चण्डिका की देह से मातृकाओं की उत्पत्ति, मातृकाओं के साथ असुरो का युद्ध, रक्त बीज से युद्ध एव रक्तबीज-वध, निशुम्भ वध, देवों द्वारा देवी की स्तुति एवं देवी द्वारा वरप्रदान, देवी द्वारा अपनी भावी उत्पत्ति का कथन

पुलस्त्य उवाच।

चण्डमुण्डौ च निहतौ दृष्ट्वा सैन्यं च विद्रुतम् ।

समादिदेशातिनलं रक्तवीज महासुरम् ।

अक्षौहिणीनां त्रिंशद्भिः कोटिभिः परिवारितम् ॥ १

तमापतन्तं दैत्यानां यलं दृष्ट्वैव चण्डिका ।

मुमोच सिंहनादं वै ताभ्यां सह महेश्वरी ।। २

निनदन्त्यारवतो देव्या ब्रह्माणी मुखतोऽभवत् ।

हंसयुक्तविमानस्था साक्षसूत्रकमण्डलुः ॥३

माहेश्वरी त्रिनेत्रा च वृपारूढा त्रिशूलिनी।

महाहिवलया रौद्रा जाता कुण्डलिनी क्षणात् ।।४

कण्ठादथ च कौमारी यहिपत्रा च शक्तिनी।

समुद्भूता च देवर्षे मयूरवरवाहना ।। ५

बाहुभ्यां गरुडारूढा शङ्खचक्रगदासिनी ।

शाहवागधरा जाता वैष्णवी रूपशालिनी ॥६

महोग्रनुशला रौद्रा दंष्ट्रोल्लिखितभूतला ।

वाराही पृष्टतो जाता शेषनागोपरि स्थिता ॥ ७

वजाङ्कयोयतकरा नानालंकारभूपिता ।

जाता गजेन्द्रपृष्ठस्था माहेन्द्री स्तनमण्डलात् ।। ८

विक्षिपन्ती सटाक्षेपहनक्षत्रतारकाः ।

नखिनी हृदयाजाता नारसिंही सुदारुणा ॥९

ताभिर्निपात्यमानं तु निरीक्ष्य बलमासुरम् ।

ननाद भूयो नादान् वै चण्डिका निर्भया रिपून् ।

तन्निनादं महच्छ्रुत्या त्रैलोक्यप्रतिपूरकम् ॥ १०

समाजगाम देवेशः शूलपाणिरित्रलोचनः ।

अभ्येत्य वन्ध चौनां प्राह वाक्यं तदाऽम्बिके ॥ ११

समायातोऽस्मि चै दुर्गे देवाज्ञां किं करोमि ते ।

तद्वाक्यसमकालं च देव्या देहोद्भवा शिवा ॥ १२

जाता सा चाह देवेशं गच्छ दौत्येन शंकर

३०

पुलस्त्य ने कहा-चण्ड-मुण्ड को मरा हुआ और सैनिकों को पलायित देखकर शुम्भ ने अत्यधिक बलवान् महासुर रक्तबीज को आदेश दिया। तीस करोड़ अक्षौहिणी सेना से युक्त दैत्यों की उस सेना को आती हुई देसर महेश्वरी चण्डिका ने उन दोनों देवियों के साथ सिहनाद किया।(२-२)

उसके बाद सिहनाद करती हुई देवी के मुख से हंस. युक्त विमान पर बैठी हुई तथा अक्षमाला और कमण्डलु से युक्त नहाणी उत्पन्न हुई तथा तीन नेत्रोंवाली, वृप पर आरुद, त्रिशूल को धारण करने वाली, महासर्प के मन से युक्त चुण्डरधारिणी माहेश्वरी भी उसी क्षण उत्पन्न हुई। (३-४)

हे देव ! देवी के षण्ठ से मोरपंस से अलत, शक्ति धारिणी एवं मयूर के श्रेष्ठ पाहन पर आरूढ कौमारी उत्पन्न हुई। (५)

देयी की दोनों भुजाओं से गरुड़ पर सवार, शंख, चर, गदा, बलवार एवं धनुष पाण धारण करने वाली रूप यती पैष्णवी शक्ति उत्पन्न हुई।

