चित्राङ्गदा आख्यान में विश्वकर्मा का वानर होना, वेदवती नम्दयन्ती, जाबालि एव देववती का उपाख्यान जावालि के जटामोधन का वर्णन

दण्ड उवाच।

चित्राङ्गदायास्त्वरजे तत्र सत्या यथासुखम् ।

स्मरन्त्याः सुरथं वीरं महान् कालः समभ्यगात् ॥ १

विश्वकर्माऽपि मुनिना शप्तो वानरतां गतः ।

न्यपतन्मेरुशिखराद् भूपृष्ठं विधिचोदितः ॥ २

धनं पोरं सुगुल्माख्यं नदी शालूफिनीमनु ।

शाल्वेयं पर्वतश्रेष्ठ समावसति सुन्दरि ॥३

तत्रासतोऽस्य सुचिरं फलमूलान्यथाश्नतः ।

मुनि के ऐसा कहने पर बाला चित्राङ्गदा यहाँ से शीघ्र सप्तगोदावर नामक तीर्थ में गई। (८२)

वहाँ जाने के उपरान्त वह देवाधिदेव त्रिलोचन की पूजा करती तथा फल-मूल का भक्षण करती हुई पवित्रता-पूर्वक रहने लगी।

उन ज्ञान-सम्पन्न ऋषि ने उसकी हित-कामना से प्रेरित होकर श्रीकण्ठ के मन्दिर मे महाख्यानयुक्त एक श्लोक लिया। (८४)

ऐसा कोई देवता, असुर, यक्ष, मनुष्य या राक्षस नहीं जो अपने पराक्रम से मृगनेत्री का दुःख दूर कर सके। (८५)

ऐसा कहने के उपरान्त उस विशालाक्षी के विषय में विचार करते हुए चे मुनि पूज्य विभु पुष्कर-नाथ का दर्शन करने के लिये मुनिन्द से वन्द्य पयोष्णी नदी के तट पर गये।(८६)

श्रीवामनपुराण में सैंतीस्वाअध्याय समाप्त ॥ ३७॥

३८

दण्ड ने कहा-हे अरजे । वहाँ वीर सुरथ का भ्याग करते हुए सुखपूर्वक चित्रागदा को दीर्घ ममय व्यतीत हुआ।

मुनि से अभिशप्त विश्वकर्मा भी पानर हो गये। भवितव्यतावश ये मेरु शिखर से भ्रष्ट होकर पृथ्वी पर आ गये। (२)

हे सुन्दरि ! वे 'शाकिनी नदी के समीप पने गुल्मों से पूर्ण भयङ्कर यन याले पर्वत-श्रेष्ठ शाल्वेय पर रहने लगे।

