपने ) पति भुवनेश्वर से कहा-आप वहाँ जाँय जहाँ अग्निहोत्र परायण, अध्ययनशील एव काष्ठ तथा लोप्ट सदृश वे मुनिगण स्थित है। (५३-५४)
तदनन्तर उन्हें देखकर देव शकर वनमालांधारी, भिक्षा कपाल को धारण किये, साग-सुदर नग्न युवा के रूप मे मुनियों क समक्ष भिक्षाहेतु पर्यटन करते हुए 'भिक्षा दो यह कह कर एक आश्रम से दूसरे आश्रम में जाने (५५ ५६)
आश्रम में पर्यटन कर रहे उनको देखकर ब्रह्मवादियों की स्त्रियों ने कौतुकपूर्ण स्वभाववश उनके रूप से मोहित होकर एक दूसरे से कहा--आओ भिक्षुक को देखें। परस्पर ऐसा कहने के उपरान्त पर्याप्त मूलफल लेकर मुनि पत्नियों ने उन देव से कहा 'भिक्षा लो।' उन्होंने भी
गृहाण भिक्षामूचुस्तास्तं देवं मुनियोपितः ।
स तु भिक्षाकपालं तं प्रसार्य बहु सादरम् ॥ ५९
देहि देहि शिवं वोऽस्तु भवतीभ्यस्तपोवने।
हसमानस्तु देवेशस्तत्र देव्या निरीक्षितः ।
तस्मै दत्त्वैव तां भिक्षा पप्रच्छुस्तं स्मरातुराः ॥ ६०
नार्य ऊचुः ।
कोऽसौ नाम व्रतविधिस्त्वया तापस सेव्यते ।
यत्र नग्नेन लिङ्गेन वनमालाविभूषितः ।
भवान् वै तापसो हृयो हृद्याः स्मो यदि मन्यसे ॥ ६१
इत्युक्तस्तापसीभिस्तु प्रोवाच हसिवाननः ।
इदमीग् व्रतं किंचिन्न रहस्यं प्रकाश्यते ॥ ६२
शृण्वन्ति बहवो यत्र तत्र व्याख्या न विद्यते ।
अस्य व्रतस्य सुभगा इति मत्या गमिष्यथ ॥ ६३
एवमुक्तास्तदा तेन ताः प्रत्यूचुस्तदा मुनिम्।
रहस्ये हि गमिष्यामो मुने नः कौतुर्क महत् ।। ६४
इत्युक्त्वा तास्तदा तं वै जगृहुः पाणिपल्लवैः ।
काचित् कण्ठे सकन्दर्पा पाहुभ्यामपरास्तथा ॥ ६५
जानुभ्यामपरा नार्यः केशेषु ललितापराः ।
अपरास्तु कटीरन्ध्र अपराः पादयोरपि ॥ ६६
क्षोभं विलोक्य मुनय आश्रमेषु स्वयोपिताम् ।
हन्यतामिति संभाष्य काठपापाणपाणयः ।। ६७
पातयन्ति स्म देवस्य लिङ्गमद्धत्य भीषणम् ।
पातिते तु ततो लिङ्गे गतोऽन्तर्धानमीश्वरः ॥ ६८
देच्या स भगवान् रुद्रः कैलासं नगमाश्रितः।
पतिते देवदेवस्य लिङ्गे नटे चराचरे ॥ ६९
क्षोभो बभूव सुमहानृपीणा भावितात्मनाम् ।
एवं देवे वदा तत्र वर्तति व्याकुलीकृते ॥७०
उवाचैको मुनिवरस्तत्र बुद्धिमतां वरः ।
न वयं विद्यः सद्भावं तापसस्य महात्मनः ।। ७१
विरिश्चि शरणं यामः स हि ज्ञास्यति चेष्टितम् ।
एवमुक्ताः सर्व एव पयो लञ्जिता भृशम् ।। ७२
ब्रह्मणः सदनं जग्मुर्देवैः सह निपेवितम् ।
अत्यन्त आदर पूर्वक उस भिक्षा-कपाल को फैला कर कहा- (५७-५९)
हे तपोवनवासिनियो! "दो दो। आप सभी का कल्याण हो।" वहाँ हँस रहे देवेश को पार्वती देख रही थीं। उन्हें भिक्षा देकर कामातुर मुनि पत्नियों ने उनसे पूछा । (६०)
