सरोमाहात्म्ये 23 ब्रह्मा द्वारा की गई शिव की स्तुति हस्तिरुपधारी शिव द्वारा दारुवन के लिङ्ग का आनयन एव सर के पार्श्व में स्थापन, देवों तथा ऋषियों द्वारा शिव की स्तुति

सनत्कुमार उवाच ।

ब्रह्मणो वचनं श्रुत्वा सपयः सर्व एव ते ।

पुनरेव र पप्रच्छुर्जगतः श्रेयकारणम् ॥ १

ब्रह्मोवाच ।

गच्छामः शरणं देवं शूलपाणि त्रिलोचनम् ।

प्रसादाइ देवदेवस्य भविष्यथ यथा पुरा ॥२

इत्युक्ता ब्रह्मणा सार्दू कैलासं गिरिमुत्तमम् ।

ददृशुस्ते समासीनममया सहितं हरम् ॥ ३

वतः स्तोतुं समारब्धो ब्रह्मा लोकपितामहः ।

देवाधिदेवं वरदं त्रैलोक्यस्य प्रभु शिवम् ॥ ४

ब्रह्मोवाच ।

अनन्ताय नमस्तुभ्यं वरदाय पिनाकिने ।

महादेवाय देवाय स्थाणवे परमात्मने || ५

नमोऽस्तु भुवनेशाय तुम्यं तारक सर्वदा ।

ज्ञानानां दायको देवस्त्वमेकः पुरुषोत्तमः ।। ६

नमस्ते पद्मगर्भाय पोशाय नमो नमः ।

पोरशान्तिस्वरूपाय चण्डक्रोध नमोऽस्तु ते ॥७

नमस्ते देव विश्वेश नमस्ते सुरनायक ।

शूलपाणे नमस्तेऽस्तु नमस्ते विश्वभावन ॥८

एवं स्तुतो महादेवो ब्रह्मणा ऋपिभिस्तदा ।

उवाच मा भैप्रजत लिङ्गं वो भविता पुनः ॥९

क्रियतां मद्वचः शीघं येन मे प्रीतिरुत्तमा ।

भविष्यति प्रतिष्ठायां लिङ्गस्यात्र न संशयः ॥१०

ये लिङ्गं पूजयिष्यन्ति मामकं भक्तिमाश्रिताः ।

न तेषां दुर्लभं किंचिद् भविष्यति कदाचन ॥ ११

सर्वेषामेव पापानां कृतानामपि जानता।

सनत्कुमार ने कहा-ब्रह्मा के वचन को सुन कर उन सभी ऋषियों ने पुन ससार के कल्याण का उपाय (१)

ब्रह्मा ने कहा-हम सभी शूलपाणि त्रिलोचन की शरण में चलें। उन्ही देवदेव की कृपा से तुम सभी लोग पूर्वसदृश हो जाओगे। (२)

ऐसा कहे जाने पर वे लोग ब्रह्मा के साथ पर्वत श्रेष्ठ कैलास पर गये। वहाँ उन लोगों ने उमा के साथ बैठे हुए शकर को देखा। (३)

तदनन्तर लोक-पितामह ब्रह्मा ने देवाधिदेव, त्रैकोक्य के प्रभु घरद शंकर की स्तुति करनी प्रारम्भ की।

ब्रह्मा ने कहा- परदाता, पिनाकधारी, महादेव, स्थाणु- स्वरूप, परमात्मा, अनन्त देव को मेरा नमसार है।

हे तारने वाले भुवनेश्वर ! आपको सदा नमस्कार है। आप ही एकमात्र पुरुषोत्तम एवं ज्ञानदायक देव हैं। (६)

पद्मगर्भ के लिये नमस्कार है एव पद्मश को वारम्बार नमस्कार है। हे चण्डकोष! आप घोरशान्तिस्वरूप को नमस्कार है। (७)

हे विश्वेश्वर देव ! आपको नमस्कार है । हे सुरनायक ! आपको नमस्कार है। हे शूलपाणि! आपको नमस्कार है। हे विश्वभावन। आपको नमस्कार है। (८)

ब्रह्मा एव ऋषियों के इस प्रकार स्तुति करने पर महा. देव ने कहा-भयभीत मत होओ। तुम लोग सभी जाओ।लिङ्ग पुन हो जायेगा। (९)

मेरे बचन का शीघ्र पालन करो। लिङ्ग की प्रतिष्ठा करने पर निस्सन्देह मुझे अत्यन्त प्रसन्नता होगी। (१०)