हे वरारोहे ! उस वन में फल-मूल खाकर रहते हुए

कालोऽत्यगाद् वरारोहे बहुवर्षगणो वने ॥ ४

एकदा दैत्यशार्दूलः कन्दरास्न्यः सुतां प्रियाम् ।

प्रतिगृह्य समस्यागात् स्याता देवपतीमिति ॥ ५

तां च तद् वनमायान्ती सम पित्रा वराननाम् ।

ददर्श वानरश्रेष्ठः प्रजग्राह बलात् करे ॥६

ततो गृहीतां कपिना स दैत्यः स्वसुतां शुमे ।

कन्दरो वीक्ष्य संक्रुद्धः सङ्गमद्यम्य चाद्रवत् ॥ ७

तमापतन्तं देत्येन्द्रं दृष्ट्या शासामृगो बली |

तथैव सह चार्यङ्गया हिमाचलमुपागतः ॥ ८

ददर्श च महादेवं श्रीकण्ठं यमुनातट ।

वस्थापिदूरे गहनमाश्रमं मपिपर्जितम् ॥ ९

तस्मिन् महाश्रमे पुण्ये स्थाप्य देवपती कपिः ।

न्यमअत स कालिन्यां पश्यतो दानवस्य हि ॥१०

सोऽज्ञानव तां मृतां पुत्रीं समं शासामृगेण हि ।

जगाम च महातेजाः पातालं निलयं निजम् ॥ ११

स चापि वानरो देव्या कालिन्या वेगतो हृतः ।

नीतः शिवीति विरयात देशं शुमजनावृतम् ॥ १२

ततस्ती.ऽथ वेगेन स कपिः पर्वते प्रति ।

गन्तुकामो महातेजा यत्र न्यस्ता सुलोचना ॥ १३

अथापश्यत् समायान्तमञ्जन गुसकोत्तमम् ।

नन्दयन्त्या समं पुत्र्या गत्या जिगमिपुः कपिः ।। १४

तां दृष्ट्वाऽमन्यत श्रीमान् सेयं देवरती ध्रुवम् ।

तन्मे वृथा श्रमो जातो जलमजनमंभवः ॥ १५

इति संचिन्तयन्नेन समाद्रवत सुन्दरीम् ।

सा तद् भयाच न्यपवन्नी चैर हिरण्यतीम् ॥ १६

गुसको वीक्ष्य तनयां पतितरमाएगाजले। ।

दुःसशोकममाक्रान्तो जगामाञ्जनपर्वतम् ।। १७

तत्रासौ तप आम्थाय मौनातधरः शुचिः ।

समास्त व महातेजाः संवत्सरगणान् यहून् ।। १८

नन्दयन्त्यपि वेगेन हिरण्वत्याऽपवाहिता ।

उन्होंने अनेक वर्षों का समय व्यतीत किया ।

एक समय 'कन्दर' नामर श्रेष्ट दैत्य 'देवरती' नाम से प्रसिद्ध अपनी प्रिय पुत्री को साथ लेकर यहाँ आया।

तदनन्तर घानरश्रेष्ट ने पिता के साय धन मे आ रही उस सुन्दरी को देखा एवं बलपूर्वक उसका हाथ पकड़ (६)

हे शुभे । दैत्य कन्दर अपनी कन्या को पानर के द्वारा परड़ी गयी देसर अत्यन्त क्रोध से सड्ग उठाकर दौड़ा।

पलान् यानर उस दैत्येन्द्र को आने देखकर उस सुन्दरी कन्या के साथ हिमालय पर चला गया। उसने 'यमुना' तट पर महादेव श्रीरण्ठ का दर्शन रिया एव यहाँ से थोड़ी दूर पर ऋषिविरहित गहन आश्रम देखा।

उस पवित्र महाप्रम में देयवती को रसकर यह यानर दत्य फन्दर के सामने कारिन्दी (ये जल) में दूब गया। (१०)

उम कन्दर ने समझा कि उस कन्या उस घानर के साथ हूयं मरी। अत यह सेजाची पाचालस्थित अपने गृह में चला गया।

देवी कालिन्दी वेगपूर्वक उस बन्दर को शुभ व्यक्तियों से परिपूर्ण शिरि नाम से प्रसिद्ध देश मे यहा कर ले (१२)

तदनन्तर महातेजस्वी यानर ने वेगपूर्वक उसे तैर कर पार करने के बाद उस पर्वत पर जाने की इच्छा की जहाँ यह सुलोचना रखी गयी थी। (१३)

तदनन्तर उसने 'नन्दयन्ती' नामर पुत्री के साथ आने हुए श्रेष्ट गुह्यक 'अञ्जन' को देसा । जाने की इच्छा करने वाला वानर (उनके) निस्ट गया। (२४)

उसे देखकर श्रीमान् रपि ने सोचा रिवरतुन यह यही देवरती है। अत जल मे दूरने का मेरा परिश्रम व्यर्थ हो गया।

वह वानर ऐसा सोचता दुभा उस सुन्दरी की ओर दौड़ा। उसरे हर से वह कन्या हिरण्यदी नदी में गिर (१६)

