वामन महा पुराण
सुकेशि वृत्तान्त के अन्तर्गत नरकप्रद कर्मों का वर्णन, कृतघ्न र्निन्दा के प्रसङ्ग में अपने अपने घर्गो में पदार्थो की प्रधानता का वर्णन, कृतघ्न निन्दा
मुकेशिरुवाच ।
कर्मणा नरकानेवान् केन गच्छन्ति वै कथम् ।
एतद् वदन्तु विप्रेन्द्राः परं कौतूहलं मम ॥ १
ऋपय ऊचुः।
फर्मणा येन येनेह यान्ति शालमटकट ।
स्वकर्मफलमोगार्थ नरकान् मे शृणुप्प वान् || २
वेददेवद्विजातीनां यैनिन्दा सवतं कृता ।
ये पुराणेविहामार्यान् नाभिनन्दन्ति पापिनः ॥ ३
गुरुनिन्दाकरा ये च मसगिनकराच ये ।
दातुनिवारका ये च तेषु ते निपतन्ति हि ॥ ४
मुहृदम्पतिमोदर्यस्वामिभृत्यपितामुतान् ।
याज्योपाध्याययोर्येच कृतो मेदोऽधर्मियः ॥ ५
तदनन्तर पश्रम नरफ को कालचफ पहते हैं। अप्र- दिष्ठ नामक नरक प धीर पटीयन्त्र सप्तम है। (५) नरकमेष्ठ असिपत्ररन नामक पाठयों नरक पहचर हजार योजन विस्तृत पहा जाता है। (५५)
नरें पताम्म, दशयों फूटशाल्मलि, एकादरा कर- . पत्र और पारहयों नररू श्वानमोजन है।
तदनन्तर प्रमश संदेश, सहपिण्ड, परम्मसिाना, भयंकर भार नदी, कृमिभोजन और अट्ठारह को घोर येतरणी नदी यहा जाता है। (५७)
सदनन्तर शोणितपूयमोजन, शुरामधार, निशिनचका वथा संशोषण नामक अन्त रहित नरक है । है मुसी। सुमसे इन नरकों का वर्णन किया गया। (१८)
श्रीवामनपुराण में ग्वारहवाँ अध्याय समाप्त ॥११॥
मुकेशी ने कहा- पिमेन्द्रगा! आप लोग यह बनता कि इन नाफों में मनुष्य किस कर्म मे और कैसे जाने है इस विषय में मुरे अत्या कौतूहल है। (१)
ऋपियों ने कहा- लाटपट! (समस ) अपने कर्मफल भोग करने के लिये जिन कर्मों में मनुष्य इन नरों में जाते है हमसे सुनो।
वेद, रेषता एवं द्विजातियों सतत निन्दा करने वाले, पुराण एवं इतिहास के अर्यों का अभिनन्दन न करने वाले, गुरुषों के निदक, पों में विघ्न गलनेवारे और दामा को रोपने पाले पापी एन नरकों में गिरने हैं। (३-५)
मुरार दम्पति, सहोदर प्रभु साप, पिता-पुत्र, प्पे पाम्योपाध्याय में परापर भेद पा प्रनेपाने, अपम पतितपा को अपम म्यटि एसोन्या देर पुनः
कन्यामेकस्य दत्वा च ददत्यन्यस्य येऽधमाः ।
करपत्रेण पाव्यन्ते ते द्विधा यमकिंकरैः ॥ ६
परोपतापजनकाश्चन्दनोशीरहारिणः ।
पालन्यजनहारः करम्भसिकताश्रिताः ॥ ७
निमन्वितोऽन्यतो भुङ्क्त श्राद्धे दैवे सपैतृके ।
स विधा कृष्यते मूढस्तीक्ष्णतुण्डैः सगोत्तमैः ॥ ८
मर्माणि यस्तु साधूनां तुदन वाग्भिनिकन्तति ।
तस्योपरि तुदन्तस्तु तुण्डैस्तिष्ठन्ति पत्रिणः ।। ९
यः करोति च पैशुन्यं साधूनामन्यथामति ।
वज्रतुण्डनखा जिह्वामाकर्षन्तेऽस्य घायसाः ।।१०
मातापितृगुरूणां च येऽवज्ञा चक्रुरुद्धताः ।
मज्जन्ते पूयविण्मूत्रे त्वप्रतिष्ठे ह्यधोमुखाः ॥ ११
देवताऽतिथिभूतेषु भृत्येवम्यागतेषु च ।
अभुक्तवत्सु येऽश्नन्ति पालपित्रग्निमात्षु ॥ १२
