सरोमाहात्म्ये 2 वामनचरित-दैत्यराज पद पर बलि का अभिषेक बलि का ऐश्वर्य वर्णन

ऋपय ऊचुः।

ग्रूहि वामनमाहात्म्यमुत्पत्तिं च विशेषतः ।

यथा वलिनियमितो दत्तं राज्यं शतक्रतोः ॥ १

लोमहर्पण उवाच ।

भृणुध्वं मुनयः प्रीता वामनस्य महात्मनः ।

उत्पत्ति च प्रभावं च निवासं कुरुजाङ्गले ॥२

तदेव वंशं दैत्यानां शृणुध्वं द्विजसत्तमाः।

यस्य वंशे समभवद् पलिवैरोचनिः पुरा ॥३

दैत्यानामादिपुरुषो हिरण्यकशिपुः पुरा ।

तस्य पुत्रो महातेजाः प्रह्लादो नाम दानवः ।।४

सम्माद् विरोचनो जज्ञे बलिर्ज पिरोचनात् ।

हते हिरण्यकशिपो देवानुत्साध सर्वतः ॥ ५

राज्यं कृतं च तेनेष्टं त्रैलोक्ये सचराचरे ।

कृतयत्नेषु देवेषु त्रैलोक्ये दैत्यवां गते ॥ ६

जये तथा बलवतोर्मयशम्मरयोस्तथा ।

शुद्धासु दिक्षु सर्वासु प्रवृत्ते धर्मकर्मणि ।।७

संप्रवृत्ते दैत्यपथे अयनस्थे दिवाकरे ।

प्रहादशम्मरमौरनुहादन चैव हि ।। ८

इसका 'कुरुक्षेत्र' नाम हुआ। (१३)

सरोवर के मध्य में प्रविष्ट महात्मा रुद्र ने इस तीर्थ का सेवन किया जिससे महातेजस्वी हर को स्थाणुत्व प्राप्त हुआ। (१२)

आदि मे यह 'मक्षवेदी' थी किन्तु कालान्तर में इसका नाम 'रामहृद' हुआ। तदुपरान्त फुरु द्वारा पृष्ट होने से इसका 'कुरुक्षेत्र' नाम हुआ। (१३)

तरन्तुक एवं अरन्तुफ के मध्य तथा रामहृद एवं चतुर्मुस का मध्य भाग समन्तपञ्चक कुरुक्षेन है तथा इसे ही पितामह की उत्तरवेदी कहा जाता है।

श्रीवामनपुराण के सरोम्हात्मय में प्रथम अध्याय समाप्त ॥१॥

ऋषियों ने कहा-(आप) वामन के माइल्य और उत्पत्ति का विशेष रूप से घणन परें तथा यह बतलायें कि किस प्रकार पलि यो पाँध कर इन्द्र को राज्य दिया गया।(१)

लोमहर्पण ने पदा-मुनियो । प्रसन्नता पूर्वक आप लोग महात्मा यामत की उत्पत्ति, प्रभाव और कुरूनागल में उनके निवास का वर्णन मुनें। (२)

हे द्विजप्ठो!आपलरोग दरयों के टस पंश फो भी मुर्ने जिसमें प्राचीनमाल में विरोचन फे पुत्र थलिपैदा हुए थे। (३)

पूर्य समय में देत्यों का आदिपुरुष हिरण्यरशिपु था। अन्यदनामक महानेजस्वी दानव उसय पुत्र था । (४) उससे विरोचन और विरोचन से पलि उत्पन्न हुआ। हिरण्यरशिपु के मारे जाने पर सभी स्थानों से देवताओं यो हटा कर चराचर सहित तीनों लोकों मे बलिने भलीभाति राज्य किया। देवताओं के प्रयत्न करने पर भी त्रैलेक्य दैत्यों ये अधीन हो गया। (५-६)

बलशाली मय और शम्यर की विजय हो गई। सर्वत्र धर्म कार्य फैल गया और दिशायें शुद्ध हो गई। (७)

सूर्य भी दैत्यपय पाले (दक्षिण) अयन में स्थित हो गये। प्रहलाद, शम्पर और मयतया अनुहाद दैत्य सब दिशाओं की रक्षा करने लगे।आगरा भी दैत्य पाठिन हो गया। देवगन

