वामन महा पुराण
गालव-वृत्ताम्त चिचाङ्गदा द्वारा वेदवती से अपने वृसान्त का वर्णन वेदवती वृतान्त इन्द्रघुम्न प्रभूति द्वारा कन्याओ का अन्वेषण वृत्तान्त द्वारा जाबालि की जटाओ से मुक्ति र्कापरुपधारी विश्वकर्मा की शापमुक्ति इन्द्रद्युम्न आदि का सप्तगोदावर मे आगमन, कन्याओ द्वारा शिव की स्तुति, सप्तगोदावर में सभी का एकत्र सम्मेलग घृताची द्वारा चिवाङ्गदा को आश्वासन चारों कन्याओं का विवाह
दण्डक उवाच ।
एतस्मिन्नन्तरे बाले यक्षासुरसुते शुभे ।
समागते हरं द्रष्टुं श्रीकण्ठं योगिनां वरम् ॥ १
ददृशाते परिम्लानसशुष्ककुसुमं विभुम् ।
पहुनिर्मालल्यसंयुक्तं गते तस्मिन् ऋतध्वजे ॥ २
ततस्तं वीक्ष्य देवेशं ते उभे अपि कन्यके ।
स्नापयेतां विधानेन पूजयेतामहर्निशम् ॥ ३
ताभ्यां स्थिताभ्यां तत्रैव ऋपिरम्यागमद् वनम् ।
द्रष्टुं श्रीकण्ठमव्यक्तं गालयो नाम नामतः ।। ४
स दृष्ट्या कन्यकायुग्मं कस्येदमिति चिन्तयन् ।
प्रविवेश शुचिः स्नात्वा कालिन्धा विमले जले ।
ततोऽनुपूजयामास श्रीकण्ठं गालवो मुनिः ।
गायेते सुस्वरं गीतं यक्षासुरसुते ततः ॥ ६
ततः स्वरं समाकर्ण्य गालवस्ते अमानत |
गन्धर्वकन्यके चैते संदेहो नात्र विद्यते ॥ ७
संपूज्य देवमीशानं गालवस्तु विधानतः ।
कटी हुई शाखा के साथ भारवाही तपोधन बाण की सीढ़ियों के मार्ग से वृक्ष के नीचे उतरे । (७८)
राजा के धनुर्धारी पुत्र द्वारा अपने पुत्र की रक्षा हो जाने के उपरान्त ऋतमज भारवाही जाबालि के साथ सूर्य-पुत्री ( यमुना ) नदी के तट पर गए।(७६)
श्रीवामनपुराव भे अडतीसवाँ अध्याय समाप्त ।।३८।।
३९
दण्डक ने कहा-हे बाले। इसी धीच यक्ष और अरुर दोनों की कन्याएँ योगियों में श्रेष्ठ श्रीकण्ठ महादेव का दर्शन करने आई।
उन ऋतध्वज के चले जाने के कारण उन दोनों ने देखा कि महादेव के (चतुर्दिक ) म्लान एवं शुष्क पुष्प तथा प्रचुर निर्माल्य पड़ा है।
तदनन्तर उस देवेश का दर्शन कर वे दोनों कम्पाएँ विधिपूर्वक अहोरात्र श्रीकण्ठ को स्नान कराने एवं उनस पूजन करने लगीं। (३)
उन दोनों के घहीं रहते समय गालव नामक ऋषि अव्यक्त स्वरूप श्रीकण्ठ का दर्शन करने के लिए इस वन में आये।(४)
उन्होंने दोनों कन्याओं को देखार 'ये किसकी कन्याएँ है ऐसा सोचते सुए कालिन्दी के विमल जल मे प्रवेश किया। स्नान करने के बाद पवित्र होकर गालव ऋषि ने श्रीकण्ठ महादेव की पूजा की। तदनन्तर यक्ष और असुर दोनों की कन्याओं ने मधुर स्वर से गान किया।
तदुपरान्त (उनके) स्वर को सुनकर गालव ने यह समझा कि ये दोनों निस्सन्देह गन्धर्व की कन्याएँ हैं। (७)
गालव ने विधिपूर्वक श्रीकण्ठदेव की पूजाकर जप
कृतजप्यः समध्यास्ते कन्याम्यामभिवादितः ॥ ८
ततः पप्रच्छ स मुनिः कन्यके कस्य कथ्यताम् ।
कुलालङ्कारकरणे भक्तियुक्त भवस्य हि ॥ ९
तमूचतुर्म निश्रेष्ठं याथातथ्यं शुभानने ।
जातो विदितवृत्तान्तो गालवस्तपतां वरः ॥ १०
समुष्य तत्र रजनीं वाम्यां संपूजितो मुनिः।
प्रातल्याय गौरीशं संपूज्य च विधानतः ॥ ११
ते उपेत्याप्रवीवास्ये पुष्करारण्यमुत्तमम् ।
आमन्त्रयामि वा कन्ये समनुज्ञातुमर्हथः ॥ १२
सतम्तै ऊचतुर्ब्रह्मन् दुर्लभं दर्शनं तर ।
किमर्थ पुष्करारर्ण्य भवान् यास्यत्यथादरात् ।। १३
ते उवाच महातेजा महत्कार्यसमन्वित ।
कार्तिकी पुण्यदा माविमासान्ते पुष्करेषु हि ॥ १४
ते ऊचतुर्वयं यामो भवान् यत्र गमिष्यति ।
नं त्वया स्म विना ब्रह्मनिह स्थातुं हि शक्नुवः ॥ १५
याढमाह ऋषिश्रेष्ठस्ततो नत्वा महेश्वरम् ।
गते ते ऋपिणा साई पुष्करारण्यमादरात् ॥ १६
तथाऽन्ये अपयस्तत्र समायाताः सहस्रशः ।
पार्थिवा जानपद्याश्च मुक्त्वैकं तमृतध्वजम् ॥ १७
ततः स्नाताश्च कार्तिस्यामृपयः पुष्करेष्वथ ।
राजानश्च महाभागा नाभागेक्ष्वाकुसंयुताः ॥ १८
गालबोऽपि समं ताम्यां कन्यकाम्यामवात रन् ।
स्नातुं स पुष्करे तीर्थे मध्यमे धनुषाकृतौ ॥ १९
निमग्नश्चापि ददृशे महामत्स्यं जलेशयम् ।
यहीभिर्मत्स्यकन्याभिः प्रीयमाणं पुनः पुनः ॥२०
स तायाह तिमिर्मुग्धाः यूयं धर्म न जानथ ।
जनापवादं घोरं हि न शक्तः सोढुमुल्नणम् ॥ २१
तास्तमूचुमहामत्स्यं किं न पश्यसि गालवम् ।
किया। तदनन्तर दोनों ग्याओं से अभिवादित होकर वे बैठ गये।
तत्पश्चात् उन मुनि ने पूछा-यह बतलाओ कि कुला- लकार स्वरूप एवं शंकर मे भक्ति करने वाली तुम दोनों किसकी कन्याएँ हो?
