सरोमाहात्म्ये 26 स्थागुतीर्थ महिमा के प्रसङ्ग में वेन-चरित, पृथु का जन्म एवं राज्याभिषेक, पृथु द्वारा अपने पिता के उद्धार का प्रयत्न पृथु द्वारा तारित वेन की शिवस्तुति

मार्कण्डेय उवाच ।

स्थाणुतीर्थप्रभावं तु श्रोतुमिच्छाम्यह हुने ।

केन सिद्धिरथ प्राप्ता सर्वपापभयापहा ।। १

सनत्कुमार उवाच ।

शृणु सर्वमशेषेण स्थाणुमाहात्म्यमुत्तमम् ।

यच्छ्रुत्वा सर्वपापेभ्यो मुक्तो भवति मानवः ॥२

एकार्णवे जगत्यस्मिन् नष्टे स्थावरजङ्गमे ।

विष्णोर्नाभिसमुद्भूतं पद्ममव्यक्तजन्मनः।

तस्मिन् ब्रह्मा समुद्भूतः सर्वलोकपितामहः ॥ ३

तम्मान्मरीचिरभवन्मरीचे कश्यपः सुतः ।

कश्यपादभवद् भास्वस्तिस्मान्मनुरजायत ॥ ४

मनोस्तु क्षुवतः पुत्र उत्पनो मुखसंभवः ।

पृथिव्यां चतुरन्तायां राजासीद् धर्मरक्षिता ।। ५

तस्य पत्नी बभूवाथ भया नाम भयावहा ।

मृत्योः सकाशादुत्पन्ना कालस्य दुहिता तदा ॥ ६

तस्यां समभवद् वैनो दुरात्मा वेदनिन्दकः ।

स दृष्ट्वा पुत्रवदनं क्रुद्धो राजा यनं ययौ ॥७

तत्र कृत्वा तपो घोरं धर्मेणावृत्य रोदसी ।

प्राप्तवान् ब्रह्मसदनं पुनरावृत्तिदुर्लभम् ॥ ८

वेनो राजा समभवत् समस्ते क्षितिमण्डले ।

स मातामहदोपेण तेन कालात्मजात्मजः ॥ ९

घोपयामस नगरे दुरात्मा वेदनिन्दकः ।

न दातव्यं न यष्टव्यं न होतव्यं कदाचन ॥ १०

अहमेकोऽत्र वै धन्यः पूज्योऽहं भवतां सदा ।

मया हि पालिता यूयं निवसध्यं यथासुखम् ।। ११

तम्मत्तोऽन्यो न देवोऽस्ति युष्माकं यः परायणम् ।

एतच्छ्रुत्वा तु वचनमृपयः सर्व एव ते ॥ १२

परस्परं समागम्य राजानं वाक्यमघवन् ।

२६

मार्कण्डेय ने कहा हे मुनि ! मैं स्थाणुतीर्थ का प्रभाव सुनना चाहता हूँ। यहाँ किसने समस्त पापों के भय को दूर करने वाली सिद्धि प्राप्त की ? (१)

सनत्कुमार ने कहा-स्थाणु के उत्तम माहात्म्य को पूर्णतया सुनो जिसे सुनकर मनुष्य सभी पापों से मुक्त हो जाता है। (२)

इस स्थावर जंगमात्मक संसार के एकार्णव में नष्ट हो जाने पर अव्यक्तजन्मा विष्णु की नाभि से एक पद्म उत्पन्न हुआ। उसमें लोकपितामह ब्रह्मा उत्पन्न हुए। (३)

उनसे मरीचि उत्पन्न हुए। मरीचि के पुत्र कश्यप हुए। कश्यप से सूर्य की उत्पत्ति हुई एवं उनसे मनु का जन्म हुआ। (४)

मनु के छींकने पर उनके मुख से एक पुत्र उत्पन्न हुआ। वह सम्पूर्ण पृथ्वी का धर्मरक्षक राजा हुआ। (५)

उसकी भया नाम की भयंकर पत्नी थी। वह मृत्यु से उत्पन्न काल की पुत्री थी।(६)

उससे दुरात्मा वेदनिन्दक वेन उत्पन्न हुआ। उस पुत्र के मुख को देखार क्रुद्ध हुआ राजा वन मे चला गया।

वहाँ घोर तपस्या कर, पृथ्वी एवं आकाश के मध्य भाग को धर्म से आवृत कर बह राजा पुनरावृत्ति रहित ब्रह्मलोक को चला गया। (८)

वेन समस्त पृथ्वीमण्डल का राजा हो गया। अपने नाना के उस दोषवश उस दुरात्मा वेदनिन्दक कालात्मजा (काल की पुत्री भया) के पुत्र ने नगर मे यह घोषित कराया कि "कभी भी दान, यज्ञ एवं हवन न किया (९-१०)

इस संसार में एकमात्र में ही आप लोगों का पन्ध और पूज्य हूँ। मेरे द्वारा पालित होकर आप लोग सुख- पूर्वक निवास करें। (११)

इसलिये मुझसे अतिरिक्त अन्य कोई देवता नहीं है,

श्रुतिः प्रमाणं धर्मस्य ततो यज्ञः प्रतिष्ठितः ॥ १३

यसैविना नो प्रीयन्ते देवाः स्वर्गनिवासिनः ।

अनीता न प्रयच्छन्ति वृष्टिं सम्यस्य वृद्धये ॥ १४

तस्माद् यज्ञैश्च देवैश्व धार्यते सचराचरम् ।

एतच्छ्रुत्वा क्रोधदृष्टिनः प्राह पुनः पुनः ॥ १५

न यष्टव्यं न दातव्यमित्याह क्रोधमूछितः ।

तत. क्रोधसमाविष्टा ऋपयः सर्व एव ते ॥ १६

निजघ्नुमन्त्रपूर्तस्ते कुशैर्वसमन्वितैः ।

ततस्त्वराजके लोके तमसा संवृते तदा ।। १७

दस्युभिः पीड्यमानास्तान् ऋपींस्ते शरणं ययुः ।

ततस्ते ऋषयः सर्वं ममन्थुस्तस्य वै करम् ॥ १८

सव्यं तस्मात् समुचस्थौ पुरुषो हस्वदर्शनः ।

वमूचुर्ऋपयः सर्वे निपीदतु भवानिति ॥ १९

तस्मान्निपादा उत्पन्ना पेनकल्मपसंभवाः ।

ततस्ते ऋषयः सर्वे मन्मथुर्दक्षिणं करम् ॥ २०

मध्यमाने करे वस्मिन् उत्पन्नः पुरुषोऽपरः ।

बृहत्सालप्रतीकाशो दिव्यलक्षणलक्षितः ।। २१

धनुर्माणाङ्कितकरश्चक्रध्वजसमन्वितः ।

तमुत्पन्नं तदा दृष्ट्या सर्वे देवाः सवासवाः ।। २२

अभ्यपिञ्चन् पृथिव्यां तं राजानं भूमिपालकम् ।

ततः स रञ्जयामास धर्मेण पृथिवीं तदा ॥ २३

पित्राऽपरजिता तस्य तेन सा परिपालिता।

तत्र राजेतिशब्दोऽस्य पृथिव्या रखनादभृत् ।। २४

स राज्यं प्राप्य तेभ्यस्तु चिन्तयामास पार्थिवः ।

पिता मम अधर्मिष्ठो यज्ञव्युच्छितिकारकः ।। २५

कथं तस्य क्रिया कार्या परलोकसुसायहा ।

इत्येवं चिन्तयानस्य नारदोऽम्याजगाम ह ॥ २६

तस्मै स चासनं दत्त्वा प्रणिपत्य च पृष्टवान् ।

जो आप लोगों का आश्रय हो सके । यह वचन सुनने के उपरान्त सभी ऋपियों ने परस्पर मिल कर राजा से यह वचन कहा-धर्म के लिये श्रुति ही प्रमाण है । उसी से यज्ञ प्रतिष्ठित होता है। (१२-१३)

