19 वसिष्ठापवाहतीर्थ की उत्पत्ति का वर्णन

ऋपय ऊचुः।

वसिष्ठस्यापवाहोऽसौ कथं वै संगभून ह ।

किमर्थ सा सरिच्छ्रेष्ठा तमृपिं प्रत्यवाहयत् ॥ १

लोमहर्पण उवाच ।

विश्वामित्रस्य राजर्वसिष्ठस्य महात्मनः ।

भृशं वैरं बभूवेह तपःस्पर्धाकृते महत् ॥ २

आश्रमो वै वसिष्ठस्य स्थाणुतीर्थे यभूव है।

वस्य पश्चिम दिग्मागे विश्वामित्रस्य धीमतः ॥३

यत्रेष्ट्वा भगवान् स्थाणुः पूजयित्वा सरस्वतीम् ।

स्थापयामास देवेशो लिङ्गाकारां सरस्वतीम् ।। ४

मनुष्य नित्य मनोभिलपित फल प्राप्त करता है। (३६)

वहाँ यायात ( ययाति का तीर्थ ) नाम से सुविख्यात तीर्थ है। वहाँ यज्ञ करने वाले के लिये नदी ने मधु बहाया था। (३७)

उसमे भक्तिपूर्वक स्नान करने से मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है एव उसे अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है। (३८)

हे द्विजो । वहीं मधुस्रव नामक पवित्र तीर्थ है। उसमे भक्तिपूर्वक स्नान कर मनुष्य को मधु द्वारा पितरों का तर्पण करना चाहिये। (३९)

वहीं पर वसिष्ठोदाइ नामक सुन्दर महान् तीर्थ है। उसमें भक्तिपूर्वक स्नान करने वाला वासिष्ठ लोक प्राप्त परता है। (४०)

श्रीदामनपुराय के सरोमाहात्म्य में अट्ठारहवाँ अध्याय समाप्त ॥१८॥

ऋषियों ने पूछा-वसिष्ठापवाह कैसे हुआ ? उस श्रेष्ठ सरिता ने उन ऋपि को क्यों प्रतिवाहित किया ? (१)

लोमहर्पण ने कहा-राजर्षि विश्वामित्र एव महात्मा वसिष्ठ में तप स्पर्धा के कारण महान् पैर उत्पन्न

हुआ।

वसिष्ठ का आश्रम स्थाणुतीर्थ मे था। उसको पश्चिम दिशा में बुद्धिमान विश्वामिन का आश्रम था । (३)