हे शुभानने ! दोनों कन्याओं ने मुनिश्रेष्ठ से यथार्थ वृत्तान्त बतलाया तब श्रेष्ठ तपस्वी गालव यो सम्पूर्ण वृत्तान्त विदित हो गया। (१०)
उन दोनों से पूजित मुनि ने यहाँ रात्रि में निवास किया। प्रातःकाल उठकर उन्होंने विधानपूर्वक गौरीश शंवर का पूजन किया। (११)
तदनन्तर उन दोनों के समीप जाकर उन्होंने कहा- में परमभेष्ठ पुपर घन मे जाऊँगा। मैं तुम दोनों की अनुमति चाहता हूँ। मुझे अनुमति दो। (१२)
तदुपरान्त उन दोनों ने कहा-हे प्रझन् । आपका दर्शन दुर्लभ है। आप आदर पूर्वक पुपरारण्य मे क्यों जा रहे हैं। (१३)
महतार्थ युक्त महातेजस्वी (मुनि) ने उन दोनों से पदा-आगे मासान्त में कात्तिरी पूर्णिमा होगी जो पुपर में दुप्पर पुण्यदायिनी है। (१४)
उन दोनों ने पहा-आप जहाँ जायेंगे हम भी यही चलेंगी। हे ब्रह्मन् । आपके बिना हम यहाँ नहीं रह सकतीं। (२५)
पिश्चेष्ट ने कहा-ठीक है। तदनन्तर महेश्वर को प्रणाम कर ऋपि के साथ वे दोनों आदर पूर्वक पुप्फरारण्य (१६)
वहाँ केवल उन ऋतम्बज पो छोड़कर सहस्रों ऋपि, राजा एवं जनपद निवासी एकत्रित हुए। (१७)
तदनन्तर ऋपियों एवं नाभाग तथा इक्ष्याकु आदि महाभाग्यवान राजाओं ने कार्तिक पूर्णिमा के दिन पुमर तीर्थ मे स्नान किया। (१८)
गालय भी उन दोनों कन्याओं के साथ धनुप के समान आकार वारे मध्यम पुष्कर तीर्थ में स्नान करने के लिये उतरे।(१९)
(जलम) निमग्न होने पर उन्होंने देखा कि एक महा- मत्स्य जल में स्थित है एवं अनेक मत्स्य-यन्याएँ यारंवार उसे प्रसन्न करने में रगी है। (२०)
उस मस्य ने इन (मठलियों) से कहा-मुग्ध होने के कारग तुम सभी धर्म नहीं जानती। में वीरग एवं भयङ्कर जनापवाद नहीं सहन फर सरना । (२१)
उन सभी (मदलियों) ने कहा-क्या तुम दो कन्याओं
तापस कन्यकाभ्यां चै विचरन्तं यथेच्छया ॥२२
यद्यसावपि धर्मात्मा न निभेति तपोधनः ।
जनापवादात् तरिक त्वं विभेपि जलमध्यगः ॥ २३
ततस्ताचाह स तिमिनैप पेत्ति तपोधनः।
रागान्धो नापि च भयं विजानाति सुगलिशः ॥ २४
तच्छ्रुत्वा मत्स्यवचनं गालयो जीडया युतः ।
नोत्तत्तार निमग्नोऽपि तस्थौ स विजितेन्द्रियः ॥ २५
लात्या ते अपि रम्भोरू समुत्तीर्य तटे स्थिते ।
प्रतीक्षन्त्यौ मुनिवर तदर्शनसमुत्सुकै ॥ २६
वृत्ता च पुष्फरे यात्रा गता लोका यथागतम् ।
ऋपय. पार्थिवाश्चान्ये नाना जानपदास्तदा ॥ २७
वत्र स्थितेका सुदती विश्वकर्मवनूरुहा ।
चित्रागदा सुचार्यश्री वीक्षन्ती तनुमध्यमे ॥ २८
ते स्थिते चापि वीक्षन्त्यो प्रतीक्षन्त्यो च गालवम् ।
सस्थिते निर्जने तीर्थे गालयोऽन्वजले तथा ॥ २९
वतोऽभ्यागाद् वेदवती नाम्ना गन्धर्वकन्यका ।
पर्जन्यवनया साध्वी घृताचीगर्भसंभया ।। ३०
सा चाम्येत्य जले पुण्ये स्नात्वा मध्यमपुष्करे ।
ददर्श कन्याश्तियमुनयोस्वटयो. स्थितम् ।। ३१
चित्राङ्गदामथाम्येत्य पर्यपृच्छदनिष्टरम् ।
कासि केन च कायेंण निर्जने स्थित्वत्यसि ॥ ३२
सा तामुवाच पुत्री मां विन्दस्व सुरवर्धकैः ।
चित्राङ्गदेति सुश्रोणि विरयाता विश्वकर्मणः ॥ ३३
साहमभ्यागता भद्रे स्नातु पुण्यां सरस्वतीम् ।
नैमिपे काञ्चनाहीं तु विख्यातां धर्ममातरम् ॥ ३४
तत्रागताथ राज्ञाऽहं दृष्ट्वा चैदर्भकण हि ।
सुरथेन स कामाता मामेव शरणं गतः ।। ३५
मयात्मा तस्य दत्तश्च ससीभिवार्यमाणया।
के साथ यथेच्छ विचरण करने वाले तपस्वी गाल्व को नहीं देख रहे हो? (२२)
यदि धर्मात्मा एव तपस्वी होते हुए भी वे जनापवाद से भयभीत नहीं होते तो जल में रहने वाले आप क्यों डर रहे हैं? (२३)
तदनन्तर उस तिमि (मत्स्य) ने उनसे कहा- यह रागान्ध तपस्वी जनापवाद को नहीं जानता एव मूर्खतावश जनापवादजन्य भय को भी नहीं जानता। (२४)
मरस्य के उस पचन को सुनकर गालब लज्जित हो गये। वे जितेन्द्रिय उपर नहीं आये, भीवर ही डूचे रहे। (२५)
वे दोनों सुन्दरियाँ स्नानोपरान्त जल से निकल कर तट पर खड़ी हो गई एव मुनिश्रेष्ठ के दर्शन के लिए उत्सुकता पूर्वक उनकी प्रतीक्षा करने लगी। (२६)
पुष्कर की यात्रा समाप्त होने पर सभी ऋपि, राजा और नगरवासी लोग जहाँ से आये थे वहाँ चले गये। (२७)
वहाँ केवल सुन्दर दातों वाली एव शोभनाङ्गी विश्वकर्मा की पुत्री चिनागदा उन दोनों वृशोदरी (कन्याओं को) देखती हुई खड़ी थी। (२८)
ये दोनों भी देखती हुई एव गालब री प्रवीक्षा करती हुई
निर्जन तीर्थ में खड़ी रहीं एवं गाल्ब जल के भीतर ही रहे। (२९)
तदनन्तर वेदवती नामक गन्धर्य-कन्या यहाँ आई। वह साध्वी घृताची के गर्भ से उत्पन्न पर्जन्य नामक गन्धर्व की पुत्री थी। (३०)
उसने आफर मध्यम पुष्कर तीर्थ के पवित्र जल मे स्नान किया और दोनों तटों पर अपस्थित तीन कन्याओं को देखा।
तदनन्तर चिनागदा के पास जाकर उसने मृदुता पूर्वक पूछा-तुम कौन हो ? किस कार्य से इस निर्जन स्थान मे स्थित हो? (३२)
उस (चित्रागदा) ने उस ( वेदवती ) से कहा-हे सुन्दर नितम्बोंवाली । मुझे देवशिल्पी विश्वकर्मा की चिनागदा नाम से प्रसिद्ध पुनी जानो । (३३)
हे भद्रे। वह (मैं) नैमिष में धर्म की जननी काचनाक्षी नाम से विख्तात पवित्र नदी में स्नान करने गई थी) यहाँ जाने पर विदर्भ-वशीय राजा सुरथ ने मुझे देखा और कामात होकर मेरी शरण में आया । (३५)
ससियों के मना करने पर भी मैंने सन्हें आत्मसमर्पण कर दिया। तदनन्तर पिता के शाप से मैं राजा से वियुक्त
ततः शमाऽस्मि तातेन वियुक्तास्मि च भूभुना ॥ ३६ ।
मर्तु कृतमतिर्भद्रे वारिता गुह्यकेन च ।
श्रीकण्ठमगमं द्रष्टुं ततो गोदावरं जलम् ॥ ३७
