वामन महा पुराण
अन्धक युद्ध, शिव के शूल से अन्धक का भेदन अष्ट भैरव एव मङ्गल तथा चर्चिका की उत्पत्ति शिव की नेत्रवाहि से अन्धक का शोषण, अन्धक-कृत शिवस्तुति, अन्धक को भृङ्गित्व की प्राप्ति, शिव की नेत्रवहि से अन्धक का शोषण, अन्धक-कृत शिवस्तुति, अन्धक को भृङ्गित्व की प्राप्ति, शिव द्वारा देवादिको का विसर्जन अर्ककुसुम से पार्वती का प्रकट होना एव अन्धक द्वारा पार्वती की स्तुति
पुलस्त्य उवाच।
तस्मिस्तदा दैत्ययले च भग्ने
शुक्रोऽब्रवीदन्धकमासुरेन्द्रम् ।
एोहि वीराद्य गृहं महासुर
योत्स्याम भृयो हरमेत्य शैलम् ।। १
तमुवाचान्धको प्रमन् न सम्यग्भवतोदितम् ।
रणानेवाफ्यास्यामि कुलं व्यपदिशन् स्वयम् ॥ २
पश्य त्वं द्विजशार्दूल मम वीर्य सुदुर्धरम् ।
देवदानपगन्धर्वान् जेष्ये सेन्द्रमहेश्वरम् ॥ ३
इत्येवमुक्त्या वचनं हिरण्याक्षसुतोऽन्धकः ।
समाश्वास्याब्रवीच्छंभु सारथिं मधुराक्षरम् ।।
सारथे वाहय रथं हराभ्याशं महायल ।
यावनिहन्मि पाणौधैः प्रमथामरवाहिनीम् ।। ५
इत्यन्धकवचः श्रुत्वा सारथिस्तुरगांस्तदा ।
कृष्णवर्णान् महावेगान् कशयाऽन्याहनन्मने ॥ ६
ते यत्नतोऽपि तुरगाः प्रेर्यमाणा हरं प्रति ।
जपनेष्ववसीदन्तः कृन्छे णोडुश्च त रथम् ॥ ७
वहन्तस्तुरगा दैत्यं प्राप्ताः प्रमथवाहिनीम् ।
जम्भ के मारे जाने एवं दैत्य सेना के भग्न हो जाने पर सभी गण हरि का अर्चन एवं इन्द्र की पराक्रम की प्रशसा करने लगे। वे इन्द्र शहर के समीप जाकर सड़े हो गये।(१६२)
श्रीवामनपुराण में तैतालिसवाँ अध्याय समाप्त ॥४३॥
४४
पुलस्त्य ने कहा-उस समय देत्य सेना के भग्न हो जाने पर शुक्र ने असुरेन्द्र अन्धर से पहा-ई वीर महासुर । इस समय घर चले। पुन पर्वत पर आर शहर से युद्ध करेंगे। (१)
अन्धक ने उनसे कहा-हे ब्रह्मन् । आपने उचित मात नदी पही। अपने कुल को कहित करते हुए मैं युद्ध से पलायन नहीं कहँगा। (२)
हे द्विजश्रेष्ठ! मेरा दुर्घ पीर्य देधिए। मैं इन और महेश्वर सहित सभी देशों, दानों और गन्धों को जीतूंगा। (३)
इस प्रकार के यपन को पहकर हिरण्यान-पुत्र अन्धक ने शम्भु (नामक) सारथि से मधुरवाणी मे समाश्यासन देते हुये कहा- (४)
हे महाबलशाली सारथि ! तुम रथ को महादेय के सामने ले चलो। में याणों की पा से प्रमथों एवं देवों पी सेना को मारूँगा।
हे मुने! अन्धक का वचन सुनार सारथि ने महा- वेगवान् कृष्णवर्ण के घोड़ों को कोदे से मारा।
शङ्कर पे प्रति प्रयत्नपूर्वक प्रेरित किये जा रहे वे अप जांपों में पीड़ा या अनुभव करते हुए पूर्वक उस स्य कोणीच रहे थे।
दैत्य को दोने वाले वे अध पायुवेग-तुरुप होने पर भी
संवत्सरेण साग्रेण वायुवेगसमा अपि ॥ ८
वतः कार्सकमानम्य पाणनालगणेश्वरान् ।
मुरान् संछादयामास सेन्द्रोपेन्द्रमहेश्वरान् ॥ ९
माणेश्छादितमीक्ष्यैर पलं त्रैलोक्यरक्षिता ।
मुरान् प्रोवाच भगयांश्चक्रपाणिर्जनार्दनः ।। १०
विष्णुरुनाच ।
किं विष्ठध्वं सुरश्रेष्ठा हतेनानेन चै जयः ।
तस्मान्मद्वचन शीघ्र नियता वै जयेप्सवः ॥ ११
शात्यन्तामस्य तुरगाः समं रथकुटुम्बिना।
भज्यतां स्यन्दनचापि पिरयः नियतां रिपुः ॥ १२
पिरथं तु कृतं पश्चादेनं घक्ष्यवि शंकरः ।
नोपेक्ष्यः शत्रुरदिष्टो देवाचार्येण देवताः ॥ १३
इत्येवमुक्ताः प्रमथा बामुदेवेन सामराः ।
चगं सहेन्द्रेण सम चक्रधरेण च ॥१४