दुष्टाहक्पूयनिर्यासं भुखते त्यधमा इमे।
सूचीमुखाय जायन्ते क्षुधा गिरिविग्रहाः ॥ १३
एकपड्क्त्युपविष्टानां विषम भोजयन्ति ये
विड्भोजनं राक्षसेन्द्र नरकं ते व्रजन्ति च ॥ १४
एकसार्थप्रयात ये पश्यन्तयार्थिनं नराः।
असंविभज्य भुञ्जन्ति ते यान्ति श्लेष्मभोजनम् ॥ १५
गोब्राह्मणाग्नयः स्पृष्टा यरुच्छिष्टैः क्षपाचर ।
क्षिप्यन्ते हि करास्तेषां तमकुम्भे सुदारुणे ॥१६
सूर्येन्दुवारका दृष्टा यैरुच्छिष्टैश्च कामतः ।
तेपा नेत्रगतो चह्निर्धम्यते यमकिंकरः ॥१७
मित्रजायाथ जननी ज्येष्ठो भ्राता पिता स्वसा ।
जामयो गुरवो वृद्धा यैः संस्पृष्टाः पदा नृमिः ।। १८
यद्धाड्मयस्ते निगडैलोहर्वह्निप्रवापितैः ।
क्षिप्यन्ते रौरवे घोरे ह्याजानुपरिदाहिनः ।। १९
पायसं कृशरं मांसं वृथा मुक्तानि पैनरैः
तेपामयोगुडास्तमाः क्षिप्यन्ते वदने ताः ॥२०
दूसरे को देते हैं वे यम दूतों द्वारा करपत्र (आरे) से दो टुकड़ों में चीरे जाते हैं। (५-६)
दूसरे को सताप देनेवाले, चन्दन और उशीर (सस) के हरणकर्ता और बालों से बने पखों अर्थात् चवरों के हरणात करम्भसिकता नामक नरक में जाते हैं। (७)
देव या पैतृक श्राद्ध में निमन्त्रित होकर अन्यन भोजन करने वाले मूढ को तीक्ष्ण चोंच वाले बड़े-बड़े पक्षी दो टुकड़े करते हैं।
वचनों के द्वारा चोट करते हुये जो सजनों के मों को फाटता है उसके ऊपर चोच द्वारा प्रहार करते हुये पक्षी बैठे रहते है।
दुष्टयुद्धियुक्त जो मनुष्य साधुओं की पिशुनना करता है उसकी जिह्वा को पतुल्य चोंच और नस वाले कौए खीचते है। (१०)
माता, पिता एवं गुर की अपज्ञा करने वाले उस्त पुरुष पूय, विष्ठा एवं मूत्र से पूर्ण अप्रतिष्ठ नामक नरक में अधोमुस अवस्था में डूयते हैं। (११)
देषता, अतिथि, अन्य प्राणी, भृत्य, अभ्यागत, पालक, पिता, अग्नि एवं माताओं को बिना खिलाये सानेवाले अधम पुरुष पर्यततुल्य शरीर एवं सूची सदृश मुख से युक्त होकर
क्षुधात रहते हुये दूषित रक्त एवं पीय का निर्यास (रस) भक्षण करते हैं। (१२-१३)
हे राक्षसेन्द्र । एक ही पक्ति में बैठे हुये लोगों को जो समान रूप से भोजन नहीं कराते वे विड्भोजन नामक नरक मे जाते हैं। (१४)
एक साथ चलनेवाल किसी इच्छुक को देखते हुये भी विना बाँटे भोजन करने वाले शेज्मभोजन नामक (नरक) मे जाते हैं। (१५)
हे राक्षस । उच्छिष्टावस्था में गाय, ब्राह्मण और अग्नि को स्पर्श करने वालों के हाथ भयंर तप्तकुम्भ में डाले (१६)
उच्चियावस्था मे स्वेच्छा से सूर्य, चन्द्र और नक्षन को देखने वालों के नेनों मे यमदूत अग्नि जलाते हैं। (१७)
मित्रपत्नी, जननी, ज्येष्टधाता, पिता, बहन, पुत्री, गुरु और वृद्धों को पैर से छूनेवाले मनुष्यों के पैर बहिन- जलते हुए दोहनिगड से घाँधकर उन्हें रोरप नरक में डाय जाता है जहाँ वे जानुपर्यन्त जलमे रहते हैं। (१८-१६)
