अन्धकवृत्तान्त प्रह्राद द्वारा कामसन्तम अन्धक से दण्डकाख्याग का वर्णन, अरजा से दण्डक का चित्राङ्गदा के वृताम्त का कथन

नारद उवाच।

गतोऽन्धकस्तु पाताले किमचेष्टत दानवः ।

शंकरो मन्दरस्थोऽपि यच्चकार तदुच्यताम् ॥१

पुलस्त्य उवाच ।

पावालस्थोऽन्धको ब्रह्मन् पाध्यते मदनाग्निना ।

संतप्रविग्रहः सर्वान् दानपानिदमब्रवीत् ॥ २

स मे सुहृत्स मे पन्धुः स भ्राता स पिता मम ।

यस्तामद्रिसुता शीघं ममान्तिकमुपानयेत् ।। ३

एवं ध्रुवति दैत्येन्द्र अन्धके मदनान्धके ।

मेघगम्भीरनिर्घोष प्रहलादो वाक्यमब्रवीत् ॥ ४

येयं गिरिसुता धीर सा माता धर्मतस्तव ।

पिता त्रिनयनो देवः श्रूयतामत्र कारणम् ।। ५

वन पित्रा ह्यपुत्रेण धर्मनित्येन दानव ।

आराधितो महादेवः पुत्रार्थाय पुरा फिल ॥ ६

तस्मै त्रिलोचनेनासीद् दत्तोऽन्धोऽप्येव दानव ।

पुत्रकः पुत्रकामस्य प्रोक्त्वत्यं वचनं विभो ॥७

नेत्रत्रय हिरण्याक्ष नार्थ मया मम ।

पिहितं योगसंस्थस्य ततोऽन्धमभवत्तमः ॥८

तस्माच्च तमसो जातो भृतो नीलघनस्वनः ।

तदिदं गृह्यता दैत्य तवोपयिकमात्मजम् ॥ ९

यदा तु लोकपिद्विष्टं दुष्टं कर्म परिष्यति ।

हे द्विज ! मैंने तुमसे यह पतलाया कि उस समय शङ्कर के तपस्या हेतु जाने के कारण शून्य पर्वत पर जाकर दुष्टमति (अन्धक) ने देवी से युद्ध किया।

श्रीवामनपुराण म  छत्तीसवाँ अध्याय समाप्त॥३६॥

३७

नारद ने कहा-अन्धक दानव ने पाताल में जाकर क्या किया? महादेव ने भी मन्दर पर्वत पर रहकर जो कुछ किया उसे बतराइये।

पुलस्त्य ने कहा-हे ब्रह्मन् । अन्धक पाताठ में रहकर कामाग्नि से पीडित होने लगा। उसरा शरीर सन्तप्त हो गया। उसने सभी दानवों से यह कहा- (२)

वही मेरा सुहृद्, बन्धु, भाई और पिता है जो उस पर्वत नन्दिनी को मेरे पास शीघ्र लाये। (३)

मदनातुर दैत्येन्द्र अन्धक के इस प्रकार कहने पर प्रह्लाद ने मेघ के समान गम्भीर शब्द से इस प्रकार कहा-

हे वीर । ये जो गिरिनन्दिनी हैं वेधर्मत तुम्हारी माता है और त्रिलोचन महादेव तुम्हारे पिता हैं। इसका कारण सुनो-

हे दानव । प्राचीन काल में धर्म में सदा तत्पर रहने वाले पुनहीन तुम्हारे पिता ने पुन की अभिलाग से महादेव की आराधना की। (६)

हे दानय । हे विभो । त्रिलोचन ने पुत्र की कामना वाले उसको अन्ध पुन दिया और यह कहा- (७)

हे हिरण्याक्ष । एक समय जब मैं योगस्य था, उमा ने परिहासार्थ मेरे तीनों नेत्रों को बन्द कर दिया था। तदनन्तर अन्धकारस्वरूप तम उत्पन हुआ। (८)

उस तम से नील मेघ सदृश शब्द करने पाला एक भूत (प्राणी) उत्पन्न हुआ। हे दैत्य । इसे महण करो। यह तुम्हारे उपयुक्त पुत्र है। (९)