मेरे लिग की भक्ति-पूर्वक पूजा करने वालों को कभी कोई पदार्थ दुर्लभ नहीं होगा।

शुद्धथते लिङ्गपूजायां नात्र कार्या विचारणा ।। १२

युष्माभिः पातितं लिङ्गं सारयित्या महत्सरः ।

सांनिहत्यं तु विख्यातं तस्मिशीघ्रं प्रतिष्ठितम् ॥ १३

यथाभिलपितं कामं ततः प्राप्स्यय ब्राह्मणाः ।

स्थाणुनर्नाम्ना हि लोकेषु पूजनीयो दिवौकसाम् ॥ १४

स्थावीश्वरे स्थितो यस्मात्स्थाण्वीश्वरस्ततः स्मृतः।

ये स्मरन्ति सदा स्थाणुं ते मुक्ताः सर्वकिल्लिपैः ।। १५

भविष्यन्ति शुद्धदेहा दर्शनान्मोक्षगामिनः ।

इत्येवमुक्ता देवेन झपयो ब्रह्मणा सह ।। १६

तस्माद् दारुवनालिझं नेतुं समुपचक्रमुः ।

न तं चालयितुं शक्तास्ते देवा पिभिः सह ।। १७

श्रमेण महता युक्ता ब्रह्माणं शरणं ययुः।

तेषां श्रमाभितमानामिदं ब्रह्माऽब्रवीद् वचः ॥ १८

किं वा श्रमेण महता न य॒यं वहनक्षमाः।

स्वेच्छया पावितं लिङ्गं देवदेवेन शूलिना || १९

तस्मात् तमेव शरणं यास्यामः सहिताः सुरोः ।

प्रसन्नश्च महादेवः स्वयमेव नयिष्यति ॥ २०

इत्येवमुक्ता ऋषयो देवाश्च ब्रह्मणा सह ।

कैलासं गिरिमासेद् रुद्रदर्शनकाशिणः ॥ २१

न च पश्यन्ति तं देवं तवश्चिन्तासमन्विताः।

ब्रह्माणमूचुर्मुनयः क्व स देवो महेश्वरः ॥ २२

ततो ब्रह्मा चिरं च्यात्वा ज्ञात्या देवं महेश्वरम् ।

हस्तिरूपेण तिष्ठन्तं मुनिभिमानमः स्तुतम् ।। २३

अथ ते ऋषयः सर्वे देवाश्च ब्रह्मणा सह ।

गता महत्सरः पुण्यं यत्र देवः स्वयं स्थितः ।। २४

न च पश्यन्ति तं देवमन्निष्यन्तस्ततस्ततः ।

ततचिन्तान्विता देवा ब्रह्मगा सहिता स्थिताः ॥ २५

पश्यन्ति देवीं सुप्रीतां कमण्डलुविभूषिताम् ।

प्रीयमाणा तदा देवी इदं वचनमब्रवीत् ॥ २६

श्रमेण महता युक्ता अन्वियन्तो महेश्वरम् ।

लिङ्ग-पूजा करने से बुद्धिपूर्वक भी किये गये समस्त पापों की शुद्धि होती है। इसमें कोई सन्देह नहीं करना चाहिये। (१२)

अपने द्वारा गिराये गये लिङ्ग को उठाकर सानिहत्य नाम से विख्यात महा सरोवर तीर्थ मे शीघ्र प्रतिष्ठित (१३)

हे ब्राह्मणो । उससे यथेच्छ कामनाओं की प्राप्ति करोगे। संसार मे स्थाणु नाम से ( प्रसिद्ध वह लिङ्ग) देवताओं का पूजनीय होगा। (१४)

स्थाण्वीश्वर स्थित रहने से (उस लिग को) स्थायी. श्वर कहा जायेगा। सदा स्थाणु का स्मरण करने वाले सभी पापों से मुक्त एय शुद्ध देह होकर (स्थायीश्वर का) दर्शन करने से मोक्षगामी हो जायेंगे । शङ्कर के ऐसा कहने पर ब्रह्मा के सहित ऋषि लोग लिड्ग को उस दारवन से ले जाने का उपक्रम करने लगे। किन्तु ऋपियों के सहित देवगण उसे चालित करने में असमर्थ रहे । (१५-१७)

महान् श्रम से युक्त होकर वे ब्रह्मा की शरण में गए। श्रम से अभितप्त उन लोगों से ब्रह्मा ने यह वचन कहा-(१८)

