देवी की पुनस्स्पति के विषय में प्रश्न, अन्य महिष द्वारा पीडित देवों का विष्णु के समीप, कुरुक्षेत्र निर्माण वर्णन के प्रसङ्ग में सवरण एवं तपती का वृत्तान्त

नारद उवाच।

पुलस्त्य कथ्यतां तावद् देव्या भूया मसुद्भवः ।

महत्कौतूहलं मेऽय विस्तराद् ब्रह्मवित्तम ।। १

पुलस्त्य उवाच।

श्रूयतां कथयिष्यामि भृयोपस्याः संभवं मुने।

शुम्भासुरवधार्थाय लोकानां हितकाम्यया ॥

उछलने लगा। वे भी मृटु तथा कोमल चरणों से भीगे मृग-धर्म के सदृश उसरा मर्दन करने लगी। (४७)

देवी द्वारा मर्दन किया जाता हुआ पर्वताकार पल्यान् पद (महिपामुर) यहीन हो गया। तदनन्तर (देवी ने) शूल से उसका कण्ठ काट दिया। उससे (कटे कठ से) एक सड्गधारी पुरुष निकला। (४८)

उसके निकलते ही (देवी में) उसके हृदय पर चरण से भाघात कर और क्रोध से उसके यालों को पकड़कर श्रेष्ठ तलवार से उसका शिर काट डाला। उस समय दैत्यों की सेना दाहापार करने लगी।

श्रीवामनपुराण में अध्याय समाप्त ॥२१॥

२८

नारद ने कहा-६ प्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ पुलस्त्य! सम्प्रति देवी फी उत्पत्ति मुझसे पुन विस्तार पूर्वक कहिये । मुझे महान कुतूहल है।

चण्ड, मुण्ड, मय, तार और असिलोमा आदि भय से कातराक्ष होकर तथा भवानी के प्रमयों द्वारा प्रताडित होने पर भयार्त होकर पाताल में प्रविष्ट हो गये। (५०)

हे महदें। देवी की जय को देखकर देवगण स्तुतियों के द्वारा सर्वजगत् की आधारभूता, घोरमुसी एवं सुरूपा, नारायणी, कात्यायनी देवी की स्तुति करने लगे। (५१)

शिर के पादमूल में बैठी हुई देवों और सिद्धों द्वारा सस्तूयमान दुर्गा ने कहा कि में अमरों के लिये पुन आविर्भूत होऊँगी। ऐसा यहने के उपरान्त यह दुर्गा अन्तर्धान हो गई। (५२)

२२

पुलस्त्य ने कहा "६ मुने! मुनिये, में लोरहित की कामना से शुम्भामुर के यघहेतु हुई इनकी पुन उत्पत्तिका वर्णन करता हूँ।" (२)

