वामन महा पुराण
उमा और शिव का विवाह तथा बालसिल्यों की उत्पत्ति
पुलस्त्य उवाच।
समागतान् सुरान् दृष्ट्या नन्दिराख्यातवान् विभोः।
अथोत्थाय हरिं भक्त्या परिनज्य न्यपीडयत् ।। १
ब्रह्माणं शिरसा नत्या समाभाष्य शतक्रतुम् ।
आलोक्यान्यान् सुरगणान् सभावयत् स शंकरः ॥२
गणाश्च जय देवेति वीरभद्रपुरोगमा।
शैवाः पाशुपताद्याश्च विविशुमन्दराचलम् ॥ ३
ततस्वस्मान्महाशैलं कैलासं सह दैवतैः ।
जगाम भगवान् शर्वः कर्तु वैवाहिकं विधिम् ॥ ४
ततस्तस्मिन् महाशैले देवमातादितिः शुभा।
सुरभिः सुरसा चान्याश्चक्रर्मण्डनमाकुलाः ॥५
का दर्शन करेंगे। (६६-६७)
तदनन्तर शङ्कर ने प्रसन्न होकर क्रमानुसार अरुन्धती सहित सप्तर्षियों की विधिपूर्वक पूजा की। (६८)
(शिव द्वारा) भली भाँति पूजित होकर वे देवों को निम त्रित करने गये । (तदनन्तर) वे ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र एवं सूर्य आदि (देवता) भी शिव का दर्शन करने आये । (६९)
हे महर्षि । यहाँ जारर ( शङ्कर को) प्रणाम करने के उपरान्त वे लोग शङ्कर के गृह में प्रविष्ट हुए। उन्होंने नन्दी आदि का स्मरण किया। वे सभी आकर शङ्कर प्रणाम करने के पश्चात् वैठ गये। (७०)
देवों एव गणों से आवृत खुली जटा वाले वे शङ्कर धन मे सर्ज और क्दम्र के मध्य प्ररोहयुक्त वटवृक्ष के सदृश शोभित हो रहे थे। (७१)
श्रीवामनपुराण में छबीसवाँ अध्याय समाप्त ॥२६॥
पुलस्त्य ने कहा-नन्दी ने आये हुए समस्त देवताओं को देसार शक्कर से बताया। शङ्कर ने उठकर भक्तिपूर्वक विष्णु का गाद आलिङ्गन रिया।
उन शहर ने प्रधा फो शिर से प्रणाम किया ए इन्द्र से पुशल समाचार पूछा तथा अन्य देयों की ओर देसकर उनस आदर किया।
पीरभद्रादि शेय एव पाशुपत गण 'जय देय' बहते हुए मन्दराचल में प्रविष्ट हुए। (३)
तदनन्तर भगवान शिव वैवाहिक विधि सम्पन्न करने के लिए देवताओं सहित कैलास नामक महान पर्वत पर गये। (४)
तदुपरान्त उस महान् पर्वत पर देवमाता कल्याणी अदिति, सुरभि, मुरसा एवं अन्य नियों ने शीघ्रता से शहर का मण्डन रिया।
महास्थिशेखरी चारुरोचनाविलको हरः ।
सिंहाजिनी चालिनीलभुजंगकृतकुण्डलः ॥ ६
महाहिरनवलयो हारकेयूरनपुरः ।
समुन्नवजटाभारो वृषभस्थो विराजते ॥७
तस्याग्रतो गणाः स्वैः स्वैरारूढा यान्ति वाहनः ।
देवाथ पृष्ठतो जग्मुर्हताशनपुरोगमाः ॥ ८
वैनतेयं समारूढः सह लक्ष्म्या जनार्दनः।
प्रयाति देवपार्श्वस्थो हंसेन च पितामहः ॥ ९
गजाधिरूढो देवेन्द्रश्छवं शुक्लपटं विभुः ।
धारयामास विततं शच्या सह सहस्रदृक् ।। १०
यमुना सरिता श्रेष्ठा यालव्यजनमुत्तमम् ।