देवी के पीठ से महाभयङ्कर मुशल से युक्त, दाढों से पृथ्वी को सोदने वाली शेपनाग के ऊपर आरूढ धाराही शक्ति उत्पन्न हुई। (७)

हाथ मे वन और अंकुश को लिये, अनेक प्रकार के आभूपणों से विभूपित गजराज की पीठ पर बैठी हुई माहेन्द्री शक्ति स्तनमण्डल से उत्पन्न हुई। (८)

अयाल के हिराने से प्रह, नक्षत्र और ताराओं को विक्षिप्त करती हुई नसोंवाली अत्यन भयंकर नारसिंही- शक्ति देवी के हृदय से उत्पन्न हुई।

उन शक्तियों द्वारा मारी जाती हुई असुर-सेना एवं शत्रुओं को देखकर चण्डिका ने घोर गर्जन किया। तीनों लोकों को पूरित करने वाले उस गर्जन को सुनकर शूलपाणि, त्रिलोचन महादेव देवी के समीप आए और उनसे प्रणाम कर यह कहा-'हे अम्बिके ! हे दुर्गे! में आ गया हूँ। मैं तुम्हारा क्या कार्य करूं ? मुझे आशा दो। उस वाक्य के साथ ही देयी के देह से से शिया उत्पन्न हुई। उन्होंने देवेश्वर से कहा, "हे शङ्कर !

धूहि शुम्भ निशुम्भं च यदि जीवितुमिच्छ्य ।। १३

तद् गच्छध्वं दुराचाराः सप्तमं हि रसातलम् ।

वासवो लभतां स्वर्ग देवाः सन्तु गतव्यथाः ॥ १४

यजन्तु ब्राह्मणाद्यामी वर्णा यज्ञांश्च साम्प्रतम् ।

नोचेद् बलायलेपेन भवन्तो योधुमिच्छय ॥ १५

तदागच्छध्यमव्यग्रा एपाऽहं विनिदये।

यवस्तु सा शिवं दौत्ये न्ययोजयत नारद ॥ १६

वतो नाम महादेव्याः शिवतीत्यज्ञायत ।

ते चापि शंकरवचः श्रुत्या गर्यसमन्वितम् ।।

हुंकृत्वाऽभ्यद्रवन् सर्वे यत्र कात्यायनी स्थिता ।। १७

ततः शरैः शक्तिभिरङ्कुशवः

परश्वधैः शूलभुशुण्डिपदिशैः।

प्रामैः सुतीक्ष्णः परियश्च विस्त-

ववर्षतुदैत्यवरी सुरेश्वरीम् ॥ १८

सा चापि बाणैर्वरकार्मुकच्युत

चिच्छेद शस्त्राण्यथ याहुभिः सह ।

जघान चान्यान् रणचण्डविक्रमा

महासुरान् वाणशतैर्महेश्वरी ॥ १९

मारी त्रिशुलेन जघान चान्यान्

सट्याङ्गपारपरांश्च कौशिकी ।

महाजलक्षेपहतप्रभावान्

ग्रामी तयान्यानसुरांचकार ।। २०

माहेश्वरी शूलविदारितोरसश

नकार दग्धानपरांश्च वैष्णवी।

शक्त्या कुमारी कुलिशेन चैन्द्री

तुण्डेन चक्रेण वराहरूपिणी ॥ २१

नसविभिन्नानपि नारसिंही

अट्टाहामैरपि रुद्रती ।

द्वत्रिशूलेन तथैव चान्यान्

विनायकश्चापि परश्वधेन ॥ २२

एवं हि देव्या विविधस्तु रूप-

निपात्यमाना दनुपुंगवास्ते ।

आप दूत बनकर जाइये और गुम्भ-निशुम्भ से कहिए कि हे दुराचारियो ! यदि तुम रोग जीना चाहते हो, तो सातये रसातल लोक मे चले जाओ। इन्द्र को स्वर्ग की प्राप्ति हो एवं देवाण व्यथा रहिन हो जाय। (१०-१४)