कन्या को नदी-जल में गिरी हुई देसार गुह्यक दुःख और मोक से विखल होता हुआ अअन पर्वत पर पटा गया।

यहाँ महातेजस्वी यह पवित्रतापूर्वक मौन ग्रन पारण कर अनेक वर्षों तक तप करवा रहा। (२८)

हिरण्यती वेगपूर्वक नन्दयन्ती को यहार साघुओं से

नीता देशं महापुण्यं कोशलं साधुमिर्युतम् ॥ १९

गच्छन्ती सा च रुदती ददृशे वटपादपम् ।

प्ररोहमायततनं जटाधरमियेश्वरम् ॥ २०

तं दृष्ट्वा विपुलच्छायं विशश्राम वरानना ।

उपनिष्टा शिलापट्टे ततो वाचं प्रशुश्रये ॥ २१

न सोऽस्ति पुरुषः कश्चिद् यस्तं घूयात् तपोधनम् ।

यथा स तनयस्तुभ्यमुद्वद्धो वटपादपे ॥ २२

सा श्रुत्वा तां तदा वाणी विस्पष्टाक्षरसंयुताम् ।

तिर्यगूमधश्चैव समन्तादवलोकयत् ॥ २३

ददृशे वृक्षशिखरे शिशुं पश्चाब्दिकं स्थितम् ।

पिजलाभिटामिस्तु उदर यत्नतः शुभे ।। २४

तं विवन्तं दृष्ट्वैव नन्दयन्ती सुदुःखिता ।

प्राह केनासि पद्धस्त्वं पापिना वद पालक ।। २५

स तामाह महाभागे बद्धोऽस्मि कपिना घटे ।

जटास्वेव सुदृष्टेन जीयामि तपसो पलात् ॥ २६

पुरोन्मत्पुरेत्येव सत्र देवो महेश्वरः।

तत्रास्ति तपसो राशिः पिता मम प्रतध्वजः ॥ २७

तस्यास्मि नपमानस्य महायोगं महात्मनः ।

जावोलिन्दसंयुक्तः सर्वशास्त्र निशारदः ।। २८

ततो मामनवीन तातो नाम कृत्वा शुभानने ।

जागालीति परिम्याय तच्छृणुष्य शुभानने ।। २९

पञ्चवर्षसहस्राणि पाल एव भविष्यसि ।

दशवर्षसहस्राणि कुमारत्वे चरिष्यगि ॥ ३०

विंशतिं यौवनस्थायी चीर्येण द्विगुणं ततः ।

पञ्चवर्ष शतान पालो भोक्ष्यसे पन्धनं दृढम् ॥ ३१

दवाव शतान्येव कौमारे कायपरटनम् ।

यौचने परमान् भोगान् द्विसहस्रसमास्तथा ।। ३२

चत्वारिंशच्छतान्येव वार्धके लेशमुत्तमम् ।

लप्स्यसे भूमिशय्याढ्य पदनाशनभोजनम् ॥ ३३

इत्येवमुक्तः पित्राऽहं बालः पश्चान्ददेशिकः ।

युक्त महापविन कोशल देश मे ले गई। (१९)

जाते समय रोती हुई उसने एक वट वृक्ष को देखा। यह वट वृक्ष जटाधर महेश्वर के समान अनेक प्ररोहों से युक्त था। (२०)

यह सुन्दरमुखी विपुल-छाया युक्त उस वृक्ष को देख कर एक पत्थर पर विश्राम करने के लिए बैठ गयी। तदनन्तर उसने यह वाणी सुनी। (२१)

क्या ऐसा कोई पुरुष नहीं है जो उस तपोधन (ऋतध्वज) से जाकर कहे कि तुम्हारा वह पुन वटवृक्ष में (२२)

