वामन महा पुराण
10 वामनचरित- वामन द्वारा तीन पग मात्र की याचना तथा अपने सर्वदेवमय विराट् रुप का प्रदर्शन, वामन का तीन पग में त्रैलोक्य को तापना बलि का पाताल-गमन
लोमहर्पण उवाच ।
सपवरनाटावी दृष्टका सभुमिद अलिः ।
पप्रच्छोशनस शुक्रं प्रणिपत्य कृताञ्जलिः ॥ १
आचार्य धोभमायाति मान्धिभूमिधरा मही।
कम्माघ नामुरान मागान् प्रतिगृह्णन्ति यहयः ॥२
इति पृष्टोऽथ पलिना काव्यो वेदविदा वरः ।
उवाच दैत्याधिपतिं चिर ध्यात्वा महामतिः ।। ३
अवतीणों जगद्योनिः कश्यपस्य गृहे हरिः
सपनेह रूपेण परमात्मा समावनः ॥४
स नूनं यज्ञमायाति तर दानरपुंगव ।
तत्पादन्यासपिडोमादियं प्रचलिता मही॥
कम्पन्ने गिरयमे क्षुभिता मकरालयाः।
नेयं भूतपति भूमिः ममयां योदुमीश्वरम् ।। ६
सदेवासुरगन्धयों यक्षराक्षसपनगा।
हे विप्रो । सि जिम भ भाग में पामन पर रग थे यहाँ यहाँ दपी हुई भूमि में पियर (गर्त ) हो जाता था। (४०)
उन मन्दगरि थामन ने मृदुभाय से पलो हुए ममुद्रों, द्वीपों तया पर्वतों याली समरा पृथ्वी यो प्राम्पित पर दिया। (५२)
बृहरपति धीरे धीरे उद शुम मार्ग दिग्गने लगे एवं व भी कीहायिनोदार्थ अत्यन्त मन्दगामी दो गए। (५२)
तदनन्तर मदानाग शेप रमातल से निकल कर देपदेय चमधारी की सहायता करने लगे।
आप भी यह पेट स्थान 'अहिपिल' नाम से प्रसिद्ध है। उस परमात्र से नागों से भय नही होता। (४)
श्रीवामनपुराण में सरोमाहारगम नवाँ अध्याय समाप्त l
१०
माग ने कहा-यन-पतों सहिन पृप्या फो से उन्ध दुई देगार पलि ने प्रगाम परसथा हाथ जोदर रमा पायरे पूछा-(११)
है आपाय । पया पारा कि ममुद्रों तया पर्वतों सहित यह प्यी शुम्प हो रही है और आग असुरों भागों को प्रहरा गद्दी पर रहे हैं? (२)
पलिप ऐगा पूली पर पेठ महानि गुमापार्य ने पितापान र देर से कहा- (३)
फाप प गृह में गयोनि (जगा के पारा) सनावन परमामा यामन रूप से अपी हुए हैं। (२)
दे दानोन्द्र । पिपरदीये गुग्दारे या में भा में हैं। पन्ही पैर गमे सस विनोम के प्रत पद पृथ्यो पम्पिादोरही है। (५)
ये पत्र पर दोदप ममा चम्प हो गए हैं। पद भूमि भूनपनि भर कर पदा करने में समर्थ नदी।
अनेनैव धृता भूमिरापोऽग्निः पयनो नभः ।
धारयत्यखिलान् देवान् मनुष्यांश्च महासुरान् ॥ ७
इयमस्य जगद्धातुर्माया कृष्णस्य गहरी ।
धार्यधारकभावेन यया संपीडितं जगत् ॥ ८
तत्सन्निधानादसुरा न भागार्हाः सुरद्विपः ।
भुञ्जते नासुरान् भागानपि तेन त्रयोऽग्नयः ॥ ९
शुक्रस्य वचनं श्रुत्वा हृष्टरोमानवीद् वलिः ।
धन्योऽहं कृतपुण्यश्च यन्मे यज्ञपतिः स्वयम् ।
यज्ञमभ्यागतो ब्रह्मन्मत्त. कोऽन्योऽधिकः पुमान् ॥१०
यं योगिनः सदोद्युक्ता. परमात्मानमव्ययम् ।
द्रष्टुमिच्छन्ति देवोऽसौ ममावरमुपेष्यति ।
यन्मयाचार्य कर्त्तव्यं तन्ममादेष्टुमर्हसि ॥ ११
शुक्र उवाच ।
यज्ञभागभुजो देवा वेदप्रामाण्यतोऽसुर ।
त्वया तु दानवा दैत्य यज्ञभागभुजः कृताः ॥ १२
अयं च देवः सत्त्वस्थः करोति स्थितिपालनम् ।