ये ब्राह्मण आदि वर्ण उचित रीति से यज्ञ फ्रें अन्यथा यदि तुम लोग पल के घमण्ड से युद्ध करना चाहते हो-तो आ जाओ। यह में व्यग्र न होती हुई तुम लोगों का संहार करूँगी । हे नारद । क्योंकि उन्होंने शिव को दूत धनाया अत महादेवी का नाम शिवदूती हुआ। वे सारे असुर भी शङ्कर के गर्नयुक्त वचन को सुनकर हुँकार करते हुए जहाँ कात्यायनी स्थित थीं यहाँ दौड़े। (१५-१७)

तदनन्तर दोनों असुर सुरेश्वरी के ऊपर वाण, शक्ति, अंकुश, श्रेष्ठ फुटार, शूल, 'मुशुण्डी, पटिश, तीक्ष्य प्रास और विशाल परिध आदि थरनों की वर्षा करने लगे। (१८)

संग्राम में प्रचण्ड विक्रमशाटिनी उस महेश्वरी ने भी

श्रेष्ठ धनुप से निकने बाणों द्वारा असुरों के शस्रों को उनरी बाहुओं सहित काट दिया एव सैकड़ों वाणों से अन्य असुरों को मार डाला। (१९)

मारी ने त्रिशूल से अनेकों को मारा, कौशिकी ने सट्वाङ्ग के प्रहार से बहुतों का वध किया तथा ब्राह्मी ने जल के प्रक्षेप से दूसरे अनेक असुरों को हतप्रभ कर दिया। (२०)

माहेश्वरी ने शूल से बहुत से अनुरों का वक्षस्थलविदीर्ण किया। वैष्णवी ने बहुतों को जला डाला । कुमारी ने शक्ति से, ऐन्द्री ने वन से, वाराही ने मुख तथा चक्र से असुरों का संहार (२१)

नारसिंही ने नखों के प्रहार से दैत्यों को विदीर्ण किया, शिवदूती ने अट्टहास से, रुद्र ने त्रिशूल से एव विनायक ने फरसे के प्रहार से अन्य असुरों नष्ट किया । (२२)

इस प्रकार देवी के अनेक रूपों द्वारा मारे जाते हुए

पैनः पपिप्या सपि पापि भूत-

म्ने भक्ष्यमाणाः प्रलयं प्रजन्मः॥ २३

ने पम्पमानाम्गय देयताति-

महागुरा मामिरायलाथ।

चिमुक्त नाम्नरंथपा भयाद

ने रस्ती शरणं हि जग्मुः॥ २४

म रस्तरीन: महमाम्पुपेत्य

पराग्यमादाय र मानमन्टनम् ।

पिदारपन भूतगणान ममन्त

सिंत कापान स्फारिताघरा ॥ २५

तमापतन् प्रमीय मातरः

सम्पः शिदिव याः।

यो रकारिन्दम्पत प्रषिप्या

म तापमानामुरोऽपि च ॥ २६

सानदायमर्य निरीक्ष्य

मा पौगिरी मिनिमम्पुपार ।

पिसनद रपिरंपराने

स्तित्य यस्यं यहयानलामम् ॥ २७

सा त्येपास्ता परदामिका हि

स्तित्य या किरालमुग्रम् ।

ओठं नभम्पर प्रथिवी सन्त

कृत्वाऽधरं तिष्ठति गर्मसन्हा ।। २८

ततोऽमिया गरिसर्पगारलं

गया रिपुं प्राधिपत स्वयको ।

रिमदानेन तथाऽप्पुरतः

ध्वोदवान्ये न्यपतंच वस्त्रे ॥ २९

वनम्न छोपं जगाम रस्तं

रस्त इंनिपलो पभूव ।

सं होनी शतधा पसार

गरेप

गामीफरभूषितन ॥३.