यज्ञों के विना स्वर्गनिवासी देवता प्रसन्न नहीं होते एव विना प्रसन्न हुए वे अन्न की वृद्धि हेतु वृष्टि नहीं करते। (२४)

अतएव यज्ञों और देवताओं से ही चराचर ससार का धारण होता है। यह सुनकर जुद्ध वेन ने बार-बार कहा- (१५)

"यज्ञ और दान नहीं करना चाहिए" ऐसा कह कर वह क्रोधान्ध हो गया। तदनन्तर क्रुद्ध उन सभी ऋपियों ने मन्त्र से पवित्र वनमय कुशों से उसे मार डाला । तब राजा से विहीन होने के कारण सारे संसार के अन्धकार से आच्छादित हो जाने पर दस्युओं से पीडित सभी लोग उन ऋषियों की शरण में गए। तदनन्तर सभी ऋषियों ने उसके बाएं हाथ का मन्थन किया। उससे एक ह्रस्व दिखाई पड़ने वाला (यौना) पुरुप निकला, उससे पियों ने कहा-'निपीदतु भवान्', अर्थात् आप बैठे। (१६-१९)

उससे वेन के पापों से सम्भूत निपाद उत्पन्न हुए। हे तदनन्तर उन समस्त ऋषियों ने उसके दाहिने हाथ का  मन्थन किया। (२०)

उस हाथ के मये जाने पर ऊँचे शाल वृक्ष के समान और दिव्य लक्षणों से युक्त एक दूसरा पुरुप उत्पन्न (२१)

में धनुष बाण, चक्र और ध्वजा का चिन्ह था। उस समय उसे उत्पन्न हुआ देखकर इन्द्र सहित सभी देवताओं ने उसको पृथ्वी मे भूपालक राजा के रूप में अभिषिक्त किया । तदनन्तर उसने धर्मपूर्वक पृथ्वी का रजन किया अर्थात् प्रसन्न किया। (२२-२३)

उसके पिता ने पृथ्वी का अपरजित (विरक्त, दुःखी) किया था और उसने उससपालन किया। पृथ्वी का रअन करने से ही उसका राजा यह नाम हुआ। (२४)

उनसे राज्य प्राप्त करने के उपरान्त उस राजाने विचार किया कि मेरे पिता अधर्मिष्ठ ए' यज्ञ के उच्छेदकर्ता थे,

अत उनकी परलोक-सुखावह क्रिया किस प्रकार की जाय । उसके ऐसा विचार करते समय नारद जी आ पहुंचे। (२५-२६)

उन्हें आसन देने के उपरान्त उसने प्रणाम कर पूछा- हे भगवन् । आप सभी लोकों के शुभाशुभ को जानते हैं। हे विप्र । मेरे दुराचारी, देव ब्राह्मण निन्दक एवं स्वकर्मरहित

भगवन् सर्वलोकम्य नानामि त्वं शुभाशुभम् ।। २७

पिता मम दुराचारो देवताह्मणनिन्दकः ।

स्वकर्मरहितो विन परलोकमवाप्तवान् ॥ २८

ततोऽनवीनारदस्तं ज्ञात्या दिव्येन चक्षुपा ।

म्लेच्छमध्ये समुत्पन्नं क्षयकुष्ठसमन्वितम् ॥ २९

वच्छुत्वा वचनं तस्य नारदस्य महात्मनः ।

चिन्तयामास दुःखातः कथं कार्य मया भवेत् ॥ ३०

इत्येवं चिन्तयानस्य मतिर्नासा महात्मनः ।

पुत्रः स कथ्यते लोके यः पितुंस्त्रायते भयाद ।। ३१

एवं संचिन्त्य स वदा नारदं पृष्टवान् मुनिम् ।

तारणं मपितुस्तस्य मया कार्य कथं मुने ॥ ३२

नारद उवाच ।

गच्छ त्यं तस्य तं देहं तीर्थेषु कुरु निर्मलम् ।

यत्र स्थाणोर्महत्तीर्थ सरः संनिहितं प्रति ।। ३३

एतच्छुत्या तु वचनं नारदस्य महात्मनः ।

सचिवे राज्यमाधाय राजा स तु जगाम ह ॥ ३४

म गत्या चोचर भूमि म्लेच्छमध्ये ददर्श ह ।

उत्तर दिशा में आकर उसने म्हेच्छों के थीप मदान

कुष्ठरोगेण महता क्ष्येण च समन्वितम् ॥ ३५

ततः शोक्न महता संतमो वाक्यमब्रवीत् ।

हे म्लेच्छा नौमि पुरुपं स्वगृहं च नयाम्यहम् ॥ ३६

तत्राहमेनं निरुजं करिष्ये यदि मन्यथ ।

वधेवि सर्वे ते म्लेच्छाः पुरुषं तं दयापरम् ॥ ३७

ऊचुः प्रणतमर्वाङ्गा यया जानासि तत्कुरु ।

तत आनीय पुरुपान् शिविकायाहनोचितान् ।। ३८

दत्त्वा शुल्कं च द्विगुणं सुसेन नयत द्विजम् |

ततः श्रुत्वा तु वचनं तस्य राज्ञो दयावतः ॥३९

गृहीत्वा शिविकां क्षिप्रं कुरुक्षेत्रेण यान्ति ते ।

तब नीत्वा स्थाणुतीर्थे अवतार्य च ते गताः ।। ४0

ततः स राजा मध्याह्न तं स्नापयति वै तदा ।

ततो वायुरन्तरिक्ष इदं वचनममवीत् ।। ४१

मा तात साहसं कापीस्तीर्थ रक्ष प्रयत्नतः ।

अयं पापेन घोरेण अतीव परिवेष्टितः ॥ ४२

वेदनिन्दा महत्पापं यस्यान्तो नैव लम्यते ।

सोऽयं स्नानान्महत्तीर्थ नाशयिष्यति तत्क्षणात् ॥ ४३

पिता परलोकगामी हो गए हैं। (२७-२८)

तदनन्तर दिव्य दृष्टि से उसको देख कर नारद ने पहा-यह क्षय और कुष्ठ रोग से आमारत होरर म्लेच्छों के मध्य उत्पन्न हुआ है। (२९)

उन महात्मा नारद के इस पचन को सुनार दुसात हो उसने विचार किया मुझे क्या करना चाहिये। (३०)

इस प्रसर यिवार पर रहे महात्मा फे मन में यह बुद्धि एत्पन्न हुई कि संमार में पुन उसी पो कहा जाता है जो पितरों का भय से प्राण फरता है। (३१)

इस प्रकार विचार कर उसने नारद मुनि से पूछा-है मुने! में अपने पिता को कैसे मारूं ? (३२)

नारद ने कहा--तुम स्थाणु के महनीयस्यरूप सनिहित सर की ओर जाओ पयं सप्तफ शरीर को दीयों में निर्मल (३३)

महारमा नारद ने यह पान गुन पर यह राजा मन्त्री परपन्य का मार देफर पला गया। (३४)

कुष्ठ और क्षय रोग से आक्रान्त अपने पिता को देखा।(३५)

तदनन्तर महान् शोक सन्तान हो उसने कहा-हे म्लेच्छो । में प्रणाम करता हूँ और इस पुरुष को अपने घर ले जाता हूँ। (३६)