विसृष्टं च तथाऽयं च स्वयमति प्रजाः प्रभुः ॥ १३
भवांस्तु वन्दी भविता नूनं विष्णुः स्थितौ स्थितः ।
विदित्वैवं महाभाग कुरु यत् ते मनोगतम् ॥ १४
त्वयाऽन्य दैत्याधिपते स्वल्पकेऽपि हि वस्तुनि ।
प्रतिज्ञा नैव वोढव्या वाच्यं साम तथाऽफलम् ॥ १५
कृतकृत्यस्य देवस्य देवार्थ चैव कुर्वतः ।
अलं दयां धनं देवे स्वेतद्वाच्यं तु याचतः ।
कृष्णस्य देवभूत्यर्थ प्रवृत्तस्य महासुर ॥ १६
पलिरुवाच ।
ब्रह्मन् कथमहं घ्यामन्येनापि हि याचितः ।
नास्तीति किमु देवस्य संसारस्यापहारिणः ॥ १७
व्रतोपवासैविविधैर्यः प्रभुह्यते हरिः।
स मे वक्ष्यति देहीति गोविन्दः किमवोऽधिकम् ।। १८
यदर्थ सुमहारम्भा दमशौचगुणान्वितैः ।
देव, असुर, गन्धर्व, यक्ष राक्षस एवं पन्नों युक्त पृथ्वी, जल, अग्नि, पवन, आकाश, समस्त देवों, मनुष्यों एव महासुरों को ये ही धारण करते हैं। (७)
जगद्धाता कृष्ण की ही यह गभीर माया है जिसके द्वारा यह जगत् धार्यधारक भाव से सपीड़ित हो रहा है। (८)
उन्हीं का सामीप्य होने से देव शत्रु असुर लोग यज्ञ भाग योग्य नहीं रहे तथा उसी से अग्नित्रय भी असुरों के भाग का भोग नहीं कर रहे है। शुक्राचार्य के वचन को सुन र रोमाञ्चित होकर बलि ने कहा-हे ब्रह्मन् मैं धन्य एव सफल पुण्य वाला हूँ जो स्वय यज्ञपति मेरे यज्ञ मे आ रहे हैं। मुझ से कौन अन्य पुरुष श्रेष्ठ है ? (१०)
सदा जागरूक योगी लोग जिन अव्यय परमात्मा को देखना चाहते हैं वे ही देव मेरे यज्ञ में आ रहे हैं। हे आचार्य। आप मुझे आज्ञा दें कि मेरा क्या कर्तव्य है? (११)
शुक्र ने कहा-हे असुर । वेदप्रामाण्य से देवता यज्ञभाग के भोगी होते हैं। किन्तु हे दैत्य ! तुमने दानवों को यज्ञभाग का भोगी बना दिया है। (१२)
ये ही देव सत्त्व गुण का आश्रय लेकर स्थिति और पालन करते हैं तथा ये ही सृष्टि करते हैं और ये ही प्रभु स्वयं प्रजा का भक्षण करते हैं। (१३)
विष्णु स्थिति के कार्य मे तत्पर हुए हैं । अतः आप निश्चय ही वन्दी होने वाले है । हे महाभाग ! यह जानकर तुम्हारा जो अभीष्ट हो उसे करो। (१४)
हे दैत्यपति । तुम स्वल्प वस्तु के लिए भी उनसे प्रतिज्ञा न करना तथा फलहीन सान्त्वना युक्त मीठी बातें करना। (१५)
हे महासुर । कृतकृत्य, देवों का कार्य सम्पादन करने वाले तथा देवों की सम्पत्ति के लिए प्रयत्नशील देव कृष्ण के याचना करने पर तुम उनसे यह कहना कि मैं देव के हेतु पर्याप्त धन दूंगा।
बलि ने कहा-हे ब्रह्मन् । दूसरों अर्थात सामान्य जनों से याचित होने पर भी में "मेरे पास नहीं है" ऐसा कैसे कह सकता हूँ फिर ससार के पापों का सहार करने वाले देवेश्वर से ऐसा कैसे कहूँगा? (१७)
अनेक प्रकार के व्रतों एव उपवासों से जो प्रभु हरि प्राप्त किये जाते है जब वे ही गोविन्द मुझ से 'दो' ऐसा फहेंगे तो इससे बढ़ कर और क्या हो सकता है ? (१८)
जिनके निमित्त दम, शौच गुणों से युक्त लोग वृहत्
यज्ञाः क्रियन्ते यज्ञेशः स मे देहीति वक्ष्यति ॥ १९
तत्साधु सुकृतं कर्म तपः सुचरित च नः ।