तुरगाणां सहसं तु मेघामानां बनार्दनः।
निमिपान्तरमात्रेण गदया विनिपोषयत् ।। १५
हताश्चात् स्यन्दनात् स्कन्दः प्रगृह्य रथमारथिम् ।
शक्त्या विभिन्नहृदयं गवासु व्यस्जद् मुवि ॥ १६
विनायकाद्याः प्रमथाः समं शक्रेण देवतैः ।
रावनाक्षं रथं तूर्णमभवन्त तपोधनाः ॥ १७
सहसा स महातेजा विरथम्त्यज्य कार्मुकम् ।
गदामादाय बलवानभिद्राय दैवतान् ॥ १८
पदान्यष्टी ततो गत्ता मेघगम्भीरया गिरा।
स्थित्या प्रोवाच दैत्येन्द्रो महादेयं स हेतुमद् ॥ १९
भिक्षो भवान् सहानीकरत्वसहायोऽस्मि साम्प्रतम् ।
तथापि त्या विजयामि पश्य मेऽध पराक्रमम् ॥२०
वद्वाक्यं शंकरः श्रुत्वा सेन्द्रान्मुरगणांस्तदा ।
ब्रह्मणा सहितान् सर्वान् स्वशरीरे न्यवेशयत् ।। २१
शरीरस्थास्वान् प्रमथान् कृत्या देवांश्च शंकरः।
प्राह एोहि दुष्टात्मन् अहमेकोऽपि संस्थितः ।। २२
तं दृष्ट्वा महदाथर्य समिरगणक्षयम् ।
दैत्यः शंफरमभ्यागाद् गदामादाय वेगवान् ॥ २३
एक वर्ष से अधिक समय में प्रमयों की सेना में पहुँचे ।१८)
तदनन्तर (अन्धक ने) घनुप को याकर घाणसमूहों द्वारा गणेघरों पय इन्द्र, उपेन्द्र (विष्णु) तया महेश्वर सहित सभी देयों को अच्छादित कर दिया।
सेना को पाणों से आच्छादित देसर प्रैलोक्यरक्षक चमपाणि मगयान् जनार्दन ने देयों से कहा । (१०)
विष्णु ने कहा-हे सुरश्रेष्टो। आप लोग पैठे क्यों हैं? इसके मारे जाने से ही पिजय होगी। अव विजयाराक्षी भाप सोग शीघ्र मेरे यपनानुमार कार्य करें। (१२)
रपये सारधि सदिन इसके अधों को मार डासो एय रप को तोदकर श पोरवीन पना दो। (१२)
रपहीन फरने पे उपरान शहर इसे भरम फरेंगे। दे देयों ! देयापार्य दरपति ने कहा है कि शत्रु की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। (१३)
पामुदेय फे ऐसा करने पर इन एवं विष्णु सहिन प्रमयों मया देयों ने गपूर आमा किया। (१४)
जान ने क्षममात्र में गदाय आपात से भेष के समान पया सदरा पदों को मार डाटा । सन्द ने मारे गये पोदो पाले रप से सारथि को सोपहर तिमारा सपो भिम र दिया एवं
निष्प्राण हो जाने पर उसे भूमि पर पर दिया। (२६)
इन्द्र आदि देवों के साथ तपोधन विनायरादि प्रमयों ने शीत यजा अझ सहित प्य को तोड़ डाटा।
महातेजस्वी पलमान ( अन्धक) ने स्पहीन होने पर धनुष को छोड़ दिया ६५ गदा लेकर यह देयों की (१८)
तदनन्तर आठ पग पलने पे उपरान्न सहे होकर देरपेन्द्र ने भेपटुल्य गम्भीर पानी में महादेव से ऐतुयुक्त पगन पदा (१९)
हेभि पुस । सम्प्रति तुम सेनायुक्त हो एवं में असदाय तथापि मैं तुमसे जनगा। आग मेरा पराक्रम (२)
उमरा ययन मुनार शहर ने दीरममा के साथ समी देवताओं को अपने शरीरम संनियट पर लिया। (२१)
उन प्रमपों एर देयों से अपने शरीर में मप्रपिट फरने के अराग शर ने कहा- दुष्टात्मा। आभो, पा। मैं पनही पड़ा। (२२)
समान देवो के यो फ बिटपन पर महान् महान आश्चर्य देयने उपरान पर रप गा कर शङ्कर
तमापतन्तं भगवान् दृष्ट्वा त्यक्त्वा वृपोत्तमम् ।
शूलपाणिगिरिप्रस्थे पदातिः प्रत्यविष्ठत ॥ २४
वेगेनवापतन्तं च निमदोरसि भैरवः ।
दारुणं सुमहद् रूपं कृत्वा त्रैलोक्यमीपणम् ॥ २५
दंष्ट्राकरालं रविकोटिसंनिभं
मृगारिचर्माभिवं जटाधरम् ।
भुजंगहारामलकण्ठकन्दरं
विशार्धनाई सपडलोचनम् ॥ २६
एवादशेन रूपेण भगवान् भृतभावनः ।
निमद शतुं शूलेन शुभदः शाश्वतः शिनः ॥२७
