अन्धक से युद्ध के लिए हर का प्रयाण, रुद्रगणो का दानवो से युद्ध, तुहुण्ड, कुजम्भ दुर्योधन, हस्ती आदि का वध

पुलस्त्य उवाच।

एतस्मिन्नन्तरे प्राप्तः समं दैत्यैस्तथाऽन्धकः ।

मन्दरं पर्वतश्रेष्ठं प्रमथाश्रितकन्दरम् ॥ १

प्रमथा दानवान् दृष्ट्या चक्रुः फिलकिलाध्वनिम् ।

प्रमथाश्चापि संख्धा जघ्नुस्तूर्याण्यनेकशः ॥२

स चावृणोन्महानादो रोदसी प्रलयोपमः ।

शुश्राव वायुमार्गस्थो विघ्नराजो विनायकः ॥३

समभ्ययात् सुसंक्रुद्धः प्रमथैरभिसंवृतः।

मन्दरं पर्वतश्रेष्ठं ददृशे पितरं तथा ॥४

प्रणिपत्य तथा भक्त्या वाक्यमाह महेश्वरम् ।

किं तिष्ठप्ति जगन्नाथ समुत्तिष्ठ रणोत्सुकः ॥५

ततो विघ्नेशवचनाजगन्नाथोऽम्बिकां वचः ।

प्राह यास्येऽन्धकं हन्तुं स्थेयमेवाप्रमत्तया ॥६

ततो गिरिसुवा देवं समालिङ्गय पुनः पुनः।

सभी गणपति मन्दरपर्वत को चतुर्दिक आकृत कर रहने लगे।(५८)

मेघाभ प्रमथों से आच्छादित शङ्करपादसेवी शुक्ल शरीर गिरिवर इस प्रकार सुशोभित हो रहा था जैसे नील मृगचर्म से आच्छादित शरीरवाला एवं शरदकालीन मेघ के वर्णवाला शङ्कर का बलवान् वृपभ सुशोभित होता है।(५६)

श्रीदामनपुराण में इकतालीसवाँ अध्याय समाप्त |४||

४२

पुलस्त्य ने कहा-इसी बीच अन्धक दैत्यों के साथ प्रमों से सेवित कन्दराओं वाले पर्वतश्रेष्ठ मन्दर पर आया। (१)

दानवों को देखकर, प्रमथों ने क्लिकिला ध्वनि की एक उत्तेजनापूर्वक अनेक तूर्य बजाने लगे।

उस प्रलय-तुल्य तुमुलध्वनि ने आकाश और पृथ्वी के अन्तराल को आवृत कर लिया। वायुमार्गस्थ विघ्न राज विनायक ने उस शब्द को सुना। (३)

प्रमयों से आवृत अत्यन्त क्रुद्ध वे पर्वत श्रेष्ठ मन्दर पर गये एवं अपने पिता को देखा। (४)

भक्तिपूर्वक प्रणामकर उन्होंने महेश्वर से कहा-हे जगन्नाथ ! आप बैठे क्यों है? रण के लिए उत्सुक होकर आप उठे।

विघ्नेश्वर गणेश के कहने पर जगन्नाथ महादेव ने अम्बिका से कहा-मैं अन्धक को मारने के लिए जाऊँगा, तुम सावधानी से रहना।

तदुपरान्त गिरिनन्दिनी ने महादेव को यार-बार आलिङ्गन कर एवं सप्रेम दृष्टि से उन्हें देखकर कहा-

