वामन महा पुराण
देवों से अन्धक का युद्ध(पूर्वानुवृत्त)
पुलस्त्य उवाच।
ततः प्रवृत्ते संग्रामे भीरूणां भयवर्धने।
सहस्राक्षो महाचापमादाय व्यसृजच्छरान् ॥ १
अन्धकोऽपि महावेगं धनुराकृप्य भास्वरम् ।
पुरंदराय चिक्षेप शरान् यहिणयाससः ॥२
वायन्योन्यं सुतीक्ष्णायैः शरैः संनतपर्वभिः ।
|रुक्मपुरैर्महायगैराजघ्नतुरुभावपि ॥ ३
वतः क्रुद्धः शतमसः कुलिशं भ्राम्य पाणिना ।
चिक्षेप दैत्यराजाय तं ददर्श तथान्धकः ॥ ४
आजधान च पाणौधैरस्त्रैः शस्त्रैः स नारद ।
छोडने तथा यह कहने टगे कि 'अरे । आओ आओ क्यों रुके हो? (४९)
तीक्ष्ण पाणों की वर्षा करते हुए तथा अमोघ शस्त्रों से प्रहार करते हुए उन लोगों ने मन्दारिनी के वेग सदृश प्रवाहित होने वाली भयकर (रण) नदी को प्रवर्तित क्यिा।
हे नारद । उस युद्ध में नैरोक्य की आकाक्षा वाले उस वेगशाले सुर एव असुरगग पिशाचों एव राक्षसों की पुष्टि बढ़ाने याली शोगित-सरिता को पार करने की इच्छा कर रहे थे। (५१)
(उस समय) देव और असुरों के याजे बज रहे थे आगशमे स्थित मुनियों और सिद्धों के समूह उस युद्ध को देख रहे थे तथा जो धीर समुस युद्ध में मारे गये थे उन्हें अप्सराये (स्वर्ग में) ले जा रही थी। (५२)
श्रीवामनपुराग में नवाँ अध्याय समाप्त।।
पुलस्त्य ने कहा-तदनन्तर भीरओं के लिये भयवर्धक संग्राम आरम्भ होने पर सहस्राक्ष (इन्द्र) महान् धनुष लेफर थाणों को छोड़ने लगे ।
अन्धक ने भी वेगशाली तथा तेजस्वी धनुप लेकर मयूर के पंख याने अनेक पाणे को पुरन्दर (इन्द्र) के ऊपर छोड़ा। (२)
उन दोनों ने एक दूसरे को झुके हुए पर्यो पाले, स्वर्णपुंसयुक्त तथा महावेगवान् वीक्ष्ण पाणों से आहत किया।
तदनन्तर कुद्ध इन्द्र ने हाय से यम को घुमा कर दैत्यराज के ऊपर फें। अन्य ने उसे देसा और- (४)
तान् भस्मसात्तदा चक्रे नगानिव हुताशनः ॥ ५
ततोऽतिवेगिनं वज्रं दृष्ट्वा बलवतां वरः ।
समाप्लुत्य रथात्तस्थौ भुवि पाहु सहायवान् ॥ ६
रथं सारथिना सार्ध साश्वध्वजसकूवरम् ।
भस्म कृत्वाथ कुलिशमन्धकं समुपाययौ ।। ७
तमापतन्तं वेगेन मुष्टिनाहत्य भूतले ।
पातयामास पलवान् जगर्ज च तदाऽन्धकः ॥ ८
तं गर्जमानं वीक्ष्याथ वासव. सायकैदृढम् ।
वयर्प तान् वारयन् स समभ्यायाच्छतक्रतुम् ॥ ९
आजघान तलेनेभं कुम्भमध्ये पदा करे ।
जानुना च समाहत्य विपाणं प्रमभञ्ज च ॥ १०
वाममुष्ट्या तथा पावं समाहत्यान्धकस्त्वरन् ।
गजेन्द्र पातयामास प्रहारैर्जर्जरीकृतम् ॥ ११
गजेन्द्रात् पतमानाच्च अवप्लुत्य शतक्रतुः ।
पाणिना वज्रमादाय प्रविवेशामरावतीम् ॥ १२
पराड्मुखे सहस्राक्षे तद् दैवतरलं महत् ।
पातयामास दैत्येन्द्रः पादमुटितलादिभिः ॥ १३
ततो वैवस्वतो दण्डं परिभ्राम्य द्विजोत्तम ।