तम्मिन शिमं दनुगन्पनाये

ने दानरा दीनवरं विनंदन

हा सात हा प्रातरिति घुयन्तः

फ सामि विटम्प मार्ग महि ॥ ३१

दानव पृथ्वी पर गिरने कीपर (गिरे हुए) इन दानवो को करने लगो। (२३)

द्वारा एव में मारे गये वह गये थे महासुर मुने केशो कई भष में चश्चय क्षेत्रो में दृध्य को भर में (२४)

अपने मुगको पार कर पीटा। (२०)

ऐसा रहने पर पारादिनी अपने पिरा पप गुरागामेभामा भार मेरी गुहा (४)

मापन मदिरा ने पार

तथाऽपरे बिललितकेशपाशा

विशीर्णवर्माभरणा दिगम्बराः।

निपातिता धरणितले मृडान्या

प्रदुद्रुवुगिरिवरमुद्य दैत्याः ॥ ३२                      

विशीर्णवर्मायुधभूपर्ण तत्

पलं निरीक्ष्यैव हि दानवेन्द्रः ।

विशीर्णचत्राधरयो निशुम्मः

क्रोधान्मृडानी सम्रपाजगाम ॥ ३३

खड्गं समादाय च चर्म मास्वरं

धुन्वन् शिरः प्रेक्ष्य च रूपमस्याः ।

संस्तम्भमोहन्यरपीडितोय

चित्रे ययाऽसौ लिखितो यभूव ॥ ३४

तं स्तम्भितं वीक्ष्य सुरारिमने

प्रोवाच देवी वचनं विहस्य ।

अनेन वीर्येण सुरास्त्वया जिता

अनेन मां प्रार्थयसे यलेन ॥ ३५

श्रुत्वा तु यास्यं कौशिक्या दानवः सुचिरादिव ।

प्रोवाच चिन्तयित्वाऽथ वचनं वदतां वरः ॥ ३६

सुकुमारशरीरोऽयं मस्त्रपतनादपि ।

शतधा यास्यते भीरु आमपात्रमियाम्भसि ।। ३७

एतद् विचिन्तयन्नर्थ त्यां प्रहतुं न सुन्दरि ।

करोमि बुद्धि तस्मात् त्वं मां भजस्वायतेक्षणे ॥ ३८

मम सङ्गनिपातं हि नेन्द्रो धारयितुं धमः ।

निवर्त्तय मति युद्धाद् भार्या मे भव साम्प्रतम् ॥ ३९

इत्थं निशुम्भवचनं श्रुत्या योगीश्वरी मुने ।

विहस्य भावगम्भीरं निशम्भं वाक्यमब्रवीत् ।। ४०

नाजिताऽहं रणे वीर भवे भायां हि कस्यचित् ।

भवान् यदिह भार्यार्थी ततो मां जय संयुगे ॥४१

इत्येवमुक्त वचने राजमुद्यम्य दानवः ।

प्रचिक्षेप तदा वेगात् कौशिकी प्रति नारद ॥ ४२

मृडानी ने अस्त-व्यस्त केशपाश और छिन्न-भिन्न कवच वाले अनेक नग्न दैत्यों को पृथ्वी पर पटक दिया। वे देत्य पर्वत श्रेष्ठ को छोड़कर भाग गए। (३२)

टूटे क्वच, आयुधों एवं आभूषणों से युक्त अपनी सेना को देसार टूटे चक्र एवं धुरी वाले रथ पर आरूढ दानवेन्द्र निशुम्भ प्रोधपूर्वक मृहानी के निकट गया। (३३)

तलवार और चमकती हुई ढाल लेकर सिर हिलाते हुए यह देवी का रूप देखकर मोहज्वर से पीडित हो चित्र लिखित की भाँति स्तम्भित हो गया। (३४)

उस स्तम्भित देवशत्रु को सामने देयका देवी ने हँसते हुए यह वचन कहा-क्या इसी पराक्रम से तुमने देवताओं को जीता है? क्या क्या इसी बल से मुझ को (पनीरूप में) पाने के लिए प्रार्थना करते हो? (३५)

कौशिकी की बात सुनने के उपरान्त देर तक सोचकर वक्ताओं में श्रेष्ठ यह दानव यह वचन बोला-(३६)

हे भीरु! यह तुम्हारा अत्यन्त सुकुमार शरीर मेरे शस्त्रों के प्रहार से जल में सच्चे वर्तन की भाँति सैकड़ों टुकड़ों में विभक्त हो जायगा। (३७)

हे सुन्दरी ! यह सोच कर मैं तुम्हारे ऊपर प्रहार परने का विचार नहीं कर रहा हूँ। अत. हे पिशालाक्षी ! तुम मुझे स्वीकार कर लो।

