वामन महा पुराण
रवायम्भुव, स्वारोचिप, उत्तम, तामस, रैवत एव चाक्षुप मन्वम्तरों के मस्तों की उत्तपत्ति
नारद उवाच ।
यदमी भवता प्रोक्ता मस्तो दिविजोत्तमाः ।
तत् केन पूर्वमासन् वै मरुन्मार्गेण कथ्यताम् ॥ १
पूर्वमन्वन्तरेष्वेव समतीतेपु सत्तम । के त्वासन् वायुमार्गस्थास्तन्मे व्यारयातुमर्हसि ॥२
पुलस्त्य उवाच ।
श्रूयतां पूर्वमस्तामुत्पत्तिं कथयामि ते ।
स्वायंभुवं समारम्य यावन्मन्वन्तरं त्विदम् ॥ ३
वे इन्द्र के मरुत नामक देवभृत्य हो गए। माता के ही अपचार के कारण वे आगे चलते है।
तदनन्तर जठर से कुलिश सहित बाहर आकर शाप से भयभीत इन्द्र ने हाथ जोड़ कर दिति से कहा- (३८)
आपके पुत्र को काटने मे मेरा अपराध नहीं है। आपके ही अपनय से वह काटा गया। अत मेरे ऊपर आपको क्रुद्ध नहीं होना चाहिए। (३६)
दिति ने कहा-इसमें तुम्हारा कोई अपराध नहीं है। मैं इसे पूर्व से ही निश्चित मानती हूँ। इसी से काल पूर्ण होने पर भी मैंने अशौचाचरण कर दिया।
पुलस्त्य ने कहा-भामिनी दिति ने ऐसा कहने के उपरान्त उन बालकों को सान्त्वना दिया एवं उन्हें देवराज के साथ ही भेज दिया। (४१)
हे महर्षे। इस प्रकार पूर्वकाल में भयात महेन्द्र ने वन द्वारा गर्भस्थित अपने ही सहोदरों के विनाश के लिये काट डाला। इसीसे वे गोत्रभित् नाम से प्रसिद्ध हुए। ४२)
श्रीवामनपुराण मे पैतालिसावाँ अध्याय समाप्त॥ ४५ ॥
४६
नारद ने कहा-आपने दितिजोत्तम मरुद्गणों का जो वर्णन किया उसके विपय मे यह घतलायें कि पहले वे मरुत् किस मार्ग में अवस्थित थे?
हे सत्तम ! आप मुझे विशेषरूप से यह बतलायें कि पूर्व मन्वन्तर के व्यतीत होने पर कौन (मरुत) वायुमार्ग में स्थित थे? (२)
पुलस्त्य ने कहा-स्वायम्भुव मन्वन्तर से लेकर इस मन्वन्तर तक के पूर्व मरुद्गणों की उत्पत्ति आपसे कहता हूँ
स्वायंभुवस्य पुत्रोऽभून्मनो म प्रियवतः ।
तस्यासीत् सवनो नाम पुत्रस्त्रैलोक्यपूजितः ॥ ४
स चानपत्यो देव नृपः प्रेतगति गतः।
ततोऽरुदत् तस्य पत्ती सुदेवा शोकविद्वला ॥५
न ददाति तदा दग्धुं समालिङ्गय स्थिता पतिम् ।
नाथ नाथेति यहुशो विलपन्ती त्वनाथवत् ॥ ६
तामन्तरिक्षादशरीरिणी याक्
प्रोवाच मा राजपत्नीह रोदीः ।
यद्यस्ति ते सत्यमगुचमं तदा
भवत्वयं ते पतिना सहामिः॥ ७
सा नां वाणीमन्तरिक्षान्निशम्य
प्रोवाचेदं राजपुत्री सुदेवा ।
शोचाम्येनं पार्थिव पुत्रहीनं
नैवात्मानं मन्दभाग्यं पिहा ॥८
सोऽधानचीमा रुदस्वायताक्षि
पुत्रास्त्वत्तो भूमिपालस्य सप्त ।
भविम्यन्ति यद्विमारोह शीघ्रं
सत्यं प्रोक्तं श्रद्दधत्स्व त्वमय ॥९
इत्येवमुक्ता खचरेण वाला
चिती समारोप्य पंति वराहम् ।
हुताशमासाथ पतिव्रता तं
संचिन्तयन्ती ज्वलनं प्रपन्ना ॥ १०
ततो मुहर्वान्नृपतिः थिया युतः