यदि तुम लोगों की अनुमति हो तो इस पुरुष को में यहाँ नोरोग काटेंगा। सभी म्लेच्छों ने सात प्रणिपात पूर्वक उस दयालु पुरुप से कहा-'अच्छा! तुम जैसा समझो पैसा फरो। तदनन्तर शियिकायादकों को युयर उन्हें दुगुना पारिश्रमिक देने के उपरान्त उसने कहा-इस दिन को मुररपूर्वक ले चलो। उस दयालु राजा के यचन को मुन ले पर उन्होंने पालो ठायी और शीघ्रता से कुरुत्तेय होते हुए स्थाणुतीर्थ में ले जाफर उसे स्वारने के पक्षपान ये पते गए। (३७-४०)

तदनन्तर जब वे राजा मम्यान में इसे स्नान कराने लगे सो अन्तरिक्ष से वायु ने यह पपन रहाहे तात ! साहस मन को। दीयं की प्रपरनपूर्वक रक्षा करो। यह पोर पाप से अत्यम आकृत है। वेदनिम्दा महापाप है, जिसमाजन्त

एतद् वायोर्वचः श्रु स्वादुःखेन महताऽन्वितः ।

उवाच शोकसंतप्तस्तस्य दुःखेन दुःखितः ।

एप घोरेण पापेन अतीव परिवेष्टितः ॥ ४४

प्रायश्चित्तं करिष्येऽहं यद्वदिप्यन्ति देवताः ।

ततस्ता देवताः सर्ग इदं वचनमब्रुवन् ॥ ४५

स्नात्या स्नात्वा च तीर्थेषु अभिपिञ्चस्व वारिणा।

ओजसा चुलुकं यावत् प्रतिकूले सरस्वतीम् ॥ ४६

स्नात्वा मुक्तिमवाप्नोति पुरुपः अद्यान्वितः ।

एप स्वपोपणपरो देवपणतत्परः ॥ ४७

ब्राह्मणैश्च परित्यक्तो नैप शुद्धयति कर्हि चित् ।

तस्मादेनं समुदिश्य स्नात्वा तीर्थेषु भक्तितः ॥ ४८

अभिपिञ्चस्व नोयेन ततः पूतो भविष्यति ।

इत्येवद्वचनं श्रुत्वा कृत्वा तस्याश्रमं वतः ॥ ४९

तीर्थयात्रां ययौ राजा उद्दिश्य जनकं स्वकम् ।

स तेषु प्लावनं कुर्वस्तीर्थेषु च दिने दिने।।५०

अभ्यपिश्चत् स्वपितरं वीर्थतोयेन नित्यशः।

एतस्मिन्नेव काले तु सारमेयो जगाम ह ॥ ५१

स्थाणोर्मठे कौलपतिर्देवद्रव्यस्य रक्षिता ।

परिग्रहस्य द्रव्यस्य परिपालयिता सदा ॥ ५२

प्रियश्च सर्वलोकेषु देवकार्यपरायणः ।

तस्यैवं वर्तमानस्य धर्ममार्गे स्थितस्य च ॥५३

कालेन चलिता बुदिर्दैवद्रव्यस्य नाशने ।

तेनाधर्मेण युक्तस्य परलोकगतस्य च ॥ ५४

दृष्ट्वा यमोऽब्रवीद् वाक्यं श्वयोनि बज मा चिरम् ।

तवाक्यानन्तरं जातः श्वा वै सौगन्धिके वने ।। ५५

ततः कालेन महता श्वयूथपरिवारितः ।

परिभूतः सरमया दुःखेन महता वृतः ॥ ५६

त्यक्त्वा द्वैतवनं पुण्यं सानिहत्यं ययौ सरः।

तस्मिन् प्रविष्टमात्रस्तु स्थागोरेव प्रसादतः ॥ ५७

अतीव तृपया युक्तः सरस्वत्यां ममज है।

तत्र मंप्लुतदेहस्तु रिमुक्तः सर्वकिल्बिपैः ।। ५८

आहारलोमेन तदा प्रविवेश कुटीरकम् ।

नहीं होता। अतएव यह स्नान द्वारा इस महान तीर्थ को तत्काल नष्ट कर देगा। (४१-४३)

वायु के इस वचन को सुन कर दुःखी एवं शोक-सन्तप्त राजा ने पहा-यह घोर पाप से सुतरां व्याप्त है। (४८)

देवगण जो प्रायश्चित्त कहेंगे उसे मैं करूँगा । तदनन्तर उन सभी देवताओं ने यह बात कही-तीथों में स्नान करके जल द्वारा इसे अभिषिक्त करो। सरस्वती के किनारे ओजस से घुलुक पर्यन्त प्रत्येक तीर्थ में स्नान करने वाला श्रद्धालु पुरुष मुक्ति प्राप्त करता है। यह स्वपोषण मे रत एवं देवनिन्दा मे तत्पर था तथा ब्राह्मणों ने इसका परित्याग कर दिया था। यह कदापि शुद्ध नहीं हो सकता । अतः इसके उद्देश्य से भक्तिपूर्वक तीर्थों में स्नान कर जल से इसे अभिषिक्त करो। इससे यह शुद्ध हो जायगा। यह वचन सुनने के उपरान्त वहाँ उसका आश्रम बनाकर राजा अपने पिता के निमित्त तीर्थयात्रा करने गये। प्रतिदिन उन तीयों में स्नान कर वे तीर्थजल से अपने पिता को अभिपिछ करने लगे। इसी समय वहाँ एक कुत्ता आया । (पूर्वकाल में) वह स्थाणु तीर्थ स्थित मठ में

देव द्रव्य का रक्षक, परिग्रह के द्रव्य का सदा पाठक, सर्वलोकप्रिय एव देव-कार्य में

रत (महन्त) था। इस प्रकार जीवनयापन कर रहे तथा धर्म मार्ग में स्थित उस कौलपति की बुद्धि कालान्तर में विचलित हो गई। वह देवद्रव्य का नाश करने लगा। उस अधर्म से युक्त होकर उसके परलोक में जाने पर यमराज ने उसे देखकर कहा "कुत्ते की योनि में जाओ, देर मत करो।" उनके कहने के पश्चात् वह सौगन्धिक वन में धुत्ता बनकर (४५-५५)

तदनन्तर दीर्घ काल बीतने पर कुत्तों के समूह से आवृत यह कुतिया से अपमानित होने के कारण अत्यन्त उत्पन्न हुआ। दुसित हुआ।

द्वैतवन को छोड़ कर वह पवित्र साग्निहत्य सरोवर में पहुंचा। उसमें प्रवेश करते ही स्थाणु की कृपा से अत्यन्त तृषायुक्त होकर उसने सरस्वती नदी में डुबकी लगाई। उसमें स्नान करने के उपरान्त वह समस्त पापों से विमुक्त हो गया। (५७-५८)

तदनन्तर आहार के लोभवश वह कुटी में प्रविष्ट हुआ । कुत्ते को प्रवेश करते देख भयग्रस्त हो उसने (वन) ने उसका

प्रविशन्तं तदा दृष्ट्वा श्वानं मयसमन्वितः ।। ५९ :