दिक्षु सर्वासु गुप्तासु गगने दैत्यपालिते ।

देवेषु मसशोमां च स्वर्गस्थां दर्शयत्सु च ॥९

प्रकृतिस्थे ततो लोके वर्तमाने च सत्पथे ।

अभावे सर्वपापानां धर्मभावे सदोत्थिते ॥ १०

चतुष्पादे स्थिते धर्म ह्यधर्मे पादविग्रहे ।

प्रजापालनयुक्तेपु प्राजमानेषु राजसु ।

स्वधर्मसंग्रयुक्तेषु तथाश्रमनिवासिपु ॥ ११

अभिपिक्तोऽसुरैः सदैत्यराज्ये नलिस्तदा ।

हृष्टेष्वसुरसंघेपु नदत्सु मुदितेषु च ।। १२

अथाभ्युपगता लक्ष्मीलिं पद्मान्तरप्रभा ।

पद्मोद्यतफरा देवी वरदा सुप्रवेशिनी ॥ १३

श्रीस्वाच ।

पले घलयता श्रेष्ठ दैत्यराज महायुते ।

प्रीताऽस्मि तय भद्रं ते देवराजपराजये ॥ १४

यत्त्वया युधि विक्रम्य देवराज्यं पराजितम् ।

दृष्ट्वा ते परमं सत्वं ततोऽहं स्वयमागता ॥ १५

नाश्चर्य दानवव्याघ्र हिरण्यकशिपोः कुले ।

प्रसूतस्यासुरेन्द्रस्य तय कर्मदमीदृशम् ॥ १६

विशेपितस्त्वया राजन् दैत्येन्द्रः प्रपितामहः ।

येन भुक्तं हि निसिलं त्रैलोक्यमिदमव्ययम् ॥ १७

एवमुक्त्या तु सा देवी लक्ष्मीदैत्यनृपं पलिम् ।

प्रनिटा वरदा सेव्या सर्वदवमनोरमा ॥ १८

तुष्टाश्च देव्य. प्रवराः ही. कीर्तिद्युतिरेव च ।

प्रभा धृति क्षमा भूविझद्धिर्दिव्या महामतिः ॥ १९

श्रुति.स्मृतिरिडा कीर्तिः शान्ति. पुष्टिस्तथा क्रिया।

सर्वाश्चाप्सरसो दिव्या नृत्तगीतविशारदाः ।। २०

प्रपद्यन्ते स्म दैत्येन्द्रं त्रैलोक्यं सचराचरम् ।

प्राप्तमैश्चर्यमतुलं यलिना ब्रह्मवादिना ॥ २१

इति श्रीवामनपुराणे सरोमाहास्ये द्वितीयोऽध्याय ॥२॥

स्वर्गस्थ यज्ञ की शोभा देखने लगे।(८-९)

सारा ससार प्रकृस्थित हो गया तथा सन्मार्ग पर आरूढ हो गया। सभी पापों के नष्ट होने पर धर्म भाव स्थिर हो गया। (१०)

धर्म चार पादों से प्रतिष्ठित हो गया। अधर्म एक ही पाद पर स्थित हुआ। सभी राजा प्रजापालन करते हुये सुशोभित होने लगे तथा सभी आश्रमों के लोग स्वधर्म का पालन करने लगे। (११)

ऐसे समय में असुरों ने बलि को दैत्य-राज-पद पर अभि पिक्त कर दिया । इष्ट असुर समुदाय प्रसन्न होकर निनाद करने लगा। (१२)

इसके अनन्तर कमलोदर के समान कान्ति बाली, वरदा, सुप्रवेशिनो लक्ष्मी देवी हाय में फमल लिये हुये घोल के समीप आई। (१३)

लक्ष्मी ने कहा-हे यवानों में श्रेष्ठ । महातेजस्यो दैत्यराज पलि। देवराज के पराजय से में तुम पर प्रसन्न में हूँ। तुम्हारा मंगल हो। (१४)

क्योंकि तुमने सग्राम मे पराक्रम दिसाफर देवों के राज्य को जीत लिया है । अत तुम्हारे श्रेष्ठ पल को देखकर मैं स्वय आई हूँ। (१५)

हे दानपश्रेष्ट । असुरेन्द्र हिरण्यकशिपु के कुल में उत्पन्न तुम्हारे इस प्रकार के कर्म में कोई आश्चर्य की यात नहीं है।

हे राजम् । आप दैत्यश्रेष्ठ अपने प्रपितामह हिरण्यकशिपु से भी विशिष्ट है। क्योंकि । आप इस अव्यय समप्र रोक्य का भोग पर रहे हैं। (१७)

देत्यराज यलि से ऐसा कहने के उपरान्त सर्वदेव मनोरमा सेव्या एव परदा वे लक्ष्मी देवी राजा बलि में प्रविष्ट हो गई। (१८)

वर प्रसन्न होकर सभी श्रेष्ठ देवियाँ ही, फीति, पुति, प्रमा, धृति, क्षमा, भूति, ऋद्धि, दिव्या महामति, श्रुति, स्मृति, इहा, कीति, शान्ति, पुष्टि, क्रिया तथा मृतगीत विशारदा दिव्य अप्सरायें देत्येन्द्र का सेवन करने लगी। इस प्रकार ब्रह्मवादी यलि ने सचराचर प्रैलोक्य का अतुल ऐधर्य प्राप्त कर लिया। (१९-२१)

श्रीवामनपुराग के समाहारम्य में दूसरा अध्याय समाप्त ॥२॥