पायस, फशर एप मास का वृथा (देवादि को यिना अर्पित किये हुए) भोजन करने वालों के मुख में अद्भुत सात लौहपिण्ड ह्सा जाता है। (२०)
गुरुदेव द्विजातीनां वेदाना च नराधमैः ।
निन्दा निशामिता यैस्तु पापानामिति कुवताम् ॥ २१
तेपा लोहमयाः कीला यह्निवर्णाः पुनः पुनः ।
श्रयणेषु निखन्यन्ते धर्मरानस्य किंकरैः ॥ २२
प्रपादेवकुलारामान् विप्रवेश्मसभामठान् ।
कूपवापीवडागाच भक्त्वा विध्वसयन्ति ये ।। २३
तेपा विलपता चर्म देहत क्रियते पृथक् ।
कतिकाभिः सुतीक्ष्णाभिः सुरौर्यमकिंकरः ॥ २४
गोब्राह्मणामग्नि च ये चै मेहन्ति मानवाः ।
तेपां गुदेन चान्त्राणि पिनि कृन्तन्ति वायसा. ॥ २५
सपोपणपरो यस्तु परित्यजति मानव' ।
पुत्रभृत्यकलत्रादिवन्धुवर्गमकिञ्चनम् ।।
दुर्भिक्ष सम्रमे चापि स श्वमोज्ये निपात्यते ॥२६
शरणागत ये त्यजन्ति ये च बन्धनपालकाः ।
पतन्ति यन्त्रपीडे ते ताड्यमानास्तु किंकरः ॥ २७
क्लेशयन्ति हि पिप्रादीन् ये द्यकर्मसु पापिनः ।
ते पिण्यन्ते शिलापेपे शोष्यन्तेऽपि च शोपकैः ॥ २८
न्यासापहारिणः पापा वध्यन्ते निगडैरपि।।
क्षुत्क्षामा. शुष्कताल्योष्ठा पात्यन्ते वृश्चिकाशने ॥ २९
पर्वमैथुनिनः पापा. परदाररताच ये।
ते यहितमा कूटाग्रामालिङ्गन्ते च शाल्मलीम् ।। ३०
उपाध्यायमध कृत्य पैरधीत द्विजाधमः।
तेपामध्यापको यश्च स शिला शिरसा बहेत् ॥ ३१
मूत्रश्लेष्मपुरीपाणि यैरुत्सृष्टानि वारिणि ।
ते पात्यन्ते च पिण्मूत्रे दुर्गन्धे पूयपूरिते {{ ३२
श्राद्धातिथेयमन्योन्य यैर्युक्त भुवि मानः ।
परस्पर भक्षयन्ते मासानि स्यानि यालिशाः ।। ३३
वेदवह्निगुस्त्यागी भार्यापित्रोस्तथैव च ।
गिरिशृङ्गादयःपात पात्यन्ते यमकिंकरैः ।। ३४
पुन पतयो ये च कन्याविध्यसकाच ये ।
पापियों द्वारा की गई गुरु, देवता, ब्राह्मण और वेदों की निन्दा को सुनने वाले नीच मनुष्यों के कानों में धर्मराज के किंकर अग्निवर्ण रोहे की कीलें बार-बार ठोंक्ते हैं। (२१-२२)
प्रपा (प्याऊ),देवमन्दिर, उद्यान, ब्राह्मणगृह,समा, मठ, कूप, वापी (यावली) एव तडाग को तोड़कर नष्ट करनेवाले मनुष्यों के विलाप करते रहने पर भयकर यमकिंकर सुतीक्ष्ण छुरिकाओं के द्वारा उनको देह से धर्म को पृथक् करते है। (२३-२४)
गाय, ब्राह्मण, सूर्य और अग्नि के सम्मुख मल-मूत्रादि का उत्सर्ग करने वालों की गुदा से कौए उनकी आतों को नोच-नोंच कर काटते हैं। (२५)
'दुर्भिक्ष एव विप्लय के समय अञ्चिन पुत्र, भृत्य एवं फलादि बन्धुवर्ग को छोड़कर आरमपोषण करनेवाला मनुष्य श्वभोजन नामक नरक मे डाला जाता है। (२६)
शरणागत व्यक्ति का परित्याग करनेवाले तथा मन्धन पालक (कारागार-रक्षक) मनुष्य यमदूतों के द्वारा ताड़ित होते हुये यन्त्र पीड नामक नरक में गिरते हैं। (२७)
अश्मों में ब्राह्मणों को क्लेश देने वाले पापी मनुष्य शिलाओं पर पीसे जाते है तथा अग्नि द्वारा शोपित किये (२८)