जहाँ देवाधिदेव भगवान स्थाणु (शिप) ने यक्ष करने

यसिष्ठस्तत्र वपसा घोररूपेण संस्थितः

तस्येह तपसा हीनो विश्वामित्रो बभूव ह ॥ ५

सरस्वती समाहूय इदं वचनमब्रवीत् ।

वसिष्ठं मुनिशार्दूल स्वेन वेगेन आनय ॥ ६

इहाहं तं द्विजश्रेष्ठं हनिष्यामि न संशयः ।

एतच्छ्रुत्वा तु वचनं व्यथिता सा महानदी ।। ७

तथा तां व्यथितां दृष्ट्वा वेपमानां महानदीम् ।

विश्वामित्रोऽब्रवीत् क्रुद्धो वसिष्ठं शीप्रमानय ॥ ८

ततो गत्वा सरिच्छेष्ठा वसिष्ठं मुनिसत्तमम् ।

कथयामास रुदती विश्वामित्रस्य तद् वचः ॥९

तपःक्रियाविशीर्णा च भृशं शोकसमन्विताम् ।

उवाच स सरिच्छेष्ठां विश्वामित्राय मां वह ॥ १०

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा कृपाशीलस्य सा सरिन् ।

चालयामास तं स्थानात् प्रवाहेगाम्भसस्तदा ॥ ११

स च कूलापहारेण मित्रावरुणयोः सुतः ।

उद्यमानश्च तुष्टाव तदा देवी सरस्वतीम् ॥१२

पितामहस्य सरमः प्रवृत्ताऽमि सरस्वति ।

व्याप्तं त्वया जगत् सर्व तवैवाम्भोमिरुत्तमः ॥ १३

त्वमेवाकाशगा देवी मेघपु सृजसे पयः ।

सर्यास्त्वापस्त्वमेवेति त्वत्तो वयमधीमहे ।। १४

पुष्टिईतिस्तथा कीर्ति मिद्धिः कान्तिः क्षमा तथा ।

स्वधा स्वाहा तथा वाणी तवायत्तमिदं जगत् ॥ १५

त्यमेव सर्वभूतेषु वाणीरूपेण संस्थिता।

एवं मरसती तेन स्तुता भगवती तदा ॥ १६

सुसेनोवाह तं विप्रं विश्वामित्राश्रमं प्रति ।

न्यवेदयत्तदा सिन्ना विश्वामित्राय ते मुनिम् ॥ १७

तमानीतं सरस्वत्या दृष्ट्वा कोपसमन्धितः ।

अथान्विपत् प्रहरणं यसिष्ठान्तकर तदा ॥ १८

तं तु मभिप्रेक्ष्य प्रमहत्याभयान्नदी।

अपोवाह वसिप्टं तं मध्ये चैवाम्भसस्तदा ।

उभयोः कुर्वती वाक्यं वञ्चयित्वा च गाधिजम् ॥ १९

ततोऽपवाहितं दृष्ट्वा वसिष्ठमृपिसत्तमम् ।

के उपरान्त सरस्वती की पूजा कर लिङ्गाकार सरस्वती की स्थापना की थी। वहीं वसिष्ठ घोर तपस्या में सलग्न थे।

उनकी तपस्या से विश्वामित्र हीन हो गये। उन्होंने सरस्वती को बुलाकर यह वचन कहा-तुम मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठ को अपने वेग से लाओ। मैं उन दिजश्रेष्ठ को निसन्देह यहाँ मागा। यह सुनकर वह महानदी व्यथित हो गई। (६-७)

उस प्रकार व्यथित एव कम्पित होती हुई उस महानदी को देखकर युद्ध विश्वामित्र ने कहा-वसिष्ठ को शीघ्र लाओ। (८)

तदनन्तर श्रेष्ठ सरिता ने मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठ के पास जाकर उनसे विश्वामित्र के उस वचन को रोते हुए कहा । उन्होंने तप किया से कृश एव अतिशय शोक समन्वित श्रेष्ठ सरिता से कहा-विश्वामित्र के यहाँ मुझे ले चलो । उन दयालु के उस वचन को सुनकर उस सरिता ने जल के प्रवाह द्वारा उन्हें उस स्थान से प्रवाहित कर दिया । (१०-११)

किनारे से ले जाये जाने के कारण बह रहे मिनावरुण के पुत्र (वसिष्ठ ऋषि) देवी सरस्वती की स्तुति करने लगे- (१२)

हे सरस्वती आप ब्रह्मा के सरोवर से निकली है। आपने अपने उत्तम जल से समस्त जगत् को व्याप्त किया (१३)

आपही आसाशगामी देवी धनकर मेघों मे जल की सृष्टि करती है । आप ही समस्त जलों के रूप में वर्तमान है। आप से हम लाग अध्ययन करते है। (१४)

आप ही पुष्टि, धृति, कीर्ति, सिद्धि, कान्ति, क्षमा, स्वधा, स्वाहा तथा वाणी है। समस्त ससार आपका ही वशवर्ती है। (१५)

आप ही समस्त प्राणियों में वाणी रूप से स्थित है। उनके द्वारा इस प्रकार स्तुता भगरती सरस्वती उस विष को मुख पूर्वक विश्वामित्र के आश्रम में ले गई एव खिन्नता पूर्वक उन मुनि को विश्वामिन के लिये निवेदित किया। (१६-१७)

सरस्वती द्वारा वसिष्ठ को लाया गया देखकर कुद्ध विश्वा मित्र उन्हें मारने के लिए शस्त्र खोजने लगे। (१८)

उन्हें कुद्ध हुआ देख ब्रह्महत्या के भय से भीत नदी गाधिपुन को पहिचत कर दोनों के वाक्य का पालन करती हुई उन वसिष्ठ को जल मे बहा ले गई। (१९)