समुत्तस्थौ सहितो भार्ययाऽसौ।
समुत्पपाताय स कामचारी
समं महिप्या च सुनाभपुत्र्या ॥ ११
तस्याम्परे नारद पार्थिवस्य
जाता रजोगा महिपी तु गच्छवः ।
स दिव्ययोगात् प्रतिसंस्थितोऽम्मरे
भार्यासहायो दिवसानि पञ्च ।। १२
ततस्तु पाठेऽहनि पार्थिवेन
ऋतुर्न यभ्योऽद्य भवेद् विचिन्त्य ।
रराम तन्व्या सह कामचारी
ततोऽपरात् प्राच्ययतास्य शुक्रम् ।। १३
उसे सुनिये। (३)
स्वायम्भुव मनु के पुत्र का नाम प्रियव्रत था। प्रैलोक्यपूजित सपन उन प्रियता के पुत्र धे। (४)
हे देवपि । वे पजा पुरहीन ही प्रेतगति को प्राप्त हुए। तदनन्तर उनरी मुदेवा नामक पत्नी शोरदिल होरर रोने लगी।
पुमने (मृत शरीर फो) जाने के लिये नहीं दिया । पति पा आलिशन फिर 'नाथ नाय' फदती हुई यह अनाया फैसश अत्यन्त रदन करने लगी।
उस समप अन्तरिक्ष से अशरीरिणी पाशी ने इससे पदा-हे राजपत्नी । रोओ नहीं। यदि तुम्हारा सग्य श्रेष्ठ है मो यह भग्नि पति फे साय मुम्हारे लिये हो ।
अरिस से हुई उस पानी को मुनर राजपुत्री मुदेषा ने पहा- आयशपारी ! मैं इस पुदीन राजा फे टिपे शेर कर दो न कि अपने मन्दभाग्य के दिये। (८)
उसने (आराध्धानी ने) पुन कहा- पिशाही!
तुम मत रोभो । तुम्हारे गर्भ से राजा को सात पुत्र होंगे। तुम शीम अग्नि पर आरोहण करो। मैं सत्य पहा हूँ। इसपर तुम आज पद्धा करो।
आराशचारी फे ऐसा कहने पर उस पाला ने श्रेष्ठ पति को चिता पर रसा एवं उस पति का चिन्ता करती हुई अग्नि में प्रवेश कर यह पवित्रता अग्नि की शरण में गई। (५०)
वदनन्तर मुहर्तमान में यह थी-सम्पन्न तृपति मार्ग के साथ उठा एवं मुनाम-पुनी अपनी महिपी के साथ आगरा में जाकर यथेच्छ पिचरण यरने एगा। (१२)
हे नारद ! आग में जाते हुए उस राजा फी महिपी रजस्या हो गई। यह राजा दिव्ययोग से आपरा में भार्या (सुदेया ) फे माय पाँच दिनों तक रहा। (१२)
तदननर एजें दिन आज मनु व्यर्थ न हो आप ऐसा सोप पर कामपा0 राजा भार्या के साथ रमन करने गा। सदुपपन पाश से इनय यक पति (१३)
शुक्रोत्सर्गावसाने तु नृपतिर्मार्यया सह ।
जगाम दिव्यया गत्या ब्रह्मलोकं तपोधन ॥ १४
तदम्बरात् प्रचलितमभ्रवर्ण
शुक्रं समाना नलिनी वपुष्मती।
चित्रा विशाला हरितालिनी च
सप्तपिपन्यो ददृशुर्यथेच्छया ।। १५
तद् दृष्ट्वा पुष्करे न्यस्तं प्रत्यैच्छन्त तपोधन ।
मन्यमानारतदमृतं सदा यौयनलिप्सया ॥१६
ततः स्नात्वा च विधिवत् संपूज्य तान् निजान् पतीन् ।
पतिभिः समनुज्ञाताः पपुः पुष्करसंस्थितम् ॥ १७
तच्छुकं पार्थियेन्द्रस्य मन्यमानास्तदाऽमृतम् ।
पीवमात्रेण शुक्रेण पार्थिवेन्द्रोद्भवेन ताः ॥ १८
ब्रह्मतेजोविहीनास्ता जाताः पत्न्यस्तपस्विनाम् ।
ततस्तु तत्यजुः सर्वे सदोपास्ताश्च पत्नयः ॥ १९