महान् थम का क्या प्रयोजन ? तुल लोग इसे उठाने में समर्थ नहीं हो सकते । देवाधिदेय शंकर ने स्वेच्छा से लिङ्गको गिराया है। (१९)

अव हे देवो! हमलोग एक साथ उन्हीं की शरण में चले। महादेव प्रसन्न होकर स्वयं ही (लिङ्गको) ले जायेंगे। (२०)

ऐसा कहे जाने पर सभी ऋपि और देवता ब्रह्मा के साथ शकर के दर्शन की इच्छा से कैलास पर्वत पर पहुँचे।

यहां उन्होंने शकर को नहीं देखा। इससे चिन्तित होकर मुनियों ने ब्रह्मा से पूछा कि “वे महेश्वर देव कहाँ हैं?" (२२)

तदनन्तर ब्रह्मा ने देर तक ध्यान लगा कर देसा कि मुनियों के मानस द्वारा सस्तुत महेश्वर देव हाथी के रूप में (२३)

तदुपरान्त वे सभी ऋपि और देवता ब्रह्मा के साथ उस पवित्र महान सरोवर पर पहुँचे जहाँ शंकर स्वय उपस्थित थे। (२४)

वे लोग इधर-उधर ढूँढने पर भी शकर को न देस सके। तदनन्तर ब्रह्मा के साथ चिन्तायुक्त होकर सड़े हुए उन लोगों ने कमण्डलुविभूपित परमप्रसन्न देवी को देखा। प्रसन्न किये जाने पर देयी ने कहा- (२५-२६)

महेश्वर को ढूढते हुये तुम लोग अन्यन्त थक गये हो । हे देयो! अमृत का पान करो। तदनन्तर तुम शंकर को

पीयताममृतं देवास्ततो ज्ञास्यथ शंकरम् ।

एतच्छुत्वा तु वचन भवान्या समुदाहृतम् ॥२७

सुखोपविष्टास्ते देवाः पपुस्तदमृतं शुचि।

अनन्तरं सुसासीनाः पप्रच्छुः परमेश्वरीम् ॥२८

क स देव इहायातो हस्तिरूपधर स्थितः ।

दर्शितश्च तदा देव्या सरोमध्ये व्यवस्थितः ॥२९

दृष्ट्या देवं हर्पयुक्ताः सर्वे देवाः सहर्षिभिः ।

ब्रह्माणमग्रतः कृत्वा इद वचनमब्रुवन् १३०

त्वया त्यक्तं महादेव लिङ्ग त्रैलोक्यमन्दिवम् ।

तस्य चानयने नान्यः समर्थः स्यान्महेश्वर ॥३१

इत्येवमुक्तो भगवान् देवो ब्रह्मादिमिहर।

जगाम मृपिभिः साई देवदारुवनाश्रमम् ।। ३२

तत्र गत्वा महादेवो हस्तिरूपधरो हरः।

करेण जग्राह ततो लीलया परमेश्वर.॥ ३३

वमादाय महादेवः स्तूयमानो महर्षिभिः।

निवेशयामास तदा सरस्पार्श्वे तु पश्चिमे ॥३४

ततो देवाः सर्व एव ऋषयश्च वपोधना.।

आत्मान सफल दृष्ट्या स्तवं चतुर्महेश्वरे ॥ ३५

नमस्ते परमात्मन् अनन्तयोने लोकसाक्षिन्

परमेष्टिन् भगवन् सर्वज्ञ क्षेत्रज्ञ परावरज्ञ

ज्ञानज्ञेय सर्वेश्वर महापिरिश्च महाविभूते

महाक्षेत्रज्ञ महापुरुप सर्वभूतावास

मनोनिवास आदिदेव महादव सदाशिव [5]

ईशान दुर्विज्ञेय दुराराध्य महाभूतेश्वर

परमेश्वर महायोगेश्वर व्यम्पक महायोगिन

परब्रह्मन् परमज्योतिः ब्रह्मविदुत्तम ॐकार

चपट्कार स्वाहाकार स्वधाकार परमकारण

सर्वगत सर्वदर्शिन् सर्वशक्ते मर्वदेव अज [10]

सहस्राचिः पृपार्चिः सुधामन् हरथाम अनन्तधाम

संवर्त संकर्षण वडवानल अग्नीपोमात्मक

पवित्र महापवित्र महामेघ महामायाधर महाकाम

कामहन् हंस परमहंस महाराजिक महेश्वर

महाकामुक महाहंस भयक्ष्यकर सुरसिद्धाचित [15]

