वामन महा पुराण
सरोमाहात्म्ये 25 स्थागुलिङ्ग के चतुर्दिक समीपस्थ विविध लिङ्गो की प्रतिष्ठा एवं उनका माहात्म्य
सनत्कुमार उवाच ।
स्थागोर्वटस्योत्तरतः शुक्रतीर्थ प्रकीर्तितम् ।
स्थाणोर्यटस्य पूर्वेण सोमतीर्थ द्विजोत्तम ॥ १
स्थाणो दक्षिणतो दक्षतीर्थमुदाहृतम् ।
स्थाणोटात् पश्चिमतः स्कन्दतीर्थ प्रतिष्ठितम् ॥ २
एतानि पुण्यतीर्थानि मध्ये स्थाणुरिति स्मृतः ।
वस्य दर्शनमात्रेण प्राप्नोति परमं पदम् ॥ ३
अष्टम्यां च चतुर्दश्यां यस्त्वेतानि परिक्रमेत् ।
पदे पदे यशफलं स प्राप्नोति न संशयः ॥ ४
एतानि मुनिभिः साध्यैरादित्यैर्वसुभिस्तदा।
मरुद्धिर्वविभिथैव सेवितानि प्रयत्नतः ॥५
अन्ये ये प्राणिनः केचित् प्रविष्टाः स्थाणुमुत्तमम् ।
सर्वपापविनिर्मुक्ताः प्रयान्ति परमां गतिम् ॥ ६
अस्ति तत्संनिधी लिङ्गं देवदेवस्य शूलिनः ।
उमा च लिङ्गरूपेण हरपाय न मुञ्चति ॥ ७
तस्य दर्शनमात्रेण सिद्धि प्राप्नोति मानवः ।
वटस्य उत्तरे पार्श्वे तक्षकेण महात्मना ॥८
प्रतिष्ठितं महालिङ्गं सर्वकामप्रदायकम् ।
वटस्य पूर्व दिग्भागे विश्वकर्मकृतं महत् ॥ ९
लिङ्गं प्रत्यड्मुखं दृष्ट्वा मिदिमाप्नोति मानवः ।
तत्रैव लिङ्गरूपेण म्धिता देवी मरस्वती ॥ १०
प्रणम्य तां प्रयत्नेन पुद्धिं मेधां च विन्दति ।
वटपार्श्वे स्थित लिङ्गं ब्रह्मणा तन् प्रतिष्ठितम् ॥ ११
दृष्ट्वा वटेश्वरं देवं प्रयाति परमं पदम् ।
उतः स्थाणुवटं दृष्ट्या कृत्वा चापि प्रदक्षिणम् ॥ १२
प्रदक्षिणीकृता तेन समद्वीपा वसुंधरा ।
स्थाणोः पश्चिमदिग्भागे नकुलीशो गणः स्मृतः ॥१३
तमभ्यर्च्य प्रयत्नेन सर्वपापैः प्रमुच्यते ।
तस्य दक्षिणदिग्भागे तीर्थ स्टकरं स्मृतम् ।। १४
तस्मिन् स्नातः सर्वतीर्थे स्नातो भवति मानवः ।
२५
सनत्युमार ने कहा, "हे द्विजोत्तम ! स्थाणुरट के उत्तर में शुमतीर्थ और स्थाणुस्ट के पूर्व में सोमतीर्थ कहा गया है।
स्थाणुरट के दक्षिण में दानीर्य एवं उसके पश्चिम में रफन्दतीर्थ प्रतिष्टिन है। (२)
इस पवित्र तीयों के मध्य में स्थाणु नामक तीर्थ है। उसके दर्शनमात्र से परमपद की प्राप्ति होती है।
अष्टमी और पतुर्दशी को नी परिक्रमा करने वाले यो निस्सन्देह पग पग पर यज्ञ का फल प्राप्त होता है। (४)
मुनियों, सायों, आदिस्यों, पमुओं, मस्तों एवं अग्नियों ने प्रयत्नपूर्वक इन तीयों का सेपन किया है। उत्तम स्थाणुतीर्थ में प्रवेश करने पाले अन्य प्राणी भी सर्वपाप-विनिमुक्त होोर परम गति की प्राप्ति करने हैं। (६)
उसके समीप देवाधिदेव भगवान शंकर का दिन रिपत है।यदो रिकरूप से ( स्थित ) उमा भी हर के पाया का स्याग नहीं करती।