उसने उस समय विशेष स्पष्ट अक्षर युक्त उस वाणी को सुनकर चारो ओर ऊपर नीचे देखा। (२३) हे शुभे । उसने वृक्ष के शिखर पर पिङ्गल जटाओं से यत्नपूर्वक आबद्ध एक पञ्चवर्षीग शिशु को देखा । (२४)

अत्यन्त दुखित नन्दयन्ती ने उस घोलने वाले को देसकर कहा-हे बालक ! बतलाओ तुम्हें किस पापी ने (२५)

उस शिशु ने उससे कहा-हे महाभागे। एक महादुष्ट वानर ने मुझे जटाओं के द्वारा इस बट में बाँध दिया है। मैं तपोबल से ही जी रहा हूँ। (२६)

पहले उन्मत्तपुर में देव महेश्वर प्रतिष्ठित थे।

यहाँ तपोराशि मेरे पिता ऋतध्वज निवास करते थे। (२७)

महायोग का जप कर रहे उन महात्मा का में सभी शास्त्रों में निपुण एवं भ्रमर समूह से युक्त पुत्र उत्पन्न (२८)

हे शुभानने। पिता ने मेरा जागालि नाग रसकर गुम से जो कुछ कहा उसे सुनो। (२९)

उन्होंने कहा तुम पाँच हजार वर्षों तक बालक रहोगे, एव दस हजार वर्षों तक कुमार रहोगे। (३०)

बीस हजार वर्षों तक तुम्हारा पराक्रमपूर्ण यौवन रहेगा एय तदुपरान्त उसके द्विगुणित कालनक वार्धक्य की स्थिति रहेगी। बाल्यावस्था मे पाँच सौ वर्षों तक तुम्हें दृढ बन्धन भोगना पड़ेगा। (३१)

उसके बाद एक हजार वर्षों तक कुमार अवस्था मे तुम्हें शारीरिक क्लेश भोगना होगा तथा यौवन काल मे दो हजार वर्षों तक तुम उत्तम भोगों का आनन्द प्राप्त (३२)

वृद्धावस्था मे चालीस सौ वर्षों तक अत्यन्त क्लेश भोगना होगा। उस समय तुम्हें भूमि पर शयन तथा निकृष्ट अन्न का भोजन करना पड़ेगा। (३३)