सुपुवुः सप्त तनयान रुदतो भैरवं मुने ।
तेपा रुदितशब्देन सर्वमापूरितं जगत् ।। २०
अथाजगाम भगवान् ब्रह्मा लोकपितामहः ।
समभ्येत्यानवीद् बालान् मा रुदध्वं महाबलाः ॥२१
मरुतो नाम यूयं वै भविष्यध्वं वियचराः ।
इत्येवमुक्त्या देवेशो ब्रह्मा लोकपितामहः ।। २२
तानादाय वियचारी मारुवानादिदेश है।
ते त्यासन् मरुतस्त्वाधा मनोः स्वायंभुवेऽन्तरे ॥ २३
स्वारोचिपे तु मरुतो वक्ष्यामि भृणु नारद ।
स्वारोचिपस्य पुत्रस्तु श्रीमानासीत् क्रतुध्वजः ॥ २४
तस्य पुत्राभवन् सप्त सप्ताचिःप्रतिमा मुने ।
तपोऽयं ते गताः शैलं महामेरुं नरेश्वराः ॥ २५
आराधयन्तो ब्रह्माणं पदमैन्द्रमथेप्सयः।
ततो विपश्चिन्नामाथ सहस्राक्षो भयातुरः ॥२६
पूतनामप्सरोमुख्यां प्राह नारद वाक्यवित् ।
गच्छस्व पूतने शैलं महामेरुं विशालिनम् ॥ २७
तत्र तप्यन्ति हि तपः ऋतुध्वजसुता महत् ।
यथा हि तपसो विघ्न तेषां भवति सुन्दरि ॥ २८
हे तपोधन ! शुक्र-स्याग करने के उपरान्त राजा पत्नी के साथ दिव्यगति से ब्रह्मलोक चला गया। (१४)
समाना, नलिनी, वपुष्मती, चित्रा, विशाला, हरिता एवं अलिनी इन सात ऋपि पत्नियों ने आमाश से गिरते हुए अभ्रक तुल्य वर्ण याने शुक्र को यथेच्छापूर्वक देसा। (१५)
हे तपोधन । उसे देखकर उसको अमृत मानती हुई शाश्वव यौवन प्राप्त करने की इच्छा से ( वे सभी ) उसको पुष्कर में रख ली। (१६)
तदनन्तर स्नानोपरान्त अपने अपने पतियों का पूजन कर उन पतियों की आज्ञा से पुष्कर में स्थित पार्थिवेन्द्र के उस शुक्र को अमृत मानती हुई वे पान कर गई। राजा के शुक्र का पान करते ही तपस्वियों की वे पत्नियाँ ब्रह्मतेज से विहीन हो गई । तदनन्नर उन तपरवी लोगों ने अपनी उन दोपयुक्त पत्नियों का त्याग कर दिया । (१७-१९)
हे मुने! उन ऋपि परिनयों ने भयकर रुदन करते हुए सात पुत्रों को उत्पन्न किया उनके रदन के शब्द से समस्त जगत आपूरित हो गया। (२०)
तदनन्तर भगवान् लोरपितामह नया आये। बालरों के निस्ट जाकर उन्होंने कहा-हे महाबलवानों! रोओ नहीं। (२१)
तुम्हारा नाम मस्त होगा । तुम आकाशचारी बनोगे। इतना कहकर लोक पितामह देवेश ब्रह्मा उन मरुतों को लेकर आकाश मे गये एवं उन्हें ( आकाश में रहने का ) आदेश दिया। वे ही स्वायम्भुव मनु के काल में आद्य मस्त हुए। (२२-२३)
हे नारद । स्वारोचिप मन्यन्तर के मरुतों का वर्णन करता हूँ। इसे सुनो। स्यारोचिप के पुत्र श्रीमान् ऋतुध्वज थे। (२४)
हे मुने। उनके अग्नि तुल्य सात पुत्र थे। वे सभी नरेश्वर तपस्या हेतु महामेरु पर्वत पर गए । (२५)
इन्द्रपद प्राप्त करने की इच्छा से वे ब्रह्मा की आराधना करने लगे। तदनन्तर बुद्धिमान् इन्द्र भयातुर हो (२६)
हे नारद! वाक्यविद् इन्द्र ने अप्सराओं मे प्रधान पूतना से कहा-हे पूतने ! तुम विशाल महामेरु पर्वत पर (२७)