उसके दर्शनमात्र से मनुष्य सिद्धि प्राप्त करता है। पट पे उत्तर पार्श्व में महात्मा तक्षक ने सर्वकाम-प्रदायक महालिङ्ग प्रतिष्टित किया है । यट की पूर्व दिशा में विवर्मा का पनाया महान् लिङ्ग है। उम पश्चिमाभिमुस लिग का दर्शन करने से मनुष्य यो सिद्धि प्राप्त होती है। यही देवी सरपती रिग रूप से स्थित है। (८-१०)
उसे प्रयत्न पूर्वक प्रणाम कर मनुष्य पुद्धि एप मेधा प्राप्त करता है। यट के पाधं में स्थित सिद्ग को प्रमाने प्रतिष्ठित किया है। पदेपर देव का दर्शन करने से परमपद को प्राप्ति होती है। तदनन्तर स्थाणुषट का दर्शन और उससे प्रदभिमा फरने याला सहदीपा यमुन्धरा की प्रदक्षिणा कर लेता है। स्थाणु की पथिम दिशा मे नतीश नामफ गर स्थित है। (११-१३)
प्रयत्न पूर्वक उनसे पूजा पर मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है। उसके दक्षिण भाग में रखकर सोय है। (१४)
तस्य चोत्तरदिग्भागे रारणेन महात्मना ।। १५
प्रतिष्ठितं महालिङ्गं गोकर्ण नाम नामतः ।
आपाढमासे या कृष्णा भविष्यति चतुर्दशी ।
तस्यां योऽर्चति गोकर्ण तस्य पुष्यफलं भृणु ॥ १६
कामतोऽकामतो वापि यत् पापं तेन संचितम् ।
तस्माद् विमुच्यते पापात् पूजयित्वा हरं शुचिः ॥ १७ :
कौमारब्रह्मचर्येण यत्पुण्यं प्राप्यते नरैः ।
तत्पुण्यं सकलं तस्य अष्टम्यां योयेच्छिवम् ॥ १८
यदीच्छेत् परमं रूपं सौभाग्यं धनसंपदः ।
कुमारेश्वरमाहात्म्यात् सियने नात्र संशयः ॥ १९ त
तस्य चोत्तरदिग्भागे लिङ्ग पूज्य विभीषणः।
अजरश्वामरश्चैव कल्पयित्वा बभूव ह ।। २०
आपाढस्य तु मासस्य शुक्ला या चाष्टमी भवेत् ।
तस्यां पूज्य सोपवासो झमृतत्वमवाप्नुयात् ॥ २१
खरेण पूजित लिङ्गं तस्मिन् स्थाने द्विजोत्तम ।
तं पूजयित्वा यत्नेन सर्वकामानवाप्नुयात् ।। २२
दुपणस्त्रिशिराश्चैव तत्र पूज्य महेश्वरम् ।
यथाभिलपिवान् कामानापतुस्तौ मुदान्वितौ ॥ २३
चैत्रमासे सिते पक्षे यो नरस्तत्र पूजयेत् ।
वस्य तौ वरदी देयौ प्रयच्छतेऽभिवाञ्छितम् ॥ २४
स्थाणोटिस्य पूर्वेण हम्तिपादेश्वरः शिवः ।
तं दृष्ट्वा मुच्यते पापैरन्यजन्मनि संभवः ॥ २५
तम्य दक्षिणतो लिङ्गं हारीतस्य ऋपेः स्थितम् ।
यत् प्रणम्य प्रयत्नेन सिद्धि प्राप्नोति मानवः ॥ २६
तस्य दक्षिणपार्थे तु वापीतस्य महात्मनः ।
लिङ्गं त्रैलोक्यविख्यातं सर्वपापहरं शिवम् ॥ २७
कडालरूपिणा चापि रुद्रेण सुमहात्मना ।
प्रतिष्ठितं महालिङ्गं सर्वपापप्रणाशनम् ॥ २८
भुक्तिदं मुक्तिदं प्रोक्तं सर्वकिल्पिपनाशनम् ।
लिङ्गस्य दर्शनाच्चैव अग्निष्टोमफलं लभेत् ॥ २९
उसमे स्नान करने वाला पुरुष समस्त तीयों में स्नान कर लेता है। उसके उत्तर की दिशा में महात्मा रावण के द्वारा प्रतिष्ठित गोकर्ण नामक महालिङ्ग है । आपाढ़ मास के कृष्णपक्ष की चतुर्दशी मे गोकर्ण की अर्चना करने वाले मनुष्य के पुण्यफल को सुनो। (१५-१६)
पवित्रता पूर्वक हर की पूजा करने से वह अपने द्वारा इच्छा या अनिच्छा पूर्वक सचित पाप से मुक्त हो जाता है।