स्त्रियों ने कहा-हे तापस। तुम किस व्रतिविधि का पालन कर रहे हो जिससे वनमाला विभूषित सुन्दर स्वरूपधारी आपको नग्नलिङ्ग विशिष्ट तापस बना पड़ा है। यदि आप चाहे तो हम आप की प्रिया हो सकती है। (६१)
तपस्विनियों के ऐसा कहने पर हँसते हुए (शङ्कर ने) कहा-यह व्रत इस प्रकार का है जिसका कुछ भी रहस्य प्रकाशित नहीं किया जा सकता। (६२)
हे सौभाग्यशालिनियो। जहाँ बहुत सुनने वाले हों यहाँ इस व्रत की व्याख्या नहीं की जा सकती। यह जानकर आप सभी चली जाँय" (६३)
उनके ऐसा कहने पर उन्होंने मुनि से कहा-हे मुनि । हम एकान्त में चलेंगी (क्योंकि) हमे महान् कुतुहल हो रहा है। (६४)
यह कहकर उन सभी ने उनको अपने पाणिपल्लवों से पकड लिया।कुछ कामातुराहो क्ण्ठ मे लिपट गई,कुछ ने उन्हें पाहुओं मे आवेष्टित कर लिया, कुछ स्त्रियों ने उन्हें जानुओं से पकड़ लिया, कुछ सुन्दर स्त्रियाँ उनके केश का स्पर्श करने लगी, कुछ उनकी कटि से लिपट गई एव कुछ ने उनके पैरों को पकड लिया। (६५-६६)
मुनियों ने आश्नम में अपनी स्त्रियों का क्षोभ देखकर 'मारो मारो' ऐसा कहते हुए हाथों में काष्ठ और पाषाण लेकर शिव के लिङ्ग को उखाड कर फेंक दिया। लिग गिरा दिये जाने पर ईश्वर अन्तर्धान हो गये। (६७-६८)
भगवान् रुद्र देवी के साथ कैलाश पर्वत पर चले गये। देवाधिदेव का लिङ्ग गिरने पर चराचर का नाश होने लगा। इससे पवित्र मर्पियों को क्षोभ हुआ । इस प्रकार देव के व्याकुल होने पर एक अत्यन्त बुद्धिमान श्रेष्ठ मुनि ने कहा-"हम उन महात्मा तापस के अस्तित्व को नहीं जानते। हम सभी ब्रह्मा की शरण में चलें। वे ही उनकी चेष्टा (रहस्य ) को समझेंगे।" ऐसा कहे जाने पर सभी ऋषि अत्यन्त लज्जित हुए। (६९-७२)
वे रोग देवताओं से सेवित ब्रह्मा के लोक में गये एवं
प्रणिपत्याथ देवेशं लजयाऽधोमुसाः स्थिताः ।। ७३
अथ तान् दुःखितान् दृष्ट्वा ब्रह्मा वचनमब्रवीत् ।
अहो मुग्धा यदा यूयं क्रोधेन कलुपीकृताः ॥ ७४
न धर्मस्य क्रिया काचिज्ज्ञायते मृढबुद्धयः ।
श्रूयतां धर्मसर्वस्वं तापसाः करचेष्टिताः ॥ ७५
विदित्वा यद् युधः क्षिप्रं धर्मम्य फलमाप्नुयात् ।
योऽसावात्मनि देहेऽस्मिन विभुनित्यो व्यवस्थितः ॥७६
सोनादिः स महास्थाणुः पृथक्त्वे परिसूचितः ।
मणिर्यथोपधानेन धचे वर्णोज्ज्वलोऽपि वै ।। ७७
तन्मयो भवते तद्वदात्माऽपि मनसा कृतः ।
मनसो भेदमाश्रित्य कर्मभिधोपचीयतें ॥ ७८
ततः कर्मवशाद् भुङ्क्ते संभोगान् स्वर्गनारकान् ।
तन्मनः शोधयेद् धीमान् ज्ञानयोगायुपक्रमैः ।। ७५
तस्मिन् शुद्धे ह्यन्तरात्मा स्वयमेव निराकुलः ।
न शरीरस्य संक्लेशैरपि निदहनात्मकैः ॥ ८०
शुद्धिमाप्नोति पुरुषः संशुहूं यस्य नो मनः ।