मेरे खडा के प्रहार को इन्द्र भी नहीं सहन कर सकते। तुम युद्ध की बुद्धि छोड़ दो एवं अब मेरी पत्नी घन जाओ। (३९)

हे मुनि। योगीश्वरी ने निशुम्भ की यह बात सुन कर हँसते हुए उस से अर्थयुक्त वचन कहा- (४०)

हे पोर! सग्राम में विना पराजित हुये मैं किसी की भार्या नहीं बन सकती, यदि तुम मुझे ली बनाना चाहते हो तो युद्ध मे मुझे पराजित करो। (४१)

हे नारद! यह बात कहे जाने पर इस दानव ने सड्ग सठा र कौशिकी की ओर वेग से चलाया। (४२)

वमापतन्तं निरित्र पभिहिणराजितैः ।

चिच्छेद चर्मणा सार्द्ध तदद्भुतमिवाभवत् ॥ ४३

खड्गे सचर्मणि छिन्ने गदां गृह्य महासुरः ।

समाद्रवत् कोशभवां वायुवेगसमो जवे ॥१४

वस्थापवत एवाशु करौ श्लिष्टौ समौ दृढौ।

गदया सह चिच्छेद क्षुरप्रेण रणेऽम्पिका ॥ ४५

तस्मिन्निपतिते रौद्रे सुरशत्रौ भयंकरे ।

चण्डाधा मातरो हृष्टाश्चकु. किलकिलाध्यनिम् ॥ ४६ ।।

गगनस्यास्ततो देवाः शतक्रतुपुरोगमाः ।

जयस्व विजयेत्युचुर्दृष्टाः शत्रौ निपातिते ।। ४७

ततस्तूर्याण्यवाद्यन्त भूतमधैः समन्ततः ।

पुष्पवृष्टिं च मुमुचुः सुरा, कात्यायनी प्रति ॥ ४८

निशुम्भं पतितं दृष्ट्या शुम्भ क्रोधान्महामुने ।

वृन्दारकं समास्य पाशपाणिः समभ्यगात् ॥ ४९

तमापतन्तं दृष्ट्वाऽथ सगज दानवेश्वरम् ।

जग्राह चतुरो वाणांचन्द्राधीकारवर्चसः ।। ५०

क्षुरनाम्यां समं पादौ द्वौ चिच्छेद द्विपस्य सा।

द्वाम्यां कुम्भे जघानाथ हसन्तीलीलयाऽम्बिका ॥ ५१

निकृत्ताभ्यां गजः पद्धयां निपपात यथेच्छया।

शक्रवज्रसमाकान्तं शैलराजशिरो यथा ॥ ५२

वस्यावर्जितनागस्य शुम्भस्याप्युत्पतिष्यतः ।

शिरश्चिच्छेद घाणेन कुण्डलालंकृत शिवा ।। ५३

छिन्ने शिरसि दैत्येन्द्रो निपपात सकुञ्जरः।

यथा समहिप. क्रौञ्चो महासेनसमाहतः ॥ ५४

श्रुत्वा सुराः सुररिपू निहतौ मृडान्या

सेन्द्रा. ससूर्यमरुदचिवसुप्रधानाः ।

आगत्य तं गिरिवरं विनयावनम्रा

देव्यास्तदा स्तुतिपदं स्विदमीरयन्तः ॥ ५५

देवा ऊचुः ।

नमोऽस्तु ते भगवति पापनाशिनि

नमोऽस्तु ते सुररिपुदर्पशातनि ।

नमोऽस्तु ते हरिहरराज्यदायिनि

दाल के साथ अपनी ओर आती हुई उस तलवार को देवी ने मयूरपुच्छ से सुशोभित छः बाणों से काट दिया। यह (दृश्य) बड़ा ही अद्भुत हुआ। (४३)

डाल के सहित पा के फट जाने पर यह महान असुर गदा लेकर पायु के समान घेग से कौशिकी पर झपटा (४४)

अम्यिरा ने युद्ध में आक्रमण करने वाले उस असुर की गदा सहित सुगठित एष दृद् भुजाओं को क्षुरप्र (वाणों) से तत्काल काट डाल। (४२)