सशूलं भैरवं गृह्य भिन्नेप्युरमि दानमः ।
विवहाराविवेगेन फोगमात्रं महामने ॥ २८
ततः कथंचिद् भगवान् संरतम्यात्मानमात्मना ।
तूर्णमुत्पाटयामास शूलेन मगदं रिपुम् ॥ २९
दत्याधिपस्त्वपि गर्दा हरमूनि न्यपातयत् ।
कराम्यां गृह्य शूलं च समुत्पतत दानवः ॥३०
संस्थिवः स महायोगी सर्वाधारः प्रजापतिः ।
गदापावक्षताद् भूरि चतुर्धाऽमृगयापतत् ।। ३१
पूर्वधारासमुद्भुतो भैरवोऽग्निसमनभः।
विद्याराजेवि विख्यातः पद्यमालाविभूषितः ॥ ३२
तथा दक्षिणधारोत्यो भैरवः प्रेवमण्डितः ।
कालराति विरन्यातः कृष्णाचनसमप्रभः ।। ३३
अथ प्रतीचीधारोत्यो भैरयः पत्रभूषितः ।
अतसीकुसुमप्ररन्यः कामराजेति विश्रुतः ॥ ३४
उदग्धाराभवधान्यो भैरवः शूसभूपितः ।
सोमराजेति विरयातयक्रमालाविभूपितः ।। ३५
क्षतस्य रुधिराव् जातो भैरवः शूलभूषितः ।
स्वच्छन्दराजो पिरन्यातः इन्द्रायुधसमप्रभः ॥३६
भूमिस्थाद् रुधिराजातो भैरवः शूलभूपितः ।
ख्यातो ललिवराजेवि सौभाअनसमप्रभः ॥ ३७
के समीप गया। (२३)
भगवान् शूटपागि उसे आते देख श्रेष्ठ पभ को छोदर पर्वत पर पैरल सड़े हो गए। (२४)
भैरप ने अतिभयर प्रेोक्य भीपग रूप पारण पर घेगपूर्वक आ रहे ( अन्धक फा) उर स्थल यिदीर्ण पर दिया। (२५)
(शष्टर पा तत्कालीन रूप) भयकर दाहों से युक्त, योटिसूर्य के सारा प्रकाशमान, म्यानपावृत, जटामण्डिन सर्प हार से अलपत मीयापाटा, दस भुजाओं से युक पया निनासापाया। (२६)
इस प्रगर के रस में संयुक्त शुभर, शरया, भूतभाग भगवान शिव ने गुरु द्वारा शत्रु रा भेदन रिपान महागुने । रयत पे यिभेदिन होने पर भी दानय शुरुमहिन भैरय पो पर पर फ कोस तक पन्हें वरीयगा। (२८)
तरनार भापान में रिमी मगर मन द्वारा स्वयं पोप माप शन में गदायुक्त यो मात (५९)
पाधिर ने भी डर के मगर पर गा मारिया पप गुरू यो दापों से पसर पर ऊपर
उदला। (३०)
सबके आधार पे महायोगी प्रजापति खड़े रहे किन्तु, गदापात से हुए एत द्वारा पार धाराओं में अत्यन्त रघिर प्रयादित होने लगा। (२०
पूर्व दिशा की धारा से अग्नि के समान प्रभा याले पद्ममाडा से विभूषित विद्याराज' नाम से विख्यात भैरव उत्पन्न हुये। (१२)
तथा दक्षिण की धाप से प्रेतमणित पणा. अन तुल्य प्रमायान पालराज' नाम से प्रसिद्ध भैरय सम्म (२३)
तदनन्तर पश्रिम की धारा से आसीपुष्प के सटश पत्र. भूपित 'कामराज' नाम से प्रसिद्ध भैरप दापस हुये। (३४)
सर की धारा से गममालापिभूपित मूलमण्डित 'संमराज' नाम से प्रसिद्ध अन्य भैरय उपम हुए। (३१)
धन के पिर से एह पनुप पे गमान कहानिया धूरभूपित 'यायदराज' नाम से विख्यात भैरव उत्पन हुये। (२६)
भूमि पर गिरे हुए रपिर से सीमाअन के मदर शुभूपि दोमायुत 'सिप' नाम में पियार (१७)
एवं हि सप्तरूपोऽसौ कथ्यते भैरवो मुने।
विनराजोऽष्टमः प्रोक्तो भैरवाष्टकमुच्यते ।। ३८
एवं महात्मना दैत्यः शूलपोतो महासुरः ।
छत्रवद् धारितो ब्रह्मन् भैरवेण विशुलिना ॥ ३९
तस्यासृगुल्मणं
ब्रह्मलमेदादयापतन् ।
येनारुण्ठ महादेवो निमग्नः सममूर्तिमान् ॥ ४०
ततः स्वेदोऽभवद् भूरि श्रमजः शकरस्य तु ।
ललाटफलक तस्मामाता कन्या सृगाप्लुता ॥ ४१
यद्भुम्यां न्यपतद् विप्र स्पेदपिन्दुः शिवाननात् ।
तम्मादारपुजाभो बालकः समजायत ॥ ४२
सपालस्तृपितोऽत्यर्थ पपोरधिरमान्धकम् ।
कन्या चोत्कृत्य संजातमसृग्विलिलिहेऽभुता ॥ ४३