समभ्यधावत् प्रह्लादं हन्तुकामः सुरोत्तमः ॥ १४
तमापतन्तं पाणौधैर्ववर्ष रविनन्दनम् ।
हिरण्यकशिपोः पुत्रश्चापमानम्य वेगवान् ॥ १५
तां वाणवृष्टिमतुला दण्डेनाहत्य भास्करिः।
शातयित्वा प्रचिक्षेप दण्डं लोकभयंकरम् ॥ १६
स वायुपथमास्थाय धर्मराजकरे स्थित. ।
जज्वाल कालाग्निनिभो यद्वद् दग्धुं जगत्त्रयम् ।। १७
जाज्वल्यमानमायान्तं दण्डं दृष्ट्वा दितेः सुताः ।
प्राक्रोशन्ति हतः कष्टं महादोज्य यमेन हि ॥ १८
समानन्दितमाकण्य हिरण्याक्षसुतोऽन्धकः ।
प्रोवाच मा भैष्ट मयि स्थिते कोऽयं मुराधमः ॥ १९
इत्येवमुक्त्वा वचनं वेगेनाभिससार च ।
हे नारद । उसने भी बाणों, अखों और शस्त्रों से प्रहार किया। अग्नि जिस प्रकार वृक्षों को भस्म करती है उसी प्रकार उस वन ने उन्हें भस्म कर डाला। (५)
तव बलवानों में श्रष्ठ अन्धक अति वेगवान वन को आते देस कर रथ से फूद कर बाहुवल या आश्रय लेकर पृथ्वी पर खड़ा हो गया। (६)
वह वम सारथि, अश्व, ध्वजा एवं पूनर के साथ रथ को भस्म कर अन्धक के पास आया। (५)
वेगपूर्वक आते हुए उस ( वन ) को बलवान अन्धक ने मुष्टि से प्रहार कर भूमि पर गिरा दिया और गर्जन करने लगा। (८)
उसे गर्जन करन देस वासव (इन्द्र ) ने उसके ऊपर दृढ़ बाणों को वर्षा की। उनको निगरित करत हुए वह शतऋतु के पास आया। (६)
एसने करतल से ऐरावत के कुम्भमध्य मे एवं पैर से सूड पर प्रहार किया तथा जानु से दाँत पर प्रहार कर उसे दोड़ दिया। (१०)
तथा अन्धक ने याममुष्टि से पार्च मे शीघ्रतापूर्वक प्रहार करने से जर्जर हुए गजेन्द्र को गिरा दिया। (११)
गिर रहे गजेन्द्र पर से कूद कर एवं हाथ में वम प्रहण पर इन्द्र अमरायती में चले गए। (१२)
इन्द्र के पराड मुग हो जाने पर उस महती देव-सेना को दैत्येन्द्र ने पद, मुष्टि एव करतल आदि द्वारा (प्रहार फर) (१३)
हे द्विजोत्तम। तदनन्तर देव श्रेष्ठ यम दण्ड घुमाते हुए प्रहलाद को मारने की इच्छा से दौड़ पड़े। (१४) रविनन्दन (यम) को आते देख हिरण्यकशिपु के वेगवान पुत्र प्रहलाद ने धनुप खींच कर पाणों की वर्षा की। (१५)
भास्करनन्दन यमराज ने दण्ड के आघात से उस अतु- सनीय घाण-वृष्टि को नष्ट कर लोकभयकारी दण्ड चलाया। (१६)
धर्मराज के हाथ में स्थित वह दण्ड वायुपथ मे जाकर मानों त्रैलोक्य को दग्ध करने हेतु पालाग्नितुल्य प्रज्वलित होने लगा। (१७)
जावल्यमान दण्ड को आते देस दैत्य लोग चिल्लाने लगे, "हाय ! हाय! यमराज द्वारा प्रहलाद मारे (१८)
उस आमन्दन को सुन पर हिरण्याक्ष-नय अग्धक ने कहा-"डरो मत । मेरे रहते यह सुराधम क्या है?" (१)
हे नारद ! ऐसा कह कर यह वेग से दौड़ा और हँसते
जग्राह पाणिना दण्डं हसन् सव्येन नारद ।। २०