न्यास का अपहरण करनेवाले पापियों को निगडबद्ध पर क्षुधाक्षीण एच शुष्क ताल्योष्ठ अवस्था में वृश्चिकाशन नामक नरक में गिराया जाता है। (२६)
पर्व मे मैथुन करनेवाले तथा परस्नीरत पापियों को यद्दिन तप्त कीरों वाले शाल्मलि का आलिङ्गन करना पड़ता है । (३०)
उपाध्याय को स्वय की अपेक्षा निम्नासन पर बिठाकर अध्ययन करनेवाने अधम द्विजों एव उनके अध्यापकों को शिरपर शिला वहन करनी पड़ती है। (३१)
जल मे मूल, श्लेष्मा (कफ) एवमल कात्यागकरने वालों को दुन्धि युक्त विष्टा, और पीब से पूर्ण विष्मून नामक नरक मे गिराया जाता है। (३२)
इस ससार में श्राद्ध के अवसर पर अतिथि के निमित्त प्रस्तुत पदार्थ को परस्पर भक्षण करने वाले मूखों को परलोक में एक दूसरे का मास साना पड़ता है। (३३)
वेद, अग्नि, गुरु, भार्या, पिता एवं माता का त्याग करने वालों को यमदूत गिरिशिखर पर से नीचे जाते हैं।
विघया से विवाद करनेवालों, अविवाहित कन्या को
तद्गर्भयामुग यश कुमीन्मक्षेत्पिपीलिकाः ॥ ३५
चाण्डालादन्त्यजाद्वापि प्रतिगृह्णाति दक्षिणाम् ।
याजको यजमानच सोऽश्मान्तः स्थूलकीटकः ॥ ३६
पृष्ठमांसाशिनो मूढास्तथैवोत्कोचजीविनः ।
क्षिप्यन्ते वृकमक्षे ते नरके रजनीचर ।। ३७
स्वर्णस्तेयी च ब्रह्माघ्नः सुरापो गुस्तल्पगः ।
तया गोभूमिहर्तारो गोस्त्रीयालहनाश्च ये ॥३८
एते नरा द्विजा ये च गोपु विकयिणस्तथा ।
सोमविक्रयिणो ये च वेदविक्रयिणस्तथा ।। ३९
टसम्यास्त्वशौचाच नित्यनैमित्तनाशकाः।
कूटसाक्ष्यप्रदा ये च ते महारोखे स्थिताः ।। ४०
दशवर्पसहस्राणि तावत् तामिस्रके स्थिताः ।
सापञ्चैवान्धतामिस्र असिपत्रवने सतः ॥ ४१
तावच्चैव घटीयन्ये ताकुम्मे ततः परम् ।
प्रपातो भवते तेपां पैरिदं दुष्कृतं कृतम् ॥ ४२
ये त्वते नरका रौद्रा रौरवाद्यास्तवोदिताः ।
ते सर्वे क्रमशः प्रोक्ताः कृतघ्ने लोकनिन्दिते ॥ ४३
यथा सुराणां प्रवरो जनार्दनो
यथा गिरीणामपि शैशिराद्रिः ।
यथायुधानां प्रवरं सुदर्शन
यथा खगानां नितातनूजः ।
महोरगाणां प्रबरोऽप्यनन्तो
यथा च भूतेषु मही प्रधाना ॥ ४४
नदीपु गङ्गा जलजेपु पद्म
सुरारिमुख्येषु हराघ्रिभक्तः ।
क्षेत्रेषु यद्वत्कुरुजङ्गलं परं
तीर्थेषु यद्वत् प्रवरं पृथूदकम् ॥ ४५
सरस्सु चैवोत्तरमानसं यथा
यनेषु पुण्येपु हि नन्दनं यथा ।
लोपु यद्वत्सदनं विरिश्चः
सत्यं यथा धर्मविधिनियासु ॥ ४६
यथाऽश्वमेधः प्रवरः ऋतूनां
पुत्रो यथा स्पर्शवतां वरिष्ठः ।
तपोधनानामपि कुम्भयोनिः
श्रुतिर्वरा यदिहागमेषु ॥४७
दूपित करनेवालों एवं उक्त प्रकार से उत्पन्न व्यक्तियों की सन्तान के यहाँ भाद्ध में भोजन करने वालों को कृमि तथा पिपीलिरा का भक्षण करना पड़ता है। (३५)
पाण्डाल और अन्त्यज से दक्षिणा रेनेवाले याजकों एवं उनके यजमानों को पत्यरों में रहनेवाला स्थूल यीट पनना पड़ता है। (३६)