ततस्तामाह बालार्कममा भैरयमूर्विमान् ।
शंफरो वरदो लोके श्रेयोऽर्थाय पचो महत् ॥ ४४
स्वां पूजयिष्यन्ति सुरा ऋषयः पितरोरगाः।
यक्षविद्याधरायैव मानवाथ शुभकारि ॥ ४५।
त्या स्तोप्यन्ति सदा देरि पलिपुप्पोत्करैः करैः
चर्धिकेति शुभं नाम यस्माद् रुधिरचर्चिता ॥ ४६
इत्येवमुक्ता परदेन चर्चिका
भूवानुजाता हरिचर्मवासिनी ।
महीं समन्ताद् पिचचार मुन्दरी
स्थानं गता हैड्गुलतादिमुत्तमम् ॥ ४७
तस्यां गतायां घरदः कुनम्य
प्रादाद् परं सर्वयरोत्तमं यत् ।
ग्रहाधिपत्यं जगतां शुभाशुभ
भविष्यति सशगं महात्मन् ॥ ४८
हरोऽन्यक वर्षसहस्रमानं
दिव्य स्वनेत्राताशनेन ।
चकार संशुष्पतनुं त्वशोणित
त्यगस्थिशेपं भगवान् स भैरवः ॥४९
तनाग्निना नेत्रमयेन शुद्धः
स युक्तपापोऽमुरराट् पभूव ।
तत. प्रजानां यहुरूपमीशं
नाथं हि सर्वस्य चराचरस्य ।। ५०
हे मुनि । इस प्रकार इन भैरव का सात रूप पहा जाता है। ' विराज' नाम ये अष्टम भैरय कहे जाने हैं। इस प्रकार आठ भैरय पहे जाने हैं। (३८)
हे ब्रह्मन् । इस प्रकार महात्मा त्रिशूली भैरर ने शूलविद्ध महामुर दैत्य को पत्र की सरद्द धारण किया। (३६)
हे प्रझन् । शूलभेद से उसका अत्यधिक रधिर गिरा। इससे सप्तमूर्तिमान् महादेय आरण्ठ निमम दो गए। (४०)
परिश्रम के पारण शहर पे लगटपटा पर अतिशय शेद उत्पन हुआ। उससे रचिराप्त एक कन्या उत्पन्न हुई।
देविप्रा शिव ये मुरासे पृथ्वी पर गिर स्पेपिन्दुओं से अहारपुस की बोभा पारा एक पाटर टत्पन्न हुआ। (४२)
अत्यन्त प्यासा यह पाटक अन्धर का रघिर पान करने गा एवं अद्भुत फन्या भी उठकर उत्पन्न हुए : रधिर को काटने लगी।
तदनत्तर भैरपरूपधारी पर कार ने पाल सूर्य के सास मा पाली उस कम्या से पायागरी महान वचन कहा-
हे शुभारिणी। देवता, ऋपि, पितर, उरण, यक्ष, विद्याधर एच मानय तुम्हारी पूजा करेंगे। (४५)
हे देयि । (वे लोग) यलि एय पुप्पाअलि से तुम्हारी स्तुति करेंगे। यत तुम धिर से यि हो अन तुम्हारा शुभ नाम पपिरा' यह होगा । (४६)
परद शहर ये ऐसा कहने पर व्यापम का पन पारण परने पाली भूगनुजाना सुन्दरी पर्षिया पृप्पी पर चतुर्दिक भ्रमण करती हुइ उत्तम ऐनललादि पर पली गई।
उसपे पर जाने पर परदाता शकर ने पुष (मगल) को राध पर दिया। उन्होंने पहा)-हे महामन् । मुम महो के अधिपनि यनोगे तया अगा का शुभाशुभ ग्यारे यश में होगा। (४८)
दन भगवान भैरय हर ने अपने धनगर नेत्रों से सहस दिव्य पणे सा अप फ शरीर को मुना कर परिजनशम्य य अस्थियमांगमिट पना दिया। पर के मंत्र ने हत्या अग्नि द्वारा रार होने में पद अमुरराज पापमुक्त हा गया। तदनन्तर प्रयाओं के यरूपवान नियाम, समन परापर के स्वामी, मयपर, सम्पप, रंग प्रेटेषयनाय, पाद, वरण्य, समान मुपदि दाप सपिनय
शात्या स सर्वेश्वरमीशमव्ययं
त्रैलोक्यनाथं घरदं वरेण्यम् ।
सवैः सुराधैर्नवमीब्यमाचं
ततोऽन्धकः स्तोत्रमिदं चकार ॥५१
अन्धक उवाच।
नमोऽस्तु ते भैरव भीममूर्ते
त्रिलोकगोप्ने शितशूलधारिणे ।
विशाईवाहो भुजगेशहार
त्रिनेत्र मां पाहि विपन्नयुद्धिम् ॥ ५२
जयस्व सर्वेश्वर पिथमूर्ते
सुरासुरैर्वन्दितपादपीठ ।
त्रैलोक्यमातुर्गुरवे वृपाडू
भीतः शरण्यं शरणागतोऽस्मि ॥ ५३
त्यां नाथ देवाः शिवमीरयन्ति
सिद्धा हरं स्थाणु महर्प यश्च ।
भीमं च यक्षा मनुजा महेश्वरं
भूताथ भृताधिपमामनन्ति ।। ५४