यन्मा देहीति विश्वेशः स्वयमेव वदिष्यति ॥ २०
नास्तीत्यहं गुरो वक्ष्ये तमम्यागतमीश्वरम् ।
प्राणत्यागं करिष्येऽहं न तु नास्ति बने कचित् ॥ २१
नास्तीति यन्मया नोक्तमन्येषामपि याचताम् ।
वक्ष्यामि कथमायाते तदद्य चामरेऽच्युते ।। २२
श्लाघ्य एव हि वीराणां दानाचापत्समागमः ।
न बाधाकारि यदानं तदङ्ग बलवत् स्मृतम् ॥ २३
मद्राज्ये नासुखी कचिन्न दरिद्रो न चातुरः ।
न दुःखितो न चोद्विग्नो न शमादिविवर्जितः ॥ २४
हृष्टस्तुष्टः सुगन्धी च तृप्तः मर्वसुखान्वितः ।
जनः सर्वो महाभाग किमुताह मदा सुखी ॥२५
एतद्विशिष्टमत्राहं दानबीजफलं लभे ।
विदितं मुनिशार्दूल मयैतन् त्वन्मुखाच्छूतम् ॥ २६
मत्प्रसादपरो नूनं यज्ञेनाराधितो हरिः ।
मम दानमवाप्यासी पुष्णाति यदि देवताः ।। २७
एतद्बीजवरे दानवीजं पतति चेद् गुरौ ।
जनार्दने महापात्रे किं न प्राप्तं ततो मया ॥ २८
विशिष्टं मम तहानं परितुष्टाश्च देवताः।
उपभोगाच्छतगुणं दानं सुखकरं स्मृतम् ।। २९
मत्प्रसादपरो नूनं यज्ञेनाराधितो हरिः।
तेनाम्येति न संदेहो दर्शनादु पकारकृत् ॥ ३०
अथ कोपेन चाभ्येति देवभागोपरोधतः ।
मां निहन्तुंततोहि स्याद्वधः श्लाध्यतरोऽच्युतात् ॥ ३१
एतज्ज्ञात्वा मुनिश्रेष्ठ दानविघ्नकरण मे ।
नेय भाव्यं जगन्नाथ गोविन्दे समुपस्थिते ॥ ३२
लोमहर्षण उवाच ।
इत्येवं वदतस्तस्य प्राप्तस्तत्र जनार्दनः ।
सर्वदेवमयोऽचिन्त्यो मायावामनरूपधृक् ॥ ३३
सभार वाले यज्ञ करते है वे ही यज्ञेश मुझसे "दो" ऐसा कहेंगे। (१९)
मेरा सुकर्म सफल है तथा मेरी तपस्या भी भली भाति आचरित है क्यों कि स्वयं विश्वेश मुझ से 'दो' ऐसा कहेंगे। (२०)
हे गुरु । क्या मैं उन अभ्यागत ईश्वर से "नहीं है" ऐसा कहूँ? मैं भले ही प्राणत्याग कर दूं किन्तु किसी मनुष्य से 'नहीं है' यह नहीं कह सकता । (२१)
दूसरों के भी माँगने पर जब मैंने "नहीं है" ऐसा नहीं कहा तो आज अच्युत देव के आने पर कैसे (२२)
वीर पुरुषों के लिये दान से आपत्ति का समागम होना श्लाघ्य ही होता है। किन्तु हे गुरो। जो दान बाधाकारी नहीं होता वह निस्सन्देह श्रेष्ठतर माना गया है। (२३)
मेरे राज्य में कोई भी असुसी, दरिद्र, आतुर (रोगी), दु.सित, उद्विग्न एवं शमादि गुणों से हीन नहीं है। हे महाभाग! सभी लोग हृष्ट, तुष्ट, सुगग्धी, तृप्त एवं सुखों से युक्त है ! अधिक क्या? मैं तो सदा सुखी हूँ। (२४-२५)
हे मुनिशार्दूल। आपके मुख से सुन कर मुझे यह ज्ञात हो गया कि में यहाँ पर विशिष्ट दानरूपी बीज का फल प्राप्त कर रहा हूँ। (२६)
वे मुझसे दान लेकर यदि देवताओं को पुष्ट करते हैं तो यज्ञ से आराधित हरि मुझ पर निश्चय ही प्रसन्न हैं । (२७)
यदि बीजवर, महान् पात्र, पूज्य जनार्दन में मेरे दान का बीज पड़ गया तो फिर मुझे क्या प्राप्त नहीं हुआ ? मेरा यह दान विशिष्ट प्रकार का है और देवता मेरे ऊपर प्रसन्न हैं। उपभोग की अपेक्षा दान को सी गुना सुखकर माना गया है। (२८-२६)