हे रजनीचर । धुगलसोरों एवं घूससोरों को कमक्ष नामक नरक में डाला जाता है। (३७)
सुवर्णचोर, माग का हत्याकारी, मधप, गुरुपत्नीगामी, गाय, तथा भूमि की पोरी करने वाले एवं श्री तथा याटक के मारने पाले मनुष्यों तथा गो, सोम प्यं वेद का विश्य फरने पाले, फूटसभ्य तथा शौचाचारपरित्यागी, नित्यने. मित्तिरूपों के नाशक, फूट साश्य देनेयाने द्विजों को महारष नामसमरक में निवास करना पड़ता है। (३८-४२)
उपर्युक्त प्रसार के पापियों को दस हजार पर्ष तामिस नरक में पया एतने ही यों तक अन्धतामिस और असिपचपन नामक नरक में रहने के उपरान्त-उतने ही वर्षों तक घटीयन्त्र और तप्तकुम्भ नामक नरकों में रहना पड़ता है। (४१-४२)
जिन भयर रोरय आदि नरकों का वर्णन तुमसे किया गया है वे सभी लोक निन्दित कृतघ्नों को पारी-बारी से प्राप्त होते हैं। (४३)
जैसे देवताओं मे जनादेन, पर्वतों में हिमालय, अखों में सुदर्शन, पक्षियों में गरुड, महान् सपों में अनन्त नाग तथा भूतों में पृथ्वी श्रेष्ठ हैं। (४४)
नदियों मगंगा, जलजों में क्मल, देव शत्रु-दैत्यों में महादेय के चरणों या मक्त, क्षेत्रों में जिस प्रकार पुरुजांगल, तीर्थों में पृथूदक प्रधान है। (४५)
जलाशयों में उत्तरमानस, पवित्र धनों में नन्दन फानन, लोगों में ब्रह्मलोक, धर्म-कार्यों में सत्यप्रधान है सया जैसे- (४६)
यनों में अश्वमेघ, स्पर्श करने योग्य पदार्थों में पुर, पपस्थियों में अगस्त्य, भागम शास्त्रों में वेद श्रेष्ठ है। (४७)
मुरयः पुराणेपु यथैव मात्स्यः
स्वायंभुवोक्तिस्त्वपि संहितासु ।
मनुः स्मृतीनां प्रवरो यथैव
तिथीपु दर्शो विपुवेषु दानम् ॥ ४८
तेजस्विनां यदिहार्क उक्तो
मक्षेपु चन्द्रो जलधिईदेषु ।
मवान् यथा राक्षससत्तमेपु
पाशेपु नागस्तिमितेषु बन्धः ॥ ४९
धान्येपु शालिद्विपदेपु विप्रः
चतुष्पदे गौः श्वपदा मृगेन्द्रः ।
पुष्पेषु जाती नगरेपु काञ्ची
नारीपु रम्भा श्रमिणां गृहस्थः ॥ ५०
कुशस्थली श्रेष्ठतमा पुरेषु
देशेषु सर्वेषु च मध्यदेशः ।
फलेषु चूतो मुकुलेष्वशोकः
सौंपधीनां प्रवरा च पथ्या ॥५१
मूलेषु कन्दः प्रवरो यथोक्तो
व्याधिष्मजीणे क्षणदाचरेन्द्र ।
श्वेतेषु दुग्धं प्रवरं यथैव
कासिकं प्रावरणेषु यद्वत् ॥ ५२
कलासु मुख्या गणितज्ञता च
विज्ञानमुरयेषु यथेन्द्रजालम् ।
शाकेषु मुरया त्वपि काकमाची
रसेषु मुरयं लवणं यथैव ॥ ५३
तुङ्गेषु तालो नलिनीषु पम्पा
वनौकसेप्येव च ऋक्षराजः।
महीरुहेश्वेव यथा बटश्च
यथा हरो ज्ञानवतां वरिष्ठः॥ ५४
यथा सतीनां हिमवत्सुता हि
यथार्जुनीनां कपिला वरिष्ठा ।
यथा वृपाणामपि नीलवर्णों
ययैव सर्वेष्वपि दुःसहेपु।
दुर्गेपु रौद्रेषु निशाचरेश
नृपातनं वैतरणी प्रधाना॥ ५५
जैसे पुराणों मे मत्स्यपुराण, सहिताओं में स्वयम्भू के द्वारा कथित सहिता, स्मृतियों मे मनुस्मृति, तिथियों में अमावस्था और विपुवों (मेप और तुला की समान्ति) के अवसर पर किया गया दान श्रेष्ठ होता है। (४८)
