वामन महा पुराण
प्रायश्चित के लिए इन्द्र की महानदी के तटपर तपश्वर्या पर निष्कल्पम होकर मादा के आश्रम में आगमन, अदिति की तपस्या एव वासुदेव स्तुति वासुदेव की अदिति से स्वय पुत्र होने की स्वीकृति एव अपने तेज के अश से अदिति के गर्भ में प्रवेश
पुलस्त्य उवाच
गते प्रलोक्यराज्ये तु दानवेपु पुरंदरः ।
जगाम प्रमसदनं सह देः शचीपतिः ॥१
वनापश्यत् स देवेशं प्रमाण कमलोद्भयम् ।
पिमिः सार्घमासीनं पितरं स्व च कश्यपम् ॥ २
ततो ननाम शिरमा शकः मुरगणैः सह ।
प्रमाणं कश्यपं चैव तांश्च सास्तपोधनान् ॥ ३
प्रोवाचेन्द्रः मुरः सार्ध देवनाथ पितामहम् ।
पितामह हृतं राज्यं चलिना बलिना मम ॥ ४
ब्रह्मा प्रोवाच शतद् सुज्यते स्वकृतं फलम् ।
शः पाल भो घहि किं मया दुप्फतं कृतम् ॥ ५
कश्यपोऽप्याह देश भ्रूणहत्या कता त्वया ।
दित्युदरात् त्वया गर्भ: कृत्तो वै पहुधा बलात् ॥ ६
सत्त्य गुणाधित अन्य देवियाँ भी विधया स्त्रियों ने सहमा बलि पे आश्रय में मुस पूर्वक रहने उगे। में (४५-००)
शुगयुद्धि थाले, आत्मयान, यज्ञ परने यारे, तपस्वी मृदु समाप वाले, सत्ययादी, दाता, भरणात्ता, स्वजनों की रक्षा करने याने दैत्यभेष्ट महारमा यलि इस पार ये गुणों से सम्पन्न थे। (५१)
दानवेन्द्र यलि के वर्ग का शासन करते समय कोई भूपसे पीड़ित, मलिन एवं दीन नहीं था। मनुष्य भी सदा उबट धर्मरत, दान एय कामोपभोगी हो गए। (५२)
श्रीवामनराम में उनचामावाँ अध्याय समाप्त ॥ ४६॥
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पुलस्त्य ने कहा-तीनों लोकों का राम्य दानराधीन हो जाने पर शचीपति पुरन्दर देषों के साप मालोक घने गये।
उन्होंने पापियों सहित येठे हुए फमउयोनि प्रमा पप अपने पिता पश्यप को देश्या । (२)
तानन्तर देवताओं सहित इन्द्र ने प्रक्षा पश्यप पर्व मन सभी पोपनों यो शिरमे प्रणाम किया।
दयों सहित इन्द्र ने देयनाय पितामह से कहा- दे पितामह । यल्यान् पलि ने मेरा पाय धीन लिया है।
ब्रह्मा ने कहा-हेन्द्र! यद तुम अपने किये हुए फर्म का पल भोग रहे हो। इन्द्र ने पूछा-आप पटायेंकि मैंने फोन सा दुपर्म किया है। पश्यप ने भी इन्द्र में कहा-गुमने भूण हत्या की है।
पितरं प्राह देवेन्द्र. स मातुर्दोपतो विभो ।
कृन्तनं प्राप्तवान् गर्भो यदशौचा हि सा भवत् ॥ ७
ततोऽप्रवीत् कश्यपस्तु मातुर्दोपः स दासताम् ।
गतस्ततो विनिहतो दासोऽपि कुलिशेन भो ॥ ८
तच्छ्रुत्वा कश्यपवचः प्राह शकः पितामहम् ।
विनाशं पाप्मनो हि प्रायश्चित्तं विभो मम ॥ ९