यज्ञ से आराधित हरि निश्चय ही मेरे ऊपर प्रसन्न हैं। निरसदेह इसी से दर्शन द्वारा उपकार करने वाले वे आ रहे है।
देवभाग का उपरोध होने के कारण यदि वे योपयश मुझे मारने आ रहे हैं तो अच्युत से होने घाटा वध भी श्लाध्यतर होगा। (३१)
हे मुनिश्रेष्ठ! यह जानकर गोविन्द के समुपस्थित होने पर आप मेरे दान में विघ्न न करें। (३२)
लोमहर्षण ने कहा-उसके ऐसा कहने के समय ही सर्वदेवमय, अचिन्त्य माया से वामनरूपधारी जनार्दन यहाँ पहुंचे। (३३)
तं दृष्ट्वा यज्ञवाट तु प्रविष्टमसुराः प्रभुम् ।
जग्मुः प्रभावतः क्षोभं तेजसा तस्य निष्प्रभाः ॥ ३४
जेपुश्च मुनयस्तत्र ये समेता महाध्वरे ।
वसिष्ठो गाधिजो गों अन्ये च मुनिसत्तमाः ॥ ३५
बलिश्चैवाखिलं जन्म मेने सफलमात्मनः ।
ततः संक्षोभमापनो न कश्चित् किंचिदुक्तवान् ॥ ३६
प्रत्येक देवदेवेशं पूजयामास तेजसा ।
अथासुरपति प्रहं दृष्ट्या मृनिवरांश्च तान् ।। ३७
देवदेवपति. साक्षाद् विष्णुर्वामनरूपवृक् ।
तुटाव यज्ञं वद्धिं च यजमानमथाचितः ।
यज्ञकर्माधिकारस्थान् सदस्यान् द्रव्यसंपदम् ॥ ३८
सदस्याः पात्रमसिलं वामनं प्रति तरक्षणात् ।
यज्ञवाटस्थित विप्राः साधु साध्वित्युदीरयन् ॥ ३९
स चार्धमादाय बलिः प्रोद्भुतपुलकस्तदा ।
पूजयामास गोविन्दं प्राह चेद महासुरः ॥ ४०
बलिरुवाच ।
सुवर्णरत्नसंघातो गजाश्वसमितिस्तथा ।
स्त्रियो वस्त्राण्यलंकारान् गावोग्रामाश्च पुष्कलाः ।। ४१
सर्वे च सकला पृथ्वी भवतो या यदीप्सितम् ।
तद् ददामि वृणुष्येष्ठं ममार्थाः सन्ति ते प्रियाः ॥ ४२
इत्युक्तो दैत्यपतिना प्रीतिगर्भान्वितं वचः ।
प्राह सस्मितगम्भीर भगवान् वामनाकृतिः॥ ४३
मभाग्निशरणार्थाय देहि राजन् पदत्रयम् ।
सुपर्णग्रामरत्नादि तदधिम्यः प्रदीयताम् ॥ ४४
पलिरुवाच ।
त्रिभिः प्रयोजन किं ते पदैः पदवतां वर ।
शत शतमहस्रं वा पदाना मार्गवां भवान् ॥ ४५
श्रीवामन उवाच ।
एतारवा दैत्यपते कृतकृत्योऽस्मि मार्गणे
अन्येपार्थिनां वित्तमिच्छया दास्यते भवान् ॥ ४६
एतच्छ्रुत्वा तु गदितं वामनम्य महात्मनः ।
वाचयामास वै तस्मै वामनाय महात्मने ॥ ४७
उग प्रभु को यज्ञस्थल मे प्रमिष्ट हुआ देख कर असुरलोग उनके प्रभाव से क्षुब्ध एव सेज से निष्प्रभ हो (३४)
उस महायज्ञ में उपस्थित घसिष्ठ, विश्वामित्र, गर्ग एवं अन्य मुनिश्रेष्ठ जप करने लगे। (३५)
बलि ने अपना सम्पूर्ण जन्म सफल माना । तदनन्तर सक्षोभमत होने से किसी ने कुछ नहीं कहा । (३६)
उनके तेज के कारण प्रत्येक ने देवदेवेश का पूजन किया। तदुपरान्त विनीत असुरपति एव उन मुनिवरों को देखकर देवदेवेश्वर वामनरूप धारण करने वाले साक्षात् विष्णु भगवान् ने पूजित होने के बाद यज्ञ, अग्नि, यजमान, यज्ञकर्म मे अधिकृत सदस्यों एवं द्रव्य सामग्रियों की स्तुति की। (३७-३८)
हे विप्रो । तत्क्षण सभी सदस्य लोग यज्ञमण्डप में उपस्थित पारस्वरूप वामन के प्रति 'साधु साधु' कहने लगे। (३९)
सस समय पुलकित महासुर बलि ने अर्घ लेकर गोविन्द की पूजा की और उनसे यह कहा। (४०)