श्वेत प्रगृह्य हस्तेन कच्छपे मस्थिता ययौ ।। ११
हसकुन्देन्दुसंकाशं वाल्व्यजनमुत्तमम् ।
सरस्वती सरिच्छेष्टा गजारूढा समादधे ।। १२
ऋतवः पट् समादाय कुसुमं गन्धसयुतम् ।
पञ्चवर्ण महेशानं जग्मुस्ते कामचारिणः ॥ १३
मत्तमैरावणनिभं गजमारह्य वेगवान् ।
अनुलेपनमादाय ययौ तत्र पृथूदकः ॥ १४
गन्धर्यास्तुम्मरमुखा गायन्तो मधुरस्वरम् ।
अनुजग्मुर्महादेवं वादयन्तश्च किबराः ॥ १५
नृत्यन्त्योऽप्सरवैव स्तुवन्तो मुनयश्च तम् ।
गन्धर्वा यान्ति देवेश त्रिनेत्रं शूलपाणिनम् ॥ १६
एकादश तया कोट्यो रुद्राणां तत्र वै ययुः ।
द्वादशैवादितेयानामष्टौ कोटयो वसूनपि ॥ १७
सप्तपष्टिस्तथा कोट्यो गणानामृपिसत्तम ।
चतुर्विशत् तथा जग्मु पीणामूर्ध्वरेतसाम् ॥ १८
असंख्यातानि यथानि यक्षकिन्नररक्षसाम् ।
अनुजग्मुर्महेशानं विवाहाय समाकुलाः ॥ १९
ततः क्ष्णेन देवेशः माधराधिपतेस्तलम् ।
संप्राप्तास्त्यागमन् शैलाः कुञ्जरस्थाः समंवतः ॥२०
ततो ननाम भगवास्त्रिनेत्रः स्थायराधिपम् ।
शैलाः प्रणेमुरीशानं ततोऽसौ मुदितोऽभवत् ॥ २१
समं सुरैः पार्षदेव विवेश पवेतनः ।
नन्दिना दर्शिते मार्गे शैलराजपुरं महत् ।। २२
नरकपाल धारी, सुन्दर गोरोचन के तिलक याले, व्याघ्र चर्मधारी, भ्रमर के सदृश नीले (काले) सर्प का कुण्डल धारण किये, महान सपों का रत्नकङ्कण पहने, हार, केयूर एव नूपुर धारण किये तथा लम्बी, उनत जटा समूह वारे शकर वृपम पर विराजित हुए। (६-७)
शङ्कर के आगे अपने अपने याहनों पर बैठे उनके गण एवं उनके पीछे अग्नि आदि देवता चले। शङ्कर के पार्श्व में लक्ष्मी सहित गरडास्ट विष्णु एव हसारूढ ब्रह्मा चलने लगे।
शची सहित गजारूढ सहस्रनेत्र इन्द्र ने शुल वस्त्र निर्मित विस्तृत छर धारण किया।
नदियों में श्रेष्ठ यमुना कच्छप पर सवार हो अपने हाथ मे उत्तम श्वेच चँवर लेकर चलने लगी। (११)
सरिच्छेा सरस्वती भी हाथी पर पदपर इस, कुन्द एव इन्दु सदृश चेंबर लेकर चलने लगी। (१२)
कामचारीछ ऋतुएँ पाँच वर्गों के मुगन्धित पुष्प हेफर शङ्कर ये साथ घलने लगी। (१३)
ऐरायत तुल्य मत्त गज पर आरद पृथूदक अनुलेपन
रेकर चला। (१४)
मधुर स्वर से गायन कर रहे तुम्बरप्रभृति गन्धर्व एच बाजा बजा रहे किन्नर शङ्कर के पीछे पीछे चले। नृत्य कर रही अप्सरायें तथा देवेश शूलपाणि त्रिलो चन की स्तुति करते हुए मुनि तथा गन्धर्व चले। हे ऋषिसत्तम । ग्यारह कोटि रद, बारह कोटि आदित्य, आठ कोटि वसु, सतसठ कोटि गग एव चौबीस (कोदि) उर्ध्वरेता ऋपियों ने प्रस्थान क्यिा। (१७-१८)
