5 वामनचरित-कश्यप द्वारा नारायण का स्वचन

कश्यप उवाच ।

नमोऽस्तु ते देवदेव एकशृङ्ग वृपार्चे

सिन्धुप वृषाकपे सुरवृष अनादिसंभव

रुद्र कपिल विष्वक्सेन सर्वभूतपते ध्रुव

धर्माधर्म वैकुण्ठ वृषापर्च अनादिमध्यनिधन

धनंजय शुचिश्रवः पृश्नितेजः निजजय [6]

अमृतेशय सनातन विधाम तुपित महातत्त्व

लोकनाथ पद्मनाभ विरिश्चे बहुरूप अक्षय

अक्षर हव्यभुज खण्डपरशो शक मञ्जकेश

हंस महादक्षिण हृषीकेश सूक्ष्म महानियमधर

विरज लोकप्रतिष्ठ अरूप अग्रज धर्मज धर्मनाम [10]

गभस्तिनाम शतक्रतुनाभ चन्द्ररथ सूर्यतेजः

समुद्रवासः अजः सहस्रशिरः सहस्रपाद

अधोमुख महापुरुप पुस्पोचम सहस्रनाहो

सहस्रम् सहस्रास्य सहस्रसंभव सहस्रसत्त्वं

स्वामाहुः । पुष्पहास चरम त्वमेव चौपट [15]

वपटकारं त्वामाहुरप्रयं मसेपु प्राशितारं सहस्रधारं

च भूव भुवश्च स्वश्च त्वमेव वेदवेद्य ब्रह्मशय

ब्राह्मणप्रिय त्वमेव धौरसि मातरिश्वाऽसि

धर्मोऽसि होता पोता मन्वा नेता होमहेतुस् त्यमेव

उस अमृत स्थान पर पहुँच कर महात्मा कश्यप ने धीमान् योगी सुरेश्वर, कल्याणस्वरूप, सहस्राक्ष, नारायण देव की प्रसन्नता हेतु ( देवताओं को ) सहस्रवार्षिक दिव्य कामद व्रत की दीक्षा दी। (२०-२१)

सभी देवता क्रम पूर्वक ब्रह्मचर्य, मौन एव स्थान वीरा सन (आसन विशेष) धारण कर दम तप करने (२२)

वहाँ भगवान् कश्यप ने महात्मा विष्णु को प्रसन्न करने के लिये वेदोक्त स्तर का पाठ किया जिसे 'परमस्त कहते है। (२३)

श्रीवामनपुराग के सरोमाहात्म्य मे चैथा अध्याय समाप्त।।

कश्यप ने कहा-'हे देव देव एकङ्ग, वृषार्षि, सिन्धुप, वृषाकपि, सुरवृप, अनादिसभव, रुद्रकपिल, विष्वक्सेन, सर्वभूतपति, ध्रुय, धर्माधर्म, धैकुण्ठ, वृपायर्स, अनादिमध्यनिधन, धनञ्जय, शुचिश्व, पृश्नितेज, निजजय, अमृतेशय, सनावन, विधाम, तुपित, महातत्त्व, लोकनाथ, पद्मनाभ, विरिश्चि, बहुरूप, अक्षय, अक्षर, हव्यभुज, खण्डपरशु, शक, मुअकेश, हंस, महादक्षिण, हृषीकेश, सूक्ष्म, महानियमधर, विरज, लोकप्रतिष्ट, अरूप, अग्रज, धर्मज, धर्मनाभ, गभस्तिनाम, शतक्रतुनाम, चन्द्ररथ, सूर्यतेज, समुद्रवास, अज, सहस्रशिर, सहस्रपाद, अधोमुख, महापुरुप, पुरुषोत्तम, सहस्रबाहु, सहस्रमूर्ति, सहस्रात्य, सहस्रसमव । आपको नमस्कार है। आपको सहस्रसत्व रहसे हैं। हे पुष्पहास, चरम | आप ही वौषट् है एव आपको ही वपद् कहते हैं। आपही अप्रय, यज्ञों मे प्राशिता (भोक्ता) सहस्रधार, भू, मुघ एव स्व है। आपदी वेदवेद्य, प्राशय, ब्राह्मणप्रिय, द्यौ, मातरिश्वा, धर्म, होता, पोता, मन्ता, नेता

अग्रघ विश्वधाम्ना त्वमेव दिग्भिः सुभाण्ड

इज्योऽसि सुमेधोऽसि समिधस्त्वमेव मतिर गतिर्

दाता त्वमसि । मोक्षोऽसि योगोऽसि । सृजसि ।

धाता परमयज्ञोऽसि सोमोऽसि दीक्षितोसि दक्षि-

णासि विश्वमसि । स्थविर हिरण्यनाभ नारायण

त्रिनयन आदित्यवर्ण आदित्यतेजः महापुस्प [25]

पुरुषोत्तम आदिदेव सुविक्रम प्रभाकर

शभो स्वयंभो भूतादि. महाभूतोऽसि विश्वभूत

विश्वं त्वमेव विश्वगोप्ताऽसि पवित्रमसि विश्वभव

ऊर्चकर्म अमृत दिवस्पते वाचस्पते घृताचें

अनन्तकर्म वश प्राग्यंश विश्वपास्त्वमेय [30]

वरार्थिना वरदोऽसि त्वम् ।

चतुर्भिच चतुर्भिश्च द्वाम्या पञ्चभिरेव च ।

हूयते च पुनस्या तुभ्य होत्रात्मने नमः ॥ १

इति श्रीवामनपुराणे सरोमाहात्म्ये पश्चमोऽध्याय ॥२॥