समीक्ष्य सस्नेहहरं प्राह गच्छ जयान्धकम् ॥ ७

सतोऽमरगुरोगौरी चन्दनं रोचनाञ्जनम् ।

प्रतिवन्ध सुसंगीता पादावेवाभ्यवन्दत ॥८

ततो हरः प्राह वचो यशस्यं मालिनीमपि ।

जयां च विजयां चैव जयन्तीं चापराजिताम् ॥ ९

युष्माभिरप्रमत्ताभिः स्थेयं गेहे सुरक्षिते ।

रक्षणीया प्रयत्नेन गिरिपुत्री प्रमादतः ॥ १०

इति संदिश्य ताः सर्वाः समारुह्य वृपं विभुः।

निर्जगाम गृहात तुष्टो जयेप्सुः शुलधृग् बली ॥ ११

निर्गच्छतस्तु भवनादीश्वरस्य गणाधिपाः ।

समंतात् परिवाJय जयशब्दाथ चक्रिरे ॥ १२

रणाय निर्गच्छति लोकपाले

महेश्वरे शूलधरे

शुभानि सौम्यानि सुमङ्गलानि

जातानि चितानि जयाय शंभोः ।। १३

शिया स्थिता यामवरेऽथ भागे

प्रयाति चाने वनमुन्नदन्ती ।

कन्यादसंघाच तथामिपैषिणः

प्रयान्ति हटास्कृपितासुगर्थे ॥ १४

दक्षिणाझं नखान्तं वै समकम्पत शूलिनः ।

शकुनिश्चापि हारीतो मौनी याति पराड्मुखः॥ १५

निमित्तानीदृशान् दृष्ट्वा भूतभव्यभवो विभुः ।

शैलादिं प्राह वचनं सस्मितं शशिशेखरः ॥ १६

हर उवाच ।

नन्दिन् जयोऽध मे भावी न कथंचित् पराजयः ।

निमित्तानीह दृश्यन्ते संभूतानि गणेश्वर ॥ १७

तच्छंभुवचनं श्रुत्वा शैलादिः प्राह संकरम् ।

का संदेहो महादेव यत् त्व जयसि शात्रयान् ॥ १८

इत्येवमुक्त्वा वचनं नन्दी रुद्रगणांस्तथा ।

समादिदेश युद्धाय महापाशुपतैः सह ॥ १९

तेऽभ्येत्य दानववलं मदयन्ति स्म वेगिताः ।

नानाशस्त्रधरा वीरा वृक्षानशनयो यया ।।२०

ते वध्यमाना पलिभिः प्रमथैदैत्यदानवाः ।

प्रवृत्ताः प्रमथान् हन्तुं कूटमुद्गरपाणयः ॥ २१

जाइए एय अन्धक पर विजय प्राप्त कीजिए। (७)

तदनन्तर गौरी ने देवश्रेष्ठ शङ्कर को चन्दन, रोचना एवं अअन लगाया एव अति प्रीतिपूर्वक उनके चरणों को वन्दना की।

तदनन्तर महादेव ने मालिनी, जया, विजया, जयन्ती और अपराजिता से यह यशस्कर वचन कहा- (९)

तुम लोग सुरक्षित गृह में सावधानी से रहना एवं प्रयत्नपूर्वक गिरिपुत्री की प्रमाद करने से रक्षा करना । (१०)

उन सभी को ऐसा निर्देश देने के उपरान्त वृप पर आरूढ़ होरर शूलधारी पलवान् शङ्कर जय की आराक्षा से प्रसन्नतापूर्वक घर से निकले। (११)

गृह से निपल रहे शङ्कर को चारों ओर से आरत कर गणाधिपों ने "जय जयकार" किया। (१२)

है महर्पि! लोपाल शूलधारी महेश्वर के युद्धार्थ निक्लने पर उनकी जय के लिये शुभ, सौम्य और महलजनक चिह्न प्रकट हुए। (१३)

उनके पाम भाग मे शृगारिनी स्थित थी एवं पर करती हुई आगे जा रही थी। मांस-लोभी प्राणी प्रसन्नतापूर्वक रुधिर के लिये जा रहे थे। (१४)

शूलपाणि का दाहिना अग नख तक काँप उठा। हारीत पक्षी चुपचाप पीछे की ओर जा रहा था। (१५)

भूत, भविष्य एवं वर्चमानस्वरूप शशिशेखर विभु महादेव ने इस प्रकार के निमित्तों को देसफर शैलादि नन्दी से हास्ययुक्त वचन कहा। (१६)

शङ्कर ने कहा-हे नन्दी । हे गणेश्वर । यहाँ शुभ निमित्त दृष्टिगोचर हो रहे है। अत आज मेरी विजय होगी। किसी भी प्रकार पराजय नहीं हो सकती। (१७)

शम्भु के उस वचन को सुनार शैलादि ने शङ्कर से पहा हे महादेव आप शत्रुओं को जीतेंगे इसमे सन्देश क्या है? (१८)