बलि ने कहा-सुवर्ण और रत्नों का समूह, हाथी, घोड़े, स्त्रियाँ, वस्त्र, भूपण, गायें तथा प्रामसमूह-ये सभी वस्तुएँ, समस्त पृथ्वी अथवा आपका जो अभीष्ट हो वह मैं देता आप अभीष्ट का वरण करें। मेरे प्रिय अर्थ आपके (४१-४२)
दैत्यपति के इस प्रकार प्रीति युक्त पचन कहने पर वामनाकृति भगवान ने हँसते हुए गम्भीर वचन कहा । (४३)
हे राजन् । मुझे अग्नि शाला के निमित्त तीन पग (भूमि) दें। सुवण, ग्राम एव रत्नादि उनके याचकों को (४४)
वलि ने कहा-हे पदधारियों में श्रेष्ठ ! तीन पग भूमि से आपका कौन प्रयोजन सिद्ध होगा। सौ अथवा सौ हजार पग भूमि आप माँगिये।
श्रीवामन ने कहा-हे दैत्यपति । इतना पाने से ही मैं कृत्यकृत्य हूँ आप अन्य याचों को इच्छानुसार दान दीजियेगा। (४६)
महात्मा वामन का यह पचन सुनकर (बलि ने) उन महारमा वामन को वचन दे दिया।" (४७)
पाणौ तु पतिते तोये वामनोऽभूदयामनः ।
सर्वदेवमयं रूप दर्शयामास तत्क्षणात् ॥ ४८
चन्द्रसूयौ तु नयने घो. शिरश्चरणौ शितिः ।
पादाङ्गुल्यः पिशाचास्तु हस्ताङ्गुल्पश्च गुह्यकाः ॥४९
विश्वेदेवाश्च जानुस्था जड्डे साध्याः सुरोत्तमाः ।
यक्षा नसेषु संभूता रेसास्वप्सरसस्तथा ।। ५०
दृष्टिरक्षाण्यशेपाणि केशाः सूर्याशय प्रभोः ।
तारका रोमकृपाणि रोमेपु च महर्षयः ॥ ५१
पाहवो विदिशस्तस्य दिशः थोरे महात्मनः ।
अश्विनौ श्रवणे तस्य नासा वायुर्महात्मनः ॥ ५२
प्रसाद चन्द्रमा देवो मनो धर्मः समाश्रितः ।
सत्यमस्यामवद् वाणी जिह्वा देवी सरस्वती ॥५३
ग्रीवादितिर्देवमाता विद्यास्तद्वलयस्तथा ।
स्वर्गद्वारमभन्मैत्रं त्वष्टा पूपा च चै ध्रुवौ ॥५४
मुसे वैश्वानरथास्य वृपणौ तु प्रजापतिः ।
हृदयं च परं ब्रह्म पुंस्त्वं वै कश्यपो मुनिः ॥ ५५
पृष्ठेऽस्य वसवो देवा मस्तः सर्वसंधिपु ।
वक्षस्थले तथा रुद्रो धैर्ये चास्य महार्णवः ॥ ५६
उदरे चास्य गन्धर्वा मस्तश्च महाबलाः।
लक्ष्मीर्मेधा धृति, कान्तिः सर्वविद्याश्च वै कटिः ॥ ५७
सर्वज्योतीपि यानीह तपश्च परमं महत् ।
तस्य देवाधिदेवस्य तेजः प्रोद्भुतमुत्तमम् ॥ ५८
तनौ कुक्षिपु वेदाश्च जानुनी च महामसाः ।
इष्टयः पशवश्चास्य द्विजाना चेष्टितानि च ॥ ५९
तस्य देवमयं रूपं दृष्ट्वा विष्णोर्महात्मनः ।
उपसर्पन्ति ते दैत्याः पतङ्गा इव पावकम् ।। ६०
चिक्षुरस्तु महादैत्यः पादाङ्गुष्ठं गृहीतवान् ।
दन्ताभ्यां तस्य यै ग्रीवामड्गुष्ठेनाहनद्धरिः ।। ६१
प्रमथ्य सर्वानसुरान् पादहस्ततलैर्विभुः ।
कृत्या रूपं महाकायं संजहाराशु मेदिनीम् ॥ ६२
हाथ पर जल गिरते ही चामन अवामन (विराट् ) हो गये। तत्क्षण उन्होंने सर्वदेवमय स्वरूप को दिसाया । (४८)
चन्द्र और सूर्य उनके दोनों नेत्र, आकाश शिर, पृथ्वी दोनों चरण, पिशाच पैर की अंगुलियाँ एय गुह्यक होंथों की अँगुलियाँ थे। (४६)
जानु मे विश्वेदेवगण, दोनों जवाओं मे सुरश्रेष्ठ साध्य गण, नखों में यक्ष एव रेसाओं में अप्सरायें थीं।(५०)
समस्त नक्षत्र उनकी दृष्टियाँ, सूर्यकिरणें प्रभु के केश, तारकायें उनके रोम कूप एव रोमों में मषिगण स्थित थे। (५१)