ब्रह्मा प्रोवाच देवेशं वशिष्ठः कश्यपस्तथा ।
हितं सर्वस्य जगतः शत्रस्यापि विशेषतः ॥ १०
शङ्खचक्रगदापाणिर्माधव. पुरुषोत्तमः ।
तं प्रपद्यस्य शरणं स ते यो विधास्यति ॥ ११
सहस्राक्षोऽपि वचन गुरूणां स निशम्य वै ।
प्रोवाच स्वल्पकालेन कस्मिन् प्राप्यो यहूदयः
तमूचुर्देवता मत्र्ये स्वल्पकाले महोदयः ॥ १२
इत्येवमुक्तः सुरराड विरिश्चिना
मरीचिपुत्रेण च कश्यपेन ।
तथैव मित्रावरुणात्मजेन
वेगान्महीपष्ठमवाप्य
कालिञ्जरस्योत्तरतः सुपुण्य-
स्तथा हिमाद्रेरपि दक्षिणस्थः ।
कुशस्थलात् पूर्वत एव विश्रुतो
यसोः पुरा पश्चिमतोऽवतस्थे ॥ १४
पूर्व गयेन नृपरेण यत्र
योऽश्वमेघः शतकत्सदक्षिणः।
मनुष्यमेधः शतकृत्सहस्रक-
नरेन्द्रसूयश्च सहस्रकृद् वै ॥ १५
था पुरा दुर्यजनः सुरासुरैः
रख्यातो महामेध इति प्रसिद्धः ।
यत्रास्य चके भगवान मुरारिः
वास्तव्यमव्यक्ततनुः खमूर्तिमत् ।
रयाति जगामाथ गदाधरेति
तुमने दिति के उदर से गर्भ को बलपूर्वक अनेक टुकड़ों मे काट डाला था। (६)
इन्द्र ने पिता से कहा-हे विभो । जननी के दोप से पद्द गर्भ छिन्न हुआ था। क्योंकि वे अपवित्र हो गई थी। (७)
तदनन्तर कश्यप ने कहा-माता के दोष से यह दासता को प्राप्त हो चुका था। तदुपरान्त तुमने दास को भी पन से मारा। (८)
कश्यप के उस वचन को सुनकर इन्द्र ने पितामह से कहा-हे विभो। मुझे पाप नाशक प्रायश्चित्त बतलायें।
ब्रह्मा, वसिष्ठ एव कश्यप ने देवेश से समस्त जगत् एवं विरोधरूप से इन्द्र के लिये हितकर वचन कहा- (१०)
तुम शङ्खचक्र तथा गदाधारण करने वाले पुरुषोत्तम माधव की शरण में जाओ। वे तुम्हारा क्ल्याण करेंगे। (११)
उन सहस्त्राक्ष ने गुरुजनों का वचन सुनकर कहा- स्वल्पकाल में प्रचुर अभ्युदय की प्राप्ति कहाँ सम्भव है। देवों ने उनसे कहा-मर्त्यलोक मे स्वल्प समय में महान अभ्युदय सम्भव है। (१२)
भक्षा, मरीचिपुत्र कश्यप एव वसिष्ठ के ऐसा कहने पर सुरराज इन्द्र वेगपूर्वक पृथ्वीतल पर गए । (१३)
कालिअर पर्वत के उत्तर, हिमाद्रि के दक्षिण, कुशस्थल के पूर्व एव वसुपुर के पश्चिम में स्थित विख्यात पुण्य स्थान में रहने लगे। (१४)
जहाँ पहले राजा गय ने दक्षिणा के साथ सौ अश्वमेध यज्ञ, ग्यारह सौ नरमेधयज्ञ तथा एक सहस्र राजसूय यज्ञ का अनुष्ठान किया था।
पहले (गय ने) जहाँ परसुरों एव असुरों से दुष्करमहामेध नागक प्रसिद्ध यज्ञ सम्पादित किया था तथा उसके लिये आकाशस्वरूप अन्यक्तशरीर मुरारि ने वहाँ निवास किया था। महान पापरूपी वृक्ष के लिये तीक्ष्ण पुठार स्वरूप वे
मापरपर निइसारः॥ १६ !