तम्मादिम समायाता तीर्थप्रवरमुत्तम् ।
न चापि दृष्ट' सुरथः स मनोवादनः पतिः ॥ ३८
भवती चात्र का याले वृत्ते यात्राफलेऽधुना।
समागता हि तच्छंम मम सत्येन भामिनि ॥ ३९
सामवीच्छ्यतां याऽस्मि मन्दभाग्या कृशोदरी ।
यथा यात्रोफले वृत्ते समायाताऽस्मि पुष्करम् ॥ ४०
पर्जन्यस्य घृताच्या तु जाता वेदवतीति हि ।
रममाणा वनोद्देशे दृष्टाऽस्मि कपिना ससि ॥ ४१
स चाम्येत्याप्रवीत् का त्व यासि दवयतीति हि ।
आनीवास्थाश्रमात् केन भूपृष्ठान्मेरुपर्वतम् ॥ ४२
वतो मयोक्यो नैयास्मि कपे टेयवतीत्यहम् ।
नाम्ना चैदवतीत्येव मेरोरपि कृताश्रया ॥ ४३
ततस्तेनातिदुष्टेन वानरेण घभिद्रुता ।
समारूढामि सहसा पन्धुजीवं नगोत्तमम् ।। ४४
तेनापि वृक्षस्तरसा पादाक्रान्तस्त्वभज्यत ।
ततोस्य विपुलां शासा समालिङ्गय स्थिता त्वम् ।। ४५
तत. प्लवङ्गमो वृक्षं प्रापिन् सागराम्भसि ।
सह तेनैव वृक्षण पतितास्म्यहमाकुला ॥ ४६
ततोम्परतलाद् वृक्षं निपतन्त यदृच्छया।
ददृशुः सर्वभूतानि स्थावराणि चराणि च ॥ ४७
ततो हाहाकृत लोकैमा पतन्ती निरीक्ष्य हि ।
ऊचुश्च सिद्धगन्धवाः कष्ट सेयं महात्मनः ॥ ४८
इन्द्रधम्नस्य महिपी गदिता ब्रह्मणा स्वयम् ।
मनो. पुनस्य वीरस्य सहस्रक्रतुयाजिन. If ४९
ता वाणी मधुरा श्रुत्वा मोहमस्म्यागता दतः ।
न च जाने स केनापि वृक्षश्छिन्न. सहस्रधा ॥ ५०
ततोऽस्मि वेगान बलिना हृतानलसरीन हि ।
हो गयी। (३६)
हे भद्रे । मैंने मरने का विचार किया किन्तु गुह्यक ने मुझे रोक दिया। उसके बाद मैं श्रीकण्ठ के दर्शन हेतु गई और यहाँ से गोदावर जल के निकट गयी। (३७)
यहाँ से मैं इस श्रेष्ठ उत्तम तीर्थ मे आयी। किन्तु ये मन को प्रसन्न करने वाले पति सुरथ मुझे नहीं दिखलाई पड़े। (३८)
पाले। यानाफल समाप्त हो जाने पर आज यहाँ आने वाली आप यौन हैं? हे भामिनि । मुझे सत्य सत्य बताओ। (३९)
उसने पहा-दे पृशोदरि। मैं मन्दागिनी पौन तथा यात्रापल समाप्त होने पर पुष्कर मे क्यों भाइ हूँ, उसे सुनो। (१०)
में पृताची के गर्भ से उत्पन्न वेदवती नामक पर्जन्य को पुत्री हूँ। हे ससि। धनप्रदेश में घूम रही मुसको एक यानर ने देखा। (४१)
उसने समीप आरर कहा-तुम कौन हो । यहाँ जा।। रही हो ? (निश्चय ही तुम) देवरती हो। पृथ्वी पर स्थित थाम से मेरु पर्वत पर तुम्हें कौन लाया है ? (४२)
इस पर मैंने कहा-हे यानर । में देवपती नहीं हूँ
मेरा नाम वेदयती है । में मेरुपर्वत पर ही रहती हूँ। (४३)
तदनन्तर उस अति दुष्ट यानर ने मेरे ऊपर आक्रमण कर दिया। मैं सहसा यन्धुजीव के उत्चम वृक्ष पर चढ गयो। (४४)
उसने भी वेगपूर्वक पैर से प्रहार कर वृक्ष को तोड़ दिया। तदनन्तर में उसरी एक बड़ी शासा को परड़ पर स्थित रही।(४५)
तदुपरान्त वानर ने उस वृक्ष को समुद्र के जल में फेंक दिया। में अत्यन्त व्याकुल होपर उस वृक्ष के साथ ही जल में गिर पड़ी। (४६)
तदनन्तर सभी घराचर प्राणियों ने आगश से गिरने वाले उस वृक्ष को देखा। (४७)
तत्पश्चात् मुझसे गिरता देसार सभी लोग हाहाकार करने लगे। सिद्ध और गन्धयं लोग कहने लगे-हाय । यह कष्ट की पात है। ब्रह्मा ने स्वय कहा है कि यह कन्या मनु के योर पुन सहस यहां के कर्वा इन्द्रद्युम्न की महिषी होगी। (१८-४९)
इस मधुर यागी को सुनने के उपरान मुझे मूच्या आ गई। मैं नही जानी रि क्सिने उस वृक्ष को सहस्रों टुरदों में काट डारा। (५०)
तदनन्तर अग्नि के मित्र पलयान यायु बेगपूर्वक मुझे
समानीतास्म्यहमिमं त्वं दृष्ट्या चाद्य सुन्दरि ॥ ५१
तदुत्तिष्ठस्व गच्छावः पृच्छायः क इमे स्थिते ।
कन्यके अनुपश्ये हि पुष्करस्योत्तरे वटे ॥ ५२
एवमुक्त्या वराङ्गी सा तया सुतनुकन्यया ।
जगाम कन्यके द्रष्टुं प्रष्टुं कार्यसमुत्सुका ।। ५३
ततो गत्वा पर्यपच्छत् ते ऊचतुरुमे अपि ।
याथातथ्यं तयोस्वाम्यां समात्मानं निवेदितम् ॥ ५४
ततस्ताश्चतुरोपीह सप्रगोदावरं जलम् ।
संप्राप्य तीर्थे तिष्ठन्ति अर्चन्त्यो हाटकेश्वरम् ।। ५५
ततो बहून् वर्षगणान् वनमस्ते जनास्त्रयः ।
तासामर्थाय शकुनि गालि समतध्वजः ॥ ५६
भारवाही ततः सिनो दशान्दशतिक गते ।
काले बगाम निवेदात् समं पित्रा तु शाकलम् ।। ५७
तस्मिन्नरपतिः श्रीमानिन्द्रधुम्नो मनोः सुतः ।
समध्यास्ते स विज्ञाय सापात्रो पिनिर्ययौ ॥ ५८
सम्यक् संयूजितस्तेन सजावालिमतमतः ।
स चे वासुतो धीमान् शकुनि जोर्चितः ॥ ५९
ततो वाक्य मुनिः प्राह इन्द्रधुम्नं ऋतध्वजः ।
राजन् नटालास्माकं नन्दयन्तीति निश्रुता ।। ६०
तस्याथै चैव वसुधा अस्माभिरटिता नृप ।
तस्मादुनिष्ठ मार्गस साहाय्यं कर्तुमर्हसि ॥ ६१
अथोवाच नृपो ब्रह्मन् ममापि ललनोत्तमा ।
नष्टा कृतश्रमस्यापि कस्याहं कथयामि ताम् ॥ ६२
आकाशात् पर्वताकास पतमानो नगोत्तमः ।
सिद्धाना वाक्यमाकर्ण्य याणश्छिन्नः सहस्रधा ॥ ६३
न चैव सा परारोहा पिमिन्ना लाघवान्मया।
नवजानामि सा कुत्रतस्माद् गच्छामि मार्गितुम् ॥ ६४
इत्येवमुक्त्वा स नृपः समुत्थाय त्वरान्वितः ।
यहाँ लाये है । हे सुन्दरी! तुमसे आज यहाँ मेरो भेट हुई है।
इसलिए उठो, हम दोनों चलें, पूँछे और देखें कि पुष्कर तीर्थ के उत्तरी किनारे पर विद्यमान ये दोनों कन्याएँ कौन है? (५२)
ऐसा कहकर कार्य में उत्सुक वह सुन्दरी उस सुन्दर वथा वृश अगवाली कन्या के साथ दोनों कन्याओं को देखने तथा पूछने के लिए यहाँ गयी । (५३)
तदनन्तर वहाँ जारर उसने पूछा। उन दोनों ने अपना यथार्थ वृत्तान्त उन दोनों से कहा । (५४)