तथा जैसे तेजस्वियों में सूर्य, नक्षत्रों में चन्द्रमा, जलाशयों में समुद्र, राक्षसश्रेष्ठों में आप और निश्चेष्ट करनेवाले पागों में नागपाश श्रेष्ठ है। (४६)
एच जैसे धानों में शालि, द्विपदों में ब्राह्मण, चतुष्पदों मे गाय, जगली जानवरों में सिंह, फूलों में जाती, नगरों में पानी, नारियों में एभा और आमियों में गृहस्थ (५०)
आम, मुकुलों में अशोक, समस्त जड़ी बूटियों में पध्या सर्व श्रेष्ठ है। (५१)
हे निशाचर | जैसे मूरों में कन्द, रोगों में अजीर्ण, श्वेत वस्तुओं मे दुग्ध और वस्नों में रूई के कपड़े श्रेष्ठ है। (तथा जैसे ) (५२)
कराओं में गणितज्ञता, विज्ञान मे इन्द्रजाल, शाकों में काफमाची. रसों में लवण, ऊँची वस्तुओं में ताल, कमल सरोवरों में पम्पा, यनौकसों में ऋक्षराज, वृक्षों में पट, शानियों में महादेव परिष्ठ है। (एव) हे निशाचर। जैसे- (५३-५४)
सतियों में पार्वती, गायों में कपिला, बैलों में नील रण का बैल, सभी दुःसह कठिन एष भयकर नरकों में घेतरणी सर्वप्रधान है। उसी प्रकार हे निशाचरेन्द्र ! पापियों में
चित्रोत्पला वै तमसा करमोदा पिशाचिका ।
तथान्या पिप्पलश्रोणी विपाशा वजुलावती ।। २६
सत्सन्तजा शुकिमती मञ्जिष्ठा कृचिमा वसुः ।
ऋक्षपादप्रसूता च तथान्या बलवाहिनी ।। २७
शिवा पयोष्णी निर्विघ्या तापी सनिपधावती ।
वेणा चैतरणी चैव सिनीवाहुः कुमुदती ॥ २८
तोया चैव महागौरी दुर्गन्धा वाशिला तथा ।
विन्ध्यपादप्रसूताच नधः पुण्यजलाः शुभा. ॥ २९
गोदावरी भीमरथी कृष्णा घेणा सरस्वती ।
तुङ्गभद्रा सुप्रयोगा पाह्या कावेरिरेव च ॥३०
दुग्धोदा नलिनी रेवा वारिसेना क्लम्बना ।
एतास्त्वपि महानयः सह्यपादविनिर्गताः ॥ ३१
कृतमाला ताम्रपर्णी वञ्जुला चोत्पलावती।
मिनी चव मुदामा च शुक्तिमत्प्रभवास्त्विमाः ।। ३२
मर्वाः पुण्याः सरस्वत्यः पापप्रशमनास्तया ।
जगतो मावरः मर्गः सर्वाः सागरयोपितः ॥३३
अन्याः सहस्रचार क्षुद्रनद्यो हि राक्षस ।
सदाकालवहायान्याः प्राट्वालवहास्तथा ।
उदङ्मध्योद्भवा देशाः पिरन्ति स्वेच्छया शुभाः ॥ ३४
मत्स्याः कुशट्टाः कुणिकुण्डलाश्च
पाश्चालकाश्या: सह कोसलभिः।।
वृकाः शबरकौवीराः सभूलिङ्गा जनास्त्विमे ।
शकाचैव समशका मध्यदेश्या जनास्त्विमे ॥ ३६
वाहीका वाटधानाश्च आभीराः कालतोयकाः ।
अपरान्तास्तथा शुद्राः पलवाश्च सखेटकाः ।। ३७
गान्धारा यवनाथै सिन्धुसौवीरमद्रकाः ।
शातद्रवा ललित्थाश्च पारावतसम्पका. ॥ ३८
माठरोदकधाराश्च कैकेया दशमास्तथा ।
क्षत्रियाः प्रातिपैश्याच वैश्यशूद्रकुलानि च ॥ ३९
काम्बोजा दरदाथैव यरा ह्यङ्गलौकिकाः ।
चीनाश्चैव तुपाराश्च बहुधा बाह्यतोदराः ॥ ४०
आत्रेयाः सभरद्वाजाः प्रस्थलाश्च दशेरकाः ।
लम्पकाम्तावकारामा. शूलिकास्तङ्गणैः सह ॥ ४१
औरसाश्चालिमद्राश्च किरातानां च जातयः ।