उस अति भयर देवशनु के गिरने पर चण्डी आदि मातपायें प्रसन्न होकर क्लिगारी करने लगी। (४६)

तदनन्तर आराश में स्थित इन्द्रादि देवगण शत्रु के गिर जाने पर प्रसन्न होते हुए योले हे विजये। तुम्हारी जय हो।

तदुपरान्त चारों ओर भूतगण भेरी यजाने लगे और देवगण फात्यायनी के उपर पुष्पवृष्टि करने सगे। (४८)

हे महामुनि । निशुम्भ को गिरा हुआ देसार शुम्भ मोध से दाय में पाश लिये हाथी पर पदफर आया । (४६)

गजारूद दानवेधा पो आने देस ( देवी ने ) घमरने हुए अर्धचन्द्राशर पार पागों को प्रहण किया। (५०)

उस अम्यिका ने लीलापूर्वक हंसते हुए दो तीक्ष्ण चाणों से उस हाथी के दो पैरों को वाट दिया एवं दो घाणों से उसके कुम्भस्थल पर प्रहार दिया। (५१)

दोनों पैरों के कट जाने पर वह हाथी इन्द्र के पक्ष से आहत शैलराज के शिसर की भाँति अपने आप ही गिर पड़ा। (५२)

शिया ने मारे गए हाथी पर से उछलने वाले शुम्भ का कुण्डलभूपित शिर बाण से काट दिया। (५३)

शिर कट जाने पर देरयेन्द्र हाथी सहित इस प्रकार गिर पड़ा जैसे महासेन कार्तिकेय द्वारा आदत कौन महिए के साथ गिरा था । (५४)

मृडानी द्वारा दोनों देवशनुओं पा मारा जाना सुन पर इन्द्रसहित सूर्य, मस्तु , अश्विनीकुमार एवं यसुगग इत्यादि देवता उस श्रेष्ठ पर्वत पर आए एवं विनयपूर्वक देवी की इस प्रकार स्तुति करने लगे। देवताओं ने कहा-हे भगति ! हे पापनाशिनि ! आप को नमस्कार है। हे सुर शुओं के पं का सहार फरने याली ! आप को नमस्कार है। हे विष्णु और शहर को राग्य देने याली ! आप को नमामार है। यममोका

नमोऽस्तु ते मसभुनकार्यकारिणि ॥५६

नमोऽस्तु ते त्रिदशरिपुक्षयंकरि

नमोऽस्तु ते शतमसपादपूजिते ।

नमोऽस्तु ते महिपविनाशकारिणि

नमोऽस्तु ते हरिहरभास्करस्तुते ॥ ५७

नमोऽस्तु तेऽष्टादशगाहुशालिनि

नमोऽस्तु ते शुम्भनिशुम्भपातिनि ।

नमोऽस्तु लोकातिहरे त्रिशूलिनि

नमोऽस्तु नारायणि चकधारिणि ॥ ५८

नमोऽस्तु वाराहि सदा धराधरे

त्या नारनिहि प्रणता नमोऽस्तु ते।

नमोऽस्तु ते वज्रघरे गनमजे

नमोऽस्तु कौमारि मयूरवाहिनि ।। ५९

नमोऽस्तु पैतामहहंसवाहने

नमोऽस्तु मालाविकटे सुकेशिनि ।

नमोऽस्तु ते रासभपृष्ठवाहिनि

नमोऽस्तु समोतिहरे जगन्मये ।। ६.

नमोऽस्तु विश्वेश्वरि पाहि विश्व

निदयारीन द्विजदेवतानाम् ।

नमोऽस्तु ते सर्वमयि त्रिनेत्रे

नमो नमस्ले वरदे प्रसीद ॥ ६१

ब्रह्माणीत्व मृडानी वरशिसिगमना शक्तिहस्ता कुमारी

वाराहीत्यं सुत्रासगपविगमना वैष्णरी त्वं सशाङ्गीं।

दुर्दश्या नारसिंही घुरघुरितरवा त्वं तथैन्द्री सवत्रा

त्वमारीचममुण्डाशगमनरता योगिनी योगसिद्धा॥६२

नमस्ते त्रिनेत्रे भगवति तपचरणानुपिता ये

अहरहनिवशिरसोऽननवा.