तदुपरान्त चारों कन्यायें सप्तगोदावर के जल के निकट जार हाटकेश्वर की पूजा करती हुई वीर्थ में रहने लगी।
तदनन्तर शकुनि, जाबालि और ऋतचज ये तीनों व्यक्ति उन कन्याओं के लिए अनेक वर्षों तक भ्रमण परते रहे।
तदुपरान्त एक सइस वर्ष व्यतीत हो जाने पर भार पाही खिन्न (जाबालि) उदास होकर पिता के साथ शाकल जनपद में चले गये। (५७)
वहाँ मनु के पुत्र श्रीमान् राजा इन्द्रद्युम्न नियास कर रहे थे। समाचार जानकर वे अर्धपात्र हाथ मे लिए बाहर निकले।
उन्होंने जाबालि और ऋतधज की विधि पूर्वक सुन्दर ढग से पूजा की तथा उस इक्ष्वाकुनन्दन बुद्धिमान भतीजे शकुनि की भी पूजा की। (५६)
तदनन्तर अउत्तध्वज मुनि ने इन्द्रद्युम्न से कहा- राजन् । नन्दयन्ती नाम से विख्यात हम रोगों की अबला कन्या खो गयी है। (६०)
हे राजन् ! उसके लिए हमलोगों ने वसुधा का भ्रमण किया है। इसलिए उठिए, खोजिए और हमारी सहायता कीजिए।(६१)
सदुपरान्त राजा ने कहा-हे ब्रह्मन् । मेरी भी एक उत्तम कन्या खो गयी है। उसको सोजले मे में परिश्रम कर चुका हूँ। मैं उसके विषय में किससे कहूँ। (१२)
सिद्धों का वचन सुनकर आकाश से गिरने वाले पर्वताफार श्रेष्ठ वृक्ष को मैने घाणों से सहस्रों टुकड़ों मे काट डाला।
मैने कुशलता से उस सुन्दरी कन्या को चोट नहीं आने दी। मैं नहीं जानता कि यह कहाँ है ? अत उसे खोजने के लिए में चल रहा हूँ। (६४)
ऐसा कहने के उपरान्त वे राजा शीघ्रता पूर्वक उठे
स्यन्दनानि द्विजाभ्यां स भावपुत्राय चार्पयत् ।। ६५
तेऽधिरुह्य रथांस्तूर्ण मार्गन्ते वसुधां फ्रमात् ।
यदर्याश्रममासाद्य ददृशुस्तपसां निधिम् ॥ ६६
तपसा कशित दीनं मलपङ्कजटाधरम् ।
निःश्वासायासपरमं प्रथमे वयसि स्थितम् ॥ ६७
तमुपेत्याब्रवीद् राजा इन्द्रधुम्नो महाभुजः ।
तपस्विन् यौवने घोरमास्थितोऽसि सुदुश्चरम् ॥ ६८
तपः किमर्थं तच्छंस किमभिनेतमुच्यताम् ।
सोऽब्रवीत् को गवान् ब्रूहि ममात्मानं मुहृत्तया ॥ ६९
परिपृच्छसि शोकात परिसिन्नं तपोन्वितम् ।
स प्राह राजाऽस्मि विभो तपस्विन् शाकले पुरे ॥ ७०
मनोः पुत्रः प्रियो भ्राता इस्याकोः कथित तय ।
स चास्मै पूर्वचरितं सर्व कथितवान् नृपः ॥ ७१
श्रुत्वा प्रोगाच राजर्षिर्मा सुश्चम्प कलेवरम् ।
आगच्छ यामि तन्यही विचेतुं भ्रातृजोऽसि मे ॥७२
इत्युक्त्वा संपरिष्यज्य नृपं धमनिसंततम् ।
समारोप्य रथं तूर्ण तापसाभ्यां न्यवेदयत् ।। ७३
सतध्वजः सपुत्रस्तु तं दृष्ट्वा पृथिवीपतिम् ।
प्रोवाच राजन्नेोहि करिष्यामि तव प्रियम् ॥७४
यासौ चित्राङ्गदा नाम त्वया दृष्टा हि नैमिये ।
सप्तगोदावरं तीर्थ सा मयैव विसर्जिता ॥ ७५
तदागच्छथ गच्छामः सौदेवस्यैव कारणात् ।
सत्रास्माकं समेष्यन्ति कन्यास्तित्रस्तथापराः ॥ ७६
इत्येवमुस्त्या स झपिः समावास्य सुदेवजम् ।
शकुनि पुरतः कृत्वा सेन्द्रधुम्नः सपुत्रकः ॥ ७७
स्यन्दनेनाथयुक्तेन गन्तुं सम्पचक्रमे ।
सप्तगोदावरं तीर्थ यत्र ताः कन्यका गताः ॥ ७८
एतस्मिन्नन्तरे तन्वी घृताची शोकमंयुता ।
विचचारोदयगिरि विचिन्नन्ती सुतां निजाम् ॥ ७९
तमाससाद च कपि पर्यपृच्छद तथाप्सराः।
किं याला न त्वया दृष्टा कपे सत्यं वदस्य मा ।। ८०
एवं उन दोनों ब्राह्मणों तथा अपने भ्रातृज को रथ प्रदान किया।
वे रथों पर आरूढ होकर शीघ्रता से क्रमानुसार पृथ्वी पर अन्वेषण करने लगे। घरिवाश्रम मे पहुँच कर उन लोगों ने तप से कृश, धूल मिट्टी से भरे, जटाधारी जोर-जोर से साँस ले रहे एक तपोनिधि युवक को देखा। (६६-६७)
उसके समीप जाकर महापाहु राजा इन्द्रद्युम्न कहा-हे तपस्विन् । यह बतलाओ कि युवावस्था मे ही तुम सुदुश्चर घोर तप क्यों कर रहे हो? यह भी बतलाओं कि तुम्हारा क्या अभीष्ट है ? उसने कहा-आप मुझे यह पतलायें कि शोरा, अतिसिन्न एव तपोन्वित मुमसे सौहार्द पूर्वक पूछने पाने आप कौन है ? एराने पहा-दे वरस्विर । हे विभो ! में मनु फा पुन एवं इस्या का प्रियभ्राता शारटपुर का राजा हूँ। सस राजा ने भी एनसे समरा पूर्व वृत्तान्त कह दिया । (६८-७२)
उपर्युक घातों को सुनकर राजर्षि ने कहा-शरीर मत छोड़ो। तुम मेरे भतीजे हो। आओ उस मुन्दरी का अन्वेपण करने चलें।(७२)
इतना पहफर उन्होंने उभरी शिराओं से आच्छन्न राजा फा आलिङ्गन किया एवं उन्हें रथ पर चढ़ा पर शीघ्र उन दोनों तपस्वियों के सामने पहुंचा (७३)
पुत्र के साथ ऋनभ्यज ने उन राजा को देखकर कहा-हे राजन् । आइये आइये, मैं आपका प्रिय कार्य करूँगा। (७४)
आपने नैमिपारण्य मे जिस चित्राङ्गदा को देसा था उसे में ही सप्तगोदावर नामक तीर्थ में छोद आया (७१)
इस लिए आइए, हमलोग सुदेव के पुन के ही निमित्त चले । यहाँ पर हम लोगों की अन्य तीन कन्यायें मिलेगी।
ऐसा कहने के उपरान वे ऋपि सुदेव के पुत्र को सान्त्वना देकर एय शकुनि को आगे फर इन्द्रद्युम्न और पुत्र के साथ अश्र युक्त रथ से सप्तग्मेदापर वीर्य में जाने का उपक्रम किये जहाँ वे कन्यायें गयी थी। (७७-७८)
इसी योर कृशाद्गी घृताची शोकान्वित होरर अपनी कन्या सोलनी हुई उदयगिरि पर विचरण कर रही थी। (७९)
यहाँ अप्सरा यो यह यन्दर मिला। अप्सरा ने उससे पूछा-हे कपि! मुझसे सत्य यहो कि क्या तुमने बाटा को देखा है? (८०)
वस्थास्तद् वचनं श्रुत्वा स कपिः प्राह पालिकाम् ।
दृष्टा देववती नाम्ना मया न्यस्ता महाश्रमे ।। ८१
कालिन्धा विमले तीर्थे मृगपक्षिसमन्विते ।
श्रीकण्ठायतनस्याने मया सत्यं तवोदितम् ।। ८२
सा प्राह वानरपते नाम्ना वेदवतीति सा ।
न हि देववती ख्याता तदागच्छ बजावहे ॥ ८३