अग्रवीत् क्रोधरक्ताक्षो विश्वामियो महातपाः ।। २०

यस्मान्मां सरिता श्रेष्ठे वश्वयित्या विनिर्गता।

शोणितं यह कल्याणि रक्षोग्रामणिसंयुता ॥ २१

ततः मरस्वती शमा विश्वामित्रेण धीमता।

अपहच्छोणिवोन्मिभं तोयं मंवत्सरं तदा ॥ २२

अथर्प यश्च देवाश्च गन्धर्वाप्सरसस्तदा ।

सरस्वती तदा दृष्ट्वा बभूवुर्भुशासिताः ॥ २३

तस्मितीर्थवरे पुण्ये शोणितं समुपावहत् ।

वतो भूतपिशाचाच राक्षसाश्च समागताः ॥ २४

ततस्ते शोणितं सर्वे पिरन्तः सुसमासते।

वप्ताश्च सुभृशं तेन सुखिता विगतज्वराः।

नृत्यन्तय हसन्तश्च यथा सर्गजितस्तथा ।। २५

कस्यचित्त्वथ कालस्य ऋपय. सतपोधनाः ।

तीर्थयात्रा समाजम्मु. सरस्वत्या तपोधनाः ।। २६

तां दृष्ट्वा राक्षसैघोरैः पीयमानां महानदीम् ।

परित्राणे सरस्वत्याः परं यत्नं प्रचक्रिरे ॥ २७

ते तु सवें महाभागाः समागम्य महानताः ।

आहूय सरितां श्रेष्ठामिदं वचनमब्रवन् ॥ २८

किं कारणं सरिच्छेष्ठे शोणितेन हदो रायम् ।

एक्माकूलता यातः श्रुत्वा वेत्स्यामहे वयम् ॥ २९

ततः सा सर्वमाचष्ट विश्वामित्रविचेष्टितम् ।

ततस्ते मुनयः प्रीताः सरस्वत्यां समानयन् ।

अरुणां पुण्यतोयौघां सर्वदुष्कृतनाशनीम् ॥ ३०

दृष्ट्वा तोयं सरस्वत्या राक्षसा दुःखिता भृशम् ।

ऊचुस्वान् वै मुनीन् सर्वान् दैन्ययुक्ताः पुनः पुनः।। ३१

वयं हि क्षुधिताः सर्वे धर्महीनाच शाश्वताः ।

न च नः कामकारोयं यद् वयं पापकारिणः ॥ ३२

युष्माकं चाप्रसादेन दुष्कृतेन च कर्मणा ।

पक्षोऽयं वर्धतेऽस्माकं यतः रमो ब्रह्मराक्षसाः ॥ ३३

एवं वैश्याच शूद्राश्च क्षत्रियाच विकर्मभिः ।

तदनन्तर ऋपिप्रवर पसिष्ठ को (यहाया गया) देसकर क्रोध से रक्त नेनों वाले महातपस्वी विश्वामित्र ने कहा- (२०)

हे श्रेष्टनदी । क्योंकि तुम मुमे यचित कर चली गई हो अत हे कल्याणी । तुम श्रेष्ठ राक्षसों से सयुक्त होकर शोणित (२१)

तदनन्तर बुद्धिमान् विश्वामित्र से शाप पार सरस्वती ने एक वर्ष तक रक्त से मिश्रिति जल का वहन क्यिा । (२२)

तदुपरान्त सरस्वती को देखकर ऋपि, देवता गन्धव एवं अप्सरायें अत्यन्त दुखित हुए। (२३)

उस पवित्र श्रेष्ठ तीर्थ में रधिर बहने लगा। इससे वहाँ भूत, पिशाच एकत्रित हो गये । (२५)

वे सभी रक्त का पान करते हुए यहाँ सुसपूर्वक रहने लगे। इससे अत्यन्त तृप्त, सुखी एव विगतज्वर होकर वे इस प्रकार नाचने एव हंसने लगे मानो उन्होंने स्वर्ग को जीत लिया हो। (२५)

कुछ समय बीतने पर तपोधन ऋपि लोग तीर्थ याना देह सरस्वती के तट पर पहुंचे। घोर राक्षसों द्वारा पान की जाती हुई महानदी सरस्वती को देखकर उसकी रक्षा के लिए चे उत्कृष्ट यत्न करने लगे। (२७)

महाभाग एव महाव्रती वे सभी रेग एक साथ श्रेष्ठ नदी को बुलाकर यह वचन बोले- (२८)

हे श्रेष्ठनदी । म सुनकर जानना चाहते हैं कि यह हद क्यों शोणित से पूर्ण है ? (२९)

तदनन्तर उसने विश्वामिन के समस्त कमों का वर्णन किया।तदुपरान्त प्रसन्न हुये मुनि लोगसरस्वती में पवित्र जल वाली तथा सर्वपापों की नाशिनी अस्णा नदी को लाये। सरस्वती के जल को (इस प्रकार शुद्ध हुआ) देखकर राक्षस बहुत दुखित हुए। वे दोनतापूर्वक सभी मुनियों से बार वार कहने लगे- (३०-३१)