पिता के ऐसा कहने के उपरान पाँच वर्ष की अवस्था

विचरामि महीपृष्ठं गच्छन् स्नातुं हिरण्यतीम् ॥३४

तमोऽपश्यं कपिवरं मोऽवदन्मांक यास्यसि ।

इमां देववती गृथं मूड न्यरतां महाश्रमे ॥ ३५

ततोऽसौ मां समादाय विस्फुरन्तं प्रयत्नतः ।

पटाप्रेऽस्मिन्नुबन्ध जटाभिरपि सुन्दरि ॥ ३६

क्या च रक्षा कपिना कृता मीरु निरन्तरैः

लतापाशैर्महायन्त्रमयस्ताद् दुष्टबुद्धिना ॥ ३७

अमेद्योऽयमनाक्रम्य उपरिष्टात् तथाप्यधः।

दिशां मुसेषु सर्वेषु कृतं यन्त्रं लतामयम् ॥ ३८

संयम्य मां कपिवरः प्रयातोऽमरपर्वतम् ।

यथेच्छया मया दृष्टमेवन ते गदितं शुमे ॥ ३९

मवती का महारण्ये ललना परिवर्जिता ।

समायाता सुचाङ्गी केन सार्थेन मां वद ॥ ४०

साम्प्रवीदानो नाम गुह्यकेन्द्रः पिता मम ।

नन्दयन्तीति मे नाम अम्लोचागर्भसंभवा ॥ ४१

तत्र मे जातके प्रोक्तमृपिणा मुद्गलेन हि ।

इयं नरेन्द्रमहिषी भविष्यति न संशयः ॥ ४२

तद्वास्यसमकालं च व्यनदद् देवदुन्दुभिः ।

शिवा चाशिवनिर्घोपा ततो भूयोऽनवीन्मुनिः ॥ ४३

न संदेहो नरपतेर्महाराशी भविष्यति ।

महान्तं संशयं घोरं कन्याभावे गमिष्यति ।

ततो जगाम स ऋपिरेवमुक्त्या यचोऽद्भुतम् ॥ ४४

पिता मामपि चादाय समागन्तुमथैच्छत ।

तीर्थ ततो हिरण्यत्यास्तीराद कपिरथोत्पतत् ॥ ४५

तद् भयाच मया छात्मा क्षिमः सागरगाजले।

तयाऽस्मि देशमानीता इमं मानुपवर्जितम् ॥ ४६

श्रुत्वा जापालिरथ तद् वचनं वै तयोदितम् ।

प्राह सुन्दरि गच्छस्य श्रीकण्ठं यमुनातटे ॥ ४७

में मैं हिरण्यती में स्नानार्थ जाते हुए पृथ्वी पर विचरण कर रहा था। (३४)

उस समय मैंने एक श्रेष्ठ वानर देखा। उसने मुझ से कहा-हे मूढ ! इस महाश्रम में रखी हुई इस देवरती को लेकर कहाँ जा रहा है? (३५)

हे सुन्दरि! तदुपरान्त काँपने हुए मुझ को पकड़ कर उसने प्रयास पूर्वक इस वट वृक्ष के शिसर पर जटाओं से बाँध दिया।

हे मीरु ! उस दुष्टबुद्धि वानर ने अनेक लतापाशों से एक महान यन्त्र बनाकर उसके नीचे मुके रस दिया और निरन्तर मेरी रक्षा करता रहा। (३७)

सभी दिशाओं में अर्थान् चारों ओर से निर्मित किया गया यह लनायन्त्र अभेद्य है तथा ऊपर या नीचे से भी आक्रमण करने योग्य नहीं है। (३८)

वह श्रेष्ठ वानर मुझको पाँधकर स्वेच्छा से अमर पर्वत पर चला गया। हे शुभे ! मैंने जो कुछ देसा था उसे तुमसे कह दिया । (३६)

हे सुन्दरी ! मुझे बतलाओ कि तुम कौन हो एवं इस घोर जंगल में अकेली तुम किसके साथ आयी हो। (४०)

उसने कहा-गुह्यकराज अञ्जन मेरे पिता हैं।। मेरा नाम नन्दयन्ती है। मैं अम्लोचा के गर्भ से उत्पन्न (४१)

मेरे जन्म के समय मुद्गल ऋपि ने कहा था कि यह कन्या निस्सन्देह राजरानी बनेगी। (४२)

उनके कहने के समय ही स्वर्गीय दुन्दुभि का नाद हुआ और उसी समय शृगालीका अशुभ निर्योप हुआ। तदनन्तर मुनि ने पुन. कहा- (४३)

इसमें सन्देह हहीं कि यह कन्या महाराज की महारानी होगी। किन्तु कन्या अवस्था में यह घोर विपत्ति में पड़ जायेगी। इस प्रकार का अद्भुत वचन कहकर वे ऋपि चले गये। (४४)

तदनन्तर मुझे लेकर मेरे पिता तीर्थ जाने की इच्छा किये। इसी बीच हिरवती के तीर से वानर उछला।

उसके भय से मैंने अपने को नदी के जल में गिरा दिया । उस नदी के प्रयाह से में इस मनुष्य-रहित देश में आ गयी हूँ। (४६)

जागलि ने उसकी यही बात को सुनकर कहा-हे सुन्दरि! तुम यमुना तट पर श्रीकण्ठ के पास जाओ। (१७)