घृताच्यास्तद्वचः श्रुत्वा वानरस्त्वरितक्रमः ।
पृष्ठतोऽस्याः समागच्छन्नदीमन्वेव कौशिकीम् ॥ ८४
ते चापि कौशिकी प्राप्ता राजर्पिप्रवरास्त्रयः।
द्वितयं तापसाभ्यां च स्यैः परमवेगिभिः ॥ ८५
अवतीर्य रथेन्यस्ते स्नातुमभ्यागमन् नदीम् ।
घृताच्यपि नहीं नातुं सुपुण्यमाजगाम है ! ८६
सामन्येव कपिः प्रायाद् दृष्टो जापालिना तथा ।
दृष्ट्यैव पितरं प्राह पार्थिवं च महाबलम् ॥ ८७
स एव पुनरायाति वानरस्तात वेगवान् ।
पूर्व जटास्वेव वलायेन बद्धोऽस्मि पादपे॥ ८८
तजायालिवचः श्रुत्वा शकुनिः क्रोधसंयुतः ।
सशरं धनुरादाय इदं वचनमब्रवीत् ॥ ८९
ब्रह्मन् प्रदीयतां मामाज्ञा तात यदस्य माम् ।
यावदेनं निहन्म्यद्य शरेणैकेन वानरम् ।। ९०
इत्येवमुक्त वचने सर्वभूतहिते रतः ।
महर्षिः शकुनि प्राह हेतुयुक्तं वचो महत् ॥ ९१
न कश्चित्तात केनापि बध्यते हन्यतेऽपि वा ।
वधबन्धौ पूर्वकर्मवश्यौ नृपतिनन्दन ।। ९२
इत्येवमुक्त्या शकुनिमृपिर्यानरमप्रवीत् ।
एोहि वान रास्माकं साहाय्यं कर्तुमर्हसि ।। ९३
इत्येवमुक्तो मुनिना पाले म कपिकुञ्जरः
कृताञ्जलिपुटो भूत्वा प्रणिपत्येदमब्रवीत् ॥
ममाज्ञा दीयतां ब्रह्मन् शाधि किं करवाण्यहम् ।। ९४
इत्युक्ते प्राह स मुनिस्तं वानरपतिं वचः।
उसके उस पचन को सुनार उस कपि ने कहा-मैंने देववती नामक पालिस को देखा है एवं उसे कालिन्दी के मृगपक्षि समन्वित विमल तीर्थ में श्रीकण्ठ के मन्दिर के सम्मुस स्थित महाश्रम मे रक्खा है। मैंने तुमसे यह सत्य बात कही है। (८१-८२)
उसने (घृताची ने) महा-हे धानरराज । यह वेदवती नाम से प्रसिद्ध है देववती नहीं है। अस्तु, आओ, हम दोनों यहाँ पलें। (८३)
घृताची पी मात सुनकर वानर उछलता हुआ उसके पीछे-पीछे कौशिकी नहीं की ओर चला। (८४)
घे तीनों श्रेष्ट राजपि भी दोनों तपस्वियों (जापालि और तभ्यज) के साथ अत्यधिर वेगशाली रथों पर चढ़कर पौशिकी नदी के समीप पहुँचे।
वे लोगग्य से उतर पर स्नान करने के लिए नदी के समीप आये। घृताची भी उस परम पवित्र नदी मे स्नान करने थायी। (८६)
पानर भी एनरे पीछे पीछे आया और जावालि ने उसे देखा। देसमे ही उन्होंने पिता और महापली राजा से कहा-
हे तात! यह पही घेगयाम् पानर पुन आ रहा है जिसने पहले बलपूर्वक जटापाश के द्वारा मुझे वृक्ष मे बाँध (८८)
जापालि के उस पचन को सुनर अत्यन्त मुद्ध शकुनि ने वाणयुक्त धनुप लेकर यह वचन कहा- (८९)
हे वहन् ! मुझे आज्ञा दीजिए, हे तात! मुझसे कहिए कि क्या में अभी एक बाण से इस वानर को मार डाल। (९०)
ऐसा वचन कहने पर समस्त प्राणियों के हित मे तत्पर मपि ने शकुनि से अत्यधिक युक्ति-युक्त ४ वचन कहा- (६१)
हे तात! कोई किसी को न तो पाँधवा और न मारता ही है। हे नृपतिनन्दन और पन्धन पूर्व- वर्माधीन होते हैं। (६२)
शकुनि से ऐसा कह कर मुनि ने वानर से कहा- हे वानर ! आओ, आओ। तुम हम लोगों को सहायता पर सस्ते हो। (९३)
हे याले। मुनि के ऐसा कहने पर सस श्रेष्ठ फपि ने हाथ जोद कर प्रणाम करसे हुये यह कहा-हे ब्रह्मन् ! मुझे आशा दीजिए कि मैं क्या करूँ? (९४)
उसके ऐसा कहने पर मुनि ने उस पानरपति से यह
मम पुत्रस्यपोबद्धो जटागु चटपादपै ॥ ९५
न चोन्मोचयितुं वाच्छपनुयामोऽपि यत्नतः ।
तदनेन नरेन्द्रेण विधा कृत्वा तु शासिनः ।। ९६
शायां वहति मत्सूनुः शिरमा वा विमोचय ।
दशर्पशवान्यस्य शाखांचे पद्दतोऽगमन् ।। ९७
न च सोऽम्ति पुमान् कविद् यो घन्मोचयितुं धमः।
म पेयाक्यमारण्य कपितयारिनो जटाः ।। ९८
नरन्मोनयामाम णादुन्मोचिताच ताः ।
ततः प्रीतो मुनिश्रेष्टो परदोरतमाः ।। ९९
पपि प्राह पृषीप त्वं परं यन्मनसेरिमतम् ।
मजयनः श्रुत्या इमं वरमयारत ॥ १००
विधामा महातेवाः कपित्ये प्रतिमंम्पितः ।
प्रदान भयान्वरं ममं यदि दातुमिहन्छति ॥ १०१
सम्मपदलो महापोरो मम शापो निपस्यताम् ।
निसानदायाः पितरं मां सारं तपोन ॥१०२
अमिनानीहि भवतः शापाद्वानरवां गतम् ।
गुबहनि च पापानि मया यानि कवानि हि ।। १०३
फपिचापल्यदोपेण तानि मे यान्तु संधयम् ।
वतो ऋतमतः प्राह शापस्यान्वो मरिष्यति ॥१०४
यदा घृवाच्या तनयं जनियमि मदारलम् ।
इत्येवठक्तः संहष्टः म तदा पपिहारः ॥ १०५
म्नातुं तुर्ण महानद्यामवतीणः कृमोदरि ।
ततस्तु म क्रमशः स्नात्याय॑ पितृदयताः ।। १०६
जग्मुर्ट ग्येश्यले पृताची दिवमुत्पनन् ।
तामन्यन महागः म फपिः प्लपनां वरः ॥ १८७
दो रूपमंपना पृताची म प्रसंगमः ।
गापि तं पलिना श्रेष्टं दृष्टयर फपिट मरम् ॥ १०८
प्राचाय पियर्माण कामपामाम कामिनी ।
ततोग्नु पर्वतश्रेप्टे रयाने कोलाहरे कपिः ।। १.१
रमयामाग त तन्वी गा स तं यानरोत्तमम् ।
एवं रमन्ती गुचिरं मंग्रामो रिभ्यपर्वतम् ।। ११०
रथैः पश्चापि तत्तीर्थ संग्रामास्ते नरोत्तमाः।
मध्याहसमये प्रीताः सप्तगोदावरं जलम् ॥ १११
प्राप्य विश्रामहेत्वर्थमवतेरुस्त्वरान्विताः ।
तेषां सारथयथाश्वान् स्नात्वा पीतोदकाप्लुतान् ॥११२
रमणीये वनोद्देशे प्रचारार्थे समुत्सृजन् ।
शाड्वलाढथेषु देशेषु मुहूर्तादेव वाजिनः ।। ११३
हप्ताः समाद्रवन् सर्वे देवायतनमुत्तमम् ।
तुरङ्गसुरनिर्योपं श्रुत्वा ता योपितां वराः ॥ ११४
किमेतदिति चोक्त्वैव प्रजग्मुर्हाटकेश्वरम् ।
आरुह्य बलभी तास्तु समृदेक्षन्त सर्वशः ॥ ११५
अपश्यंस्तीर्थसलिले स्नायमानान् नरोत्तमान् ।
वतधिनागदा दृष्ट्वा जटामण्डलधारिणम् ॥
सुरथं हसती प्राह संरोहत्पुलका सखीम् ।। ११६
योऽसौ युवा नीलघनप्रकाशः
संदृश्यते दीर्घभुजः सुरूपः ।
स एव नूनं नरदेवसृनु-
वृतो मया पूर्ववरं पतियः ॥ ११७