निशाचरा उग्रमुपायन्ति
भवेति पुण्याः पितरो नमन्ति ।
दासोऽस्मि तुभ्यं हर पाहि मह्यं
पापक्षयं मे कुरु लोकनाथ ॥ ५५
भवां स्त्रिदेवस्त्रियुगरित्रधर्मा
विपुष्करश्चासि विभो त्रिनेत्र ।
त्रय्यारुणिस्त्रिथुतिरन्ययात्मन्
पुनीहि मां त्वां शरणं गतोऽस्मि ॥ ५६
त्रिणाचिस्तस्त्रिपदप्रतिष्ठः
पडद्गवित् त्वं विषयेष्वलुब्धः ।
त्रैलोक्यनाथोऽसि पुनीहि शंभो
दासोऽस्मि भीतः शरणागतस्ते ॥ ५७
कृतं महत् शंकर तेऽपराध
मया महाभूतपते
कामारिणा निर्जितमानसेन
प्रसादये त्वां शिरसा नतोऽस्मि ॥५८
पापोऽहं पापकर्माऽहं पापात्मा पापसंभवः ।
स्तुत्य एवं आद्य शङ्कर पो जानकर अन्धक ने यह स्तुति की। (४९-५१)
हे भीममूर्ति भैरव ! हे त्रिलोक रक्षक ! सेवशूलधारी ! भापो नमार है। हे दश भुजाओं पाले तथा भुजगेश का हार धारण करने पाले प्रिनेत्र। मुश विपन्नधुद्धि की रक्षा (५२)
हे देयों तथा असुरों से वन्दित पादपीठ पाले विश्वमूर्ति मोदवर!आप की जयहो । हेटोक्यजननी के स्वामी पाव। मैं भयभीर होकर आप शरण देने वाले की शरण में आया हूँ। (५३)
हे नाथ। देवता आपसे शिष (मंगलमय) कहते हैं। आपनो सिम लोग हर (पाप दारी), मपि लोग स्थाणु (अपल), यक्ष टोग भीम, मनुष्य महेश्वर और भूत ! मूनाधिपति मानत हैं। (५४)
निशपर सम नाम से आपरा अर्चन करते हैं एवं पुण्ययान् पितृग भय नाम से आपको नमस्र करते हैं। हेर! मैं आपका दास हूँ, मेरी रक्षा करें। टोपनाय! मेरे पापों का नाश कीजिए। (५५)
हे विभु त्रिनेत्र! आप विदेच, त्रियुग, निधर्मा, तथा निपुष्कर है।हे अव्ययात्मन् ! आप त्रय्यारणि, तयानिश्रुति । आप मुझे पवित्र परें। में आपरी शरण में आया हूँ। (५६)
आप विणाचिकेत, त्रिपदप्रतिष्ठ, (स्वर्ग, मर्त्य, पावाल रूप तीन पदों पर प्रतिष्टित), पद्ग- पित, (वेद के शिक्षा, फल्प, व्याररण, निरुवा, छन्द, और ज्योतिप इन छ अंगों के माता), पिपयों के प्रति अलुब्ध तथा त्रैलोक्यनाथ है। हे शम्भो! आप मुझे पवित्र परें। में आपरा दास हूँ। भयभीत होकर मैं आपकी शरण में आया हूँ। (५७)
हे शहर! हे महाभूतपति! हे गिरीश! पामरूपी शत्रु ने मेरे मन को जीत लियाथा इसलिए मैंने आपरा महान अपराध किया है। में आपसे दिर से प्राम परता हूँ। (५८)
में पापी, पापरा, पापारमा सथा पापसम्भूत हूँ।हे
न्नाहि मां देव ईशान सर्वपापहरो भव ॥ ५९
मा मे ऋष्यस्व देवेश त्वया चैवादृशोऽस्म्यहम् ।
सृष्टः पापसमाचारो मे प्रसन्नो भवेश्वर ॥ ६०
त्वं कर्चा चैव पाता च त्वं जयस्त्वं महाजयः।
त्वं महल्यस्त्यमोंकारस्त्वमीशानो शुयोऽव्ययः ॥ ६१
त्वं प्रमा सृष्टिकनाथस्त्वं विष्णुपं महेश्वरः ।
त्वमिन्द्रस्त्वं यपट्कारो धर्मस्त्यं च सुरोनमः ॥ ६२
सूक्ष्मस्त्वं व्यक्तरूपस्त्वं त्वमव्यक्तस्त्वमीश्वरः ।
त्वया सर्वमिदं व्याम जगत् स्थावरजङ्गमम् ॥ ६३
समादिरन्तो मध्यच समनादिः सहस्रपात् ।
विजयस्त्वं महसायो रिरूपाशे महाभुजः ॥ ६४
अनन्तः सर्वगो व्यापी हंसः प्राणाधिपोऽन्युतः ।
गीर्वाणपतिरल्यग्रो स्टः पशुपतिः शिवः ।। ६५
विधस्त्वं निकोधो जिवारिविजितेन्द्रियः।
जयच शूलपाणिस्त्वं त्राहि मां शरणागतम् ॥ ६६
पुलस्त्य उवाच।
इत्यं महेबरो प्रक्षन स्तुनो दैत्याधिपेन तु ।
प्रीतियुक्तः पिङ्गलाक्षो हैरण्याक्षिमुवाच ॥ ६७
सिद्धोऽसि दानवपते परितुष्टोऽस्मि तेऽन्धक ।
वरं वरय भद्रं ते यमिच्छसि विनाऽम्बिकाम् ॥ ६८