स तं पस्पर्श शनकै. स्थाणुतीर्थे ममज है ।

पततः पूर्वतीर्थेषु निग्रुपैः परिपिञ्चत. ॥ ६०

शुनोऽस्य गात्रसभूतैरबिन्दुभिः स सिश्चितः ।

विरक्तदृष्टिश्व शुनः क्षेपेण च ततः परम् ॥ ६१

स्थाणुतीर्थस्य माहात्म्यात् स पुत्रेण च तारितः ।

नियतस्तरक्षणाजातो दिव्यदेहसमन्वितः ।

प्रणिपत्य तदा स्थाणु स्तुति कर्तुं प्रचक्रमे ।। ६२

वेन उवाच ।

प्रपद्ये देवमीशान त्वामजं चन्द्रभूपणम् ।

महादेवं महात्मान विश्वस्य जगतः पतिम् ॥ ६३

नमस्ते देवदेवेश सर्वशत्रुनिपूदन ।

देवेश वलिविष्टम्भदेवदैत्यैश्च पूजित ।। ६४

विरूपाक्ष सहस्राक्ष व्यक्ष यक्षेश्वरप्रिय ।

सर्वत. पाणिपादान्त सर्वतोऽक्षिशिरोमुस ।। ६५

सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठसि ।

शङ्कुकर्ण महाकर्ण कुम्भकर्णार्णवालय ॥ ६६

गजेन्द्रकर्ण गोकर्ण पाणिकर्ण नमोऽस्तु ते ।।

शतजित शतावत शतोदर शतानन ॥ ६७

गायन्ति त्वां गायत्रिणो घर्चयन्त्यमणिः

ब्रह्माणं त्वा शतक्रतो उद्वंशमिव मेनिरे ॥ ६८

मूत्तौं हि ते महामूर्वे समुद्राम्युधरास्तथा ।

देवताः सर्व एवात्र गोष्ठे गाव इवासते ॥ ६९

शरीरे तव पश्यामि सोममग्नि जलेश्वरम् ।

नारायणं तथा सूर्य ब्रह्माणं च वृहस्पतिम् ॥ ७०

भगवान् कारणं कार्य क्रियाकारणमेव तत् ।

प्रभवः प्रलयश्चैव सदसच्चापि दैवतम् ॥ ७१

नमो भवाय शर्वाय परदायोग्ररूपिणे ।

अन्धकासुरहन्त्रे च पशूनां पतये नमः ॥ ७२

त्रिजटाय विशीय त्रिशूलासक्तपाणये।

व्यम्बकाय त्रिनेत्राय त्रिपुरन नमोऽस्तु ते ॥ ७३

नमो मुण्डाय चण्डाय अण्डायोत्पत्तिहेतवे ।

धीरे से स्पर्श किया एव धीरे धीरे स्थाणुतीर्थ में मजन किया। पूर्वतीर्थों में स्नान कर तीर्य जल से अभिषिक्त करने वाले पुत्र से परिपिशित होने, एव उस कुत्ते के शरीर से निकले जलबिन्दुओं से सिञ्चित होने तया कुत्ते (के भय चश) स्थाणुतीर्य में गिरने से वह विरक्तदृष्टि हो (५९-६१)

स्थाणुतीर्थ के माहात्म्य से पुत्र द्वारा तारित होने से नियमधारी वह तरक्षण दिव्यदेह युक्त होकर स्थाणु को प्रणाम करने के उपरान्त स्तुति करने लगा। (६२)

वेन ने कहा-में आप अज, चन्द्रभूषण, ईशान, देव, महात्मा, महादेव, समस्त जगत के पति की शरण ग्रहण करता हूँ। (६३)

हे देवदेवेश । हे समस्त शनुभों के निपूदन । हे देवेश । हे पलि पो निरुद्ध करने याने। हे देय-दैत्यों से पूजित । आपरो नमस्कार है। (६)

हे विरूपाम। हे सहसा । हे श्या । हे यक्षेश्वर प्रिय । हे चारों ओर से पाणिपादयुक्त हे पारों ओर और एवं मुख्याने । आपको नमस्कार है। (६५)

आपय धोत्र सभी स्थानों पर व्याप्त है। ससार में आपने सभी ग्रे आवृत कर रस्सा है। हे शकणे! हे

महाकर्ण। हे कुम्भकर्ण । हे समुद्र निवासी (आपको नमस्कार है)। हे गजेन्द्रकर्ण । हे गोकर्ण ! हे पाणिकर्ण ! हे शतजित । हे शतावर्त । हे शतोदर! हे शवानन! आपको नमस्कार है। (६७)

गायत्री जपने वाले आपकी ही महिमा गाते हैं। सूर्योपासक आपकी ही सूर्य रूप से उपासना करते हैं। आप को ही सभी लोग इन्द्र से उत्कृष्ट वंशवारा ब्रह्मा मानते हैं। (६८)

हे महामूटिं! आपकी मूर्ति में समुद्र, मेघ और समस्त देवता इस प्रकार स्थित जैसे गोशाला में गौर निरास करती है। (६६)

आपके शरीर में में सोम, अग्नि, वरुण, नारायण, सूर्य, वझा, और वृहस्पति को देख रहा हूँ। (७-)

आप भगवान्, पारण, कार्य, क्रिया-कारण, प्रभव, प्रलय, सत्, असत् एवं देवत हैं। (७१)

भय, रार्थ, परद, उमरूपी, अन्धकासुरइन्ता और पशुओं के पति को नमस्कार है। (७२)

है त्रिपुरनाशक | दोन जटा वाले, तीन शिर पाने, निशूल में आसकपाणि पाने, ऽयम्यक, त्रिनेत्र स्वरूप आप को नमस्कार है।

डिण्डिमासक्तहस्ताय डिण्डिमुण्डाय ते नमः ॥ ७४ ।

नमोर्ध्वकेशदंष्ट्राय शुष्फाय विकृताय च ।

धूम्रलोहितकृष्णाय नीलग्रीवाय ते नमः ।। ७५

नमोऽस्त्वप्रतिरूपाय विरूपाय शिवाय च ।

सूर्यमालाय सूर्याय स्वरूपधजमालिने ।। ७६

नमो मानातिमानाय नमः पटुतराय ते ।

नमो गणेन्द्रनाथाय वृपम्कन्धाय धन्विने ।। ७७

समन्दनाय चण्डाय पर्णधारपुटाय च ।

नमो हिरण्यवर्णाय नम. कनकवर्चसे ।। ७८

नमः स्तुताय स्तुत्याय स्तुतिस्थाय नमोऽस्तु ते ।

सर्वाय सर्वभक्षाय सर्वभृतशरीरिणे ॥ ७९

नमो होने च हन्त्रे च सितोदापताकिने ।

नमो नम्याय नसाय नमः कटकटाय च ॥ ८०

नमोऽस्तु कृशनाशाय शयितायोत्थिताय च ।

स्थिताय धायमानाय मुण्डाय कृटिलाय च ॥ ८१

नमो नर्तनशीलाय लयवादित्रशालिने ।

नाट्योपहारलुब्धाय मुखवादिवशालिने ।। ८२

नमो ज्येष्ठाय श्रेष्ठाय चलातिबलधातिने ।

कालनाशाय कालाय ससारक्षयरूपिणे ।। ८३

हिमबदुहितुः कान्त भैरवाय नमोऽस्तु ते ।

उग्राय च नमो नित्य नमोऽस्तु दशाहवे ॥ ८४

चितिभस्मप्रियायैव कपालासक्तपाणये ।

विभीपणाय भीष्माय भीमरतधराय च ॥ ८५

नमो विकृतपत्राय नमः पूतोग्रदृष्टये ।

पक्काममासलुब्धाय तुम्बिवीणाप्रियाय च ॥ ८६

नमो वृपाङ्कवृक्षाय गोवृषाभिरुते नमः ।

कटङ्कटाय भीमाय नमः परपराय च ॥ ८७

नमः सर्ववरिष्ठाय वराय वरदायिने ।

नमो विरक्तरक्ताय भावनायाक्षमालिने ।। ८८

विभेदभेदभिन्नाय छायायै वपनाय च ।

अबोरघोररूपाय घोरघोरतराय च ।। ८९

नमः शिवाय शान्ताय नमः शान्ततमाय च ।

बहुनेत्रपालाय एकमूः नमोऽस्तु ते ॥ ९०

नम. क्षुद्राय लुब्धाय यज्ञभागप्रियाय च |

मुण्ड, चण्ड, अण्ड, उत्पत्तिहेतु, डिण्डिमपाणि एव डिण्डिमुण्ड आप को नमस्कार है। (७४)