पम्मिन् हिन्द्राः शिवाय तिवाः
ममत्वमापानि विसामान।
गाव पिएन पर गंवर
माता सनापन दिया।
पन महामेषमाम्प माना
ममनयनर मगर मादान ।। १७
पहानदी पर गुगारमा
नाधिपाय
गई गापापिन हिमाली
गंदनवागनाउन ।। १०
सर शरः ममम्पग्र मानवागरे।
मारापनारम्पसममापि ॥ १०
मायग्नापी रवानीपतिः ।
जप गरमाय. पनपं गापाम् ॥२.
सम्पप गायरा: मम्पग्जितमन्दिरम्य हि।
पायोपनिम्य गाप्र. संपामरो गमः ॥ २१
पतो गदापरः प्रीतो पाग प्राद नारद ।
गरतीयोऽम्मि मपी एगपापोऽमि माम्प्रयम् ।। २२
निरा परप्रायमेन निरादिप ।
परिष्यामि मारिभरो मायर २३
दरपैनोर गदापांग
विगाय: नाप्प मनोहरापाम् ।
नागदे पार दिनमाना-
गुरम्माननुशाम।। २४
माग सान मारमंगरान
नाम्ना पुरिन्दान मम पापमपाः ।
पमान्तरमाविकी
हिमागिरिधरपी पुन्दिाः ।। २५
इस्पेशरा मुरराट् पुरिन्दान
पिन पायो मानिदपः।
गापमानांनुजगाम गाथम
माना पानिपागमीयम् ।। २६
प्प्या:दिति मूनि जारित
विनम्रमौलिः समुपाजगाम।
प्रणम्य पादौ कमलोदरामो
निवेदयामास तपस्वदात्मनः ॥ २७
पप्रच्छ सा कारणमीश्वरं तम्
आघ्राय चालिङ्गय सहायुदृष्टया ।
स चाचचक्षे पलिना रणे जयं
तदात्मनो देवगणैश्च सार्धम् ॥ २८
श्रुत्वैव सा शोकपरिप्लुताङ्गी
ज्ञात्वा जितं दैत्यसुतैः सुतं तम् ।
दुःखान्निता देवमनाघमीड्यं
जगाम विष्णु शरणं वरेण्यम् ॥ २९
नारद उवाच ।
कस्मिन् जनित्री सुरसत्तमाना
स्थाने हृषीकेशमनन्तमाघम् ।
चराचरस्य प्रभवं पुराण-
माराधयामास शुभे यद त्वम् ।। ३०
पुलस्त्य उवाच ।
सुरारणिः शक्रमवेक्ष्य दीनं
पराजित दानवनायकेन ।
सितेऽय पक्षे मकरसंगे
घृतार्चिप. स्पादय सप्तमेऽति ॥ ३१
दृष्ट्वैव देयं त्रिदशाधिपं ६
महोदये शक्रदिशाधिरूढम् ।
निराशना संयतपार सुचिचा
तदोपतम्धे शरणं सुरेन्द्रम् ॥ ३२
अदितिस्वाच ।
जयस्व दिव्याम्बुनकोशचौर
जयस्व संसारतरो. कुठार ।
जयस्त पापेन्धननात वेद-
स्तमौघसंरोध नमो नमस्ते ॥ ३३
नमोऽस्तु ते भास्कर दिव्यमर्ते
त्रैलोक्पलक्ष्मीतिलकाय ते नमः ।
त्वं कारण सर्वचराचरस्य
नाथोऽसि मा पालय विश्वमूर्ते ॥ ३४
त्वया जगन्नाथ जगन्मयेन
नायेन शक्रो निजराज्यहानिम् ।
अवाप्तवान् शनुपराभवं च
ववो भवन्त शरणं प्रपन्ना ॥३५
कमलों में प्रणाम करने के उपरान्त उन्होंने अपने तप का वर्णन किया। (२७)
उन (अदिति) ने अश्रुपूर्ण दृष्टि से (इन्द्र को) सूंघ एवं उनका आलिङ्गन पर (तप का पारण) पूछा । इन्द्र ने बलि द्वारा देवों सहित अपने विजित होने का वृत्तान्त पहा । (२८)