महेश के पीछे यक्ष स्निर एव राक्षसों के असख्य यूथ विवाह के लिए आकुलतापूर्वक घल। (१९)
तदुपरान्त देवेश क्षणमात्र में पर्वतराज हिमालय पर पहुँच गये। चारों ओर से गजारूढ़ पर्यत उनके पास एकत्रित हो गये। (२०)
तदुपरान्त त्रिलोचन भगवान शेरने पर्वतराज को प्रणाम क्यिा तथा अन्य पर्यों ने शिव यो प्रणाम रिया जिससे ये प्रसन्न हो गये। (२१)
नन्दी द्वारा दिपाये गये मार्ग से देवताओं एवं पार्षदों सहित पृपवेतन शंकर पर्वतराज फे महान् पुर में प्रविष्ट हुए । (२२)
जीमूतकेतुरायात इत्येवं नगरस्त्रियः ।
निजं कर्म परित्यज्य दर्शनव्यापूताभवन् ॥ २३
माल्याईमन्या चादाय करेणैकेन भामिनी।
केशपाश द्वितीयेन शंकराभिमुसी गवा ॥ २४
अन्याऽलक्तकरागाढ्यं पादं कृत्वाकुलेक्षणा ।
अनलक्तकमेकं हि हरं द्रष्टुमुपागता ।। २५
एकेनाक्ष्णाञ्जितेनैव श्रुत्वा भीममुपागतम् ।
साञ्जनां च प्रगृह्यान्या शलाका सुष्ठु धापति ॥ २६
अन्या सरसनं घासः पाणिनादाय सुन्दरी ।
उन्मत्त वागमन्नग्ना हरदर्शनलालसा ।। २७
अन्यातिक्रान्तमीशानं श्रुत्ना स्तनभरालसा ।
अनिन्दन स्पा वाला यौवनं स्वं कृशोदरी ।। २८
इत्थं स नागरस्त्रीणां क्षोभं सजनयन् हर।
जगाम वृषभारूढो दिव्यं श्वशुरमन्दिरम् ।। २९
ततः प्रविष्टं असमीक्ष्य शंभुं
शैलेन्द्रवेश्मन्यबला श्रवन्ति ।
जीमूत केतु शकर को आया जान नगर की स्त्रियाँ अपना काम छोडकर उनके दर्शन में सलग्न हो गई। (२३)
एक बी एक हाथ मे आधी मारा और दूसरे हाथ में अपने केशपाश को पकड़े हुए शङ्कर की ओर दौड़ी। (२४)
अन्य उत्सुक नेत्रों वाली एक पैर में महावर लगा कर तथा दूसरे मे बिना महापर लगाये शङ्करको देखने चरीआयी।(२५)
कोई महिला शङ्कर को आया सुनकर एक आँख मे आँजन लगाये और दूसरी आँख के लिए अञ्जनयुक्त शलाका लिये दौड पड़ी।
शकर के दर्शन की लालसा से दूसरी सुन्दरी उन्मत्ता की तरह करधनी सहित बस्न को हाथ मे लिए नगी ही चली (२७)
महादेव का आना सुनकर दूसरी स्तन के भार से अल सायी कृशोदरी बाला क्रोध से अपने यौवन की निन्दा करने । (२८)
इस प्रकार नगर की महिलाओं को क्षुब्ध करते हुए वृषभारूद शकर अपने श्वसुर के दिव्य मन्दिर मे गये। (२९)
तदनन्तर घर में प्रविष्ट शम्भु को देखर शैलेन्द्र के घर में आई हुई कियाँक्ने लगी कि पार्वती द्वारा किया गया तप उचित है। क्योंकि ये शङ्कर महान् देव हैं। (३०)
ये वही है जिन्होंने क्न्दर्प नामक कुसुमायुध के अङ्ग को नष्ट कर दिया। ये ही ऋतुक्षयी, दक्षविनाशक, भगाक्षि- हन्ता, शूलधर एव पिनाकी है। (३१)