ऐसा कहकर नन्दी ने महापाशुपत सहित रुद्रगयों को युद्ध के लिए आदेश दिया।

नाना प्रकार के शरनों को धारण करने वाले ये वीर दानयसैन्य के निकट जार उसे इस प्रकार मर्दित करने लगे जैसे यथ वृक्षों को नष्ट करता है। (२०)

बलवान् प्रमयों द्वारा मारे जा रहे वे दैत्य-दानय गण

वतोऽम्मरतले देवाः सेन्द्रविष्णुपितामहाः।

समर्यामिपुरोगास्तु समायाता दिदृश्यः ।। २२

ततोऽबरवले घोफः समनः समजायत ।

गीतनाधादिमंमिश्रो दुन्दुभीनां कलिप्रिय ॥ २३

ततः पश्यत्सु देवेषु महापाशुपतादयः ।

गणारतदान सन्यं नियामन्ति स्म कोपिताः ॥ २४

चतुरशयलं दृष्ट्वा हन्यमानं गणेश्वरः ।

क्रोधान्वितस्तुगुण्डस्तु वेगेनामिसमार ह ।। २५

आदाय परिपं घोरं पट्टोढङमयस्मयम् ।

राजतं राजश्त्यर्थमिन्द्रध्वजामियोच्छ्रितम् ।। २६

तं भ्रामयानो पलयान् निजयान रणे गणान् ।

रुद्रायाः स्कन्दपर्यन्तास्तेऽभज्यन्त भयातुराः ।। २७

तत्ममग पलं दृष्ट्वा गणनाधो निनायकः ।

समादयत वैगेन तुहुण्डं दनुपुंगवम् ॥ २८

भापतन्तं गणपतिं दृष्ट्या दैत्यो दुरात्मवान् ।

परिचं पातयामास पुम्भपृष्ठे महारतः ।। २९

विनायकस्य तत्कुम्भे परिपं वनभूपणम् ।

शवधा त्यगमद् ब्रह्मन् मेरोः फट इवाशनिः ॥३०

परिघं विफलं दृष्ट्वा समायान्तं च पार्पदम् ।

यवन्ध वाहुपाशैन राह रक्षन् हि मातुलम् ।। ३१

स बद्धो याहुपाशेन बलादाकृष्य दानवम् ।

समाजपान शिरमि कुठारेण महोदरः ।। ३२

काष्ठवंद स द्विधा भूतो निपपात धरातले।

तथाऽपि नात्पजद् राहुबलवान् दानवेश्वरः ।

स मोसाकरोद् यत्नं न शशाक च नारद ॥ ३३

विनायकं संयतमीक्ष्य राहुणा

कुण्डोदरो नाम गणेश्वरोऽध ।

प्रगृह्य तूर्ण मुलं

मुशलं महात्मा

राहुं दुरात्मानममौ जधान ॥ ३४

ततो गणेशः फलमध्यनस्तु

प्रासेन राहुं हृदये विभेद

घटोदरो चै गदया लघान

सड्गेन रक्षोऽधिपतिः सुकैशी ।। ३५

स तैश्चतुर्मिः परिवाड्यमानो

गणाधिपं राहुरथोत्ससर्ज।

संत्यक्तमात्रोऽथ परवधेन

तुहुण्डमूनिमथो निभेद।।

हते तुहुण्डे विमुसे च राही

गणेश्वराः क्रोधविपं मुमुक्षयः ।

पश्चैककालानलसन्निकाशा

विशन्ति सेनां दनुपुंगवानाम् ॥ ३७

तां वध्यमानां स्वचमूं समीक्ष्य

पलिबली मास्ततुल्यवेगः।

गदा समाविष्य जघान मुनि

विनायकं कुम्भतटे करे च ॥३८

कुण्डोदरं भग्नकटिं चकार

महोदरं शीर्णशिर:कपालम् ।

कुम्भध्वजं चूर्णितसंधियन्ध

घटोदरं चोरुविभिन्नसंधिम् ॥ ३९

गणाधिपरितान् विमुसान् स कृत्या

पलान्वितो वीरतरोऽसुरेन्द्रः।

समभ्यधायत् त्वरितो निहन्तुं

गणेश्वरान् स्कन्दविशापमुख्यान् ॥ ४०

तमापतन्तं भगवान् समीक्ष्य

महेश्वरः श्रेष्ठतमं गणानाम् ।

शैलादिमामव्य पचो घमापे

गच्छस्व दैत्यान् जहि पीर युद्धे ॥ ४१

इत्येवमुक्तो वृषभध्वजेन

वज्र समादाय शिलादसूनुः ।

पलि समभ्येत्य जघान मुनि

संमोहितः सोऽवनिमाससाद ॥ ४२