न्नैलोक्यजननी चापि अमिवाञ्छिप्यतेऽधमः ॥ १०

घातयिष्यति वा विप्रं यदा प्रक्षिप्य चामुरान् ।

वदास्य स्त्रयमेवाहं करिये कायद्योधनम् ॥ ११

एवमुक्त्या गतः शंभुः स्वस्थानं मन्दराचलम् ।

त्यत्पिताऽपि समभ्यागान् त्यामादाय रसातलम् ।। १२

एतेन कारणेनाम्मा शैलेयी भविता वय ।

सर्वस्पापीह जगतो गुरुः शंभुः पिता ध्रुवम् ॥ १३

मवानपि तपोयुक्तः शाम्यवेत्ता गुणाप्लुतः ।

नेहो पापमंग्ल्पे मति पुर्याद् माद्विधः ।। १४

प्रैलोक्यप्रभुरव्यक्तो भयः गर्नमस्कृतः ।

अजेयम्तस्य भायं न समहोऽमराटन १५

न चापि शक्तः प्राप्तुं तां भवाशैलनृपात्मनाम् ।

अजित्या सगणं र म न कामोऽध दुलभः ।। १६

यस्तोत् सागरं दोम्या पातयेद् मुनि मास्करम् ।

मेरमुत्पाटयेद् यापि स जमेच्छलपाणिनम् ॥ १७

उदाहोरिसदिमाः शक्याः क्रियाः कर्तु नरैर्यलात् ।

न च शक्यो हरो जेतुं सत्यं सत्यं मयोदितम् ॥ १८

किं त्वया न श्रुतं देत्य यथा दण्डो महीपतिः ।

परस्त्रीकामयान् मूढः सराष्ट्रो नारामामवान् ॥ १९

आमीद् दण्डो नाम नृपः प्रभूवनलाहनः ।

स च पत्रे महातेजाः पौरोहित्याय मार्गयम् ।। २०

ईजे च विविधर्याइँपतिः शुक्रपालितः ।

शुक्रस्यामीण दुहिता अरजा नाम नामवः ।। २१

शुक्रः कदाचिद्गमद् यूपपर्यागमासुरम् ।

तेनाचिठचिरं तर वायो भार्गवसत्तमः ।। २२

अरसा म्यगृह यझिं शुश्रूपन्ती महासुर ।

अतिष्ठत सुगाली ततोऽभ्यागानराधिपः ॥ २३

म पप्रच्छ क शुप्रेति तमूचुः परिचारिकाः।

यह अधम जप लोरविरोधी दुष्ट यर्म परेगा तया त्रैलोक्य-जननी की कामना करेगा अथवा असुरों को भेज कर जय यह विनों का यय करेगा, उस समय मैं स्वयं इसके शरीर का शोधन करुँगा। (२०-१२)

ऐसा कहकर शम्मु अपने स्थान मन्दरायल पर चले गये एव तुम्हारे पिता तुमको लेर रसातल में आये। (१२)

इसीलिए शेलनन्दिनी तुम्हारी माना है एय समस्त जगन् के गुरु शम्भु निश्चय ही तुम्हारे पिता हैं। (१३)

तुम तपस्वी, शास्त्रज्ञ तथा अनेक अद्भुत गुणों से भूपित हो । अत तुम्हारे जैसे पुरुष को इस प्रभार के पाप सङ्कल्प में युद्धि नहीं लगानी चाहिए। (१४)

हे देवशनु । लोक्य के प्रमु अव्यक्त शिप सभी के चन्दनीय एवं अजेय है। उनकी इस भार्या की इच्छा तुम्हें नहीं करनी चाहिए। (१५)

गणों-सहित शहर को बिना इराये तुम उस शैलपुत्री को प्राप्त भी नहीं कर सकते । अत तुम्हारी वह अमि टापा दुर्लभ है। (१६)

शूलपाणि को वहीं जीत सकता है, जो भुजाओं से सागर को पार कर जाय, अथवा सूर्य को पृथ्वी पर गिरा दे, अथवा मेरु पर्यंत यो उपाद दे। (१७)