अष्टमी में शिव का अर्चन करने वाला मनुष्य कौमार ब्रह्मचर्य से प्राप्त होने वाले. समस्त पुण्य को उपलब्ध करता है।
यदि मनुष्य सुन्दर रूप, सौभाग्य या धन सम्पत्ति की प्रा इच्छा करता है तो कुमारेश्वर के माहात्म्य से उसे निस्सन्देह उसी सिद्धि होती है।
उसकी उत्तर दिशा में लिङ्ग की स्थापना तथा पूजा करने से विभीषण अजर एवं अमर हुए । (२०)
आपाढ़ मास की शुक्लाष्टमी को उपवास पूर्वक पूजा करने से मनुष्य को अमरत्व की प्राप्ति होती है। (२१)
हे द्विजोत्तम । उस स्थान पर खर द्वारा पूजित लिङ्ग है उसकी यलपूर्वक पूजा करने से समस्त कामनाओं की प्राप्ति होती है। (२२)
दूपण एवं त्रिशिरा वहाँ पर महेश्वर की पूजा कर प्रसन्न- चित्त हो यथाभिलषित कामनाओं को प्राप्त किये। (२३)
चैत्र मास के शुक्लपक्ष मे वहाँ पूजन करने वाले मनुष्य को वे दोनों वरददेव अभिवाछित फल प्रदान करते हैं । (२४)
स्थाणुवट के पूर्व में हस्तिपादेश्वर शिव है उनका दर्शन करने से मनुष्य अन्य जन्मों में किये गये पापों से मुक्त हो जाता है। (२५)
उसके दक्षिण में हारीत सपि द्वारा स्थापित लिङ्ग है। उससे प्रयत्नपूर्वक प्रणाम करने से मनुष्य को सिद्धि प्राप्त होती है। (२६)
उसके दक्षिण पार्श्व में महात्मा वापीत द्वारा प्रतिष्ठित त्रैलोक्य विख्यात, सर्वपापहारी एवं कल्याणकारी लिङ्ग स्थित है। (२७)
कट्वालरूपी महात्मा रुद्र ने भी सर्वपापनाशक महालिङ्ग की स्थापना की है। (२८)
वह लिङ्ग भुक्ति एव मुक्ति का दायक तथा सर्वपाप-नाशक है तथा उस लिङ्ग का दर्शन करने से अनिष्टोम यज्ञ के फल की प्राप्ति होती है। (२६)
तस्य पश्चिमदिग्भागे लिङ्गं सिद्धप्रतिष्ठितम् ।
सिद्धेश्वरं तु विख्यातं सर्वसिद्धिप्रदायकम् ॥ ३०
तस्य दक्षिण दिग्भागे मृकण्डेन महात्मना ।
तत्र प्रतिष्ठित लिङ्गं दर्शनात् सिद्धिदायकम् ॥ ३१
तस्य पूर्वे च दिग्भागे आदित्येन महात्मना ।
प्रतिष्ठित लिङ्गवरं सर्वकिल्यिपनाशनम् ।। ३२
चित्राङ्गदस्तु गन्धर्यों रम्भा चाप्सरसां वरा।
परस्परं सानुरागौ स्थाणुदर्शनकासिणौ ॥ ३३
दृष्ट्या स्थाणुं पूजयित्वा सानुरागौ परस्परम् ।
आराध्य वरदं देवं प्रतिष्ठाप्य महेश्वरम् ॥ ३४
चित्राङ्गदेश्वर दृष्ट्वा तथा रम्भेश्वरं द्विज ।
सुभगो दर्शनीयश्च वुले जन्म समाप्नुयात् ।। ३५
तस्य दक्षिणतो लिङ्ग वञिणा स्थापितं पुरा ।
तस्य प्रसादात् प्राप्नोति मनसा चिन्तितं फलम् ।। ३६
पराशरेण मुनिना तथैवाराध्य शंकरम् ।
प्राप्त कवित्वं परमं दर्शनाच्छंकरस्य च ।। ३७
वेदव्यासेन मुनिना आराध्य परमेश्वरम् ।
सर्वज्ञत्वं ब्रह्मज्ञानं प्राप्तं देवप्रसादतः ॥ ३८
स्थाणोः पश्चिमदिग्भागे वायुना जगदायुना ।
प्रतिष्ठित महालिङ्ग दर्शनात् पापनाशनम् ।। ३९