तमादाय ततो वैगाद् भ्रामयामास चान्धकः ।
नगर्ज च महानादं यथा प्रापि तोयदः ॥ २१
प्रसादं रक्षितं दृष्ट्वा दण्डाद् दैत्येश्वरेण हि ।
साधुवादं ददुर्दृष्टा दैत्यदानवयूथपाः ॥ २२
भ्रामयन्तं महादण्डं दृष्ट्वा भानुसुतो मुने ।
दुःसहं दुर्घरं मत्वा अन्तर्धानमगाद् यमः ।। २३
अन्तर्हिते धर्मराजे प्रहादोऽपि महामुने ।
दारयामास बलवान् देवसैन्यं समन्ततः ॥ २४
वरुणः शिशुमारस्थो बद्ध्वा पाशैर्महाऽसुरान् ।
गदया दारयामास तमभ्यागाद् विरोचनः ॥ २५
बोमरैर्वजसंस्प शक्तिभिर्मार्गरपि ।
जलेशं वाडयामास मुद्गरैः कणपैरपि ।। २६
ततस्तं गदयाऽभ्येत्य पातयित्वा धरातले ।
अभिद्रुत्य घयन्धाय पाशर्मत्तगजं बली ॥ २७
वान् पाशान्यतधा चक्रे वेगाच दनुजेश्वरः ।
वरुणं च समभ्येत्य मध्ये जग्राह नारद ॥ २८
ततो दन्ती च शृङ्गाभ्यां प्रचिक्षेप तदाऽव्ययः ।
ममर्द च तथा पद्भ्यां सवाहं सलिलेश्वरम् ॥ २९
तं मर्धमानं वीक्ष्याथ शशाङ्क: शिशिरांशुमान् ।
अभ्येत्य ताडयामास मार्गणेः कायदारणः ॥३०
म तोड्यमानः शिशिरांशुवाण-
रवाप पीडां परमां गजेन्द्रः ।
दुएश्व वेगात् पयसामधीशं
मुहुः पादवलममर्द ॥ ३१
स मृद्यमानो वरुणो गजेन्द्र
पद्यां सुगाढं जगृहे महर्षे ।
पादेपु भूमि फरयोः स्पृशंश्व
मूर्धानमुल्लाल्य पलान्महात्मा ।। ३२
गृह्याङ्गुलीभिश्च गजस्य पुन्छ
कृत्वेह यन्धं भुजगेश्वरेण ।
उत्पाट्य चिक्षेप विरोचनं हि
सकुञ्जरं से सनियन्तृवाहम् ।। ३३
हुए पायें हाथ से उस दण्ड को पकड़ लिया। (२०)
तदनन्तर अन्धक ने उसे लेकर घुमाया और वर्षामालीन मेघ के सदृश मदानाद करते हुए गर्जन किया। (२१)
दैत्येश्वर (अन्धक) के द्वारा दण्ड से प्रहलाद यो रक्षित देय देत्यों एवं दानवों के यूथपति प्रसन्न होकर साधुराद देने लगे। (२२)
हे मुने ! घुमाए जाते महादण्ड को देख सूर्यतनय यम उसे दु सह और दुर्घर समझार अन्तर्धान हो गये। (२३)
हे महामुने ! धर्मराज के अन्तर्हित होने पर यल्यान प्रसाद भी चारों ओर से देवसेना को विदीर्ण करने (२४)
शिशुमार (सूस) पर स्थित घरुण महान असुरों को पाशों से याँध कर गदा द्वारा विदीर्ण करने लगे। तर विरो- चन ने उनका सामना किया। (२५) में
( उसने ) यम के सदृश तोमरों, शक्तियों, याणों, मुद्गरों, फणपों एवं मालों से जलेश को ताडित
किया।
तदनन्तर उसके निम्ट जाकर गदा के आघात से उसे भूतल पर गिराने के उपरान्त दीढ़ कर पाशों द्वारा घल्यान् वरुण ने हाथी को बाँध लिया। (२७)
दनुजेश्वर ने वेगपूर्वक उन पाशों को सैकड़ों एण्डों में तोड़ दिया । हे नारद । वरुण के निकट जाकर उसने उनसे मध्य भाग में पकड लिया। (२८)
तदनन्तर अव्यय दन्ती ने सोगों (दाँतों) द्वारा घरूण को फेंक दिया और अपने पैरों से पाहन सहित परण को कुचल डाला। (२६)