यहाँ फतुध्वज के पुत्र महान तप कर रहे हैं।
तया कुरुष्व मा तेषां मिद्धिर्भवतु सुन्दरि।
इत्येवमुक्ता शरण पूतना रूपशालिनी ।। २९
माजगाम त्वरिता यत्रातप्यन्त ते तपः।
आश्रमस्याविरे तु नदी मन्दोदवाहिनी ॥ ३०
तस्यां स्नातुं समायावाः सर्व एव सहोदराः ।
साऽपि स्नातुं सुचापली त्वरवीर्णा महानदीम् ।। ३१
दस्ते नृपाः स्नातां ततश्चुक्षुभिरे मुने ।
तेषां च प्राच्यपच्छुकं तत्पपी जलचारिणी ॥ ३२
शुद्धिनी ग्राहमरयस्य महाराहस्य बलभा ।
तेऽपि विभ्रष्टवपसो जग्म राज्यं तु पैवयम् ॥ ३३
मा चाम्मराः शक्रमत्य यायावथ्यं न्यवेदयत् ।
ततो पटुतिधे काले सा ग्राही शहरूपिणी ॥ ३४
माधृता महानालमत्स्यपन्धेन मानिनी ।
म सां दृष्ट्या महाराहीं स्थलम्यां मत्स्यजीविकः ॥३५
निपैदयामाम तदा प्रतुघजमुनेषु वै ।
तथाऽम्येत्य महात्मानो योगिनो योगधारिणः ॥ ३६
नीत्या स्वमन्दिरं सर्वे पुरवाप्यां समुत्सृजन् ।
वतः क्रमाच्छहिनी सा सुपुर्व मप्र वै शिशून् ॥ ३७
जातमात्रेषु पुत्रेषु मोक्षभावमगाच सा।
अमातृपितृका याला जलमध्यविहारिणः ॥ ३८
स्तन्यार्थिनो चे रुस्तुरधाम्यागात् पितामहः ।
मा रुदम्पमितीत्याह मस्तो नाम पुत्रकाः ॥ ३९
यूयं देवा भविष्यध्वं वायुस्कन्धविचारिणः ।
इत्येवमुक्तायादाय साँस्तान् दैवतान् प्रति ॥ ४०
नियोज्य च मरन्मार्गे वैराज भवनं गतः ।
एवमामश्च मस्तो मनोः सारोचिपेऽन्तरे ॥ ४१
उत्तमे मरतो ये च ताञ्णुप तपोधन ।
उत्तमस्यायवाये तु राजासीन्निपधाधिपः ॥ ४२
चपुष्मानिति विरयातो वपुषा मास्करोपमः ।
तम्य पुत्रो गुणश्रेष्ठो ज्योतिष्मान् धार्मिकोऽभवत् ।।४३
दे मुन्दरि । उनरे तप में जिस प्रकार निम्न हो तया मुन्दरि । टन्हें सिद्धि प्राप्ति न हो सके ऐसा परो । इन्द्र में करने पर रूपयती पूनना शीम यदी गई जदों ये तप पर रहे थे। आभम के निस्ट ही मन्द जटप्रयाह वाली नदी थी। (२८-३०)
सभी सगे माई इस नदी मे रमान परने के लिये आये। यह सुन्दरी मी स्नान करने के लिये इस महानदी में (३१)
मुने! पन राजपुत्रों ने स्नान परती दुई उसो देगा घोर पे सुमिन हुए। सनरा र गिर गया। प्राद- मुख्य महामद की प्रिया दामिनी में से यो लिया।तप प्रष्ट हो जाने पाये भी अपने पिता राय मेपले गए। (३२-३३)
एस अपरा ने भी . समीप जार एनसे पापं तस्यको निदिन रिया। सदनमा पिरराज के मार तिमी पीपरने महामास द्वारा मगरपिगी मानिनी कादरीधेपण टिपा। मरम्पपी (पीयर) ने स्पस पर पोरंग महारतीय प्रपत्र के पुशे में निलि पिा। पारन पर पापे माया शिनासमीप गर। (३४-३६)
ये सभी इसको अपने घर सार नगर की यापी में छोड़ दिये। इप्त शदिनी ने प्रमश सात पुत्रों को टापस (३७)