या सा हिमवतः पुत्री भवेनोढा तपोधना।

उमा नाम्ना च तस्याः सा कोशाजातातु कौशिकी ॥३

संभूय विन्ध्यं गत्वा च भूयो भूतगणैर्युता ।

शुम्भं चैव निशुम्भं च वधिष्यति चरायुधैः ॥ ४

नारद उवाच ।

ब्रह्मस्त्वया समाख्याता मृता दक्षात्मजा सती ।

सा जाता हिमवत्पुत्रीत्येवं मे वक्तुमर्हसि ।। ५

यथा च पार्वतीकोशाद समुद्भूता हि कौशिकी ।

यथा हतवती शुम्भ निशुम्भं च महासुरम् ॥ ६

कस्य चेमौ सुतौ वीरौ स्यातौ शुम्भनिशुम्भको।

एतद् विस्तरतः सर्व यथावद् वक्तुमर्हसि ।। ७

पुलस्त्य उवाच ।

एतत्ते कथयिष्यामि पार्वत्याः संभवं सुने ।

शृणुष्वावहितो भूत्वा स्कन्दोत्पत्तिं च शाश्वतीम् ॥ ८

रुद्रः सत्यां प्रणष्टायां ब्रह्मचारियते स्थितः ।

निराश्रयत्वमापन्नस्तपस्तप्तुं व्यवस्थितः ॥ ९

स चासीद् देवसेनानीदैत्यदर्पविनाशनः ।

शिवरूपत्वमास्थाय सैनापत्यं समुत्सृजत् ॥ १०

ततो निराकृता देवाः सेनानायेन शंभुना ।

दानवेन्द्रण विक्रम्य महिपेण पराजिताः ॥ ११

वतो जग्मुः सुरेशानं द्रष्टु चक्रगदाधरम् ।

श्वेतद्वीपे महाहंसं प्रपन्नाः शरणं हरिम् ॥ १२

तानागतान् सुरान् दृष्ट्वा ततः शक्रपुरोगमान् ।

रिहस्य मेघगम्भीरं प्रोवाच पुरुषोत्तमः ॥ १३

किं जितास्त्वसुरेन्द्रेण महिपेण दुरात्मना ।

येन सर्वे समेत्यैवं मम पार्श्वमुपागताः ॥ १४

तद् युष्माकं हितार्थाय यद् वदामि सुरोत्तमाः।

तत्कुरुध्यं जयो येन समाश्रित्य भवेद्धि ।। १५

य एते पिवरो दिव्यास्त्वग्निध्यात्तेवि विश्रुताः ।

अमीपां मानसी कन्या मेना नाम्नास्ति देवताः ॥ १६

शङ्कर ने हिमवान् की जिस तपोधना उमा नामक पुत्री से विवाह किया था उन्हीं के कोश से वह कौशिकी उत्पन्न हुई। (३)

उत्पन्न होने के उपरान्त भूतगणों के साथ पुन विन्ध्यपर्वत पर जाकर श्रेष्ठ आयुधों से वे शुम्भ और निशुम्भ का वध करेंगी। (४)

नारद ने कहा "हे ब्रह्मन् । आपने यह कहा था कि दक्षपुत्री सती मर गई वे पुन (कैसे) हिमवान् की पुत्री हुई यह मुझसे कहिये।

पार्वती के कोश से जिस प्रकार कौशिकी उत्पन्न हुई, तथा उन्होंने शुम्भ और निशुम्भ नामक महान असुरों का जिस प्रकार वध किया तथा ये शुम्भ और निशुम्भ नामक प्रसिद्ध वीर किसके पुत्र थे-इन सभी को विस्तार पूर्वक ठीक ठीक बतलाइये। (६-७)

पुलस्त्य ने कहा-हे मुने मैं आपसे पार्वती की इस उत्पत्ति का वर्णन करता हूँ। आप सावधान होकर स्कन्द की शाश्वत उत्पत्ति को सुने । (८)

सती के नष्ट हो जाने पर ब्रह्मचारिखत मे स्थित तथा आश्रयहीन रुद्र तप करने लगे। (६)

दैत्यों के दर्प का नाश करने वाले वे देवताओं के

सेनापति थे। अब उन्होंने शिव (मंगल) स्वरूप धारण कर सेनापतित्व का परित्याग कर दिया। (१०)

तदुपरान्त सेनापति शम्भु से निराकृत (परित्यक्त) देवों

को दानवेन्द्र महिष ने बलपूर्वक आक्रमण कर पराजित कर दिया। (११)

तदनन्तर (वे देवगण) सुरस्वामी महाहंस (परमात्मा) चक्रगदाधर के दर्शनार्थं श्वेतद्वीप मे गये एवं हरि के शरणापन्न हुये। (१२)

तदनन्तर उन इन्द्रादि देवों को आया हुआ देखकर पुरुषोत्तम ने हंसकर मेघ के समान गम्भीर स्वर में कहा- (१३)

क्या आप सभी लोग असुराधिप दुरात्मा महिप से पराजित हो गये हैं जिससे इस प्रकार समवेत होकर मेरे पास आये है। (१४)

हे सुरोत्तमो | आप लोगों के हितार्थ मैं जो कहता उसे करें जिसरा आश्रय करने से आपकी विजय होगी।

हे देवगण | जो ये दिव्य पितर 'अग्निष्वात्त' इस नाम से प्रसिद्ध है उनकी मेना नामक एक मानसी कन्या है। (१६)