हम सभी निरन्तर क्षुधित एव धर्महीन रहते हैं। यह स्वेच्छा का परिणाम नहीं है कि हम पापकारी बने हुए है, अपितु आप लोगों की अकृपाएव पापकों से हमारा पक्ष बढ़त्ता रहता है क्योंकि हम सभी ब्रह्मराक्षस (३२-३३)

इसी प्रकार विकृत कर्मों के कारण ब्राह्मणों से ट्रेप करने वाले वैश्य, शूद्र एवं क्षत्रिय भी राक्षस हो जाते

ये ब्राह्मणान् प्रद्विपन्ति ते भवन्तीह राक्षसाः ।। ३४

योषितां चैव पापानां योनिदोषेण यईते ।

इयं संततिरस्माकं गतिरेपा सनातनी ॥३५

शक्ता भवन्तः सर्वेषां लोकानामपि तारणे।

तेषां ते मुनयः श्रुत्वा कृपाशीलाः पुनश्च ते ॥ ३६

ऊचुः परस्परं सर्वे तप्यमानाथ ते द्विनाः।

क्षुतकीटावपन्नं च यचोच्छिष्टाशित भवेत् ।। ३७

केशावपन्नमाधूतं मास्तश्वासदृषितम् ।

एभिः संसृष्टमन्नं च भागं वै रक्षसां भवेत् ॥ ३८

तस्माज्ज्ञात्या सदा विद्वान् अन्नान्येतानि वर्जयेत् ।

राक्षसांनामसो भुक्ते यो भुङ्क्ते अन्नमीदृशम् ॥३९

शोधयित्वा तु तत्तीर्थमृपयस्ते तपोधनाः ।

मोक्षार्थ रक्षसां तेषां सगमं तत्र कल्पयन् ॥ ४०

अरुणायाः सरस्वत्याः संगमे लोकविश्रुते ।

त्रिरात्रोपोपितः स्नातो मुच्यते सर्वकिल्पिपैः ॥ ४१

प्राप्ते कलियुगे घोरे अधर्म प्रत्युपस्थिते ।

अरुणासंगमे स्नात्या मुक्तिमाप्नोति मानवः ॥ ४२

ततस्ते राक्षसाः सर्वे स्नाताः पापविसर्जिताः ।

दिव्यमाल्याम्बरधराः स्वर्गस्थितिसमन्विताः॥४३

इति श्रीवामनपुराणे सरोमाहाम्ये एकोनविंशोऽध्याय ॥१९॥

है। (३४)

पापयुक्त स्त्रियों के योनिदोष से हमारी इस सन्तति की वृद्धि होती रहती है। यह सनातनी गति है। (३५)

आप लोग समस्त लोकों के उद्धार करने में समर्थ है। उनकी बात सुनकर सतप्त हो रहे कृपाशील मुनियों ने परस्पर परामर्श कर कहा-छींक तथा कीट के ससर्ग से दूपित, उच्छिष्ट भोजन, केशयुक्त, तिरस्कृत एव श्वासवायु से दूषितअन्न राक्षसों का भाग होता है। (३६-३८)

अत इस बात को जानकर विद्वान् पुरुप इस प्रकार के अन्न को त्याग दे । इस प्रकार का अन्न साने याला राक्षसों का भाग खाता है। (३६)

उन तपोधन ऋपियों ने उस तीर्थ को शुद्धकर उन राक्षसों की मुक्ति के लिए वहाँ एक सङ्गम की रचना की। (४०)

अरुणा और सरस्वती के लोक विख्यात सगम में तीन रातों तक उपवास पूर्वक स्नान करने वाला समस्त पापों से मुक्त हो जाता है। (४१)

घोर कलियुग आने पर तथा अधर्म का प्रसार होने पर मनुष्य अरुणा के सगम में स्नान करने पर मुक्ति प्राप्त करता है। (४२)

तदनन्तर वे सभी राक्षस स्नान करने से पाप-रहित होकर दिव्य माला तथा वन्न धारण कर स्वर्ग में स्थान प्राप्त (४३)

श्रीवामनपुराग के सरोमाहात्म्य मे उन्नीसा मध्याय समाप्त ॥१६॥