संमोहितं भ्रातृसुतं विदित्वा

पली कुजम्मो मुसलं प्रगृह्य ।

संभ्रामयंस्तूर्णतरं स वेगात्

ससर्ज नन्दि प्रति जावकोपः ॥ ४३

तमापतन्तं मुसलं प्रगृह्य

हृदय में भेदन किया। घटोदर ने गदा से तथा राक्षसों के अधिपति सुकेशी ने खड्ग से प्रहार किया। (३५)

उन चारों द्वारा आघात किये जाने पर राहु ने गणाधि- पति को छोड़ दिया। छूटते ही उन्होंने फरसे से तुहुण्ड के शिर को काट दिया। (३६)

तुहुण्ड के मारे जाने प्य राहु फे विमुख हो जाने पर मोधरूपी यिप को छोड़ने की इच्छा याले फालानरतुल्य पाँचों गणेश्वर एक साथ दानयष्टों की सेना में प्रविष्ट हुए।

अपनी उस सेना को मारी जाती देसार यायु के सदृश वेगयाले यलयान् यलि ने गदा लेकर यिनायक के कुम्भस्थल, मस्तक एय ह पर प्रहार किया। (३८)

पुण्डोदर की पटि फो भग्न कर दिया, महोदर के शिर.कपाल को विशीर्ण कर दिया, युम्भध्यज के जोड़ों को पूर्ण पर डाटा एवं घटोदर फी जाँघों को सोद दिया। (३६)

उन गणाधिपों को विमुख कर पीर श्रेष्ठ यह बल्यान असुरेन्द्र शीघ्रता से स्मन्द, पिशास आदि प्रमुस गणेश्वरों को मारने के लिए दौड़ा। (४०)

भगवान् महेश्वर ने उसे आते हुए देखकर गणों में सर्वश्रेष्ठ शैलादि को बुलाकर कहा-हे धीर! जाओ और युद्ध में दैत्यों को मारो। (४१)

वृषभध्वज के ऐसा कहने पर शिलाद के पुत्र नन्दी यय लेकर घलि के समीप गये एवं उसके मस्तक पर प्रहार किया जिससे यह मूच्छित होकर भूमि पर गिर पड़ा। (४२)

अपने भतीजे को भूठित जानवर यट्यान्' (जम्म ने शोधपूर्वक मुसल हैकर घुमाते हुये ससे नन्दी की ओर बेगपूर्वक पया। (५३)

भगवान् नन्दी ने आते हुये उस मुसल को शोप्रतापूर्वक हाय से पकड़ लिया एवं उसी से युद्ध में कुजम्भ

करेण तूर्ण भगवान् स नन्दी।

जधान तेनैव कुजम्भमाहये

स प्राणहीनो निपपात भूमौ ॥ ४४

हत्वा कुजम्मं मुसलेन नन्दी

वजेण चीरः शतशो जघान ।

ते वध्यमाना गणनायकेन

दुर्योधनं वै शरणं प्रपन्नाः ॥ ४५

दुर्योधनः प्रेक्ष्य गणाधिपेन

वजाहारैनिहतान् दितीशान् ।

प्रासं समाविध्य तडित्प्रकाश

नन्दि प्रचिक्षेप हतोऽसि वै घुवन् ।। ४६

तमापतन्तं पुलिशेन नन्दी

विभेद गुह्यं पिशुनो यथा नरः।

तत्प्रासमालक्ष्य तदा निकृत्त

सवयं मुष्टिं गणमाससाद ।। ४७

ततोऽस्य नन्दी कुलिशेन तुर्ण

शिरोमच्छिनत् तालफलप्रकाशम् ।

हतोऽथ भूमौ निपपात वेगाद्

दैत्याश्च भीता विगता दिशो दश ॥ ४८

ततो हतं स्वं तनयं निरीक्ष्य

हस्ती तदा नन्दिनमाजगाम ।

प्रगृह्य बाणासनमप्रवेग

विमेद वाणैर्यमदण्डकल्पैः ॥ ४९

गणान् सनन्दीन् वृपभध्वजास्तान्

धाराभिरेवाम्बुधरास्तु शैलान् ।

ते छाद्यमानासुरवाणजालै-

विनायकाद्या पलिनोऽपि वीराः।

सिंहाणुना वृपमां यचैव

भयातुरा दुद्रुविरे समन्तात् ॥ ५०

पराड्मुसान् वीक्ष्य गणान् कुमार.