तस्यापि दक्षिणे भागे लिङ्ग हिमवतेश्वरम् ।
प्रतिष्ठित पुण्यकृतां दर्शनात् सिद्धिकारकम् ।। ४०
तस्यापि पश्चिमे भागे कार्तवीर्येण स्थापितम् ।
लिङ्गं पापहर सद्यो दर्शनात् पुण्यमाप्नुयात् ।। ४१
तस्याप्युत्तरदिग्भागे सुपार्श्वे स्थापितं पुनः ।
आराध्य हनुमांश्चाप सिद्धि देवप्रसादतः ॥ ४२
तस्यैव पूर्व दिग्भागे विष्णुना प्रभविष्णुना ।
आराध्य वरदं देवं चक्रं लब्धं सुदर्शनम् ॥ ४३
तस्यापि पूर्व दिग्भागे मित्रेण वरुणेन च ।
प्रतिष्ठितौ लिङ्गवरौ सर्वकामप्रदायकौ ॥ ४४
एतानि मुनिभिः साध्यैरादित्यैर्वसुमिस्तथा ।
सेवितानि प्रयत्नेन सर्वपापहराणि वै ॥ ४५
उसके पश्चिम में सिद्धप्रतिष्टित लिङ्ग है। यह सिद्धे-श्वर नाम से विख्यात है तथा सर्वसिद्धि प्रदायक है। (३०)
उसके दक्षिण भाग में महात्मा मृकण्ड ने लिङ्ग की प्रतिष्ठा की है। उसके दर्शन से सिद्धि प्राप्त होती है । (३१)
उसके पूर्व में महात्मा आदित्य ने समस्त पापों का नाशक श्रेष्ठ लिङ्ग प्रतिष्ठित किया है। (३२)
परस्पर अनुराग युक्त चिनाजद नामक गन्धर्व और रम्भा नाम की श्रेष्ठ अप्सरा ने स्थाणु का दर्शन करने की इच्छा से स्थाणु का दर्शन एव पूजा करने के उपरान्त वर- दाता महेश्वर देव की प्रतिष्ठा की। (३३-३४)
हे द्विज | चित्राङ्गदेश्वर एव रम्भेश्वर का दर्शन कर मनुष्य सौभाग्य, सौन्दर्य, एवं सत्कुलोत्पत्ति की प्राप्ति करता है। (३५)
उसके दक्षिण में इन्द्र ने प्राचीन काल में लिङ्ग की स्थापना की थी। उसके प्रसाद से मनुष्य को मनोमि- पित फल प्राप्त होता है। (३६)
उसी प्रकार पराशर मुनि ने शंकर की आराधना कर उनके दर्शन से कवित्व प्राप्त किया। (३७)
वेदव्यास मुनि ने परमेश्वर की आराधना कर देव के प्रसाद से सर्वज्ञता एव ब्रह्मज्ञान प्राप्त किया। (३८)
स्थाणु की पश्चिम दिशा मे ससार के आयु स्वरूप वायु ने महालिङ्ग प्रतिष्टित किया है जो दर्शनमात्र से पाप-नाशक है। (३९)
उसके भी दक्षिण भाग मे पुण्यवानों को दर्शन से सिद्धि प्रदान करने वाला हिमवतेश्वर लिङ्ग प्रतिष्ठित है। (४०)
उसके भी पश्चिम भाग में कार्तवीर्य ने लिङ्ग की स्था- पना की है। यह लिङ्ग पापहारी है तथा इसके दर्शन से सद्य पुण्य की प्राप्ति होती है। (४१)
उसके भी उत्तर भाग में सुपार्श्व मे स्थापित लिन की आराधना कर हनुमान ने देव के प्रसाद से सिद्धि प्राप्त की थी।
उसके भी पूर्व भाग मे प्रभावशाली विष्णु ने घरद देव की आराधना कर सुदर्शन चक्र प्राप्त किया था। (४३)
उसके भी पूर्व भाग में मित्र एव वरुण ने सर्वकामप्रदा- यक दो लिङ्गों की प्रविष्टा की है। (४४)
मुनियों, साप्यों, आदित्यो एव वसुओं द्वारा ये सभी लिग प्रयत्नपूर्वक सेवित है तथा ये समस्त पापों को नष्ट करने वाले हैं। (४५)