अथवा उपर्युक्त सभी कार्य मनुष्य बळ से पर सस्ते है, किन्तु शहर नहीं जीते जा सकने, यह मैंने सच सच रहा है। (१८)

हे दैत्य । तुमने क्या यह नहीं सुना है कि परस्त्री की कामना करने वाला दण्ड नामक मूद राजा अपने राष्ट्र के सहित नष्ट हो गया। (१९)

प्रचुर सेना ण्य वाहनों से युक्त दण्ड नामक एक राजा था। उस महानेजस्वी ने शुक्राचार्य को पुरोहित बनाया। (२०)

शुमाचार्य द्वारा रक्षित होकर उस राजा ने अनेक यसो का अनुष्ठान किया। शुक्राचार्य की अरजा नाम की एक (२१)

शुक्राचार्य किसी समय असुर वृषपर्वा के समीप गये थे। उसके अनुरोध करने पर भार्गव श्रेष्ठ यहुत याल तक वहाँ एक गये (२२)

हे महासुर! सुन्दरी अरजा अपने घर मे रहकर अग्नि की सेवा करती हुई स्थित थी। इतने में एक दिन यहाँ गये। (२३)

उन्होंने पूछा-शुप्राचार्य कहाँ है ? पर की सेविकाओं

गतः स भगवान् शुक्रो याजनाय दनोः सुतम् ।। २४

पप्रच्छ नृपतिः का तु तिष्ठते भार्गवाश्रमे ।

तास्तमूचुर्गुरोः पुत्री संतिष्ठत्यरजा नृप ॥ २५

तामाश्रमे शुक्रर्ता द्रष्टुमिक्ष्याकुनन्दनः ।

प्रविवेश महाराहुर्ददर्शारजसं ततः ॥ २६

वां दृष्ट्वा कामसंतमस्तक्ष्णादेव पार्थिवः ।

सजातोन्यक दण्डस्तु कृतान्तरलचोदितः ।। २७

ततो विसर्जयामास भृत्यान् भावन् सुहृत्तमान् ।

शुक्रशिष्यानपि वली एकाकी नृप आयजत् ॥ २८

तमागतं शुक्रसुता प्रत्युत्थाय यशस्सिनी ।

पूजयामास संहृष्टा भ्रातृभावेन दानव ॥ २९

ववस्तामाह नृपतिर्याले कामाग्नितापितम् ।

मां समाहादयस्वाद्य सपरिष्वङ्गवारिणा ॥३०

साऽपि प्राह नृपश्रेष्ठ मा चिनीनश आतुरः।

पिता मम महाक्रोधात् त्रिदशानपि निर्ट हेत् ।। ३१

मृढयुद्धे भवान् भ्राता ममासि त्वनयाप्लुतः ।

भगिनी धर्मतस्तेऽहं भवाशिष्य. पितुर्मम ॥ ३२

सोऽधनीद् भीर मां शुक्र. कालेन परिपक्ष्यति ।

कामाग्निनिर्दहति मामयैव तनुमभ्यमे ।। ३३

सा प्राह दण्डं नृपति मुहृतं परिपालय ।

तमेव याचस्स गुरुं स ते दास्यत्यसंशयम् ।। ३४

दण्डोऽप्रवीत् मुतन्यगि कालधेपो न मे क्षमः ।

च्युतायसरर्तृत्वे विघ्नो जायेत सुन्दरि ॥ ३५

ततोऽब्रवीच गिरजा नाहं त्वा पार्थिवात्मज ।

दातु शक्का स्वमात्मान स्वतन्त्रा न हि योपितः ॥३६

किंवा ते यहुनोक्तेन मा त्वं नाश नराधिप ।

गच्छस्व शुक्र शापेन सभृत्यज्ञातिवान्धयः ।। ३७

ततोऽप्रवीन्नरपतिः मुतनु शृणु चेष्टितम् ।

चित्राङ्गदाया यद् वृत्तं पुरा देवयुगे शुभे ॥ ३८

ने उनसे कहा-वे भगवान् शुक्र दनुनन्दन के यहाँ यज्ञ कराने गये हैं। (२४)