यह सुनने के उपरान्त अपने उस पुन को दिति के पुनों द्वारा विजित जानकर शोकाविष्ट एव दु खान्वित (अदिति) वरेण्य, पूज्य एव अनादि देव विष्णु की शरण मे गयीं।
नारद ने कहा--आप यह बतायें कि सुरजननी ने किस शुभ स्थान पर अनादि, अनन्त, चराचरोत्पादक एव पुरातन हृषीकेश की अराधना की। (३)
पुलरत्य ने कहा-दानव नायक द्वारा पराजित हुए दीन इन्द्र को देखकर अदिति सूर्य के मकरस्थित होने पर शुक्लपक्षीय सूर्य
सप्तमी के दिन उन सुराधिप (सूर्य) देव को महान उदयाचल पर पूर्व दिशारुद हुआ देसकर उपास पूर्वक वाणी एवं मन को सयत कर सुरेन्द्र (सूर्य) की शरण में गयीं। (३१ -३२)
अदिति ने कहा-हे दिव्याम्बुजकोश के चोर। आप की जय हो। हे ससाररूपी वृक्ष के कुठार । आपकी जय हो। हे पापरूपी इन्धन के लिए अग्नि आप क जय हो । हे तमसमूह के विनाशक ! आपको बारम्बार नमस्कार है। (३३)
हे भास्कर । हे दिव्यमूति । आपको नमस्कार है। हे त्रैलोक्य लक्ष्मी के पति । आपको नमस्कार है। आप समस्त चराचर जगत के कारण तथा नाथ हैं। हे विश्वमूर्ते। मेरी रक्षा कीजिए। (३४)
हे जगन्नाथ | जगन्मय आप नाथ के ही कारण इन्द्र को अपने राज्य की हानि एव शत्र से पराभव की प्राप्ति हुई है। मत मैं आपकी शरण में आयी हूँ। (३५)
इत्येवमुक्त्या सुरपूजितं सा ।
आलिख्य रक्तैन हि चन्दनेन ।
संपूजयित्वा । करवीरपुष्पैः
संधूप्य धूपैः कणमर्कभोज्यम् ॥३६
निवेद्य चैवाज्ययुतं महाह
मन्नं महेन्द्रस्य हिताय देवी •
स्ववेन पुण्येन च संस्तुवन्ती
स्थिता निराहारमथोपवासम् ॥ ३७
ततो द्वितीयेऽति कृतप्रणामा
स्नात्वा विधानेन च पूजयित्वा ।
दत्त्वा द्विजेभ्यः कणकं विलाज्यं
ततोऽग्रतः सा प्रयता बभूव ॥ ३८
वतः प्रीतोऽभवद् भानुर्घताचि. सूर्यमण्डलात् ।
विनिःसृत्याग्रतः स्थित्वा इदं वचनमब्रवीत् ।। ३९
व्रतेतानेन सुप्रीवस्तवाहं दक्षनन्दिनि ।
प्राप्स्यसे दुर्लभं कामं मत्प्रसादान संशयः ॥ ४०
राज्यं त्वतनयानां चे दास्ये देवि सुरारणि ।
दानवान् ध्वंसयिष्यामि समयैवोदरे तय ॥ ४१ T
तद् वाक्यं वासुदेवस्य श्रुत्वा ब्रह्मन् सुरारणिः ।
प्रोवाच जगतां योनि वैपनांना पुनः पुनः ॥४२
कथं त्वामदरेणाहं वोढुं शक्ष्यामि दुर्धरस्
यस्योदरे जगत्सवं वसते स्थाणुजङ्गमम् ॥ ४३
कस्त्वां धारयितुं नाय शक्तस्त्रैलोक्यधार्यसि
यस्य सप्तार्णवाः कुक्षी निवसन्ति सहाद्रिभिः ॥ ४४
