वामन महा पुराण
देवताओं के साथ अन्धक के युद्ध-वर्णन के अगतगंत देवासुरों के वाहनों का वर्णन देवाताओं से अन्धक का युद्ध
नारद उवाच।
नेत्रहीनः कथं राज्ये प्रहादेनान्धको मुने !
अभिपिक्तो जानवापि राजधर्म सनातनम् ॥ १
पुलस्त्य उवाच ।
लब्धचक्षुरसौ भूयो हिरण्याक्षेऽपि जीवति ।
ततोऽभिपिक्तो दैत्येन प्रह्लादेन निजे पदे ॥२
नारद उवाच ।
राज्येन्धको भिपिक्तस्तु फिमाचरत सुव्रत ।
देवादिभिः सह कथं समास्ते तद् वदस्व मे ॥३
पुलस्त्य उवाच।
राज्येऽभिपिक्तो दैत्येन्द्रो हिरण्याक्षसुतोऽन्धकः ।
तपसाराध्य देवेश शूलपाणि त्रिलोचनम् ॥ ४
अजेयत्वमवध्यत्वं सुरसिर्पिपन्नगैः।
अदायत्व हुताशेन अक्लेद्यत्वं जलेन च ॥ ५
एव स वरलब्धस्तु दैत्यो राज्यमपालयत् ।
शुक्रं पुरोहितं कृत्वा समध्यास्ते ततोऽन्धकः ॥६
ततश्चके समुद्योग देवानामन्धकोऽसुरः ।
आक्रम्य वसुधा सा मनुजेन्द्रान् पराजयत् ॥ ७
पराजित्य महीपालान् सहायार्थे नियोज्य च ।
तैः समं मेरुशिखरं जगामाद्भुतदर्शनम् ।। ८
शक्रोऽपि सुरसैन्यानि समुद्योज्य महागजम् ।
समारुह्यामरावत्यां गुप्तिं कृत्वा विनिर्ययौ ॥९
शऋस्यानु तथैवान्ये लोकपाला महौजसः ।
आरह्य वाहनं स्वं स्वं सायुधा निर्ययुर्वहिः ॥१०
देवसेनाऽपि च समं शत्रेणाद्भुतकर्मणा ।
निर्जगामातिवेगेन गजवाजिस्थादिमिः ॥ ११
अग्रतो द्वादशादित्याः प्रष्टतच त्रिलोचनाः ।
मध्येऽष्टौ वसवो विश्वे साध्याश्चिमस्वां गणाः ।
नारद ने कहा-“हे मुने। सनातन राजधर्म जानते हुए भी प्रहलाद ने नेत्रहीन अन्धक को क्यों राज्याभिषिक्त किया ?
पुलस्त्य ने कहा-हिरण्याक्ष के जीवित रहने के समय ही पुन उसे दृष्टि प्राप्त हो गई थी। इसी से दैत्य प्रहलाद ने अपने पद पर उसे अभिषिक्त किया। (२)
नारद ने कहा-"हे. सुव्रत । मुझे यह पतलाइये कि अन्धक ने राज्याभिषिक्त होकर क्या किया तथा देवादिकों के साथ कैसा व्यवहार किया? (३)
पुलस्त्य ने कहा-हिरण्याक्षवनय दैत्येन्द्र अन्धक ने राज्याभिपित होकर तपस्या द्वारा देवेश शूलपाणि रिलोचन की आराधना कर उनसे सुर, सिद्ध, ऋपि एवं पन्नगों द्वारा अजेयत्व तथा अवध्यत्व, अग्नि के द्वारा अदासत्व (जलाया न जाना) और जल से अक्लेद्यत्व (भिगोया न जाना) रुप यरदान प्राप्त कर राज्य का पालन किया और शुक्राचार्य को पुरोहित पद पर नियुक्त कर निवास करने लगा। (४-६)
तदनन्तर अन्धकासुर ने देवताओं को जीतने का उद्योग किया तथा सम्पूर्ण पृथ्वी को आक्रान्त र श्रेष्ठ राजाओं को पराजित कर दिया। (७)
राजाओं को पराजित कर तथा उन्हें अपनी सहायता मे नियुक्त कर उनके साथ वह मेरु पर्वत के देखने में अद्भुत शिसर पर पहुंचा। (८)
इन्द्र भी देव सेना को सजा कर महागज ऐरावत पर आस्ट होकर अमरावती में सुरक्षा की व्यवस्था र बाहर (९)