उन्हें मदित होते हुए देस शीत रिरणों वाले शशाफ ने उसके निकट जार पारीर विदीर्ण करने वाले याणों से उसे ताड़ित किया। (३०)
चन्द्र के याणों से ताड़ित गजेन्द्र को अत्यन्त पीड़ा हुई और दुष्ट गजेन्द्र परण को अंगपूर्वक पैरों से पुन पुना मदित करने यया। (३१)
हे महर्षे । कुचले जाते हुए महात्मा यरुण ने द्वापूर्वक हाथी के दोनों पैरों को पकड़ लिया एवं अपने हाथों तया परों से भूमि का स्पर्श करत हुए पलपूर्वक मतक उठा कर अगुलियों से उस हाथी की पृष्ठ परद सर्पराज से विरोचन
क्षिप्तो जलेशेन विरोचनस्तु
सकुञ्जरो भूमितले पपात ।
साई सन्यत्रार्गलहर्म्यभूमि
पुर सुकेशेरिव भास्करेण ॥३४
ततो जलेशः सगदः सपाशः
समभ्यधावद् दिविज निहन्तुम् ।
ततः समानन्दमनुत्तमं हि
मुक्तं तु दैत्यैर्धनरावतुल्यम् ॥ ३५
हा हा हतोऽसौ वरुणेन वीरो
विरोचनो दानवसैन्यपाल ।
प्रहाद है जम्भकुजम्भकाया
रक्षध्वमभ्येत्य सहान्धकेन ॥३६
अहो महात्मा बलवाञ्जलेशः
संचूर्णयन् दैत्यभर्ट सवाहम् ।
पाशेन बद्ध्या गदया निहन्ति
यथा पशु वाजिमखे महेन्द्रः ॥ ३७
श्रुत्याथ शब्दं दितिजैः समीरितं
जम्भप्रधाना दितिजेश्वरास्ततः ।
समभ्यधावंस्त्वरिता जलेश्वरं
यथा पतझा ज्वलित हुताशनम् ।। ३८
वानागतान् वै प्रसमीक्ष्य देवः
प्राहादिमुत्सृज्य वितत्य पाशम् ।
गदा समुभ्राम्य जलेश्वरस्तु
दुद्राव तान् जम्भमुखानरावीन् ॥ ३९
जम्भं च पाशेन तथा निहत्य
तार तलेनाशनिसंनिभेन ।
पादेन वृत्रं तरसा कुजम्भ
निपातयामास पल च मुष्ट्या ॥ ४०
तेनार्दिता देववरेण दैत्याः
संपाद्रवन् दिक्षु विमुक्तशस्त्राः।
ततोऽन्धकः सत्वरितोऽभ्युपेयाद्
रणाय योद्धु जलनायकेन ॥ ४१
तमापतन्त गदया जघान
पाशेन पद्ध्वा वरुणोऽसुरेशम् ।
तं पाशमाविध्य गदां प्रगृह्य
चिक्षेप दैत्यः स जलेश्वराय ॥ ४२
को बाँध कर उसके हाथी, नियन्ता एव वाहन के साथ उठाकर आकाश में फेंक दिया। (३२-३३)
वरण द्वारा फेंका गया विरोचन हाथी सहित पृथ्वी पर इस प्रकार गिरा जैसे भारवर द्वारा सुफेशी राक्षस का अट्टा लियाओं, यन्त्रों, अलाओं एव प्रासादों से युक्त नगर गिराया गया था।
तनन्तर वरण, गदा और पाश लेकर दैत्य को मारने के लिये दौड़े। तब दैत्यगण मेघ के गर्जन के सदृश आक न्दन करने लगे. (३५)
"हाय हाय । राक्षस सेना के रक्षक वीर विरोचन वरण द्वारा मारे जा रहे हैं। हे प्रहलाद् । जम्भ । बुजम्भादि । अन्धक के साथ आकर उन्हें बचाओ। (३६)
हाय । महात्मा पलवान् वरुण वाहन सहित दैत्यवीर फो चूर्ण करते हुए पाश से याँधकर गदा द्वारा इस प्रकार मार रहे हैं जैसे अश्वमेध यज्ञ में इन्द्र पशु का वध करते हैं। (३७)