राजा ने पूछा-भार्गव के आश्रम में कौन स्त्री है ? उन रोगों ने उत्तर दिया-हे राजन् । गुरु की कन्या अरजा यहाँ है। (२५)

महाबाहु इक्ष्वाकुनन्दन शुक्राचार्य की उस पुत्री को देखने के लिए आश्रम में प्रविष्ट हुए एव अरजा को (२६)

हे अन्धक | कालबल से प्रेरित राजा उसे देखकर तत्क्षण ही काम से सनप्त हो गये। (२७)

तदनन्तर भृत्यों, भाइयों घनिष्ट मित्रों एव शुक्राचार्य के शिष्यों को भी बलवान राजा ने वहाँ से हटा दिया एय अकेले गये। (२८)

यशस्विनी शुमपुत्री प्रसन्नतापूर्वक उस आये हुए राजा की भ्रातृभाव से पूजा की। (२९)

तदनन्तर राजा ने उससे कहा-हे बाले । मैं कामाग्नि से तापित हूँ। आज तुम अपने आलिङ्गन रूपी जल से मुझे शीतल क्रो। (३०)

उस (अरजा ) ने कहा-हे नृपश्रेष्ठ । आतुर होकर अपने को नष्ट न करो। मेरे पिता अत्यधिक क्रोध से देवताओं को भी जला सकते हैं। (३१)

हे मूढबुद्धि। तुम मेरे भाई हो। किन्तु अनीति से व्याप्त हो गये हो। मैं धर्म से तुम्हारी यहिन हूँ । क्यों कि तुम मेरे पिता के शिष्य हो।  (३२)

उस (दण्डफ) ने कहा-हे भीरु । शुक्र ( भविष्य में ) किसी समय मुझे दग्ध करेंगे। किन्तु हे कृशोदरी। काम की आग मुझे अभी दग्ध कर रही है। (३३)

उस ( अरजा) ने राजा दण्ड से पहा-हे राजन् । एक मुहूर्त तक प्रतीक्षा कीजिए। आप उस गुरु से ही याचना करिये वे मुझे आपको निस्सन्देह प्रदान कर देंगे। (३४)

दण्ड ने कहा-हे सुन्दरी। मैं कारक्षेप करने मे असमर्थ हूँ। अवसर घृक कर कार्य करने में विघ्न होता है। (३५)

उसके अनन्तर विरजा ने कहा-हे राजपुत्र। मैं अपने को तुम्हें देने में असमर्थ हूँ। क्योंकि स्त्रियाँ स्वतन्त्र नहीं होती। (३६)

हे नराधिप । अथवा अधिक कहने से क्या लाभ? तुम शुक्र के शाप से भृत्य, जाति और बन्धुओं के साथ अपना नाश मत करो। (३७)

इसके बाद राजा ने कहा-हे सुन्दरि । प्राचीन काल में देवयुग में पटित चित्राङ्गदा का वृत्तान्त सुनो। (३८)