अन्यान्य महातेजस्वी आयुधधारी लोक्पालगण अपने- अपने वाहनों पर सवार होकर इन्द्र के पीछे-पीछे बाहर निकल पड़े।
अद्भुतकर्मा इन्द्र के साथ हाथी घोड़े रय आदि से युक्त देवसेना भी बडे वेग से निकल पड़ी। (११)
अप्रभाग में द्वादश आदित्य, पृष्ठभाग में त्रिलोचन,
यक्षविद्याधरायाश्च स्वं स्वं वाहनमास्थिताः ॥ १२
नारद उवाच ।
रुद्रादीनां वदस्वेह वाहनानि च सर्वशः।
एकैकस्यापि धर्मज्ञ परं कौतूहलं मम ॥ १३
पुलस्त्य उवाच।
भृणुष्व कथयिष्यामि सर्वेषामपि नारद ।
वाहनानि समासेन एकैकस्यानुपूर्यशः ।। १४
स्द्रहस्तलोत्पन्नो महावीर्यो महाजयः ।
श्वेतपर्णो गजपतिर्देवराजस्य वाहनम् ।। १५
रुद्रोरसंभवो भीमः कृष्णवर्णो मनोजयः ।
पौण्डको नाम महिपो धर्मराजस्य नारद ।। १६
स्द्रकर्णमलोद्भुत. श्यामो जलधिसंज्ञकः ।
शिशुमारो दिव्यगतिः वाहन वरुणस्य च ॥ १७
रौद्रः शकटचक्राक्षः शैलाकारो नरोत्तमः ।
अम्बिकापादसभृतो वाहन धनदस्य तु ॥ १८
एकादशानां रुद्राणां वाहनानि महामुने।
गन्धर्वाश्च महावीर्या भुजगेन्द्राश्च दारुणाः।
श्वेतानि सौरमेयाणि पाण्युग्रजवानि च ॥ १९
रथं चन्द्रमसचाईसहस्रं हसवाहनम् ।
हरयो रथवाहाश्च आदित्या मुनिसत्तम ॥ २०
कुञ्जरस्थाश्च यसमो यक्षाश्च नरवाहनाः।
किनरा भुनगारूढा हयारूढौ तथाश्विनौ ।। २१
सारङ्गाधिष्टिवा प्रमन् मरतो घोरदर्शनाः ।
शुकारूढाश्च कवयो गन्धर्वाश्च पदातिनः ।। २२
आरय वाहनान्येवं स्वानि सान्यमरोत्तमाः।
सना निर्ययुर्हष्टा पुद्धाय सुमहौतसः ॥ २३
नारद उवाच।
गदितानि सुरादीना वाहनानि त्वया मुने ।
दैत्याना वाहनान्येव यथावद् वस्तुमर्हसि ॥ २४
पुलस्त्य उवाच ।
शृणुष्प दानवादीना वाहनानि द्विजोचम ।
कथयिष्यामि तत्त्वेन यथावच्छ्रोतुमर्हसि ॥ २५
(रुद्रगण), मध्य मे आठोंवसु, विश्वेदेव, साध्य, अश्विनीकुमार, मरुद्गण, यक्ष, विद्याधर आदि अपने-अपने वाइन पर अधिष्ठित होकर चलने लगे। (१२)
नारद ने कहा-“हे धर्मज्ञ । रुद्र आदि के वाहनों का एक एक कर पूर्णतया वर्णन कीजिये। इस विषय में मुझे बहुत कौतूहल हा रहा है। (१३)
पुलस्त्य ने कहा-हे नारद । सुनो, मैं एक एक करके क्रमश सभी के वाहनों का सक्षेप में वर्णन करता हूँ।
रुद्र के करतल से उत्पन्न महावीर्ययुक्त एवं अति वेगवान् कल्दी वाला राजपति(ऐरावत) देवराज का बाहर है।।१५)
हे नारद । रुद्र के अरु से उत्पन्न भयकर, कृष्णवर्ण वाला एव मन के सदृश वेगवान पौण्डूक नामक महिए धर्मराज का वाहन है।
रुद्र के कर्ण-मल से स्पन्न श्यामवर्ण वाला दिव्यगति शील जलधि नामक शिशुमार वरण का वाहन है। (१७)
अम्बिका के चरणों से उत्पन्न भयकर, गाड़ी के चक्रवत् चक्षुवाला, पर्वताकार नरोत्तम कुवर का वाहन है। (१८)