तामसाः क्रममामाश्च सुपार्धाः पुण्डकारतया ॥ ४२
बुलूताः कुहुका ऊर्णास्तूणीपादाः सउपयुटाः ।
चिरफूटा, अपपादिया, चित्रोत्पला, तमसा, फरमोदा, पिशाचिग, पिप्पलश्रोगी, विपाशा, यजुलायनी, सत्सन्तजा, सुष्मिती, मशिष्टा, कृत्तिमा, पसु और पल्याहिनी-ये नदियाँ ऋक्ष पर्यंत से निकली है। (२२-२७)
शिवा, पयोष्णी, निर्षिया, तापी, निग्धावती, वेणा, येतरणी, सिनीयाटु, पुमद्वती, तोया, महागौरी, दुग्धा सभा पाशिरा-ये पवित्र जरपाटी फल्यागारिणी नदियाँ विष्यपर्यन से निकरी हुई है। (२८-२६)
गोदायरी, भीमरथी, गा, धेगा, मरम्बनी, तुगभद्रा, मुप्रयोगा, बाधा, फावेरी, दुग्धोदा, नलिनी, रेया, पारिसेना सपा स्टायनान्ये महानदियों समपर्यंत ये पाद से निकली हैं। (३०-३१)
फलमाला, साम्रपर्णी, पंजुटा, परपसायती, सिनी तथा मुदामा-ये नदियों पुतिमान् पर्पत से निम्टी हुई है।(३२)
ये सभी नदियों पवित्र, पापों का प्रश्मन परने पाठी, जगा की मातायें क्या सागर पस्निया है। (२३)
हे राक्षस । इनके अतिरिक्त अन्य सदसों क्षुद्र नदियों भी यहाँ पर है। इनमे कतिपय सदैव प्रवाहित होने पाठी है तथा कतिपय फेवल पर्श काल में प्रवाहित होने वाली है। उत्तर एव मभ्य के देशों के निवासी इन पवित्र नदियों के जल पो स्वेच्छया पान करते हैं। (३४)
मत्स्य, कुशट्ट, फुणि, पुण्डल, पायाल, काशी, कोशल, वृक, शयर, कौवीर, भूलिङ्ग, शक, तथा मशा जातियों पे मनुष्य मध्यदेश में रहत है। (३५-३६)
पालोर, याटधान, आभीर, पारतोयफ, अपरान्त, शुद्ध पहलव, खेटक, गाग्धार, ययन, सिन्धु, सौवीर, मद्रक, शानदय, ललित्य, पारावत, मूषक, माठर, उदम्यार, कैकेय दम, क्षत्रिय, प्रातिश्य,तथा पैश्य यशद्रों के कुल, कम्योज, परद, पर्यर, अगलौकिक, पीन, तुपार, पहुध, यानतोदर, आग्रेय, भरद्वाज, प्रस्थल, दशेरक, एम्पक, सायक, राम, शुटिफ, वगण, औरस, अस्मिद्र, किरातों की जातियों, सामस, प्रममास, सुपाय, पुण्डक, कुल्त, पुर, अर्ण,
माण्डन्या मालवीयाश्च उत्तरापथवामिनः ॥ ४३
अङ्गा बना मुद्गरवास्त्वन्तगिरिनहिगिराः ।
तथा प्रवङ्गा वाङ्गेया मासादा बलदन्तिकाः ॥ ४४
ब्रह्मोचरा प्राविजया मार्गयाः केशवरा.।
प्राग्ज्योतिपाश्च शूद्राथ विदेहास्ताम्रलिप्तका. ॥ ४५
माला मगधगोनन्दा, प्राच्या जनपदास्त्विमे ।
पुण्डाथ केरलाथैव चौडाः कुल्याश्च राक्षम ॥ ४६
जातुपा मूपिकादाच कुमारादा महाशकाः ।
महाराष्ट्रा माहिपिकाः कालिङ्गाश्चैव सर्वशः॥ ४७
आभीरा. सह नैपीका आरण्या. शराश्च ये।
वलिन्ध्या किध्यमौलेया वैदर्भा दण्डकै. मह ॥ ४८
पौरिकाः सौशिकायैव अश्मका भोगवईनाः।
वैपिकाः कुन्दला अन्धा उद्भिदा नलकारकाः ।
दाक्षिणात्या जनपदास्त्विमे शालकटङ्कट ॥ ४९
सूर्पारका कारिपना दुर्गास्तालीकट. सह ।
पुलीया. ससिनीलाश्च तापसास्तामसास्तथा ॥ ५०
कारस्करास्तु रमिनो नासिक्यान्तरनर्मदाः ।