विश्वकर्मसुता सानी नाम्ना चित्रागदाऽभवत् ।

रुपयौवनमंपन्ना पद्महीनेच पद्मिनी ॥ ३९

सा कदाचिन्महारण्यं ससीमि. परिवारिता ।

जगाम नैमिपं नाम स्नातुं कमललोचना ॥ ४०

सा स्नातुमवतीर्णा च अथाम्यागानरेश्वर. ।

सुदेवतनयो धीमान् सुरथो नाम नामतः ।।

वा ददर्श च तन्वगी शुभाङ्गो मदनातुरः॥ ४१

तं दृष्ट्वा सा ससीराह वचनं सत्यमयुतम् ।

असौ नराधिपसुतो मदनेन यदर्यते ॥ ४२

मदर्थे च क्षमं मेऽम्य स्नादानं सुरूपिणः ।

सख्यस्तामत्रुवन् नाला न प्रगरमाऽसि मुन्दरि।। ४३

अस्वातन्त्र्यं तपास्तीह प्रदाने स्वात्मनोऽनये ।

पिता तनास्ति धर्मिष्टः सर्वशिल्पविशारदः ॥ ४४

न ते पुक्तमिहात्मान दातुं नरपतेः म्ययम् ।

एतस्मिन्नन्तरे राजा मुरथ. सत्यवाक सुधीः ।। ४५

समस्येत्यानीदेना कन्दर्पशरपीडित ।

त्वं मुग्धे मोहपसि मा दृष्टयव मदिरेक्षणे ॥ ४६

त्वदृष्टिशरपातेन स्मरेणाम्येत्य ताडित. ।

तन्मां कुचतले तल्पे अभिशायितुमर्हसि ॥ ४७

नोचे प्रयत्पते कामो भूयो भूयोऽतिदर्शनात् ।

ततः सा चारुसङ्गिी राज्ञो राजीवलोचना ॥ ४८

चार्यमाणा ससीमिस्तु प्रादादात्मानमात्मना ।

एव पुरा नया तव्या परित्रात. स भृपतिः ॥ ४९

वस्मान्मामपि सुश्रोणि त्वं परिवातुमर्हसि ।

अरजसाब्रवीद् दण्ड तस्या यद् वृत्तमुत्तरम् ॥ ५०

किं त्वया न परिज्ञातं तस्मात् ते कथयाम्यहम् ।

तदा तया तु तन्वङ्गाया सुरयस्य महीपतेः ॥ ५१

आत्मा प्रदत्तः स्वातव्या वतस्तामशपत् पिता ।

विश्वकर्मा की चिनागदा नामक एक साध्वी कन्या थी। यह रूप यौन सम्पन्न एव मानो पद्म विहीन पद्मिनी थी। (३९)

कमल के समान नेत्रवारी यह किसी समय अपनी सखियों से घिरी हुई नैमिप नामक महारण्य मे स्नान करने के लिए गई। (४०)

और वह स्नान करने के लिए जल मे उतरी। उसी समय सुदेव के पुत्र बुद्धिमान् राजा मुरथ यहाँ पहुँचे और उस कृशाही को देसार शुभ अगों यान वे कामातुर वे हो गये।

उनको देसर उस (चिनागदा ) ने सखियों से सत्य-सयुक्त वचन कहा-यह रानपुन मेरे लिए कामपीडित हो रहा है। अत इस सुन्दर स्प वाले को मुझे अपने को समर्पित कर देना उचित है । याला ससियों ने उससे कहा-हे सुन्दरि हम प्रगल्भा नहीं हो। (४२-४३)

हे पापरहित यारिके । आत्मदान करने मे तुम्हें स्वतन्त्रता नही है। क्योंकि तुम्हारे पिता परमधानिक तथा सर्वशिल्पों में विशारद है। (४४)

अत तुम्हें यहाँ राजा को स्वत आत्मदान करना उचित नहीं है। इसी बीच कामबाण पीडित सत्यवादी

बुद्धिमान् सुरथ ने उसो निकट जार कहा-हे मुग्धे । हे मदिरेक्षणे । तुम दृष्टि से ही मुझे मुग्ध कर रही हो। (४५-४६)

मदन न आर तुम्हारी दृष्टि स्पी याण द्वारा मुझ आहत किया है। अत तुम मुदा अपने कुचतल रूपा शय्या पर लिटाओ।

अन्यथा बार-बार अतिदर्शन से गम मुझे दग्ध कर डालेगा। तदनन्तर उस राजीवलोचना सर्वाङ्गसुन्दरी ने सखियों के मना करने पर भी रपय को राजा के प्रति अर्पित कर दिया। इस प्रकार प्राचीन काल में उस कृशानी ने उस राजा की रक्षा की थी। (४८-४९)

अत हे सुश्रोणि । तुम मेरा भी परिगण क्रो शुक्रनन्दिनी अरजा ने राजा दण्ड से कहा-क्या तुम उसके पश्चात् की घटना को नहीं जानते अत में तुमसे कहती हूँ । राजा सुरथ को जब उस तन्बगी ने स्वय को स्वतन्त्रता से अर्पित कर दिया तो पिता ने उसको शाप दिया। हे मन्दवेतसे। यद तुमने स्त्रीस्वभाववश धर्म का परित्याग कर स्वय को प्रदान किया है अत तुम्हारा विवाह नहीं होगा। विपाइरहित होने से तुम्हें