ऊर्चकेश, ऊदष्ट्र, शुष्क, विकृत, धूम्र, लोहित, कृष्ण एव नीलग्रीव आपको नमस्कार है। (७५)

अप्रतिमस्वरूप, विरूप, शिव, सूर्यमालाधारी, सूर्य एव स्वरूपध्वजमाली को नमस्कार है। (७६)

मनातिमान को नमस्कार है । आप पटुतर को नमस्कार है। गणेन्द्रनाथ, वृपस्कन्ध एव धन्वी को नमस्कार है। (७७)

सकन्दन, चण्ड, पर्णधारपुट एवं हिरण्यवर्ण को नम स्कार है । कनकवर्चस् को नमस्कार है। स्तुत तथा स्तुत्य को नमस्कार है। स्तुतिस्थ, सर्व, सर्वभक्ष एव सर्वभूतशरीरी आप को नमस्कार है। (७६)

होता, हन्ता तथा सितोप्रपताकी को नमस्कार है। नम्य एव नम्र का नमस्कार है। कटकट को नमस्कार है। (८०)

कृशनाश, शयित, उस्थित, स्थित, धावमान, मुण्ड एय कुटिल को नमस्कार है। (८)

नर्तनशील, लयवादितशाली, नट्योपहारलुब्ध एव मुखवादिनशाली को नमस्कार है। (८२)

ज्येष्ट, श्रेष्ठ, बलरातिबलपाती, कालनाश, काल एव ससार- क्षयरूपीको नमस्कार है। (८३)

हे हिमालय की दुहिता के पति | आप भैरव को नमस्कार है । उप्र को नित्य नमस्कार है । दश बाहों वाले को नमस्कार है। (८४)

चितिभस्मप्रिय, कपालपाणि, विभीषण, भीष्म एवं भीमव्रतधर को ( नमस्कार है)। (८५)

विकृतवक्त्र को नमस्कार है। पूतोप्रदृष्टि,पक्काममासलुब्ध एव तुम्बिवीणाप्रिय को नमस्कार है। (८६)

घृपाकवृक्ष को नमस्कार है। गोवृषाभिस्त को नमस्कार है। कटकट, भीम एव परपर को नमस्कार है। (८७)

सर्ववरिष्ट, घर एव वरदायी को नमस्कार है। विरक्तरक्त, भावन एवं अक्षमाली को नमस्कार है। (८८)

विभेदभेदभिन्न, छाया, तपन, अघोरघोररूप एव घोर घोरतर ( को नमस्कार है)। (८६)

शिव एव शान्त को नमस्कार है। शान्ततम, अनेकनेत्र एव कपालधारी को नमस्कार है। हे एकमूर्ति । आपका नमस्कार है। (९०)

क्षुद्र, लुब्ध, यज्ञमागप्रिय, पचाल एय सिताह का

पश्चालाय सिताङ्गाय नमो यमनियामिने ।। ९१

नमश्चित्रोरुपण्टाय घण्टाघण्टनिपण्टिने ।

सहस्रशठपण्टाय घण्टामालाविभूपिणे ॥ ९२

प्राणसंघट्टगाय नमः फिलिफिलिप्रिये ।

हुंझुकाराय पाराय हुहुंकारप्रियाय च ॥ ९३

नमः समममे नित्यं गृहमनिकेतिने ।

गर्भमांमशृगालाप तारकाय वराय च ॥ ९४

नमो यज्ञाय यजिने दुताय प्रहुताय च ।

यशवाहाय हव्याय तप्याय वपनाय च ।। ९५

नमस्तु पयसे तुम्यं तुण्डानां पतये नमः ।

अमदायानपतये नमो नानान्नभोजिने ।। ९६

नमः महशीय सहरूचरणाय च ।

सहस्रोधवशूलाय सहस्राभरणाय च ।। ९७

यालानुचरगोप्ने च पाललीलापिलासिने ।

नमो पालाप याय क्षुधाय क्षोभणाय च ॥ ९८

गगाललिताशाय मुशाय नमः ।

नमः पटकर्मतुष्टाय त्रिकर्मनिरताय च ॥ ९९

नग्नप्राणाय चण्डाय कशाय स्फोटनाय च ।

धर्मार्थकाममोक्षाणां कथ्याय कथनाय च ॥ १००

सावयाय साहथमुख्याय सासययोगमुखाय च ।

नमो विरयरध्याय चतुप्पथरथाय च ॥ १०१

कृष्णाजिनोचरीयाय ग्यालयमोपवीतिने ।

वक्त्रसंधानकेशाय हरिकेश नमोऽस्तु ते ।

ध्यम्मिकाम्मिकनाथायव्यक्ताव्यक्ताय वेधसे ।। १०२

कामकामदकामम तमासविचारिणे।

नमः सर्वद पापप्त कल्पसंख्याविचारिणे ॥ १०३

महामत्त्व महागहो महारल नमोऽस्तु ते ।

महामेघ महाप्ररय महाकाल महायुते ॥ १०४

मेघावर्त युगावर्च चन्द्रार्कपतये नमः ।

त्वमन्नमन्नभोक्ता च पक्वमुक् पावनोचम ॥ १०५

जरायुजाण्डवाश्चैव स्वेदजोद्भिदवाथ ये ।

त्वमेव देवदेवेश मृतप्रामवतुधिः ॥ १०६

स्रया चराचरस्थास्य पाता इन्ता तथैव च ।

नमस्कार है। यम के नियमनकर्ता को नमस्कार है। (९१)

चियोरपण्ट, पण्टापण्टनिपण्टी, सहतशतपण्ट प्पं पण्टामालायिभूपित को नमस्सर है। (१२)

प्रागसंपटगर्य, मिलिपिरिप्रिय, हुँदुकार, पार एवं मारप्रिय को नमस्कार है। समसम, गृहमनिरेनी, गर्भमांसएगाल, दारक पंतर को नित्य नमसर है। (९४)

पायजमान, हुन, प्रत, यज्ञयाह, हव्य, सप्य और सपनो नमस्सा है। पयस आपये नमरकार है। मुणों के पति को नम- गधर।प्रद,अमपनि एवं नानामभोजी को नमार

साप, सहरापरण, सहसोपताल एवं साररा. भरमो नमरार है। (६७)

पाअनुपपता, पाउदीलावियमी, पाल, धुम्प धोमन नमार है।

गंगा मुलाश, भोर मुझो ग्रे नमत्थर है। पर मंट पर विनिरत नमागर। (९९)

नग्नप्राण, पण्ड, पश, स्फोटन तया धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के मध्य और क्यन यो नमरणार है। (१००)

सांख्य, सांस्यमुख्य, सांस्प-योगमुख, बिरथरप्य तथा चतुप्पथरय को नमस्कार है। है हरिफेश! कृष्णाजिनोत्तरीय, घ्यालयतोपपीती, यश्वसधानरेश, ध्यम्यिाम्यिनाप, पचाम्यक एवं वेधा स्वरूप आपसे नमार है।

हे काम ! हे कामद! हे कामान! आप तात- पिरारी, को नमरघर है। हे सर्वद! हे पापान ! श्राप प्रपसंख्याविपारीको नमस्थर है। (1:3)