तत्रागच्छति मध्यावे मपिता शमचितुम् ।

तस्मै निवेदयात्मानं तत्र श्रेयोऽधिलप्म्यसे ।। ४८

ततस्तु त्वरिता काले नन्दयन्ती तपोनिधिम् ।

परित्राणार्थमगमद्धिमाद्रेर्यमुना नदीम् ॥ ४९

सा त्वदीर्पण कालेन कन्दमूलफलाशना ।

संप्राप्ता शंकरस्थानं यत्रागच्छति वापसः ॥ ५०

ततः सा देवदेवेशं श्रीकण्ठं लोकवन्दितम् ।

प्रतिवन्ध ततोऽपश्यदक्षरांस्वान्महामुने ।। ५१

तेपामर्थ हि विज्ञाय सा तदा चारुहासिनी

तजाधाल्युदितं श्लोकमलिसच्चान्यमात्मनः ॥ ५२

मुद्गलेनास्मि गदिता राजपत्नी भविष्यति ।

सा चावस्यामिमां प्राप्ता कश्चिन्मा त्रातुमीश्वरः ॥ ५३

इत्युल्लिरय शिलापट्टे गता स्नातुं यमस्वसाम् ।

ददृशे चाश्रमवर मत्तकोकिलनादितम् ॥ ५४

ततोऽमन्यत सानपिनूनं तिष्ठति सत्तमः ।

इत्येवं चिन्तयन्ती सा संप्रविष्टा महाश्रमम् ॥ ५५

ततो ददर्श देवानां स्थितां देववती शुभाम् ।

संशुष्कास्यां चलनेत्रां परिम्लानामिवाजिनीम् ।। ५६

सा चापतन्ती ददृशे यक्षजां दैत्यनन्दिनी ।

कैयमित्येव संचिन्त्य समुत्थाय स्थिताभवत् ॥ ५७

ततोऽन्योन्यं समालिङ्गय गाढं गाढं सुहत्तया ।

पप्रच्छतुस्तथान्योऽन्यं कथयामासतुस्तदा ॥ ५८

ते परिज्ञाततत्वाथै अन्योन्यं ललनोत्तमे ।

समासीने कथाभिस्ते नानारूपाभिरादराव ॥ ५९

एतस्मिन्नन्तरे प्रामः श्रीकण्ठं स्नातुमादरात् ।

स तत्त्वज्ञो मुनिश्रेष्ठो अक्षराण्यवलोकयन् ।। ६०

स दृष्ट्वा पाचयित्वा च तमर्थमधिगम्य च ।

मुहर्त ध्यानमास्थाय व्यजानाच वपोनिधिः ॥ ६१

ततः संपूज्य देवेशं स्वरया स ऋतध्वजः ।

अयोध्यामगमत् क्षिप्रं द्रष्टुमिक्ष्याफुमीवरम् ॥ ६२

वहाँ मेरे पिता दोपहर को शिवपूजा करने के लिए आते हैं । तुम वहाँ जाकर उनको अपना वृत्तान्त सुनाओ। इससे तुम्हारा कल्याण होगा। (४८)

तदनन्तर नन्दयन्ती अपनी रक्षा हेतु शीघ्रतापूर्वक हिमाचल से निकली एव यमुना के तट पर स्थित तपोनिधि (ऋतध्वज ) के निकट पहुंची। (४९)

कन्द मूल फल खाती हुई वह अल्प काल मे शङ्कर के उस स्थान पर पहुंची जहाँ तपस्वी आया करते थे। (५०)

हे महामुने । तदनन्तर उसने लोकवन्दित देवदेवेश श्रीरण्ठ की पूजा कर उन अक्षरों को देखा। (५१)

उनका अर्थ जानकर उस सुन्दरी ने जाबालि द्वारा कथित श्लोक तथा अपना एक अन्य श्लोक लिखा। (५२)

महर्षि मुद्गल ने कहा था कि मैं राजपत्नी होऊँगी। किन्तु मैं इस अवस्था में पड़ी हूँ। क्या कोई मेरा उद्धार करने में समर्थ है? (५३)