अन्धक उवाच ।
अम्बिका जननी मद्यं भगवांस्यमकः पिता।
वन्दामि चरणौ मातुर्धन्दनीया ममामिका ॥ ६९
वरदोऽसि यदीशान वद्यात रिलयं मम ।
शारीरं मानसं वाग्नं दुस्मृतं दुर्विचिन्वितम् ॥ ७०
तया मे दानयो भावो व्यपयातु महेश्वर ।
स्थिराऽस्तु त्वयि भक्तिस्तु परमेतत् प्रयच्छ मे ॥ ७१
महादेव उवाच ।
एवं गन्तु दैत्येन्द्र पापं ते यातु संक्षयम् ।
मुक्तोमि दैत्यमागच भृङ्गी गणपतिर्मय ॥ ७२
देय ईशान। हे सर्वपापहारी महादेय। मेरी रक्षा कीजिये। (५९)
हे देवेश ! आप मेरे उपर मद्ध न हो। आपने ही मुझे इस प्रकार या पापाचारी बनाया है। हे ईश्वर! मेरे उपर प्रसन्न होइये। (६०)
आप फर्ना, यं पाता है। आप ही जय है और आप महाजय है। आप मगल मय है। आप ओगार है। आप ही ईशान, अव्यय तथा भूय है। (६१)
भाप सष्टिकता मझा तया प्रनु हैं। आप यिष्णु ज्य मद्दे पर हैं। आप इन्द्र है, आप यषटकार है, आप धर्म सपा गुरमेष्ठ हैं। (६२)
थाप पुरम है, थाप म्याप है, आप अव्यफ दे, धाप ईयर है, आप दी से यह पयपर जगा ज्यात है। (६३)
आप आदि, मध्य अन्त है, भाप अनादि एप सदरापार है। आप विजय है। आप सहसार, पिरपाश , मादागुन (६)
आर अनन्त, सपंगा, पापी, ईस, पाराधिप, अयुत, गोगपति, अध्याल, रस, पति परिप है। (६५)
आप पप सोपी, समयी, इन्द्रियनयो, जय एयं शूलपाणि है। आप मुझ धारणागत की रक्षा करें। (६६)
पुलस्त्य ने कहा-हे अझन् ! दैत्याधिपति के इससप्रसर रतुति परने पर पिद्गलाक्ष महेश्वर ने प्रीतिपूर्वक हिरण्याक्ष के पुत्र अधिक से कहा- (६७)
हे दानरपति अन्धक । तुम सिद्ध हो गएहो में तुम्हारे उपर प्रसन्न हूँ। अम्पिका के अतिरिष्ठ तुम जो पादो पह पर माँगो । तुम्हारा कल्याग हो । (६८)
अपर ने पदा-अम्यिरा मेरी जननी धौर थाप न्यम्पक मेरे पिता है। माता के परगों की मैं पादना परता अम्बिा मेरी पन्दनीया है। (६९)
ईशान। यदि आप पर ना पादरी हैं तो मेरे शारीरिक, मानसिक सय पापिय पाप या पुरिसर पिचार नट हो जाय। (७०)
है महेश्पर! मेरा पाना माप भी दूर से जाप पर्य आप में मेरी रिघा भक्तिो। यद्दी पर मुभ दीजिए।
महादेव ने कहा-ईस्पेन्द्र! ऐसा दीदारे पाप नट हो जॉप! तुम देरणमा से मुन्न हो गये। अब तुम गनपी मगी बनो।
इत्येवमुक्त्वा घरदः शूलाग्रादयतार्य तम् ।
निर्माय निजहस्तेन चक्रे निर्यणमन्धकम् ।। ७३
वतः स्वदेहतो देवान् ब्रह्मादीनाजुहाय सः ।
ते निश्चमहात्मानो नमस्यन्तस्त्रिलोचनम् ॥ ७४
गणान् सनन्दीनाहूय सनिवेश्य वदाग्रतः ।
भृङ्गिनं दर्शयामास ध्रुवं नैपोऽन्धकैति हि ॥ ७५
तं दृष्ट्वा दानवपतिं संशुष्कपिशितं रिपुम् ।
गणाधिपत्यमापन प्रशशंसुर्वपध्वजम् ॥ ७६
ततस्तान् प्राह भगवान् संपरिष्वज्य देवताः।
गच्छध्वं स्वानि धिष्ण्यानि भुञ्जध्वं त्रिदिवं सुसम् ।।७७
सहस्राक्षोऽपि सयातु पर्वतं मलयं शुभम् ।
तत्र स्वकार्य कृत्वैव पश्चाद् यातु त्रिविष्टपम् ॥ ७८
इत्येवमुक्त्वा त्रिदशान् समाभाष्य व्यसर्जयत् ।
पिमामहं नमस्कृत्य परिष्वज्य जनार्दनम्।
ते विसृष्टा महेशेन सुरा जग्मुस्त्रिपिष्टपम् ॥ ७९
महेन्द्रो मलयं गत्वा कृत्वा कार्य दिवं गतः ।
गतेषु शम्पारयेपु देवेषु भगवाशिवः ॥ ८०
विसर्जयामास गणाननुमान्य यथार्हतः ।
गणाथ शंकरं दृष्ट्वा स्वं स्वं वाहनमास्थिताः ॥ ८१
जग्मुस्ते शुभलोकानि महाभोगानि नारद ।