हे महासर ! हे महावाटु ! हे महायल! महाने । हे महाय! हे महाय! एवं है महापुति! आपये नमरमार है।

है मेपार ! है युगायतं! आप पन्द्रारंपति ने नमाचर है। भाप ही अर, अन्त के मोजा, पवमुर एवं पापनोरम । पोरेश! बाप ही अपपुन, भगर,

हे मेघार्श्य हे युगावर्त्त आप चन्द्रार्दपति तो नमस्कार है। आप ही अमर के भोष्टा पबयमुक् एवं पादनोत्तम हैं।

हे देवदेवेश आप ही खरायुज अण्डज श्चेदज कद्मिश्च्र चतुबिंच भूतथाम है।

खामाहुन्नि विद्वांसो ब्रह्म प्रमविदां गतिम् ॥ १०७

मनसः परमज्योतिस्त्वं वायुज्योतिषामपि ।

हंसवृक्षे मधुकरमाहुस्त्वां ब्रह्मवादिनः ॥ १०८

यजुर्मयो ऋङ्मयस्त्वामाहुः साममयस्तथा ।

पठ्यसे स्तुतिभिनित्यं वेदोपनिषदां गणैः ।। १०९

ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्रा वर्णावराय ये।

त्वमेव मेघसंघाश्च विद्युतोऽशनिगर्जितम् ॥ ११०

संवत्सरस्त्वमृत्वो मासो मासार्धमेव च ।

युगा निमेपाः काष्ठाश्च नक्षत्राणि ग्रहाः कलाः ॥ १११

वृक्षाणां ककुभोऽसि त्वं गिरीणां हिमवान् गिरिः ।

व्याघो मृगाणां पत्तां ताक्ष्योऽनन्तश्व भोगिनाम्॥११२

क्षीरोदोऽस्युदधीनां च पत्राणां धनुरेव च ।

वज्र प्रहरणानां च व्रतानां सत्यमेव च ।। ११३

त्वमेव द्वेष इच्छा च रागो मोहः क्षमाक्षमे ।

व्यवसायो धृतिलोमः कामक्रोधी नयाजयो ।। ११४

स्वं शरी त्यं गदी चापि खट्वाङ्गी च शरासनी ।

छेचा मेत्ता प्रहर्ताऽसि मन्ता नेता सनावनः ॥ ११५

दशलक्षणसंयुक्तो धर्मोर्थः काम एव च ।

समुद्राः सरितो गङ्गा पर्वताव सरांसि चं ॥ ११६

लतापल्ल्यस्तृपोपध्यः पशवो मृगपक्षिणः ।

द्रव्यकर्मगुणारम्भः कालपुष्पफलप्रदः ॥ ११७

आदिवान्तश्च वेदानां गायत्री प्रणवस्तथा ।

लोहितो हरितो नीलः कृष्णः पीतः सितस्तथा ॥ ११८

कद्रुश्च कपिलश्चैव कपोतो मेचकस्तथा ।

सवर्णश्चाप्यवर्णाश्च कर्ता हर्ता त्वमेव हि ॥ ११९

त्वमिन्द्रश्च यमश्चैव वरुणो धनदोऽनिलः।

उपप्लवचित्रमानुः स्वानुरेव च ॥ १२०

शिक्षाहौत्रं त्रिसौपर्ण यजुषां शतरुद्रियम् ।

पवित्रं च पवित्राणां मगलानां च मङ्गलम् ।। १२१

विन्दुको गिरिजो वृक्षो मुद्रं चाखिलजीवनम् ।

आप शरघारी, गदाधारी, सट्वाङ्गी एवं धनुर्धारी

आप इस चराचर के स्रष्टा, पाता एवं हन्ता है।। ब्रह्मवेत्ता लोग आप को ब्रह्म एवं ब्रह्मवेत्ताओं की गति रहते हैं। (१०७)

आप मन की परमज्योति एवं ज्योतियों (नक्षत्रों) को मी (धारक) वायु हैं। ब्रह्मवादी जन आपको हसवृक्ष पर रहने याला मधुकर कहते हैं। (१०८)

आप को यजुर्मय, ऋमय एवं साममय रहते हैं। चेद और उपनिषदों के समूहों द्वारा आप स्तुतियों से पढ़े जाते हैं। (१०६)

थापही प्राह्मण क्षत्रिय, घेश्य, शूद्र, वणों से हीन ( वर्णावर ), मेघसमूह, विद्युत तथा मेघगर्जन है। (११०)

आप संवत्सर, तु, मास, पक्ष, युग, निमेप, काष्टा, नक्षत्र, प्रह तथा कला हैं। (१११)

आप वृक्षों में पकुम ( अर्जुन वृक्ष ), पर्वतों में हिमा- लय, मृगों(पशुओं)मे व्याघ्र, पक्षियों में तार्य (गरुड़) और सों में अनन्त ( शेषनाग) है। (११२)

आप समुद्रों में क्षीरसागर, यन्त्रों में धनुष, अरनों में पन और व्रतों में सत्य हैं। (११२)

आप दी द्वेप, इच्छा, राग, मोह, क्षमा, अक्षमा, व्यवसाय, धैर्य, डोम, काम, क्रोध, जय और पराजय हैं। (१२४)

 आप शरधारी, गद्दाधारी, राष्टवाटी एवं धनुधारी हैं। आप छेत्ता, भेत्ता, प्रहर्ता, मन्ता (मनन करने वाले) नेता और सनातन है। (११५)

आप दश लक्षणों से संयुक्त धर्म, अर्थ एवं काम तथा समस्त समुद्र, नदियाँ, गद्गा, पर्वत एवं सरोवर (११६)

आप समस्त सताएँ, पल्लियाँ, तृण, औषधियों पशु, मृग, पक्षी, द्रव्यकर्मगुणारम्भ एवं समय पर पुष्पफल (११७)

आप वेदों के आदि और अन्ट, गायत्री तथा प्रणन हैं। आप ही लोहित, हरित, नील, कृष्ण, पीत, सित, कद्रु, कपिल, कपोत, मेचक, सवर्ण, अवर्ग, कर्ता एवं हर्चा है। (१९८-११६)

थाप इन्, यम, यरुग, कुवेर, पवन, उपप्ठव, चित्र-भानु, स्यानु एवं मानु हैं। (१२०)

आप शिक्षा, हौत्र, त्रिसीपर्ण, यजुर्वेद का रुद्रिय, पवित्रों में पवित्र एवं महलों में महल है। (१२१)

आप विन्दुक, गिरिज (शिलाजतु !) वृक्ष, मुद्ग, असिल जीवन, प्राण, सत्त्व, रज, सम सथा प्रतिपत्पति (१२२)