शिलापट्ट पर यह लिखकर वह स्नानार्थ यमुना तट पर गयी एव वहाँ पर मत्त कोकिलों के स्वरों से पूर्ण एक सुन्दर आमम देखा। (५४)

तदनन्तर उसने सोचा-यहाँ पर श्रेष्ठ ऋषि अवश्य  रहते है। इस नगर सोचती हुई वह महान् आश्रम में प्रविष्ट हुई।

तदनन्तर उसने दैवी शोभा से सम्पन्न शुष्क मुख एव चञ्चलनेत्रों वाली देववती को परिम्न पद्मिनी के सदृश वहाँ बैठी हुई देसा। (५६)

देवरती ने यक्षपुत्री को आती हुई देखा। 'यह कौन ऐसा विचार कर वह उठ खड़ी हुई। (५७)

तदनन्तर सखीभाव से उन दोनों ने परस्पर गाद आलिङ्गन किया और परस्पर पूछताछ और घातचीत करने लगी। (५८)

वे दोनों उत्तम ललनाऍ एक दूसरे की यथार्थ घटनाओं को जानकर बैठ गई एव आदरपूर्वक अनेक प्रकार की कथायें कहने लगी। (५६)

इसी बीच वे तत्त्वज्ञ मुनिश्रेष्ठ श्रीकण्ठ के निकट स्नानार्थ आये और पत्थर पर लिखित अक्षरों को देखा। (६.)

उसे देखकर, पढ़कर और उसका अर्थ समझकर उस तपोनिधि ने एक क्षण ध्यान लगाया एव जान गये (६१)

तदनन्तर महर्षि ऋतध्वज शीघ्रता से देवेश्वर की पूजा कर राजा इक्ष्वाकु से मिलने के लिए शीघ्र अयोध्या चले गये। (६२)