पुत्रों का जन्म होते हो यह शदिनी मुक्त हो गई। मामूपिवृद्धिीन याला जल में विचरण करने (३८)
दुग्ध पै रिए ये रोने लगे। हम समय पितामह पहाँ आये। उन्होंने कहा- पुत्रो ! रोजी मत । मुम्हारा माम मरा होगा। (३७)
तुम लोग पापु फन्म पर विचरण करने वाले दंपता होगे। यह पहने पे उपाय ममी ऐकामी से जार उन्हें यायु मार्ग में निपेकिन फर समोर पने गए। इस प्रकार स्थापिप माकपाल में मरम् हुए (४.-४)
तपोधा! राम (मन्यम्हर) में जो मस्ती, धनर विषय में मुभि । उत्तम थे, में शरीर में सूर्य के समान पुप्मान नाम पापिया निरपाधिप पापा। गस गुमेध योनिमाम् नामर पार्मिक (४२-१३)
स पुत्रार्थी तपस्तेपे नदी मन्दाकिनीमनु ।
तस्य भार्या च सुश्रोणी दवाचार्यसुता शुभा ।। ४४
तपश्चरणयुक्तस्य बभूव परिचारिका ।
सा स्वयं फलपुष्पाम्बुसमित्कुशं समाहरत् ॥ ४५
चकार पनपत्राक्षी सम्पर चाविधिपूजनम् ।
पति शुश्रूपमाणा सा कशा धमनिसंतता ।। ४६
तेजोयुक्ता सुचाङ्गी दृष्टा समर्पिमिर्वने
तां क्या चारसर्वाङ्गी दृष्ट्वाध्य उपसा कृशाम् ॥ ४७
पप्रच्छुस्तपसो हेतुं वस्यास्तद्भर्तुरेव च ।
साप्रवीत् वनयाय आवाभ्यां ये तपःक्रिया ॥४८
ते चास्पै घरदा ब्रह्मन् जाताः सम सहर्षयः
ग्रजध्वं तनयाः सम भविष्यन्ति न संशयः ॥ ४९
पुययोर्गुणसंयुक्ता महर्षीणां प्रमादतः ।
इत्येवमुक्त्वा जग्मुस्ते सर्व एव महर्षयः॥५०
स चापि राजपिरगाव सभार्यो नगरं निजम् ।
वतो यद्भुविधे काले सा राज्ञो महिपी प्रिया ।। ५१
अयाप गर्भ तन्वङ्गी तस्मान्नृपतिसत्तमात् ।
गुविण्यामय भार्यायां ममारासी नराधिपः ।। ५२
सा चाप्यारोटुमिच्छन्ती भारं वै पवित्रता ।
निवारिता दामात्यैर्न वयापि व्यतिष्टव ॥ ५३ ।
समारोप्याथ मर्वारं चितायामारुहा सा ।
वतोऽग्निमध्याद सलिले मांसपेश्यपवन्मुने ।। ५४
साऽम्भसा सुसशीतेन संसिक्ता समधाऽभवत् ।
तेऽजायन्ताथ मस्त उत्तमस्यान्तरे मनोः।। ५५
ताममस्यान्तरे थे च मरुतोऽप्यभवन पुरा ।
तानहं कीर्तयिष्यामि गीतनृत्यकलिप्रिय ॥ ५६
ताममस्य मनोः पुत्रो शवयन इति श्रुतः ।
स पुत्रार्थी जुहायाग्नी स्वमांसं रुधिरं तथा ॥५७
अम्धीनि रोमकेशांश्च स्नायुमआयकृद्धनम् ।
शुक्रं च चित्रगी राजा सुतार्थी इति नः श्रुतम् ॥ ५८
सप्तस्वार्चिपु ततः शुक्रपातादनन्तरम् ।
मा मा क्षिपस्वत्यगवच्छन्दः सोऽपि मृतो नृपः॥ ५९
यह पुत्र की कामना से मन्दारिनी नदी के तट पर तपस्या फरने लगा। देशाचार्य वृहस्पति की सुन्दरी पुत्री उनी फल्याणी भार्या थी वह उन तपस्वी यी परिचारिया पनी । यह श्वयं फल, पुप्प, जल, समिया एवं कुश लाती थी । (४४-४५)
कमलदल के सदश टोचनों याली यह अच्छी तरह अतिथियों का पूजन करती थी। पति की सेवा करते हुए उसरा शरीर फश हो गया तथा शिराय प्रकट हो गई। (४६)