हिरण्यवाह हिरण्यरेतः हिरण्यनाभ हिरण्याकेश

जानोगे भवानी द्वारा कथित इस वचन को सुन कर देवताओं ने सुखपूर्वक बैठ कर उस पवित्र अमृत का पान किया। तदनन्तर सुख से बैठे उन लोगों ने परमेश्वरी से पूछा- (२७-२८)

हस्तिरूपधारी वे देव यहाँ आकर कहाँ स्थित हैं ? देवी ने सरोवर के मध्य उन्हें स्थिन दिखाया । (२९)

देव को देख कर ऋषियों सहित हर्षयुक्त सभी देवताओं ने ब्रह्मा को आगे कर यह वचन कहा । (३०)

हे महादेव । आपने रैलोक्य-वन्दित जिस लिग का त्याग किया है उसे लाने मे दूसरा कोई समर्थ नहीं है। (३१)

ब्रह्मादि देवों के ऐसा कहने पर भगवान महादेव ऋषियों के साथ देवदारुवन के आश्रम में गए। (३२)

वहाँ जाकर हस्तिरूपधारी परमेश्वर महादेव ने लीला पूर्वक (लिङ्गको) {ड में उठा लिया। (३३)

महर्षियों से सस्तुत हो रहे महादेव ने उसे लाकर सरोवर के पश्चिम पार्श्व में निवेशित किया। (३४)

तदनन्तर समी देवता एवं तपोधन ऋषि स्वय को सफल हुआ देस महेश्वर की स्तुति करने लगे- (३५)

हे परमात्मन् । हे अनन्तयोने । हे लोकसाक्षिन् । हे परमे प्ठिन् । हे भगवन् । हे सर्वज्ञ । हे क्षेत्रज्ञ । हे परावरज्ञ । हे ज्ञानज्ञेय । हे सर्वेश्वर । हे महाविरिष्ठ । हे महाविभूति ! हे महाक्षेत्रज्ञा हे महापुरुष । हे सर्वभूतावास । हे मनोनिवास। हे आदिदेव । हे महादेवा हे सदाशिव। हे ईशान हे दुर्विज्ञेय । हे दुराराध्य । हे महाभूतेश्वर । हे परमेश्वर । हे महायो. गेश्वर । हे त्र्यम्बक । हे महायोगिन् । हे परमब्रह्मन् । हे परमज्योति । हे ब्रह्मविद् । हे उत्तम । हे ओंकार । हे वफ्ट्रकार । हे स्वाहाकार । हे स्वधाकार । हे परमकारण। हे सर्वगत । हे सर्वदशिन् । हे सर्वशक्ति । हे सर्वदेव । हे अज ( हे सहस्रार्चि (हे पृषार्थि । हे सुधामन् । हे हर अनन्तधाम । हे सवर्त । हे सकर्षण । हे वडवानल । हे अग्नीषोमात्मक । हे पवित्र । हे महापवित्र । हे महामेघ । हे महामायाधर । हे महाकाम । हे कामहन् । हे हस । हे परमहसा हे महाराजिक । हे महेश्वर । हे महा कामुक । हे महाहस। हे भवक्षयकर । हे सुरसिद्धाचित । हे हिरण्यवाह । हे हिरण्यरेत । हे हिरण्यनाभ । हे हिरण्या प्रकेश । हे मुअकेशिन् । हे सर्वलोकवरप्रद । हे सर्वानुप्रह

मुकेशिन् सर्वलोकवरप्रद सर्वानुग्रहकर

कमलेशय कुशेशय हृदयेशय ज्ञानोदधे शंमो

विभो महायज्ञ महायाज्ञिक सर्वयज्ञमय

सर्वयज्ञहृदय सर्चयज्ञसस्तुत निराश्रय [20]

समुद्रेशय अत्रिसंभव भक्तानुकम्पिन्

अभग्नयोग योगधर वासुकिमहामणि-

विद्योतितविग्रह हरितनयन त्रिलोचन जटाधर

नीलकण्ठ चन्द्रार्धधर उमाशरीरार्धहर

गजचर्मधर दुस्तरसंसारमहासंहारकर [25]

प्रसीद भक्तजनवत्सल

एवं स्तुतो देवगणैः सुभक्त्या

सप्रामुख्यैव पितामहेन ।

त्यक्त्वा तदा इस्तिरूपं महात्मा

लिङ्गे तदा संनिधानं चकार ॥ ३६

इति श्रीवामनपुराणे सरोमाहात्ये त्रयोविंशोऽध्याय ॥२३॥