हे महामुने । एकादश रुद्रों के वाहन महावीर्यशाली गन्धर्वगण, दारुण भुजगेन्द्रगण तथा सुरभि के अश से उत्पन्न तीव्रगति वाले श्वेत वृषभ है। (१६)
हे मुनिश्रेष्ठ । चन्द्रमा के रथ के वाहक अर्ध सहस्र (पाँच सौ) हस हैं। आदित्यों के रथ के वाहक (२०)
वसुओं के वाहन फुजर, यक्षों के वाइन नर, किन्नरों के वाइन सर्प एव अश्विनीकुमारों के बाहन अश्व हैं। (२१)
हे ब्रह्मन् । भयंकर दीसने वाले मरद्गणों के वाहन सारन हैं, कवियों (भृगुओं) के वाहन शुक है तथा नम्बपलोग पदाति है।
इस प्रकार अतितेजस्वी श्रेष्ठ देवगण अपने-अपने वाहनों पर आरूढ एव सन्नद्ध होकर हर्षपूर्वक युद्धार्थ निकले। (२३)
नारद ने कहा-हे मुने । आपने देवादिकों के वाहनों का वर्णन किया। इसी प्रकार अब दैत्यों के वाहनों का यथा वत् वर्णन करें। (२४)
पुलस्त्य ने कहा-हे द्विजोत्तम । दानवों के वाइन को सुनो । मैं तत्त्वत यथावत् वर्णन करता हूँ। (२५)
अन्धकम्य रथो दिव्यो युक्तः परमवाजिभिः ।
कृष्णवर्णैः सहस्रारस् त्रिनल्यपरिमाणवान् ।। २६
प्रहादस्य रयो दिव्यश्चन्द्र वर्णेयोत्तमः ।
उह्यमानस्तयाऽटाभिः श्वेतरुक्ममयः शुभः ।। २७
विरोचनस्य च गजः कुजम्भस्य तुरंगमः।
जम्भस्य तु रथो दिव्यो हौः काञ्चनसन्निभैः ।। २८
शङ्कुकर्णस्य तुरगो हयग्रीवस्य कुञ्जरः ।
रथो मयस्य विरन्यातो दुन्दुमेश्च महोरगः ।
शम्बरस्य विमानोऽमृदयाशङ्कोम॑गाधिपः ॥ २९
बलत्री च बलिनी गदामुसलधारिणी।
पद्भ्यां दैवतमैन्यानि अभिद्रवितुमयतौ ॥ ३०
ततो रणोऽभूव तुमुलः संकुलोऽतिभयंकरः ।
रजसा संतो लोको पिङ्गवर्णेन नारद ।। ३१
नाज्ञासीच पिता पुत्रं न पुत्र. पितरं तथा ।
सानेवान्ये निजघ्नुर्वै परानन्ये च सुव्रत ॥ ३२
अभिद्रुतो महावेगो रथोपरि रथस्तदा ।
गजो मत्तगजेन्नं च सादी सादिनमभ्यगात् ।। ३३
पदातिरपि संक्रुद्धः पदातिनमथोल्पणम् ।
परस्परं तु प्रत्यघ्नग्रन्योन्यजयकाशिणः ।। ३४
ततस्तु संकुले तस्मिन् पुढे देवासुरे मुने ।
प्रावर्तत नदी घोरा शमयन्ती रणाद्रजः ॥ ३५
शोणितोदा रथावर्चा योधसंघट्टवाहिनी ।
गजकुम्भमहाकूर्मा शरमीना दुरत्यया ।। ३६
तीक्ष्णाग्रप्रासमकरा महासिग्राहनाहिनी ।
अन्नसेवालसंकीर्णा पताकाफेनमालिनी ॥ ३७
मृध्रकमहाहंसा श्येनचमाहमण्डिता ।
वनवायसकादम्मा गोमायुश्वापदाकुला ।। ३८
पिशाचमुनिसंकीर्णा दुस्तरा प्राकृतैर्जनैः ।
स्थालौः मंतरन्तः शूरास्तां प्रजगाहिरे ॥ ३९
आगुल्फादवमजन्तः सूदयन्तः परस्परम् ।
अन्धक का अलौकिक रथ कृष्णवर्ण के श्रेष्ट अञ्चों से परिचालित है एवं सहस्र अरों (पहिये की नाभि और नेमि के बीच की लरदियों) से युक्त और बारह सौ हाथ परिमाण वाला है। (२६)