सप्तर्षियों ने उस सेजस्विनी सांगसुन्दरी पो यन में सा। सप से फश उस सर्योगमुन्दरी को देखकर उन लोगों ने उसी तथा उसके पति की तपस्या का कारण पूड़ा। उसने कहा-हम दोनों पुत्र के लिए तप पर रहे (४७-४८)
हे महान् ! सातो महपियों ने उसे पर दिया- तुम जाओ। मर्पियों के अगुबह से तुम दोनों को निरसन्देह सात गुमशन पुत्र होंगे ऐसा कद पर वे सभी महर्षि पले गए। (४३-५०)
यह राजर्षि भी पत्नी सहित अपने नगर में गये। पानम्तर पान पाउ व्यतीत हो जाने पर रामा की उस प्रिय महिषी ने पप्त गृपदिय में गर्म पारण किया। भार्या के गर्भिणी होने पर यह राजा मर गया। (५१-५२)
यद पतिव्रता पति के साथ चितारोहण के लिए उत्सुक हुई। मन्त्रियों ने उसे निपारित किया। किन्तु यह निवृत्त न हुई।
पति को चिता पर समारोपित कर यद भी उस पर आरूढ़ हो गई। हे मुने! तदनन्तर अग्नि के मध्य से जल में एक मांसपेशी गिरी। (५४)
सुशीतल जल से ससित होने पर पद्द ( मांसपेशी ) सात सण्डों में विभक्त हो गई। वे ही उत्तम मनु ये. कार में मर हुए।
देगीवनृत्य रतिप्रिय (नारद)! पहले सामसमन्यन्तर में जो मस्तु हुए (अय में ) टनश वर्णन फलंगा। वामस मनु के पुय पातध्यज नाम से विख्यात थे। उन्होंने पुत्र की कामना से अग्नि में अपने सारीर के मांस और रधिर का इयन रिया) (५७)
हम रगों में सुना है कि पुयायी राजा ने अस्थि, रोम, फेश, स्नायु, मात्रा, यात और पते एम की अग्नि में आहुति दी। (५८)
तदनतर साता अग्नियों में गुस्पात होने पर 'मन
ततस्तस्माद्भुतवहाद सप्त तत्तेजसोपमाः ।
शिशवः समजायन्त ते स्दन्तोऽभवन् मुने॥६०
तेषां तु ध्वनिमाकर्ण्य भगवान् पद्मसभवः ।
समागम्य निवा-थ स चक्रे मस्त. सुतान् ॥ ६१
ते त्यासन् मरुतो प्रास्तामसे देवतागणाः ।
येऽभवन् रेवते तांश्च शृणुष्य त्वं तपोधन ॥ ६२
रैवतस्यान्ववाये तु राजासीद् रिपृजिद् वशी ।
रिपुजिन्नामतः ख्यातो न तस्यासीत् सुतः किल ॥ ६३
स समाराध्य तपसा भास्कर तेजसा निधिम् ।
अवाप कन्यां सुरति तां प्रगृह्य गृह ययौ ॥ ६४
तस्या पिगृहे ब्रह्मन् वसन्त्यां स पिता मृतः ।
साऽपि दुःखपरीताङ्गी स्वा तनुं त्यक्तुमुद्यता ।। ६५
वतस्ता चारयामासुर्ऋपयः सप्त मानसाः ।
तस्यामासक्तचित्तास्तु सर्व एव तपोधनाः ॥ ६६
अपारयन्ती तदुःसं प्रज्माल्याग्नि विवेश ह ।
ते चापश्यन्त ऋपयस्तचित्ता भावितास्तथा ॥ ६७
तां मृतामृपयों दृष्ट्वा कष्टं कप्रीति वादिनः ।
प्रजग्मुचलनाचापि सप्ताजायन्त दारकाः ॥ ६८
ते च मात्रा पिनाभृता रुरुदुस्तान् पितामहः ।
निवारयित्वा कृतवांल्लोकनाथो मरुद्गणान् ॥ ६९
रैवतस्यान्तरे जाता मरुतोऽमी तपोधन ।
शृणुष्व कीर्तयिष्यामि चाक्षुपस्यान्तरे मनोः ॥ ७०
आसीन्मतिरिति रयातस्तपस्वी सत्यवाक् शुचिः ।