हे शङ्कर । हे शूलपाणे । हे व्याघ्रचर्मधारिन् । हे काल- शनो। हे महान् सपों का हार और कुण्डल धारण करने चाले पार्यतीवल्लभ । आप को वारम्बार नमस्कार है। (३२)
इस प्रकार सस्तुत तथा इन्द्र के द्वारा धारण किये छत्र से युक्छ, सिद्धों एव यक्षों द्वारा वन्दनीय, सर्प का ककण पहने सुन्दर भस्म से उपलिप्त, ब्रह्मा को आगे किये हुये एवं विष्णु द्वारा अनुगत शिव मङ्गलमयी अग्निपूर्ण वैवाहिक वेदी पर गये। (३३)
सहचरों और सप्तर्षियों के साथ त्रिपुरान्तरु शिव के आने पर हिमवान के घर के लोग काली के सजाने में एव आये हुए पर्वत देवताओं की पूजा, और सरकार में व्यस्त
व्याकुल्यं समुपागताश्च गिरय. पूजादिना देवताः
प्रायोव्याकुलिता भवन्ति सुहृद. कन्यारिवाहोत्सुकाः॥३४
प्रसाध्य देवी गिरिजां ततः स्त्रियो
दुकूलशुक्लाभिवृताङ्गयष्टिकाम् ।
भ्रात्रा सुनामेन तदोत्सवे कृते
सा शंकराभ्याशमयोपपादिता ॥ ३५
ततः शुमे हHतले हिरण्मये
स्थिताः सुराः शकरकालिचेष्टितम् ।
पश्यन्ति देवोऽपि समं कुशागया
लोकानुजुष्ट पदमाससाद ॥३६
यन्न क्रीडा विचित्राः सकुसुमतरवो बारिणो बिन्दुपात-
र्गन्धाढ्यैर्गन्धचूर्ग:अविरलमयनौ गुण्डितौ गुण्डिकायाम्।
मुक्तादामः प्रकाम हरगिरितनया क्रीडनार्थ वदाम्नत् |
पश्चासिन्दूरपुजैरविरतविवतैश्चातःक्ष्मां सुरक्ताम्॥३७
एवं क्रीडां हरः कृत्वा समं च गिरिकन्यया।
आगच्छद् दक्षिणां वैदिमृपिभिः सेवितां दृढाम् ॥ ३८
हो गये। कन्या के विवाह मे उत्सुक सुहृद् लोग प्राय व्याकुल हो ही जाते हैं। (३४)
पार्वती के शरीर को स्त्रियों ने के उज्ज्वल रेशमी वस्त्रों से आच्छादित र सजाया एवं भाई सुनाभ वैवाहिक उत्सव के लिए उसे शङ्कर के निकट हे गये।
तदनन्तर सुवर्णमय प्रासाद के भीतर बैठे हुए देवगण शङ्कर और पार्वती की पैराहिक चेष्टाओं को देखने लगे और महादेव भी वृशाङ्गी पार्वती के साथ लोक सेवित स्थान को प्राप्त किये। (३६)
सुन्दर पुष्पों वाले वृक्षों से अलङ्कृत भूमि के घेरे में नीडा करते हुए शङ्कर और पार्वती ने एक दूसरे पर सुगन्धित जलविन्दुओं और गन्धचूणों की अविरल वर्षा की। तदनन्तर उन दोनों ने मोडनार्थ एक दूसरे को मुला-दाम से मारने के उपरान्त सिन्दूरपुञ्ज की अविरत वर्षा से पृथ्वी को टाल कर दिया। (३७)
इस प्रकार पार्वती के साथ क्रीडा कर शङ्कर ऋपियों से सेवित सुदृढ़ दक्षिण वेदी पर आये। (३८)
अथाज्ञगाम द्विमवान् शुक्लाम्बरथरः श्चुचिः।
पवित्रपाणिरादाय मधुपर्कमयोज्ज्वलम् ॥ ३९
उपविष्टस्त्रिनेत्रस्तु शात्री दिशमपश्यत ।
सप्तर्षिकांश्च शैलेन्द्रः सूपविष्टोऽवलोकयन् ॥ ४०