यश्चैप जाम्यूनदतुल्यवर्णः
श्वेत जटाभारमधारयिष्यत् ।
स एप नूनं नूनं वपतां वरिष्ठो
ऋतध्वजो नात्र विचारमस्ति ।। ११८
ततोऽब्रवीदयो हृष्टा नन्दयन्ती सखीजनम् ।
एपोऽपरोऽस्यैव सुतो जापालिनात्र संशयः ॥ ११९
इत्येवमुक्त्वा वचनं बलभ्या अवतीर्य च ।
समासताग्रतः शंभोर्गायन्त्यो गीतिका शुभाम् ॥ १२०
नमोऽस्तु शर्व शंभो त्रिनेत्र चारुगात्र त्रैलोक्यनाथ
उमापते दक्षयज्ञविध्वंसकर कामाङ्गनाशन घोर
पापप्रणाशन महापुरुप महोग्रमूर्ते सर्व-
सत्यक्षयकर शुभंकर महेश्वर त्रिशूलधारिन्
स्मरारे गुहावासिन् दिग्यासः महाशवशेखर [5]
जटाधर कपालमालाविभूपितशरीर पामचक्षुः
वामदेव प्रजाध्यक्ष भगाक्ष्णोः क्षयंकर भीमसेन
वे पांचो श्रेष्ठ लोग भी प्रसन्नमन से रथ द्वारा मध्याह के समय सप्तगोदावर जल के उस तीर्थ में पहुंचे। (१११)
यहाँ जाफर वे शीघ्रता पूर्वक विश्राम करने के लिए नीचे उतरे। उनके सारथियों ने भी स्नान किया एवं घोडों को जल पिलाकर रमणीय वन प्रदेश में विचरण करने के लिए छोड़ दिया । मुहूर्त भर में ही हरियाली से पूर्ण स्थान मे वे घोड़े वृत हो गये। तदनन्तर वे सभी (घोड़े) उत्तम देवायतन के निकट दौडने लगे। घोड़ों के खुर काशब्द सुनकर श्रेष्ठ स्त्रियां 'यह क्या है ऐसा पहपर हाटकेश्वर (फे मन्दिर में) गई एवं छत पर चढ़कर सभी ओर देखने लगीं। (११२-११५)
एन कन्याओं ने तीर्थ सलिल में स्नान करते हुए उन श्रेष्ट पुरुषों को देखा। तदनन्तर चित्राङ्गदा ने जटामडल-धारी सुरथ नृपति को देखा एवं रोमाचित होकर हँसती हुई ससी से कहा- (११६)
नील मेघ के वर्ण वाटा यह जो दीर्घबाहु सुन्दर युवा पुरुप दिसलाई पड़ता है निश्चय ही उसी राजपुत्र पो मैंने पहले पतिस्प से परण किया था।
इसमे कुछ विचार करने की आवश्यकता नहीं है कि स्वर्णतुल्य वर्ण वाले जो व्यक्ति श्वेत जटाभार को धारण कर रहे है वे निश्चय ही तपस्वियों मे श्रेष्ठ ऋतध्वज्ञ है। (११८)
तदनन्तर नन्दयन्ती ने ससियों से प्रसन्न होकर कहा- वह दूसरा व्यक्ति निस्सन्देह इन्हीं ऋतधज का पुन जापालि है। (११६)
ऐसा रहार वे सभी छत से उतरी एव शंकर के सम्मुख बैठार कल्याणकारी (निम्न) गीत गाने लगी। (१२०)
हे शर्व! हे शम्भु। हे त्रिनेत्र ! हे चारुगात्र! हे त्रैलोक्यनाथ । हे उमापति। है दक्षयज्ञविध्वंसकर! कामाङ्गनाशन ! हे घोर ! हे पाप प्रणाशन ! हे महापुरुष ! हे महोप्रमूर्ति। हे समस्त प्राणियों के क्षयकारी ! हे शुभकर! हे महेश्वर ! हे त्रिशूलघारिन् ! हे रमरारि ! हे गुहार सिन् ! हे दिगम्बर- हे महाशशेखर ! हे जटाधर ! हे कपालमाला विभूषित शरीर! हेपामचक्षु! हे घामदेष ! हे प्रजाभ्यक्ष ! हे भगाक्षि के क्षयकारी! हे भीमसेन ! है
महासेननाथ पसुपते कामाङ्गदहन चत्वरवासिन्
शिव महादेव ईशान शंकर भीम भव
वृपभध्वज जटिल प्रौढ महानाट्येवर भूरिरत्न [10]
अविमुक्तक रुद्र स्टेश्वर स्थाणो एकलिङ्ग
कालिन्दीप्रिय श्रीकण्ठ नीलकण्ठ अपराजित
रिपुभयंकर संतोपपते वामदेव अघोर
तत्पुरुष महायोर अघोरमूर्चे शान्त
सरस्वतीकान्त कीनाट सहस्रमूर्ने महोदय (15]
विभो कालाग्निरुद्र रुद्र, हर महीधरप्रिय
सर्वतीर्थाधिवास हंस कामेश्वर दाराधिपते
परिपूर्ण मुचुकुन्द मधुनियासिन कृपाणपाणे
भयंकर विद्याराज सोमराज कामराज रक्षक
अञ्जनराजकन्याहृदचलवसते समुद्रशायिन् [20]
गजमुस घण्टेश्वर गोकर्ण ब्रह्मयोने
सहस्रयस्त्राक्षिचरण हाटकेश्वर नमोऽस्तु ते ॥
एतस्मिन्नन्तरे प्रामाः सर्व एवपिपार्थिवाः ।
द्रष्टुं त्रैलोक्यकर्वारं त्र्यम्बकं हाटकेश्वरम् ।। १२१
समारूढाश्च सुस्नाता ददृशुर्योपितच ताः।
स्थितास्तु पुरतस्तस्य गायन्त्यो गेयमुत्तमम् ॥ १२२
ततः सुदेयतनयो विश्वकर्मसुतां प्रियाम् ।
दृष्ट्वा हृपितचित्तस्तु संरोहत्पुलको वभौ ॥ १२३
ऋतध्वजोऽपि तन्वगीं दृष्ट्या चित्रागदां स्थिताम् ।
प्रत्यभिज्ञाय योगात्मा यमौ मुदितमानसः ॥ १२४
ततस्तु सहसाऽभ्येत्य देवेशं हाटकेश्वरम् ।
संपूजयन्तस्त्र्यक्षं ते स्तु पन्तः संस्थिताः क्रमात् ॥ १२५
चित्राहदापि तान् दृष्ट्वा ऋतध्वजपुरोगमान् ।
समं ताभिः कुशाङ्गीभिरभ्युत्थायाम्यवादयत् ॥ १२६
स च ताः प्रविनन्यैव समं पुत्रेण तापमः ।
समं नृपतिभिर्हष्टः संविवेश यथासुखम् ॥ १२७
ततः कपिवरः प्रामो घृताच्या सह सुन्दरि ।
महासेननाथ । हे पशुपति ! हे कामागदहन ! हे चत्वर- यासिन् ! हे शिव ! हे महादेव ! हे ईशान ! हे शङ्कर ! हेभीम ! हे भव !हे वृपमध्यज! हे जटिल ! हे प्रौढ़ ! हे महानाट्येश्वर ! हे भूरिरत्न ! हे अविमुक्तक! हे रद्र! हे रुद्रेश्वर ! हे स्थाणु ! हे एक लिङ्ग ! हे कालिन्दीप्रिय ! हे श्रीकण्ठ! हे नीलकण्ठ ! हे अपराजित! हे हे रिपुभयङ्कर ! हे सन्तोपपति! हे वामदेव! हे अघोर ! हे तत्पुरप! हे महाघोर! हे अघोरमूर्ति ! हे शान्त ! है। सरस्वतीकान्त ! हे कीनाट ! हे सहसमूनि ! हे महोद्भव ! हे विमो! हे काराग्निस्ट! हे रुद्र! हे हर! हे महीधरप्रिय ! हे सर्व तीर्थाधिवास ! हे हंस! हे कामेश्वर ! है केदाराधिपति ! हे परिपूर्ण ! हे मुचुकुन्द ! हे मधु-निरासिन् ! हे कृपाणपाणि! हे मयङ्कर! हे विद्याराज! हे सोमराज!हे कामराज!हे रसक ! हे अजनराजकन्याहृद- पलयसति ! हे समुद्रशायी ! हे गजमुख ! हे घण्टेश्वर ! हे गोकर्ण! हे प्रायोनि! हे सहस्रपत्राक्षिचरण! हेहाटकेश्वर! आपको नमस्कार है।
इसी बीच समस्त ऋपि ए राजालोग त्रैलोक्यकर्ता, त्र्यम्बक हाटकेश्वर का दर्शन करने यहाँ पहुंचे। (१२१)