क्रिया हि नियमार्थाय पातफेभ्यः प्रकीर्तिताः ॥ ८१
यस्मादत्याविलं देहं न शीघ्र शुद्यते किल ।
तेन लोकेषु मार्गोऽयं सत्पथस्य प्रवर्तितः ॥ ८२
वर्णाश्रमविभागोऽयं लोकाध्यक्षण केनचिद ।
निर्मितो मोहमाहात्म्यं चिह्न चोत्तमभागिनाम् ॥ ८३
भवन्तः क्रोधकामाभ्यामभिभृताश्रमे स्थिताः ।
ज्ञानिनामाश्रमो वैश्म अनाश्रममयोगिनाम् ॥ ८४
क च न्यस्तसमस्तेच्छा क च नारीमयो नमः ।
क क्रोधमीदृशं घोरं येनात्मानं न जानथ ॥ ८५
यत्कोधनो यजति यद् ददाति
यद् वा तपस्वपति यज्जुहोति ।
न तस्य प्राप्नोति फलं हि लोके
मोघं फलं तस्य हि शोधनस्य ॥ ८६
इति श्रीवामनपुराणे सरोमाहम्ये द्वाविंशोध्याय ॥२२॥
देवेश को प्रणाम कर लज्जा से मुख नीचा किये सड़े हो (७३)
तदनन्तर उन्हें दुःखित देखकर ब्रह्मा ने यह वचन कहा अहो ! क्रोध से कलुपित चित्त बाले तुम लोग मूह हो । हे मूढयुद्धिवालो! तुमलोग धर्म की कोई क्रिया नहीं जानते । हे क्रूरकर्मा तापसो। धर्म के उस रहस्य को सुनो जिसे जानकर बुद्धिमान मनुष्य शीघ्र धर्म का फल प्राप्त करता है। हमारे इस शरीर में रहने याला जो नित्य विभु है वह अनादि एवं महास्थाणु है । वह इस शरीर से पृथक् प्रतीत होता है। जैसे उम्मल वर्ण का भी मणि आश्रय के प्रभाव से उप्ती रूप का दीखता है उसी प्रकार आत्मा भी मन से संयुक्त होकरमन के भेद का आश्रय कर कर्मों से उपचित होता है। तदननर कर्मशात् यह स्वर्ग एवं नरक के भोगों को भोगता रहता है। युद्धिमान व्यक्ति वो ज्ञान तथा योग इत्यादि उपायों द्वारा उस मन का शोधन करना चाहिए। (७४-७९)
उस मन के शुद्ध होने पर अन्तरात्मा स्वयमेव निराकुल है हो जाता है। जिसका मन शुद्ध नहीं है ऐसा पुरुष शरीर के शोपक क्लेशों द्वारा नहीं शुद्ध होता । पातकों से बचने के लिये ही क्रियाओं का विधान हुआ है। यत अत्यन्त कलुपित देह शीघ्र शुद्ध नहीं होता अत एव लोक मे सत्पथ का यह मार्ग प्रवर्तित हुआ है। (८०-८२)
फिसी लोकाध्यक्ष ने उत्तमभाग्य वालों के लिए मोह-माहात्म्य के चिह्न स्वरूप इस वर्णाश्रम विभाग का निर्माण (८३)
आप लोग आश्रम में रहते हुये भी क्रोध तथा काम से अभिभूत है। शानियों के लिये घर आश्रम है और अयोगियों (अज्ञानियों) के लिये अनाश्रम है। (८४)
यहाँ समस्त कामनाओं का त्याग यहाँ नारिमय यह भ्रम एवं कहाँ इस प्रकार का बोध जिससे तुम लोग अपनी आत्मा को नहीं पहचान पाते।
मोधी पुरुष लोक में जो यश करता है, जो दान देवा है अथवा जो तप या हवन करता है उसका कोई फल दसे नहीं मिलता। उस मोधी के समी फल व्यर्थ होते है।(८६)
श्रीवामनपुराण के सरोमाहात्म्य में बाइसवाँ अध्याय समाप्त ॥२२॥