सुखासीनस्थ शर्यस्य कृताञ्जलिपुटो गिरिः।
प्रोगाच वचनं श्रीमान् धर्मसाधनमात्मनः ॥ ४१
हिमवानुवाच ।
मत्पुत्रीं भगवन् काली पौत्री च पुलहायजे ।
पितृणामपि दीहिनीं प्रतीच्छेमा मयोद्यताम् ।। ४२
पलस्त्य उवाच ।
इत्येवम् क्त्या शैलेन्द्रो हस्तं हस्तेन योजयन् ।
प्रादाद प्रवीच्छ भगवन् इदमुचैरुदीरयन् ।। ४३
हर उवाच।
न मेऽस्ति माता न पिता तथैव
न ज्ञातयो पापि च पान्धवाश्च ।
निराश्रयोऽहं गिरिशृङ्गवासी
सुतां प्रतीच्छामि तवाद्रिराज ॥ ४४
तदनन्तर पचित्री पहने तथा श्वेतवस्त्र धारण किये हिमवान उज्वल मधुपर्फ लेकर आये। (३९)
निनेत्र बैठे हुए ऐन्द्री (पूर्व) दिशा को देख रहे थे तथा शेरेन्द्र ने सप्तर्षियों की ओर देखते हुये भली भाति आसन ग्रहण किया। (४)
सुसासीन शङ्कर से गिरि ने हाथ जोड़कर अपने धर्म का साधक वचन कहा। (४१)
हिमवान् ने कहा-हे भगवन । मेरे द्वारा दी जा रही पुलहाराज का पौत्री, पितरों की दौहित्री एवं मेरी पुत्री, को आप स्वीकार करें।
पुलस्त्य ने कहा- यह बहार शैलेन्द्र ने ( शङ्कर के) हाथ से (पार्वती के) हाथ को मिलार उच्च खर से यह कहते हुये कि 'हे मगनन् । इसे स्वीकार कर दिया। (४३)
शङ्कर ने कहा-हे पर्वतराजमेरे पिता, माता, दायाद या कोई बान्धव नहीं है। मैं निराश्रय होकर गिरिशिखर पर रहता हूँ। मैं आप की पुत्री को स्वीकार करता हूँ। (४४)
इत्येवमुक्त्वा वरदोऽयपीडयत्
करं करेगादिषुमारिकायाः।
सा चापि संम्पर्शमवाप्य शंभोः
परां मुदं लब्धवती सुर ॥ ४५
तथाधिरूढो घरदोऽथ वेदि
सहाद्रिपुच्या मधुपर्कमश्नन् ।
दत्त्या च लानान् कलमस्य शुक्ला-
स्ततो पिरिश्चो गिरिजामुवाच ॥ ४६
कालि पश्यस्व पदनं भर्तुः शशधरप्रभम् ।
समदृष्टिः स्थिरा मृत्वा पुरुष्वाग्नेः प्रदक्षिणम् ॥ ४७
ततोऽनिस हरमुसे दृष्टे शैत्यमुपागता ।
यथार्करश्मिसंतमा प्राप्य वृष्टिमिवारनिः ।। ४८
भूयः प्राह विभोकनमीक्षस्वेति पितामहः ।
लअया साऽपि दृष्टेति शनैदाणमब्रवीत् ।। ४९
समं गिरिजया तेन हुताशग्नि मदक्षिणम् ।
वृतो लानाथ हविषा समं थिमा हुताशने ॥ ५०
ततो हरामिर्मालिन्या गृहीतो दायकारणात् ।
किं याचसि च दास्यामि मुश्वस्वेति हरोऽब्रवीत् ॥ ५१
मालिनी शंकरं प्राह मत्सरया देहि शंकर ।
सौभाग्यं निजगोत्रीयं ततो मोक्षमवाप्स्यसि ।। ५२
अथोवाच महादयो दत्तं मालिनि मुश्च माम् ।
सौभाग्यं निजगोत्रीयं योऽस्यास्तं शृणु वच्मि ते ॥ ५३
योऽसौ पीताम्बरधरः शहथक् मधुसूदनः ।
एतदीयो हि सौभाग्यो दत्तोऽस्मद्गोरमेव हि ॥ ५४
इत्येवमुक्ते पचने प्रमुमोच यूपध्वनम् ।
मालिनी निजगोत्रम्य शुभचारित्रमालिनी ।। ५५