सप्तसारस्वते तीर्थे सोऽतप्यत महत् तपः ॥ ७१
विन्नार्थ तस्य तुपिता देवाः सप्रेषयन् वपुम् ।
सा चाभ्येत्य नदीतीरे क्षोभयामास भामिनी ।। ७२
ततोऽस्य प्राच्यवच्छुक्र सप्तसारस्वते जले ।
तां चैवाप्यशपन्मूढा मुनिर्मऋणको वपुम् ।। ७३
गच्छ लन्याऽसि मूढे त्व पापस्यास्य महत् फलम् ।
विध्वंसयिष्यति हयो भवतीं यज्ञसंसदि ।। ७४
पंको, मत को, इस प्रकार या शब्द होने लगा। यह राजा भी मर गया। (५६)
हे मुने! तदनन्तर उस अग्नि से सात तेजस्वी शिशु उत्पन्न हुए और वे रोने लगे। (६)
उनके रोदन की ध्वनि सुनकर भगवान् पद्मयोनि ने आर मना किया और उन पुनों यो मरुत नामक देवता बना दिया। (६२)
हे प्रक्षन् । वे ही तामस मन्वन्तर मे (मरुद्गण) नामक देयता हुए थे। हे तपोधन रैवत मन्यन्तर मे जो (मरुद्- गम) हुए ये मनका विवरण सुनिए । (६२)
रैयत के यश मे शत्रुजयी सयमी रिपुजित् नाम से विख्यात राजा थे। उनसे पुन नहीं था। (६३)
उन्होंने तप द्वारा तेजोनिधि भास्सर की अराधना कर सुरति नामक कन्या प्राप्त की और उसे रफर वे घर चले (६४)
हे अझन् । उस कन्या के पितृ-गृह मे रहते हुए पिता का देहान्त हो गया। यह भी शोकाकुल होकर अपने शरीर का परित्याग करने के लिए उद्यत हुई। (६५)
तदनन्तर सात मानस सपियों ने उसे मना किया। ये सभी तपोधन उस में आसक्त हो गये थे। (६३)
किन्तु यह कन्या उस दुसको सहन न कर सकने के कारण आग जलाकर उसमे प्रविष्ट हो गई। उस में आसक्त तथा सीन ऋपियों ने उसे देखा। (६७)
उसे मृत देसार ये ऋपि 'दु स की बात है 'दुख की यात है। कहते हुए चले गये। तदनन्तर उस अग्नि से सात पुन उत्पन्न हुए। (६८)
माता के अभाव मे वे रोने लगे। लोग्नाथ पितामह ब्रह्मा ने उन्हें रोककर मरगण का पद दिया। (६६)
हे तपोधन । वे ही रैयत मन्वन्तर में मरुद्गण हुए ये । अव में चाक्षुप मनु के पाल के मरुद्गणों का वर्णन करूँगा। उसे सुनिये। (७०)
मटि नाम से विख्यात सत्यवादी और पवित्र एकतपाची थे। उन्होंने सप्तसारस्वत तीर्थ में महान तप किया था।
देवताओं ने उनकी तपस्या में विघ्न डालने के लिये 'व' न मा अप्सरा को भेजा। उस भामिनी ने नदी तट पर आर मुनि को क्षुब्ध कर दिया। (७२)
तदनन्तर उनम शुक्र च्युत होकर सप्तसारस्वत के जल में स्खलित हुआ। मुनि मवणा ने उस मूद 'यपु' को भी शाप दिया।
हे मुद्दे । चली जाओ। तुम्हें इस पाप का दारण फल प्राप्त होगा। यानससद मे तुमको अपभ्यस्त फरेगा। (७१)
एवं शप्त्या ऋषिः श्रीमान् जगामाथ समाश्रमम् ।
सरस्वतीम्यः सप्तम्यः सम वै मरुतोऽगवन् ॥ ७५
एवम् तवोक्ता मरुतः पुरा यया
जाता वियद्वयामिकरा महर्षे ।
येषां श्रुते जन्मनि पापहानि-
भवेच धर्माभ्युदयो महान् वै ॥ ७६
इति श्रीवामनपुराणे पट्चत्त्यारिंशोऽध्यायः॥४६॥