तामाराध्य महाविथ्या श्रद्धया परयाऽमराः ।

प्रार्थयध्वं सती मेनां प्रालेयारिहार्थतः ॥ १७

तस्यां सा रूपसंयुक्ता भविष्यति तपम्पिनी ।

दक्षकोपाद् यया मुक्तं मलबजीवितं प्रियम् ॥ १८

सा शंकरात् स्वतेजोऽशं जनयिष्यति यं सुतम् ।

स हनिष्यति दैत्येन्द्रं महिपं सपदानुगम् ।। १९

तस्माद् गच्छत पुण्यं तत् कुरुक्षेत्रं महाफलम् ।

तत्र पृथदके तीर्थे पूज्यन्तां पितरोऽध्ययाः ॥ २०

महातिथ्यां महापुण्ये यदि शत्रुपराभवम् ।

जिहासतात्मन, सर्वे इत्यं वै क्रियतामिति ॥ २१

पुलस्त्य उवाच ।

इत्युक्त्वा वासुदेवेन देवाः शक्रपुरोगमाः।

कृताञ्जलिपुटा भूत्वा पप्रच्छुः परमेश्वरम् ।। २२

देवा ऊचुः।

कोऽयं कुरुक्षेत्र इति यत्र पुण्यं पृथूदकम् ।

उद्भवं तम्य तीर्थस्य भगवान् प्रब्रवीतु नः ॥ २३

केय प्रोक्ता महापुण्या तिथीनामुत्तमा विधिः ।

यस्यां हि पितरो दिव्याः पूज्याऽस्माभिः प्रयत्नतः ।। २४

ततः सुराणां वचनान्मुरारिः कैटभार्दनः ।

कुरुक्षेत्रोद्भवं पुण्यं प्रोक्तवांस्ता तिथीमपि ॥ २५

श्रीभगवानुवाच ।

सोमवंशोद्भवो राजा ऋक्षो नाम महारलः ।

कृतस्यादौ समभवदृक्षात् संवरणोऽभवत् ॥ २६

स च पित्रा निजे राज्ये बाल एवाभिपेचितः ।

पाल्येऽपि धर्मनिरतो मद्भक्तश्च सदाऽभवत् ॥ २७

पुरोहितस्तु तस्यासीद् वसिष्ठो वरुणात्मजः।

स चास्याध्यापयामास साङ्गान् वेदानुदारधीः ।। २८

ततो जगाम चारण्यं त्वनध्याये नृपात्मजः।

सर्वकर्मसु निक्षिप्य वसिष्ठं तपसां निधिम् ।। २९

ततो मृगयाच्यापाद् एकाकी विजनं वनम् ।

चैम्राज स जगामाथ अयोन्मादनमभ्ययात् ॥ ३०

ततस्तु कौतुकाविष्ट. सर्वतकुसुमे बने ।

हे देववृन्द । अत्यन्त प्रद्धा से महातिथि (अमावास्या) मे सती मेना की आराधना कर उससे हिमालय (की पत्नी बनने) के निमित्त प्रार्थना कीजिये । (१७)

उन्हीं (मना) से रूपवती यह तपस्विनी उत्पन्न होगी  जिसने दक्षकोप से अपने प्रिय जीवन को मल के सदृश त्याग दिया था। (१८)

वह शार से स्वतेज के अशस्वरूप जिस पुन को उत्पन्न । करेगी यह दैत्येन्द्र महिष को उसके अनुचरों के साथ मारेगा।

अव आप लोग महाफळपद, पवित्र कुरुक्षेत्र में जाइये। और यहाँ पृयूदक तीर्थ में अन्यय पितरों पा पूजन (२०)

यदि आप सभी लोग अपने शत्रु का परामव घाइते  है तो महातिथि के दिन परम पवित्र तीर्थ में इस प्रकार का कार्य करें। (२१)

पुलस्त्य ने कहा-बासुदेव के ऐसा कहने पर शमादि देवों ने हाय जोदकर परमेश्वर से पूछा। (२२)

देवताओं ने कहा-“यह कुरुक्षेत्र कौन है जहाँ पवित्र पृथूदक तीर्थ है ? आप हमलोगों को उस वीर्य की उत्पत्ति

बतायें। (२३)