यदा हरो हि मालिन्या गृहीवश्चरणे शुभे ।
वदा कालीमुसं ब्रह्मा ददर्श शशिनोऽधिकम् ॥ ५६
तद् दृष्ट्या क्षोममगमन् शुमच्युतिमवाप च ।
तल्लुम पालुरायां च सिलीचके ससानमः ।। ५७
ततोऽनवीधरो प्रमन् न द्विजान् इन्तुमर्हसि ।
यह कहकर यरदायर शहर ने पर्यनपुनी पानी पे हाथ दो अपने हाथ में लिया है देयर्षि। शहर फे हाथ पा स्पर्श प्राप्त कर एसे भी अत्यन आनन्द (४५)
तदनन्तर मधुपां सामे हुए यरदाता शहर पनपुत्री के माय वेदी पर बैठे। सदुपरान धान पा सफेद लाया देकर झा ने गिरिजा से कहा- (४६)
हेपाली। पति पे चन्द्र सदश मुप यो देसो प समष्टि में स्थित दोर अति की प्रदक्षिए। परो। (४७)
सदनभर वर पा मुग दंपने पर अम्यिा पो इस प्रकार की बोतला प्रान हुई जैसी मूर्यपिरगसन्तता पृथ्यो को दृष्टि में प्राप्त होती है। (१८)
पितामद ने पुन पदा-यिनुपा मुगदेयो। सोभी साता पूर्वक धीरे में मामा से कहा-देवरिया। (४९)
तदनन्तर गिरिजा पसाय उन्होंने मन की सीन प्रदक्षिणा की एवं अग्नि में दविन्य फे साथ माया की आहुति दी। (५०)
का पैर पर लिया। शहर ने पहा-क्या माँगती हो? मैं दंगा। पैर छोद दो।
मालिनी में शहर से यहा-दे शङ्कर। मेरी सायी को अपने गोत्र का सौभाग्य दीजिए तभी छुटकारा मिलेगा।
तदनन्तर महादेय ने यहा-हे मालिनी । मैंने दिया। मुझे छोड़ो। इसरा जो गोत्रीय सीमाग्य होगा उसे में तुम्हें पसराता हूँ। तुम सुनो। (५३)
ये जो पीवापर शपधारी मधुसूदन है मैंने इनके ही सौभाग्य यो तथा अपने गोत्र पो दिया । (५४)
इस प्रसर र के यहने पर अपने गुरु की गुम सम्परिना की माडा पार परने यालीमारिनी ने शर में फोहोर दिया। (५५)
जब माहिती ने शहर में दोनों पातों फो पमा प्रस समय प्रमा ने पन्द्रमा मे भी अधिर गुदर शाली के मुपको देगा। (५६)
उसे देखने में रोम होने से भगए दना शुभ ग्युत हो गया। मययश छन्दोंने इस एक पो हिरा दिया।
तदनमररने कदा-हे ब्रह्मम्! ब्राह्मनो का वध
अमी महर्पयो धन्या वालखिल्याः पितामह ॥ ५८
वतो महेशवाक्यान्ते समुत्तस्थुस्तपस्विनः ।
अष्टाशीतिसहस्राणि चालसिल्या इति स्मृताः ॥ ५९
ततो विवाहे निवृत्ते प्रविष्टः कौतुकं हरः ।
रेमे सहोमया रात्रि प्रभाते पुनरुस्थितः ॥ ६०
ततोऽद्रिपुत्रीं समवाप्य शंभुः
सुरैः समं भृतगणैश्च दृष्टः ।
संपूजितः पर्वतपार्थिवेन
स मन्दरं शीघ्रमुपाजगाम ।। ६१
तत. सुरान् ब्रह्महरीन्द्रमुख्यान्
प्रणम्य संपूज्य यथाविभागम् ।
विसय॑ भूतैः सहितो महीध्र-
मध्यावसन्मन्दरमष्टमूर्तिः ॥ ६२
इति श्रीवामनपुराणे सप्तविशोध्याय ॥२७॥