विदिशायें उनकी बाहें, दिशाएँ उन महात्मा के दोनों कर्ण, दोनों अश्विनीकुमार श्रवण एव वायु उन महात्मा के नासिका स्थान पर थे। (५२)
उनके प्रसाद में चन्द्रदेव तथा मन में धर्म आश्रित थे। सत्य उनकी वाणी तथा जिह्वा सरस्वती देवी (५३)
देवमाता अदिति उनकी ग्रीवा, विद्या उनकी वलियाँ, स्वर्ग द्वार उनकी गुदा तथा त्वष्टा एव पूषा उनकी भौहें (५४)
वैश्वानर उनके मुस तथा प्रजापति वृपण थे। पर ब्रह्म उनके हृदय तथा कश्यप मुनि उनके पुस्त्व थे। (५५)
उनकी पीठ में पसु देवता, सभी सन्धियों मे मरुद्गण, वक्ष स्थल मे रुद्र, तथा उनके धैर्य मे महार्णव आश्रित थे। (५६)
उनके उदर मे गन्धर्व एव महाबली मरुद्गण स्थित थे। लक्ष्मी, मेधा, धृति, कान्ति एव सर्व विद्यायें उनकी कटि मे स्थित थीं।
समस्त ज्योतियाँ एव परम महत् तप उन देवाधिदेव के उत्तम तेज थे। (५८)
उनके शरीर एवं कुक्षियों में वेद थे, वथा बड़े बड़े यज्ञ इष्टियाँ,पशु एव ब्रह्मणों की चेष्टायें उनकी दोनों जानु थीं। (५९)
उन महात्मा विष्णु के सर्वदेवमय रूप को देखकर वे दैत्य उनके निकट उसा प्रकार जाते थे जिस प्रकार अग्नि के निकट पतग जाते है। (६०)
सहादैत्य चिक्षुर ने दाँतों से उनके पैर के अंगूठे को पकड लिया। भगवान ने अंगूठे से उसकी ग्रीवा को आहत किया। (६१)
अपने पैरों एव हाथों के तलवों से समस्त असुरों को मथित कर तथा महाकायरूप धारण कर शीघ्र ही उन्होंने पृथ्वी को छीन लिया। (६२)
तस्य विक्रमतो भूमिं चन्द्रादित्यौ स्तनान्तरे ।
नभो विक्रममाणस्य सक्थिदेशे स्थितावुभौ ॥ ६३
परं विक्रममाणस्य जानुमूले प्रभाकरौ।
विष्णोरास्तां स्थितस्यैतौ देवपालनकर्मणि ॥ ६४
जित्वा लोकत्रयं तांश्च हत्वा चासुरपुंगवान् ।
पुरंदराय त्रैलोक्यं ददौ विष्णुरुरुक्रमः ॥ ६५
सुतलं नाम पातालमधस्ताद्वसुधातलात् ।
बलेर्दत्त भगवता विष्णुना प्रभविष्णुना ॥ ६६
अथ दैत्येश्वरं प्राह विष्णुः मर्वेश्वरेश्वरः।
यत् त्वया सलिलं दत्त गृहीतं पाणिना मया ॥ ६७
कल्पप्रमाणं तस्मान् ते भविष्यत्यायुरुत्तमम् ।
वैवस्वते तथाऽतीते काले मन्वन्तरे तथा ॥ ६८
सावर्णिके तु संप्राने भवानिन्द्रो भविष्यति ।
इदानी भुवन सर्व दत्त शकाय चै पुरा ॥ ६९
चतुर्युगव्यवस्था च साधिका ोकसमतिः ।
नियन्तव्या मया सर्वे ये तस्य परिपन्धिनः ।। ७०
तेनाहं परया भक्त्या पूर्वमाराधितो बले ।
सुतलं नाम पातालं समासाद्य वचो मम ।। ७१
वसासुर ममादेशं यथावत्परिपालयन् ।
तत्र देवसुखोपेते प्रासादशवसंकुले ।। ७२
प्रोत्फुल्लपमसरसि ह्रदशुद्धसरिद्वरे ।
सुगन्धी रूपसंपन्नो पराभरणभूपितः ॥ ७३
स्रक्चन्दनादिदिग्धाशो नृत्यगीतमनोहरान् ।
उपभुञ्जन् महाभोगान् विविधान् दानवेश्वर ।। ७४
ममाज्ञया कालमिमं तिष्ठ स्त्रीशवसंवृतः ।
यावत्सुरैश्च पिप्रैश्च न निरोधं गमिष्यसि ।। ७५
तावत् त्वं मुह्य संभोगान् सर्वकामसमन्वितान् ।
यदा सुरैश्च विप्रैश्च विरोधं त्व करिष्यसि ।