"अतिपवित्र कौन तिथि तिथियों में उत्तम कही गई है जिसमें हम प्रयल पूर्वक दिव्य पितरों की पूजा करें।" (२४)

तदुपरान्त कैटभार्दन मुरारि ने देवताओं के कहने पर उनसे कुरुक्षेत्र को पवित्र उत्पत्ति और उस तिथि का वर्णन किया। (२५)

श्रीभगवान् ने कहा-कृत युग के आदि में वृक्ष नामक एक महायलवान राजा सोमवश में उत्पन्न हुआ। ऋक्ष से सवरण की उत्पत्ति हुई। (२६)

पिता ने उसे बाल्यकाल में ही राज्याभिषिक्त कर दिया। यह माल्यावस्था में भी सदा धर्म निरत एवं मेरा भक्त था। (२७)

उदारचेता घरुणपुत्र वसिष्ठ उसके पुरोहित थे। उन्होंने ससे अनों सहित वेदों को पदाया। (२८)

तदनन्तर अनभ्याय होने पर तपोनिधि पसिष्ठ को समी कार्य सौंपकर यह राजपुत्र वन में गया। (२६)

तदनन्तर मृगयासक्त होकर यह एघकी वैधार नामक निर्जन घन में पहुँचा और फिर उन्मादप्रस्त हो गया । (३०)

अविवप्नः सुगन्धस्य समन्ताद् व्यचरद् वनम् ॥ ३१

स वनान्तं च ददृशे फुल्लकोफनदावृतम् ।

कहारपद्मकुमुदैः कमलेन्दीवरैरपि ॥ ३२

तत्र क्रीडन्ति सततमप्सरोऽमरकन्यकाः।

तासां मध्ये ददर्शाथ कन्यां संवरणोऽधिकाम् ॥ ३३

दशनादेव स नृपः काममार्गणपीडितः ।

जातः सा च तमीक्ष्यैव कामवाणातुराऽभवत् ॥ ३४

उभौ तौ पीडितौ मोहं जग्मतुः काममार्गणैः ।

राजा चलासनो भूम्यां निपपात तुरङ्गमात् ॥ ३५

वमभ्येत्य महात्मानो गन्धर्वाः कामरूपिणः ।

सिपिचुरिणाऽभ्येत्य लब्धसंज्ञोऽभवत् क्षणात् ॥३६

सा चाप्सरोभिरुत्पात्य नीता पितृकुल निजम् ।

वाभिरावासिता चापि मधुरैर्वचनाम्मुभिः ।। ३७

स चाप्यारुह्य तुरगं प्रतिष्ठानं पुरोतमम् ।

गवस्तु मेरुशिखरं कामचारी यथाऽमरः॥३८

यदाप्रभृति सा दृष्टा आक्षिणा तपती गिरौ।

वदाप्रभृति नाश्नाति दिवा स्वपिति नो निशि ॥ ३९

ततः सर्वचिदन्यग्रो विदित्वा वरुणात्मजः ।

तपतीतापितं वीरं पार्थिवं तपसां निधिः॥ ४०

समुत्पत्य महायोगी गगनं रविमण्डलम् ।

विवेश देवं तिग्मांशु ददर्श स्यन्दने स्थितम् ॥ ४१

तं दृष्ट्वा भास्करं देवं प्रणमद् द्विजसत्तमः ।

प्रतिप्रणमितश्वासौ भास्करेणाविशद् रथे ॥ ४२

ज्वलज्जटाकलापोऽसौ दिवाकरसमीपगः ।

शोभते वारुणिः श्रीमान् द्वितीय इव भास्करः ॥ ४३

ततः सपूजितोऽर्धाधैर्भास्करेण तपोधनः ।

पृष्टश्चागमने हेतुं प्रत्युवाच दिवाकरम् ॥ ४४

समायातोऽस्मि देवेश याचितुं त्वां महायुते ।

तदुपरान्त सर्वऋतुओं के फुसुमों वाले वन में कौतुका- विष्ट होकर सुगन्धों से अतृप्त होने के कारण चारों ओर विचरण करने लगा। (३१)