भारकच्छाः समाहेयाः सह सारस्वतैरपि ॥ ५१
वात्सेयाश्च सुराष्ट्राच आवन्त्याचार्बुदैः सह ।
इत्येते पश्चिमामाशां स्थिता जानपदा जनाः ॥ ५२
कारुपाश्चैकलव्याश्च मेकलाश्चोत्कलैः सह ।
उत्तमर्णा दशार्णाश्च भोजा. किंकवरैः सह ।। ५३
तोशला कोशलाश्चैत्र पुराश्चल्लिकास्तथा ।
तुस्सास्तुम्बराश्चैव वहनाः नैपधैः सह ।। ५४
अनूपास्तुण्डिकेराश्च वीतहोत्रास्त्वान्तयः ।
सुकेशे पिन्ध्यमूलस्थास्त्विमे जनपदा. स्मृताः ॥ ५५
अथो देशान् प्रवक्ष्याम. पर्वताश्रपिणस्तु ये ।
निराहारा हंसमार्गाः कुपथास्तङ्गणाः खशाः ॥ ५६
कुथप्रावरणाश्चैव ऊर्णाः पुण्याः सहहुकाः ।
त्रिगर्ताश्च किराताश्च तोमराः शिशिराद्रिकाः ।। ५७
इमे तपोक्ता विषया. सुविस्तराद्
द्वीपे कुमारे रजनीचरेश ।
एते देशेषु च देशधर्मान्
संकीर्त्यमानाञ् शृणु तत्त्वतो हि ॥ ५८
इति श्रीवामनपुराणे त्रयोदशोऽध्याय ॥१३॥
तूणीपाद, कुनकुट, माण्डव्य एव मालवीय ये जातियों उत्तरापथ (उत्तराखण्ड) के निवासी है। (३७-१३)
अग, वग, एय मुद्गरय,अन्तगिरि, पहिगिरि, प्रवग,वागेय, मासाद, वलदन्तिक, ब्रह्मोत्तर, प्राविजय, भार्गव, केशवर्वर, प्रागज्योतिष, शूद्र, विदेह, ताम्रलितक, माला, मगध एघ गोनन्द-ये पूर्व के जनपद हैं। (४४-४६.)
हे राक्षस । पुण्डू, केरल, चौड, कुल्य, जातुप, मूपि काद, कुमाराद, महासक, महाराष्ट्र, माहिपिक, कालिंग, आभीर, नैपीक, आरण्य, शबर, बलिन्थ्य, विभ्यमौलेय, वैदर्भ, दण्डक, पौरिक, सौशिक, अश्मक, भोगगर्द्धन, वैपिक, सुन्दल, अन्ध्र, उद्भिद् एव नलकारक-हे शारफटकट । ये दक्षिण के जनपद हैं। (४६ cd-४६)
शूर्पारक, कारिवन, दुर्ग, तालीकट, पुलीय, ससिनील, तापस, तामस, कारस्कर, रमी, नासिक्य, अन्तर, नर्मद, भारकच्छ, माहेय, सारस्वत, वात्सेय, सुराष्ट्र, आवत्य एय आर्बुद ये पश्चिम दिशा में स्थित जनपदों के निवासी हैं। (५०-५२)
कारूप, ऐकलव्य, मेफल, उत्कल, उत्तमर्ण, दशार्ण, भोज, किंवर, तोशल, कोशल, पुर, ऐहिक, तुरम, तुम्बर, वहन, नेपध, अनूप, तुण्डिकेर, वीतहोत्र एव अवन्ती-हे सुकेशी । ये सभी जनपद विध्यपर्वत के मूल मे हैं। (५३-१५)
हम अब पयताश्रित देशों का वर्णन करेंगे ( उनके नाम ये हैं-)। निराहार, हममार्ग, कुपथ, तगण, खश, कुथ प्रावरण, ऊर्ण, पुण्य, हूहुक, त्रिगर्न, किरात, तोमर एव शिशिरादिक। (५६-५७)
हे राक्षस । तुम से कुमारद्वीप के इन देशों का विस्तार से हम लोगों ने वर्णन किया। अब हम इन देशों में वर्तमान देश धर्मों का यथार्थत वर्णन करेंगे। उसे सुनो। (५८)
श्रीवामन पुराण मे तेरहवाँ अध्याय समाप्त ॥१३॥
पापीयसां तद्वदिह कृतमः
सर्वेषु पापेषु निशाचरेन्द्र ।
ब्रह्मागोमादिषु निश्कृतिर्हि
विद्यत नैयास्य तु दुष्टचारिणः ।
न निष्कृतिश्चास्ति कृतमत्तेः
सुहृत्कृतं नाशयतोऽब्दकोटिभिः ॥ ५६
इति श्रीवामनपुराणे द्वादशोऽध्याय ॥ १२॥