बन्धिष्यन्ति तदा पाशा बारुणा घोरदर्शनाः ॥ ७६
पलिरुवाच।
तत्रासतो मे पाताले भगवन् भवदाज्ञया ।
किं भविष्यत्युपादानमुपभोगोपपादकम् ।
भूमि का मापन करते समय चन्द्र और सूर्य उनके स्तनों के मध्य स्थित थे तथा आकाश का मापन करते समय वे उनके सक्थि प्रदेश में स्थित हुए। (६३)
परम् (ऊर्य) लोक का विक्रमण करते समय देवपालन कर्म में स्थित श्रीविष्णु के जानुमूल में चन्द्र एव सूर्य स्थित हुए (६४)
उस्कम (भारी डगों वाले) विष्णु ने तीनों लोकों का जीत एवं उन बड़े-बड़े असुरों को मारकर इन्द्र को त्रैलोक्य दे दिया। (६५)
सामर्थ्यशाली भगवान् विष्णु ने वसुधातल के नीचे स्थित सुतल नामक पाताल बलि को दिया। (६६)
तदनन्तर सर्वेश्वर विष्णु ने दैत्येश्वर से कहा-"क्योंकि तुम्हारे द्वारा प्रदत्त जल को मैंने हाथ मे ग्रहण किया अत कल्पप्रमाण की तुम्हारी उत्तम आयु होगी तथा चैव- स्वत मन्वन्तर का काल व्यतीत होने तथा सावर्णिक मन्वन्तर आने पर तुम इन्द्र बनोगे। इस समय के लिये मैंने पहले ही समस्त भुवन इन्द्र को दे रक्खा है। (६५-६६)
इकहत्तर चतुर्युगी के काल से कुछ अधिक काल तक जो समय की व्यवस्था है अर्थात् एक मन्वन्तर के काल तक मैं उसके (इन्द्र के) विरोधियों का नियमन करूँगा । (७०)
हे बलि। पूर्वकाल में उसने परमभक्तिपूर्वक मेरी आराधना की थी। अत. मेरे कहने से सुतल नामक पाताल में जाकर मेरे आदेश का यथावत् पालन करते हुये देव-सुख से सम्पन्न सैकड़ों प्रासादों से पूर्ण विकसित कमलों वाले सरोवरों, हृदों एवं शुद्ध श्रेष्ठ सरिताओं वाले उस स्थान पर निवास करो। हे दानवेश्वर । सुगन्ध धारण कर,श्रेष्ठ आभरणों से भूपित एव माला तथा चन्दनादि से अलङ्कृत सुन्दर से तुम नृत्य और गीत से युक्त विविध प्रकार के महान् भोगों का उपभोग करते हुये सैकडों स्त्रियों से आवृत होकर इतने काल तक मेरी आज्ञा से वहाँ निवास करो। जब तक देवताओं एव ब्राह्मणों से तुम विरोध न करोगे से तर तक समस्त कामनाओं से युक्त भोगों को भोगोगे। किन्तु जब तुम देवों एव ब्राह्मणों के साथ विरोध करोगे तो देखने में भयकर वरुण के पाश तुम्हें बाँधेगे । (७१-७६)
बलि ने कहा-हे भगवन् । हे देव ! आपकी आज्ञा से वहाँ पाताल में निवास करने वाले मेरे भोगों की सामग्री क्या होगी जिससे तृप्त होकर मैं सदा आपका स्मरण
आप्यायितो येन देव स्मरेयं त्वामहं सदा ।। ७७
श्रीभगवानुवाच ।
दानान्यपिधिदत्तानि श्राद्धान्यश्रोत्रियाणि च ।
हुवान्यश्रद्धया यानि तानि दासन्ति ते फलम् ॥ ७८
अदक्षिणास्तथा यज्ञा. क्रियावारिधिना कृताः।
फलानि तर दास्यन्ति अधीतान्यव्रतानि च ॥ ७९
उदकेन पिना पूजा विना दर्भेण या क्रिया ।
आज्येन च पिना होमं फलं दास्यन्ति ते पले ॥ ८०
यथेदं स्थानमाथित्य क्रियाः काश्चित्करिष्यति।
न तत्र चासुरो भागो भविष्यति कदाचन ।। ८१
ज्येष्ठाश्रमे महापुण्ये तथा विष्णुपदे हदे ।
ये च श्राद्धानि दास्यन्ति व्रतं नियममेव च ॥ ८२
किया कृता च या काचिद् विधिना विधिनापि वा ।