नहि नहि परिभवमस्त्यशुभ च

स्तुतिमलिकुसुमकरा, मत्त ये ॥ ६३

एव स्तुता सुरनर, सुरशत्रुनाशिनी

प्राह ग्रहस्य सुरसिद्धमहर्पियर्यान् ।

प्राप्तो मयाऽद्भुततमो भवता प्रसादाद

देवों का कार्य करने वाली । आपको नमस्कार है। (५६)

हे देवशनुविनाशिनी । आपको नमस्कार है। हे इन्द्र द्वारा पूजित चाणों वाली| आप को नमस्कार है। हे महिषासुर विनाशिनी । आप को नमस्कार है। हे विष्णु, शकर एव सूर्य से स्तुति की जाने वाली। आपको नमस्कार है। (५७)

हे अष्टादश भुजाओंवाली। आप को नमस्कार है। हे शुम्भ निशुम्भ का वध करने वाली । आप को नमस्कार है। हे लोकों का दुस हरण करने वाली । हे त्रिशूलधारिणी। आप को नमस्कार है। हे चक्रधारिणि नारायणि। आपको नमस्कार है। (५८)

हे वाराहि । हे घरा को सदा धारण करने वाली । आप को नमस्कार है। हे नारसिहि । आप को हम प्रणत है, आपको नमस्कार है। हे वनधारिणि । हे गजव्यजै । आप को नमस्कार है। हे कौमारि। हे मयूरवाहिनि । आप को नमस्कार है।

हे ब्रह्मा के इस पर बैठने वाली। आप को नमस्कार है। ह विकटमाला धारण करने वाली। हे सुन्दर केशों वाली । आप को नमस्कार है। हे गर्दम की पीठ पर बैठने वाली । आप को नमस्कार है। हे समस्त क्लेशों का नाश

करने बारी। हे जगन्मये । आप को नमस्कार है। (६०)

हे विश्वेश्वरि । आपको नमस्कार है। आप विश्व की रक्षा कर तथा बाह्यगों और देवताओं के शत्रुओं का सहार करें। हे गिनेने। हे सर्वमयि | आपको नमस्कार है। हे वरदे । आपको बारम्बार नमस्कार है। आप प्रसन्न हों। (६१)

"ब्रह्माणी और मृडानी आप ही है। आप ही सुन्दर मयूर पर चलने वाली और हाथ में शक्ति धारण करने वाली कुमारी है। सुन्दा मुखपाली वाराही आप ही है तथा गरुड से चलने वाली, शाई धनुप धारण करने वाली धैष्णवी आप ही है। घुर घुर शब्द करने वाली, देखने में भयकर नारसिही आप ही हैं। आप ही पत्रधारिणी ऐन्द्री एव महामारी चर्ममुण्डा है, शव पर चलने वाली तथा योगसिद्धा योगिनी भी आप ही है। (६२)

हे तीन नेत्रोवाली भगवति । आप को नमस्कार है। आप के चरणों का आश्रय कर नम्रता से प्रतिदिन अपना शिर झुकाने वालो तथा वलि एच फूलों को हाथ मे लिये सर्वदा भापकी स्तुति करने वालों का कोई परिभव और अमगल नहीं होता।

देवश्रेष्ठों के इस प्रकार स्तुति करने पर मुरशत्रुओं का सहार करने वाला देवी ने देवताओं, सिद्धों तथा श्रेष्ठ