स्नानोपरान्त ऊपर चढ़ने पर उन लोगों ने देवता के सम्मुख बैठकर गीत गाती हुई स्त्रियों को (१२२)
तदनन्तर सुदेव के पुत्र अपनी प्रिया विश्वकर्मा की पुत्री को देखकर प्रसन्नता से पुलकित हो गये। (१२३)
योगी ऋतथ्वज भी तन्वङ्गी चित्रागदा को वहाँ स्थित देस तथा पहचान कर अत्यन्त आनन्दित (१२४)
तदनन्तर सभी लोग शीघ्र ही देवाधिदेव हाटकेश्वर के समीप गए एवं त्रिलोचन की पूजा कर सड़े होकर स्तुति करने लगे। (१२५)
टन ऋतध्वज आदि को देखकर चित्राङ्गदा ने भी उन शाही ( कन्याओं) के साथ उठकर प्रणाम (१२६)
पुत्र सहित टन तपस्वी ने उन्हें आशीर्वाद दिया एवं प्रसन्नतापूर्वक राजाओं सहित सुखपूर्वक बैठ (१२७)
हे सुन्दरी! तदनन्तर गोदावरीतीर्थ में स्नान कर
स्नात्वा गोदावरीतीर्थे दिक्षुर्हाटकेश्वरम् ॥ १२८
ततोऽपश्यत् सुता तन्वी घृताची शुभदर्शनाम् ।
साऽपि तां मातरं दृष्ट्वा हृष्टाऽभूदरवर्णिनी ॥ १२९
वतो घृताची स्वां पुत्री परिष्वज्य न्यपीडयत् ।
स्नेहाद सवाष्पनयनां मुगुस्ता परिजिनती ॥ १३०
ततो ऋतध्वज. श्रीमान् कपि वचनमब्रवीत् ।
गच्छानेतुं गुहा त्यमञ्जनाद्रौ महाजनम् ॥ १३१
पातालादपि दैत्येश वीरं कन्दरमालिनम् ।
स्वर्गाद् गन्धर्वराजानं पर्जन्यं शीघ्रमानय ।। १३२
इत्येवमुफ्ते मुनिना प्राह दवरती कपिम् ।
गाल वानरश्रेष्ठ इहाोतुं त्वमर्हसि ।। १३३
इत्येवमुक्त वचने कपिर्मास्वविक्रमः ।
गत्वाऽद्धनं समामन्त्र्य जगामामरपर्वतम् ॥ १३४
पर्जन्यं तत्र चामन्य प्रेपयित्वा महाश्रमे ।
सप्तगोदावरे तीर्थे पातालमगमत् कपिः ॥ १३५
तत्रामव्य महावीर्य कपि. कन्दरमालिनम् ।
पातालादभिनिष्क्रम्य महीं पर्यचरजवी ॥ १३६
गालवं तपसो योनिं दृष्ट्वा माहिष्मतीमनु ।
समुत्पत्यानयच्छीघ्र सप्तगोदावरं जलम् ॥ १३७
तत्र स्नात्या विधानेन संप्राप्तो हाटकेश्वरम् ।
ददृशे नन्दयन्ती च स्थितां देववतीमपि ॥ १३८
तं दृष्ट्वा गालव चैव समुत्थायाम्यवादयत् ।
स चार्चिष्यन्महादेव महीनभ्यवादयत् ।
ते चापि नृपतिश्रेष्ठारतं संपूज्य तपोधनम् ।। १३९
प्रहमतुल गत्या उपविष्टा यथासुखम् ।
तेपूपविष्टेषु तदा वानरोपनिमन्त्रिता. ॥ १४०
समायाता महात्मानो यक्षगन्धर्वदानवाः।
तानागतान् समीपैच पुज्यस्ता. पृथुलोचनाः ॥ १४१
स्नेहर्टनयनाः सर्यास्तदा ससजिरे पितृन्
नन्दयन्त्यादिका दृष्ट्वा सपितृका वरानना ॥ १४२
हाटकेश्वर के दर्शन का इच्छुक श्रेष्ठ कपि भी घृताची सहित यहाँ पहुंचा। (१२८)
तदुपरान्त घृताची ने अपनी शुभदर्शना कशाही पुत्री को देसा । यह सुन्दरी भी अपनी उस माता को देखकर प्रसन्न हुई। (१२६)
वदनन्तर घृताची ने अपनी पुत्री का गाद आलिङ्गन किया। अश्रुपूर्ण नेत्रों यारी (अपनी पुत्री) को यह बार बार स्नेह से ऍपने रगी। (१३०)
तत्पश्चात् श्रीमान् ऋतभ्यज ने कपि से पहा-तुम महाजन नामक गुबर को राने अअन पर्वत पर (१३१)
पाताल से धीर दैत्येश्वर पन्दरमाली को तथा स्वर्ग से गन्धर्यराज पर्जन्य को यहाँ शीघ्र लाओ। (१३२)
मुनि के ऐसा कहने पर देवरती ने पानर से कहा-हेपपिष्ठ गाय को भी आप यहाँ सायें। (९३३)
ऐसा कहे जाने पर पायुप्तदश परानम पाटापपि अञ्जन पर्यत पर गया एव (गुणक को) आमन्त्रित फर सुमेरु पर्वत पर चला गया। (१३४)
यहाँ टसने पर्जन्य को आमन्त्रित किया एप सप्त- गोदावर सीर्य में स्थित महामम में उन्हें भेजने पे पार पाताल पटा गया। (१३१)
वहाँ महापराक्रमी कन्दरमाली यो आमन्त्रित कर वेगवान वानर पाताल से निकलकर पृथ्वी पर विचरण करने लगा। (१३६)
माहिष्मती के निकट तपोनिधि गालव को देसार यह उछला एय शीघ्र उन्हें सप्लगोदार के जल के निस्ट ले आया। (१३७)
यहाँ विधिपूर्वर स्नान पर यह हाटकेश्वर के समीप पहुँचा एव नन्दयन्ती तथा देवरती को भी यहाँ बैठी हुई देसा। (१३८)
गारव को देसार उन सभी ने उठकर उनस अभिवादन किया। उन्होंने भी महादेव की पूजा कर महपियों को प्रणाम दिया। उन श्रेष्ठ राजाओं ने भी उन तपोधन को पूजा पी एवं अरयन्त प्रसन्न होकर सुसपूर्वक बैठ गये। उनके यैठ जाने पर धानर द्वारा आमन्त्रित यक्ष, गन्धर्य एवं दानर तीनों महात्मा यहाँ आए। उन्हें आया देसने ही उन विशालाक्षी पुगियों ये नेत्र स्नेहाश्रुपूर्ण हो गये। उन सभी ने अपने अपने पिता का आलिङ्गन किया। नन्दपन्ती आदि को पिता से युफ हुई देखकर विश्वकर्मा की मुन्दरी पुत्री के नेत्र भनपूर्ण
सवाष्पनयना जाता विश्वकर्मसुता तदा ।
अब तामाह स मुनिः सत्यं सत्यमनो वचः ॥ १४३
मा विपादं कृथाः पुति पिताऽयं तव वानरः ।
सा तद्वचनमाकर्ण्य वीडोपहतचेतना ॥ १४४
कथं तु विश्वकर्माऽमी वानरत्वं गतोऽधुना ।
दुप्पुत्र्यां मयि जातायां तस्मात् त्यक्षे कलेवरम् ।। १४५
इति संचिन्य मनसा ऋतधनमुवाच ह ।
परिवायम्य मां ब्रह्मन् पापोपहतचेतनाम् ॥ १४६
पिनी मर्तुमिच्छामि तदनुज्ञातुमर्हसि ।
अथोवाच मुनिस्तानी मा रिपाद कृथाधुना ॥ १४७
भाव्यस्य नैव नाशोऽस्ति तन्मा त्यागः क्लेवरम् ।
भविष्यति पिता तुभ्यं भूयोऽप्यमरवर्दकिः ।। १४८
जातेऽपत्ये पृताच्या तु नात्र कार्या विचारणा।
इत्येमुक्तं वचने मुनिना मावितात्मना ॥ १४९
घृताची तां समभ्येत्य प्राह चित्रागदां वचः।
पुनि त्यजस्व शोकं त्वं मामर्दशभिरात्मनः ॥ १५०
भविष्यति पितुस्तुभ्य मत्सफाशान संशयः ।
इत्येवमुक्ता संहृष्टा यमौ चित्राङ्गदा तदा ।। १५१
प्रतीक्षन्ती सुचाट्नी विवाहे पितृदर्शनम् ।
सास्ता अपि वारन्तं झालं मुतनु कन्यकाः ॥ १५२
प्रत्यैदन्त विवाहं हि तस्या एर प्रियेप्मया ।
ततो दशसु मासेपु समतीनेवयामराः ॥ १५३