यस्माद् धर्म परित्यज्य स्त्रीभावान् मन्दचेतसे ॥ ५२

आत्मा प्रदत्तस्तस्माद्धि न विवाहो भविष्यति ।

विवाहरहिता नैव सुसं लप्स्यसि भर्तृतः ॥ ५३

न च पुत्रफलं नैव पतिना योगमेष्यसि ।

उत्सृष्टमात्रे शापे तु ह्यपोवाह सरस्वती ॥ ५४

अकृतार्थ नरपति योजनानि त्रयोदश ।

अपकृष्ट नपरपतौ साऽपि मोहमपागता ।। ५५

ततस्ता सिपिचुः सख्यः सरस्वत्या जलेन हि ।

सा सिच्यमाना सुतरां शिशिरेणाप्यथाम्भसा ।। ५६

मृतकल्पा महायाहो विश्वकर्मसुताऽभवत् ।

तां मृतामिति विज्ञाय जग्मुः सख्यस्त्वरान्विताः ॥५७

काष्ठान्याहर्तमपरा पहिमानेतुमाकुलाः।

सा च तास्वपि सर्वासु गवासु वनमुत्तमम् ॥ ५८

संज्ञा लेमे सुचाङ्गी दिशश्वाप्यवलोकयत् ।

अपश्यन्ती नरपति तथा स्निग्धं सखीजनम् ॥ ५९

निपपात सरस्वत्याः पयसि स्फुरितेक्षणा ।

वां वेगात् काञ्चनाक्षी तु महानयां नरेश्वर ॥ ६०

गोमत्यां परिचिक्षेप तरङ्गकुटिले जले।

तयाऽपि तस्यास्तद्भाव्यं विदित्वास्थ विशां पते ॥ ६१

महापने परिक्षिमा सिंहच्याघ्रभयाकुले ।

एवं तस्याः स्वतन्त्राया एपाऽवस्था श्रुता मया ॥ ६२

तस्मान दास्याम्यात्मानं रक्षन्ती शीलमुत्तमम् ।

तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा दण्डः शक्रममो बली ॥

विहस्य त्यरजां प्राह स्वार्थमर्थक्षयंकरम् ।। ६३

दण्ड उवाच ।

वस्या यदुत्तरं वृत्तं वत्पितुश्च कृशोदरि ।

सुरथस्य तथा राज्ञस्तच्छ्रोतुं मविमादध ॥ ६४

यदाऽवकृष्टे नृपती पतिता सा महायने ।

तदा गगनसंचारी दृष्टवान् गुह्यकोऽञ्जनः ।। ६५

ततः सोऽभ्येत्य तां चाला परिसान्त्व्य प्रयततः।

प्राह मा गच्छ सुभगे विपादं सुरथं प्रति ॥ ६६

ध्रुवमेप्यसि वेन त्वं संयोगमसितेक्षणे ।

पति का सुख नहीं मिलेगा। (५०-५३)

तुम्हें न तो पुनफल की प्राप्ति होगी और न पति से संयोग प्राप्त होगा। शाप देते ही सरस्वती नदी अकृतार्थ राजा को तेरह योजन तक बहा ले गई। राजा के दूर चले जाने पर वह भी मूर्छित हो गई । (१४-१५)

तदनन्तर सखियों ने सरस्वती के जल से उसने सिक्त किया। हे महाबाहो । उस अत्यन्त शीतल जल से सिक होने पर वह विश्वर्मा की पुत्री मृत तुल्य हो गयी। उसे मृत जानार कुछ सखियाँ शीघ्रता पूर्वक काष्ठ एव कुछ आफुल होकर अग्नि लाने गई। उन सभी के उत्तम वन में जाने पर उसे चेतना प्राप्त हुई । उस सुन्दरी ने चतुर्दिक देखा। राजा एव प्रिय सखियों को न देखकर वह नरुचलनेत्रा सरस्वती के जल में गिर पड़ी। हे नरेश्वर ! काश्चनाभी ने वेगपूर्वक उसे महानदी गोमती के तरङ्गों से कुटिल जलमे फेंक दिया। हे राजन् ! उसकी भवितव्यता को जानकर उस (गोमती) ने भी उसे सिंद एव व्याघ्र से पूर्ण बन  मे फेक दिया। इस प्रकार मैंने उस स्वतन्त्रा की इस अवस्था का वर्णन सुना है। (५६-६२)