तदनन्तर दैत्यों के द्वारा कहे गये शब्द को सुन कर जम्भ प्रमुख दैत्य गण वरुण की ओर इस प्रकार शीघ्रता से दौड़े जैसे पतङ्ग प्रज्वलिन अग्नि की ओर झपटते हैं। (३८)
उन्हें आया देस वरण प्रहलाद-पुत्र ( विरोचन) को छोड पाश फैला कर और गदा घुमा कर उन जम्भप्रभृति शत्रुओं की ओर दौडे। (३९)
उन्होंने जम्भ को पाश से, तार-दैत्य को वम तुल्य कर तल के प्रहार से, वृत्रासुर को पैर से, वेगपूर्वक फुजम्भ को और बल नामक असुर को मुक्के से गिरा दिया। (४)
उन देवप्रयर द्वारा मदित दैत्य शत्रों को छोड़ कर दिशाओं मे भाग गए। तदनन्तर अन्धक वरुण के साथ युद्ध करने के लिये शीघ्रतापूर्वक वहाँ आया । (४१)
उस आ रहे असुरेश्वर को परण ने पाश से पाँध कर गदा से मारा । उस पाश और गदा को छीन कर दैत्य ने वरुण पर पंका। (४२)
समाजघानाथ हुताशनं हि
बरायुधेनाथ वराङ्गमध्ये ।
समाहतोऽग्निः परिमुच्य शम्बरं
तथाऽन्धकं स त्वरितोऽभ्यधावत् ॥ ५२
तमापतन्तं परिघेण भूयः
समाहनन्मूनि वदान्धकोऽपि ।
स ताडितोऽग्निर्दितिजेश्वरेण
भयात् प्रदुद्राय रणाजिराडि ॥ ५३
वतोऽन्धको मारतचन्द्रभास्करान्
साध्यान् सरद्राविवसन महोरगान् ।
यान् याञ्शरेण स्पृशते पराक्रमी
पराङ्मुखांस्तान्कृतवान् रणाजिराव ।। ५४
ततो विनित्यामरसैन्यमुन
सेन्द्रं सरुद्रं सयमं ससोमम् ।
संपूज्यमानो दनुपुंगवैस्तु
तदाऽन्धको भूमिमुपाजगाम ॥ ५५
आसाध भूमि करदान् नरेन्द्रान्
कृत्वा वशे स्थाप्य चराचरं च ।
जगत्समग्रं प्रविवेश धीमान्
पातालमायं पुरमश्मकाहम् ॥ ५६
तत्र स्थितस्यापि महाऽसुरस्य
गन्धर्वविद्याधरसिद्धसंघाः।
सहा-सरोभिः परिचारणाय
पातालमभ्येत्य समावसन्त ॥ ५७
इति श्रीवामनपुराणे दशमोऽध्याय ॥१०॥
उसने श्रेष्ठ आयुध के द्वारा अग्नि के शिर पर प्रहार किया। इस प्रकार आहत अग्नि शम्बर को छोड कर तत्काल अन्धक की ओर दौड़े। (५२)
अन्धक ने आ रहे अग्नि के मस्तक पर पुन परिघ से प्रहार किया। दितिजेश्वर द्वारा ताडित अग्निदेव भयभीत हो रणक्षेत्र से भाग गए। (५३)
तदनन्तर पराक्रमी अन्धक ने वायु, चन्द्र, भास्कर, साभ्य, रुद्र, अश्विनीकुमार, बसु और महानागों में जिन- जिनको धाण से स्पर्श किया वे सभी युद्धभूमि से पराङ्मुख हो गये। (५४)
तदनन्तर इन्द्र, रुद्र, यम, सोम सहित देवताओं की उप्र सेना को जीत कर अन्धक श्रेष्ठ दानवों के द्वारा पूजित होते हुए भूतल पर आ गया। (५५)
भूमि पर आकर, नरपतियों को करद बना कर तथा समस्त चराचर जगत् को वशीभूत कर धीमान् ( अन्धक) पाताल में स्थित अपने अश्मक नामक उत्तम नगर में प्रविष्ट (५६)
यहाँ पर स्थित महासुर की सेवा करने के लिए अप्सराओं के साथ गन्धर्व, विद्याधर एवं सिद्धों के समूह पाताल में आकर निवास करने लगे। (५७)
श्रीवामनपुराण में दसवाँ अध्याय समाप्त ॥१०॥