उसने फुल्ल कोकनद, कहलार, पद्म, कुमुद, कमल एव इन्दीवरों से आवृत धन को देखा। (३२)

वहाँ अप्सराय एव देव कन्यायें सतत क्रीडा कर रही थीं। सवरण ने उनके मध्य एक अत्यन्त सुन्दरी कन्या को (३३)

देखते ही वह राजा कामवाणों से पीडित हो गया और बह कन्या भी उसे देखते ही कामबाण से आतुर हो गई। (३४)

काम के बाणों से पीडित वे दोनों मूच्छित हो गये। राजा का आसन विचलित हो गया और वह घोड़े से पृथ्वी पर गिर पड़ा। (३५)

इच्छानुसार रूप धारण करने वाले महात्मा गन्धर्व लोग उसके पास जाकर जल से सिञ्चन करने लगे और वह क्षणमात्र में सचेत हो गया। (३६)

अप्सरायें उसे भी उठाकर उसके पिता के गृह में ले गई एव उन्होंने उसे मधुर वचन रूपी जल से आश्वासित (३७)

वह (राजा) भी घोडे परआरूढ होकर श्रेष्ठ प्रतिष्ठान पुर को इस प्रकार चला गया जैसे कामचारी देवता मेरु-शिखर पर (३८)

ऋक्ष-चनय सवरण ने जब से नेत्रों द्वारा देवकन्या तपती को पर्वत पर देखा, तब से वह दिन में न तो भोजन करता था और न रात्रि मे सोता था। (३६)

तदनन्तर सवज्ञ, अव्यग्र,तपोनिधि एव महायोगी वरुण- पुत्र वसिष्ठ उस वीर राजाको तपती के कारण सन्तप्त जान कर आकाश मे ऊपर उठे एव सूर्य मण्डल मे प्रवेश कर रथ पर बैठे हुये सूर्य देव को देखा। (४०-४१)

द्विजोत्तम वसिष्ठ ने सूर्यदेव को देख कर प्रणाम किया एवं सूर्य द्वारा प्रविप्रणाम किये जाने के उपरान्त रथ में प्रवेश किया। (४२)

भास्कर के समीप स्थित प्रज्वलित जटाकलाप युक्त वरण- पुत्र द्वितीय भास्कर के सदृश सुशोभित हुये। (४३)

तदनन्तर भास्कर द्वारा अर्यादि से सम्पूजित होने के पश्चान् आगमन का कारण पूछे जाने पर तपोधन ने दिवाकर (४४)

"हे महायुतिमान् देवेश ! मैं संवरण के लिए आप से

सुतां संवरणस्याथें तस्य त्वं दातुमर्हसि ।। ४५

ततो चमिठाय दिवाकरण

निवेदिता सा तपती तनूजा ।

गृहागवाय द्विजपुंगवाय

राज्ञोऽर्थतः संवरणस्य देवाः ॥ ४६

सावित्रिमादाय ततो वसिष्ठः

स्वमाश्रम पुण्यमुपाजगाम।

सा चापि संस्मृत्य नृपात्मजं तं

कृताञ्जलिरुणिमाह देवी ॥ ४७

तपत्युवाच ।

ब्रह्मन् मया खेदमुपेत्य यो हि

सहाप्सरोभिः परिचारिकाभिः ।

दृष्टो घरण्येऽमरगतुल्यो

नृपात्मजो लक्षणतोऽभिजाने ।। ४८

पादौ शभौ चक्रगदासिचिवो

जो तथोर करिहस्ततुल्यौ।

कटिस्तथा सिंहकटियथैव

क्षामं च मध्यं विषलीनियद्धम् ।। ४९

ग्रीवाऽस्य शलाकृतिमादधाति

भुजौ च पीनौ कठिनौ सुदीपों ।

हस्तौ तथा पद्मदलोद्भवाडौ

छत्राकृतिस्तस्य शिरो विभाति ॥ ५०

नीलाश्च केशाः कुटिलाश्च तस्य

कों समांसौ सुसमा च नामा।

दीर्घाश्च तस्याङ्गुलय. सुपीः

पद्धयां कराभ्यां दशनाश्च शुमाः ॥ ५१

समुन्नत. पड्भिरुदारचीर्य-

रित्रभिर्गभीरस्त्रियु च प्रलम्पः ।

रक्तस्तथा पश्चसु राजपुत्र:

कृष्णचतुर्भिस्त्रिभिरानतोऽपि ॥ ५२

द्वाभ्यां च शुक्ल. सुरभिश्चतुर्मिः

दृश्यन्ति पनानि दशैव चास्य ।

कन्या को याचना करने आया हूँ। उसे आप प्रदान करें।

हे देवगण! तदनन्तर भास्कर ने गृहागत द्विजश्रेष्ठ वसिष्ठ को राजा संवरण के लिये तपती नामक यह कन्या समर्पित कर दी। (४६)

तदुपरान्त सूर्यपुत्री को लेकर पसिष्ठ अपने पवित्र आश्रम में आये । उस कन्या ने भी उस राजपुत्र का स्मरण पर वसिष्ठ से हाथ जोड़कर कहा । (४७)

तपती ने कहा-हे ब्रह्मन् ! खेयुक्त होकर परिचारिका अप्सराओं के साथ मैंने वन मे देवपुत्र तुल्य जिस राजपुत्र को देसा था उसको में लक्षणों से जानती हूँ। (४८)

उसके दोनों शुभ चरण धम, गदा एवं असि के चिन्हों से युक्त है, उसकी जड्वायें तथा ऊरु हाथी के शुण्ड सदृश हैं, तथा उसकी कटि सिंह की कटि के समान है तथा त्रिवली

निरद्ध उसका मध्य भाग अत्यन्त कृश (४६)

उसकी प्रीवा शङ्ख के सदृश है, दोनों भुजायें मोटी, कठोर एवं दीर्घ है, दानों करतल पद्मदल से चिहित है तथा उसका मस्तक छत्र सदृश सुशोभित है। (५०)

उसके केश नीले तथा घुघराले हैं, दोनों कर्ण मांसल है, नासिका सुडौल है, उसके हाँथों ए पैरों की अँगुलियाँ सुन्दर पर्व वाली एव दीर्घ है तथा उसके दांत शुभ्र हैं। (५१)

वह महावीर्यवान् राजपुन छ स्थानों से उन्नत, तीन स्थानों से गभीर और तीन स्थानों से लम्बा पाँच स्थानों से बाल, चार स्थानों से काला और तीन स्थानों से नन्न है। (५२)

वह दो स्थानों से शुक्ल तथा चार स्थानों से सुगन्धित है । उसके दस स्थानों पर कमल दिखलाई पड़ते हैं। हे

१. रामचन्द्रभट्ट कृत वामनपुरम को संस्कृत टीका के अनुसार ५२खें तथा ५५वें श्लोक के पूवार्थ का मर्थ इस प्रकार है-सलाट, स्कन्ध, गण्ड, पोवा, कटि तथा कल्यै छ धैग उनत है, नाभि, मध्य तया बनु ये तीन भंग गम्मोर है, दोनों भुजाये सवा मण्डकोप ये सीन धंग प्रलम्ब हैं। दोनों नेत्र-प्रान्त, अपर, हस्तन्य, पारस्य तया नस ये पांच रत है, केश, पदम मोर कनोनिरा ये पार अंग कृष्ण है, माय, नेत्रप्रान्तप, तया कर्ग:स नम्र हैं, दन्त दया नेत्र दो अंग शुक्ल वर्ग के हैं, केश, मुख तथा गाय ये चार बंग सुगन्धित है।