संग्राममूनि सुरशत्रुजयः प्रमर्दात् ॥ ६४

इमा स्तुति भक्तिपरा नरोत्तमा

भवद्भिरुक्तामनुकीर्तयन्ति ।

दुःस्वप्ननाशो भविता न संशयो

वरस्तथान्यो वियताममीप्सितः ।। ६५

देवा ऊचुः।

यदि वरदा भवती विदशानां

द्विजशिशुगोपु यतस्व हिताय ।

पुनरपि देवरिपूनपरांस्त्वं

प्रदह हुताशनतुल्यशरीरे ॥ ६६

देव्युवाच ।

भूयो भविष्याम्यसृगुक्षितानना

हराननस्वेदजलोद्भया सुराः।

अन्धासुरस्याप्रतिपोपणे रता

नाम्ना प्रसिद्धा भुवनेपु चर्चिका ।। ६७

भूयो वधिष्यामि सुरारिमुत्तमं

सभूय नन्दस्य गृहे यशोदया ।

तं विप्रचित्ति लवणं तथाऽपरौ

शुम्भ निशुम्भं दशनप्रहारिणी ॥ ६८

भूयः सुरास्तिष्यपुगे निराशिनी

निरीक्ष्य मारी च गृहे शवस्तोः ।

संभूय देव्याऽमितसत्यधामया

सुरा भरिष्यामि च शाकम्भरी वै॥६९

भूयो विपक्षक्षपणाय देवा

विन्ध्ये भविष्याम्यपिरक्षणार्थम् ।

दुर्वृत्तचेष्टान् विनिहत्य दैत्यान्

भूयः समेष्यामि सुरालयं हि ॥ ७०

यदारुणाक्षो भविता महासुरः

तदा भविग्यामि हिताय देवताः।

महालिरूपेण विनष्टजीवित

कृत्या समेष्यामि पुनस्त्रिविष्टपम् ।। ७१

पुलस्त्य उवाच।

इत्येवमुक्त्वा वरदा सुराणां

कृत्वा प्रणामं द्विजपुंगवानाम् ।

पिसृज्य भूतानि जगाम देवी

सं सिद्धसंधैरनुगम्यमाना ॥ ७२

महर्षियों से हँसार कहा-माप लोगों के अनुप्रह से मैंने संग्राम में (शनु फा) मर्दन कर देयशत्रुओं पर अत्यन्त अद्भुत विजय प्राप्त की है। (६४)

आप लोगों से कही गई इस स्तुति को पढ़ने वाले भक्तिपरायण श्रेष्ठ मनुष्यों के दुस्वप्नों का निस्सन्देह नाश होगा। आप लोग अन्य अभिलपित पर माँगे। (६१)

देयताओं ने पहा-यदि आप देवताओं को वर देना पाहती हैं तो ग्रामणों, पची और गौओं के हित के लिए यरन कीजिये । हे पारक पे समान शरीरयाली। अन्य देव शत्रुओं को आप पुन ( भविष्य में) भरम करें। (६६)

देयी ने पदा-हे देयो । पुन शहर के मुस के स्वेदजल से उत्पन्न होपर रक्त से रजिन मुसयाली होर संसार में पशिनाम से प्रसिद्ध में अन्धरासुर फायध पगी।(६७)

पुन नन्द के घर में यशोदा से उत्पन्न होकर में प्रपल मुर शव का पथ परंगी । यहाँ अवतार लेकर दांतों के प्रकार से में विप्रचित्ति, व्यगामुर एवं अन्य शुम्भ निशुम्म  दानवों का सहार करूँगी। (६८)

हे देवताओ! कलियुग में भोजन न मिलने से उत्पन्न होने पाली मारी को देसकर मैं पुनः अमितसत्यधामा देवी के साथ इन्द्र के घर शारम्भरी के रूप में प्रकट होकर भरण करूँगी। (६६)

हे देवताओ! पुन मैं शओं के संहार तथा पियों की रक्षा के लिये पिण्याचल में उत्पन्न होऊँगी। हे देवो । यहाँ दुराचारी दैत्यों का नाश करने के उपरान्त पुन स्वर्ग घरी जाऊँगी। (७0)

हे देवताओ! अरगाक्ष नामक महासुर के उत्पा होने पर महाभ्रमर के रूप से पुन उत्पन्न होऊँगी एय उसका यध कर पुन स्वर्ग चली जाऊँगी। (७१)

पुलस्त्य ने कहा-सा कहने के उपरान्त द्विजयरों को प्रणाम कर एवं अन्य प्राणियों को विशारदेवों को पर देनेपाली देवी सिद्धों सहित आश में पली गई। (७२)

इटं पुराणं परमं पवित्र

देच्या जयं मालदायि पुंसाम् ।

श्रोतव्यमेतभियतः सदर

रक्षोममेवगवानुवाच ।। ७३

इति श्रीवामनपुराणे निंशोभ्याय ॥३॥