तस्माद् यथा सुरपतिः शक्रः स्यात् सुरराडिह ।
यथा च न मम क्लेशस्तथा कुरु जनार्दन ॥ ४५
विष्णुरुवाच।
सत्यमेतन्महाभागे दुर्घरोऽस्मि सुरासुरैः ।
तथापि संभविष्यामि अहं देव्युदरे तय ॥ ४६
आत्मानं भुवनान् शैलांस्त्याश्च देवि सकश्यपाम् ।
ऐसा कहने के उपरान्त रक्तचन्दन द्वारा सुरपूजित (सूर्य) को चित्रितकर उन देवी (अदिति) ने करवीर (कनेल) के पुष्पों से उनका पूजन किया एवं धूप से धूपित करने के पश्चात् महेन्द्र के हितार्थ अर्कभोज्य कण एवं घृतयुक्त उत्तम अन्न निवेदित किया तथा निराहार उपवास पूर्वक पवित्र स्तोत्रों से स्तुति करती हुई बैठी रहीं। (३६-३७)
तदनन्तर दूसरे दिन प्रणाम करने के उपरान्त विधान पूर्वक स्नान एव पूजन पर ब्राह्मणों को क्णक, तिल एव घृत प्रदान किया और तदनन्तर वे प्रकृष्ट संयम करने लगी। (३८)
इससे पृताचि मानु प्रसन्न हो गये । (वे) सूर्य मण्डल से निकरे एवं अदिति के सम्मुस सड़े होकर यह (३६) वचन पोले-
हे दक्षनन्दिनि! तुम्हारे इस मन से मैं बहुत प्रसन्न हूँ। अतः मेरी रुपा से तुम निसन्देह मनोवांछिव दुर्लम यस्तु प्राप्त करोगी। (४०)
हे देवि देवजननि ! मैं तुम्हारे उदर से उत्पन्न होकर तुम्हारे पुत्रों को राज्य दूंगा और दानवों का नाश करूँगा। (४१)
ब्रह्मन् ! वासुदेव का यह वाक्य सुनकर यार-बार काँपती हुई देवजननी अदिति ने जगयोनि विष्णु से कहा
जिसके उदर में स्थायर-उद्गमात्मक समस्त जगत् निवास करता है ऐसे दुर्धर आपको मैं अपने उदर में कैसे धरण करूँगी। (४३)
हे नाथ । याप त्रैलोक्य शे धारण करने वाले हैं। जिसकी कुक्षि में पर्वतों सहित सातों समुद्र स्थित हैं ऐसे आपको कौन धारण कर सकता है। (४४)
अतः हे जनार्दन! आप वैसा ही करें जिससे इन्द्र देवताओं के अधिपति मन जाँय एवं मुझे भी सोश न हो। (४५)
विष्णु ने कहा-दे गदामागे ! यह सत्य है कि समस्त सुर एवं थसुर मुझे घारम नही कर सरले । वथापि हे देवि! मैं आपके उदर से उत्पन्न होऊँगा। (४६)
देवि! स्वयं को, मुवों को, पर्वतों को एवं कश्यप सहित आपको में योग द्वारा धारण करूँगा।हे मातः!
धारयिष्यामि योगेन मा विपादं कथाऽम्पिके ॥ ४७
तवोदरेऽहं दायि संभविष्यामि चै यदा ।
तदा निस्तेजसो दैत्याः संभविष्यन्त्यसंशयम् ॥ ४८
इत्येवमुक्त्या भगवान् विवेश
तस्याभ भूयोऽरिगणनमर्दी ।
स्वतेजसोऽशेन विवेश देव्याः
दोदरे शक्रहिताय विप्र ॥ ४१
इति श्रीवामनपुराणे षवाशोऽध्यायः ॥५॥