यृतः स भर्ता भगवान् हि पूर्व

तं राजपुत्रं भुवि संविचिन्त्य ॥ ५३

ददस्व मां नाथ तपस्विनेऽस्मै

गुणोपपनाय समीहिताय ।

नेहान्यकामा प्रवदन्ति सन्तो

दातुं तथाऽन्यस्य विभो क्षमस्व ।। ५४

देवदेव उवाच ।

इत्येवमुक्तः सवितुश्च पुच्या

ऋपिस्तदा ध्यानपरो बभूव ।

ज्ञात्वा च तत्रार्कसुता सकामां

सुदा युतो वाक्यमिदं जगाद ॥ ५५

स एव पुत्रि नृपतेस्तनूजो

दृष्टः पुरा कामयसे यमद्य ।

स एव चायाति ममाश्रम वै

ऋक्षात्मजः संवरणो हि नाम्ना ॥५६

अथाजगाम स नृपस्य पुत्र-

स्तमाश्रम ब्राह्मणपुंगवस्य ।

दृष्ट्वा वसिष्ठं प्रणिपत्य मूर्घ्वा।

स्थितस्त्वपश्यत् तपती नरेन्द्रः ॥५७

दृष्ट्वा च तां पद्मविशालनेत्रां

ता पूर्वदृष्टामिति चिन्तयित्वा ।

पप्रच्छ केयं ललना द्विजेन्द्र

स वारणिः प्राह नराधिपेन्द्रम् ॥ ५८

इयं विवस्वदुहिता नरेन्द्र

नाम्ना प्रसिद्धा तपती पृथिव्याम् ।

मया तपार्थाय दिवाकरोथित.

प्रादान्मया त्वाश्रममानिनिन्ये ॥ ५९

तस्मात् समुचिष्ठ नरेन्द्र देव्याः

पाणिं तपत्या विधिवद् गृहाण ।

इत्येवमुक्तो नृपतिः प्रहटो

जग्राह पाणिं विधिवत् तपत्याः ॥ ६०

सा तं पति प्राप्य मनोऽभिरामं

सूर्यात्मजा शक्रसमप्रभावम् ।

रराम तन्वी भवनोत्तमेषु

यथा महेन्द्रं दिवि दैत्यकन्या ॥ ६१

इति श्रीवामनपुराणों द्वाविंशोऽध्याय ॥२२॥

भगवन् । मैंने पृथ्वी पर उस राजपुत्र को विचारपूर्वक पहले ही पति रूप से वरण किया है। (५३)

हे नाथ । गुणोपपन्न तथा अभीष्ट उस तपस्यो के निमित्त मुझे प्रदान करें।सन्तों का यह कहना है कि अन्य की कामना करने वाली स्त्री को किसी दूसरे को नहीं देना चाहिये । हे विभो । मुझे क्षमा करें। (५४)

देव देव ने कहा-तब सूय-पुत्री के ऐसा कहने पर ऋषि ध्यानमग्न हो गये और सूर्य पुत्री को उस कुमार में आसक्त जानकर प्रसन्नता पूर्वक यह वचन कहे। (५२)

हे पुनि । जिसको तुम आज कामना कर रही हो उसी राजपुत्र को तुमने पहले देखा था। यही सवरण नामक ऋक्ष-पुत्र मेरे आश्रम मे आ रहा है। (५६)

तदनम्तर वह राजकुमार ब्राझणश्रेष्ठ वसिष्ठ के आश्रम मे आया । उस नरेन्द्र ने वसिष्ठ को देखकर शिर झुकाकर  प्रणाम किया और बैठने पर तपती को देसा। (५७) कमल के सदृश विशाल नेनोंवाली उसो देखकर उसने सोचा कि इसे मैंने पहले भी देखा है। उसने पूछा है द्विजवर। यह ललना कौन है तब घरुणपुत्र ने राजेन्द्र (सवरण) से कहा- (५८)

हे नरेन्द्र । पृथ्वी में तपती नाम से प्रसिद्ध यह सूर्य की पुत्री है । तुम्हारे लिये मेरे माँगने पर दिवाकर ने इसे मुये दे दिया और मैं आश्रम मे लाया हूँ। (५९)

"अत' हे नरेन्द्र । उठो एव विधिवत् तपती देवी का पाणिग्रहण करो। ऐसा कहे जाने पर अतिर्षित नृपति ने तपती का विधिवत् पाणिग्रहण किया । (६०)

वह सूर्य-तनया (तपती) इन्द्र तुल्य प्रभावशाली उस मनोहर पति को पाकर उत्तम महलों में इस प्रकार रमण करने लगी जैसे स्वर्ग में महेन्द्र को पाकर दैत्यकन्या (पौलोमी) विहार करती है। (६१)

श्रीवामनपुराण बाहसवाँ अध्याय समाप्त ॥२२॥