शक्त्या पृपत्कानथ वारयित्वा ।

तूर्ण समभ्येत्य रिपुं समीक्ष्य

प्रगृह्य शक्त्या हृदये बिशेद ।। ५१

शक्तिनिभिन्नहृदयो हस्ती भूम्यां पपात ह ।

ममार चारिपृतना जाता भूयः पराङ्मुखी ॥ ५२

अमरारियलं दृष्ट्वा भग्नं क्रुद्धा गणेश्वरा ।

को मारा। यह निष्प्राण होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा। (४४)

वीर नन्दी ने मुसल से कुजम्भ को मार कर द्वारा सैकडों दानवों को मार डाला। गणनायक द्वारा मारे जा रहे ये दानव दुर्योधन की शरण मे गये। (४५)

दुर्योधन ने गणाधिप द्वारा यन्त्र प्रहार से दैत्यो को निहत देखकर बिजली के समान प्रकाश से युक्त प्रास लिया तथा 'तुम मारे गये' ऐसा कहते हुये उसे नन्दी की ओर (४६)

नन्दी ने आ रहे उस (प्रास ) को वस से इस प्रकार पाट दिया जैसे पिशुन व्यक्ति रहस्य का भेदन कर देता है। तदनन्तर उस पास को कटा हुआ देख (दुर्योधन) मुट्ठी बाँध कर गण नन्दी के पास गया। (४७)

तदनन्तर नन्दी ने देगपूर्वक फुलिश द्वारा वालफल के सदृश उसके मस्तक को काट डाला। मारे जाने पर वह भूमि पर गिर पड़ा एव भयभीत दैत्य वेगपूर्वक दसों दिशाओं में भाग गए। (४८)

हस्ती (नामक असुर) अपने पुत्र को मारा गया देसकर नन्दी के पास आया। उसने धनुप लेकर नीववेग से यमदण्ड तुल्य बाणों से प्रहार किया। (४६)

मेघ जिस प्रकार जलधाराओं से पर्वतों को आच्छा दित परता है, उसी प्रकार उसने नन्दी के सहित वृषभध्वज के उन गणों को आच्छादित किया । अमुर के के बाणजाल से आच्छादित हो रहे वे विनायक आदि बल्वान् वीर सिह के द्वारा आक्रान्त वृपभों के सदृश भयातुर होकर चारों ओर भागने लगे। (५०)

कुमार ने गणों को पराङ्मुख देख शक्ति द्वारा बाणों को निवारित किया। व शीघ्रतापूर्वक शत्रु के पास पहुंचे तथा शक्ति से उसका हृदय भिन्न कर दिये। (५१)

शक्ति से हृदय के फट जाने पर हस्ती पृथ्वी पर गिर पड़ा एवं मर गया तथा शुनु सेना पुन पराङ्मुस हो गई।