प्रहलाद का श्वेतरुक्ममय सुन्दर दिव्य रथ चन्द्रवर्ण- पाले आठ उत्तम अश्वों से याहित होता है। (२७)
विरोचन का वाइन हाथी एवं कुजम्भ का घोडा है तथा जम्भ का दिव्य रथ काश्चन तुल्य अश्यों से (२८)
शंकुकर्ण का वाइन अश्व, हयग्रीव का याहन हाथी, मय दानव का विख्यात रथ एवं दुन्दुभि का वाहन विशाल उरग है। शम्बर का पाहून विमान तथा अय शंकु का पाइन सिंह है। (२६)
गदा और मुसलधारी यलपान पल ओर और पैदल ही देवताओं की सेना पर चढाई करने के लिये एथत थे। (३०)
तदनन्ता अति भयकर घमासान युद्ध हुआ। हे नारद । समस्त लोक पोली धूल से आवृत हो गया जिससे पिता पुत्र को तथा पुत्र पिता को पहचान नहीं पाते थे । हे सुव्रत । दुव लोग अपने ही पक्ष के लोगों को तथा कुछ लोग विरोधी पक्ष के लोगों को मारने लगे। (३१-३२)
रथ के ऊपर रथ वेग से आक्रमण करने लगे। हाथी मतवाले हाथी के उपर तथा घुड़सवार घुड़सवारों की ओर बढे । पैदल सैनिक ने ऋद्ध होकर अन्य बलशाली पैदल पर आक्रमण किया एवं इस प्रकार ये एक दूसरे को जीतने की इच्छा से परस्पर प्रहार करने रो। (३३-३४)
हे मुने । तदनन्तर देवों और असुरों के उस घोर सग्राम मे युद्ध से उत्पन्न धूलि का शमन करती हुई शोणित रूपी जल एवं रथ रूपी आवर्त से युक्त तथा योद्धाओं के समूह को वहाने याली एव गजकुम्भ रूपी महान धर्म तथा शर रूपी मीन से युक्त अगम्य नदी प्रवर्तित हुई । (३५-३६)
(यह नदी ) सेज धार वाल प्रास रूपी मकर, महान् असि रूपी प्राद, आँत रूपी शैराल, पताका रूपी फेन, गृध्र एय का रूपी महाहस, श्येन रूपी घश्याम, पन यायस म्पी फलहस, शृगाल रूपी हिंस्र ण्य पिशाच रूपी मुनियों से समीणं थी तथा साधारण मनुष्यों से दुस्तर थी। जयरूप धन से इच्या पाले शूर योद्धा लोग घुटनों तक डूयते उतराते, एक दूसरे को मारते हुये
समुचरन्तो वेगेन योधा जयचनेप्सवः ॥ ४०
ततस्तु रौद्रे सुरदैत्यसादने
महाहवे भीरमयंकरेज्य ।
रक्षांसि यक्षाथ सुसप्रहृष्टाः
पिशाचयथास्त्वभिरेमिरे च ॥ ४१
पिरन्त्यसृग्गाढतरं भटाना-
मालिङ्गय मासानि च भक्षयन्ति ।
यसां रिलुम्पन्ति च विस्फुरन्ति
गर्जन्त्यथान्योन्यमयो वयासि ।। ४२
मुश्चन्ति फेत्काररवाशिवाश्च
मन्दन्ति योधा भुवि वेदनार्त्ता।
शस्त्रप्रतप्ता निपतन्ति चान्ये
युद्धं श्मशानप्रतिमं बभूव ॥ ४३
सम्मिशिवायोरखे प्रवृत्ते
मुरामुराणां मुभयंकरे
मुभयंकरे हा
युद्धं यमी प्राणपणोपविद्धं
द्वन्देऽतिशस्त्राक्षगतो दुरोदरः ।। ४४
हिरण्यचक्षुस्तनयो रणेऽन्धको
रथे स्थितो वाजिसहस्रयोजिते ।
मचेभपृष्ठस्थितमग्रतेजस
समेयिवान् देवपति शतक्रतुम् ।। ४५
समापतन्तं महिपाधिरुढं
यमं प्रतीच्छद् बलवान् दितीशः ।
प्रह्लादनामा तुरगाष्टयुक्तं
रथं समास्थाय समुद्यतास्त्रः ॥ ४६
विरोचनश्चापि जलेश्वरं त्वगा.