तस्मिन् गोदारीतीर्थ प्रसूता तनयं नलम् ।
जातेऽपत्ये कपित्याच विश्वकर्माप्यमुच्यत ।। १५४
समभ्येत्य प्रिया पुत्री पर्यघजत चादरात् ।
ततः प्रीतेन मनसा सम्मार सुरवई किः ।। १५५
सुराणामधिपं शक सहय मुरफिन्नरैः ।
स्वष्ट्राऽथ सम्मृत. शो मरुद्गणस्तस्तदा ॥१५६
सुरैः सस्तैः संप्राप्तस्तत्तीर्थ हाटकाह्रयम् ।
समायातेषु देवेषु गन्धर्वेप्यासरस्सु च ॥ १५७
इन्द्रघुम्नो मुनिश्रेष्टमृतध्वजमुवाच ह ।
जागलेदीयता ब्रह्मन् सुताकन्दरमालिनः ।। १५८
गृहातु विधिवत् पाणिं देतेग्यास्तनयस्तव ।
नन्दयन्ती च शकुनिः परिणेतुं स्वरूपवान् ॥ १५९
गये। तदनन्तर मध्यज मुनि ने उससे सत्यवचन कहा। (१३६-२४३)
हे पुत्री । विपाद मत करो। यह यानर तुम्हारा पिता है। उस वचन को सुनार वह जित हो गई। (१४४)
क्योंकि मुझ कुपुत्री के उत्पन्न होने से ये विश्वकर्मा इस समय यानर हो गये है अत में शरीर का त्याग करगी। (१४५)
मन में ऐसा विचार कर उसने शतम्घज से कहा- हे ब्रह्मन् । मुझ पापये कारण नष्ट घुद्धियालीका आप परिमाण करें। पितृयातिनी भरना चाहती हूँ।उद आप अनुमति दें। वय मुनि ने उस कृशानी से कहा-अब विपाद (४६-१४७)
भारी का नाश नहीं होता। अत शरीर का त्याग मत करो। घृताची के गर्भ से पुत्र उत्पन्न हो जाने पर तुम्हार पिता पुन देवताओं के शिल्पी हो जायेंगे। इसमें सन्देह नहीं। सयतचिच मुनि के ऐसा कहने पर घृताची ने चित्रासदा के समीप जाकर उससे कहा-हे पुनी। तुम शोक छोड़ दो। निस्सन्देह दस महीनों में तुम्हारे पिता द्वारा मुझ से एक पुत्र उत्पन्न होगा। ऐसा कहे जाने पर चिनानदा प्रसन्न हो गई। (१४८-१५१)
सुन्दरी (चित्राङ्गदा) अपने विवाह में मिलने वाले पिता के दर्शन की प्रतीक्षा करने लगी। वे सुन्दरी कन्यायें भी प्रिय की प्राप्ति की कामना से उनके ही विवाह के समय की प्रतीक्षा करने लगीं। दस मास व्यतीत हो जाने पर अप्सरा ने उस गोदारीतीर्थ में नल नामर पुत्र को जन्म दिया। पुन पत्पन हो जाने पर विश्वकर्मा भी कपित्व से मुक्त हो गये (१५२-१५४)
अपनी प्रिय पुत्री के समीप जार उन्होंने उसका आदरपूर्वक आलिङ्गन किया। तदन्तर प्रसन्न मन से देव शिल्पी ने देवताओं एष किन्नरों सहित सुराधिप इन्द्र का स्मरण किया। त्वष्टा के स्मरण करने पर इन्द्र मरुद्गणों, देवों एव रुद्रों के साथ हाटक नामक तीर्थ में आये । देवताओं, गन्धों और अप्सराओं के आने पर इन्द्रद्युम्न ने मुनिश्रेष्ठ तध्वज से कहा-हे प्रहन् । जावालि को कन्दरमाली की कम्या प्रदान करें। आपका पुत्र विधिवत् दैत्यनन्दिनी का पाणिग्रहण करे। स्वरूपवान् शकुनि नन्दयन्ती से विवाह करें। (१५५-१५९)
ममेयं वेदवत्यस्तु त्वाष्ट्र यी सुरथस्य च ।
याढ मित्यप्रवीद्धृष्टो मुनिर्मनुसुतं नृपम् ।। १६०
ततोऽनुचक्रुः संहृष्टा विवाहविधिमुत्तमम् ।
ऋत्विजोऽभू गालवस्तु हुत्या हव्यं विधानतः॥१६१
गायन्ते तत्र गन्धर्वा नृत्यन्तेऽसरसस्तथा ।
आदौ जापालिनः पाणिगृहीतो दैत्यकन्यया ॥ १६२
इन्द्रधुम्नेन तदनु वेदवत्या विधानतः ।
ततः शकुनिना पाणिहीवो यक्षकन्पया ॥ १६३
चित्राङ्गदायाः कल्याणि सुरथः पाणिमग्रहीत् ।
एवं क्रमाद् विवाहस्तु निर्वृत्तस्तनुमध्यमे ॥ १६४
वृत्ते मुनिर्वियाहे तु शक्रादीन् प्राह दैवतान् ।
अस्मिस्तीर्थे भवद्भिस्तु सप्तगोदावरे सदा ॥ १६५
स्थेयं विशेपतो मासमिमं माधवमुत्तमम् ।
पाढमुक्त्वा सुराः सर्वे जग्मुर्हटा दिवं क्रमात् ॥ १६६
मुनयो मुनिमादाय सपुत्रं जग्मुरादरात् ।
भार्याश्चादाय राजानः स्वं स्वं नगरमागताः ॥ १६७
प्रहृष्टाः सुखिनस्तस्थुः भुञ्जते विषयान् प्रियान् ।
चित्राङ्गदायाः कल्याणि एवं वृत्तं पुरा किल ।
तन्मां कमलपत्राक्षि भजस्व ललनोत्तमे ।। १६८
इत्येवमुक्त्वा नरदेवसूनु-
स्तां भूमिदेवस्य सुतां वरोरुम् ।
स्तुवन्मृगाक्षी मृदुना क्रमेण
सा चापि वाक्यं नृपति वभापे ॥ १६९
इति श्रीवामनपुराणे एकोनचत्वारिशोऽध्यायः ॥३९॥
यह वेदवती मेरी तथा स्वष्टा (विश्वर्मा) की पुत्री (चित्राङ्गदा) सुरथ की पत्नी हो। मुनि ने मनुपुत्र राजा से यहा-ठीक है। (१६०)
तदनन्तर उन लोगों ने आनन्दपूर्वक भलीभाँति विवाह की विधि को सम्पन्न किया। विधिपूर्वक हव्य या हवन कर गालव ऋत्विक बने। (१६१)
एस समय यहाँ गन्धयों ने गाना गाया और अप्स-राओं ने नृत्य किया। सर्व प्रथम दैत्यकन्या ने जावालि का पाणिग्रहण किया। (१६२)
हे कल्याणी ! तदनन्तर इन्द्रद्युम्न ने विधिपूर्वक वेद- यती का, शकुनि ने यक्ष-कन्या का तया सुरथ ने चिनागदा का पाणिग्रहण किया। हे यशोदरी ! इस प्रकार मम से वियाहार्य पूर्ण हुआ। (१६३-१६४)
वियाहार्य सम्पन्न हो जाने पर मुनि (ऋतध्वज) ने इन्द्र आदि देवताओं से कहा-इस सप्तगोदावरतीर्थ में आपलोग सदा निवास करें। विशेप रूपसे इस उत्तम वैशास मास में आप लोग यहाँ अवश्य रहें। देवता लोग 'ऐसा ही हो' यह कर आनन्द से स्वर्ग चले गये। (१६५-१६६)
मुनिलोग पुत्र सहित मुनि (मृतध्वज) को सम्मान के साथ लेकर चले गये। राजा लोग भी अपनी-अपनी पत्नी लेकर अपने नगर में आ गये। (१६७)
सभी लोग प्रिय विषय या उपभोग करते हुए सुख पूर्वक रहने लगे। हे फ्ल्याणि! चित्रागदा का पूर्व वृत्ता इस प्रकार का है। अतः हे कमलनयना ललनोत्तमा! तुम मुझे स्वीकार करो। (१६८)
ऐसा कहकर राजपुत्र (दण्ड) प्रामण की उस सुन्दरी मृगाक्षी पुत्री की कोमलवाणी से स्तुति करने लगे। उसने भी राजा से कहा। (१६६)
श्रीवामनपुराण में उन्नतातीसवाँ अध्याय समाप्त ॥३९॥