यत्र कामदुधा गावः सर्वकामफलद्रुमाः ॥ ८२
नद्यस्त्वमृतवाहिन्यो ह्रदाः पायसकर्दमाः।
स्वां स्वां गतिं प्रयातेपु प्रमधेपु महेश्वरः ।। ८३
ममादायान्धकं हस्ते सनन्दिः शैलमम्यगात् ।
द्वाभ्यां वर्षसहस्राभ्यां पुनरागारो गृहम् । ॥ ८४
ददृशे च गिरेः पुत्रीं श्वेता कुसुमस्थिताम् ।
समायातं निरीक्ष्यैव सर्वलक्षणसंयुतम् ।। ८५
त्यक्त्वाऽपुष्पं निर्गत्य सखीस्ताः समुपाह्वयत् ।
समाहूताश्च देव्या ता जयायास्तूर्णमागमन् ॥ ८६
वाभिः परिवृता तस्थौ हरदर्शनलालसा ।
ऐसा कहकर वरदावा महादेव ने उस अन्धक यो शूल की नोक से उतारा एय अपने हाथ से सहला कर क्षत रहित कर दिया। (७३)
तदनन्तर उन्होंने अपने शरीर में स्थित ब्रह्मादि देवों का आह्वान किया। त्रिलोचन को नमस्कार करते हुए सभी महात्मा बाहर निकले।
नन्दी सहित गणों को बुलाकर एव सम्मुस बैठार भृगी को दिखलाते हुए कहा-निश्चय ही यह अन्धक नहीं है। (५५)
उस शुष्क मास वाले दानवपति शत्रु को गणाधिप हुआ देखकर वे सभी वृपध्वज की प्रशसा करने लगे। (७६)
तदनन्तर उन देयों का आलिङ्गन र भगवान ने कहा-हे देवताओ । आप लोग अपने स्थान को जाइये एवं मुखपूर्वक स्वर्ग में रहिये । (७७)
सहस्राक्ष इन्द्र भी शुभ मलय पर्वत पर जॉय तथा यहाँ अपना काम समाप्त कर स्वर्ग चले जाय। (७८)
ऐसा यहकर देवों से सम्भापण, पितामह को नमस्कार तथा जनार्दन का आलिङ्गन कर उन्होंने सभी को विदा किया। मद्देश से विदा किये गए वे देवगण स्वर्ग चले गए।(७९)
महेन्द्र भी मलयाचल पर जाकर कार्य सम्पादन कर स्वर्ग चले गये। शमादि देवों के चले जाने पर भगवान शिव ने यथायोग्य सम्मान कर गणों को विदा किया । हे नारद । गण भी शङ्कर का दर्शन कर अपने वाहनों पर आरूढ होकर महाभोगयुक्त उन शुभलोकों को चले गए जहाँ की गौएँ इच्छित वस्तु देने वाली तथा वृक्ष सर्वकामरूपी फलों के दाता, नदियाँ अमृतवाहिनी तथा हद पायसरूपी कर्दम से पूर्ण थे । प्रमथों के अपने-अपने स्थानों पर चले जाने पर अन्धक का हाथ पकड कर नन्दी सहित महेश्यर पर्वत पर चले गए। दो सहस्र वर्षों के उपरान्त शङ्कर पुन अपने घर लौटे। (८०-८४)
उन्होंने श्वेत अपुष्प मे स्थित गिरिजा को देखा। सर्पलक्षणसयुक्त शङ्कर को आया हुआ देखते ही पार्वती अपुष्प को छोडकर बाहर निकली एव उन्होंने उन ससियों को पुकारा । ये सभी जयादि देवियों पुरारी जाने पर शीघ्र चरी आयी। (८५-८६)
उनसे घिरी हुई पार्वती हर के दर्शन की लालसा से खदी हो गई। गिरिजा को देखने के बाद दानव एव नन्दी क ऊपर दृष्टिपात कर त्रिलोचन ने हर्पपूर्वक गिरिसुता का आलिङ्गन किया। तदनन्तर उन्होंने
ततस्त्रिनेत्रो गिरिजा दृष्ट्या प्रेक्ष्य प दानयम् ।। ८७
नन्दिनं च क्या होदालिलिङ्गे गिरेः मुताम् ।
अयोवाचेप दासस्ते कृतो देवि मयाऽन्धकः ॥ ८८
पश्यस्त्र प्रणति या स्वमुतं चारुहासिनि ।
इत्युच्चार्यान्धकं चैव पुत्र एोहि सत्वरम् ॥ ८९
ग्राम शरण मातुरेपा श्रेयस्करी वर ।
इत्युक्तो निमुना नन्दी अन्धकश्च गणेश्वरः ॥ ९०
समागम्याम्पिकापादी वपन्दतुरुभानपि।
अन्धकोऽपि तदा गौरी भक्तिनम्रो महामुने ।
स्तुतिं च महापुण्यां पापनी श्रुतिमंमिताम् ॥ ९१
अन्धक उवाच ।
ॐ नमस्ये मयानी भूतमव्यप्रिया लोरधात्री
बनिनी सन्दमातरं महाडेवप्रिया धारिणी
स्यन्दिनी पेनां त्रैलोक्यमावरं धरित्री देवमावर.