तं दृष्ट्वा नृपतिश्रेष्ठं वापसो वाक्यमब्रवीत् ।

श्रूयतां नरशार्दूल विज्ञनिर्मम पार्थिय ।। ६३

मम पुत्रो गुणैर्युक्तः सर्वशास्त्रविशारदः ।

उद्द्धः कपिना राजन् विषयान्ते तव हि ॥ ६४

तं हि मोचयितुं नान्यः शक्तस्त्यत्तनयाहते ।

शनि म राजेन्द्र स घस्प्राविधिपारगः ॥ ६५

तन्मुनेर्वाक्यमाकर्ण्य पिता मम कृशोदरि ।

आदिदेश प्रियं पुत्रं शकुनि तापसान्वये ॥ ६६

ततः स प्रहितः पित्रा भ्राता मम महाभुजः ।

संप्राप्तो बन्धनोद्देशं समं हि परमर्षिणा ॥ ६७

दृष्ट्या न्यग्रोधमत्युचं प्ररोहास्तृतदिङ्मुसम् ।

ददर्श पृक्षशिसरे उद्यद्धमृपिपुत्रकम् ॥ ६८

तांश्च सौटतापाशान् दृष्टयान् स रामंततः ।

दृष्ट्वा स मुनिपुत्रं तं स्वजटाप्सयत वटे ॥ ६९

धनुरादाय पलवानधिज्यं स चकार ह ।

लापवापिपुत्रं तं रक्षविच्छेदमार्गणैः ॥७०

कपिना यत् कृतं सर्व लतापाशं चतुर्दिशम् ।

पश्चवर्षशते काले गते शक्तस्तदा शरैः ॥ ७१

लताच्छन्नं ततस्तूर्णमारुरोह मुनिर्वटम् ।

प्राप्त स्वपितरं दृष्ट्वा जापालिः संयतोऽपि सन् ।। ७२

आदरान पितरं मूर्ना ववन्दत विधानतः ।

संपरिष्वज्य स मुनिर्व्याघ्राय मुतं वतः ॥ ७३

उन्मोचयितुमारब्धो न शशाक सुसंयतम् ।

तवस्तूण धनुय॑स्य बाणांश्च शानिर्वली ॥ ७४

आरोह वटं तूर्ण जटा मोचयितुं तदा ।

न च शक्नोति संच्छन्नं दृढ़ फपिवरेण हि ॥ ७५

यदा न शकिता स्तेन संप्रमोचयितुं जटाः ।

तदाऽवतीर्णः शकुनिः सहितः परमर्पिणा ।। ७६

जग्राह च धनुर्याणांचकार शरमण्डपम् ।

लाघवादईचन्द्रस्तां शाखां चिच्छेद स त्रिधा ॥ ७७

श्रेष्ठ नरपति से मिल कर तापस ने कहा-हे नरशार्दूल! दे राजन मेरी विज्ञप्ति मुनिये। (६३)

हेराजन् ! आप फे राज्य की सीमा पर एक यानर ने मेरे सर्वशास्त्रविशारद, गुणयुक्त पुत्र को याँध रसा है। (६८)

हे राजेन्द्र! आप के अस्त्र-विधिपारगामी मानि नामक पुत्र के अतिरिफ दूसरा कोई उसे मुक्त नहीं पर सकता। (६५)

हे मोदरि! मुनि फे इस यचन को सुन कर मेरे पिता ने अपने पुत्र शनि को तपसी के पुत्र के सम्बन्ध में आदेश रिया। (६६)

तदनन्तर पिता द्वारा प्रेपित पराममी मेरा भाई भेष्ठ ऋपि फे साथ पन्धन के स्थान पर पहुँचा। (६७)

पतुर्दिप प्ररोहों से आग्न अत्युच घटपृश्न को देखने के उपरान्त उसने पृनशिमर पर पंपे हुए शपि के पुत्र यो देगा। (६८)

उसने (विस्तृत) उन समस्त समापाशों को पारों और से देग्ग एवं यट में अपनी जटाओं से पंधे मुनिघुन को देसर एस परयान में पनुप हेर उसी प्रत्यया को पमाया एवं पुत्र को पाने एटापरपूर्वक पानों से पार्श को पाटने लगा। (६९-७०)

पाँच सौ वर्ष व्यतीत हो जाने पर चतुर्दिक पानर द्वारा यनाया गया तापाश यागों से काट दिया गया। (७१)

तदनन्तर ऋपि प्रानघज शीघ्र ललाओं से याच्यात पटवृक्ष पर चढ़ गये। जापालि ने अपने पिता को आया देख कर यो रहने पर भी आदरपूर्वक यथाविधि शिरसा प्रणाम किया। उन मुनि ने मला मृघर पुत्र का आलिगन किया। (७२-७३)

तदुपरान्त ये यन्धन रोसने लगे। किन्तु अत्यन रद पन्धन पो सोल ने मरे। तय पलयान पानि शीप धनुर और पाणों को गर उटा सोलने लिए पट पर चढ़ गये। किन्तु (वे भी) घेष्ट पपि द्वारा दता पूर्वक बनाए गये पन्धन को नसोल सके। (७४-७१)

जर वे जटाओं ने नहीं रो सके तो भेट अपि के साथ शनि नीचे उतर गये। उन्होंने धनुष पं पाग टिया तथा एक समाप पनाया। सदनगर उन्होंने सापक भदंपन्द्र पारों से उस पासा से संन पनों में पाट

शाखया कृत्तया चासौ भारवाही तपोधनः

शरसोपानमार्गेण अवतीणोऽथ पादपात् ॥ ७८

तस्मिस्तदा स्वे तनये ऋवध्वज-

स्त्राते नरेन्द्रस्य सुतेन धन्विना ।

जायालिना मारवहन संयुतः

समाजगामाय नदी स सूर्यजाम् ।। ७९

इति श्रीवामनपुराणे अष्टात्रिंशोऽध्यायः ॥३८॥