आप ही माण, अपान, समान, उदान, म्यान, सम्मेष,

प्राणाः सत्त्वं रजश्चैव तमश्च प्रतिपत्पतिः ॥ १२२

प्राणोऽपानः समानश्च उदानो व्यान एव च ।

उन्मेपश्च निमेषश्च क्षुतं जम्भितमेव च ।। १२३

लोहितान्तर्गतो दृष्टिमहावक्त्रो महोदरः।

शुचिरोमा हरिश्मश्रुरुर्घकेशश्वलाचलः ॥ १२४

गीतवादिवनृत्यज्ञो गीतयादित्रकप्रियः ।

मत्स्यो जालो जलौकाश्च कालः कलिकला कलिः ॥ १२५

अकालश्च विकालश्च दुप्फालः काल एव च ।

मृत्युश्च मृत्युका च यक्षो यक्षभयकरः ॥ १२६

संवर्गकोऽन्तकश्चैव संवर्तकवलाहकः ।

घण्टो घण्टी महाघण्टी चिरी माली च मातलिः ॥ १२७

ब्रह्मकालयमानीना दण्डी मुण्डी त्रिमुण्डधृक् ।

चतुर्युगश्चतुर्वेदश्चातुहत्रिप्रवर्तकः ॥ १२८

चातुराथम्यनेता च चातुर्वर्ण्यकरस्तथा ।

नित्यमक्षप्रियो धृत्तों गणाध्यक्षो गणाधिपः ।। १२९

रक्तमाल्याम्मरधरो गिरिको गिरिकप्रियः ।

शिल्पं च शिल्पिना श्रेष्ठः सर्वशिल्पप्रवर्तकः ॥ १३०

भगनेत्राङ्कशश्चण्डः पूष्णो दन्तविनाशनः ।

स्वाहा स्वधा वपट्कारो नमस्कारो नमो नमः ॥१३१

गूढवतो गुह्यतपास्तारकास्तारकामयः ।

धाता विधाता संधाता पृथिव्या धरणोऽपरः ।। १३२

ब्रह्मा तपश्च सत्यं च ब्रवचर्यमथार्जवम् ।

भृतात्मा भूतकृद् भृतिर्भूतभव्यभवोद्भवः ॥ १३३

भूर्भुवः स्वर्मत चैव ध्रुवो दान्तो महेश्वरः ।

दीक्षितोऽदीक्षितः कान्तो दन्तो दान्तसंभवः॥१३४

चन्द्रावतॊ युगावतः संवर्तकप्रवर्तकः ।

बिन्दु. कामो ह्यणुः स्थूलः कर्णिकारस्रजप्रियः ॥ १३५

नन्दीमुखो मीममुखः सुमुखो दुर्मुखस्तथा ।

हिरण्यगर्भः शकुनिहोरगपतिम्रािट् ।। १३६

अधर्महा महादेवो दण्डधारो गणोत्कटः।

गोनो गोप्रतारव गोपेश्वरवाहनः ॥ १३७

त्रैलोक्यगोप्ता गोविन्दो गोमार्गो मार्ग एव च ।

निमेप, क्षुत (छींक) एव जृम्भित है । (१२३)

आप लोहितान्तर्गत, दृष्टि, महायत, महोदर, शुचि रोमा, हरिश्मश्रु, ऊर्ध्वकेश एव चल तथा अचल हैं। (१२४)

आप गीतवादित्रनृत्यक्ष तथा गीतवादिनकप्रिय हैं। आप मत्स्य, जाल, जलौका, काल तथा केलि कला एय फलद हैं।

आप असल, विकाल, दुष्काल और कालस्वरूप है। आप मृत्यु, मृत्युक्र्ता, यक्ष तथा यक्ष भयङ्कर है। (१२६)

आप सर्तक, अन्तक ण्य सवर्वकपलाइक है। आप घण्ट, घण्टी, महापण्टी, चिरी, माली और मातलि (१२)

आप ब्रह्मा, काल, यम और अग्नि को दण्ड देने पाले मुण्टी निमुण्डधारी हैं। आप चतुर्युग, धतुर्वेद एव चातुहर्लोन के प्रवर्तक हैं। (१२८)

आप चारों आश्रमों के नेता तथा चारों यगों की ष्टि पर्सा है। आप नित्य यूतप्रिय, धूर्त, गणाध्यक्ष और गणाधिप है। (१२६)

आप रतमालाम्बरधारी, गिरिक गिरिकप्रिय, शिल्प,

शिल्पिश्रेष्ठ तथा सर्वशिल्पप्रवर्तक है। (१३०)

आप भगनेननाशक चण्ड एव पूपा के दातों के विना- शक हैं। आप स्वाहा, स्वधा, वपटकार और नमस्कार हैं। आप को यारम्बार नमस्कार है। (१३१)

आप गूढप्रत, आप गुह्यतपा, तारक और तारकामयः हैं।आप धावा, विधाता, सघाता और पृथिवी के श्रेष्ठ धारणकर्ता हैं। (१३२)

आप ब्रह्मा, तप, सत्य, व्रत-चर्या और आर्जय है। आप भूतात्मा, भूतकृद् भूति और भूतभव्यभवोद्भव (१३३)

आप भू भुव व ऋत, भुव, दान्त तथा महेश्वर है। आप दीक्षित, अदीक्षित, कान्त, दुर्दान्त और दान्तसम्भव है। आप चन्द्रावत, युगायर्त, सवर्तक और प्रयत है। आप बिन्दु, काम, अणु, स्थूल तथा कर्णिकार की माला के प्रेमी आप नन्दीमुस, भीममुख, सुमुख तथा दुर्मुख है। हिरण्यगर्भ, शकुनि, महासर्पपति विराटू है। (१३६)

आप अपमहन्ना, महादेव, दण्डधार, गणोत्कट, गोनई गोप्रवार तथा गोपेपरवाहन हैं।  (१३५)

स्थिर श्रेष्ठच स्थाणुश्च विक्रोशः क्रोश एव च ॥ १३८

दुर्वारणो दुर्विपहो दुःसहो दुरतिक्रमः ।

दुई? दुष्प्रकाशश्च दुर्दशों दुर्जयो जयः ॥ १३९ .

शशाङ्कानलशीतोष्णः क्षुत्तष्णा च निरामयः।

आधयो व्याधयश्चैव व्याधिहा न्याधिनाशनः ॥ १४०

समूहश्च समूहस हन्ता देवः सनातनः ।

शिखण्डी पुण्डरीकाक्षः पुण्डरीकवनालयः ॥ १४१

ध्यमको दण्डधारश्च उग्रदंष्ट्रः कुलान्तकः ।

विपापहः सुरश्रेष्ठः सोमपास्त्वं मरत्पते ।

अमृताशी जगन्नाथो देवदेव गणेवरः ॥ १४२

मधुश्च्युताना मधुपो ब्रह्मयाक् त्व, घृतच्युतः ।

सर्वलोकस्य भोक्ता त्वं सर्वलोकपितामह. ॥ १४३

हिरण्यरेताः पुस्पस्त्वमेकः

स्व स्त्री पुमास्त्य हि नपुंसकं च ।

पालो युवा सपिरो दवदष्ट्रा

स्वन्नो गिरिविश्वकृद् विश्वहर्ता ॥ १४४

त्वं वै धाता विश्वकृतां वरेण्यम् ।

त्वां पूजयन्ति प्रणताः सदैव ।

चन्द्रादित्यो चक्षुषी ते भवान् हि

त्वमेव चाग्निः प्रपितामहथ ।

आराध्य त्वा सरखती चाग्लभन्ते

अहोरात्रे निमिपोन्मेपकर्ता ॥ १४५

न ब्रह्मा न च गोविन्द पौराणा ऋपयो न ते ।

माहात्म्यं वेदितु शक्ता याथातथ्येन शकर ।। १४६

पुंसा शतसहस्रागि यत्समात्य तिष्ठति ।

महतस्तमस. पारे गोसा मन्ता भवान् सदा ॥ १४७

य विनिद्रा जितश्वासा. सत्त्वस्था. सयतेन्द्रियाः।

ज्योतिः पश्यन्ति युञ्जानास्तस्मै योगात्मने नमः ॥ १४८

या मूर्तयश सूक्ष्मास्ते न शक्या या निदर्शितुम् ।

वाभिमा सतत रक्ष पिता पुत्रमियौरसम् ॥ १४९

रक्ष मा रक्षणीयोग्हं तपानघ नमोऽस्तु ते ।

आप त्रैलोक्यगोप्ता गोविन्द, गोमार्ग दया मार्ग हैं। आप स्थिर, श्रेष्ठ, स्थाणु, विक्रोश तथा क्रोश है। (१३८)