अत उत्तम शील की रक्षा करती हुई मैं अपने को तुम्हें समर्पित नहीं करूंगी। इन्द्र के समान बलवान राजा दण्ड ने उसके उस वचन को सुनकर हँसते हुए अरजा से अर्थ को नष्ट करने वाला स्वाथ युक्त वचन कहा। (६३)

दण्ड ने कहा-हे कृशोदरि ! उसके पिता तथा राजा सुरथ के साथ घटित वाद के वृत्तान्त को सुनने के लिए तुम सावधान हो जाओ। (६४)

राजा के दूर चले जाने पर जब वह महावन में गिरी उस समय गगनसञ्चारी अञ्जन नामक गुह्यक ने उसे देखा। (६५)

तदननर वह बाला के निकट गया एवं प्रयत्न पूर्वक उसे सान्त्वना देते हुए कहा-सुभगे। सुरथ के लिए दुःख मत करो। (६६)

हे कृष्णनेत्रों वाली ! तुम उससे अवश्य मिलोगी। अतः

तस्माद् गच्छस्स शीघं लं द्रष्टुं श्रीकण्ठमीश्वरम् ॥ ६७

इत्येवमुक्ता सा तेन गुशकेन सुलोचना ।

श्रीकण्ठमागता तूर्ण कालिन्या दक्षिणे तटे ।। ६८

दृष्ट्या महेश श्रीकण्ठ स्नात्या रविसुताजले ।

अतिष्ठत शिरोनम्रा यान्मध्यस्थितो रविः ।। ६९

अयाजगाम देवस्य स्नानं तु तपोधनः ।

शुभः पाशुपताचार्यः सामवेदी ऋतम्मनः ॥ ७०

ददर्श तत्र वन्नगी सुनिश्चित्राङ्गदां शुभाम् ।

रतीमिर स्थितां पुण्यामनगपरिवनिताम् ।। ७१

तां दृष्ट्वा स निर्ध्यानमगमत् केयमित्युत ।

अथ सा तमृर्षि वन्य कृताञ्जलिरुपस्थिता ।। ७२

तो प्राह पुत्रि कस्यासि सुता सुरसुतोपमा ।

किमर्थमागतामीह निर्मनुप्यमृगे वने ॥ ७३

ततः सा प्राह तमृषि यथातथ्यं दृशोदरी।

श्रुत्वार्पिः कोपमगमदशपछिल्पिना वरम् ।। ७४

यस्मात् स्वतनुजातेयं परदेयाऽपि पापिना ।

योजिता नै पतिना तस्माच्छासामृगोऽस्तु सः ॥ ७५

इत्युक्त्वा स महायोगी भूयः स्नाला निधानतः ।

उपास्य पश्चिमा सन्ध्यां पूजयामास शंकरम् ।। ७६

सपूज्य देवदेवेशं यथोक्तविधिना हरम् ।

उवाचागम्यतां सुसुदतीं पतिलालसाम् ॥ ७७

गच्छस सुभगे देशं मप्रगोदाररं शुभम् ।

तत्रोपास्य महेशानं महान्तं हाटकेश्वरम् ।। ७८

तत्र स्थिताया रम्भोरु रयाता देवरती शुमा ।

आगमिष्यति दैत्यस्य पुत्री कन्दरमालिनः ॥ ७९

तथाऽन्या गुह्यरसुता नन्दयन्तीति विश्रुता।

अञ्जनस्यैव तत्रापि समेष्यति तपस्विनी।

तयाऽपरा वेदरती पर्जन्यदुहिता शुभा ।। ८०

यदा वियः समेष्यन्ति समगोदावरे जले ।

हाटकारये महादेव वदा मंयोगमेप्यसि ।। ८१

तुम शीघ्र भगवान श्रीकण्ठ का दर्शन करने जाओ। (६७)