दैत्यसेना को लिम्न भिन्न हुई देखकर क्रुद्ध गणेश्वर

पुरतो नन्दिनं कृत्वा जिघांसन्ति स्म दानवान् ।। ५३

ते वध्यमानाः प्रमथैदैत्याश्चापि पराङ्मुखाः।

भूयो निवृत्ता यलिनः कार्तस्वरपुरोगमाः ॥ ५४

वान् निवृत्तान् समीक्ष्यैव क्रोधदीप्सेक्षणः श्वसन् ।

नन्दिपेणो व्याप्रमुखो निवृत्तश्चापि वेगवान् ।। ५५

तस्मिन् निवृत्ते गणपे पट्टिशाग्रकरे तदा ।

कार्तस्वरो निववृते गदामादाय नारद ।। ५६

तमापतन्तं ज्जलनप्रकाशं

गण, समीक्ष्यय महासुरेन्द्रम् ।

त पद्दिशं भ्राम्य जघान मूर्ध्नि

कार्तस्वरं विस्वरन्नदन्तम् ॥ ५७

तस्मिन् हते भ्रातरि मातुलेये

पाशं समाविध्य तुरंगकन्धरः।

पन्ध चीरः सह पट्टिशेन

गणेश्वरं चाप्यय नन्दिपेणम् ॥ ५८

नन्दिपेणं तथा बद्धं समीक्ष्य पलिनां वरः।

विशाखः कुपितोऽभ्येत्य शक्तिपाणिरवस्थितः ॥ ५९

तं दृष्ट्वा बलिना श्रेष्ठः पाशपाणिरय.शिराः ।

संयोधयामास पली विशासं कुक्कुटध्वजम् ॥ ६०

विशासं मंनिरुद्धं चै दृष्ट्वाध्य शिरसा रणे ।

शासच नैगमेयश्च तूर्णमाद्रवतां रिपुम् ॥ ६१

एकतो नैगमेयेन भिन्नः शक्त्या त्वयःशिराः

एकतश्चैव शासन विशाखप्रियकाम्यया ॥ ६२

स त्रिभिः शंकरसुतैः पीड्यमानो जहौ रणम् ।

ते प्राप्ताः शम्बरं तूर्ण प्रेक्ष्यमाणा गणेश्वराः ।। ६३

पाशं शक्त्या समाहत्य चतुभिः शंकरात्मजः।

जगाम विलयं तूर्णमाकाशादिय भूतलम् ॥ ६४

पाशे निराशतां याते शम्बरस कातरेक्षणः ।

दिशोऽथ भेजे देव कुमार सैन्यमर्दयत् ॥ ६५

नन्दी को आगे कर दानवों को मारने लगे। (५३)

प्रमथों द्वारा मारे जा रहे वे सभी पराड मुख बलवान कार्तवरादि दैत्य पुन' लौट पड़े।

उन्हें लौटते देखकर वेगवान् व्याघ्रमुख नन्दिपेण भी क्रोध से आँखे लालकर लम्बी साँस छोड़ते हुए लौट पड़ा। (५५)

हे नारद । तदनन्तर हाथ के अप्रभाग में पट्टिश लिये हुये उस गणाधिप के लोटने पर कारीस्वर गदा लेकर लौटा। (५६)

उस अग्नि के सदृश तेजस्वी महासुरेन्द्र को आते देखकर गणपति ने पटिश घुमाकर उसके शिर पर मारा। कार्चस्वर चीत्कार करता हुआ मर गया । (५७)

उस ममेरे भाई के मारे जाने पर वीर तुरङ्गकन्धर ने पाश को लेकर पहिश के सहित नन्दिपेण गणेश्वर को बाँध लिया।

नन्दिपेण को बँधा देखकर बलवानों में श्रेष्ठ विशाख क्रोधपूर्वक उसके समीप गए एव हाथ में शक्ति लिये हुए

( उसके सम्मुख ) खड़े हो गए। (५९)

उन्हें देखकर बलवानों में श्रेष्ठ अय शिरा हाथ में पाश लेर कुक्कुटध्वज विशाख के साथ युद्ध करने लगा। (६०)

विशाख को अय.शिरा के द्वारा युद्ध में अवरुद्ध हुआ देखकर शाख एव नैगमेय नामक गण शीघ्रतापूर्वक शनु की ओर दौड़ पड़े। (६२)

विशास का प्रिय करने की इच्छा से एक ओर से नेगमेय ने एवं दूसरी ओर से शास ने शक्ति द्वारा अय शिरा को मारा। (६२)

शङ्कर के तीनों पुत्रों द्वारा पीड़ित होने पर उस अय शिरा ने युद्ध छोड़ दिया। वे गणेश्वर शम्बर को देखकर शीघ्र उसके पास पहुंचे। (६३)

शम्बर ने उनपर पाश को घुमा कर चलाया शङ्कर के चारपुत्रों ने पाश पर प्रहार किया । ( इससे वह पाश ) आकाश से भूतल पर गिर कर नष्ट हो गया। (६४)

पाश के नष्ट हो जाने पर भयभीत शम्बर

तैर्वध्यमाना पूतना महर्षे

सादानवी रुद्रसुतैर्गणैश्च ।

विषण्णरूपा मयविहलाङ्गी

जगाम शुक्र शरणं भयाः ॥ ६६

इति श्रीवामनपुराणे द्विचवारिंशोऽध्यायः॥२॥