सर्व वदक्षयं तस्य भविष्यति न संशयः ।। ८३
ज्येष्ठे मासि सिते पक्ष एकादश्यामुपोषितः ।
द्वादश्यां वामनं दृष्ट्वा स्नात्वा विष्णुपदे इदे ।
दानं दत्त्वा यथाशक्त्या प्राप्नोति परमं पदम् ।। ८४
लोमहर्पण उवाच ।
यले रमिमं दत्त्वा शक्राय च विपिष्टपम् ।
व्यापिना तेन रूपेण जगामादर्शनं हरिः॥ ८५
शशास च यथापूर्वमिन्द्रस्त्रैलोक्यमूर्जितः ।
नि.शेपं च तदा कालं बलिः पातालमास्थितः ॥ ८६
इत्येतत् कथितं तस्य विष्णोर्माहात्म्यमुत्तमम् ।
वामनस्य शृण्वन् यस्तु सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥८७
पलिप्रहादसंवादं मन्त्रितं यलिशुक्रयोः ।
पलेविष्णोश्च चरित ये स्मरिष्यन्ति मानवाः ॥ ८८
नाधयो व्याधयस्तेषां न च मोहाकुलं मनः ।
भविष्यति द्विजश्रेष्ठा. पुंसस्तस्य कदाचन ॥ ८९
च्युतराज्यो निजं राज्यमिष्टप्रानि नियोगवान् ।
करूँगा। (७७)
श्रीभगवान् ने कहा--अविधिपूर्वक दिये गये दान, श्रोत्रिय ब्राह्मण रहित श्राद्ध तथा विना श्रद्धा के किये गये जो हवन हैं वे तुम्हें फल देगे। (७८)
दक्षिणा रहित यज्ञ, अविधिपूर्वक किये गये कर्म और प्रतरहित अध्ययन तुम्हें फल प्रदान करेंगे। (७९)
बलि । जल के विना की गई पूजा, विना फुश की की गई किया और विना घी के किये गये हवन तुमको फल (८)
इस स्थान का आश्रय कर जो मनुष्य किन्हीं भी क्रियाओं को करेगा, उसमे कभी भी असुरों का अधिकार न होगा (८१)
अत्यन्त पवित्र ज्येष्ठाश्रम तथा विष्णुपद सरोवर में जो घाद्ध, दान, व्रत, या नियम करेगा एव विधि या अविधि पूर्वक जो कोई क्रिया वहाँ को जायेगी उसके लिये यह सभी निरसदेह अक्षय फलदायी होगा। (८२-८३)
ज्येष्ठ मास के शुरू पक्ष में एकादशी के दिन उपवास फर द्वादशी के दिन विष्णुपद हुद में स्नान करके तथा थामन का दर्शन करने के उपरान्त यथाशक्ति दान देकर मनुष्य परम पद को प्राप्त करता है। लोमहर्षग ने कहा-थलि को यह वर तथा इन्द्र को त्रिविष्टप देकर भगवान उस सर्वव्यापी रूप से तिरोहित हो गये। (८५)
(तदनन्तर) बलवान् इन्द्र पूर्ववत् त्रैलोक्य का शासन करने लगे एव बलि ने सम्पूर्ण समय पावाल मे निवास (८६)
इस प्रकार उन भगवान् (वामन) विष्णु का उत्तम माहात्म्य कहा गया जो इसे (वामन माहात्म्य को) सुनेगा यह सभी पापों से मुक्त हो जायेगा। (८७)
हे द्विजश्रेष्ठो। बलि एय प्रह्लाद के सम्बाद, यलि एवं शुक की मन्त्रगा तथा बलि एव विष्णु के चरित का जो मनुष्य स्मरण करेंगे उन्हें कभी काई आधि एष व्याधि न होगी तथा उनका मन भी मादावुल नहीं होगा। (८८-२६)
हे महामागो। इस कथा को सुनकर राग्यच्युन व्यक्ति अपने राग्य यो एव रियोगी मनुष्य अपने प्रिय को प्राप्त
समाप्नोति महाभागा नरः श्रुत्वा कथामिमाम् ॥ ९०
ब्राह्मणो वेदमाप्नोति क्षत्रियो जयते महीम् ।
वैश्यो धनसमृद्धिं च शूद्रः सुसमवाप्नुयात् ।
यामनस्य च माहात्म्यं शृण्वन् पापैः प्रमुच्यते ॥ ९१
इति श्रीवामनपुराणे सरोमाहात्म्ये दशमोऽध्याय ॥१०॥