स्वर्णलिङ्गस्य पश्चात्त झपिभिस्तत्त्वदर्शिभिः ।
प्रतिष्ठितानि लिङ्गानि येपा सरया न विद्यते ॥ ४६
तथा युत्तरतस्तस्य यानदोघनती नदी ।
सहस्रमेक लिङ्गाना ढवपश्चिमत. स्थितम् ॥ ४७
तस्यापि पूर्वदिग्भागे बालसिल्यैर्महात्मभिः ।
प्रतिष्ठिता रुद्रकोटियित्संनिहित मरः ॥ ४८
दक्षिणेन तु देवस्य गन्धर्यक्षकिन्नरः ।
प्रतिष्ठितानि लिङ्गानि येपा सरया न विद्यते ॥ ४९
वित्र. कोट्योऽर्धकोटी च लिङ्गाना वायुरप्रवीद ।
असंरयावाः सहस्राणि ये रुद्रा. स्थाणुमाश्रिताः ॥ ५०
एतज्ज्ञात्वा श्रद्दधान, स्थाणु लिङ्गं समाश्रयेत् ।
यस्य प्रसादात् प्राप्नोति मनसा चिन्तित फलम् ॥५१
अकामो वा सकामो वा प्रविष्ट. स्थाणुमन्दिरम् ।
विमुक्त. पातको रै. प्राप्नोति परम पदम् ॥ ५२
चैरे मासे त्रयोदश्या दिव्यनक्षत्रयोगतः ।
शुक्राचन्द्रसंयोगे दिने पुण्यतमे शुभे ॥ ५३
प्रतिष्ठित स्थाणुलिन ब्रह्मणा लोकधारिणा।
मपिभिर्देवसधैश्च पूजित शाश्वती. समाः ॥ ५४
तस्मिन् काले निराहारा मानवा. श्रड्यान्विताः ।
पूनयन्ति शिव ये वै ते यान्ति परम पदम् ॥ ५५
तदारूढमिद ज्ञात्वा ये कुर्वन्ति प्रदक्षिणम् ।
प्रदक्षिणीकृता तैस्तु सप्तद्वीपा वसुधरा ॥ ५६
इति श्रीवामनपुराणे सरोमाहात्त्म्ये पञ्चरिशोऽध्याय ॥२५॥
स्वर्णलिङ्ग के पृष्ठ भाग में तत्त्वदर्शी ऋषियों द्वारा असख्य लिग प्रतिष्ठित है। उसी प्रकार उसके उत्तर में ओघवती नदी तक देव के पश्चिम भाग मे एक सहस्र लिङ्ग प्रतिष्ठित है। (४६-४७)
उसके पूर्व की दिशा में महात्मा बालखिल्यों ने सनि हित सरोवर तक कोटि रुद्रों की प्रतिष्ठा की है। (४८)
देव के दक्षिण भाग में गन्धयों, यक्षों एव किन्नरों ने असख्य लिङ्गों को प्रतिष्टित किया है। (४९)
वायु ने साढे तीन करोड लिङ्गों का वर्णन किया है। स्थाणुतीर्थ में असख्य सहस्र रुद्र लिङ्ग वर्तमान है। (५०)
यह जानकर श्रद्धापूर्वक स्थाणुलिङ्ग का समाश्रयण करना चाहिये जिसके प्रसाद से मनुष्य मनोभिलपति फल प्राप्त करता है। (५१)
सकाम या निष्काम भाव से स्थाणु मदिर में प्रवेश करने वाला मनुष्य घोर पातकों से विमुक्त होकर परम पद प्राप्त करता है। (५२)
चैत्रमास की त्रयोदशी तिथि को दिव्यनक्षत्रों के योग मे शुक्र सूर्य तथा चन्द्र का सयोग होने पर पुण्यतम शुभ दिन में लोकधारी ब्रह्मा न स्थाणु लिङ्ग को प्रतिष्ठित किया था। ऋषियों एव देवों द्वारा शाश्वत वर्षों तक अर्थात् सदैव इसकी पूजा होती है। (५३ -२४)
उस समय निराहार रहकर श्रद्धापूर्वक शिव की पूजा करने वाले मनुष्य परम पद प्राप्त करते है। (५५)
(स्थाणुलिङ्ग को) उनसे (शिव से)आरूढ मानकर उसकी प्रदक्षिणा करने वारे सप्तद्वीपा वसुन्धरा की प्रदक्षिणा कर लेते हैं।(५६)
श्रीवामनपुराग के सरोमाहात्म्य में पच्चीसाँअध्याय समाप्त ॥२५॥