आप दुर्धारण, दुर्विपह, दुस्सह, दुरविक्रम, दुर्धर्ष, दुष्प्रकाश, दुर्दर्श, दुर्जय तथा जय हैं। (१३९)

आप शशाङ्क, अनल, शीत, उष्ण, क्षुधा, तृष्णा, निरामय, आधि, व्याधि, व्याधिदा तथा व्याधिनाशक है। (१४०)

आप समूह के समूह, इन्ता तया सनातन देव है। आप शिखण्डी, पुण्डरीक्ष तथा पुण्डरीकवनालय हैं। (१४१)

हेमरुत्पति। हे देवदेव । आप ज्यदक, दण्डयारी, उप्रर्दष्ट्र, फुलान्तक, विपापह, सुरश्रेष्ठ, सोमपायी, अमृताशी, जगन्नाथ तया गणेश्वर हैं। (१४२)

आप मधुरच्युतों के मधुप, ब्रह्मवार, घृतच्युत, सरोकभोक्ता एव सर्वलोक-पितामह है। (१५३)

आप हिरण्यरेता एक पुरुष है । आप स्त्री, पुरुष तथा नपुंसक भी है। आप ही हमारे पालक, युया, पृष्ट, देय दंष्ट्रा, गिरि, विघसा तथा विश्वचा है। (१४४)

आप विश्वनिर्माणकर्ताओं में श्रेष्ठ धाता है। प्रणत जन सदैव आप की पूजा करते हैं। चन्द्रमा एय सूर्य आप के नेत्रस्वरूप हैं। आप ही अग्नि एव प्रपितामह हैं। सरस्वतीस्वरूप आप की आराधना कर लोग पाणी की प्राप्ति करते हैं। आप अहोरात्र में निमेप एव उन्मेप के (१४५)

हे शङ्कर । प्रझा, गोविन्द तथा प्राचीन ऋषि भी यथार्थत आप के माहात्म्य को नहीं जान सकते। (१४६)

आप लाखों पुरुषों को समायूद कर स्थित है। आप सदा महान तम से परे रहने वाले गोप्ता एवं मन्ता है। (१४७)

विनिद्र, जितरवास,सत्त्वस्य एव संयतेन्द्रिय योगोपासक योगी लोग जिस ज्योति का दर्शन करते हैं उस योगात्मक को नमस्कार है। (१४८)

सूक्षम होने के कारण आप की जो मूर्तियों प्रदर्शित नहीं की जा सस्ती उनके द्वारा सदा आप मेरी इस प्रकार रक्षा करें जैसे पिता औरस पुत्र की रक्षा करता है। (१८६)

हे अनप। आप मेरी रक्षा करें। में श्राप का रक्षरट्रिय

भक्तानुकम्पी भगयान् भक्तचाहं सदा त्वयि ॥ १५०

नटिने दण्डिने नित्यं लम्बोदरशारीरिणे ।

कमण्डलुनिपगाय तस्मै रुवात्मने नमः ॥ १५१

यस्य केशेषु जीमूता नधः सर्वाङ्गसन्धिषु ।

कुक्षौ समुद्राश्चत्वारस्तस्मै तोयात्मने नमः ॥ १५२

संभक्ष्य सर्वभूतानि युगान्ते पर्युपस्थिते ।

य. शेते जलमध्यम्थस्त प्रपद्येऽम्बुशायिनम् ।। १५३

प्रविश्य वदनं राहोर्यः सोम पिवते निशि ।

ग्रसत्यकं च स्वर्भानू रक्षितस्तव तेजसा ॥ १५४

ये चात्र पतिता गर्दा रुद्रगन्धस्य रक्षणे ।

नमस्तेऽस्तु स्वधा स्वाहा प्राप्नुवन्ति तदद्भुते ॥ १५५

येऽड गुष्ठमात्राः पुस्पा देहस्थाः सर्वदेहिनाम् ।

रक्षन्तु ते हि मा नित्य ते मामाप्याययन्तु वै ॥ १५६

ये नदीपु समुद्रेषु पर्वतेषु गुहासु च ।

वृक्षमुलेषु गोप्ठेपु कान्तारगहनेषु च ॥१५७

चतुष्पथेषु रथ्यासु चत्वरेषु सभासु च ।

हस्त्यश्वरथशालासु जीर्णोधानालयेषु च ॥ १५८

ये च पञ्चसु भूतेषु दिशासु विदिशासु च ।

चन्द्रार्कयोमध्यगता ये च चन्द्रार्करश्मिषु ॥ १५९

रसावलगता ये च ये च तस्मात् परं गताः ।

नमस्तेभ्यो नमस्तेभ्यो नमस्तेभ्यश्च नित्यशः ॥ १६०

येपा न विद्यते संख्या प्रमाणं रूपमेव च ।

असंख्येयगणा रद्रा नमस्तेभ्योऽस्तु नित्यशः ॥ १६१

प्रसीद मम भद्रं ते तव भावगतस्य च ।

त्वयि मे हृदय देव त्वयि बुद्धिर्मविस्त्वयि ॥ १६२

स्तुत्वैवं स महादेव विरराम द्विजोत्तमः ।। १६३

इति श्रीवामनपुराणे सरोमाहात्म्ये पड्विंशोऽध्याय ॥ २६ ॥

हूँ। आप को नमस्कार है । आप भक्तानुस्म्पी भगवान हैं एव में सदा आप का भक्त हूँ। (१५०)

जटी, दण्डी, लम्बोदरशरीरी वया कमण्डलुनिपत रुद्रारमा को नमस्कार है। (१५१)

जिनके केशों में मेष, समस्त अंग की सन्धियों में नदियों एप घुक्षि में चारों सागर है उन तोयात्मा को नमस्कार है। (१५२)

युगान्त उपस्थित होने पर समस्त भूतों का भक्षण पर जो जल के मध्य शयन करते हैं उन जलशायी की में शरण लेता हूँ। (१५३)

रात्रि में जो आप राहु के मुख मे प्रवेश कर सोम को पीते हैं हैं तथा आप के सेज से रक्षित राहु सूर्य को प्रसित करता है। (१५४)

रुद्रगन्ध की रक्षा मे यहाँ जो गर्भ गिरे है उन्हें नमस्कार है। उस अद्भुत को ही स्वाहा और स्था प्राप्त (१५५)

समस्त देहियों की देह में स्थित अगुष्ठमाया पाले जो पुरुष है पे निस्य मेरी रक्षा करें तथा पे मुझे आप्या यित करें। (१५६)

जो नदियों, समुद्रों, पर्वतों, गुहाओं, वृक्षमूलों, गोष्ठों, गहनकान्तारों,चतुष्पथों, गलियों,चत्वरों,सभाओं, इस्त्यश्वरय शालाओं, जीर्णोद्यानों, आलयों, पञ्चभूतों, दिशाओं एव विदिशाओं में स्थित, चन्द्रार्कमध्यगत, चन्द्र तथा सूर्य की रश्मियों में स्थित, रसातलाव एव उससे भी परगत है उनको नित्य बारम्बार नमस्कार है। (१५७-१६०)

जिनकी सख्या, प्रमाण और रूप नहीं है उन अस ख्येय रुद्रगणों को सदा नमस्कार है। (१६१)

आप का भला हो। आप के भाव में स्थित मेरे अपर आप प्रसन्न हों।हे देव । आप ही में मेरा दय, मेसी बुद्धि एव मति है। (१६२)

इस प्रकार महादेव की स्तुति कर द्विजोत्तम ने विराम किया। (१६३)

श्रीवामनपुराग के समाहात्म्य च षदसवाँ अध्याय समाप्त ॥२६॥