मधेज्यां श्रुति स्मृति दयां ल0 कान्तिमाया-
मस्या मविं सदापायनी दैत्यसन्यायकरी [5]
महामापां वैनयन्ती सुशुभां कालराति
गोपिन्दगिनी शलराजपुत्री सर्वदेवाचिंता
सर्वभूतार्चितां पियां सरस्वती त्रिनयनमहिषी
नमस्यामि मृडानी शरण्यां शरणमुपागतोऽहं
नमो नमस्ते ।।(10)
इत्यं स्तुता माऽन्धकेन परितुष्टा विभावरी
प्राह पुन प्रमन्नाऽस्मि शृणुप्प वरमुत्तमम् ॥ ९२
भृङ्गिस्पच।
पाप प्रशममायातु विविधं मम पार्यति ।
तयेवरे च सततं भस्विरस्तु ममाम्भिक ।। ९३
पुलस्त्य उवाच।
यामित्यत्रवीद् गौरी हिरण्यारगुतं ततः ।
म चास्ते पूजयञ्चार्य गणानामधिपोऽभवत् ।। ९४
एवं पुरा दानवसत्तमं ।
महेश्वरेणाथ विरूपस्टथा।
कृत्वन रूपं भयदं च मेरयं
कहा-हे देयि। मैंने अन्धा पो मुम्हारा दास पना लिया है।( ८८)
हे पारदासिनि । प्रणाम कर रहे अपने पुत्र को देगे। ऐसा पहने पे उपरान्त उन्होंने कहा- पुत्र . भी आओ। अपनी माता पीवारण में जाओ। ये तुम्हारा कश्याग करेंगी। विगु के ऐमा यहने पर गगेश्वर नन्दी अपर दोनों ने जार अम्बिका परगों में प्रगाम किया। महामुनि) सदनगर भक्तिनन अपर ने गौरी की अति पवित्र पापानी प्य मुविसम्मत शुनि की। (८९-९१)
अधा ने पदा-ओं भवानीको प्राम है । मैमून मम्य-प्रिया करपात्री, जनिी, फानिरुय जननी, महादेपप्रिया, पारिगी, स्पनिनी, घेवना, पोषय जनी, परिती, देवमाता, स्या, मुति, स्मृति, दुपा, एग्जा, मेच पामि, भम्पा, मति, सापानी, दरपपाप- पारिती, महामापा, मैत्रपाणी, भरगमयोमा पाओ, पारात,
गोपिद भगिनी, शेटराजपुत्री, सर्वदेवारिता, सर्वभूतपूजिता,विधा, सरस्चनी, मिनयामहिपी को प्रणाम परता हूँ। में शरण्या मृदानी की शरण में आया हूँ। आपको यार पार प्रम है।
अधर के इस प्रकार स्तुति करने पर भयागी ने प्रसन्न होकर कहा-३ पुस । में प्रराम हूँ। मुग सम (३२)
दिने कहा- पार्वती । ६ अम्यिो । मेरे विधि पाप दूर हो जॉप ण्यं ईश्वर में महा मेरी भक्ति पनी । (६)
पुलस्त्य ने करा-नदाउर गोरा ने हिरण्यागा में पदा-पग दी हो। यद यदा रदपर शिव की पूग करणे पगाधिर हो गया।
इस प्रथा पूर्वप्रम में दम दारोट को महेपर ने अपनी विपाटि से भयदायक मं प्रदान कर
भृङ्गित्वमीशेन कृतं स्वभक्त्या ॥९५
एवत् तवोक्तं हरकीर्तिवर्धन
पुण्यं पवित्रं शुभदं महर्षे ।
संकीर्तनीयं द्विजसत्तमेपु
धर्मायुरारोग्यधनैपिणा सदा ॥९६
इति श्रीवामनपुराणे चतुर्थप्रत्वारिंशोऽध्याय ॥४४॥