उस गुह्यक के ऐसा रहने पर यह सुन्दर नेनों वारी शोधतापूर्वक पालिन्दी के दक्षिण स्ट पर स्थित श्रीकण्ठ के पास गई। (६८)

वह महेश्वर श्रीकण्ठ का दर्शन तथा कालिन्दी के जल में स्नान कर दोपहर तक सिर झुराये सडी रही। (६९)

इतने मे देव श्रीकण्ठ के पास शुभलक्षणयुक्त पाशुपता चार्य, सामवेदी, तपोधन, ऋतचज स्नान करने के लिए (७०)

मुनि ने काम से विहीन रति के तुल्य कृशागी कल्याणी चिनागदा को वहाँ देसा। (७१)

उन मुनि ने उसको देखकर सोचा कि यह कौन है। इसी बीच यह उन ऋपि के पास जाकर उन्हें प्रणाम कर हाथ जोड़कर सड़ी हो गयी।

(ऋपि ने) उससे पूछा-हे पुनी। देवकन्या के समान तुम रिसरी पुत्री हो ? इस मनुष्य तथा पारहित वन में तुम क्यों आयी हो ?

तदनन्तर उस कृशोदरी ने उन ऋपि से यथार्थ बात कहा । उसे सुनकर ऋपि क्रुद्ध हुए एव शिल्पियों में श्रेष्ठ विश्वकर्मा को शाप दिया। (७४)

यत उस पापी ने दूसरे के देने योग्य भी अपनी इस पुत्री को पति से युक्त नहीं किया अत यह शाखामृग (यन्दर) हो जाय। (७५)

यह कहने के उपरान्त उन महायोगी ने पुन विधिवत् स्नान एव पश्चिम सन्ध्या कर शङ्कर या पूजन किया। (७६)

शास्त्रोक्त विधि से देवेश्वर शर की पूजा कर उन्होंने 'पति को चाहने वाली तथा सुन्दर भौंहों और दातों वारी चित्राङ्गदा से कहा-(७७)

हे सुभगे। कल्याणदायक सप्तगोदावर नामक देश में जाओ। यहाँ हाटकेश्वर महादेव की पूजा करते हुए निवास करो। (७८)

हे रम्मोह। वहाँ पर रहती हुई तुम्हारे पास देत्य कन्दरमाली की देवरती नामर कल्याणी पुनी आयेगी। (७६)

इसके अतिरिक्त वहीं पर असन नामक गुह्यक की नन्दयनी नामक तपस्विनी पुत्री तथा वेदवती नामक पर्जन्य की कल्याणी पुनी भी आयेगी। (८)

जब वे तीनों हाटकेश्वर महादेव के पास सप्तगोदापर में आयेंगी उस समय तुम उनसे मिलोगी । (८१)

इत्येवमुक्ता मुनिना घाला चित्राङ्गदा तदा ।

सप्तगोदावरं तीर्थमगमत् त्वरिता ततः ॥ ८२

संप्राप्य तत्र देवेशं पूजयन्ती त्रिलोचनम्

समध्यास्ते शुचिपरा फलमूलाशनाऽभवत् ।। ८३

स चर्षिर्ज्ञानसंपन्नः श्रीकण्ठायतनेऽलिसत् ।

श्लोकमेकं महाख्यानं तस्याश्च प्रियकाम्यया ॥ ८४

न सोऽस्ति कधित् त्रिदशोऽसुरो वा

यक्षोऽथ मर्यो रजनीचरो वा।

इदं हि दुःखं मृगशायनेच्या

निर्जियेद् यः स्वपराक्रमेण ॥ ८५

इत्येवमुक्त्वा स मुनिर्जगाम

द्रष्टुं विभुं पुष्करनाथमीड्यम् ।

नदी पयोष्णीं मुनिवृन्दवन्या

संचिन्तयन्नेय विशालनेत्राम् ॥ ८६

इति श्रीवामनपुराणे सप्तत्रिशोऽध्यायः ॥३७॥