जम्भस्त्वथागाद् धनदं बलाढ्यम् ।
वायुं समभ्येत्य च शम्मरोऽथ
मयो हुताशं युयुधे मुनीन्द्र ।। ४७
अन्ये हयग्रीवमुखा महाग्ला
दितेस्तनूजा दनुपुगवाच ।
सुरान् हुताशार्कवसूरगेश्वरान
द्वन्द्व समासाद्य महापलान्विताः ॥ ४८
गर्जन्त्यथान्योन्यमुपेत्य युद्ध
चापानि कर्पन्त्यतिवेगिताश्च ।
मुश्चन्ति नाराचगणान् सहस्रश
रथ रुपी नौकाओं द्वारा उस नदी को वेग से पार कर रहे थे। (३७-४०)
इस प्रकार भीर जनों के लिए भयगरी देयों एवं दैत्यों ये सहारण अत्यन्त भयर युद्ध होने पर राक्षस और यक्ष । सोग अत्यन्त जानन्दित हुए क्या पिशाचों का समूह भी प्रसन्न हुआ। ये पीरों के गादे रधिर पा पान करते थे सपा आलिगा कर मास का भक्षण करत थे। पनी पर्यो को मोपत और उपयो धे एवं एस दूसरे पे प्रति गर्जन करते थे। (४१-४२)
गगालियों फेरसार शद करोगी, भूमि पर पड़े हुए पेदना से दुरपी योसा मादन करने संगे। कुछ लोग दारया एल होकर गिरने लगे तया युरभूमि श्मशान तुरुप हो गई।
गगारियों के भयर पद मे पुरु देवासुर संग्राम इस प्रसर हुआ मानों इन्द्र में निपुग योदा सोग गरत्र रूपी पासा पर क्या मापानी गा कर चूत में सलग्न हुए हों। (४४)
हिरण्याक्ष-तनय अन्धक सहस्र-अधों से युछ स्थ पर आस्द हो कर मत्त मातंग की पीठ पर स्थित महाते- जस्वी देवराज इन्द्र के साथ युद्ध करने गया।
आठ पोदों से युक्त रथ पर आरूढ अस्त्र उठाये यल-पान् दैत्यराज प्रसाद ने महिपास्ट आक्रमणगरी यम का सामना किया। (४६)
हे मुनीन्द्र । विरोचन जरेवर (यरुग) से युद्ध पे लिए आगे पढ़ा तया जाम पलशाली धनर (कुवेर) की ओर गया। शम्बर यायु के सम्मुस गया एवं मय अग्नि पे साथ युद्ध करने लगा। इयत्रीय धादि अन्यान्य मदापल्या दैत्य तथा दानय अग्नि, सूर्य, आठ यमु तथा परमेश्वर आदि देयवाओं में साय इन्द्र युद्ध करने हो। (४८)
युद्ध में एक दूसरे का सामना कर देगन करने हुए अतिवेग पूर्वक पाए रीच कर सहसों बाणो को
आगच्छ हे तिष्ठसि किं ध्रुवन्तः ।। ४९
शरैस्तु तीक्ष्णैरविवापयन्तः
शस्त्ररमोधैरभिवाडयन्तः ।
मन्दाकिनीवेगनिभा वहन्तीम्
प्रवर्तयन्तो भयदां नदी च ॥५०
त्रैलोक्यमाकांक्षिभिरुपवेगैः
सुरासुरैर्नारद संप्रयुद्धे ॥
पिशाचरक्षोगणपुष्टिवर्धनी-
मुत्चर्तुमिच्छदिरसृग्नदी बभौ ॥ ५१
वाधन्ति तूर्याणि सुरासुराणाम्
पश्यन्ति सस्था सुनिसिद्धसंघाः।
नयन्ति तानप्सरसां गणाण्या
हता रणे येऽभिमुसास्तु शूराः ॥ ५२
इति श्रीवामनपुराणे नवमोऽध्याय ।।